शर्म की उपलब्धि
किसी जमाने में शर्म की बात पर आदमी सिर झुका लिया करता था। अब सिर ऊँचा करने का जमाना है—खासकर तब, जब सिर ऊँचा करने के लिए कोई उपलब्धि न हो। ऐसे में शर्म की बात को ही गर्व की बात घोषित कर दिया जाता है। आत्मसम्मान भी बचा रहता है और उपलब्धि का भ्रम भी।
लोकतंत्र की असली सफलता शायद यही है कि अब हमें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं पड़ती। जो बात कभी व्यवस्था की नाक कटने का कारण बनती थी, आज वही उसकी नाक की ऊँचाई मापने का पैमाना है।
सड़क में गड्ढे हों तो कहिए—यह विकास की गहराई है। अस्पताल में डॉक्टर न मिले तो स्वास्थ्य व्यवस्था आत्मनिर्भर है। स्कूल में शिक्षक न हों तो बच्चों में स्वावलंबन पैदा किया जा रहा है। रोजगार न मिले तो युवाओं को नौकरी की मानसिकता से बाहर निकाला जा रहा है। महँगाई बढ़े तो जनता को कम में जीने की कला सिखाई जा रही है।
किसान की फसल खराब हो जाए तो यह संकट नहीं, उसके धैर्य की परीक्षा है। शहर पानी में डूब जाए तो जलभराव नहीं, प्रकृति से आत्मीय संवाद है।
सबसे सुविधाजनक उपाय है—समस्या को समस्या मानने से इनकार कर देना।
कोई सवाल पूछे तो सवाल से ज्यादा सवाल पूछने वाले की नीयत पर बहस होने लगती है। आंकड़े मांगने वाला नकारात्मक है, जवाब मांगने वाला व्यवस्था-विरोधी और असहमति जताने वाला विकास-विरोधी। इस तरह समस्या अपनी जगह रहती है, बस चर्चा का विषय बदल जाता है।
लोकतंत्र में जनता को बोलने की पूरी आजादी है। वह चाहे तो चुप भी रह सकती है। बल्कि कई बार चुप रहना ही समझदार नागरिकता का प्रमाण माना जाता है। सवाल पूछने वाला नागरिक असुविधाजनक होता है; वह हिसाब मांगता है। सुविधाजनक नागरिक तालियां बजाता है।
उपलब्धियों का व्याकरण भी सरल हो गया है। योजना की घोषणा हो गई—उपलब्धि। शिलान्यास हो गया—विकास। उद्घाटन हो गया—राष्ट्र निर्माण। परिणाम कब आएगा, यह अगली घोषणा के भरोसे छोड़ दिया जाता है। जनता भी इस व्याकरण में अभ्यस्त हो रही है। जिस चीज की कल शिकायत थी, आज उसी पर गर्व करना सीख रही है। परेशानी को नियति मान लेना और फिर नियति का उत्सव मनाना—नागरिक परिपक्वता का नया मॉडल है।
बेचारी शर्म अब बेरोजगार है। जिस दृश्य को देखकर उसे पैदा होना था, उसी दृश्य पर आज सम्मान समारोह हो रहा है। शर्म को छिपाया नहीं जाता, उसका पोस्टर लगाया जाता है।
इसलिए अगली बार आपको लगे कि हालात बिगड़ रहे हैं, समस्याएँ बढ़ रही हैं और जिम्मेदारी तय नहीं हो रही, तो परेशान मत होइए। संभव है, कल उसी समस्या को किसी आकर्षक नाम के साथ उपलब्धि घोषित कर दिया जाए।
और जिस दिन जनता भी उस पर गर्व करने लगे, समझ लीजिए—जनतंत्र बढ़िया चल रहा है।
बस यह पता नहीं कि चल कहाँ रहा है।
ब्रजेश कानूनगो