Tuesday, August 18, 2026

गड्ढों का लोकतांत्रिक योगदान और दर्शन

गड्ढों का लोकतांत्रिक योगदान और दर्शन

‘गड्ढा’ होना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। प्राकृतिक संरचना में सतह से थोड़ी-सी नीचे चली गई जगह ‘गड्ढा’ कहलाती है और वही धरती थोड़ी ऊपर उठ जाए तो ‘टीला’ हो जाती है। ऊपर उठना सम्मानजनक और नीचे धँसना अपमानजनक—मनुष्य ने विकास का शायद यही सबसे सरल पैमाना बनाया है। जबकि प्रकृति को इससे कोई शिकायत नहीं। उसके यहाँ पर्वत भी हैं और समुद्र भी, पठार भी हैं और घाटियाँ भी। सबका अपना महत्व है।

लेकिन हमारे समय में गड्ढों की बड़ी भद्द पिट रही है।

खासकर सड़कों के गड्ढों की। जैसे देश की सारी समस्याओं की जड़ यही हों। कोई व्यक्ति सड़क के गड्ढे में गिर जाए तो नगरपालिका को कोसता है, सरकार को कोसता है, ठेकेदार को याद करता है और अंत में अपने भाग्य को दोष देकर उठ खड़ा होता है। बेचारा गड्ढा चुपचाप वहीं पड़ा रहता है। उसका क्या दोष?

मुझे तो लगता है कि गड्ढों को बदनाम करने की कोई सुनियोजित साजिश चल रही है। पहचान के केवल एक पक्ष को बार-बार सामने रखकर उसके उजले पक्ष पर पर्दा डाल दिया गया है। गड्ढा सदियों से निर्विकार भाव से प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था की सेवा करता आया है, मगर उसका कभी सम्मान नहीं हुआ।

जरा धरती के नीचे झाँककर देखिए। सोना, चाँदी, लोहा, कोयला, तेल, गैस और न जाने कितनी बहुमूल्य संपदाएँ गड्ढों के रास्ते ही मनुष्य तक पहुँची हैं। खनन के लिए गड्ढे खोदिए, धरती का सीना चीरिए और फिर घोषणा कीजिए—देश विकास कर रहा है।

सड़क पर वही गड्ढा हो जाए तो विकास का पहिया अचानक पंचर हो जाता है।

यह कैसी विडंबना है!

धरती के नीचे का गड्ढा ‘खनन परियोजना’ है और सड़क के ऊपर का गड्ढा ‘लापरवाही’। एक से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, दूसरे से नागरिक की कमर।

वैसे गड्ढे का संबंध केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, भूगोल और सौंदर्यशास्त्र से भी है। पृथ्वी का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं एक विराट गड्ढे में भरे पानी से बना है। हम उसे समुद्र कहते हैं। उसी समुद्र के भीतर न जाने कितने संसाधन, जीव-जंतु और रहस्य छिपे हैं। समुद्र न होता तो जमीन के ऊँचे हिस्से की ऊँचाई का पता कैसे चलता? घाटियाँ न होतीं तो पर्वतों का गौरव किसे समझ आता?

अर्थात गड्ढा ऊँचाई की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।

फिर सड़क पर कुछ गड्ढे हो गए तो इतना हंगामा क्यों?

बरसात आई, पानी भरा, बच्चों ने कागज की नाव चला दी, किसी कलाकार ने कीचड़ में भारत का नक्शा खोज लिया—इसमें भी तो रचनात्मकता है। आजकल जब हर चीज में ‘कंटेंट’ खोजा जा रहा है, तब गड्ढे भी नागरिकों को मनोरंजन और सोशल मीडिया सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। कोई गड्ढे में गिरते हुए वीडियो बना रहा है, कोई उसके किनारे सेल्फी ले रहा है और कोई उसी गड्ढे को लेकर सरकार से सवाल पूछ रहा है।

लोकतंत्र में इससे अधिक उपयोगी गड्ढा और क्या होगा?

गड्ढे हमें धैर्य भी सिखाते हैं। सड़क पर गड्ढा आज बना है तो उसे भरने की जल्दी क्यों? पहले शिकायत होगी, फिर निरीक्षण होगा, फिर टेंडर निकलेगा, फिर स्वीकृति होगी, फिर ठेकेदार आएगा और तब तक अगली बारिश आ जाएगी। गड्ढा अपने चरित्र में कितना लोकतांत्रिक है—हर नागरिक को समान अवसर देता है। कार हो, बाइक हो, स्कूटर हो या पैदल आदमी—सबको अपनी क्षमता के अनुसार झटका मिलता है।

कहीं-कहीं तो गड्ढे इतने स्थायी हो चुके हैं कि सड़क उनसे जुड़ी हुई लगती है। सड़क गायब हो जाए तो शायद लोग परेशान हों, लेकिन गड्ढा गायब हो जाए तो उन्हें चिंता होने लगेगी कि आखिर विकास का प्रमाण कहाँ गया?

हमारी विकास-यात्रा में गड्ढों का योगदान कम करके नहीं आँका जा सकता। जितना बड़ा प्रोजेक्ट, उतना बड़ा उद्घाटन और कभी-कभी उतने ही बड़े गड्ढे। नई सड़क का उद्घाटन होने के कुछ समय बाद उसमें गड्ढा दिखाई दे जाए तो इसे केवल निर्माण की कमी समझना ठीक नहीं। इसे यह भी समझा जा सकता है कि सड़क अब लोकतांत्रिक जीवन में प्रवेश कर चुकी है।

और फिर गड्ढे केवल बाहर नहीं होते।

हमारी राजनीति में गड्ढे हैं, अर्थव्यवस्था में गड्ढे हैं, व्यवस्था में गड्ढे हैं, बजट में गड्ढे हैं और वादों में तो इतने गहरे गड्ढे हैं कि उनमें पूरा चुनावी घोषणापत्र समा जाए। इन गड्ढों पर हम अक्सर फूल डाल देते हैं और उद्घाटन कर देते हैं।

सड़क का गड्ढा कम से कम दिखाई तो देता है।

चेहरे पर पड़ने वाले गड्ढों को ही देखिए। गालों में पड़ने वाले डिम्पल कितने आकर्षक लगते हैं। वही गड्ढा सड़क पर हो तो दुर्घटना, चेहरे पर हो तो सौंदर्य। इससे सिद्ध होता है कि दोष गड्ढे में नहीं, हमारी दृष्टि में है।

इसलिए इन निरीह गड्ढों के कारण अधिक दुखी होना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। तनाव बढ़ेगा, चेहरा सिकुड़ेगा, माथे पर लकीरें आएँगी और गालों के प्राकृतिक गड्ढे भी कम आकर्षक लगने लगेंगे।

बेहतर है कि गड्ढों को नए नजरिए से देखें।

जहाँ सड़क में गड्ढा दिखे, वहाँ शिकायत करने से पहले एक क्षण रुकिए और सोचिए—यह केवल गड्ढा नहीं, हमारी व्यवस्था का खुला हुआ मुँह भी हो सकता है, जो पूछ रहा है कि विकास की बातें बहुत हो गईं, अब मुझे भरोगे भी या अगली बरसात का इंतजार करोगे?

फिर मुस्कुराइए।

आखिर गड्ढे हैं तो भरने की संभावना भी है। और जब तक भर नहीं जाते, तब तक उनमें छुपे सुख खोजते रहिए।

क्योंकि इस देश में कई बार गड्ढे भरने से पहले ही उनके नाम पर योजनाएँ, बजट और उद्घाटन भरपूर हो जाते हैं।

गड्ढे का इससे बड़ा लोकतांत्रिक योगदान और क्या होगा!

ब्रजेश कानूनगो

महाराज श्रृंखला 13 : गुरुमंत्र का विस्तार

महाराज श्रृंखला 13 : गुरुमंत्र का विस्तार

रियासतें इतिहास की किताबों में जितनी जल्दी समाप्त होती हैं, उतनी जल्दी उनके संस्कार समाप्त नहीं होते। राजतंत्र का औपचारिक विलय लोकतंत्र में हो सकता है, पर राजसी आदतों का विलय होने में कई पीढ़ियाँ लगती हैं। और कभी-कभी तो वे लोकतंत्र में इस तरह घुल-मिल जाती हैं कि लोकतंत्र को ही पता नहीं चलता कि उसके भीतर कौन-सी चीज राजतंत्र है और कौन-सी प्रजा।

महाराज की रियासत भी अंततः लोकतांत्रिक देश में विलीन हो गई। राजमहल के ऊपर फहराता राजचिह्न उतार लिया गया। हाथी-घोड़ों की जगह सरकारी मोटरें आ गईं। दरबार समाप्त हुआ और जनता का शासन आरंभ हो गया।

बस एक छोटी-सी समस्या थी।

महाराज को किसी ने यह नहीं बताया था कि अब वे महाराज नहीं रहे।

सरकार ने शायद यह बात बताने की आवश्यकता भी नहीं समझी। लोकतंत्र में बड़े लोगों को बहुत-सी बातें बताने की जरूरत नहीं होती। वे अपने अनुभव और पुराने संपर्कों से स्वयं समझ लेते हैं कि नई व्यवस्था में पुराने पदों के नए नाम क्या हो सकते हैं।

कुछ ही दिनों बाद राजधानी से समाचार आया कि महाराज को राज्य मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री बनाया जा रहा है।

राजमहल में उत्सव का वातावरण था।

काक दन्त ने सबसे पहले महाराज को बधाई दी।

“हुजूर! अब तो रियासत का ज्ञान पूरे प्रदेश में फैलेगा।”

महाराज मुस्कुराए।

“ज्ञान फैलाना हमारा पुराना काम है।”

“जी हुजूर। पहले आप राजाज्ञा से फैलाते थे, अब शासनादेश से फैलाइएगा।”

महाराज ने उसे घूरकर देखा। काक दन्त तुरंत संभल गया।

“मेरा आशय है कि शिक्षा का विभाग आपके हाथ में आना प्रदेश का सौभाग्य है।”

शिक्षा मंत्री के रूप में महाराज का पहला कार्यक्रम राजमहल के पुराने दरबार हॉल में ही आयोजित हुआ। फर्क केवल इतना था कि जहां पहले दरबारियों की पंक्ति लगती थी, वहां अब अधिकारियों की पंक्ति थी और जहां पहले राजदंड रखा रहता था, वहां अब सरकारी फाइलों का ढेर था।

महाराज ने फाइलों को देखा।

“इनमें से कितनी महत्वपूर्ण हैं?”

शिक्षा सचिव ने कहा, “लगभग सभी, मान्यवर।”

महाराज ने सहजता से कहा, “तो फिर इन्हें पढ़ने की आवश्यकता नहीं। महत्वपूर्ण चीजें पढ़ने में समय बहुत लगता है। सारांश बताइए।”

सचिव ने राहत की सांस ली।

लोकतंत्र को एक और कुशल प्रशासक मिल गया था।

इसी बीच ज्ञानरिपु का भी भाग्योदय हुआ।

राजकवि ज्ञानरिपु को राज्य साहित्य परिषद का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया गया।

इस नियुक्ति का समाचार सुनकर वे कुछ देर तक कुर्सी पर बैठे रहे। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कल तक वे महाराज के भाषण लिखते थे और आज साहित्य का भविष्य लिखने वाली संस्था के अध्यक्ष बना दिए गए थे।

उन्होंने सबसे पहले अपने गुरु आचार्य विद्यादमन को प्रणाम किया।

“गुरुदेव! आपका गुरुमंत्र काम कर गया।”

आचार्य मुस्कुराए।

“मैंने कहा था न, स्वतंत्र विचारों को मन के ताम्रपात्र में बंद करके रख दो। देखो, अब वही ताम्रपात्र तुम्हें अध्यक्ष की कुर्सी पर ले आया।”

ज्ञानरिपु ने विनम्रता से पूछा, “लेकिन गुरुदेव, साहित्य परिषद का काम तो साहित्य की स्वतंत्रता, प्रश्नाकुलता और सत्ता से असहमति को प्रोत्साहित करना भी है।”

गुरु ने चश्मा ठीक किया।

“बिल्कुल।”

“तो फिर?”

“तो फिर तुम अध्यक्ष हो। तुम्हें तय करना है कि स्वतंत्रता कितनी स्वतंत्र होनी चाहिए।”

ज्ञानरिपु ने सिर झुका लिया।

गुरुमंत्र का विस्तार हो चुका था।

नई सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधारों की घोषणा की। महाराज ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि संस्कार देना है।

एक पत्रकार ने पूछ लिया, “मंत्री जी, किस तरह के संस्कार?”

महाराज ने कहा, “जो व्यवस्था के अनुकूल हों।”

पत्रकार ने फिर पूछा, “और जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाएं?”

महाराज ने मुस्कुराकर कहा, “वह शोध का विषय है।”

प्रेस कांफ्रेंस समाप्त हो गई।

साहित्य परिषद में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ। ज्ञानरिपु ने अध्यक्ष पद संभालते ही घोषणा की कि परिषद साहित्य में नए मूल्यों की स्थापना करेगी।

उन्होंने कहा, “साहित्य समाज का दर्पण है।”

एक सदस्य ने पूछा, “दर्पण में चेहरा जैसा है वैसा ही दिखाई देगा न?”

ज्ञानरिपु ने उसकी ओर देखा।

“दर्पण परिषद द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।”

सदस्य चुप हो गया।

अगले महीने साहित्य परिषद ने ‘राष्ट्रीय साहित्यिक उत्कर्ष’ पर एक संगोष्ठी आयोजित की। विषय था—“साहित्य और राष्ट्र निर्माण।”

उद्घाटन भाषण शिक्षा मंत्री महाराज ने दिया।

उन्होंने कहा—

“साहित्यकारों का काम समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। उन्हें ऐसी रचनाएं करनी चाहिए जिनसे जनता में आशा, विश्वास और विकास की भावना पैदा हो।”

तालियां बजीं।

ज्ञानरिपु सबसे जोर से ताली बजा रहे थे।

उन्हें अपना पहला भाषण याद आ गया—वही पाषाण पुष्प वाला भाषण, जिसमें जंगल के नीचे दबे स्वर्ण को निकालने के लिए जंगल के ऊपर खड़े लोगों को समझाया गया था कि यह सब उनके ही हित में है।

आज उन्हें लगा कि गुरुमंत्र केवल एक भाषण लिखने के लिए नहीं था।

वह तो करियर बनाने का मंत्र था।

संगोष्ठी के बाद एक युवा कवि ने ज्ञानरिपु से पूछा—

“अध्यक्ष जी, क्या साहित्य को सत्ता से सवाल नहीं करना चाहिए?”

ज्ञानरिपु ने उसे स्नेह से देखा।

“करना चाहिए।”

युवा कवि प्रसन्न हुआ।

“सच?”

“हाँ। मगर पहले यह देख लेना चाहिए कि सवाल पूछने का समय उपयुक्त है या नहीं।”

“और उपयुक्त समय कब आता है?”

ज्ञानरिपु ने कहा—

“जब सत्ता स्वयं सवाल पूछने को कहे।”

युवा कवि ने उस दिन पहली बार समझा कि साहित्य परिषद की अध्यक्षता साहित्य से अधिक समय की समझ मांगती है।

उधर शिक्षा मंत्री महाराज ने पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन का प्रस्ताव रखा।

इतिहास की किताबों में रियासत का अध्याय छोटा कर दिया गया था, पर महाराज के शासनकाल का अध्याय विशेष रूप से विस्तृत किया जाना था।

एक अधिकारी ने साहस करके पूछा—

“मान्यवर, लोकतंत्र में व्यक्ति से अधिक संस्थाओं का महत्व नहीं होना चाहिए?”

महाराज ने कहा—

“बिल्कुल होना चाहिए।”

“तो फिर आपका अध्याय इतना बड़ा क्यों?”

महाराज ने गंभीर होकर उत्तर दिया—

“क्योंकि यह संस्था के विकास का ऐतिहासिक प्रमाण है।”

अधिकारी ने फाइल बंद कर दी।

लोकतंत्र में तर्क का भी एक राजकीय पद होता है—वह परिस्थिति देखकर छुट्टी पर चला जाता है।

धीरे-धीरे लोगों ने देखा कि महाराज के पुराने दरबारी अब सरकारी समितियों में दिखाई देने लगे हैं। पुराने प्रशंसक सलाहकार बन गए थे। पुराने भाट सांस्कृतिक संस्थाओं में नियुक्त हो गए थे। और पुराने राजकवि अब साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे।

राजतंत्र समाप्त हो चुका था।

केवल उसकी नियुक्तियां बची थीं।

एक दिन ज्ञानरिपु फिर गुरु के पास पहुंचे।

“गुरुदेव, एक बात समझ में नहीं आ रही।”

“क्या?”

“अब महाराज राजा नहीं हैं, फिर भी सब कुछ पहले जैसा क्यों लगता है?”

आचार्य विद्यादमन ने गहरी सांस ली।

“रिपु, तुम्हे अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।”

“क्या?”

“राजा का पद समाप्त हो सकता है। राजकीय मानसिकता का नहीं।”

ज्ञानरिपु चुप रहे।

गुरु ने आगे कहा—

“और याद रखो, लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह पुराने राजा को हटाकर नया राजा नहीं बनाता।”

ज्ञानरिपु ने राहत की सांस ली।

गुरु बोले—

“वह पुराने राजा को नया पद दे देता है।”

ज्ञानरिपु ने सिर झुका लिया।

उन्हें लगा, इतिहास सचमुच बहुत कठिन विषय है।

खासकर तब, जब उसे पढ़ाने वाला शिक्षा मंत्री स्वयं उसका पात्र हो।

और साहित्य परिषद का अध्यक्ष उसका कवि।


ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, August 12, 2026

बीती काहे बिसार दें?

बीती काहे बिसार दें?

समझदार लोग हमेशा से कहते आए हैं—बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले। जीवन में आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखते रहना ठीक नहीं। पीछे बहुत कुछ ऐसा पड़ा रहता है जिसे देखकर आदमी आगे बढ़ने का उत्साह ही खो दे। इसलिए समझदार आदमी स्मृतियों की गठरी हल्की करता रहता है।

लेकिन हमारे समय में भूलना भी कोई निजी मामला नहीं रह गया है। क्या भूलना है और क्या याद रखना है, इसका निर्णय अब व्यक्ति अकेले नहीं करता। इसके लिए बाकायदा वातावरण बनाया जाता है। कभी कोई नई घटना पुरानी घटना पर डाल दी जाती है, कभी कोई नया विवाद पुराने विवाद को ढक लेता है और कभी पुरानी बात अचानक नए संदर्भ में ऐसी लौटती है जैसे वह कल ही हुई हो।

हमारे लोकतंत्र में स्मृति भी मौसम की तरह है। चुनाव आया तो कुछ बातें याद आने लगती हैं, चुनाव गया तो वही बातें इतिहास की अलमारी में रख दी जाती हैं। पाँच साल तक जिन सवालों पर धूल जमती रहती है, चुनाव के मौसम में उन पर अचानक झाड़न चलने लगती है। जनता को बताया जाता है कि उसे क्या याद रखना चाहिए और क्या भूल जाना चाहिए।

सरकारें चाहती हैं कि जनता भविष्य की ओर देखे। यह अच्छी बात है। भविष्य में विकास है, नई सड़क है, नया एक्सप्रेसवे है, नया पुल है, नया ऐप है और नया उद्घाटन है। अतीत में जाने पर कुछ असुविधाजनक प्रश्न खड़े हो सकते हैं—किसने क्या वादा किया था, किसका क्या हुआ, किसकी जमीन गई, किसकी नौकरी गई, किसका घर टूटा और किसका सपना अधूरा रह गया।

इसलिए भविष्य बहुत सुविधाजनक चीज है। उसमें हिसाब नहीं देना पड़ता।

अतीत में हिसाब-किताब रहता है।

हमने देखा है कि एक समय में घोटालों की संख्या इतनी बढ़ जाती थी कि नया घोटाला पुराने घोटाले को भुलाने का काम करता था। आज तकनीक ने इस व्यवस्था को और सरल कर दिया है। अब किसी घोटाले को भुलाने के लिए नया घोटाला जरूरी नहीं। एक वायरल वीडियो, एक उत्तेजक बयान, एक धार्मिक विवाद, कोई भावुक भाषण या सोशल मीडिया का नया ट्रेंड पर्याप्त है।

सुबह जो मुद्दा देश की सबसे बड़ी चिंता था, शाम तक वह किसी और मुद्दे के नीचे दबा मिलता है।

अगले दिन कोई पूछे—“कल क्या हुआ था?”

उत्तर मिलता है—“कल? कौन-सा कल?”

स्मृति अब चौबीस घंटे की हो गई है।

लेकिन विचित्र बात यह है कि जब सत्ता को अतीत की जरूरत होती है तो स्मृति अचानक बहुत लंबी हो जाती है। कई दशक पीछे जाकर घटनाओं की फाइलें खुल जाती हैं। इतिहास के पुराने पन्ने झाड़-पोंछकर सामने रख दिए जाते हैं। तब बताया जाता है कि देखिए, यह सब पहले हुआ था। इसलिए आज का प्रश्न मत पूछिए।

यानी इतिहास कभी सबक है, कभी हथियार।

कभी वह आईना है और कभी पर्दा।

महाभारत से लेकर आज तक मनुष्य को स्मरण कराने के लिए किसी न किसी ‘मुद्रिका’ की जरूरत पड़ती रही है। शकुंतला की मुद्रिका ने दुष्यंत को वह याद दिलाया जिसे वे भूल चुके थे। आज हमारे पास मुद्रिकाओं की कमी नहीं है। फर्क इतना है कि अब मुद्रिका अंगूठी के रूप में नहीं आती। वह कभी चुनावी नारा होती है, कभी वायरल पोस्ट, कभी पुराना भाषण, कभी किसी नेता का बयान, कभी किसी जाँच की फाइल और कभी किसी स्मारक के रूप में सामने आ जाती है।

इन मुद्रिकाओं का उपयोग बड़ा समझदारी से होता है।

जब जरूरी हो तो कहा जाता है—“इतिहास को भूलना नहीं चाहिए।”

जब इतिहास असुविधाजनक हो जाए तो कहा जाता है—“पुरानी बातों को कुरेदने से क्या फायदा?”

जब किसी पुराने अपराध का उल्लेख अपने पक्ष में हो तो वह राष्ट्र की स्मृति बन जाता है और जब वही स्मृति प्रश्न पूछने लगे तो उसे ‘नकारात्मकता’ कह दिया जाता है।

भोपाल की गैस त्रासदी हो, आपातकाल हो, बाबरी मस्जिद का विध्वंस हो, गुजरात के दंगे हों, विभाजन की त्रासदी हो, युद्धों की स्मृतियाँ हों या बड़े आर्थिक घोटाले—हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है जिन्हें भूलना भी आसान नहीं और याद रखना भी हमेशा सुविधाजनक नहीं।

ऐसी स्मृतियों से कोई कहे कि ‘बीती ताहि बिसार दे’, तो शायद बीती हुई बात पूछेगी—“किसके लिए?”

जिसे नुकसान हुआ, उसके लिए अतीत बीता हुआ नहीं होता।

जिसने लाभ उठाया, उसके लिए वह इतिहास हो सकता है।

यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है।

स्मृति का भी वर्ग-विभाजन हो गया है।

जिसके पास सत्ता है, उसके पास स्मृति को व्यवस्थित करने की सुविधा है। वह तय कर सकता है कि कौन-सी घटना राष्ट्रीय स्मृति बनेगी, कौन-सी स्थानीय घटना रह जाएगी और कौन-सी घटना इतनी पुरानी घोषित कर दी जाएगी कि उसके बारे में प्रश्न पूछना ही अनुचित लगे।

जनता भी कमाल की है। उसे रोज इतनी नई सूचनाएँ मिलती हैं कि पुरानी बात याद रखना कठिन हो गया है। मोबाइल की स्क्रीन पर सुबह का आक्रोश दोपहर तक मनोरंजन में बदल जाता है और शाम तक किसी नई बहस का शिकार हो जाता है।

पहले लोग कहते थे—समय बड़े से बड़े घाव को भर देता है।

अब सोशल मीडिया कहता है—समय बड़े से बड़े घाव को ट्रेंड से बाहर कर देता है।

फर्क मामूली नहीं है।

घाव भरा या नहीं, यह शरीर बताता है।

फिर भी कुछ लोग हैं जो बार-बार पुरानी बातें याद दिलाते रहते हैं। वे पूछते हैं—वादा क्या था? हुआ क्या? जिम्मेदार कौन था? न्याय कहाँ तक पहुँचा? मुआवजा किसे मिला? विस्थापित कहाँ गए? जिनके नाम पर राजनीति हुई, उनका जीवन कितना बदला?

ऐसे लोगों को अक्सर सलाह दी जाती है—“आगे देखिए।”

वे कहते हैं—“आगे देखने में हमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन आगे जाने के लिए पीछे की सड़क भी तो देखनी पड़ेगी।”

यही बात समझने में सबसे अधिक कठिनाई होती है।

अतीत को ढोना और अतीत से सीखना दो अलग बातें हैं। अतीत में फँसे रहना समाज को आगे नहीं ले जाता, लेकिन अतीत को मिटा देना समाज को बार-बार उसी गड्ढे में गिरा सकता है।

इतिहास की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि वह हमें बताता रहे—हम पहले कहाँ गिरे थे।

वरना सत्ता अपनी सुविधा से मुद्रिका दिखाती रहेगी, जनता अपनी सुविधा से भूलती रहेगी और हम हर पाँच साल बाद उसी पुराने मंच पर नए नाटक के टिकट खरीदते रहेंगे।

कहानी वही होगी।

केवल पोस्टर नया होगा।


ब्रजेश कानूनगो

Monday, August 10, 2026

महाराज श्रृंखला : 12 समन्वय का महाअभियान

 महाराज श्रृंखला : 12

समन्वय का महाअभियान

खनन स्थल की ओर महाराज का काफिला आगे बढ़ा तो उसके पीछे धूल का एक ऐसा बादल उठने लगा, जैसे विकास स्वयं अपने आने की घोषणा कर रहा हो। आगे-आगे पुलिस की गाड़ियां थीं, उनके पीछे प्रशासनिक अधिकारियों की गाड़ियां, फिर खनन कम्पनी के अधिकारी, उसके बाद स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के वाहन और सबसे पीछे कुछ पत्रकारों की गाड़ियां थीं।

महाराज की गाड़ी सबसे बीच में थी।

रियासत में व्यवस्था हमेशा इसी तरह चलती थी। जो सबसे महत्वपूर्ण होता था, वह बीच में रहता था और जो सबसे ज्यादा दिखाई देता था, वह सबसे आगे।

सड़क के दोनों ओर वनवासी खड़े होकर महाराज का स्वागत कर रहे थे। किसी के हाथ में फूल थे, किसी के हाथ में पत्तियों की डालियां और कुछ लोग अपनी खाली हथेलियां ही जोड़कर खड़े थे। खाली हथेलियों को देखकर महाराज को क्षणभर के लिए लगा कि शायद ये लोग बहुत सरल और संतोषी हैं।

फिर उन्होंने अपने सचिव से पूछा—

“इनके हाथों में कुछ दिया क्यों नहीं गया?”

सचिव ने धीरे से कहा—

“महाराज, सबको ग्राम भोज में भोजन मिलना है।”

महाराज संतुष्ट हो गए।

रियासत में भूख का समाधान भोजन से और प्रश्नों का समाधान घोषणा से किया जाता था।

खनन स्थल पर पहुंचते ही महाराज के स्वागत के लिए एक विशाल तोरण बनाया गया था। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

‘स्वर्ण समृद्धि परियोजना : पाषाण पुष्प के स्वर्णिम भविष्य की ओर एक ऐतिहासिक कदम।’

महाराज ने तोरण को देखा और प्रसन्न हुए।

“बहुत अच्छा लिखा है।”

राजकवि ज्ञानरिपु ने विनम्रता से कहा—

“महाराज, इसमें ‘सर्वांगीण समावेशी सतत समृद्धि’ भी जोड़ दिया जाए तो भविष्य और भी उज्ज्वल हो सकता है।”

महाराज ने तत्काल स्वीकृति दे दी।

उन्हें भविष्य की चिंता बहुत थी।

वर्तमान तो उनके नियंत्रण में था।

शिलान्यास के लिए मंच तैयार था। मंच पर एक ओर संतश्री रगडू महाराज विराजमान थे और दूसरी ओर गोपाल सेठ। उनके बीच खनन कम्पनी के प्रबंध निदेशक प्रशांत कुमार बैठे थे। तीनों के बीच ऐसी आत्मीयता दिखाई दे रही थी जैसे वे बहुत पुराने परिचित हों।

हालांकि गांव के लोग जानते थे कि तीनों की पहली औपचारिक मुलाकात कुछ महीने पहले ही हुई थी।

लेकिन कारोबार में परिचय का इतिहास बहुत लंबा रखने की आवश्यकता नहीं होती। लाभ का अनुमान हो तो संबंध तत्काल प्राचीन हो जाते हैं।

महाराज ने मंच पर पहुंचकर सबसे पहले संतश्री के चरण स्पर्श किए। फिर गोपाल सेठ से हाथ मिलाया। प्रशांत कुमार ने झुककर महाराज को प्रणाम किया।

महाराज ने तीनों की ओर देखते हुए कहा—

“यही है हमारा समन्वय।”

तालियां बजीं।

किसी ने पूछा नहीं कि समन्वय किस-किस का है।

पूछने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी।

महाराज ने शिलापट्ट का अनावरण किया। पर्दा हटते ही उस पर खुदे अक्षर चमक उठे—

‘पाषाण पुष्प स्वर्ण उत्खनन परियोजना—जनहित में समर्पित।’

जनहित शब्द देखकर एक वनवासी बूढ़ा मुस्कुराया।

उसने अपने पास खड़े युवक से पूछा—

“जनहित कौन है?”

युवक ने कहा—

“पता नहीं बाबा। शायद कोई बड़ा आदमी होगा।”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“बड़ा आदमी ही होगा। हमारा हित तो हमें दिखाई नहीं देता।”

उधर मंच पर महाराज ने नारियल फोड़ा।

नारियल फूटा।

फोटोग्राफरों के कैमरे चमके।

परियोजना आरम्भ हो गई।

उसी शाम राजधानी में महाराज के निजी सचिवालय में एक छोटी-सी बैठक हुई।

बैठक छोटी थी, पर विषय बहुत बड़ा था।

मेज के एक ओर महाराज के विश्वस्त अधिकारी बैठे थे। दूसरी ओर गोपाल सेठ, प्रशांत कुमार और रियासत के कुछ प्रमुख व्यापारी। संतश्री का प्रतिनिधि भी उपस्थित था।

बैठक को सरकारी कागजों में ‘परियोजना समन्वय समिति की अनौपचारिक बैठक’ कहा जाना था।

अनौपचारिक इसलिए कि इसकी कोई कार्यवाही नहीं होनी थी।

और समन्वय इसलिए कि सबको अपने-अपने हिस्से का काम समझना था।

गोपाल सेठ ने धीरे से कहा—

“महाराज, परियोजना में कुछ प्रशासनिक अड़चनें आ सकती हैं।”

“कैसी अड़चनें?”

“पर्यावरण, भूमि, पुनर्वास, अनुमति... कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं।”

महाराज ने गंभीर होकर कहा—

“जनहित के कार्य में अड़चन डालना उचित नहीं है।”

प्रशांत कुमार ने कहा—

“महाराज, कम्पनी सारे नियमों का पालन करेगी।”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

“नियमों का पालन होना चाहिए।”

कमरे में थोड़ी देर मौन रहा।

फिर महाराज ने मुस्कुराकर कहा—

“और नियमों की व्याख्या भी समयानुकूल होनी चाहिए।”

सभी मुस्कुराए।

राजकवि वहां नहीं थे, इसलिए अनुप्रास का कोई नया शब्द नहीं बना।

लेकिन सचिव ने तुरंत अपनी डायरी में लिख लिया—

‘नियमसम्मत, नियमनिष्ठ, राष्ट्रहितकारी त्वरित समन्वय।’

गोपाल सेठ ने आगे कहा—

“महाराज, कम्पनी चाहती है कि स्थानीय लोगों के लिए एक सामाजिक विकास कोष भी बनाया जाए।”

“बहुत अच्छा।”

“उस कोष से स्कूल, अस्पताल, पेयजल, सड़क और कौशल विकास जैसे काम किए जा सकते हैं।”

महाराज प्रसन्न हुए।

“यही तो हम चाहते हैं। विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें कम्पनी भी आगे बढ़े और जनता भी।”

प्रशांत कुमार ने विनम्रता से कहा—

“कम्पनी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

यह सुनकर संतश्री के प्रतिनिधि ने पहली बार मुंह खोला—

“आश्रम भी सहयोग करेगा।”

महाराज ने पूछा—

“कैसे?”

“आश्रम लोगों को समझाएगा कि परियोजना उनके कल्याण के लिए है।”

महाराज ने मेज पर हाथ रखकर कहा—

“यही तो चाहिए। सरकार नीति बनाए, कम्पनी विकास करे, संत समाज को समझाएं और समाज सरकार पर विश्वास रखे।”

गोपाल सेठ ने मुस्कुराकर कहा—

“और व्यापारी?”

महाराज भी मुस्कुराए।

“व्यापारी तो व्यवस्था को गति देगा।”

कमरे में फिर हंसी गूंजी।

व्यवस्था को गति देने वाले पहिए कौन थे और उस गति की कीमत कौन चुका रहा था, यह सवाल बैठक की कार्यवाही में शामिल नहीं किया गया।

कुछ ही दिनों बाद ‘जनहित विकास कोष’ का गठन हो गया।

कागजों में उसका उद्देश्य बहुत पवित्र था।

उससे विद्यालय बनेंगे।

अस्पताल बनेंगे।

सड़कें बनेंगी।

पानी पहुंचेगा।

वनवासियों के बच्चों को छात्रवृत्ति मिलेगी।

महिलाओं को रोजगार मिलेगा।

और सबसे महत्वपूर्ण—परियोजना के कारण प्रभावित होने वाले परिवारों का जीवन पहले से बेहतर होगा।

रियासत के अखबारों में अगले दिन इसका पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपा।

विज्ञापन का खर्च कम्पनी ने उठाया।

विज्ञापन में महाराज की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी।

नीचे लिखा था—

‘सरकार और समाज की साझी पहल।’

साझेदारी का यह नया मॉडल बहुत सफल रहा।

सरकार अनुमति देती थी।

कम्पनी पैसा देती थी।

मीडिया खबर देता था।

संत आशीर्वाद देते थे।

राजनीतिज्ञ उद्घाटन करते थे।

और जनता विकास का इंतजार करती थी।

सबका काम बंट गया था।

सिर्फ भ्रष्टाचार का कोई अलग विभाग नहीं बनाया गया था।

उसकी आवश्यकता भी नहीं थी।

वह सभी विभागों के बीच समन्वित रूप से काम कर रहा था।

कुछ महीनों बाद परियोजना के विस्तार का प्रस्ताव आया।

मूल स्वीकृत क्षेत्र से अधिक भूमि की आवश्यकता बताई गई।

प्रशांत कुमार ने अधिकारियों को समझाया कि यदि अतिरिक्त क्षेत्र नहीं मिला तो परियोजना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं रहेगी।

अधिकारियों ने फाइल देखी।

फाइल में ‘आर्थिक व्यवहार्यता’ शब्द देखकर उनकी चिंता समाप्त हो गई।

जनहित के बाद आर्थिक व्यवहार्यता वह दूसरा शब्द था जिसके सामने बहुत-से प्रश्न स्वयं छोटे हो जाते थे।

अतिरिक्त भूमि के लिए नई अधिसूचना जारी हुई।

कुछ वनवासियों ने आपत्ति की।

उन्होंने कहा—

“यह हमारी जमीन है।”

अधिकारी ने समझाया—

“नहीं, यह विकास की जमीन है।”

उन्होंने कहा—

“यह जंगल है।”

अधिकारी ने कहा—

“नहीं, यह खनिज क्षेत्र है।”

उन्होंने कहा—

“यह हमारे पुरखों की जगह है।”

अधिकारी ने कहा—

“कृपया भावुक न हों। मुआवजा मिलेगा।”

वनवासी ने पूछा—

“मुआवजे में जंगल मिलेगा?”

अधिकारी चुप हो गया।

फिर बोला—

“उसकी व्यवस्था अलग से होगी।”

रियासत में हर समस्या की एक अलग व्यवस्था थी।

बस समाधान अक्सर एक ही होता था—

किसी और को लाभ।

इधर राजधानी में चुनाव नजदीक आ रहे थे।

महाराज को प्रजा की याद अचानक अधिक आने लगी थी।

गोपाल सेठ ने एक शाम महाराज से कहा—

“महाराज, चुनाव के समय जनता को विकास दिखाई देना चाहिए।”

“दिखेगा।”

“सड़कें?”

“बनेंगी।”

“रोजगार?”

“घोषित होगा।”

“कुछ बड़े कार्यक्रम?”

“करेंगे।”

गोपाल सेठ ने थोड़ा रुककर कहा—

“और सहयोग?”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

दोनों कुछ क्षण मौन रहे।

इस मौन में वर्षों की राजनीति, व्यापार और परस्पर विश्वास का अनुभव था।

गोपाल सेठ ने कोई रकम नहीं बताई।

महाराज ने कोई मांग नहीं रखी।

दोनों ने कुछ कहा ही नहीं।

फिर भी सब समझ लिया गया।

यही अप्रत्यक्ष गठबंधन की सबसे बड़ी विशेषता थी।

इसमें समझौते लिखे नहीं जाते थे।

वे समझे जाते थे।

चुनाव से कुछ दिन पहले ‘जनहित विकास कोष’ से कई नई घोषणाएं हुईं।

एक अस्पताल की आधारशिला रखी गई।

एक विद्यालय का उद्घाटन हुआ।

महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र खुला।

युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम शुरू हुआ।

इन सभी कार्यक्रमों के मंच पर महाराज की तस्वीर थी।

कम्पनी का नाम कहीं छोटा-सा था।

संतश्री का नाम उससे थोड़ा बड़ा।

गोपाल सेठ का नाम आयोजक के रूप में नीचे।

और जनता का नाम सबसे ऊपर—

‘जनता की सेवा में समर्पित।’

महाराज ने उद्घाटन समारोह में कहा—

“हम राजनीति को सेवा का माध्यम मानते हैं।”

पीछे खड़े गोपाल सेठ ने धीरे से प्रशांत कुमार से कहा—

“और कारोबार को राजनीति का।”

प्रशांत कुमार ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“दोनों मिल जाएं तो सेवा अपने आप हो जाती है।”

दोनों हंस पड़े।

उनकी हंसी मंच तक नहीं पहुंची।

लेकिन मंच पर खड़े महाराज को शायद उसका अर्थ सुनाई दे गया था।

उन्होंने भाषण में तुरंत एक नया वाक्य जोड़ दिया—

“हमारे यहां राजनीति और व्यवसाय परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण के पूरक हैं।”

तालियां बजीं।

किसी ने यह नहीं पूछा कि राष्ट्रनिर्माण में किसका कितना हिस्सा है और राष्ट्र की जमीन में किसका कितना।

कुछ समय बाद एक पत्रकार ने इस पूरे प्रकरण पर सवाल उठाने का साहस किया।

उसने पूछा—

“महाराज, क्या यह सही है कि खनन कम्पनी को सरकार से कई महत्वपूर्ण रियायतें मिली हैं और उसी कम्पनी से जुड़े लोग सामाजिक विकास तथा राजनीतिक कार्यक्रमों को आर्थिक सहयोग भी दे रहे हैं?”

महाराज मुस्कुराए।

“आप बहुत अच्छी बात पूछ रहे हैं।”

पत्रकार प्रसन्न हुआ।

महाराज ने आगे कहा—

“व्यवसायी यदि समाजसेवा करता है तो क्या वह अपराध है?”

“नहीं।”

“सरकार यदि विकास के लिए उद्योग को सुविधा देती है तो क्या वह अपराध है?”

“नहीं।”

“संत यदि समाज को विकास के पक्ष में समझाते हैं तो क्या वह अपराध है?”

“नहीं।”

“और जनता यदि विकास चाहती है तो क्या उसे अपराधी कहा जाएगा?”

पत्रकार चुप रहा।

महाराज ने निष्कर्ष दिया—

“फिर समस्या कहां है?”

सभा में तालियां बजीं।

पत्रकार ने अपनी डायरी बंद कर दी।

उसे पहली बार समझ में आया कि भ्रष्टाचार हमेशा चोरी की तरह दिखाई नहीं देता।

कभी-कभी वह विकास की तरह आता है।

कभी सेवा की तरह।

कभी धर्म की तरह।

कभी दान की तरह।

कभी चुनावी सहयोग की तरह।

और कभी-कभी वह इतने सारे अच्छे शब्दों के बीच बैठा होता है कि उसे पहचानना ही अशिष्टता माना जाता है।

उस रात महाराज अपने महल की छत पर खड़े होकर दूर शहर की रोशनी देख रहे थे।

सचिव ने आकर पूछा—

“महाराज, आज का दिन कैसा रहा?”

महाराज ने कहा—

“बहुत अच्छा।”

“परियोजना?”

“चल रही है।”

“कम्पनी?”

“संतुष्ट है।”

“संतश्री?”

“प्रसन्न हैं।”

“गोपाल सेठ?”

महाराज कुछ क्षण चुप रहे।

फिर मुस्कुराए—

“वह तो अपना आदमी है।”

सचिव ने पूछा—

“और प्रजा?”

महाराज ने दूर अंधेरे में देखा।

“प्रजा?”

कुछ देर बाद बोले—

“उसके लिए अगली सभा में एक नई घोषणा कर देंगे।”

सचिव ने डायरी खोली।

“क्या घोषणा लिखूं, महाराज?”

महाराज ने आकाश की ओर देखा।

“कुछ ऐसा लिखो जिसमें विकास भी हो, विश्वास भी हो, व्यवस्था भी हो और समृद्धि भी।”

सचिव ने पूछा—

“और पारदर्शिता?”

महाराज ने पहली बार गंभीर होकर उसकी ओर देखा।

“वह भी लिख देना।”

“कहां?”

महाराज मुस्कुराए—

“वहीं, जहां दिखाई तो दे... पर दिखाई न दे।”

****

दिखाई नहीं देती फूलों की धार

दिखाई नहीं देती फूलों की धार 

आजकल धार की बड़ी पूछ है।

हर चीज में धार चाहिए—भाषण में धार, बयान में धार, बहस में धार, ट्वीट में धार और सबसे बढ़कर विरोधी के चरित्र पर लगाए गए आरोपों में धार। धार नहीं है तो समझिए आपकी बात में जान नहीं है। आप कितने ही सही क्यों न हों, यदि आपकी बात से किसी की गर्दन न झुके तो आपकी बात किस काम की?

इसलिए हमने धार का मतलब भी बदल दिया है।

पहले धार हथियार में होती थी। अब धार भाषा में होती है। फर्क इतना है कि पहले तलवार दिखाई देती थी, अब शब्द दिखाई नहीं देते। तलवार से बचने के लिए आदमी पीछे हट सकता था, शब्दों से बचने के लिए मोबाइल बंद करना पड़ता है। लेकिन मोबाइल बंद कर देने से भी शब्द कहाँ बंद होते हैं! वे स्क्रीन से उतरकर पड़ोस की बातचीत में, चाय की दुकान पर और फिर परिवार के व्हाट्सऐप समूह में पहुँच जाते हैं।

वहाँ उनकी धार और तेज हो जाती है।


हालाँकि हर धार चमकती नहीं।

कुएँ की रस्सी को देखिए। वह बेचारा वर्षों से पत्थर से रगड़ खा रहा है। न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है, न अपनी उपलब्धियों का विज्ञापन। बस पानी निकालने के लिए आती-जाती रहती है। लेकिन लगातार रगड़ खाते-खाते पत्थर के सीने पर अपनी लकीर छोड़ देती है।

यह धार हमें पसंद नहीं।

क्योंकि इसमें न शोर है, न उद्घोषणा।

आजकल उपलब्धि वही मानी जाती है जिसकी घोषणा की जा सके। आपने चुपचाप किसी की मदद कर दी—यह खबर नहीं। आपने मदद करने से पहले कैमरा बुला लिया—अब यह उपलब्धि है।

किसी ने जीवन भर ईमानदारी से काम किया—किसी को पता नहीं।

किसी ने ईमानदारी पर भाषण दे दिया—तालियाँ बजने लगती हैं।

हमारा समय काम से अधिक उसके प्रचार की धार पहचानता है।


फिर भी कुछ चीजें हैं जिनका प्रचार नहीं किया जा सकता।

मसलन सर्दियों की हवा।

वह आती है और बिना किसी अनुमति के देह काटने लगती है। उसके पास कोई हथियार नहीं। फिर भी हम काँपने लगते हैं।

प्रकृति की यह पुरानी आदत है—वह प्रमाणपत्र लेकर नहीं आती।

हवा अमीर के घर में भी प्रवेश करती है और गरीब की झोपड़ी में भी। फर्क सिर्फ इतना है कि अमीर के कमरे में उसका मुकाबला हीटर करता है और गरीब के शरीर को हीटर समझ लिया जाता है।


इसी तरह भूख की भी धार होती है।

वह किसी संसद में भाषण नहीं देती। कोई नारा नहीं लगाती। बस पेट में धीरे-धीरे बजती रहती है। लेकिन पेट की वह आवाज कभी-कभी सत्ता के सबसे ऊँचे भाषण से अधिक तीखी होती है।

इसलिए भूख को आँकड़ों में बदल देना सुविधाजनक है।

भूख को संख्या बना दीजिए।

संख्या को रिपोर्ट बना दीजिए।

रिपोर्ट को समिति के हवाले कर दीजिए।

समिति को अगले वित्तीय वर्ष के हवाले कर दीजिए।

तब तक भूख स्वयं ही किसी दूसरी सूची में चली जाएगी।

जंगल में घायल जानवर की चीख भी कुछ ऐसी ही है।

वह किसी हत्यारे की तलवार से अधिक धारदार होती है। तलवार केवल शरीर को काटती है, चीख सुनने वाले के भीतर कुछ काटती है।


हमने चीखों के साथ भी सुविधा का व्यवहार सीख लिया है।

किसी की चीख को ‘शोर’ कह दो।

किसी की पीड़ा को ‘नकारात्मकता’ कह दो।

किसी के सवाल को ‘विकास विरोधी मानसिकता’ कह दो।

और यदि वह फिर भी चुप न हो तो कह दो कि वह किसी के इशारे पर बोल रहा है।

अब आदमी को चुप कराने के लिए उसका मुँह बंद करना जरूरी नहीं। उसके बोलने की विश्वसनीयता बंद कर देना पर्याप्त है।

यही आधुनिक धार है।


कबीर होते तो शायद इस समय बहुत परेशान होते।

उन्होंने बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी थी। सीधे आदमी से सवाल करते थे। न किसी चैनल की अनुमति लेते थे, न किसी प्रवक्ता की सलाह। उनकी भाषा में ऐसी धार थी कि आदमी अपने भीतर झाँकने को मजबूर हो जाता था।

आज आदमी भीतर झाँकने से बचता है।

उसे आईना चाहिए, लेकिन ऐसा आईना जिसमें चेहरा अच्छा दिखाई दे।

कबीर का आईना खतरनाक था।

उसमें चेहरा ही नहीं, चरित्र भी दिखाई देता था।

इसलिए कबीर को पढ़ना आसान है, कबीर को मानना कठिन।

हमने उनके दोहे बचा लिए हैं, उनके सवाल छोड़ दिए हैं।

यही हमारी संस्कृति की सुविधा है।


हम विचारों की माला बनाकर पहन लेते हैं, विचारों को जीवन में उतारने की जरूरत नहीं समझते।

फूलों के साथ भी हमने यही किया।

फूल को पूजा में रख दिया।

मूर्ति पर चढ़ा दिया।

नेता के गले में डाल दिया।

शहीद की तस्वीर पर रख दिया।

और फिर फूल को भूल गए।

फूल बहुत खतरनाक चीज है।

वह किसी को घायल करने के लिए नहीं खिलता, फिर भी घायल मनुष्य के पास जाकर बैठ जाता है।

वह किसी से बदला नहीं लेता, फिर भी हिंसा पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।

इसीलिए इतिहास में कई बार फूलों ने तलवारों को शर्मिंदा किया है।


एक हाथ में पत्थर हो तो सत्ता को पुलिस मिल जाती है।

एक हाथ में बंदूक हो तो सरकार को कानून मिल जाता है।

लेकिन एक हाथ में फूल हो तो?

यह समस्या है।

फूल के विरुद्ध कौन-सी धारा लगाएँ?

‘अत्यधिक सुगंध फैलाने’ की?

‘शांति भंग करने’ की?

‘अहिंसा के माध्यम से व्यवस्था को असहज करने’ की?

या फिर फूल को भी किसी संगठन का सदस्य घोषित कर दें?

हमारे समय में यह भी संभव है।


फूल यदि अकेला है तो संदिग्ध है।

उसके पीछे कौन है, यह जानना जरूरी है।

उसने फूल क्यों पकड़ा?

किसने दिया?

कहाँ से खरीदा?

किस विचारधारा की नर्सरी में उगा?

फूल का चरित्र प्रमाणपत्र कहाँ है?

फूल बेचारा सोचता होगा—मैं तो बस फूल हूँ।

लेकिन आजकल सिर्फ फूल होना पर्याप्त नहीं है।

आपको अपना पक्ष भी बताना पड़ता है।

फिर भी फूल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पक्ष नहीं चुनता।

वह मंदिर में भी खिल सकता है, कब्रिस्तान में भी।

प्रेमी के हाथ में भी जा सकता है, शहीद की तस्वीर पर भी।

वह किसी पार्टी का नहीं होता।

शायद इसीलिए वह मनुष्य का होता है।

और यहीं से उसकी असली धार शुरू होती है।


आज जब हर बात को पक्ष और विपक्ष में बाँटने की कोशिश हो रही है, तब एक फूल कहता है—मैं किसी पक्ष में नहीं, जीवन के पक्ष में हूँ।

जब हर चीख को शोर कहा जा रहा है, फूल कहता है—पहले सुनो।

जब हर असहमति को दुश्मनी कहा जा रहा है, फूल कहता है—असहमति भी मनुष्य की भाषा है।

जब हिंसा को शक्ति समझा जा रहा है, फूल कहता है—शक्ति वह भी है जो चोट किए बिना तुम्हें बदल दे।

और शायद इसी कारण हमारी दुनिया फूलों से लहूलुहान है।

यह रक्त फूलों का नहीं, हमारी संवेदनहीनता का है।

हमने फूलों को सजावट समझा और उनकी धार को पहचानने में देर कर दी।

अब फूलों की जरूरत पहले से ज्यादा है।

क्योंकि तलवारें बहुत हैं।

शब्द भी बहुत हैं।

आवाजें भी बहुत हैं।

लेकिन मनुष्य कम होता जा रहा है।

और जब मनुष्य कम होने लगे, तब सबसे धारदार हथियार कोई हथियार नहीं होता।

वह एक फूल होता है।

जिसे हाथ में लेकर कोई कह सके—

मैं तुम्हें मारना नहीं चाहता।

मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि तुम मुझे मनुष्य समझो।

यही वाक्य शायद आज की सबसे बड़ी धार है।

और इससे डरने वाले बहुत हैं।


ब्रजेश कानूनगो 

Sunday, August 9, 2026

उनींदे नागरिक का गड़बड़ सपना

उनींदे नागरिक का गड़बड़ सपना

सुबह उठते ही मुझे लगा कि रात में कोई बहुत बड़ी गड़बड़ हुई है।

गड़बड़ सपने में नहीं, देश में हुई थी।

हालाँकि सपने में भी बहुत कुछ गड़बड़ था, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित गड़बड़ी थी कि उसे सपना मानने का मन नहीं हो रहा था। मैंने घबराकर अपना अखबार उठाया। अखबार वही था, कागज वही था, विज्ञापन वही थे, चेहरे भी लगभग वही थे, केवल उसका नाम बदल गया था। हिंदी अखबार का नाम अब अंग्रेजी में था और इतना अंग्रेजी में कि मुझे उसे पढ़ने के लिए हिंदी की जरूरत पड़ रही थी।

मैंने सोचा, शायद अखबार ने अपना अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकाल लिया है।

फिर ध्यान आया कि यह तो मेरा ही अखबार है।

मुखपृष्ठ पर एक बड़ी खबर थी—‘हिंदी दिवस की तैयारी’। खबर अंग्रेजी में थी। उसके नीचे एक विज्ञापन था—‘अपनी मातृभाषा से जुड़िए’। विज्ञापन की भाषा ऐसी थी कि मातृभाषा को पहले अंग्रेजी सीखनी पड़ती।

मैंने संपादकीय पृष्ठ खोला। वहाँ संपादकीय की जगह किसी विदेशी भाषा में ‘मन की बात’ छपी थी। मुझे राहत मिली कि मन अभी भी वही है, केवल भाषा बदल गई है।

नीचे महान हिंदी साहित्यकारों के नामों के साथ उनके सोशल मीडिया अकाउंट दिए हुए थे। कबीर के फॉलोअर्स लाखों में थे, तुलसीदास ट्रेंड कर रहे थे और रामचंद्र शुक्ल को किसी ने ‘कंटेंट क्रिएटर’ बता दिया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी की पोस्ट पर किसी युवा विचारक ने टिप्पणी की थी—‘सर, आपको अपडेट होने की जरूरत है।’

मैंने देखा, टिप्पणी देवनागरी में थी और उसमें सभी सुझाव अंग्रेजी में थे।

यह देखकर मेरी नींद में ही नींद उड़ गई।

तभी सपना आगे बढ़ गया।

एक सफेद इमारत के सामने परेड हो रही थी। सैनिकों के कंधों पर बंदूकें नहीं, लैपटॉप थे। वे इतने अनुशासित ढंग से कदमताल कर रहे थे कि लगा, अब युद्ध भी शायद पासवर्ड डालकर ही शुरू होगा।

एक अधिकारी चिल्लाया—‘फॉरवर्ड मार्च!’

सैनिक आगे बढ़े।

फिर शिक्षकों की एक विशाल टुकड़ी आई। सभी ने तिरंगे रंग की टोपियाँ पहन रखी थीं। वे शिक्षा की गुणवत्ता, नई शिक्षा नीति और डिजिटल भविष्य का प्रदर्शन करते हुए निकल रहे थे। उनके हाथों में किताबें नहीं, टैबलेट थे। किसी के टैबलेट में बच्चा नहीं खुल रहा था, किसी में नेटवर्क नहीं आ रहा था और किसी में पासवर्ड भूल जाने की सूचना थी।

परेड का सबसे आकर्षक दृश्य तब आया जब अतिथि और मेजबान ने अपनी-अपनी कुर्सियाँ बदल लीं।

मेजबान अतिथि की कुर्सी पर बैठ गया और अतिथि मेजबान की कुर्सी पर।

तालियाँ बजीं।

किसी ने कहा—‘यह हमारी लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक है।’

मैंने पूछा—‘लेकिन कुर्सी तो वही है?’

जवाब मिला—‘कुर्सी वही है, आदमी बदल गए हैं।’

मुझे लगा, यही तो असली लोकतंत्र है।

सपना अब किसी टीवी धारावाहिक की तरह एपिसोड-दर-एपिसोड चल रहा था।

अगले दृश्य में कुछ बंदूकधारी एक स्कूल को घेरे खड़े थे। स्कूल के भीतर से बच्चों के रोने की आवाजें आ रही थीं। आवाजों में ऐसी लय थी कि समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे डर के कारण रो रहे हैं या परीक्षा के कारण।

किसी ने कहा—‘शांत रहो, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।’

दूसरे ने कहा—‘नहीं, यह शिक्षा व्यवस्था का मामला है।’

तीसरे ने कहा—‘पहले इसकी जाँच के लिए एक समिति बनाओ।’

बच्चे तब तक रोते रहे।

बाहर समिति की बैठक शुरू हो गई।

उधर एक चित्रकार पेंसिल की नोक पर भीष्म की तरह लेटा हुआ था। उसके आसपास दुनिया भर की कूंचियाँ, रंग और स्याही जमा थी। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

मैंने पूछा—‘आप क्या बना रहे हैं?’

उसने कहा—‘शांति।’

मैंने चित्र देखा। उसमें हर तरफ बंदूकें थीं।

मैंने कहा—‘इसमें शांति कहाँ है?’

वह मुस्कराया—‘आप आधुनिक कला नहीं समझते।’

सपना और बिगड़ गया।

मुंबई के एक फ्रेंच रेस्तराँ में आतंकवादी घुस आए थे। उन्होंने ब्रिटेन के नागरिकों को बंधक बना लिया था। उनका उद्देश्य पाकिस्तान की जेल में बंद अपने साथी को छुड़ाना था।

मुझे लगा, आतंकवाद भी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मल्टीपर्पज हो गया है। घटना कहीं होती है, नागरिक किसी और देश के होते हैं, माँग किसी तीसरे देश से होती है और बयान चौथे देश की राजधानी से आता है।

इतने में ट्विन टावर ध्वस्त हुए और विमान अचानक नाव में बदल गया।

मैंने सपना देखने वाले अपने ही दिमाग से पूछा—‘यह क्या हो रहा है?’

दिमाग बोला—‘प्रतीक समझो।’

मैंने कहा—‘किस बात का?’

वह बोला—‘अब हर चीज प्रतीक है। वास्तविकता बहुत पुरानी चीज हो चुकी है।’

इसके बाद कुछ युवक गालियों को नारों की तरह बोलते हुए प्रबुद्ध बुजुर्गों की सभा में घुस आए।

बुजुर्गों ने कहा—‘बेटा, तर्क से बात करो।’

युवकों ने कहा—‘तर्क पुराना हो गया।’

बुजुर्गों ने कहा—‘तो संवाद करो।’

युवकों ने मोबाइल निकाला और लाइव हो गए।

अब सभा में कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। सभी अपने-अपने दर्शकों से बात कर रहे थे।

वहीं दूसरी ओर पेरिस में कुछ नागरिक मोमबत्तियाँ जलाकर एक मूर्ति के सामने खड़े थे। चेहरे पर दुख था। कैमरे उनके चेहरों पर घूम रहे थे। कुछ लोग रो रहे थे, कुछ तस्वीरें ले रहे थे और कुछ इस बात पर बहस कर रहे थे कि मोमबत्ती किस ब्रांड की है।

मुझे लगा, दुनिया में दुःख भी अब मीडिया-फ्रेंडली होना चाहिए।

तभी सपना अचानक फिर बदला।

मैंने देखा, शांति समिति की बैठक होने वाली है।

मैं खुश हुआ।

चलो, इतनी सारी गड़बड़ी के बाद कहीं तो शांति की बात होगी।

मोबाइल की घंटी बजी।

रात के तीन बजकर पैंतालीस मिनट थे।

मोबाइल की स्क्रीन पर संदेश चमक रहा था—

‘विश्व शांति एवं भाईचारे पर विमर्श हेतु बैठक दोपहर एक बजे गांधी हाल में आयोजित की गई है।’

मैंने राहत की साँस ली।

कम-से-कम शांति बची हुई थी।

फिर मैंने संदेश दोबारा पढ़ा।

नीचे लिखा था—

‘बैठक में प्रवेश हेतु अपना आधार, मोबाइल नंबर और ओटीपी साथ लाएँ।’

मैं फिर चौंक गया।

शांति के लिए भी ओटीपी जरूरी हो गया था।

सुबह हो चुकी थी। अखबार अब भी मेरे हाथ में था। उसका नाम वही था जो कल था। संपादकीय भी हिंदी में था। गांधी की तस्वीर भी थी। मोबाइल पर शांति समिति का संदेश भी नहीं आया था।

मैंने सोचा—अच्छा हुआ, सब सपना था।

तभी पत्नी ने आवाज लगाई—

‘सुनते हो, आज स्वतंत्रता दिवस पर होने वाली गोष्ठी में जाना है न?’

मैंने पूछा—‘किस विषय पर?’

वह बोलीं—‘ भारतीय नागरिक और राष्ट्र भाषा पर।’

मैंने राहत की साँस ली।

‘और संवाद किस भाषा में होगा?’

उन्होंने कहा—‘अंग्रेजी में। मुख्य अतिथि अमेरिका से आ रहे हैं।’

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर अखबार समेटा और सोचने लगा—

शायद सपना अभी खत्म नहीं हुआ है।


ब्रजेश कानूनगो 

Saturday, August 8, 2026

छौंक लगाने वाले

छौंक लगाने वाले

मोहल्ले में पहले भी छौंक लगता था।

दाल में। सब्जी में। कभी-कभी कढ़ी में भी।

छौंक की खुशबू घर की चारदीवारी का सम्मान नहीं करती थी। वह पड़ोसी के घर चली जाती थी। कोई रोकता नहीं था। खुशबू को कौन रोक सकता था?

शाम को किसी के घर से अगरबत्ती की महक आती तो पता नहीं चलता था कि किसकी है। लोबान का धुआँ हवा के साथ घूमता हुआ गली के दूसरे छोर तक पहुँच जाता। चिड़िया किसी की छत पर बैठती, फिर किसी दूसरे की छत पर चली जाती। तितली को फूल का धर्म मालूम नहीं था और हवा को दीवारों का।


मोहल्ला चलता था।

फिर कुछ लोगों ने तय किया कि मोहल्ले को चलने नहीं देना चाहिए।

उन्होंने सबसे पहले बकरी को पकड़ा।

रामचरण की बगीची में सलीम की बकरी घुस गई थी।

पुराने जमाने में इसका इलाज बड़ा सरल था। रामचरण बकरी को भगाता, सलीम उसे पकड़ता और दोनों कुछ देर एक-दूसरे को देखकर अपने-अपने काम में लग जाते।

लेकिन अब जमाना बदल गया था।

बकरी के बगीची में घुसने को किसी ने मोबाइल पर रिकॉर्ड कर लिया।

वीडियो बना।

वीडियो के ऊपर संगीत लगा।

फिर एक उत्तेजक शीर्षक लगा।

फिर किसी ने कहा—“यह सिर्फ बकरी का मामला नहीं है।”

बस, यहीं से असली छौंक शुरू हुआ।

बकरी ने लौकी खाई थी, मगर चर्चा लोकतंत्र की होने लगी।

किसी ने कहा—“साजिश है।”

दूसरे ने कहा—“पुरानी साजिश है।”

तीसरे ने कहा—“हमने पहले ही चेतावनी दी थी।”

चौथे ने पूछा—“बकरी किसकी थी?”

पाँचवें ने कहा—“यही तो असली सवाल है।”

छठे ने कहा—“सवाल पूछने वाले से पूछिए कि वह किसके साथ है।”


अब तक बकरी चुपचाप जुगाली कर रही थी।

उसे शायद समझ नहीं आ रहा था कि उसने लौकी खाई है या देश की अखंडता।

टीवी पर बहस शुरू हो गई।

एक तरफ पाँच लोग थे, दूसरी तरफ पाँच लोग थे और बीच में एक एंकर था जो सबको एक साथ बोलने का राष्ट्रीय अवसर दे रहा था।

एंकर ने घोषणा की—

“आज का सबसे बड़ा सवाल—बकरी बगीची में क्यों घुसी? क्या इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है? हमारे साथ विशेषज्ञ मौजूद हैं।”

विशेषज्ञों में एक कृषि वैज्ञानिक था, एक पूर्व अधिकारी, एक सोशल मीडिया विश्लेषक और एक ऐसा व्यक्ति भी था जिसने पिछले पंद्रह वर्षों में हर विषय पर अपनी राय दी थी।

कृषि वैज्ञानिक ने कहा—“बकरी हरी सब्जियों की ओर आकर्षित होती है।”

एंकर ने उन्हें बीच में रोक दिया।

“लेकिन आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह सामान्य घटना है? क्या आप किसी बड़ी साजिश से इनकार कर रहे हैं?”

वैज्ञानिक चुप हो गया।

उसे पहली बार लगा कि विज्ञान से ज्यादा ताकतवर चीज होती है—टीआरपी।

अगले दिन सोशल मीडिया पर हैशटैग चल रहा था—

बकरी का सच,

कुछ ही देर में दूसरा हैशटैग आया—

बगीची खतरे में,

फिर तीसरा—

कौन है बकरी के पीछे,

लोगों ने बकरी के पुराने फोटो खोज लिए।

किसी ने दावा किया कि बकरी छह महीने पहले भी रामचरण की बगीची के आसपास देखी गई थी।

किसी ने उसके चलने के ढंग से उसकी मानसिकता समझ ली।

किसी ने उसके सींगों में षड्यंत्र देख लिया।

किसी ने कहा—“बकरी तो केवल मोहरा है।”

अब बकरी मोहरा थी।

रामचरण मोहरा था।

सलीम मोहरा था।

मोहल्ला मोहरा था।

बस, छौंक लगाने वाले खिलाड़ी थे।

उन्होंने घटना को कड़ाही में डाला और उसमें अपनी-अपनी मिर्च डालते गए।

किसी ने इतिहास का मसाला डाला।

किसी ने धर्म का।

किसी ने जाति का।

किसी ने राष्ट्र का।

किसी ने अपमान का।

और सोशल मीडिया ने ऊपर से इतना गरम तेल डाला कि देखते-देखते पूरी बस्ती धुआँ-धुआँ हो गई।


अब किसी को यह याद नहीं था कि विवाद शुरू किस बात पर हुआ था।

यह छौंक की सफलता थी।

छौंक लगाने वाले हमेशा यही चाहते हैं।

लोग कारण भूल जाएँ और स्वाद याद रखें।


अब मोहल्ले में नई सावधानियाँ बरती जाने लगीं।

किसी के घर से खुशबू आए तो पहले उसकी पहचान करो।

किसी की छत पर चिड़िया बैठे तो देखो कहाँ से आई है।

किसी की खिड़की से आती छाया पर भरोसा मत करो।

किसी के घर की अगरबत्ती तुम्हारे घर तक पहुँच जाए तो यह भी जाँच का विषय हो सकता है।

हवा पर तो विशेष निगरानी रखी गई।

हवा ने आपत्ति की।

कहा—“मैं तो हवा हूँ।”

लोगों ने कहा—“यही तो समस्या है। तुम कहीं की भी हो सकती हो।”

हवा चुप हो गई।

उसे पहली बार मनुष्य की राजनीति समझ में आई।

जिस हवा ने सदियों से मंदिर की घंटी और मस्जिद की अजान को एक ही आकाश में ढोया था, अब उससे पूछा जा रहा था कि वह किस ओर से आती है।

जिस धूप ने किसी का आँगन छोटा-बड़ा नहीं समझा था, उसके भी आने-जाने पर संदेह होने लगा।

मोहल्ले में लोग अब एक-दूसरे से कम और मोबाइल से ज्यादा बातें करने लगे।

सुबह उठते ही पड़ोसी का चेहरा देखने से पहले फोन देखा जाता।

कौन नाराज है?

कौन आहत है?

किसने किसे जवाब दिया?

किसने किसका वीडियो साझा किया?

किसने किसे देशद्रोही कहा?

किसने किसे प्रमाणपत्र दिया?

किसी को समय नहीं था कि वह सामने बैठे आदमी से पूछ सके—

“भाई, तुम्हारे घर में सब ठीक है?”


क्योंकि यह सवाल वायरल नहीं होता।

दुःख वायरल नहीं होता।

भूख वायरल नहीं होती।

बेरोजगारी वायरल नहीं होती।

बुजुर्ग की दवा वायरल नहीं होती।

पड़ोसी की बीमारी वायरल नहीं होती।

हाँ, एक आदमी दूसरे आदमी से नफरत करता दिखाई दे जाए तो वह खूब वायरल होता है।

क्योंकि नफरत में मसाला है।

और मसाले का बाजार बहुत बड़ा है।


मुझे लगता है, हमारे समय का सबसे सफल उद्योग यही है—छौंक उद्योग।

इसमें कच्ची घटनाएँ कहीं से भी उठाई जाती हैं।

उन्हें कड़ाही में डाला जाता है।

फिर मिर्च, नमक, इतिहास, धर्म, अपमान और शक मिलाया जाता है।

तेज आँच पर पकाया जाता है।

फिर सोशल मीडिया की प्लेट में परोसा जाता है।

लोग खाते हैं।

पचाते नहीं।

फिर अगली थाली माँगते हैं।


इस पूरे उद्योग में सबसे दुखद बात यह है कि असली बकरी अब भी वही है।

वह न राजनीति समझती है, न इतिहास।

उसे बस हरी सब्जी दिखाई देती है।

वह आज भी कभी-कभी किसी की बगीची में चली जाती है।

रामचरण आज भी उसे भगाता है।

सलीम आज भी उसे पकड़कर ले जाता है।

दोनों कभी-कभी अब भी एक-दूसरे को देखते हैं।

शायद दोनों के मन में आता है कि पहले ऐसा नहीं था।

पहले हम बकरी को बकरी समझते थे।

अब हम बकरी में इतिहास खोजते हैं।

सब्जी में पहचान।

खुशबू में षड्यंत्र।

हवा में पक्ष।

और पड़ोसी में दुश्मन।


मगर छौंक लगाने वाले संतुष्ट हैं।

उनका धंधा चल रहा है।

कड़ाही गरम है।

तेल पर्याप्त है।

मसाला भरपूर है।

और सबसे अच्छी बात यह है कि धुआँ उठते ही हमें दिखाई देना बंद हो जाता है कि सामने खड़ा आदमी कौन है।

हम आँखों में पानी लिए पूछते हैं—

“इतना धुआँ कहाँ से आ रहा है?”

छौंक लगाने वाला मुस्कराता है।

वह जानता है।

धुआँ दाल से नहीं उठ रहा।

धुआँ हमारे भीतर पकाई जा रही नफरत से उठ रहा है।

और जब तक हम यह पहचानेंगे, तब तक शायद रामचरण की बगीची में सब्जियाँ कम और राख ज्यादा बची होगी।

बकरी फिर भी कहीं न कहीं हरी घास खोज लेगी।

और आदमी?

उसे फिर से आदमी खोजने में बहुत समय लगेगा।

 

ब्रजेश कानूनगो