भौंकते - काटते माहौल में जीवन
साधुरामजी आजकल बहुत चिंतित हैं। चिंता का कारण महँगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण या लोकतंत्र पर मंडराता कोई संकट नहीं, बल्कि मनुष्य में बढ़ती भौंकने और काटने की प्रवृत्ति है।
उनका मानना है कि आदमी और कुत्ते में अंतर तेजी से कम होता जा रहा है। कुत्ता सामने वाले को देखकर भौंकता है, आदमी मोबाइल देखकर। अंतर केवल इतना है कि कुत्ते का भौंकना गली तक सीमित रहता है और आदमी का भौंकना सोशल मीडिया के रास्ते पूरी दुनिया का चक्कर लगा आता है।
वैसे भौंकना कोई अस्वाभाविक क्रिया नहीं है। चिड़िया चहचहाती है, बकरी मिमियाती है, कौआ काँव-काँव करता है, कोयल कूकती है, गधा रेंकता है और मनुष्य बोलता है। बोलने से काम न चले तो वह चिल्लाता है, चिल्लाने से काम न चले तो गरजता है और गरजने से भी काम न बने तो भौंकने लगता है। लोकतंत्र ने उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है और सोशल मीडिया ने चौबीस घंटे का लाउडस्पीकर।
भौंकने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें तर्क की जरूरत नहीं पड़ती। तर्क देने के लिए पढ़ना पड़ता है, सोचना पड़ता है, तथ्य जुटाने पड़ते हैं। भौंकने के लिए केवल आवाज और आत्मविश्वास चाहिए। आजकल दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
पहले लोग अपनी बात कहते थे, फिर अपनी बात मनवाने लगे और अब अपनी बात ट्रेंड करवाने लगे हैं। विचार की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है। किसी खबर का सच सामने आने में समय लगता है, लेकिन उस पर भौंकने में एक सेकंड भी नहीं लगता। सोशल मीडिया ने इस कला को इतना लोकतांत्रिक बना दिया है कि अब हर जेब में एक छोटा-सा मंच और हर हाथ में एक अदृश्य माइक है।
लेकिन भौंकना अभी भी अपेक्षाकृत अहिंसक क्रिया है। असली समस्या काटने की है।
काटना केवल दाँतों से नहीं होता। शब्द भी काटते हैं, आरोप भी, व्यंग्य भी और कभी-कभी प्रेम भी। राजनीति में तो काटने की अनेक प्रजातियाँ विकसित हो चुकी हैं—टिकट काटना, पत्ता काटना, कद काटना, पद काटना और अंततः कुर्सी काटना। आज जो गले मिल रहा है, वह कल अवसर मिलते ही आपकी राजनीतिक जड़ काट सकता है।
सार्वजनिक जीवन में असहमति आवश्यक है। मगर असहमति जब तर्क छोड़कर व्यक्तिगत आक्रमण बन जाए तो लोकतांत्रिक संवाद की जगह दाँत दिखाई देने लगते हैं। विचार कमजोर पड़ते ही आवाज ऊँची होती है और तर्क समाप्त होते ही भाषा में नाखून निकल आते हैं।
सबसे विचित्र स्थिति यह है कि सब बोलना चाहते हैं, कोई सुनना नहीं चाहता। हर व्यक्ति प्रसारण केंद्र बना हुआ है और दूसरे के सिग्नल को जाम करने में व्यस्त है। परिणाम सामने है—संवाद कम हो रहा है, शोर बढ़ रहा है।
ऐसे में सरकार को ‘राष्ट्रीय भौंकन नियंत्रण मिशन’ शुरू कर देना चाहिए। विद्यालयों में बच्चों को सिखाया जाए कि असहमति जताने के लिए दाँत दिखाना जरूरी नहीं। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले एक छोटी-सी मशीन पूछे—‘क्या आपने सोचा भी है?’ और उत्तर ‘नहीं’ होने पर पोस्ट अपने आप ड्राफ्ट में चली जाए।
हालाँकि यह योजना सफल होगी, इसकी संभावना कम है। क्योंकि जिस समाज में भौंकने को विचार और काटने को तर्क समझने का चलन बढ़ रहा हो, वहाँ सबसे पहले उसी मशीन को ही संदिग्ध घोषित कर दिया जाएगा।
साधुरामजी ने जाते-जाते कहा—‘मित्र, भौंकने वालों से तो फिर भी बचा जा सकता है, काटने वालों से कैसे बचेंगे?’
मैंने कहा—‘बहुत आसान है। भौंकने वाले को देखकर रास्ता बदल लेना, काटने वाले को देखकर दूरी बना लेना और जो भौंकते भी हैं और काटते भी—उनका बहिष्कार करिए।’
साधुरामजी मेरी ओर देखने लगे। फिर बोले—‘और अगर वही लोग हमे घेर बैठे हों?’
मैंने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर एक कुत्ता लगातार भौंक रहा था और सामने से एक हाथी निर्विकार चला जा रहा था।
मैंने कहा—‘तब हाथी बन जाइए साधुरामजी। लोकतंत्र में भौंकने वालों की संख्या कभी कम नहीं होगी; असली संकट तब है, जब हाथी भी डरकर दिशा बदलने लगे।’
पता नहीं साधुरामजी मेरे सुझाव से संतुष्ट हुए या नहीं।
ब्रजेश कानूनगो