यूटर्न का दौर है साहब!
यूटर्न शब्द सड़क से आया है। सीधे आगे बढ़ते हुए अचानक मुड़कर वापस उसी रास्ते पर लौट आना। इसका एक दूसरा अर्थ भी है। पहले जो निर्णय लिया हो, जिस बात पर अड़े रहे हों, कुछ समय बाद उसी को पलटकर पीछे लौट आना। सड़क पर यूटर्न लेने के लिए संकेतक और निर्धारित जगह की जरूरत होती है, लेकिन राजनीति में इसकी कोई बाध्यता नहीं। वहां बिना इंडिकेटर, बिना ब्रेक और बिना किसी अपराधबोध के यूटर्न लिया जा सकता है।
पहले नेता कोई बात कहते थे तो उनके समर्थक उसे सिद्धांत मानकर वर्षों तक ढोते थे। अब नेता कोई बात कहते हैं तो समर्थकों को भी पता रहता है कि इसका अगला संस्करण जल्दी ही आने वाला है। कल तक जो विरोधी भ्रष्ट, अयोग्य और देशहित के खिलाफ था, आज राजनीतिक जरूरत के मुताबिक योग्य, विश्वसनीय और राष्ट्रवादी हो सकता है। विचारधारा अब स्थायी प्रतिबद्धता नहीं, जरूरत के मुताबिक बदला जाने वाला परिधान हो गई है।
इस कला में नेताओं ने इतनी महारत हासिल कर ली है कि उनके पुराने भाषण सुनकर लगता है जैसे कोई दूसरा व्यक्ति बोल रहा हो। विपक्ष में रहते हुए पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर आंदोलन करने वाले सत्ता में पहुंचकर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की दुहाई देने लगते हैं। महंगाई तब सरकार की नाकामी होती है, अब वैश्विक मजबूरी। जिस नीति को कल तक जनविरोधी बताया जाता था, आज वही विकास का अनिवार्य रास्ता बन जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुर्सी बदलते ही तर्क भी बदल जाते हैं।
संसद भी इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं है। जो बात कल तक लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जरूरी थी, आज अनुशासनहीनता हो सकती है। जिस संशोधन का कभी विरोध किया गया था, सत्ता की जरूरत पड़ने पर वही ऐतिहासिक निर्णय बन जाता है। कभी-कभी लगता है कि संसद में कानून बनाने से ज्यादा मेहनत पुराने बयानों को नए अर्थ देने में होती है।
नीतियों और नियमों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। कोई योजना बड़े जोर-शोर से शुरू होती है। कुछ समय बाद उसके स्वरूप में बदलाव होता है, नाम बदलता है और फिर उसे नई उपलब्धि बताकर पेश कर दिया जाता है। आम आदमी समझ नहीं पाता कि वह पुरानी नीति के हिसाब से चले या नई के। किसान को नहीं पता कि अगली फसल तक नियम क्या होंगे, युवा को भरोसा नहीं कि भर्ती प्रक्रिया अपने अंजाम तक पहुंचेगी भी या नहीं। सरकारों के लिए नीति बदलना रणनीति हो सकती है, लेकिन जनता के लिए यह अक्सर सिरदर्द है।
चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर भी राजनीतिक दलों का रवैया कई बार इसी सुविधा के हिसाब से बदलता दिखाई देता है। पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग भी कई बार राजनीतिक सुविधा देखकर सक्रिय होती है और यूटर्न दिखाई देने लगते हैं। लोकतंत्र में संस्थाओं पर भरोसा जरूरी है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार भी उतना ही जरूरी है।
अब तो यूटर्न के लिए आकर्षक शब्दावली भी तैयार है। इसे कभी रणनीतिक बदलाव कहा जाता है, कभी परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय और कभी समय की मांग। नेता बयान पलटें तो स्पष्टीकरण, पार्टी गठबंधन बदले तो नई राजनीतिक परिस्थिति और सरकार फैसला बदले तो व्यापक जनहित! गलती किसी की नहीं होती, दोष हमेशा परिस्थितियों का होता है।
लगता है हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां आगे बढ़ने से ज्यादा समझदारी समय पर पीछे मुड़ने में है। जनता नेताओं से अब यह नहीं पूछती कि आप कहां जा रहे हैं, बल्कि मन ही मन यह अंदाजा लगाती है कि अगला यूटर्न कब आने वाला है। डर तो बस इतना है कि कहीं एक दिन देश को पता चले कि विकास की यात्रा में हम बहुत आगे निकल आए हैं, जबकि यूटर्न लेते-लेते उसी पुराने चौराहे पर खड़े हैं जहां से चले थे। बस, इस बार चौराहे का नाम बदलकर विकास चौक कर दिया गया है!
ब्रजेश कानूनगो