Saturday, November 7, 2026

यूटर्न का दौर है साहब!

यूटर्न का दौर है साहब!

यूटर्न शब्द सड़क से आया है। सीधे आगे बढ़ते हुए अचानक मुड़कर वापस उसी रास्ते पर लौट आना। इसका एक दूसरा अर्थ भी है। पहले जो निर्णय लिया हो, जिस बात पर अड़े रहे हों, कुछ समय बाद उसी को पलटकर पीछे लौट आना। सड़क पर यूटर्न लेने के लिए संकेतक और निर्धारित जगह की जरूरत होती है, लेकिन राजनीति में इसकी कोई बाध्यता नहीं। वहां बिना इंडिकेटर, बिना ब्रेक और बिना किसी अपराधबोध के यूटर्न लिया जा सकता है।

पहले नेता कोई बात कहते थे तो उनके समर्थक उसे सिद्धांत मानकर वर्षों तक ढोते थे। अब नेता कोई बात कहते हैं तो समर्थकों को भी पता रहता है कि इसका अगला संस्करण जल्दी ही आने वाला है। कल तक जो विरोधी भ्रष्ट, अयोग्य और देशहित के खिलाफ था, आज राजनीतिक जरूरत के मुताबिक योग्य, विश्वसनीय और राष्ट्रवादी हो सकता है। विचारधारा अब स्थायी प्रतिबद्धता नहीं, जरूरत के मुताबिक बदला जाने वाला परिधान हो गई है।

इस कला में नेताओं ने इतनी महारत हासिल कर ली है कि उनके पुराने भाषण सुनकर लगता है जैसे कोई दूसरा व्यक्ति बोल रहा हो। विपक्ष में रहते हुए पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर आंदोलन करने वाले सत्ता में पहुंचकर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की दुहाई देने लगते हैं। महंगाई तब सरकार की नाकामी होती है, अब वैश्विक मजबूरी। जिस नीति को कल तक जनविरोधी बताया जाता था, आज वही विकास का अनिवार्य रास्ता बन जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुर्सी बदलते ही तर्क भी बदल जाते हैं।

संसद भी इस प्रवृत्ति से अछूती नहीं है। जो बात कल तक लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जरूरी थी, आज अनुशासनहीनता हो सकती है। जिस संशोधन का कभी विरोध किया गया था, सत्ता की जरूरत पड़ने पर वही ऐतिहासिक निर्णय बन जाता है। कभी-कभी लगता है कि संसद में कानून बनाने से ज्यादा मेहनत पुराने बयानों को नए अर्थ देने में होती है।

नीतियों और नियमों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। कोई योजना बड़े जोर-शोर से शुरू होती है। कुछ समय बाद उसके स्वरूप में बदलाव होता है, नाम बदलता है और फिर उसे नई उपलब्धि बताकर पेश कर दिया जाता है। आम आदमी समझ नहीं पाता कि वह पुरानी नीति के हिसाब से चले या नई के। किसान को नहीं पता कि अगली फसल तक नियम क्या होंगे, युवा को भरोसा नहीं कि भर्ती प्रक्रिया अपने अंजाम तक पहुंचेगी भी या नहीं। सरकारों के लिए नीति बदलना रणनीति हो सकती है, लेकिन जनता के लिए यह अक्सर सिरदर्द है।

चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर भी राजनीतिक दलों का रवैया कई बार इसी सुविधा के हिसाब से बदलता दिखाई देता है।  पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग भी कई बार राजनीतिक सुविधा देखकर सक्रिय होती है और यूटर्न दिखाई देने लगते हैं। लोकतंत्र में संस्थाओं पर भरोसा जरूरी है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार भी उतना ही जरूरी है।

अब तो यूटर्न के लिए आकर्षक शब्दावली भी तैयार है। इसे कभी रणनीतिक बदलाव कहा जाता है, कभी परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय और कभी समय की मांग। नेता बयान पलटें तो स्पष्टीकरण, पार्टी गठबंधन बदले तो नई राजनीतिक परिस्थिति और सरकार फैसला बदले तो व्यापक जनहित! गलती किसी की नहीं होती, दोष हमेशा परिस्थितियों का होता है।

लगता है हम ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां आगे बढ़ने से ज्यादा समझदारी समय पर पीछे  मुड़ने में है। जनता नेताओं से अब यह नहीं पूछती कि आप कहां जा रहे हैं, बल्कि मन ही मन यह अंदाजा लगाती है कि अगला यूटर्न कब आने वाला है। डर तो बस इतना है कि कहीं एक दिन देश को पता चले कि विकास की यात्रा में हम बहुत आगे निकल आए हैं, जबकि यूटर्न लेते-लेते उसी पुराने चौराहे पर खड़े हैं जहां से चले थे। बस, इस बार चौराहे का नाम बदलकर विकास चौक कर दिया गया है!

ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, November 4, 2026

भारत और इंडिया : दो देश, एक लोकतंत्र

भारत और इंडिया : दो देश, एक लोकतंत्र

अजीब स्थिति है इस देश की। एक मुख्यमंत्री कहते हैं कि उनके प्रदेश में क्राइम हो सकते हैं, लेकिन अपराध नहीं हैं। कोई अपराधी नहीं है। प्रदेश अपराधमुक्त हो चुका है। अब मुख्यमंत्री को झूठा कैसे कहें! हो सकता है वे सही ही कह रहे हों। आखिर यह देश ही ऐसा है जहां भारत भी है और इंडिया भी। दोनों एक ही नक्शे में रहते हैं, एक ही संविधान से संचालित होते हैं, एक ही चुनाव में वोट डालते हैं, लेकिन दोनों की दुनिया बिल्कुल अलग है।

भारत में गरीबी है, महंगाई है, बेरोजगारी है। वहां पांच किलो मुफ्त राशन पाने वालों की लंबी कतारें हैं। पेट भरने के लिए सरकारी योजनाएं हैं और दुख भुलाने के लिए दारू। कुपोषण है, बीमारियां हैं, अस्पतालों में बिस्तरों की कमी है। किसान कर्ज में है और नौजवान नौकरी की तलाश में। वहां अपराध भी हैं, अपराधी भी हैं और उनसे बचने के लिए पुलिस भी है। हालांकि पुलिस कभी-कभी अपराधियों को पकड़ने के बजाय अपराध की परिभाषा समझाने में व्यस्त रहती है।

इसके ठीक बगल में इंडिया है। वहां संपन्नता है, ऐश्वर्य है, स्वास्थ्य है, भरे हुए पेट हैं। वहां जिम हैं, हेल्थ क्लब हैं, डाइटिशियन हैं और शरीर को सुंदर बनाए रखने के लिए महंगे उपाय हैं। भारत में लोग भूख मिटाने के लिए खाते हैं, इंडिया में लोग खाने के बाद कैलोरी गिनते हैं। भारत में रोटी की चिंता है, इंडिया में रोटी के ग्लूटेन की। भारत में लोग बीमारी से परेशान हैं, इंडिया में लोग फिटनेस ट्रैकर पर अपनी सेहत का ग्राफ देखकर प्रसन्न होते हैं।

भारत में दारू गम गलत करने का साधन है तो इंडिया में सुख का नशा है। वहां महंगी शराब, विदेशी छुट्टियां, लग्जरी कारें और मनोरंजन के अनगिनत साधन हैं। भारत में आदमी अपनी परेशानियां भुलाने के लिए पीता है, इंडिया में अपनी सफलता का जश्न मनाने के लिए। दोनों के नशे अलग हैं, लेकिन सुबह उठने पर सिरदर्द दोनों को होता है।

भारत में अपढ़ लोग हैं, जिन्हें समझदार बनाने के लिए तरह-तरह के अभियान चलाए जाते हैं। इंडिया में पढ़े-लिखे मूर्खों की कोई कमी नहीं है। वहां डिग्रियां हैं, विदेशी विश्वविद्यालयों की चमक है, अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलने की क्षमता है। कुछ लोग बिना जाने सब कुछ जानते हैं और कुछ बिना समझे हर बात पर विशेषज्ञ राय देते हैं। भारत का अनपढ़ आदमी कभी-कभी अपनी सीमाएं जानता है, लेकिन इंडिया का पढ़ा-लिखा आदमी अपनी अज्ञानता को भी आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करता है।

भाषा का भी अपना कमाल है। भारत में कोई गरीब है तो इंडिया में वह 'लोअर इनकम ग्रुप' का नागरिक है। भारत में बेरोजगार नौजवान है तो इंडिया में वह 'जॉब सीकर' है। भारत में झुग्गी है तो इंडिया में 'अर्बन स्लम'। भारत में भुखमरी है तो इंडिया में 'फूड सिक्योरिटी चैलेंज'। शब्द बदलते ही समस्या का चेहरा बदल जाता है। लगता है कि अंग्रेजी में अनुवाद होते ही गरीबी भी थोड़ी प्रतिष्ठित हो जाती है।

भारत में अपराध होते हैं तो इंडिया में उन्हें कभी-कभी सिस्टम की विफलता, सामाजिक विचलन या कानून-व्यवस्था की चुनौती कहा जाता है। शायद इसी भाषाई सुविधा के कारण मुख्यमंत्री का कथन भी बिल्कुल सही है। क्राइम हो सकता है, अपराध नहीं। जैसे भ्रष्टाचार हो सकता है, भ्रष्टाचारी नहीं। महंगाई हो सकती है, महंगा कुछ नहीं। बेरोजगारी हो सकती है, बेरोजगार कोई नहीं। आखिर आंकड़ों और शब्दों का अपना लोकतंत्र है। उनमें सरकार की मर्जी से बहुमत बदल सकता है।

दोनों देशों के नागरिकों में एक और बड़ा अंतर है। भारत का नागरिक अक्सर सरकार से सवाल पूछता है क्योंकि उसके पास समस्याएं हैं। इंडिया का नागरिक सरकार की उपलब्धियों पर गर्व करता है क्योंकि उसके पास समस्याओं से बचने के साधन हैं। एक को राशन की दुकान पर अपनी बारी का इंतजार है, दूसरे को विदेश में छुट्टियों की बुकिंग का। एक को अस्पताल में डॉक्टर चाहिए, दूसरे को अच्छे अस्पताल का हेल्थ पैकेज।

हम इसे देश की विविधता कहते हैं। भाषाई विविधता, सांस्कृतिक विविधता, आर्थिक विविधता और अब तो वास्तविकताओं की भी विविधता। शायद यह हमारी बौद्धिक मौलिकता का नया अध्याय है। एक ही देश में दो देश बसाने की कला हमने विकसित कर ली है। राष्ट्र की एकता और अखंडता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि दोनों देश एक-दूसरे के इतने पास रहते हैं, फिर भी एक-दूसरे से बेखबर हैं।

बस एक छोटी-सी समस्या है। भारत के लोग जब कभी इंडिया में प्रवेश करना चाहते हैं तो उनसे पासपोर्ट नहीं मांगा जाता, केवल उनकी हैसियत पूछ ली जाती है। और हां, इंडिया के लोग जब भारत की तरफ देखते हैं तो उन्हें वहां बहुत संभावनाएं दिखाई देती हैं। आखिर विकास के लिए इससे बड़ा बाजार और क्या होगा!


ब्रजेश कानूनगो

Sunday, November 1, 2026

दीपावली पर ठंड और जैकेटों की गर्माहट

दीपावली पर ठंड और जैकेटों की गर्माहट

दीपावली आते ही मौसम में ठंडक घुलने लगती है। घरों की अलमारियों से गर्म कपड़े बाहर निकलने लगते हैं। कोई स्वेटर झाड़ता है तो कोई जैकेट की धूल साफ करता है। बाजार में भी गर्म कपड़ों की रौनक बढ़ने लगती है। लेकिन इस मौसम में एक और दिलचस्प नजारा देखने को मिलता है। अखबार भी जैकेट पहनने लगते हैं।

यह जैकेट ऊन या किसी गर्म कपड़े की नहीं होती। इसे विज्ञापनों की रंगीन परतों से तैयार किया जाता है। अखबार के ऊपर एक पूरा पन्ना किसी आभूषण विक्रेता का होता है तो भीतर के पन्नों में कार, मकान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, मोबाइल और तरह-तरह के महंगे उत्पाद अपनी चमक बिखेर रहे होते हैं। कई बार तो अखबार को खोलने से पहले यह समझना मुश्किल हो जाता है कि असली अखबार कहां है और विज्ञापन कहां से शुरू हो रहा है। लगता है जैसे समाचारों ने विज्ञापनों के बीच थोड़ी-सी जगह किराये पर ले रखी हो।

दीपावली का मौसम अखबारों के लिए कमाई का सबसे सुहाना मौसम होता है। रत्नों और महंगी धातुओं की चमक से लेकर सोने-चांदी के सिक्कों तक, सबकी गर्मी अखबारों के पन्नों में उतर आती है। विज्ञापनदाता भी जानते हैं कि इस समय लोगों की खरीदारी की इच्छा अपने चरम पर होती है। लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में लोग अपनी जेब और बैंक खाते दोनों खोलने को तैयार रहते हैं। अखबार इस पवित्र अवसर पर उनकी सहायता के लिए पूरी तरह तत्पर रहते हैं। वे सुबह-सुबह बता देते हैं कि लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए कौन-सा हार पहनना चाहिए, किस कंपनी की कार खरीदनी चाहिए और किस मकान में उनका स्थायी निवास संभव है।

इस पूरे आयोजन में अखबारों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वे अब केवल खबरें देने का काम नहीं करते, बल्कि लोगों की इच्छाओं को जगाने और उन्हें खरीदारी की दिशा दिखाने का सामाजिक दायित्व भी निभाते हैं। कभी अखबार में खबरें पढ़कर पाठक दुनिया को समझता था। अब विज्ञापन देखकर उसे यह समझने में मदद मिलती है कि दुनिया में वह कितना पीछे रह गया है। पड़ोसी ने नई कार खरीद ली, रिश्तेदार ने सोने का हार बनवा लिया और मित्र ने नया फ्लैट बुक कर लिया। इन सबके बीच अपना पुराना स्कूटर, पुरानी साड़ी और पुराना मकान अचानक आत्मसम्मान पर बोझ लगने लगते हैं।

विज्ञापन की खूबी यही है कि वह हमारी जरूरतों को इच्छाओं में और इच्छाओं को अनिवार्य जरूरतों में बदल देता है। दीपावली का त्योहार तो वैसे भी सफाई, रोशनी और खुशियों का पर्व है, लेकिन बाजार ने इसमें एक नया अध्याय जोड़ दिया है। अब घर की सफाई के साथ बैंक खाते की सफाई भी जरूरी समझी जाने लगी है। लक्ष्मी पूजन के बाद लक्ष्मीजी को घर में रोकने की चिंता कम और उन्हें बाजार तक पहुंचाने की जल्दी अधिक दिखाई देती है।

अखबारों की इस मौसमी गर्मी का एक दूसरा पहलू भी है। विज्ञापनों की मोटी जैकेट के भीतर समाचारों के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जाती है। नागरिक समस्याएं, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, अस्पतालों की बदहाली और सरकारी व्यवस्थाओं की खामियां शायद इसलिए कम दिखाई देती हैं कि वे खरीदारी का उत्साह खराब कर सकती हैं। त्योहार के दिनों में पाठक को उदास करने वाली खबरों से बचाना भी बाजार की दृष्टि में एक तरह की सामाजिक सेवा है। आखिर जब चारों ओर रोशनी का उत्सव है तो अंधेरे की चर्चा कौन करना चाहेगा!

हालांकि इस मौसम में सबसे अधिक ठंड उन लोगों को लगती है जिनके पास खरीदारी के लिए अतिरिक्त पैसा नहीं है। उनके लिए अखबार की चमक कुछ वैसी ही है जैसे ठिठुरते हुए आदमी के सामने किसी महंगे शोरूम की रोशनी। भीतर गर्मी और बाहर ठंड। विज्ञापनों में परिवार मुस्करा रहे होते हैं, घर जगमगा रहे होते हैं और खुशियां पैक होकर बिक रही होती हैं। मगर वास्तविक जीवन में अनेक परिवार दीपावली का बजट बनाते हुए जरूरी खर्चों में कटौती कर रहे होते हैं। किसी के लिए मिठाई खरीदना भी हिसाब-किताब का विषय है तो किसी के लिए बच्चों के नए कपड़े खरीदना एक छोटी आर्थिक चुनौती।

अखबारों की जैकेट जितनी मोटी होती जाती है, आम आदमी की जेब उतनी ही हल्की होती जाती है। यह भी एक विचित्र अर्थशास्त्र है कि विज्ञापनों की गर्मी बढ़ने के साथ उपभोक्ता के बैंक बैलेंस का तापमान गिरता जाता है। बाजार इसे समृद्धि का संकेत बताता है और अखबार इसे त्योहार की रौनक की तरह प्रस्तुत करते हैं।

इसमें अखबारों को दोष देने से पहले यह भी समझना होगा कि विज्ञापन उनकी आय का बड़ा स्रोत हैं। लेकिन अखबार का एक सामाजिक दायित्व भी है। उसे बाजार का हिस्सा होते हुए भी बाजार का मुखपत्र नहीं बन जाना चाहिए। पाठक अखबार खरीदता है तो केवल सामान की सूची देखने के लिए नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और व्यवस्था की सच्चाई जानने के लिए भी खरीदता है।

बहरहाल, दीपावली पर अखबारों को जैकेट पहनने का पूरा अधिकार है। मौसम ठंडा हो तो कारोबार गर्म रखना भी जरूरी है। बस इतनी-सी गुजारिश है कि जैकेट इतनी मोटी न हो जाए कि भीतर खबरों का दम ही घुटने लगे। और हां, विज्ञापनों की इस रोशनी में अखबार यह भी देख लें कि कहीं उनके पाठकों की जेबों में अंधेरा तो नहीं बढ़ रहा है। क्योंकि दीपावली का असली उजाला अखबारों के पन्नों पर चमकते सोने-चांदी से नहीं, लोगों के जीवन में बची हुई खुशियों से तय होना चाहिए।

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, October 19, 2026

घर की अर्थव्यवस्था में डिजिटल क्रांति का स्वाद

घर की अर्थव्यवस्था में डिजिटल क्रांति का स्वाद 

घर में शकर खत्म हो गई थी। पत्नी ने चाय का कप सामने रखते हुए पूछा, “जरा बाजार से शकर लेते आना। और हाँ, आटा भी खत्म होने वाला है, तेल भी बस दो दिन का बचा है।”

पति मोबाइल में आँखें गड़ाए बैठा था। बोला, “अभी देश में महँगाई पर बड़ी गंभीर बहस चल रही है। जरा खत्म हो जाए तो निकलता हूँ।”

पत्नी ने स्क्रीन पर झाँका। वहाँ महँगाई पर बहस नहीं, एक वीडियो में कोई महाशय बता रहे थे कि सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से शरीर के सारे रोग दूर हो जाते हैं।

“यह क्या देख रहे हो?”

“ज्ञान प्राप्त कर रहा हूँ। आजकल ज्ञान मुफ्त है, बस डाटा खर्च होता है।”

पत्नी ने ताना मारा, “ज्ञान से पेट भरता हो तो रसोई में रखे खाली डिब्बे भी भर दो।”

पति ने बात अनसुनी कर दी। दरअसल, उसे महँगाई से कोई खास शिकायत नहीं थी। शकर महँगी हो, तेल महँगा हो, आटा महँगा हो, गैस सिलेंडर बजट बिगाड़ दे, इससे उसकी डिजिटल दिनचर्या पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। महीने की शुरुआत में वह सबसे पहले मोबाइल का रिचार्ज करवाता था। बाकी खर्चे बाद में देखे जाते थे। रोटी एक समय कम खाई जा सकती थी, लेकिन मोबाइल का डाटा खत्म हो जाए तो जीवन में एकाएक राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती थी।

उसके लिए महँगाई का असली पैमाना बाजार में सब्जियों के भाव नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाला डाटा बैलेंस था। सब्जीवाला उधार देने से मना कर दे तो कोई बात नहीं, लेकिन इंटरनेट की गति धीमी हो जाए तो वह सेवा प्रदाता कंपनी को देश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा संकट मानने लगता था।

उसका तर्क भी सीधा था। “भाई, शकर से मिठास आती है, मान लिया। लेकिन मोबाइल से जीवन में मिठास आती है। रिश्तेदारों के जन्मदिन याद रहते हैं, मित्रों की उपलब्धियों का पता चलता है, त्योहारों पर शुभकामनाएँ भेजी जाती हैं। दुनिया भर के लोग घर बैठे मिल जाते हैं। अब बताइए, इतने लाभ के सामने दो रोटी कम खाने में क्या हर्ज है?”

पत्नी ने कहा, “रिश्तेदारों को शुभकामनाएँ भेजने से अच्छा है, कभी किसी के घर जाकर मिल भी आया करो।”

“तुम पुराने जमाने की बातें करती हो। अब रिश्ते निभाने के लिए कहीं आने-जाने की जरूरत नहीं। एक फूल, दो हाथ जोड़ते इमोजी और नीचे लिख दो—सपरिवार शुभकामनाएँ। रिश्ता भी निभ गया, पेट्रोल भी बच गया और समय भी।”

वह सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय था। सुबह उठते ही देशभक्ति का संदेश, फिर संस्कृति बचाने की अपील, दोपहर में पर्यावरण पर चिंता, शाम को महँगाई के विरुद्ध आक्रोश और रात को किसी आध्यात्मिक गुरु का प्रवचन। दिन भर में उसने देश की लगभग सारी समस्याएँ हल कर दी थीं। बस अपने घर की समस्याओं के लिए उसके पास समय नहीं था।

एक दिन पड़ोसी ने बताया कि उसकी नौकरी चली गई है। वह बहुत परेशान है। पति ने तुरंत उसके मोबाइल पर एक संदेश भेजा—‘हिम्मत मत हारिए, हर अँधेरी रात के बाद सुबह होती है।’

पड़ोसी ने फोन करके कहा, “भाई, सुबह तो होगी, लेकिन कल बच्चों की फीस कैसे भरूँ?”

पति कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “देखो, इस समय मैं थोड़ी जरूरी ऑनलाइन मीटिंग में हूँ। बाद में बात करता हूँ।”

मीटिंग दरअसल मित्रों के व्हाट्सऐप समूह में चल रही थी, जहाँ एक नया चुटकुला आया था और उस पर ठहाकों की प्रतियोगिता हो रही थी।

धीरे-धीरे उसे विश्वास हो गया था कि आभासी दुनिया में कोई नुकसान नहीं होता। वहाँ झूठी खबर आगे बढ़ा दो तो उँगली भर हिलानी पड़ती है, किसी को अपमानित कर दो तो चेहरा सामने नहीं होता, किसी की पीड़ा पर हँस दो तो उसकी आँखों में आँसू भी नहीं दिखते। वास्तविक दुनिया में किसी की मदद करने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है, समय देना पड़ता है, कभी-कभी अपने आराम का त्याग भी करना पड़ता है। आभासी दुनिया में केवल एक क्लिक से दयालु, देशभक्त, संवेदनशील और क्रांतिकारी बना जा सकता है।

हाँ, कभी-कभी कोई ठगी का संदेश आ जाता, कोई निजी जानकारी चुरा लेता या किसी फर्जी लिंक से खाते में सेंध लग जाती। तब उसे आभासी दुनिया के खतरों का एहसास होता। लेकिन अगले ही दिन कोई नया वीडियो, नया विवाद और नया संदेश उसे फिर उसी दुनिया में खींच लेता। आखिर खतरे भी तो वहीं थे जहाँ जीवन था!

एक शाम पत्नी ने फिर हिसाब सामने रख दिया। बिजली का बिल, स्कूल की फीस, राशन का खर्च और दवाइयों की पर्चियाँ मेज पर फैली थीं। पति ने सब देखा और गंभीरता से सिर हिलाया।

“स्थिति सचमुच चिंताजनक है,” उसने कहा, “हमें खर्चों में कटौती करनी होगी।”

पत्नी को पहली बार लगा कि शायद आदमी में कुछ विवेक जागा है।

पति ने आगे कहा, “कल से हम दिन में कम-से-कम दो घंटे मोबाइल कम चलाएँगे। इससे डाटा बचेगा। उसी पैसे से कुछ और रिचार्ज करा लेंगे।”

पत्नी ने माथा पीट लिया।

अगले दिन पति ने नया रिचार्ज कराया और सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली—‘महँगाई के इस दौर में आम आदमी का जीवन कठिन होता जा रहा है। सरकार को जनता की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।’

पोस्ट पर खूब लाइक आए। एक मित्र ने लिखा—‘बिल्कुल सही बात।’

दूसरे ने टिप्पणी की—‘आपकी चिंता जायज है।’

तीसरे ने सुझाव दिया—‘इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।’

पति का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसे लगा कि जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँचने लगी है। उधर रसोई में पत्नी ने चाय बनाते समय शकर की जगह गुड़ डाल दिया था और रात के खाने में रोटियों की संख्या भी घटा दी थी।

पति ने चाय पीते हुए कहा, “आज मिठास कुछ अलग है!”

पत्नी मुस्कराई, “हाँ, घर की अर्थव्यवस्था में डिजिटल क्रांति का स्वाद है।”

पति ने बात समझने की कोशिश नहीं की। तभी मोबाइल पर संदेश आया—‘आपका डाटा पैक समाप्त होने वाला है।’

वह घबरा उठा। चाय का कप मेज पर रखकर तुरंत रिचार्ज कराने दौड़ा। जाते-जाते पत्नी से बोला, “रात के खाने में थोड़ा समझौता कर लेना, लेकिन डाटा खत्म नहीं होना चाहिए। आखिर दुनिया से जुड़े रहना भी तो जरूरी है!”

पत्नी ने खाली होते राशन के डिब्बों की ओर देखा और बुदबुदाई—इस घर में अब पेट की भूख से बड़ी समस्या मोबाइल की भूख हो गई है।

ब्रजेश कानूनगो 




Saturday, October 17, 2026

दाग अच्छे हैं, बशर्ते चुनाव जीतें!

दाग अच्छे हैं, बशर्ते चुनाव जीतें!

राजनीति में अब दाग धुलते नहीं, तौले जाते हैं। टिकट देने से पहले उम्मीदवार का चरित्र नहीं, उसका चुनावी वजन देखा जाता है। ईमानदारी, स्वच्छ छवि और जनसेवा एक पलड़े में रखी जाती हैं; धनबल, बाहुबल और जीतने की गारंटी दूसरे में। फिर पार्टी बड़ी गंभीरता से लोकतंत्र के हित में वही पलड़ा चुनती है जो भारी हो। नैतिकता भाषणों में जितनी भी भारी पड़े, टिकट की तराजू पर अक्सर हल्की साबित होती है।

टिकट वितरण समिति की बैठक में एक सदस्य ने आपत्ति की, “इस उम्मीदवार पर कई आपराधिक मामले हैं। इसकी छवि ठीक नहीं है।”

दूसरे ने पूछा, “जीतने की संभावना कैसी है?”

“बहुत अच्छी है।”

“तो फिर छवि ठीक ही होगी!”

पहला सदस्य चुप हो गया। उसे समझ में आ गया कि वह चरित्र की भाषा बोल रहा था, जबकि बैठक चुनावी गणित में चल रही थी।

स्वच्छ छवि वाला उम्मीदवार कहता है, “मैंने जीवन भर ईमानदारी से काम किया है।”

पार्टी पूछती है, “बहुत अच्छी बात है। लेकिन चुनाव में कितना खर्च कर सकते हैं?”

“मेरे पास सीमित साधन हैं।”

“और समर्थक?”

“कुछ लोग हैं, जो मेरे विचारों से सहमत हैं।”

पार्टी समझाती है, “विचारों से सहमत लोग अच्छे होते हैं, भाई साहब! लेकिन चुनाव जीतने के लिए विचारों से ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है।”

उम्मीदवार निराश होकर लौट जाता है। पार्टी को एक अच्छा आदमी नहीं मिल पाता, लेकिन चुनाव के लिए एक अच्छा उम्मीदवार मिल जाता है। दोनों में अंतर अब राजनीति का गोपनीय रहस्य है।

दागी उम्मीदवार की अपनी खूबियाँ होती हैं। उसके समर्थक दावा करते हैं कि वह काम करवाने वाला आदमी है। उसके विरुद्ध मामलों की चर्चा हो तो सफाई मिलती है, “यह सब राजनीतिक साजिश है।” विपक्ष से पूछिए तो वह भी अपने उम्मीदवार के मामलों को साजिश बताता है। बस, समझ में नहीं आता कि यदि सारे मामले राजनीतिक साजिश हैं, तो राजनीति में इतने साजिशकर्ता आते कहाँ से हैं!

चुनाव के समय धनबल को लोकतंत्र के महापर्व का खर्च बताया जाता है। जनता की गरीबी पर चिंता जताने वाले नेताओं के प्रचार में करोड़ों की चमक दिखाई देती है। बाहुबल को भी नए नाम मिल जाते हैं। कहीं वह संगठन की मजबूती कहलाता है, कहीं जनाधार और कहीं प्रभावशाली नेतृत्व। भाषा का कमाल देखिए कि लाठी हाथ में हो तो भय पैदा करती है, लेकिन उसी लाठी के पीछे भीड़ खड़ी हो जाए तो राजनीतिक शक्ति बन जाती है।

इस पूरे तमाशे में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण पात्र है—और सबसे आसानी से भुला दिया जाने वाला भी। चुनाव के दिन वह लोकतंत्र का राजा होता है। नेता उसके दरवाजे पर हाथ जोड़ता है, उसकी गरीबी पर आँसू बहाता है और उसकी हर समस्या को अपनी निजी समस्या बताता है। वोट पड़ते ही राजा का राजतिलक समाप्त हो जाता है और वह फिर प्रजा की कतार में खड़ा मिलता है। कल तक जो नेता उसके दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, आज उससे मिलने के लिए मतदाता को सिफारिश ढूँढ़नी पड़ती है। पाँच साल तक जनता सरकार को खोजती है और चुनाव आते ही सरकार जनता को खोज लेती है। लोकतंत्र का यह अद्भुत चक्र है—मतदाता हर बार अपना प्रतिनिधि चुनता है, लेकिन प्रतिनिधि चुनते ही अपनी ही हैसियत भूल जाता है।

समस्या यह नहीं कि राजनीति में दागी लोग आ जाते हैं। समस्या यह है कि दाग अब कई बार अयोग्यता नहीं, योग्यता समझे जाने लगे हैं। जब चुनाव जीतना ही एकमात्र उद्देश्य हो जाए, तब साधनों की पवित्रता पर सवाल उठाना समय की बर्बादी माना जाता है।

लोकतंत्र की विडंबना देखिए—जनता से ईमानदार प्रतिनिधि चुनने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उम्मीदवार चुनने वाले दलों से यह पूछना कठिन हो जाता है कि वे ईमानदारी को कितनी प्राथमिकता देते हैं।

राजनीति में अब दाग मिटाने की नहीं, उन्हें भुनाने की कला काम आती है। जनता हर चुनाव में उम्मीदों पर मुहर लगाती है और बदले में उसे वादों की नई पैकिंग मिल जाती है। आखिर दाग अच्छे हैं—यदि उनसे टिकट मिले, टिकट से सत्ता मिले और सत्ता से दागों पर पर्दा डालने का अवसर मिले। लोकतंत्र चलता रहता है, बस नैतिकता हर चुनाव में जमानत जब्त करवा बैठती है!

ब्रजेश कानूनगो 

Thursday, October 8, 2026

लाठी किसके हाथ में

 लाठी किसके हाथ में 

लाठी बड़ी विचित्र चीज है। अपने हाथ में हो तो सहारा देती है, दूसरे के हाथ में हो तो डराती है। अपनी लाठी में आत्मविश्वास दिखाई देता है, दूसरे की लाठी में कानून-व्यवस्था का संकट।

लाठी की सबसे बड़ी खूबी है कि उसे अपना पक्ष रखने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। वह बहस में शामिल नहीं होती, बहस खत्म कर देती है। तर्क कहता है—“मेरी बात सुनिए”, लाठी कहती है—“पहले मेरी बात मानिए।”

इसीलिए लाठी केवल लकड़ी नहीं, ताकत का सबसे सरल व्याकरण है। जिसके हाथ में होती है, वह वाक्य बनाता है; जिसके सामने होती है, वह विराम चिह्न बन जाता है।

बचपन में हमने लाठी को बुजुर्गों का सहारा माना था। तब लगता था कि आदमी कमजोर होता है, इसलिए लाठी पकड़ता है। उम्र बढ़ी तो समझ आया कि मामला उलटा भी हो सकता है—कभी-कभी आदमी इसलिए लाठी पकड़ता है ताकि बाकी लोग खुद को कमजोर महसूस करें।

सत्ता के गलियारों में लाठी थोड़ी सभ्य हो जाती है। वहाँ वह हाथ में कम, अधिकार में अधिक दिखाई देती है। आदेश उसकी आवाज है और असहमति उसकी परीक्षा। अपनी लाठी को व्यवस्था कहा जाता है, दूसरे की लाठी को अराजकता।

राजनीति में लाठी का एक और कमाल है। जब अपनी तरफ उठे तो वह संघर्ष का प्रतीक होती है, दूसरी तरफ उठे तो हिंसा का। अपनी लाठी जनता की आवाज है, विपक्ष की लाठी कानून की समस्या। यानी लाठी की नैतिकता भी हाथ देखकर तय होती है।

समाज में भी यही नियम चलता है। आदमी तो क्या भैंसे भी लाठी का महत्व समझती रही हैं, चुपचाप लाठीवाले के पीछे पीछे हो लेती हैं। सवाल लाठी का नहीं, अधिकार का है। जीवन का लोकतंत्र भी शायद इसी सिद्धांत पर टिका है कि लाठी सबसे पहले किसकी आवाज का रुख करती है।

समय के साथ लाठी ने अपना रूप जरूर बदला है, स्वभाव नहीं। हर बार वह लकड़ी की नहीं होती। कभी पद उसका डंडा बन जाता है, कभी प्रभाव उसका सिरा, कभी पैसा उसकी पकड़। मगर सिद्धांत वही रहता है—जिसके हाथ में वह है, उसकी बात में वजन है। 

हमें लाठी से कोई एतराज नहीं है, बस उसकी दिशा से आपत्ति हो जाती है। जब वह हमारी तरफ से उठती है तो न्याय की रक्षा करती है। जब हमारी तरफ उठकर आती है तो न्याय की याद दिलाने लगती है।

वस्तुतः समाज में लाठी का सबसे बड़ा सम्मान उसके आकार का नहीं, उसके मालिक का होता है। हाथ बदलते ही वही लाठी कभी कानून बन जाती है, कभी अत्याचार।

सच तो यह है कि अपने हाथ की लाठी सहारा है तो सामने वाले के हाथ की लाठी इशारा, और इशारा न समझने वालों के लिए लाठी की अपनी खास भाषा होती है।

ब्रजेश कानूनगो



 

Wednesday, October 7, 2026

विकास की साइकिल

विकास की साइकिल

महँगाई ने हमें आत्मनिर्भर बना दिया है। पेट्रोल सौ के पार गया तो मोटर-साइकिल की उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न लग गया। साइकिल उठाइए, स्वास्थ्य भी बचाइए और देश का पुराना गौरव भी। फर्क बस इतना है कि पहले साइकिल साधन थी, अब समाधान है।

कल तक साइकिल विकास की दौड़ में पीछे छूटे आदमी की सवारी थी; आज वही पर्यावरण, स्वास्थ्य और संस्कृति—तीनों की ब्रांड एंबेसडर है। पेट्रोल महँगा होने का इससे सुंदर सदुपयोग और क्या हो सकता है!

गैस सिलेंडर की कीमत देखकर गृहिणी ने पूछा—“अब खाना कैसे बनेगा?”

पति बोला—“हमारे पूर्वज गैस के बिना भी खाना बनाते थे।”

“कैसे?”

“गोबर के उपले जलाकर।”

“तो भैंस भी ले आइए।”

पति ने भैंस का भाव सुना और चुप हो गया। उसे लगा, सिलेंडर अभी भी सस्ता है।

यही हमारे समय का नया अर्थशास्त्र है। आधुनिक सुविधा महँगी हो तो उसके अभाव को परंपरा का नाम दे दीजिए। डीजल का खर्च बढ़े तो हल-बैल की महिमा गाइए, गैस महँगी हो तो चूल्हे की संस्कृति याद कीजिए। सवाल यह नहीं कि पुरानी चीजों में मूल्य है या नहीं; सवाल यह है कि क्या नागरिक को विकल्प दिया जा रहा है या मजबूरी को विकल्प बताया जा रहा है।

किसान से कहा जाता है—“धरती से जुड़िए।”

किसान मुस्कराकर पूछ सकता है—“मैं तो पहले से जुड़ा हूँ, सरकार बाजार से कब जोड़ेगी?”

यह सवाल इसलिए असुविधाजनक है क्योंकि मिट्टी की बात करना आसान है, मिट्टी में पसीना बहाने वाले की बात करना कठिन।

हमें अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। प्राकृतिक खेती, पशुधन, स्थानीय संसाधन—इनमें भविष्य के लिए भी बहुत कुछ है। लेकिन अतीत का सम्मान तब सार्थक है, जब वह भविष्य का रास्ता खोले; यदि वह सुविधाओं की कमी को ढकने का परदा बन जाए, तो व्यंग्य पैदा होना स्वाभाविक है।

मिट्टी के चूल्हे पर बनी रोटी की तस्वीर मनमोहक है। उसके नीचे ‘सात्विक जीवन’ लिखते ही तस्वीर और भी सुंदर हो जाती है। मगर जिस स्त्री की आँखों में रोज धुआँ भरता है, उससे पूछना भी जरूरी है कि वह इसे संस्कृति कहती है या सुविधा का अभाव।

हमारे पूर्वजों ने भी जीवन को आसान बनाने के लिए नए साधन बनाए थे। पहिए से बैलगाड़ी और बैलगाड़ी से मोटर तक की यात्रा इसी जिजीविषा की कहानी है। इसलिए पीछे लौटना अपने आप में गौरव नहीं हो सकता।

कल बिजली महँगी हुई तो शायद सलाह मिले—“दीया जलाइए, भारतीय संस्कृति बचाइए।”

तेल महँगा हुआ तो कहा जाएगा—“चाँदनी का उपयोग कीजिए।”

और यदि चाँदनी पर भी कोई शुल्क लग गया, तो सितारों को देखकर संतोष करने की सलाह मिल सकती है।

व्यंग्य यहीं जन्म लेता है—जब जेब खाली होने को सादगी, महँगाई सहने को त्याग और सुविधा छिनने को संस्कृति कहा जाने लगे।

अतीत हमारा गौरव है, लेकिन भविष्य का विकल्प नहीं। बैलगाड़ी हमारी विरासत हो सकती है, एंबुलेंस का विकल्प नहीं। उपला परंपरा हो सकता है, हर रसोई की अनिवार्यता नहीं। साइकिल स्वास्थ्य के लिए अच्छी है, पेट्रोल महँगा होने का प्रमाणपत्र नहीं।

कहीं ऐसा न हो कि विकास की गाड़ी इतनी पीछे लौट जाए कि हम इतिहास में पहुँच जाएँ और फिर गर्व से घोषणा करें—

“देश बहुत आगे बढ़ चुका है—

बस दिशा उलटी थी, इसलिए दिखाई नहीं दिया।”


ब्रजेश कानूनगो