Thursday, August 6, 2026

उत्तरविहीन गणतंत्र के प्रवक्ता

उत्तरविहीन गणतंत्र के प्रवक्ता

राजनीति में पहले दो ही प्रजातियाँ मानी जाती थीं—नेता और कार्यकर्ता। नेता बोलता था, कार्यकर्ता उसे सही सिद्ध करता था। नेता चलता था, कार्यकर्ता पीछे-पीछे चलता था। नेता यदि भूल से गलत दिशा में भी निकल पड़ता, तो कार्यकर्ता उसी रास्ते को ऐतिहासिक बताकर उसके दोनों ओर झंडे लगा देता था। लोकतंत्र की यही सरल जैविक संरचना थी।

फिर समय बदला। टेलीविजन आया। कैमरे आए। प्राइम टाइम आया। और राजनीति ने विकास की एक नई प्रजाति को जन्म दिया—प्रवक्ता।

कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। लेकिन राजनीतिक दलों में प्रवक्ता का जन्म आवश्यकता से अधिक टीवी चैनलों की भूख का परिणाम था। चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों को हर शाम युद्ध चाहिए था। युद्ध के लिए योद्धा चाहिए थे। नेता व्यस्त थे, कार्यकर्ता अनुभवहीन थे। इसलिए दोनों के बीच से एक ऐसा जीव विकसित हुआ जो हर विषय पर बोल सकता था, चाहे उसे विषय का ज्ञान हो या न हो। ज्ञान से अधिक आवश्यक था आत्मविश्वास और आवाज़ का वॉल्यूम।

धीरे-धीरे प्रवक्ता पार्टी का चेहरा नहीं, उसका कवच बन गया। नेता गलती करे तो प्रवक्ता सफाई देता है। नेता चुप रहे तो प्रवक्ता बोलता है। नेता कुछ ऐसा बोल दे जिसकी सफाई देना भी कठिन हो, तब भी प्रवक्ता मुस्कराते हुए उसे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैचारिक और संदर्भगत बताकर राष्ट्रहित में समाहित कर देता है।

टीवी स्टूडियो आजकल लोकतंत्र के अस्थायी युद्धक्षेत्र हैं। यहाँ तलवारें नहीं चलतीं, तथ्यों के नाम पर पुराने वीडियो चलते हैं। गोले नहीं दागे जाते, बल्कि स्क्रीन पर लाल रंग की पट्टियाँ फटती रहती हैं—"बड़ी खबर", "सबसे बड़ा खुलासा", "देश पूछ रहा है।"

देश बेचारा शायद उस समय रिमोट ढूँढ़ रहा होता है।

स्टूडियो में बैठा एंकर स्वयं न्यायपालिका, अभियोजन पक्ष, विपक्ष, गवाह और कभी-कभी जनता भी बन जाता है। उसके प्रश्नों की गति इतनी तेज़ होती है कि उत्तर यदि कहीं मौजूद भी हो तो घबराकर बाहर आने से इनकार कर देता है।

प्रवक्ता भी कम साधक नहीं होते। वर्षों के अभ्यास के बाद वे उत्तर देने की कला से ऊपर उठ चुके हैं। अब वे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते, प्रश्नों का पुनर्जन्म कराते हैं।

"महँगाई क्यों बढ़ी?"

"पहले यह बताइए, आपके समय में क्या फूल बरस रहे थे?"

"बेरोज़गारी पर क्या कहेंगे?"

"आपको पिछले पचास वर्षों की बेरोज़गारी दिखाई नहीं देती?"

"इस मुद्दे पर आपका उत्तर क्या है?"

"पहले आप यह स्पष्ट कीजिए कि आपका प्रश्न निष्पक्ष है भी या नहीं?"

प्रश्न बेचारा अपने उत्तर की प्रतीक्षा करता रह जाता है और बहस अगले प्रश्न की ओर प्रस्थान कर जाती है।

मुझे लगता है कि भविष्य में विश्वविद्यालयों में 'प्रवक्ता विज्ञान' नाम का नया विषय शुरू होना चाहिए। उसके पाठ्यक्रम में कुछ अनिवार्य अध्याय होंगे—बिना उत्तर दिए पाँच मिनट बोलना, विषय बदलने की उन्नत तकनीक, प्रतिप्रश्न का व्यावहारिक प्रशिक्षण, मुस्कराते हुए क्रोधित दिखना और समय समाप्त होने तक मूल मुद्दे को सुरक्षित रूप से गायब कर देना।

अंतिम वर्ष में शोध प्रबंध का विषय होगा—"उत्तर लोकतंत्र के लिए कितना आवश्यक है?"

टीवी बहसें देखकर मुझे अब शैलेन्द्र का गीत थोड़ा संशोधित रूप में याद आता है—

"एक सवाल तुम करो,

एक सवाल मैं करूँ,

उत्तर कहीं न मिल सके,

बस सिलसिला यही चलूँ।"

अब लगता है कि हमारे समय में उत्तर सबसे असुरक्षित प्राणी है। वह स्टूडियो में प्रवेश करने से पहले ही लापता हो जाता है। चारों ओर सवालों का विराट उद्योग चल रहा है, लेकिन उत्तर का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।

हो सकता है किसी दिन संसद में नहीं, किसी टीवी स्टूडियो में यह घोषणा हो—

"देश में उत्तरों की भारी कमी है। फिलहाल अगले आदेश तक काम चलाने के लिए प्रश्नों से ही काम लिया जाए।"

ब्रजेश कानूनगो 


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