विकास की साइकिल
महँगाई ने हमें आत्मनिर्भर बना दिया है। पेट्रोल सौ के पार गया तो मोटर-साइकिल की उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न लग गया। साइकिल उठाइए, स्वास्थ्य भी बचाइए और देश का पुराना गौरव भी। फर्क बस इतना है कि पहले साइकिल साधन थी, अब समाधान है।
कल तक साइकिल विकास की दौड़ में पीछे छूटे आदमी की सवारी थी; आज वही पर्यावरण, स्वास्थ्य और संस्कृति—तीनों की ब्रांड एंबेसडर है। पेट्रोल महँगा होने का इससे सुंदर सदुपयोग और क्या हो सकता है!
गैस सिलेंडर की कीमत देखकर गृहिणी ने पूछा—“अब खाना कैसे बनेगा?”
पति बोला—“हमारे पूर्वज गैस के बिना भी खाना बनाते थे।”
“कैसे?”
“गोबर के उपले जलाकर।”
“तो भैंस भी ले आइए।”
पति ने भैंस का भाव सुना और चुप हो गया। उसे लगा, सिलेंडर अभी भी सस्ता है।
यही हमारे समय का नया अर्थशास्त्र है। आधुनिक सुविधा महँगी हो तो उसके अभाव को परंपरा का नाम दे दीजिए। डीजल का खर्च बढ़े तो हल-बैल की महिमा गाइए, गैस महँगी हो तो चूल्हे की संस्कृति याद कीजिए। सवाल यह नहीं कि पुरानी चीजों में मूल्य है या नहीं; सवाल यह है कि क्या नागरिक को विकल्प दिया जा रहा है या मजबूरी को विकल्प बताया जा रहा है।
किसान से कहा जाता है—“धरती से जुड़िए।”
किसान मुस्कराकर पूछ सकता है—“मैं तो पहले से जुड़ा हूँ, सरकार बाजार से कब जोड़ेगी?”
यह सवाल इसलिए असुविधाजनक है क्योंकि मिट्टी की बात करना आसान है, मिट्टी में पसीना बहाने वाले की बात करना कठिन।
हमें अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। प्राकृतिक खेती, पशुधन, स्थानीय संसाधन—इनमें भविष्य के लिए भी बहुत कुछ है। लेकिन अतीत का सम्मान तब सार्थक है, जब वह भविष्य का रास्ता खोले; यदि वह सुविधाओं की कमी को ढकने का परदा बन जाए, तो व्यंग्य पैदा होना स्वाभाविक है।
मिट्टी के चूल्हे पर बनी रोटी की तस्वीर मनमोहक है। उसके नीचे ‘सात्विक जीवन’ लिखते ही तस्वीर और भी सुंदर हो जाती है। मगर जिस स्त्री की आँखों में रोज धुआँ भरता है, उससे पूछना भी जरूरी है कि वह इसे संस्कृति कहती है या सुविधा का अभाव।
हमारे पूर्वजों ने भी जीवन को आसान बनाने के लिए नए साधन बनाए थे। पहिए से बैलगाड़ी और बैलगाड़ी से मोटर तक की यात्रा इसी जिजीविषा की कहानी है। इसलिए पीछे लौटना अपने आप में गौरव नहीं हो सकता।
कल बिजली महँगी हुई तो शायद सलाह मिले—“दीया जलाइए, भारतीय संस्कृति बचाइए।”
तेल महँगा हुआ तो कहा जाएगा—“चाँदनी का उपयोग कीजिए।”
और यदि चाँदनी पर भी कोई शुल्क लग गया, तो सितारों को देखकर संतोष करने की सलाह मिल सकती है।
व्यंग्य यहीं जन्म लेता है—जब जेब खाली होने को सादगी, महँगाई सहने को त्याग और सुविधा छिनने को संस्कृति कहा जाने लगे।
अतीत हमारा गौरव है, लेकिन भविष्य का विकल्प नहीं। बैलगाड़ी हमारी विरासत हो सकती है, एंबुलेंस का विकल्प नहीं। उपला परंपरा हो सकता है, हर रसोई की अनिवार्यता नहीं। साइकिल स्वास्थ्य के लिए अच्छी है, पेट्रोल महँगा होने का प्रमाणपत्र नहीं।
कहीं ऐसा न हो कि विकास की गाड़ी इतनी पीछे लौट जाए कि हम इतिहास में पहुँच जाएँ और फिर गर्व से घोषणा करें—
“देश बहुत आगे बढ़ चुका है—
बस दिशा उलटी थी, इसलिए दिखाई नहीं दिया।”
ब्रजेश कानूनगो