Saturday, October 17, 2026

दाग अच्छे हैं, बशर्ते चुनाव जीतें!

दाग अच्छे हैं, बशर्ते चुनाव जीतें!

राजनीति में अब दाग धुलते नहीं, तौले जाते हैं। टिकट देने से पहले उम्मीदवार का चरित्र नहीं, उसका चुनावी वजन देखा जाता है। ईमानदारी, स्वच्छ छवि और जनसेवा एक पलड़े में रखी जाती हैं; धनबल, बाहुबल और जीतने की गारंटी दूसरे में। फिर पार्टी बड़ी गंभीरता से लोकतंत्र के हित में वही पलड़ा चुनती है जो भारी हो। नैतिकता भाषणों में जितनी भी भारी पड़े, टिकट की तराजू पर अक्सर हल्की साबित होती है।

टिकट वितरण समिति की बैठक में एक सदस्य ने आपत्ति की, “इस उम्मीदवार पर कई आपराधिक मामले हैं। इसकी छवि ठीक नहीं है।”

दूसरे ने पूछा, “जीतने की संभावना कैसी है?”

“बहुत अच्छी है।”

“तो फिर छवि ठीक ही होगी!”

पहला सदस्य चुप हो गया। उसे समझ में आ गया कि वह चरित्र की भाषा बोल रहा था, जबकि बैठक चुनावी गणित में चल रही थी।

स्वच्छ छवि वाला उम्मीदवार कहता है, “मैंने जीवन भर ईमानदारी से काम किया है।”

पार्टी पूछती है, “बहुत अच्छी बात है। लेकिन चुनाव में कितना खर्च कर सकते हैं?”

“मेरे पास सीमित साधन हैं।”

“और समर्थक?”

“कुछ लोग हैं, जो मेरे विचारों से सहमत हैं।”

पार्टी समझाती है, “विचारों से सहमत लोग अच्छे होते हैं, भाई साहब! लेकिन चुनाव जीतने के लिए विचारों से ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है।”

उम्मीदवार निराश होकर लौट जाता है। पार्टी को एक अच्छा आदमी नहीं मिल पाता, लेकिन चुनाव के लिए एक अच्छा उम्मीदवार मिल जाता है। दोनों में अंतर अब राजनीति का गोपनीय रहस्य है।

दागी उम्मीदवार की अपनी खूबियाँ होती हैं। उसके समर्थक दावा करते हैं कि वह काम करवाने वाला आदमी है। उसके विरुद्ध मामलों की चर्चा हो तो सफाई मिलती है, “यह सब राजनीतिक साजिश है।” विपक्ष से पूछिए तो वह भी अपने उम्मीदवार के मामलों को साजिश बताता है। बस, समझ में नहीं आता कि यदि सारे मामले राजनीतिक साजिश हैं, तो राजनीति में इतने साजिशकर्ता आते कहाँ से हैं!

चुनाव के समय धनबल को लोकतंत्र के महापर्व का खर्च बताया जाता है। जनता की गरीबी पर चिंता जताने वाले नेताओं के प्रचार में करोड़ों की चमक दिखाई देती है। बाहुबल को भी नए नाम मिल जाते हैं। कहीं वह संगठन की मजबूती कहलाता है, कहीं जनाधार और कहीं प्रभावशाली नेतृत्व। भाषा का कमाल देखिए कि लाठी हाथ में हो तो भय पैदा करती है, लेकिन उसी लाठी के पीछे भीड़ खड़ी हो जाए तो राजनीतिक शक्ति बन जाती है।

इस पूरे तमाशे में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण पात्र है—और सबसे आसानी से भुला दिया जाने वाला भी। चुनाव के दिन वह लोकतंत्र का राजा होता है। नेता उसके दरवाजे पर हाथ जोड़ता है, उसकी गरीबी पर आँसू बहाता है और उसकी हर समस्या को अपनी निजी समस्या बताता है। वोट पड़ते ही राजा का राजतिलक समाप्त हो जाता है और वह फिर प्रजा की कतार में खड़ा मिलता है। कल तक जो नेता उसके दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, आज उससे मिलने के लिए मतदाता को सिफारिश ढूँढ़नी पड़ती है। पाँच साल तक जनता सरकार को खोजती है और चुनाव आते ही सरकार जनता को खोज लेती है। लोकतंत्र का यह अद्भुत चक्र है—मतदाता हर बार अपना प्रतिनिधि चुनता है, लेकिन प्रतिनिधि चुनते ही अपनी ही हैसियत भूल जाता है।

समस्या यह नहीं कि राजनीति में दागी लोग आ जाते हैं। समस्या यह है कि दाग अब कई बार अयोग्यता नहीं, योग्यता समझे जाने लगे हैं। जब चुनाव जीतना ही एकमात्र उद्देश्य हो जाए, तब साधनों की पवित्रता पर सवाल उठाना समय की बर्बादी माना जाता है।

लोकतंत्र की विडंबना देखिए—जनता से ईमानदार प्रतिनिधि चुनने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उम्मीदवार चुनने वाले दलों से यह पूछना कठिन हो जाता है कि वे ईमानदारी को कितनी प्राथमिकता देते हैं।

राजनीति में अब दाग मिटाने की नहीं, उन्हें भुनाने की कला काम आती है। जनता हर चुनाव में उम्मीदों पर मुहर लगाती है और बदले में उसे वादों की नई पैकिंग मिल जाती है। आखिर दाग अच्छे हैं—यदि उनसे टिकट मिले, टिकट से सत्ता मिले और सत्ता से दागों पर पर्दा डालने का अवसर मिले। लोकतंत्र चलता रहता है, बस नैतिकता हर चुनाव में जमानत जब्त करवा बैठती है!

ब्रजेश कानूनगो 

Thursday, October 8, 2026

लाठी किसके हाथ में

 लाठी किसके हाथ में 

लाठी बड़ी विचित्र चीज है। अपने हाथ में हो तो सहारा देती है, दूसरे के हाथ में हो तो डराती है। अपनी लाठी में आत्मविश्वास दिखाई देता है, दूसरे की लाठी में कानून-व्यवस्था का संकट।

लाठी की सबसे बड़ी खूबी है कि उसे अपना पक्ष रखने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। वह बहस में शामिल नहीं होती, बहस खत्म कर देती है। तर्क कहता है—“मेरी बात सुनिए”, लाठी कहती है—“पहले मेरी बात मानिए।”

इसीलिए लाठी केवल लकड़ी नहीं, ताकत का सबसे सरल व्याकरण है। जिसके हाथ में होती है, वह वाक्य बनाता है; जिसके सामने होती है, वह विराम चिह्न बन जाता है।

बचपन में हमने लाठी को बुजुर्गों का सहारा माना था। तब लगता था कि आदमी कमजोर होता है, इसलिए लाठी पकड़ता है। उम्र बढ़ी तो समझ आया कि मामला उलटा भी हो सकता है—कभी-कभी आदमी इसलिए लाठी पकड़ता है ताकि बाकी लोग खुद को कमजोर महसूस करें।

सत्ता के गलियारों में लाठी थोड़ी सभ्य हो जाती है। वहाँ वह हाथ में कम, अधिकार में अधिक दिखाई देती है। आदेश उसकी आवाज है और असहमति उसकी परीक्षा। अपनी लाठी को व्यवस्था कहा जाता है, दूसरे की लाठी को अराजकता।

राजनीति में लाठी का एक और कमाल है। जब अपनी तरफ उठे तो वह संघर्ष का प्रतीक होती है, दूसरी तरफ उठे तो हिंसा का। अपनी लाठी जनता की आवाज है, विपक्ष की लाठी कानून की समस्या। यानी लाठी की नैतिकता भी हाथ देखकर तय होती है।

समाज में भी यही नियम चलता है। आदमी तो क्या भैंसे भी लाठी का महत्व समझती रही हैं, चुपचाप लाठीवाले के पीछे पीछे हो लेती हैं। सवाल लाठी का नहीं, अधिकार का है। जीवन का लोकतंत्र भी शायद इसी सिद्धांत पर टिका है कि लाठी सबसे पहले किसकी आवाज का रुख करती है।

समय के साथ लाठी ने अपना रूप जरूर बदला है, स्वभाव नहीं। हर बार वह लकड़ी की नहीं होती। कभी पद उसका डंडा बन जाता है, कभी प्रभाव उसका सिरा, कभी पैसा उसकी पकड़। मगर सिद्धांत वही रहता है—जिसके हाथ में वह है, उसकी बात में वजन है। 

हमें लाठी से कोई एतराज नहीं है, बस उसकी दिशा से आपत्ति हो जाती है। जब वह हमारी तरफ से उठती है तो न्याय की रक्षा करती है। जब हमारी तरफ उठकर आती है तो न्याय की याद दिलाने लगती है।

वस्तुतः समाज में लाठी का सबसे बड़ा सम्मान उसके आकार का नहीं, उसके मालिक का होता है। हाथ बदलते ही वही लाठी कभी कानून बन जाती है, कभी अत्याचार।

सच तो यह है कि अपने हाथ की लाठी सहारा है तो सामने वाले के हाथ की लाठी इशारा, और इशारा न समझने वालों के लिए लाठी की अपनी खास भाषा होती है।

ब्रजेश कानूनगो



 

Wednesday, October 7, 2026

विकास की साइकिल

विकास की साइकिल

महँगाई ने हमें आत्मनिर्भर बना दिया है। पेट्रोल सौ के पार गया तो मोटर-साइकिल की उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न लग गया। साइकिल उठाइए, स्वास्थ्य भी बचाइए और देश का पुराना गौरव भी। फर्क बस इतना है कि पहले साइकिल साधन थी, अब समाधान है।

कल तक साइकिल विकास की दौड़ में पीछे छूटे आदमी की सवारी थी; आज वही पर्यावरण, स्वास्थ्य और संस्कृति—तीनों की ब्रांड एंबेसडर है। पेट्रोल महँगा होने का इससे सुंदर सदुपयोग और क्या हो सकता है!

गैस सिलेंडर की कीमत देखकर गृहिणी ने पूछा—“अब खाना कैसे बनेगा?”

पति बोला—“हमारे पूर्वज गैस के बिना भी खाना बनाते थे।”

“कैसे?”

“गोबर के उपले जलाकर।”

“तो भैंस भी ले आइए।”

पति ने भैंस का भाव सुना और चुप हो गया। उसे लगा, सिलेंडर अभी भी सस्ता है।

यही हमारे समय का नया अर्थशास्त्र है। आधुनिक सुविधा महँगी हो तो उसके अभाव को परंपरा का नाम दे दीजिए। डीजल का खर्च बढ़े तो हल-बैल की महिमा गाइए, गैस महँगी हो तो चूल्हे की संस्कृति याद कीजिए। सवाल यह नहीं कि पुरानी चीजों में मूल्य है या नहीं; सवाल यह है कि क्या नागरिक को विकल्प दिया जा रहा है या मजबूरी को विकल्प बताया जा रहा है।

किसान से कहा जाता है—“धरती से जुड़िए।”

किसान मुस्कराकर पूछ सकता है—“मैं तो पहले से जुड़ा हूँ, सरकार बाजार से कब जोड़ेगी?”

यह सवाल इसलिए असुविधाजनक है क्योंकि मिट्टी की बात करना आसान है, मिट्टी में पसीना बहाने वाले की बात करना कठिन।

हमें अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। प्राकृतिक खेती, पशुधन, स्थानीय संसाधन—इनमें भविष्य के लिए भी बहुत कुछ है। लेकिन अतीत का सम्मान तब सार्थक है, जब वह भविष्य का रास्ता खोले; यदि वह सुविधाओं की कमी को ढकने का परदा बन जाए, तो व्यंग्य पैदा होना स्वाभाविक है।

मिट्टी के चूल्हे पर बनी रोटी की तस्वीर मनमोहक है। उसके नीचे ‘सात्विक जीवन’ लिखते ही तस्वीर और भी सुंदर हो जाती है। मगर जिस स्त्री की आँखों में रोज धुआँ भरता है, उससे पूछना भी जरूरी है कि वह इसे संस्कृति कहती है या सुविधा का अभाव।

हमारे पूर्वजों ने भी जीवन को आसान बनाने के लिए नए साधन बनाए थे। पहिए से बैलगाड़ी और बैलगाड़ी से मोटर तक की यात्रा इसी जिजीविषा की कहानी है। इसलिए पीछे लौटना अपने आप में गौरव नहीं हो सकता।

कल बिजली महँगी हुई तो शायद सलाह मिले—“दीया जलाइए, भारतीय संस्कृति बचाइए।”

तेल महँगा हुआ तो कहा जाएगा—“चाँदनी का उपयोग कीजिए।”

और यदि चाँदनी पर भी कोई शुल्क लग गया, तो सितारों को देखकर संतोष करने की सलाह मिल सकती है।

व्यंग्य यहीं जन्म लेता है—जब जेब खाली होने को सादगी, महँगाई सहने को त्याग और सुविधा छिनने को संस्कृति कहा जाने लगे।

अतीत हमारा गौरव है, लेकिन भविष्य का विकल्प नहीं। बैलगाड़ी हमारी विरासत हो सकती है, एंबुलेंस का विकल्प नहीं। उपला परंपरा हो सकता है, हर रसोई की अनिवार्यता नहीं। साइकिल स्वास्थ्य के लिए अच्छी है, पेट्रोल महँगा होने का प्रमाणपत्र नहीं।

कहीं ऐसा न हो कि विकास की गाड़ी इतनी पीछे लौट जाए कि हम इतिहास में पहुँच जाएँ और फिर गर्व से घोषणा करें—

“देश बहुत आगे बढ़ चुका है—

बस दिशा उलटी थी, इसलिए दिखाई नहीं दिया।”


ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, September 30, 2026

कोई है जो धड़कनों को सुनता है !

कोई है जो धड़कनों को सुनता है !

शहर में इन दिनों संगीत बहुत है, सुनने वाला कोई नहीं। इधर सारंगी बज रही है, उधर सितार। मंचों पर सुरों की ऐसी बहार है कि लगता है शहर की सारी संवेदनाएँ संगीत विभाग को ठेके पर दे दी गई हैं। बस एक छोटी-सी समस्या है, जिस आदमी के घर में मातम पसरा है, उसे इन सुरों में अपनी धड़कन सुनाई नहीं देती। धड़कनों का भी अपना स्वभाव होता है। वे सच बोलती हैं। शायद इसी कारण उनसे बचने के लिए चारों तरफ संगीत बजता रहता है।

लोगों ने जीवन भर जो थोड़ा-बहुत जमा किया था, उसे बड़ी उम्मीद से संभालकर रखा। सोचा था, मुश्किल समय में काम आएगा। लेकिन मुश्किल समय आने से पहले ही मालूम हुआ कि उसकी निगरानी करने वाले ही उसे दुश्मनों में बाँट चुके हैं। अब शिकायत किससे करें? जिसे घर का चौकीदार समझकर चाबी सौंपी थी, उसी ने पड़ोसियों को बुलाकर संदूक खोल दिया। और कमाल यह कि संदूक अब भी हमारे घर में ही पड़ा है, बस उसकी चाबी किसी और की जेब में है।

लूट की यह नई व्यवस्था बड़ी विनम्र है। लुटेरा घर में घुसता नहीं, पहले अनुमति लेता है। संदूक उठाता नहीं, उसे वहीं रहने देता है। बस खूंटी बदल देता है। फिर समझाता है कि संपत्ति सुरक्षित है। सुरक्षित है—यह बात सही है। बस मालिक बदल गया है।

उधर घर के आगे अंधेरा घना होता जा रहा है। मगर इस अंधेरे को लेकर भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। शहर के दूसरे छोर पर चकाचौंध की पर्याप्त व्यवस्था है। वहाँ रोशनी इतनी है कि अंधेरे में खड़े लोगों को भी विश्वास होने लगता है कि वे उजाले में हैं।

दुःख का समंदर जरूर गहरा है। उसमें खार भी कम नहीं हुई। फिर भी जाने कैसे दिल में मोहब्बत का थोड़ा-सा नीर बचा हुआ है। लोग अब भी किसी डूबते हुए आदमी की तरफ हाथ बढ़ा देते हैं।शायद यही आखिरी मुसीबत है। क्योंकि जिस दिन आदमी दूसरे आदमी का दुःख पहचानने लगेगा, उस दिन उसे यह समझाना कठिन होगा कि उसका असली दुश्मन कौन है।

इसलिए सच और झूठ के बीच एक दुधारी तलवार टाँग दी गई है। तलवार दिखाई नहीं देती, मगर हर आदमी उसके नीचे खड़ा है। वह जो कहता है, उस पर शक है; जो सुनता है, उस पर भी शक है; और जो चुप रहता है, उसकी चुप्पी पर सबसे ज्यादा शक है।

सच बेचारा अपनी सफाई देता रहता है। झूठ को सफाई की जरूरत नहीं पड़ती। वह बस चमकता है। और हाकिम को चमक बहुत पसंद है। उसे लगता है कि चकाचौंध ही विकास का प्रमाण है। वह जब रोशनी में खड़ा होता है तो उसे अंधेरे की शिकायत दिखाई नहीं देती। जब संगीत बजता है तो उसे धड़कनों की आवाज नहीं सुनाई देती। जब तालियाँ बजती हैं तो उसे दुःख के समंदर की लहरें सुनाई नहीं देतीं।

फिर वह घोषणा करता है - मसले खत्म होंगे। मुश्किलें कम होंगी।अंधेरा छँटेगा।संदूक सुरक्षित रहेंगे। सच की जीत होगी।

जनता सुनती है। फिर अपने घर लौटती है। संदूक उसी खूंटी से बंधा मिलता है, अंधेरा वहीं खड़ा मिलता है, दिल में मोहब्बत का नीर अब भी बाकी मिलता है और सीने पर संदेह की वही अदृश्य तलवार तनी मिलती है। बस एक चीज बदलती है, सारंगी और सितार की आवाज कुछ और तेज हो जाती है।

कोई यह पूछ ही नहीं पाता कि धड़कनों को सुनने वाला आखिर है कौन?


ब्रजेश कानूनगो 


Tuesday, September 22, 2026

फॉर्म भरता हुआ आदमी

फॉर्म भरता हुआ आदमी

भारत के आम आदमी की सबसे बड़ी व्यस्तता क्या है?  सोशल मीडिया, रोज़गार की जद्दोजहद, परिवार की देखभाल, महँगाई से निपटना, बच्चों की पढ़ाई? नहीं। फॉर्म भरना।

उसका जीवन जन्म प्रमाणपत्र के फॉर्म से शुरू होता है और मृत्यु प्रमाणपत्र के फॉर्म पर जाकर भी खत्म नहीं होता। बीच में जितनी जिंदगी है, उतने ही फॉर्म हैं।

स्कूल में प्रवेश के लिए फॉर्म। परीक्षा के लिए फॉर्म। छात्रवृत्ति के लिए फॉर्म। नौकरी के लिए फॉर्म। नौकरी लगने के बाद भी फॉर्म। छुट्टी के लिए फॉर्म। तबादले के लिए फॉर्म। पेंशन के लिए फॉर्म।

नाम जुड़वाना हो—फॉर्म।नाम कटवाना हो—फॉर्म। नाम में गलती हो—संशोधन का फॉर्म। संशोधन में गलती हो जाए—फिर संशोधन का फॉर्म। आम आदमी का जीवन अब जीवन कम और आवेदन-पत्र अधिक है।

काम करवाना हो तो फॉर्म। शिकायत करनी हो तो फॉर्म। शिकायत पर कार्रवाई न हो तो फिर फॉर्म। कार्रवाई क्यों नहीं हुई, यह पूछने के लिए भी फॉर्म। फॉर्म भरते-भरते आदमी को अपने बारे में इतना कुछ बताना पड़ता है कि कभी-कभी लगता है, सरकार नागरिक से अधिक परिचित हो गई है, नागरिक खुद से नहीं।

नाम, पता, उम्र, आय, व्यवसाय, परिवार, मोबाइल, पहचान। फिर इनके प्रमाण। आधार का आधार बताइए। पहचान का प्रमाण, पते का प्रमाण, आय का प्रमाण। अंततः सामने खड़ा आदमी भी अपने अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करता रहता है।

डिजिटल युग आया तो लगा, अब फॉर्म से मुक्ति मिलेगी। मुक्ति नहीं मिली, फॉर्म स्क्रीन पर आ गया। अब लाइन में खड़े होने के बजाय वेबसाइट के खुलने की प्रतीक्षा है। ओटीपी की प्रतीक्षा है। सर्वर की कृपा की प्रतीक्षा है। फोटो के सही आकार की प्रतीक्षा है। दस्तावेज अपलोड होने की प्रतीक्षा है। पहले बाबू फाइल रोकता था, अब सर्वर रोकता है। तकनीक ने व्यवस्था को तेज नहीं किया, बस उसकी देरी को आधुनिक बना दिया।

फॉर्मों की दुनिया में हर सुविधा के साथ पात्रता जुड़ी है और हर पात्रता के साथ एक नया फॉर्म।सुविधा चाहिए तो आवेदन कीजिए। पात्रता के लिए प्रमाण दीजिए। प्रमाण के लिए दूसरा प्रमाण दीजिए। फिर प्रमाणित कीजिए कि आपने प्रमाण सही दिया है। इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ी सुविधा और है—आदमी को अपनी परेशानियों के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता।

महँगाई है, मगर फॉर्म भरना है। बेरोजगारी है, मगर आवेदन करना है। अस्पताल में इलाज महँगा है, मगर स्वास्थ्य योजना का फॉर्म भरना है। बच्चे की फीस की चिंता है, मगर छात्रवृत्ति का फॉर्म भरना है। पानी नहीं आ रहा, सड़क टूटी है, नौकरी नहीं है—लेकिन पहले शिकायत का फॉर्म भरिए। आदमी समस्या से ज्यादा उसके समाधान का फॉर्म भरने में व्यस्त है।

यही व्यस्तता व्यवस्था के लिए बड़ी सुविधा है। नागरिक यदि लगातार फॉर्म भरता रहे तो उसके पास सवाल पूछने का समय कम बचता है। वह अपनी वास्तविक जिंदगी के अभावों को कुछ देर के लिए भूल जाता है और आवेदन की स्थिति देखने में लग जाता है। उसकी जिंदगी की स्थिति भले ही ‘प्रक्रिया में’ हो, लेकिन सरकारी वेबसाइट पर उसकी सुविधा की स्थिति ‘सफल’ दिखाई दे सकती है।

यह व्यवस्था की एक अद्भुत प्रशासनिक उपलब्धि है। नागरिक लगातार व्यस्त रहता है और उसके पास यह सोचने का समय कम बचता है कि उसके जीवन में वास्तव में क्या बदल रहा है। वह सुविधा पाने से पहले सुविधा के लिए आवेदन करने में ही संतोष खोज लेता है।

यहीं से खुशहाली का एक नया गणित शुरू होता है। जितने अधिक फॉर्म, उतनी अधिक योजनाएँ; जितनी अधिक योजनाएँ,  उतनी अधिक खुशहाली।

जमीन पर आदमी परेशान हो सकता है, लेकिन कागज और पोर्टल पर वह सुखी, संतुष्ट और लाभान्वित नागरिक है।

फॉर्म भरते-भरते आदमी इतना व्यस्त हो जाता है कि देश और समाज के बड़े प्रश्न उसकी नजर से ओझल हो जाते हैं। उसे अगला फॉर्म दिखाई देता है, अगला सवाल नहीं।

शायद यही आधुनिक प्रशासन का सबसे बड़ा कौशल है—नागरिक को सुविधा देने से पहले उसे सुविधा के फॉर्म  भरने में व्यस्त कर देना।


ब्रजेश कानूनगो 


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Friday, September 18, 2026

सुविधाजनक फिल्टर हैं कान

सुविधाजनक फिल्टर हैं कान 

कानों का काम सिर्फ़ सुनना नहीं होता। कभी-कभी अनसुना भी करना पड़ता है। हमारे समय में तो यह एक जरूरी सामाजिक कौशल बन गया है। जो हर बात सुन ले, वह परेशान रहता है; जो सुविधानुसार सुनता है, वह चैन से रहता है।

पहले कान सुनते थे, दिमाग समझता था और फिर आदमी प्रतिक्रिया देता था। अब कान और दिमाग के बीच एक सुविधाजनक फिल्टर लग गया है। जो बात अच्छी लगे, उसे भीतर जाने दो। जो सवाल खड़ा करे, उसे बाहर ही रोक दो।

घर में इसकी शुरुआत होती है। पत्नी कहती है—सब्जी लेते आइए, आवाज साफ सुनाई देती है। बच्चा फीस की याद दिलाता है, वह भी सुनाई देता है। लेकिन जैसे ही पत्नी शॉपिंग के लिए जाने की बात करती है, कान अचानक तकनीकी खराबी की चपेट में आ जाते हैं—“क्या कहा? आवाज नहीं आई।”

राजनीति में यह कला और परिष्कृत है। जनता बेरोजगारी, महंगाई और खराब सड़कों की शिकायत करे तो आवाज धीमी पड़ जाती है। मगर प्रशंसा का एक वाक्य हजारों किलोमीटर दूर से भी साफ सुनाई देता है। आलोचना शोर है, प्रशंसा संगीत।

सोशल मीडिया ने अनसुना करना और आसान कर दिया है। कोई तथ्य रखे, सवाल पूछे, तर्क दे—अंगूठा चलाइए और अगली पोस्ट पर पहुँच जाइए। जवाब देने की झंझट भी खत्म, असहमति सुनने की मजबूरी भी।

अब सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले से सवाल किया जाता है। व्यवस्था की कमी बताइए तो पूछा जाएगा—“पहले अपने घर का हिसाब दो।” भ्रष्टाचार की बात कीजिए तो आपकी नीयत पर चर्चा शुरू हो जाएगी। अन्याय की ओर ध्यान दिलाइए तो विषय बदलकर देशभक्ति पर बहस शुरू हो जाएगी।

यह तकनीक बड़ी सुविधाजनक है—मुद्दा सुनना ही नहीं , मुद्दा उठाने वाले को सुनाते रहो।

धीरे-धीरे यही आदत समाज में उतरती है। सड़क पर घायल आदमी पड़ा हो तो हम आगे बढ़ जाते हैं। पड़ोसी के साथ अन्याय हो तो दरवाजा बंद कर लेते हैं। किसी कमजोर की आवाज उठे तो सोचते हैं—“हमारा क्या लेना-देना?”

बेशक, हर आवाज सुनना जरूरी नहीं। अफवाह, शोर और निरर्थक बहस से दूरी रखना समझदारी है। लेकिन सच और असुविधाजनक सवालों से बचना समझदारी नहीं, सुविधा है।

कान का बहरा होना दुर्भाग्य है, मगर विवेक का बहरा हो जाना उससे भी बड़ा संकट है। क्योंकि तब आदमी सुनता सब है—लेकिन वही, जो उसे सुनना अच्छा लगता है।

लगातार अनसुना करने का एक खतरा अवश्य है। एक दिन आदमी बाहर की आवाजों के साथ अपने भीतर की आवाज भी सुनना बंद कर देता है। अंतरात्मा पहले धीरे-धीरे बोलती है, फिर थककर चुप हो जाती है। उसे भी पता चल जाता है कि इस समय उसकी शायद कोई खास राजनीतिक उपयोगिता नहीं रही है। 

ब्रजेश कानूनगो


Thursday, September 17, 2026

हीनता के रोग में अहित का इंजेक्शन

हीनता के रोग में अहित का इंजेक्शन

हीनता बड़ा लोकतांत्रिक रोग है। इसमें गरीब-अमीर, नेता-जनता, पढ़े-लिखे-अनपढ़—सब बराबर संक्रमित हो सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आम आदमी इसे मन में रखता है और राजनीति इसे माइक पर बोल देती है।

इस रोग की सबसे कारगर दवा है—दूसरे का अहित। किसी को गिरते देखिए, मरीज के चेहरे पर तुरंत रौनक लौट आएगी। किसी की दुकान बंद हो जाए, नौकरी चली जाए, चुनाव हार जाए या प्रतिष्ठा पर दाग लग जाए—हीनताग्रस्त आत्मा को तत्काल ऑक्सीजन मिलने लगती है।

राजनीति ने इस चिकित्सा-पद्धति को बाकायदा संस्थागत रूप दे दिया है। सरकार कोई योजना शुरू करे तो विपक्ष पूछता है—इसमें घोटाला कहाँ है? विपक्ष कोई सुझाव दे तो सरकार पूछती है—पहले अपने समय का हिसाब दो। जनता पूछती है—सड़क कब बनेगी? दोनों पक्ष पूछते हैं—सड़क का श्रेय किसे मिलेगा? यही लोकतांत्रिक चिकित्सा की असली उपलब्धि है।

किसी नेता की सभा में भीड़ हो तो समर्थक कहते हैं—जनता उमड़ पड़ी। विरोधी कहते हैं—सरकारी भीड़ थी। विरोधी की सभा में भीड़ हो तो समीकरण बदल जाते हैं। कैमरा वही रहता है, भीड़ वही रहती है, मगर सत्य पार्टी के रंग के अनुसार बदल जाता है।

अब उपलब्धि की भी अपनी पार्टी होती है। यदि दूसरा अचानक जीत जाए तो पुराना बयान खोज लिया जाता है। राजनीति में भविष्यवाणी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह परिणाम आने के बाद भी की जा सकती है।

टीवी की बहसें इस रोग की खुली प्रयोगशाला हैं। एक प्रवक्ता दूसरे को बोलने नहीं देता और दूसरा पहले को। बीच में एंकर पूछता है—“सवाल यह है कि देश जानना चाहता है...” देश बेचारा घर में बैठा सोचता है कि उसने कब पूछा था।

सोशल मीडिया ने तो अहित को चौबीस घंटे की सेवा बना दिया है। किसी की तस्वीर पर पुरस्कार दिखे तो बधाई देने से पहले उसकी पुरानी पोस्ट खोजी जाती है। कोई लोकप्रिय हो जाए तो उसके अनुयायियों की गिनती पर संदेह किया जाता है। कोई चुनाव जीत जाए तो मशीनें संदिग्ध हो जाती हैं; हार जाए तो मशीनें अचानक निष्पक्ष हो जाती हैं।

दलबदल इस चिकित्सा का प्रीमियम पैकेज है। कल तक जो व्यक्ति लोकतंत्र का संकट था, आज वही लोकतंत्र का नया प्रहरी हो सकता है। कल जिस दल में जाना राजनीतिक पाप था, आज उसी में जाना जनसेवा है। विचारधारा इतनी लचीली हो गई है कि आवश्यकता पड़ने पर उसे मोड़कर जेब में रखा जा सकता है।

असल समस्या विरोध में नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना, असहमति रखना और आलोचना करना जरूरी है। समस्या तब शुरू होती है जब आलोचना का उद्देश्य सुधार नहीं, दूसरे को छोटा करना हो। तब राजनीति नीति की प्रतियोगिता नहीं रहती; वह प्रतिष्ठा की कुश्ती बन जाती है।

हीनता का स्थायी इलाज आत्मविश्वास है। लेकिन आत्मविश्वास की गोली धीरे असर करती है। उसमें अपने भीतर झाँकना पड़ता है, अपनी कमी स्वीकार करनी पड़ती है और यह मानना पड़ता है कि सामने वाला अच्छा काम करे तो उससे हमारा कद अपने आप छोटा नहीं हो जाता।

अहित का इंजेक्शन सबसे आसान है। सामने वाला गिरा और हम ऊँचे दिखाई देने लगे।

लेकिन यह ऊँचाई असली नहीं होती। दूसरों को लगातार गिराते-गिराते आदमी अंततः इतनी नीचे उतर जाता है कि ऊपर देखने पर भी उसे अपने से ऊँचा कोई दिखाई नहीं देता।

और शायद यही इस इंजेक्शन का अंतिम साइड इफेक्ट है—दूसरे का अहित करते-करते हम अपनी हीनता का इलाज नहीं करा पाते और ईवीएम का बटन हित अहित का सोचे बिना फिर दबा आते हैं।


ब्रजेश कानूनगो