Friday, September 18, 2026

सुविधाजनक फिल्टर हैं कान

सुविधाजनक फिल्टर हैं कान 

कानों का काम सिर्फ़ सुनना नहीं होता। कभी-कभी अनसुना भी करना पड़ता है। हमारे समय में तो यह एक जरूरी सामाजिक कौशल बन गया है। जो हर बात सुन ले, वह परेशान रहता है; जो सुविधानुसार सुनता है, वह चैन से रहता है।

पहले कान सुनते थे, दिमाग समझता था और फिर आदमी प्रतिक्रिया देता था। अब कान और दिमाग के बीच एक सुविधाजनक फिल्टर लग गया है। जो बात अच्छी लगे, उसे भीतर जाने दो। जो सवाल खड़ा करे, उसे बाहर ही रोक दो।

घर में इसकी शुरुआत होती है। पत्नी कहती है—सब्जी लेते आइए, आवाज साफ सुनाई देती है। बच्चा फीस की याद दिलाता है, वह भी सुनाई देता है। लेकिन जैसे ही पत्नी शॉपिंग के लिए जाने की बात करती है, कान अचानक तकनीकी खराबी की चपेट में आ जाते हैं—“क्या कहा? आवाज नहीं आई।”

राजनीति में यह कला और परिष्कृत है। जनता बेरोजगारी, महंगाई और खराब सड़कों की शिकायत करे तो आवाज धीमी पड़ जाती है। मगर प्रशंसा का एक वाक्य हजारों किलोमीटर दूर से भी साफ सुनाई देता है। आलोचना शोर है, प्रशंसा संगीत।

सोशल मीडिया ने अनसुना करना और आसान कर दिया है। कोई तथ्य रखे, सवाल पूछे, तर्क दे—अंगूठा चलाइए और अगली पोस्ट पर पहुँच जाइए। जवाब देने की झंझट भी खत्म, असहमति सुनने की मजबूरी भी।

अब सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले से सवाल किया जाता है। व्यवस्था की कमी बताइए तो पूछा जाएगा—“पहले अपने घर का हिसाब दो।” भ्रष्टाचार की बात कीजिए तो आपकी नीयत पर चर्चा शुरू हो जाएगी। अन्याय की ओर ध्यान दिलाइए तो विषय बदलकर देशभक्ति पर बहस शुरू हो जाएगी।

यह तकनीक बड़ी सुविधाजनक है—मुद्दा सुनना ही नहीं , मुद्दा उठाने वाले को सुनाते रहो।

धीरे-धीरे यही आदत समाज में उतरती है। सड़क पर घायल आदमी पड़ा हो तो हम आगे बढ़ जाते हैं। पड़ोसी के साथ अन्याय हो तो दरवाजा बंद कर लेते हैं। किसी कमजोर की आवाज उठे तो सोचते हैं—“हमारा क्या लेना-देना?”

बेशक, हर आवाज सुनना जरूरी नहीं। अफवाह, शोर और निरर्थक बहस से दूरी रखना समझदारी है। लेकिन सच और असुविधाजनक सवालों से बचना समझदारी नहीं, सुविधा है।

कान का बहरा होना दुर्भाग्य है, मगर विवेक का बहरा हो जाना उससे भी बड़ा संकट है। क्योंकि तब आदमी सुनता सब है—लेकिन वही, जो उसे सुनना अच्छा लगता है।

लगातार अनसुना करने का एक खतरा अवश्य है। एक दिन आदमी बाहर की आवाजों के साथ अपने भीतर की आवाज भी सुनना बंद कर देता है। अंतरात्मा पहले धीरे-धीरे बोलती है, फिर थककर चुप हो जाती है। उसे भी पता चल जाता है कि इस समय उसकी शायद कोई खास राजनीतिक उपयोगिता नहीं रही है। 

ब्रजेश कानूनगो


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