Tuesday, August 25, 2026

महंगाई सुरसा भई!

महंगाई सुरसा भई! 

महंगाई अब आर्थिक समस्या भर नहीं रही। वह हमारे राष्ट्रीय जीवन की स्थायी सदस्य बन चुकी है। महंगाई सुरसा हो गई है। आदमी अपने खर्च को जितना छोटा करता है, उसका मुँह उतना ही बड़ा होता जाता है। पहले सब्जी महँगी हुई तो दाल का सहारा लिया। दाल महँगी हुई तो आलू बचा। आलू ने भी आँखें तरेरीं तो दूध रोटी की ओर देखा। दूध महंगा हुआ तो चटनी की ओर देखा। अब रोटी भी ऐसी लगती है जैसे कोई पुराना रिश्तेदार हो। 

घर का बजट अब बजट नहीं, शोकपत्र हो गया है। वेतन आते ही राशन, बिजली, गैस, स्कूल की फीस, दवा और किराया उसे बाँट लेते हैं। महीने के अंत में जेब में जो बचता है, उसे बचत कहा जाता है। यह अलग बात है कि उसे बचाने के लिए आदमी को अपने कई छोटे-छोटे सुखों की हत्या करनी पड़ती है।

महंगाई ने आदमी को अर्थशास्त्री बना दिया है। गृहिणी बाजार जाने से पहले ऐसी गणना करती है कि बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के ग्राफ उसके सामने फीके लगें। बाजार में अब लोग खरीदारी कम और कीमत पूछने का अभ्यास अधिक करते हैं। कीमत सुनकर ग्राहक वस्तु को देखता है, फिर दुकानदार को और अंततः अपनी जेब को। तीनों के बीच एक मौन समझौता होता है और वस्तु वहीं रह जाती है।

राजनीतिज्ञों  का महंगाई से पुराना रिश्ता है। चुनाव के पहले नेता जनता के सामने याचक होता है। हाथ जुड़े होते हैं, आवाज में मिठास होती है और जनता को मालिक बताया जाता है। सत्ता मिलते ही दृश्य बदल जाता है। याचक भरतार हो जाता है और जनता फिर याचक।

जनता पूछती है—महंगाई क्यों बढ़ी?

उत्तर आता है—वैश्विक परिस्थितियाँ कठिन हैं।

जनता कहती है—घर चलाना मुश्किल है।

उत्तर मिलता है—अर्थव्यवस्था मजबूत है।

जनता रोजगार पूछती है तो आत्मनिर्भर बनने की सलाह मिलती है। कीमत पूछती है तो विकास का आँकड़ा सामने रख दिया जाता है। इस तरह हर सवाल का उत्तर मिल जाता है, सिवाय उस सवाल के जो वास्तव में पूछा गया था।

आँकड़े महंगाई का सबसे सुविधाजनक पर्दा हैं। जनता कहती है कि थैला खाली हो गया, विशेषज्ञ बताते हैं कि महंगाई दर नियंत्रित है। जनता अपनी जेब दिखाती है, सरकार ग्राफ दिखाती है। ग्राफ ऊपर-नीचे होता रहता है, लेकिन रसोई का खर्च लगातार ऊपर जाता रहता है।

कुर्सी पर बैठते ही आदमी जमीन से थोड़ा दूर हो जाता है। नीचे खड़ी जनता कहती है कि दाल महँगी है, ऊपर बैठे लोग बताते हैं कि देश विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है। जनता पूछती है कि उस बड़ी अर्थव्यवस्था में उसकी छोटी-सी रोटी कहाँ है, तो उत्तर राष्ट्रहित की ऊँचाई पर चला जाता है।

महंगाई केवल कीमतें नहीं बढ़ाती, इच्छाएँ घटाती है। बच्चे की छोटी माँग टलती है, बीमारी का इलाज टलता है, कपड़ों की खरीद टलती है, घूमना टलता है। धीरे-धीरे आदमी जीवन जीने के बजाय केवल जीवन चलाने लगता है।

जनता को शरबत पीने की सलाह देने से पहले यह देखना होगा कि उसके घर में पानी तो है, शकर किस भाव मिल रही है ।

महंगाई का दैत्य अब इतना बड़ा हो गया है कि उससे लड़ना समय की मांग है। सत्ता चाहे जिसकी हो, जनता का सवाल वही रहेगा—रोटी कितनी महँगी है और जीवन कितना बचा है? बाकी सब जवाब हैं। बस हिसाब नहीं।


ब्रजेश कानूनगो 

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