Thursday, August 20, 2026

महाराज श्रृंखला 17 : विकास का भवन

महाराज श्रृंखला 17 : विकास का भवन

महाराज ने जब अपना मंत्रिमंडल नए सिरे से गठित किया तो रियासत में एक बार फिर विकास की हवा चलने लगी।

हवा चलने के लिए वैसे भी किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। बस दिशा तय करने वाला कोई होना चाहिए। महाराज दिशा तय करने में सिद्धहस्त थे।

उन्होंने शुरुआत में इतने सारे विभाग अपने पास रख लिए कि देखने वालों को लगा, महाराज अब अकेले ही सरकार चलाएंगे। पर महाराज का उद्देश्य सरकार चलाना नहीं, सरकार को चलाते रहना था।

दरअसल कई सांसद ऐसे थे जिन्हें मंत्री बनने की बीमारी लग चुकी थी। वे लोकतंत्र में विश्वास करते थे और लोकतंत्र का अर्थ उनके लिए मंत्री पद था। जो मंत्री नहीं बन पाता था, वह लोकतंत्र को अधूरा मानता था।

महाराज जानते थे कि ऐसे लोगों को एकदम से मंत्री बना देना भी ठीक नहीं। लालच का स्वाद थोड़ी देर लगाकर दिया जाए तो उसकी भूख बढ़ती रहती है।

इसलिए महाराज ने कुछ विभाग अपने पास रखे।

दरबार में किसी ने पूछा—

“महाराज, इतने विभाग आप अकेले कैसे संभालेंगे?”

महाराज मुस्कराए।

“हम विभाग संभालने के लिए नहीं रखते। समय आने पर किसी को देने के लिए रखते हैं।”

दरबारी ने इस उत्तर को शासन-कला की नई परिभाषा समझकर अपनी डायरी में लिख लिया।

सबसे पहले शिक्षा का विभाग राजकवि ज्ञान रिपु को मिला।

ज्ञान रिपु अब तक साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे। साहित्य परिषद की अध्यक्षता में उन्होंने बहुत कुछ सीखा था—कविता से अधिक प्रशंसा करना, आलोचना से अधिक प्रशस्ति लिखना और साहित्य से अधिक सत्ता की भाषा समझना।

महाराज ने उन्हें शिक्षा मंत्री बनाते हुए कहा—

“ज्ञान रिपु, अब शिक्षा को नई दिशा देनी है।”

ज्ञान रिपु ने सिर झुकाया।

“महाराज, दिशा आप बताइए, हम पाठ्यक्रम बना देंगे।”

शिक्षा मंत्रालय में उनका स्वागत ऐसे हुआ जैसे साहित्य में कोई नई विधा जन्मी हो।

उन्होंने आते ही घोषणा की—

“शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन होगा।”

शिक्षा विभाग के पुराने अधिकारियों ने राहत की साँस ली। आमूलचूल परिवर्तन का अर्थ वे जानते थे। इसका मतलब था कि कुछ पुरानी फाइलें हटेंगी, कुछ नई फाइलें आएंगी और बीच में एक नई समिति बनेगी।

उधर महाराज ने अपने पुराने निजी सचिव काकदंत को भी सरकार में ले लिया।

काकदंत ने वर्षों तक महाराज की निजी सेवा में रहते हुए एक महत्वपूर्ण कला विकसित कर ली थी—महाराज के कहने से पहले उनकी इच्छा समझ लेना।

यह गुण सामान्य प्रशासन में बहुत उपयोगी माना जाता था।

काकदंत ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया और अगले ही दिन उच्च सदन में पार्टी की ओर से मनोनीत होकर गृह मंत्री बन गए।

लोगों ने पूछा—

“उन्होंने चुनाव कब लड़ा था?”

उत्तर मिला—

“चुनाव लड़ने की जरूरत ही क्या थी?”

लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुना जाना एक रास्ता था, महाराज के द्वारा चुना जाना दूसरा।

काकदंत दूसरे रास्ते से आए थे और सीधे गृह मंत्रालय पहुंच गए।

उन्होंने पद संभालते ही कहा—

“देश में कानून-व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

उनसे किसी पत्रकार ने पूछा—

“और लोकतंत्र?”

काकदंत ने क्षण भर सोचा और बोले—

“वह भी कानून-व्यवस्था के अंतर्गत ही आता है।”

पत्रकार ने आगे प्रश्न नहीं किया।

उधर उद्योगपति मोटा भाई काला जी ने इस बार इतिहास रच दिया था।

उन्होंने चुनाव भी लड़ा था और पूरे चुनाव अभियान में पार्टी की सेवा भी की थी। सेवा का स्वरूप आर्थिक था, इसलिए उसका उल्लेख पार्टी की बैठकों में ‘समर्पित सहयोग’ के रूप में किया गया।

काला जी भारी मतों से जीतकर आए।

कहा गया कि जनता ने उन्हें विकास के लिए चुना है।

कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि विकास ने उन्हें चुना है।

महाराज ने उन्हें उद्योग मंत्रालय दिया और साथ में परिवहन का अतिरिक्त प्रभार भी।

यह देखकर कुछ पुराने मंत्रियों को आश्चर्य हुआ।

महाराज ने समझाया—

“उद्योग और परिवहन में गहरा संबंध है। उद्योग बनेगा तो माल चलेगा, माल चलेगा तो सड़कें बनेंगी, सड़कें बनेंगी तो टोल आएगा, टोल आएगा तो विकास होगा।”

दरबार में तालियां बजीं।

किसी ने यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि माल किसका होगा और टोल किसके पास जाएगा।

इस प्रकार महाराज, ज्ञान रिपु, काकदंत और काला जी—चारों के समन्वय से देश के विकास का नया युग आरंभ हुआ।

विकास का सबसे सरल अर्थ तय किया गया—

निर्माण।

जहां कुछ दिखाई दे रहा हो, समझो विकास हो रहा है।

जहां कुछ बनाया जा रहा हो, वहां विकास हो रहा है।

जहां कुछ तोड़ा जा रहा हो ताकि नया बनाया जा सके, वहां तो और भी अधिक विकास हो रहा है।

इस पर किसी अर्थशास्त्री ने पूछा—

“लेकिन मनुष्य?”

उसे विकास विरोधी घोषित कर दिया गया।

स्कूलों के भवन बनने लगे।

एक से एक सुंदर भवन।

कहीं चार कमरे, कहीं आठ कमरे, कहीं रंगीन दीवारें, कहीं बड़े-बड़े प्रवेश द्वार।

उद्घाटन के दिन बच्चों को कतार में खड़ा किया जाता। मंत्री जी आते। फीता कटता। नारियल फूटता। फोटो खिंचती। अखबार में छपता—

“शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि।”

अगले दिन बच्चे फिर उसी पुराने कमरे में बैठ जाते।

नया भवन बंद रहता।

क्योंकि शिक्षक नहीं थे।

शिक्षा मंत्री ज्ञान रिपु ने इस समस्या को गंभीरता से लिया।

उन्होंने अधिकारियों की बैठक बुलाई।

“शिक्षक कम क्यों हैं?”

अधिकारी ने कहा—

“भर्ती नहीं हुई, मंत्री जी।”

“क्यों नहीं हुई?”

“पद खाली हैं।”

“पद खाली क्यों हैं?”

“क्योंकि नियुक्तियां नहीं हुईं।”

ज्ञान रिपु कुछ देर तक सोचते रहे। फिर बोले—

“इस समस्या का स्थायी समाधान खोजिए।”

अधिकारी ने पूछा—

“क्या शिक्षक भर्ती करें?”

ज्ञान रिपु ने चश्मा उतारकर उसे देखा।

“इतनी जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुंचिए। पहले एक समिति बनाइए।”

समिति बनी।

समिति ने रिपोर्ट दी—

“शिक्षकों की कमी है।”

रिपोर्ट के विमोचन का भव्य समारोह हुआ।

मंत्री जी ने कहा—

“सरकार इस कमी को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

अगले वर्ष फिर स्कूलों के भवन बने।

शिक्षक फिर कम हो गए।

विकास जारी रहा।

इसी बीच अस्पतालों का भी कायाकल्प होने लगा।

पुराने अस्पतालों के स्थान पर नए भवन बनने लगे।

शीशे की दीवारें, चमकदार फर्श, बड़े बोर्ड और विशाल प्रवेश द्वार।

अस्पताल देखकर लगता कि बीमारी से पहले ही स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा।

लेकिन भीतर जाने पर पता चलता कि डॉक्टरों के पद रिक्त हैं।

नर्सें कम हैं।

दवाएं भी बहुत कम हैं।

मशीनें हैं, मगर उन्हें चलाने वाला कोई नहीं।

मरीज हैं, मगर देखने वाला डॉक्टर नहीं।

एक ग्रामीण ने नए बने अस्पताल के बाहर खड़े होकर पूछा—

“डॉक्टर कब आएंगे?”

कर्मचारी ने कहा—

“पद स्वीकृत हो चुका है।”

ग्रामीण प्रसन्न हुआ।

“तो डॉक्टर भी आएगा?”

“अभी नहीं।”

“क्यों?”

“अभी नियुक्ति नहीं हुई।”

“कब होगी?”

“सरकार विचार कर रही है।”

ग्रामीण ने अस्पताल की चमचमाती इमारत की ओर देखा।

उसे लगा शायद इमारत ही इलाज करेगी।

उधर सड़कें बन रही थीं।

हाईवे बन रहे थे।

फ्लाईओवर बन रहे थे।

पुरानी सड़क के ऊपर नई सड़क, नई सड़क के ऊपर चौड़ी सड़क और चौड़ी सड़क के ऊपर फ्लाईओवर।

शहर के लोग ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाते हुए विकास को प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे थे।

काला जी का परिवहन मंत्रालय बहुत प्रसन्न था।

वे कहते—

“जहां सड़क है, वहां गति है। जहां गति है, वहां प्रगति है।”

किसी ने पूछा—

“और जहां रोजगार नहीं है?”

काला जी ने उत्तर दिया—

“वहां भी हाईवे है।”

युवाओं ने इस उत्तर को बहुत ध्यान से सुना।

देश में बेरोजगार युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही थी।

हर वर्ष नई डिग्रियां निकलतीं।

नई डिग्रियों के साथ नए बेरोजगार निकलते।

विश्वविद्यालयों के बाहर नौकरी के आवेदन पत्रों की लाइनें लंबी होती गईं।

सरकारी दफ्तरों में खाली पदों की सूची भी लंबी होती गई।

युवा कहते—

“पद खाली हैं तो भर्ती क्यों नहीं होती?”

सरकार कहती—

“प्रक्रिया चल रही है।”

युवा पूछते—

“प्रक्रिया कब पूरी होगी?”

सरकार कहती—

“उचित समय पर।”

युवा पूछते—

“उचित समय कब आएगा?”

सरकार कहती—

“यह सरकार तय करेगी।”

इस बीच युवाओं की उम्र निकलती रही।

फॉर्म भरने की फीस बढ़ती रही।

परीक्षाएं होती रहीं।

कभी परीक्षा स्थगित हुई, कभी परिणाम।

कभी नियुक्ति रुकी, कभी भर्ती न्यायालय पहुंची।

युवा धीरे-धीरे प्रतियोगी परीक्षाओं के विशेषज्ञ होते गए।

वे इतिहास, भूगोल, संविधान और सामान्य ज्ञान पढ़ते-पढ़ते यह भी सीख गए कि बेरोजगार रहने का धैर्य कैसे रखा जाता है।

देश में बेरोजगारी बढ़ी।

लेकिन विकास दर भी बढ़ी।

इमारतें बढ़ीं।

सड़कें बढ़ीं।

फ्लाईओवर बढ़े।

उद्घाटन बढ़े।

समारोह बढ़े।

भाषण बढ़े।

बैनर बढ़े।

लेकिन नौकरी घटती गई।

शिक्षा मंत्री ज्ञान रिपु ने एक दिन संसद में घोषणा की—

“देश में शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।”

सांसदों ने मेज थपथपाई।

गृह मंत्री काकदंत ने कहा—

“देश में कानून-व्यवस्था मजबूत हुई है।”

मेज फिर थपथपाई गई।

उद्योग मंत्री काला जी ने कहा—

“देश में उद्योगों का विस्तार हुआ है।”

मेज इतनी जोर से थपथपाई गई कि एक सांसद की उंगली में चोट आ गई।

महाराज अंत में उठे।

उन्होंने कहा—

“हमने देश को बदल दिया है।”

सभी खड़े हो गए।

तालियां बजने लगीं।

बाहर सड़क पर एक बेरोजगार युवक हाथ में अपनी डिग्री लिए खड़ा था।

सड़क के दूसरी ओर नया अस्पताल था।

उसके पीछे नया स्कूल था।

ऊपर नया फ्लाईओवर था।

और इन सबके बीच वह सोच रहा था—

“देश तो बदल गया, लेकिन मेरे जीवन में क्या बदला?”

उसे कोई उत्तर नहीं मिला।

शायद उत्तर किसी नई निर्माणाधीन इमारत में रखा था।

वह इमारत अभी अधूरी थी।

और सरकार के अनुसार—

अधूरी चीजों में ही विकास की सबसे अधिक संभावनाएं होती हैं।

महाराज श्रृंखला 16 : चेहरा ही घोषणा-पत्र था

महाराज श्रृंखला 16 : चेहरा ही घोषणा-पत्र था

शिक्षा मंत्री महाराज की प्रसिद्धि अब शिक्षा मंत्रालय की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी थी।

पहले लोग उन्हें शिक्षा मंत्री के रूप में जानते थे। फिर उन्हें ऐसा शिक्षा मंत्री मानने लगे, जो शिक्षा के अलावा सब कुछ जानता है। धीरे-धीरे यह धारणा भी बनने लगी कि वे जो कुछ जानते हैं, वही देश के लिए जानना आवश्यक है और जो वे नहीं जानते, उसे जानने की नागरिकों को कोई जरूरत नहीं।

ज्ञान रिपु की लेखनी का इसमें विशेष योगदान था।

ज्ञान रिपु ने महाराज के भाषणों में इतने अलंकार भर दिए थे कि साधारण वाक्य भी दर्शन का रूप लेने लगे थे। महाराज यदि कहते—

“हम शिक्षा को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।”

तो ज्ञान रिपु उसी बात को लिखते—

“हम उस ज्ञान-सूर्य का उदय करेंगे, जिसकी स्वर्णिम किरणें अज्ञान के अंतिम अंधकार को चीरते हुए राष्ट्र की आत्मा के प्रत्येक कोने को आलोकित करेंगी।”

महाराज मंच पर आते, दो क्षण आंखें बंद करते, फिर धीरे से खोलते।

नटराज ने उन्हें सिखाया था कि आंखें खोलने का भी एक समय होता है और जनता के सामने आंखें खोलने से पहले थोड़ी देर बंद रखना चाहिए। इससे जनता को लगता है कि नेता अभी-अभी भीतर से कोई बहुत बड़ा सत्य खोजकर लाया है।

महाराज ने अभिनय को भी अपनी राजनीति का आवश्यक अंग बना लिया था।

कभी वे किसान के बीच जाकर मिट्टी हाथ में उठा लेते।

कभी किसी विद्यालय में बच्चे के सिर पर हाथ रख देते।

कभी किसी मजदूर से गले मिलते।

कभी किसी बूढ़ी महिला की बात सुनकर इतने भावुक हो जाते कि कैमरे स्वयं भावुक होकर उनके चारों ओर घूमने लगते।

इन दृश्यों का प्रसारण होता।

अगले दिन अखबारों में शीर्षक छपते—

“महाराज ने फिर जीता जनता का दिल।”

जनता सचमुच दिल हारती जा रही थी।

किसी को यह पूछने की फुर्सत नहीं थी कि दिल हारने के बाद जेब में क्या बचा है।

महाराज की घोषणाओं का भी अपना एक अलग संसार था।

वे रोज कोई न कोई घोषणा करते।

कभी देश में ज्ञान क्रांति की घोषणा होती।

कभी रोजगार क्रांति की।

कभी गांवों को शहर बनाने की।

कभी शहरों को विश्वस्तरीय बनाने की।

कभी नदियों को स्वच्छ करने की।

कभी हवा को शुद्ध करने की।

कभी युवाओं को अवसर देने की।

कभी बुजुर्गों को सम्मान देने की।

और कभी यह घोषणा कि अब घोषणाओं को भी परिणामों से जोड़ दिया जाएगा।

जनता इन घोषणाओं को सुनती और आश्वस्त होती।

जनता को अब परिणामों की आदत कम और आश्वासन की आदत अधिक हो गई थी।

इसी बीच देश में आम चुनाव घोषित हो गए।

पार्टी के पुराने नेता चुनाव की तैयारी में जुट गए।

बैठकें हुईं।

समितियां बनीं।

रणनीतियां बनीं।

रणनीतियों पर उप-रणनीतियां बनीं।

फिर सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

तय हुआ कि इस बार पार्टी को किसी रणनीति की जरूरत नहीं है।

महाराज ही पर्याप्त हैं।

पार्टी ने अपने चुनाव अभियान का नया सूत्र वाक्य बनाया—

“चेहरा वही, भरोसा वही।”

फिर किसी ने सुझाव दिया कि चेहरा बड़ा होना चाहिए।

पोस्टर पर।

बैनर पर।

होर्डिंग पर।

दीवारों पर।

मोबाइल स्क्रीन पर।

टीवी पर।

चौराहों पर।

सरकारी विज्ञापनों में।

जहां जगह मिले वहां।

और जहां जगह न मिले, वहां जगह बनाकर।

कुछ दिनों में ऐसा लगने लगा जैसे देश में चुनाव नहीं, महाराज का जन्मदिन मनाया जा रहा हो।

पार्टी का चुनाव चिह्न छोटा पड़ गया था।

महाराज का चेहरा बड़ा हो गया था।

उम्मीदवारों के नाम छोटे हो गए थे।

महाराज का नाम बड़ा हो गया था।

घोषणा-पत्र मोटा था, लेकिन उसे पढ़ने वाला कोई नहीं था।

क्योंकि घोषणा-पत्र के ऊपर महाराज की तस्वीर इतनी बड़ी थी कि नीचे लिखी बातें दिखाई ही नहीं देती थीं।

पार्टी के एक वरिष्ठ रणनीतिकार ने कहा—

“अब मतदाता को उम्मीदवार की जरूरत नहीं। उसे केवल यह पता होना चाहिए कि उम्मीदवार महाराज के साथ है।”

दूसरे ने कहा—

“और यदि उम्मीदवार के साथ महाराज की तस्वीर है तो उम्मीदवार का परिचय देने की भी जरूरत नहीं।”

तीसरे ने बात को और आगे बढ़ाते हुए कहा—

“जहां उम्मीदवार कमजोर हो, वहां महाराज की तस्वीर और बड़ी कर दीजिए।”

यह सुझाव सर्वसम्मति से पारित हुआ।

चुनाव अभियान शुरू हुआ।

महाराज जहां जाते, भीड़ उमड़ती।

भीड़ जहां नहीं उमड़ती, वहां व्यवस्था की ओर से भीड़ उपलब्ध कराई जाती।

मंच सजते।

गीत बजते।

नारे लगते।

और फिर महाराज आते।

उनके आने से पहले उनके आने की घोषणा होती।

उनके आने के बाद उनके आने की सफलता की घोषणा होती।

और अगले दिन उनके आने की लोकप्रियता की घोषणा होती।

महाराज कहते—

“यह चुनाव देश के भविष्य का चुनाव है।”

जनता तालियां बजाती।

महाराज कहते—

“यह चुनाव विकास की दिशा तय करेगा।”

तालियां और तेज हो जातीं।

महाराज कहते—

“आपने मुझे शिक्षा मंत्री के रूप में देखा है। अब मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि देश को भी एक नई शिक्षा मिलेगी।”

लोगों को इस वाक्य का अर्थ समझ में नहीं आया, लेकिन वे फिर भी तालियां बजाते रहे।

ज्ञान रिपु मंच के पीछे खड़े मुस्करा रहे थे।

उन्होंने महाराज से कहा—

“महाराज, आपने बहुत अच्छा कहा।”

महाराज ने पूछा—

“मैंने क्या कहा?”

ज्ञान रिपु ने उत्तर दिया—

“यही तो आपकी सबसे बड़ी विशेषता है महाराज। जनता को यह पता नहीं चलता कि आपने क्या कहा, लेकिन उसे विश्वास रहता है कि आपने बहुत महत्वपूर्ण कुछ कहा है।”

नटराज ने भी मुस्कराकर सिर हिलाया।

अभिनय सफल था।

भाषण सफल था।

चेहरा सफल था।

चुनाव भी सफल हो गया।

परिणाम आए।

पार्टी फिर सत्ता में आ गई।

पुराने प्रधानमंत्री ने परिणाम सुनकर मुस्कराते हुए कहा—

“जनता ने फिर आशीर्वाद दिया है।”

किसी पत्रकार ने पूछा—

“अब आगे क्या?”

प्रधानमंत्री ने कहा—

“अब पार्टी तय करेगी।”

पार्टी ने तय कर लिया।

कुछ पुराने नेता, जो वर्षों से सत्ता में थे, अचानक राष्ट्र के लिए बहुत मूल्यवान हो गए।

इतने मूल्यवान कि उन्हें अब सक्रिय राजनीति से हटाकर सलाहकार मंडल में सुरक्षित रख दिया गया।

सलाहकार मंडल ऐसा स्थान था जहां अनुभव की कोई कमी नहीं थी और अधिकार की कोई अधिकता नहीं थी।

वयोवृद्ध नेता वहां बैठकर देश, लोकतंत्र, राजनीति और अपने पुराने अनुभवों पर विचार कर सकते थे।

उनकी सलाह ली भी जा सकती थी।

और यदि सलाह बहुत उपयोगी हो तो उसे सम्मानपूर्वक सुना भी जा सकता था।

बस उसे मानना आवश्यक नहीं था।

एक वरिष्ठ नेता ने नए प्रधानमंत्री से पूछा—

“हमारी भूमिका क्या होगी?”

उत्तर मिला—

“आप राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं।”

“और निर्णय?”

“वह नई पीढ़ी करेगी।”

“और हमारी सलाह?”

“वह इतिहास में दर्ज होगी।”

वयोवृद्ध नेता संतुष्ट हो गए।

इतिहास में दर्ज होना बुरा नहीं होता।

सत्ता में दर्ज होना कठिन होता है।

उधर पार्टी के भीतर एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ।

प्रधानमंत्री कौन बने?

नामों की चर्चा हुई।

कुछ अनुभवी नेताओं के नाम आए।

कुछ युवा नेताओं के नाम आए।

कुछ ऐसे नेताओं के नाम आए जिन्हें स्वयं भी पता नहीं था कि उनका नाम चल रहा है।

लेकिन हर चर्चा अंततः महाराज के नाम पर आकर रुक जाती।

महाराज अब केवल लोकप्रिय नहीं थे।

वे अपरिहार्य हो चुके थे।

पार्टी के एक नेता ने कहा—

“देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए, जिसे जनता अपना समझे।”

दूसरे ने कहा—

“महाराज को जनता अपना समझती है।”

तीसरे ने कहा—

“तो फिर समस्या क्या है?”

समस्या कोई नहीं थी।

और इसीलिए महाराज को देश का नया प्रधानमंत्री चुन लिया गया।

शपथ ग्रहण का दिन आया।

महाराज ने सफेद वस्त्र पहने।

चेहरे पर वही गंभीरता थी, जो नटराज ने सिखाई थी।

ज्ञान रिपु ने शपथ के आसपास के वातावरण को भी साहित्यिक बना दिया था।

हवा चल रही थी।

ध्वज लहरा रहा था।

सूरज चमक रहा था।

और देश का भविष्य भी कहीं न कहीं चमक रहा था।

महाराज ने शपथ ली।

कैमरे उनकी ओर मुड़ गए।

देश ने पहली बार उन्हें शिक्षा मंत्री के रूप में नहीं, प्रधानमंत्री के रूप में देखा।

ज्ञान रिपु ने उसी रात अपनी डायरी में लिखा—

“आज महाराज ने पद नहीं संभाला। आज पद ने महाराज को संभाला है।”

फिर उन्होंने उस वाक्य को काट दिया।

उन्हें लगा, यह कुछ कम प्रभावशाली है।

उन्होंने दूसरा वाक्य लिखा—

“आज राष्ट्र ने अपने भाग्य का नया अध्याय महाराज के करकमलों से लिखवाया।”

यह उन्हें बेहतर लगा।

उन्होंने अगले दिन इसे अखबार के लिए भेज दिया।

अखबार में वह शीर्षक बन गया।

और उसी दिन देश के अधिकांश सरकारी कार्यालयों में महाराज के नए चित्र लगाए जाने लगे।

शिक्षा मंत्रालय से लेकर ग्राम पंचायत तक।

जहां पहले महाराज की तस्वीर के नीचे लिखा था—

“शिक्षा मंत्री”

वहां अब केवल लिखा था—

“प्रधानमंत्री।”

कई जगह पदनाम भी हट गया।

क्योंकि अब लोगों को पद बताने की आवश्यकता नहीं थी।

चेहरा ही पद था।

चेहरा ही संदेश था।

चेहरा ही भरोसा था।

और धीरे-धीरे ऐसा समय आने लगा जब लोग घोषणाओं पर विश्वास करने से पहले यह नहीं देखते थे कि घोषणा क्या है।

वे केवल यह देखते थे कि घोषणा किस चेहरे से निकली है।

महाराज के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं थी कि देश को कैसे चलाया जाए।

चुनौती यह थी कि देश को यह कैसे विश्वास दिलाया जाए कि वह ठीक उसी दिशा में चल रहा है, जिस दिशा में महाराज देख रहे हैं।

और महाराज जिस दिशा में देखते थे, उधर कैमरे पहले से लगे रहते थे।


ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, August 19, 2026

महाराज श्रृंखला 15: विकास की धूल

महाराज श्रृंखला 15: विकास की धूल

मोटाभाई काला की पहली सीमेंट फैक्ट्री चल पड़ी तो उनके भीतर देशसेवा की भावना और भी प्रबल हो गई। आखिर देशसेवा में जितना अधिक माल लगता है, उतनी ही अधिक देशसेवा करने की क्षमता पैदा होती है।

पहली फैक्ट्री के बाद दूसरी फैक्ट्री लगी और दूसरी के बाद तीसरी की योजना बनने लगी।

मोटाभाई ने एक दिन अपने मुनीम से पूछा—

“हमारे पास अब कितनी जमीन है?”

मुनीम ने कहा—

“सेठजी, आपके नाम पर कम है, कंपनियों के नाम पर ज्यादा है।”

मोटाभाई ने प्रसन्न होकर कहा—

“यही तो कॉरपोरेट संस्कृति है। आदमी एक, कंपनियाँ अनेक और देश एक।”

मुनीम ने सिर झुका लिया।

वह जानता था कि सेठजी जब देश की बात करते हैं तो बीच में परिवार को सुनाई देना चाहिए।

फैक्ट्री के लिए नई जमीन चाहिए थी।

जमीन के बीच में गाँव था।

गाँव के बीच में लोग थे।

और लोगों के बीच में उनकी यादें, खेत, कुएँ, पेड़, मंदिर और पुरखे थे।

कंपनी के सलाहकार ने समझाया—

“ये सब भावनात्मक संपत्तियाँ हैं। इन्हें आर्थिक संपत्ति में बदलना होगा।”

मोटाभाई ने पूछा—

“कैसे?”

सलाहकार ने कहा—

“मुआवजा देकर।”

“लोग मानेंगे?”

“नहीं मानेंगे तो विकास समझाइए।”

“विकास से भी नहीं मानें?”

“तो पुनर्वास समझाइए।”

“फिर भी?”

सलाहकार ने मुस्कुराकर कहा—

“तब प्रशासन है न।”

मोटाभाई को प्रशासन की याद आते ही उनका चेहरा खिल उठा।

देश में लोकतंत्र था और लोकतंत्र में प्रशासन जनता के लिए था।

कंपनी भी जनता के लिए थी।

इसलिए दोनों के बीच बातचीत में कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए थी।

महाराज से बात की गई।

महाराज अब शिक्षा मंत्री थे, लेकिन शिक्षा मंत्री होने का अर्थ यह नहीं था कि वे केवल किताबों और स्कूलों की चिंता करें। मंत्री का अनुभव जितना व्यापक हो, उसकी उपयोगिता उतनी ही अधिक होती है।

उन्होंने कहा—

“विकास रुकना नहीं चाहिए।”

गोपाल सेठ ने कहा—

“बिल्कुल नहीं।”

महाराज ने पूछा—

“गाँव वालों की क्या समस्या है?”

गोपाल सेठ बोले—

“वे विकास को समझ नहीं रहे हैं।”

महाराज ने गंभीर होकर कहा—

“तो उन्हें समझाना चाहिए।”

गोपाल सेठ ने राहत की साँस ली।

समझाने का काम प्रशासन को सौंप दिया गया।

अगले सप्ताह गाँव में अधिकारियों की बैठक हुई।

अधिकारी ने नक्शा खोलकर कहा—

“यहाँ से सड़क जाएगी।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा खेत जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“विकास आएगा।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा कुआँ जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“रोजगार आएगा।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा घर जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“मुआवजा मिलेगा।”

एक बूढ़े किसान ने पूछा—

“मुआवजे से घर वापस आ जाएगा?”

अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने सरकारी भाषा में कहा—

“आप भावुक न हों। राष्ट्र निर्माण में भावनाओं का स्थान नहीं होता।”

बूढ़ा किसान चुप हो गया।

उसे पहली बार पता चला कि जिस जमीन पर उसके बाप-दादा की हड्डियाँ मिली हुई हैं, वह अब भावना कहलाती है।

फैक्ट्री का निर्माण शुरू हो गया।

पेड़ काटे गए।

पहाड़ काटे गए।

मिट्टी हटाई गई।

धूल उड़ी।

और इस धूल को देखकर मोटाभाई बहुत प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा—

“यह धूल नहीं है। यह विकास का दृश्य प्रमाण है।”

उनकी बात पर उपस्थित अधिकारी ने तुरंत सिर हिलाया।

अधिकारी सिर हिलाने में कभी देर नहीं करते थे। उन्हें मालूम था कि फाइलों में सिर हिलाने से बहुत काम होते हैं और न हिलाने से बहुत काम रुक जाते हैं।

पर्यावरण विभाग की टीम निरीक्षण के लिए आई।

उन्होंने हवा में उड़ती धूल देखी।

एक अधिकारी ने मास्क लगाया।

मोटाभाई ने पूछा—

“क्या प्रदूषण बहुत ज्यादा है?”

अधिकारी ने कहा—

“थोड़ा है।”

“कितना?”

“रिपोर्ट में देखा जाएगा।”

“रिपोर्ट में क्या आएगा?”

अधिकारी ने कहा—

“वही जो वैज्ञानिक आधार पर उचित होगा।”

मोटाभाई ने संतोष की साँस ली।

वैज्ञानिक आधार बहुत सुविधाजनक चीज थी।

उसका निर्णय विज्ञान करता था, लेकिन विज्ञान को रिपोर्ट लिखने वाला अधिकारी समझता था।

फैक्ट्री की चिमनी से धुआँ निकलता रहा।

गाँव के बच्चों को खाँसी होने लगी।

तालाब का पानी बदलने लगा।

खेतों पर सफेद धूल जमने लगी।

मोटाभाई ने तुरंत एक स्वास्थ्य शिविर लगवाया।

बैनर पर लिखा था—

“मोटाभाई काला समूह द्वारा निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा।”

डॉक्टरों ने बच्चों को दवाइयाँ दीं।

अखबार में अगले दिन खबर छपी—

“उद्योगपति मोटाभाई काला ने सामाजिक दायित्व निभाते हुए ग्रामीणों के स्वास्थ्य की चिंता की।”

किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस बीमारी के इलाज के लिए शिविर लगाया गया, वह पैदा किससे हुई।

देशसेवा का यह भी एक सुंदर मॉडल था।

पहले समस्या पैदा करो।

फिर समाधान की कंपनी खोलो।

फिर समाधान के लिए पुरस्कार लो।

मोटाभाई को पुरस्कार मिलने लगे।

एक संस्था ने उन्हें ‘हरित उद्योग सम्मान’ दिया।

दूसरी ने ‘ग्रामीण विकास रत्न’।

तीसरी ने ‘राष्ट्र निर्माण गौरव’।

मोटाभाई ने तीनों पुरस्कार अपने कार्यालय की उसी दीवार पर लगाए जहाँ गांधी बाबा की तस्वीर लगी थी।

बापू अब भी मुस्कुरा रहे थे।

उन्हें शायद आदत हो गई थी।

उधर साहित्य परिषद के अध्यक्ष ज्ञान रिपु ने विकास पर एक विशेष संगोष्ठी आयोजित की—

“धूल से धरा तक : आधुनिक राष्ट्र निर्माण में उद्योग की भूमिका।”

मुख्य वक्ता मोटाभाई थे।

ज्ञान रिपु ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा—

“आज साहित्य को उद्योग के साथ संवाद करना चाहिए। कारखाने केवल सीमेंट नहीं बनाते, वे भविष्य बनाते हैं।”

तालियाँ बजीं।

मजदूर पीछे बैठे थे।

उनमें से एक ने दूसरे से कहा—

“हम क्या बनाते हैं?”

दूसरे ने कहा—

“सीमेंट।”

पहला बोला—

“और ये लोग?”

दूसरा बोला—

“भविष्य।”

पहला कुछ देर सोचता रहा।

फिर बोला—

“हमारा भविष्य कौन बनाएगा?”

दूसरे ने कहा—

“शायद वही कंपनी।”

दोनों हँस दिए।

उनकी हँसी किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं हुई।

इधर महाराज ने शिक्षा विभाग में नई योजना घोषित की—

“उद्योग-शिक्षा समन्वय अभियान।”

इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को उद्योगों का भ्रमण कराया जाना था।

महाराज का मानना था कि बच्चे किताबों से जितना सीखते हैं, उतना ही कारखानों से भी सीख सकते हैं।

पहली यात्रा मोटाभाई की फैक्ट्री में हुई।

बच्चों को बताया गया—

“यह क्लिंकर है।”

“यह सीमेंट है।”

“यह कन्वेयर बेल्ट है।”

एक बच्चे ने पूछा—

“सर, यह जो सामने गाँव था, वह कहाँ गया?”

अध्यापक ने कहा—

“वह विकास में समाहित हो गया।”

बच्चे ने फिर पूछा—

“समाहित मतलब?”

अध्यापक ने कहा—

“बड़े होकर समझोगे।”

शिक्षा मंत्री को यह उत्तर बहुत पसंद आया।

उन्हें लगा कि शिक्षा का असली उद्देश्य यही है—कुछ बातें इतनी देर से समझ में आएँ कि तब तक सवाल पूछने की आदत समाप्त हो जाए।

मोटाभाई की तीसरी फैक्ट्री के लिए खनन पट्टा भी मिल गया।

अब सीमेंट बनाने के लिए पत्थर चाहिए था।

पत्थर पहाड़ में था।

पहाड़ जंगल में था।

जंगल आदिवासियों की जमीन पर था।

और आदिवासियों को बताया गया कि यह सब राष्ट्र की संपत्ति है।

एक अधिकारी ने सभा में कहा—

“यह खनिज देश का है।”

एक आदिवासी ने पूछा—

“तो हमारी जमीन?”

अधिकारी ने कहा—

“वह भी देश की है।”

आदिवासी ने पूछा—

“हम?”

अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा—

“आप भी देश के हैं।”

आदिवासी चुप हो गया।

उसे पहली बार लगा कि देश का होना शायद जमीन पर अपना होना नहीं है।

मोटाभाई की कंपनी को खनन की अनुमति मिल गई।

पहाड़ों में विस्फोट होने लगे।

हर विस्फोट के साथ पत्थर टूटता था।

और हर टूटे पत्थर से सीमेंट बनता था।

सीमेंट से इमारतें बनती थीं।

इमारतों में सरकारी कार्यालय बनते थे।

सरकारी कार्यालयों में विकास की योजनाएँ बनती थीं।

विकास की योजनाओं में फिर नई सड़कें बनती थीं।

सड़कों के किनारे फिर नए उद्योग आते थे।

और उद्योगों के लिए फिर पहाड़ टूटते थे।

देश एक वृत्त में घूम रहा था।

इतनी तेजी से कि किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि वह आगे जा रहा है या उसी जगह लौट रहा है।

एक दिन महाराज ने गोपाल सेठ से कहा—

“देश में विकास की गति बहुत बढ़ गई है।”

गोपाल सेठ बोले—

“महाराज, गति और बढ़नी चाहिए।”

“क्यों?”

“ताकि लोग सोचने के लिए पीछे मुड़कर न देख सकें।”

महाराज ने उनकी ओर देखा।

फिर दोनों हँस पड़े।

उनकी हँसी में अनुभव था।

अनुभव में सत्ता थी।

सत्ता में विकास था।

और विकास में बहुत सारा सीमेंट।

उसी शाम मोटाभाई के बंगले पर एक नया बोर्ड लगाया गया—

“राष्ट्र निर्माण कार्यालय।”

नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—

“मोटाभाई काला समूह।”

बोर्ड देखकर मोटाभाई देर तक खड़े रहे।

उन्हें अपने बाप-दादा याद आए।

गधे पर राख लादकर चलने वाले वे लोग आज कहाँ होते?

शायद किसी पुराने गाँव की स्मृति में।

लेकिन राख से सीमेंट तक की यात्रा ने उन्हें एक नई शिक्षा दी थी—

जिसके हाथ में राख हो, वह गरीब हो सकता है;

जिसके हाथ में सीमेंट की फैक्ट्री हो, वह राष्ट्र निर्माता कहलाता है।

और जिस राष्ट्र में राष्ट्र निर्माण का ठेका कुछ ही हाथों में चला जाए, वहाँ विकास की धूल सबकी आँखों में बराबर पड़ती है।

बस फर्क इतना रहता है कि कुछ लोग आँखें बंद कर लेते हैं।

और कुछ लोग उसी धूल से अपना अगला महल बना लेते हैं।

महाराज श्रृंखला 14 : राख से राष्ट्र निर्माण

महाराज श्रृंखला 14 : राख से राष्ट्र निर्माण तक

देश को स्वतंत्रता मिलने पर पाषाणपुष्प रियासत के महाराज नए गणराज्य में अब शिक्षा मंत्री हो चुके थे और राजकवि ज्ञानरिपु साहित्य परिषद के अध्यक्ष। दोनों के पद बदल गए थे, मगर उनके स्वभाव में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। आखिर पद बदलने से आदमी बदल जाए तो राजनीति और साहित्य दोनों की परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लग जाए।

महाराज शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए चिंतित थे और ज्ञानरिपु साहित्य में। दोनों की चिंता का एक सुखद पहलू यह था कि चिंता करते समय उन्हें अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं करनी पड़ती थी।

रियासत के प्रमुख कारोबारी गोपाल सेठ की चिंता भी अब समाप्त हो चुकी थी। उनके परिवार में कंपनियाँ इतनी तेजी से बढ़ रही थीं कि कभी-कभी खुद गोपाल सेठ को भी याद नहीं रहता था कि किस कंपनी का मालिक कौन है। एक कंपनी निर्माण करती थी, दूसरी निर्माण के लिए सामान देती थी, तीसरी उस सामान की ढुलाई करती थी और चौथी उन तीनों की सेवाओं की गुणवत्ता पर सलाह देती थी।

पाँचवीं कंपनी इस बात पर शोध करती थी कि देश में विकास की गति इतनी तेज क्यों है।

इस शोध का निष्कर्ष हमेशा यही निकलता था कि विकास को और तेज करने की जरूरत है।

देश सेवा के लिए कंपनियों का होना आवश्यक है—यह बात धीरे-धीरे देश को समझ में आने लगी थी।

गोपाल सेठ के परिजनों में देश सेवा की भावना इतनी प्रबल थी कि परिवार का शायद ही कोई सदस्य बेरोजगार रह गया था। किसी के पास खनन था, किसी के पास परिवहन, किसी के पास निर्माण, किसी के पास वित्त और किसी के पास सलाह देने का काम।

देश का विकास एक सामूहिक पारिवारिक जिम्मेदारी बन गया था।

इसी परिवार की दूर की शाखा में एक व्यक्ति थे—मोटाभाई काला। मोटाभाई काला न तो मोटे थे और न उनके शरीर और व्यक्तित्व से कृष्णता का कोई विकिरण प्रस्फुटित होता था। उनके बाप-दादा गधे पर लादकर राख के बदले पीली मिट्टी बेचने का धंधा करते थे। बाद में समय ने ऐसी करवट बदली कि उनके पिता सीमेंट के व्यापारी हो गए।

उन दिनों कंट्रोल पर बिकने वाले सीमेंट पर तो कंट्रोल था, लेकिन भ्रष्टाचार पर आज की तरह ही कोई खास रोक-टोक नहीं थी। गांधी बाबा की तस्वीर सीमेंट की दुकान पर ही नहीं, सभी प्रतिष्ठानों की दीवारों की शोभा बढ़ाती रहती थी।

तस्वीरों का यह अच्छा रहता है कि वे कुछ बोल नहीं सकतीं। इसलिए बापू की तस्वीर में मुस्कान बनी रही, जबकि सामने मोटाभाई के पिता मोटा माल बनाने में लगे रहे।

सेठजी का बेटा किसी तरह मैट्रिक पास करने के बाद एक दिन पिता के जूते में पैर डालने लगा तो पिता ने समझ लिया कि अब बेटे के मोटा माल बनाने के दिन आ गए हैं। बेटे को लाइन में डालने की चिंता हर पिता को होती है। यहाँ भी थी।

उन दिनों रेलवे तथा जंगल से चुराई गई लकड़ियों से बना कोयला अपने ताप से लोगों के पेट की आग शांत किया करता था। तभी ‘नलीदार कोयले’ के आविष्कार ने मोटाभाई के पिता की चिंता का निवारण कर दिया।

मोटाभाई के यहाँ भी कोयले की सस्ती चूरी, मिट्टी, लकड़ी का बुरादा आदि की मदद से कृत्रिम कोयला बनने लगा।

मोटाभाई ‘कोयलेवाले’ के नाम से मशहूर हो गए।

मोटाभाई का कोयले का धंधा कुछ वर्षों तक खूब अच्छा चला, लेकिन जनता पार्टी की तरह नलीदार कोयले का अस्तित्व भी बस स्मृतियों का हिस्सा रह गया। यह जरूर हुआ कि मोटाभाई के नाम के साथ ‘काला’ हमेशा के लिए चस्पा हो गया।

बाद में इस मोटे माल परंपरा का बहुत विकास हुआ। संसद के बाहर और भीतर ‘कोयला’ नेताओं की रचनात्मक समझ को प्रतिबिंबित करने का माध्यम भी बना। कोयले की दलाली में मोटा माल मिलने की बातें खूब कही गईं। यहाँ तक कि देश के एक पूर्व ईमानदार ‘मोटा भाई’ पर भी आरोप लगा कि उन्होंने अपने साथियों को मोटा माल बनाने में खूब मदद की थी।

लेकिन मोटाभाई काला ने इतिहास से एक महत्वपूर्ण शिक्षा ग्रहण की थी। सिर्फ राख में हाथ काला करने से काम नहीं चलेगा। राख को सीमेंट में बदलना होगा। और सीमेंट को विकास में। और विकास को देशसेवा में।

बस यहीं से मोटाभाई की असली यात्रा शुरू हुई।

राख बेचने वाला धीरे-धीरे सीमेंट बेचने लगा। सीमेंट बेचते-बेचते उसे यह बोध हुआ कि दूसरों की फैक्ट्री का सीमेंट बेचने में भी पैसा है, लेकिन अपनी फैक्ट्री का सीमेंट बेचने में देशसेवा अधिक है। उन्होंने अपनी पहली सीमेंट फैक्ट्री लगाने का निर्णय लिया।

मंत्रालयों में फाइलें चलीं। फाइलों के साथ कुछ और चीजें भी चलीं। फिर पर्यावरण विभाग आया। फिर अनुमति आई। फिर अनुमति की अनुमति आई।

फिर कुछ विशेषज्ञ आए जिन्होंने बताया कि फैक्ट्री से निकलने वाली धूल को विकास की धूल समझना चाहिए।

एक विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कहा कि जिस देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हों, वहाँ सीमेंट की धूल को प्रदूषण कहना राष्ट्रविरोधी मानसिकता है।

मोटाभाई ने उसी दिन तय कर लिया कि अब उनका कारखाना केवल कारखाना नहीं होगा—वह राष्ट्र निर्माण का मंदिर होगा।

उद्घाटन के लिए महाराज को बुलाया गया।

महाराज अब शिक्षा मंत्री थे। उन्होंने उद्घाटन भाषण में कहा—

“शिक्षा और निर्माण में बहुत गहरा संबंध है। शिक्षा मनुष्य का निर्माण करती है और सीमेंट राष्ट्र का।”

तालियाँ बजीं।

मोटाभाई ने तालियों को अपने पक्ष में जनादेश मान लिया।

राजकवि ज्ञानरिपु भी मंच पर थे। साहित्य परिषद के अध्यक्ष बनने के बाद उनके शब्दों में पहले से अधिक सरकारी गरिमा आ गई थी। उन्होंने तत्काल एक कविता सुनाई—

“भस्म से उठता देश हमारा,

अर्जित किया मजबूत किनारा।

श्रम की बहती बूंदों से

महका  प्यारा देश प्यारा।”

कविता सुनकर मजदूरों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

उनमें से एक ने धीरे से पूछा—

“हमारा पसीना कविता में आ गया, हमारी मजदूरी कब आएगी?”

दूसरे ने उसे चुप करा दिया।

साहित्य परिषद के अध्यक्ष के सामने सवाल पूछना साहित्य के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता था।

उधर महाराज ने फैक्ट्री का फीता काटा। फीता कटते ही मोटाभाई का कारोबार बढ़ गया। देश भी आगे बढ़ा।

अखबारों में खबर छपी—

“प्रसिद्ध उद्योगपति मोटाभाई काला ने राष्ट्र निर्माण में एक और मील का पत्थर स्थापित किया।”

मील का पत्थर वास्तव में सीमेंट का था।

उस पर मोटाभाई का नाम भी खुदा हुआ था।

गोपाल सेठ ने समाचार पढ़कर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा—

“देखा! यही होता है विकास। परिवार का एक आदमी आगे बढ़ता है तो पूरा देश आगे बढ़ता है।”

किसी ने पूछा—

“सेठजी, देश आगे बढ़ता है या परिवार?”

गोपाल सेठ ने उसे देखा।

फिर मुस्कुराकर बोले—

“आजकल दोनों में अंतर कौन करता है?”

सवाल पूछने वाला चुप हो गया।

देश में सवाल पूछने वालों की संख्या कम हो रही थी और सलाहकारों की संख्या बढ़ रही थी।

महाराज की शिक्षा नीति का असर भी दिखाई देने लगा था। नई पीढ़ी को पढ़ाया जा रहा था कि सफलता के लिए मेहनत जरूरी है।

साथ ही कुछ बच्चों को यह भी समझ में आ रहा था कि मेहनत के अलावा कुछ और चीजें भी जरूरी होती हैं—संपर्क, अवसर, समय, परिस्थिति और सही व्यक्ति की सही जगह पर मौजूदगी।

महाराज शिक्षा मंत्री थे, इसलिए शिक्षा में ‘व्यावहारिक ज्ञान’ का महत्व बढ़ रहा था। इधर साहित्य परिषद में ज्ञान रिपु ने ‘राष्ट्र निर्माण साहित्य पुरस्कार’ शुरू कर दिया था। पहला पुरस्कार मोटाभाई काला को दिया गया।

पुरस्कार का नाम था—“राष्ट्रधूलि सम्मान।”

ज्ञानरिपु ने कहा—

“मोटाभाई ने राख को केवल राख नहीं समझा। उन्होंने उसमें राष्ट्र की संभावनाएँ देखीं।”

मोटाभाई भावुक हो गए।

उन्होंने पुरस्कार ग्रहण करते हुए कहा—

“मैंने जीवन में हमेशा पहले देश को ही दिया है।”

सभा में बैठे एक बुजुर्ग ने अपने पड़ोसी से पूछा—

“क्या दिया है ?”

पड़ोसी ने कहा—

“सीमेंट।”

बुजुर्ग ने पूछा—

“देश को?”

पड़ोसी ने कहा—

“नहीं, देश के नाम पर।”

बुजुर्ग मुस्कुराए।

उन्हें शायद पुरानी बातें याद आ गई थीं। राख से पीली मिट्टी बेचने वाले उनके बाप-दादा गधे पर माल ढोते थे। अब मोटाभाई के ट्रक सड़कों पर दौड़ रहे थे। फैक्ट्रियाँ खड़ी हो रही थीं। कंपनियाँ बढ़ रही थीं। परिवार समृद्ध हो रहा था।

महाराज मंत्री बन चुके थे। ज्ञानरिपु साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे। गोपाल सेठ के परिवार की कंपनियाँ देश की अर्थव्यवस्था में योगदान कर रही थीं। हर तरफ विकास था। बस इतना अंतर था कि पहले लोग राख बेचकर सीमेंट खरीदते थे और अब राख से सीमेंट बनाने वाले देश का भविष्य खरीदने लगे थे।

महाराज ने एक दिन गोपाल सेठ से कहा—

“देश बहुत तेजी से बदल रहा है।”

गोपाल सेठ ने कहा—

“महाराज, देश ही तो बदल रहा है।”

फिर दोनों कुछ देर चुप रहे।

दोनों जानते थे कि इस वाक्य का एक दूसरा अर्थ भी है। और वह अर्थ इतना गहरा था कि उसे समझने के लिए किसी साहित्य परिषद की जरूरत नहीं थी।

उधर मोटाभाई की दूसरी सीमेंट फैक्ट्री का शिलान्यास होने वाला था।

इस बार उन्होंने निश्चय किया कि उद्घाटन पट्टिका पर केवल अपना नाम नहीं होगा।

उस पर लिखा जाएगा—“जनता को समर्पित।”

मोटाभाई ने यह बात गर्व से बताई।

किसी ने पूछा—“जनता को क्या समर्पित है?”

मोटाभाई ने कहा—“फैक्ट्री।”

“और फैक्ट्री किसकी है?”

मोटाभाई ने मुस्कुराकर कहा—“जनता की।”

“तो मालिक कौन?”

मोटाभाई ने हँसते हुए कहा—

“देश का कानून।”

फिर उन्होंने अपनी कंपनी के कागजों की ओर देखा। कागजों पर उनका नाम था। कानून में कंपनी का। भाषण में जनता का।

और इतिहास में शायद किसी दिन देश का।

यही विकास की सबसे बड़ी खूबी थी।

हर चीज सबकी होती थी।

बस उसका मालिक अलग होता था।

***

ब्रजेश कानूनगो  


Tuesday, August 18, 2026

गड्ढों का लोकतांत्रिक योगदान और दर्शन

गड्ढों का लोकतांत्रिक योगदान और दर्शन

‘गड्ढा’ होना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। प्राकृतिक संरचना में सतह से थोड़ी-सी नीचे चली गई जगह ‘गड्ढा’ कहलाती है और वही धरती थोड़ी ऊपर उठ जाए तो ‘टीला’ हो जाती है। ऊपर उठना सम्मानजनक और नीचे धँसना अपमानजनक—मनुष्य ने विकास का शायद यही सबसे सरल पैमाना बनाया है। जबकि प्रकृति को इससे कोई शिकायत नहीं। उसके यहाँ पर्वत भी हैं और समुद्र भी, पठार भी हैं और घाटियाँ भी। सबका अपना महत्व है।

लेकिन हमारे समय में गड्ढों की बड़ी भद्द पिट रही है।

खासकर सड़कों के गड्ढों की। जैसे देश की सारी समस्याओं की जड़ यही हों। कोई व्यक्ति सड़क के गड्ढे में गिर जाए तो नगरपालिका को कोसता है, सरकार को कोसता है, ठेकेदार को याद करता है और अंत में अपने भाग्य को दोष देकर उठ खड़ा होता है। बेचारा गड्ढा चुपचाप वहीं पड़ा रहता है। उसका क्या दोष?

मुझे तो लगता है कि गड्ढों को बदनाम करने की कोई सुनियोजित साजिश चल रही है। पहचान के केवल एक पक्ष को बार-बार सामने रखकर उसके उजले पक्ष पर पर्दा डाल दिया गया है। गड्ढा सदियों से निर्विकार भाव से प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था की सेवा करता आया है, मगर उसका कभी सम्मान नहीं हुआ।

जरा धरती के नीचे झाँककर देखिए। सोना, चाँदी, लोहा, कोयला, तेल, गैस और न जाने कितनी बहुमूल्य संपदाएँ गड्ढों के रास्ते ही मनुष्य तक पहुँची हैं। खनन के लिए गड्ढे खोदिए, धरती का सीना चीरिए और फिर घोषणा कीजिए—देश विकास कर रहा है।

सड़क पर वही गड्ढा हो जाए तो विकास का पहिया अचानक पंचर हो जाता है।

यह कैसी विडंबना है!

धरती के नीचे का गड्ढा ‘खनन परियोजना’ है और सड़क के ऊपर का गड्ढा ‘लापरवाही’। एक से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, दूसरे से नागरिक की कमर।

वैसे गड्ढे का संबंध केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, भूगोल और सौंदर्यशास्त्र से भी है। पृथ्वी का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं एक विराट गड्ढे में भरे पानी से बना है। हम उसे समुद्र कहते हैं। उसी समुद्र के भीतर न जाने कितने संसाधन, जीव-जंतु और रहस्य छिपे हैं। समुद्र न होता तो जमीन के ऊँचे हिस्से की ऊँचाई का पता कैसे चलता? घाटियाँ न होतीं तो पर्वतों का गौरव किसे समझ आता?

अर्थात गड्ढा ऊँचाई की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।

फिर सड़क पर कुछ गड्ढे हो गए तो इतना हंगामा क्यों?

बरसात आई, पानी भरा, बच्चों ने कागज की नाव चला दी, किसी कलाकार ने कीचड़ में भारत का नक्शा खोज लिया—इसमें भी तो रचनात्मकता है। आजकल जब हर चीज में ‘कंटेंट’ खोजा जा रहा है, तब गड्ढे भी नागरिकों को मनोरंजन और सोशल मीडिया सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। कोई गड्ढे में गिरते हुए वीडियो बना रहा है, कोई उसके किनारे सेल्फी ले रहा है और कोई उसी गड्ढे को लेकर सरकार से सवाल पूछ रहा है।

लोकतंत्र में इससे अधिक उपयोगी गड्ढा और क्या होगा?

गड्ढे हमें धैर्य भी सिखाते हैं। सड़क पर गड्ढा आज बना है तो उसे भरने की जल्दी क्यों? पहले शिकायत होगी, फिर निरीक्षण होगा, फिर टेंडर निकलेगा, फिर स्वीकृति होगी, फिर ठेकेदार आएगा और तब तक अगली बारिश आ जाएगी। गड्ढा अपने चरित्र में कितना लोकतांत्रिक है—हर नागरिक को समान अवसर देता है। कार हो, बाइक हो, स्कूटर हो या पैदल आदमी—सबको अपनी क्षमता के अनुसार झटका मिलता है।

कहीं-कहीं तो गड्ढे इतने स्थायी हो चुके हैं कि सड़क उनसे जुड़ी हुई लगती है। सड़क गायब हो जाए तो शायद लोग परेशान हों, लेकिन गड्ढा गायब हो जाए तो उन्हें चिंता होने लगेगी कि आखिर विकास का प्रमाण कहाँ गया?

हमारी विकास-यात्रा में गड्ढों का योगदान कम करके नहीं आँका जा सकता। जितना बड़ा प्रोजेक्ट, उतना बड़ा उद्घाटन और कभी-कभी उतने ही बड़े गड्ढे। नई सड़क का उद्घाटन होने के कुछ समय बाद उसमें गड्ढा दिखाई दे जाए तो इसे केवल निर्माण की कमी समझना ठीक नहीं। इसे यह भी समझा जा सकता है कि सड़क अब लोकतांत्रिक जीवन में प्रवेश कर चुकी है।

और फिर गड्ढे केवल बाहर नहीं होते।

हमारी राजनीति में गड्ढे हैं, अर्थव्यवस्था में गड्ढे हैं, व्यवस्था में गड्ढे हैं, बजट में गड्ढे हैं और वादों में तो इतने गहरे गड्ढे हैं कि उनमें पूरा चुनावी घोषणापत्र समा जाए। इन गड्ढों पर हम अक्सर फूल डाल देते हैं और उद्घाटन कर देते हैं।

सड़क का गड्ढा कम से कम दिखाई तो देता है।

चेहरे पर पड़ने वाले गड्ढों को ही देखिए। गालों में पड़ने वाले डिम्पल कितने आकर्षक लगते हैं। वही गड्ढा सड़क पर हो तो दुर्घटना, चेहरे पर हो तो सौंदर्य। इससे सिद्ध होता है कि दोष गड्ढे में नहीं, हमारी दृष्टि में है।

इसलिए इन निरीह गड्ढों के कारण अधिक दुखी होना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। तनाव बढ़ेगा, चेहरा सिकुड़ेगा, माथे पर लकीरें आएँगी और गालों के प्राकृतिक गड्ढे भी कम आकर्षक लगने लगेंगे।

बेहतर है कि गड्ढों को नए नजरिए से देखें।

जहाँ सड़क में गड्ढा दिखे, वहाँ शिकायत करने से पहले एक क्षण रुकिए और सोचिए—यह केवल गड्ढा नहीं, हमारी व्यवस्था का खुला हुआ मुँह भी हो सकता है, जो पूछ रहा है कि विकास की बातें बहुत हो गईं, अब मुझे भरोगे भी या अगली बरसात का इंतजार करोगे?

फिर मुस्कुराइए।

आखिर गड्ढे हैं तो भरने की संभावना भी है। और जब तक भर नहीं जाते, तब तक उनमें छुपे सुख खोजते रहिए।

क्योंकि इस देश में कई बार गड्ढे भरने से पहले ही उनके नाम पर योजनाएँ, बजट और उद्घाटन भरपूर हो जाते हैं।

गड्ढे का इससे बड़ा लोकतांत्रिक योगदान और क्या होगा!

ब्रजेश कानूनगो

महाराज श्रृंखला 13 : गुरुमंत्र का विस्तार

महाराज श्रृंखला 13 : गुरुमंत्र का विस्तार

रियासतें इतिहास की किताबों में जितनी जल्दी समाप्त होती हैं, उतनी जल्दी उनके संस्कार समाप्त नहीं होते। राजतंत्र का औपचारिक विलय लोकतंत्र में हो सकता है, पर राजसी आदतों का विलय होने में कई पीढ़ियाँ लगती हैं। और कभी-कभी तो वे लोकतंत्र में इस तरह घुल-मिल जाती हैं कि लोकतंत्र को ही पता नहीं चलता कि उसके भीतर कौन-सी चीज राजतंत्र है और कौन-सी प्रजा।

महाराज की रियासत भी अंततः लोकतांत्रिक देश में विलीन हो गई। राजमहल के ऊपर फहराता राजचिह्न उतार लिया गया। हाथी-घोड़ों की जगह सरकारी मोटरें आ गईं। दरबार समाप्त हुआ और जनता का शासन आरंभ हो गया।

बस एक छोटी-सी समस्या थी।

महाराज को किसी ने यह नहीं बताया था कि अब वे महाराज नहीं रहे।

सरकार ने शायद यह बात बताने की आवश्यकता भी नहीं समझी। लोकतंत्र में बड़े लोगों को बहुत-सी बातें बताने की जरूरत नहीं होती। वे अपने अनुभव और पुराने संपर्कों से स्वयं समझ लेते हैं कि नई व्यवस्था में पुराने पदों के नए नाम क्या हो सकते हैं।

कुछ ही दिनों बाद राजधानी से समाचार आया कि महाराज को राज्य मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री बनाया जा रहा है।

राजमहल में उत्सव का वातावरण था।

काक दन्त ने सबसे पहले महाराज को बधाई दी।

“हुजूर! अब तो रियासत का ज्ञान पूरे प्रदेश में फैलेगा।”

महाराज मुस्कुराए।

“ज्ञान फैलाना हमारा पुराना काम है।”

“जी हुजूर। पहले आप राजाज्ञा से फैलाते थे, अब शासनादेश से फैलाइएगा।”

महाराज ने उसे घूरकर देखा। काक दन्त तुरंत संभल गया।

“मेरा आशय है कि शिक्षा का विभाग आपके हाथ में आना प्रदेश का सौभाग्य है।”

शिक्षा मंत्री के रूप में महाराज का पहला कार्यक्रम राजमहल के पुराने दरबार हॉल में ही आयोजित हुआ। फर्क केवल इतना था कि जहां पहले दरबारियों की पंक्ति लगती थी, वहां अब अधिकारियों की पंक्ति थी और जहां पहले राजदंड रखा रहता था, वहां अब सरकारी फाइलों का ढेर था।

महाराज ने फाइलों को देखा।

“इनमें से कितनी महत्वपूर्ण हैं?”

शिक्षा सचिव ने कहा, “लगभग सभी, मान्यवर।”

महाराज ने सहजता से कहा, “तो फिर इन्हें पढ़ने की आवश्यकता नहीं। महत्वपूर्ण चीजें पढ़ने में समय बहुत लगता है। सारांश बताइए।”

सचिव ने राहत की सांस ली।

लोकतंत्र को एक और कुशल प्रशासक मिल गया था।

इसी बीच ज्ञानरिपु का भी भाग्योदय हुआ।

राजकवि ज्ञानरिपु को राज्य साहित्य परिषद का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया गया।

इस नियुक्ति का समाचार सुनकर वे कुछ देर तक कुर्सी पर बैठे रहे। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कल तक वे महाराज के भाषण लिखते थे और आज साहित्य का भविष्य लिखने वाली संस्था के अध्यक्ष बना दिए गए थे।

उन्होंने सबसे पहले अपने गुरु आचार्य विद्यादमन को प्रणाम किया।

“गुरुदेव! आपका गुरुमंत्र काम कर गया।”

आचार्य मुस्कुराए।

“मैंने कहा था न, स्वतंत्र विचारों को मन के ताम्रपात्र में बंद करके रख दो। देखो, अब वही ताम्रपात्र तुम्हें अध्यक्ष की कुर्सी पर ले आया।”

ज्ञानरिपु ने विनम्रता से पूछा, “लेकिन गुरुदेव, साहित्य परिषद का काम तो साहित्य की स्वतंत्रता, प्रश्नाकुलता और सत्ता से असहमति को प्रोत्साहित करना भी है।”

गुरु ने चश्मा ठीक किया।

“बिल्कुल।”

“तो फिर?”

“तो फिर तुम अध्यक्ष हो। तुम्हें तय करना है कि स्वतंत्रता कितनी स्वतंत्र होनी चाहिए।”

ज्ञानरिपु ने सिर झुका लिया।

गुरुमंत्र का विस्तार हो चुका था।

नई सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधारों की घोषणा की। महाराज ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि संस्कार देना है।

एक पत्रकार ने पूछ लिया, “मंत्री जी, किस तरह के संस्कार?”

महाराज ने कहा, “जो व्यवस्था के अनुकूल हों।”

पत्रकार ने फिर पूछा, “और जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाएं?”

महाराज ने मुस्कुराकर कहा, “वह शोध का विषय है।”

प्रेस कांफ्रेंस समाप्त हो गई।

साहित्य परिषद में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ। ज्ञानरिपु ने अध्यक्ष पद संभालते ही घोषणा की कि परिषद साहित्य में नए मूल्यों की स्थापना करेगी।

उन्होंने कहा, “साहित्य समाज का दर्पण है।”

एक सदस्य ने पूछा, “दर्पण में चेहरा जैसा है वैसा ही दिखाई देगा न?”

ज्ञानरिपु ने उसकी ओर देखा।

“दर्पण परिषद द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।”

सदस्य चुप हो गया।

अगले महीने साहित्य परिषद ने ‘राष्ट्रीय साहित्यिक उत्कर्ष’ पर एक संगोष्ठी आयोजित की। विषय था—“साहित्य और राष्ट्र निर्माण।”

उद्घाटन भाषण शिक्षा मंत्री महाराज ने दिया।

उन्होंने कहा—

“साहित्यकारों का काम समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। उन्हें ऐसी रचनाएं करनी चाहिए जिनसे जनता में आशा, विश्वास और विकास की भावना पैदा हो।”

तालियां बजीं।

ज्ञानरिपु सबसे जोर से ताली बजा रहे थे।

उन्हें अपना पहला भाषण याद आ गया—वही पाषाण पुष्प वाला भाषण, जिसमें जंगल के नीचे दबे स्वर्ण को निकालने के लिए जंगल के ऊपर खड़े लोगों को समझाया गया था कि यह सब उनके ही हित में है।

आज उन्हें लगा कि गुरुमंत्र केवल एक भाषण लिखने के लिए नहीं था।

वह तो करियर बनाने का मंत्र था।

संगोष्ठी के बाद एक युवा कवि ने ज्ञानरिपु से पूछा—

“अध्यक्ष जी, क्या साहित्य को सत्ता से सवाल नहीं करना चाहिए?”

ज्ञानरिपु ने उसे स्नेह से देखा।

“करना चाहिए।”

युवा कवि प्रसन्न हुआ।

“सच?”

“हाँ। मगर पहले यह देख लेना चाहिए कि सवाल पूछने का समय उपयुक्त है या नहीं।”

“और उपयुक्त समय कब आता है?”

ज्ञानरिपु ने कहा—

“जब सत्ता स्वयं सवाल पूछने को कहे।”

युवा कवि ने उस दिन पहली बार समझा कि साहित्य परिषद की अध्यक्षता साहित्य से अधिक समय की समझ मांगती है।

उधर शिक्षा मंत्री महाराज ने पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन का प्रस्ताव रखा।

इतिहास की किताबों में रियासत का अध्याय छोटा कर दिया गया था, पर महाराज के शासनकाल का अध्याय विशेष रूप से विस्तृत किया जाना था।

एक अधिकारी ने साहस करके पूछा—

“मान्यवर, लोकतंत्र में व्यक्ति से अधिक संस्थाओं का महत्व नहीं होना चाहिए?”

महाराज ने कहा—

“बिल्कुल होना चाहिए।”

“तो फिर आपका अध्याय इतना बड़ा क्यों?”

महाराज ने गंभीर होकर उत्तर दिया—

“क्योंकि यह संस्था के विकास का ऐतिहासिक प्रमाण है।”

अधिकारी ने फाइल बंद कर दी।

लोकतंत्र में तर्क का भी एक राजकीय पद होता है—वह परिस्थिति देखकर छुट्टी पर चला जाता है।

धीरे-धीरे लोगों ने देखा कि महाराज के पुराने दरबारी अब सरकारी समितियों में दिखाई देने लगे हैं। पुराने प्रशंसक सलाहकार बन गए थे। पुराने भाट सांस्कृतिक संस्थाओं में नियुक्त हो गए थे। और पुराने राजकवि अब साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे।

राजतंत्र समाप्त हो चुका था।

केवल उसकी नियुक्तियां बची थीं।

एक दिन ज्ञानरिपु फिर गुरु के पास पहुंचे।

“गुरुदेव, एक बात समझ में नहीं आ रही।”

“क्या?”

“अब महाराज राजा नहीं हैं, फिर भी सब कुछ पहले जैसा क्यों लगता है?”

आचार्य विद्यादमन ने गहरी सांस ली।

“रिपु, तुम्हे अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।”

“क्या?”

“राजा का पद समाप्त हो सकता है। राजकीय मानसिकता का नहीं।”

ज्ञानरिपु चुप रहे।

गुरु ने आगे कहा—

“और याद रखो, लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह पुराने राजा को हटाकर नया राजा नहीं बनाता।”

ज्ञानरिपु ने राहत की सांस ली।

गुरु बोले—

“वह पुराने राजा को नया पद दे देता है।”

ज्ञानरिपु ने सिर झुका लिया।

उन्हें लगा, इतिहास सचमुच बहुत कठिन विषय है।

खासकर तब, जब उसे पढ़ाने वाला शिक्षा मंत्री स्वयं उसका पात्र हो।

और साहित्य परिषद का अध्यक्ष उसका कवि।


ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, August 12, 2026

बीती काहे बिसार दें?

बीती काहे बिसार दें?

समझदार लोग हमेशा से कहते आए हैं—बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले। जीवन में आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखते रहना ठीक नहीं। पीछे बहुत कुछ ऐसा पड़ा रहता है जिसे देखकर आदमी आगे बढ़ने का उत्साह ही खो दे। इसलिए समझदार आदमी स्मृतियों की गठरी हल्की करता रहता है।

लेकिन हमारे समय में भूलना भी कोई निजी मामला नहीं रह गया है। क्या भूलना है और क्या याद रखना है, इसका निर्णय अब व्यक्ति अकेले नहीं करता। इसके लिए बाकायदा वातावरण बनाया जाता है। कभी कोई नई घटना पुरानी घटना पर डाल दी जाती है, कभी कोई नया विवाद पुराने विवाद को ढक लेता है और कभी पुरानी बात अचानक नए संदर्भ में ऐसी लौटती है जैसे वह कल ही हुई हो।

हमारे लोकतंत्र में स्मृति भी मौसम की तरह है। चुनाव आया तो कुछ बातें याद आने लगती हैं, चुनाव गया तो वही बातें इतिहास की अलमारी में रख दी जाती हैं। पाँच साल तक जिन सवालों पर धूल जमती रहती है, चुनाव के मौसम में उन पर अचानक झाड़न चलने लगती है। जनता को बताया जाता है कि उसे क्या याद रखना चाहिए और क्या भूल जाना चाहिए।

सरकारें चाहती हैं कि जनता भविष्य की ओर देखे। यह अच्छी बात है। भविष्य में विकास है, नई सड़क है, नया एक्सप्रेसवे है, नया पुल है, नया ऐप है और नया उद्घाटन है। अतीत में जाने पर कुछ असुविधाजनक प्रश्न खड़े हो सकते हैं—किसने क्या वादा किया था, किसका क्या हुआ, किसकी जमीन गई, किसकी नौकरी गई, किसका घर टूटा और किसका सपना अधूरा रह गया।

इसलिए भविष्य बहुत सुविधाजनक चीज है। उसमें हिसाब नहीं देना पड़ता।

अतीत में हिसाब-किताब रहता है।

हमने देखा है कि एक समय में घोटालों की संख्या इतनी बढ़ जाती थी कि नया घोटाला पुराने घोटाले को भुलाने का काम करता था। आज तकनीक ने इस व्यवस्था को और सरल कर दिया है। अब किसी घोटाले को भुलाने के लिए नया घोटाला जरूरी नहीं। एक वायरल वीडियो, एक उत्तेजक बयान, एक धार्मिक विवाद, कोई भावुक भाषण या सोशल मीडिया का नया ट्रेंड पर्याप्त है।

सुबह जो मुद्दा देश की सबसे बड़ी चिंता था, शाम तक वह किसी और मुद्दे के नीचे दबा मिलता है।

अगले दिन कोई पूछे—“कल क्या हुआ था?”

उत्तर मिलता है—“कल? कौन-सा कल?”

स्मृति अब चौबीस घंटे की हो गई है।

लेकिन विचित्र बात यह है कि जब सत्ता को अतीत की जरूरत होती है तो स्मृति अचानक बहुत लंबी हो जाती है। कई दशक पीछे जाकर घटनाओं की फाइलें खुल जाती हैं। इतिहास के पुराने पन्ने झाड़-पोंछकर सामने रख दिए जाते हैं। तब बताया जाता है कि देखिए, यह सब पहले हुआ था। इसलिए आज का प्रश्न मत पूछिए।

यानी इतिहास कभी सबक है, कभी हथियार।

कभी वह आईना है और कभी पर्दा।

महाभारत से लेकर आज तक मनुष्य को स्मरण कराने के लिए किसी न किसी ‘मुद्रिका’ की जरूरत पड़ती रही है। शकुंतला की मुद्रिका ने दुष्यंत को वह याद दिलाया जिसे वे भूल चुके थे। आज हमारे पास मुद्रिकाओं की कमी नहीं है। फर्क इतना है कि अब मुद्रिका अंगूठी के रूप में नहीं आती। वह कभी चुनावी नारा होती है, कभी वायरल पोस्ट, कभी पुराना भाषण, कभी किसी नेता का बयान, कभी किसी जाँच की फाइल और कभी किसी स्मारक के रूप में सामने आ जाती है।

इन मुद्रिकाओं का उपयोग बड़ा समझदारी से होता है।

जब जरूरी हो तो कहा जाता है—“इतिहास को भूलना नहीं चाहिए।”

जब इतिहास असुविधाजनक हो जाए तो कहा जाता है—“पुरानी बातों को कुरेदने से क्या फायदा?”

जब किसी पुराने अपराध का उल्लेख अपने पक्ष में हो तो वह राष्ट्र की स्मृति बन जाता है और जब वही स्मृति प्रश्न पूछने लगे तो उसे ‘नकारात्मकता’ कह दिया जाता है।

भोपाल की गैस त्रासदी हो, आपातकाल हो, बाबरी मस्जिद का विध्वंस हो, गुजरात के दंगे हों, विभाजन की त्रासदी हो, युद्धों की स्मृतियाँ हों या बड़े आर्थिक घोटाले—हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है जिन्हें भूलना भी आसान नहीं और याद रखना भी हमेशा सुविधाजनक नहीं।

ऐसी स्मृतियों से कोई कहे कि ‘बीती ताहि बिसार दे’, तो शायद बीती हुई बात पूछेगी—“किसके लिए?”

जिसे नुकसान हुआ, उसके लिए अतीत बीता हुआ नहीं होता।

जिसने लाभ उठाया, उसके लिए वह इतिहास हो सकता है।

यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है।

स्मृति का भी वर्ग-विभाजन हो गया है।

जिसके पास सत्ता है, उसके पास स्मृति को व्यवस्थित करने की सुविधा है। वह तय कर सकता है कि कौन-सी घटना राष्ट्रीय स्मृति बनेगी, कौन-सी स्थानीय घटना रह जाएगी और कौन-सी घटना इतनी पुरानी घोषित कर दी जाएगी कि उसके बारे में प्रश्न पूछना ही अनुचित लगे।

जनता भी कमाल की है। उसे रोज इतनी नई सूचनाएँ मिलती हैं कि पुरानी बात याद रखना कठिन हो गया है। मोबाइल की स्क्रीन पर सुबह का आक्रोश दोपहर तक मनोरंजन में बदल जाता है और शाम तक किसी नई बहस का शिकार हो जाता है।

पहले लोग कहते थे—समय बड़े से बड़े घाव को भर देता है।

अब सोशल मीडिया कहता है—समय बड़े से बड़े घाव को ट्रेंड से बाहर कर देता है।

फर्क मामूली नहीं है।

घाव भरा या नहीं, यह शरीर बताता है।

फिर भी कुछ लोग हैं जो बार-बार पुरानी बातें याद दिलाते रहते हैं। वे पूछते हैं—वादा क्या था? हुआ क्या? जिम्मेदार कौन था? न्याय कहाँ तक पहुँचा? मुआवजा किसे मिला? विस्थापित कहाँ गए? जिनके नाम पर राजनीति हुई, उनका जीवन कितना बदला?

ऐसे लोगों को अक्सर सलाह दी जाती है—“आगे देखिए।”

वे कहते हैं—“आगे देखने में हमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन आगे जाने के लिए पीछे की सड़क भी तो देखनी पड़ेगी।”

यही बात समझने में सबसे अधिक कठिनाई होती है।

अतीत को ढोना और अतीत से सीखना दो अलग बातें हैं। अतीत में फँसे रहना समाज को आगे नहीं ले जाता, लेकिन अतीत को मिटा देना समाज को बार-बार उसी गड्ढे में गिरा सकता है।

इतिहास की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि वह हमें बताता रहे—हम पहले कहाँ गिरे थे।

वरना सत्ता अपनी सुविधा से मुद्रिका दिखाती रहेगी, जनता अपनी सुविधा से भूलती रहेगी और हम हर पाँच साल बाद उसी पुराने मंच पर नए नाटक के टिकट खरीदते रहेंगे।

कहानी वही होगी।

केवल पोस्टर नया होगा।


ब्रजेश कानूनगो