Tuesday, September 8, 2026

भौंकते - काटते माहौल में जीवन

भौंकते - काटते माहौल में जीवन

साधुरामजी आजकल बहुत चिंतित हैं। चिंता का कारण महँगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण या लोकतंत्र पर मंडराता कोई संकट नहीं, बल्कि मनुष्य में बढ़ती भौंकने और काटने की प्रवृत्ति है।

उनका मानना है कि आदमी और कुत्ते में अंतर तेजी से कम होता जा रहा है। कुत्ता सामने वाले को देखकर भौंकता है, आदमी मोबाइल देखकर। अंतर केवल इतना है कि कुत्ते का भौंकना गली तक सीमित रहता है और आदमी का भौंकना सोशल मीडिया के रास्ते पूरी दुनिया का चक्कर लगा आता है।

वैसे भौंकना कोई अस्वाभाविक क्रिया नहीं है। चिड़िया चहचहाती है, बकरी मिमियाती है, कौआ काँव-काँव करता है, कोयल कूकती है, गधा रेंकता है और मनुष्य बोलता है। बोलने से काम न चले तो वह चिल्लाता है, चिल्लाने से काम न चले तो गरजता है और गरजने से भी काम न बने तो भौंकने लगता है। लोकतंत्र ने उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है और सोशल मीडिया ने चौबीस घंटे का लाउडस्पीकर।

भौंकने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें तर्क की जरूरत नहीं पड़ती। तर्क देने के लिए पढ़ना पड़ता है, सोचना पड़ता है, तथ्य जुटाने पड़ते हैं। भौंकने के लिए केवल आवाज और आत्मविश्वास चाहिए। आजकल दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

पहले लोग अपनी बात कहते थे, फिर अपनी बात मनवाने लगे और अब अपनी बात ट्रेंड करवाने लगे हैं। विचार की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है। किसी खबर का सच सामने आने में समय लगता है, लेकिन उस पर भौंकने में एक सेकंड भी नहीं लगता। सोशल मीडिया ने इस कला को इतना लोकतांत्रिक बना दिया है कि अब हर जेब में एक छोटा-सा मंच और हर हाथ में एक अदृश्य माइक है।

लेकिन भौंकना अभी भी अपेक्षाकृत अहिंसक क्रिया है। असली समस्या काटने की है।

काटना केवल दाँतों से नहीं होता। शब्द भी काटते हैं, आरोप भी, व्यंग्य भी और कभी-कभी प्रेम भी। राजनीति में तो काटने की अनेक प्रजातियाँ विकसित हो चुकी हैं—टिकट काटना, पत्ता काटना, कद काटना, पद काटना और अंततः कुर्सी काटना। आज जो गले मिल रहा है, वह कल अवसर मिलते ही आपकी राजनीतिक जड़ काट सकता है।

सार्वजनिक जीवन में असहमति आवश्यक है। मगर असहमति जब तर्क छोड़कर व्यक्तिगत आक्रमण बन जाए तो लोकतांत्रिक संवाद की जगह दाँत दिखाई देने लगते हैं। विचार कमजोर पड़ते ही आवाज ऊँची होती है और तर्क समाप्त होते ही भाषा में नाखून निकल आते हैं।

सबसे विचित्र स्थिति यह है कि सब बोलना चाहते हैं, कोई सुनना नहीं चाहता। हर व्यक्ति प्रसारण केंद्र बना हुआ है और दूसरे के सिग्नल को जाम करने में व्यस्त है। परिणाम सामने है—संवाद कम हो रहा है, शोर बढ़ रहा है।

ऐसे में सरकार को ‘राष्ट्रीय भौंकन नियंत्रण मिशन’ शुरू कर देना चाहिए। विद्यालयों में बच्चों को सिखाया जाए कि असहमति जताने के लिए दाँत दिखाना जरूरी नहीं। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले एक छोटी-सी मशीन पूछे—‘क्या आपने सोचा भी है?’ और उत्तर ‘नहीं’ होने पर पोस्ट अपने आप ड्राफ्ट में चली जाए।

हालाँकि यह योजना सफल होगी, इसकी संभावना कम है। क्योंकि जिस समाज में भौंकने को विचार और काटने को तर्क समझने का चलन बढ़ रहा हो, वहाँ सबसे पहले उसी मशीन को ही संदिग्ध घोषित कर दिया जाएगा।

साधुरामजी ने जाते-जाते कहा—‘मित्र, भौंकने वालों से तो फिर भी बचा जा सकता है, काटने वालों से कैसे बचेंगे?’

मैंने कहा—‘बहुत आसान है। भौंकने वाले को देखकर रास्ता बदल लेना, काटने वाले को देखकर दूरी बना लेना और जो भौंकते भी हैं और काटते भी—उनका बहिष्कार करिए।’

साधुरामजी मेरी ओर देखने लगे। फिर बोले—‘और अगर वही लोग हमे घेर बैठे हों?’

मैंने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर एक कुत्ता लगातार भौंक रहा था और सामने से एक हाथी निर्विकार चला जा रहा था।

मैंने कहा—‘तब हाथी बन जाइए साधुरामजी। लोकतंत्र में भौंकने वालों की संख्या कभी कम नहीं होगी; असली संकट तब है, जब हाथी भी डरकर दिशा बदलने लगे।’

पता नहीं साधुरामजी मेरे सुझाव से संतुष्ट हुए या नहीं। 


ब्रजेश कानूनगो 

Monday, September 7, 2026

बेइज्ज़ती बटकर इज्जत पाती है

बेइज्ज़ती बटकर इज्जत पाती है

बेइज्जती भी बड़ी अदभुत चीज है। अकेले आपकी हो तो पूरी होती है, लेकिन उसमें किसी दूसरे को शामिल कर लिया जाए तो आधी रह जाती है। और अगर दूसरे के साथ तीसरे-चौथे को भी जोड़ लें तो बेइज्जती का प्रतिशत इतना कम हो जाता है कि आदमी उसे उपलब्धि बताकर घर लौट सकता है।

मान लीजिए आप किसी दफ्तर में गए और बाबू ने सबके सामने आपको डांट दिया। पहले जमाने में आदमी चुपचाप सिर झुकाकर बाहर निकल आता था। अब वह तुरंत किसी साथी को फोन करता है—“तुम्हें भी तो कल इसी बाबू ने सुनाया था?” साथी ने यदि कह दिया, “हाँ”, तो आत्मसम्मान को तत्काल प्राथमिक उपचार मिल जाता है। अब यह आपकी बेइज्जती नहीं रही, व्यवस्था की बेइज्जती हो गई।

स्कूल में बच्चा परीक्षा में फेल हो जाए तो मां-बाप कहते हैं, “इस बार तो पूरी क्लास ने ही खराब  प्रदर्शन किया है।” बच्चा घर में प्रवेश करते ही राहत की सांस लेता है। उसे शून्य मिले हों, लेकिन जब शून्य सामूहिक हो जाए तो वह सांख्यिकी बन जाता है। अकेला फेल छात्र असफल होता है, पूरी कक्षा फेल हो जाए तो शिक्षा व्यवस्था असफल हो जाती है।

राजनीति ने तो इस सिद्धांत को विज्ञान का दर्जा दे दिया है। चुनाव में हार हुई तो हार स्वीकार करने की जरूरत नहीं। तुरंत बताया जाता है कि फलां नेता भी हारा, फलां पार्टी भी हारी, दुनिया के इतने देशों में भी सत्ताधारी दल हारे हैं। अपनी हार को वैश्विक प्रवृत्ति में मिला देने से इज्जत का कुछ हिस्सा बचा रहता है। यदि हार बहुत बड़ी हो तो हारने वालों का सम्मेलन बुला लिया जाता है। वहां हर व्यक्ति दूसरे की हार देखकर अपनी हार को सांत्वना पुरस्कार समझता है।

व्यापार में भी यही नीति है। दुकान पर ग्राहक न आएं तो दुकानदार अकेले उदास क्यों हो? सामने वाले दुकानदार को भी बुलाकर पूछता है—“तुम्हारे यहां कितने ग्राहक आए?” जवाब अगर शून्य हुआ तो दोनों के चेहरे खिल जाते हैं। बाजार मंदा है, यह निष्कर्ष निकलता है। अपनी दुकान की कमजोरी अब राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की समस्या बन चुकी होती है। मंदी वैश्विक होने पर तो यह गौरव की बात है, हम दुनिया के साथ जो हो जाते हैं।

सोशल मीडिया ने इस कला को और लोकप्रिय कर दिया है। किसी की तस्वीर पर दस लोगों ने भद्दी टिप्पणी कर दी तो वह अकेला अपमानित नहीं होता। वह स्क्रीनशॉट लेकर सार्वजनिक कर देता है। अब अपमान करने वाले दस हैं और अपमानित होने वाला अकेला नहीं। भीड़ जितनी बड़ी, आत्मसम्मान उतना सुरक्षित।

मनुष्य ने शायद इसी कारण भीड़ का आविष्कार किया था। अकेले डर लगता है, भीड़ में बहादुरी आती है। अकेले गलत बोलने में शर्म आती है, दस लोग वही गलत बात बोलें तो वह विचारधारा बन जाती है। अकेले भ्रष्टाचार अपराध लगता है, सब मिलकर करें तो व्यवस्था कहलाता है। अकेले मूर्ख दिखना कठिन है, लेकिन समूह में मूर्खता सामूहिक बुद्धिमत्ता का रूप धारण कर लेती है।

इसलिए आज का समझदार आदमी बेइज्जती से बचता नहीं, उसका साझीदार खोजता है। वह कहता है—“मेरी ही क्यों? तुम्हारी भी हुई थी न?”

और यही वह क्षण है जब आधी इज्जत बच जाती है। बाकी आधी इज्जत के लिए वह किसी तीसरे की तलाश में निकल पड़ता है।

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, September 3, 2026

भाषा में स्लैंग : जिंदगी का कपड़ा पॉलिएस्टर हो गया है

भाषा में स्लैंग : जिंदगी का कपड़ा पॉलिएस्टर हो गया है

भाषा बड़ी लोकतांत्रिक चीज है। वह संसद से पास होकर नहीं आती, न शब्दकोश से अनुमति लेकर जन्म लेती है। लोग बोलते-बोलते शब्द गढ़ते हैं, फिर उन शब्दों को चलन में लाते हैं और एक दिन भाषा के पंडित उन्हें स्लैंग कहकर अलग खाने में रख देते हैं। स्लैंग दरअसल भाषा की वह गली है जहाँ व्याकरण जूते उतारकर बैठ जाता है और रचनात्मकता बिना टिकट अंदर चली जाती है।

हर पीढ़ी ने अपनी स्लैंग बनाई है। कभी ‘कूल’, ‘हिप’, ‘ड्यूड’, ‘भौकाल’, ‘झकास’, ‘चमचा’ और ‘फंडा’ जैसे शब्द अपनी धाक जमाते थे। ‘चमचा’ रसोई का उपकरण कम और राजनीतिक चरित्र का प्रमाणपत्र अधिक था। ‘कूल’ का तापमान से कोई संबंध नहीं था। आदमी पसीने में तर हो सकता था, फिर भी कूल कहलाता था।

आज जेन जी ने स्लैंग को सोशल मीडिया की स्पीड दे दी है। ‘Rizz’- 'रिज ' आकर्षण की क्षमता है, ‘Ghosting’-  'घोस्टिंग' बिना बताए  बताए किसी रिश्ते से गायब हो जाना, ‘Delulu’ - 'डेलुलु'  अपनी कल्पनाओं को वास्तविकता से ज्यादा सच मानना और ‘NPC’ -  'एनपीसी' ऐसे व्यक्ति के लिए है जो अपनी स्वतंत्र सोच खोकर किसी डिजिटल किरदार जैसा व्यवहार करता दिखाई दे। ‘Aura’- 'औरा' अब आभा से ज्यादा किसी व्यक्ति के प्रभाव और स्टाइल का प्रमाण है। और अब नया शब्द है—पॉलिएस्टर।

पहले पॉलिएस्टर कपड़े में होता था, अब जिंदगी में होने लगा है। जेन जी के स्लैंग में ‘पॉलिएस्टर’ उस बनावटी, कृत्रिम और जरूरत से ज्यादा चमकदार जीवन का संकेत बन रहा है जो देखने में आकर्षक हो, लेकिन भीतर से नकली हो। सोशल मीडिया पर ऐसी जिंदगी की भरमार है। सुबह योग, फिर ऑर्गेनिक नाश्ता, उसके बाद समुद्र किनारे लैपटॉप, दोपहर में ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ पर पोस्ट और शाम को सूर्यास्त के सामने मुस्कराता चेहरा। पूरा दिन देखकर लगता है आदमी जीवन नहीं जी रहा, जीवन की विज्ञापन फिल्म शूट कर रहा है। यही पॉलिएस्टर है।

मजेदार बात यह है कि पुरानी पीढ़ी भी इस बीमारी को पहचानती थी। वह कहती थी—‘दिखावा मत करो’, ‘नौटंकी मत करो’, ‘बनावटी मत बनो।’ नई पीढ़ी ने वही बात कहने के लिए एक शब्द खोज लिया। अंतर सिर्फ इतना है कि पहले उपदेश मिलता था, अब स्लैंग में व्यंग्य मिलता है।

सोशल मीडिया ने आदमी को जीवन का अभिनेता ही नहीं, निर्देशक, कैमरामैन और प्रचारक भी बना दिया है। पहले लोग अच्छा जीवन जीते थे और उसकी तस्वीर कभी-कभार दिखाते थे। अब तस्वीर अच्छी दिखे, इसके लिए जीवन को व्यवस्थित किया जाता है। पहले यात्रा याद रखने के लिए फोटो खींची जाती थी, अब फोटो डालने के लिए यात्रा की जाती है। पहले खाना खाया जाता था, फिर कभी उसकी तस्वीर दिखाई जाती थी। अब खाना आने से पहले कैमरा आ जाता है।

विडंबना यह है कि नकलीपन की आलोचना भी उसी सोशल मीडिया पर हो रही है जिसने नकलीपन को सबसे बड़ा बाजार दिया है। कोई ‘पॉलिएस्टर लाइफ’ पर पोस्ट डालकर अपनी ही जिंदगी को फिल्टर कर रहा है। नकलीपन का विरोध भी कभी-कभी नकली हो जाता है। यहीं स्लैंग महज युवा फैशन नहीं रह जाती, वह सामाजिक टिप्पणी बन जाती है। ‘प्लास्टिक’ कभी कृत्रिम मुस्कान और बनावटी व्यवहार का रूपक बना था। ‘फेक’ ने नकली पहचान और झूठी सूचनाओं की दुनिया को नाम दिया। अब ‘पॉलिएस्टर’ शायद उस समय का रूपक है जिसमें मनुष्य ने अपनी वास्तविकता पर भी चमकदार आवरण चढ़ा लिया है।

भाषा में नए शब्दों का आना अच्छी बात है। भाषा तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ियाँ उसमें अपने अनुभवों के लिए नए नाम खोजती हैं। आज का स्लैंग कल का सामान्य शब्द बन सकता है। ‘कूल’ कभी नया था, आज सामान्य है। कई शब्द जिन्हें कभी अशिष्ट समझा गया, बाद में शब्दकोश में सम्मानपूर्वक बैठ गए।

लेकिन खतरा शब्दों में नहीं, जीवन में है। स्लैंग बदलती रहे, कोई समस्या नहीं। समस्या तब है जब हमारी असल जिंदगी भी स्लैंग बन जाए—क्षणिक, चमकदार और संदर्भ बदलते ही बेकार। इसलिए ‘पॉलिएस्टर’ को सिर्फ जेन जी का नया मजाक समझना भूल होगी। यह हमारे समय का आईना भी है।

कपड़े में पॉलिएस्टर सस्ता, टिकाऊ और चमकदार हो सकता है। लेकिन चरित्र में पॉलिएस्टर हो तो चमक जितनी बढ़ेगी, नकलीपन उतना ही साफ दिखाई देगा।

ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, September 2, 2026

जब तर्क की छुट्टी हो जाती है

जब तर्क की छुट्टी हो जाती है

विचार मनुष्य को मनुष्य बनाता है और तर्क उसे सभ्य बनाए रखता है। लेकिन जब विचार रास्ते में ही दम तोड़ दे और तर्क घर से निकलने से पहले ही डर जाए, तब आदमी के पास बचता क्या है? आवाज। और आवाज भी ऐसी कि पड़ोसी का कुत्ता तक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर विचार करने लगे।

सभ्यता ने मनुष्य को बोलने की आजादी दी थी, लेकिन हमने उसका एक नया संस्करण खोज लिया है—दूसरे को बोलने न देने की आजादी। अब बहस में सबसे ताकतवर तर्क वह नहीं है जो सही हो, बल्कि वह है जो सबसे ज्यादा शोर पैदा कर सके। विचार कमजोर पड़ते ही माइक मजबूत हो जाता है। तथ्य पीछे हटते हैं और हुल्लड़ आगे आकर कुर्सी संभाल लेता है।

पहले किसी मत से असहमति होती थी तो उसके जवाब में दूसरा मत प्रस्तुत किया जाता था। अब असहमति का सबसे आसान उपाय है—असहमत व्यक्ति की आवाज बंद कर दो। वह कुछ कहे तो उसे देशद्रोही, मूर्ख, बिकाऊ, नासमझ या किसी सुविधाजनक विशेषण से सम्मानित कर दो। इससे बहस भी समाप्त और बुद्धि की मेहनत भी बची।

तर्क में एक बड़ी समस्या है। उसमें तैयारी करनी पड़ती है। पढ़ना पड़ता है, सोचना पड़ता है और सामने वाले की बात भी सुननी पड़ती है। हुल्लड़ में ऐसा कोई झंझट नहीं। वहाँ केवल फेफड़ों की क्षमता और चेहरे की कठोरता चाहिए। जिसे अपनी बात पर भरोसा नहीं होता, वह अपनी मुट्ठी पर भरोसा करने लगता है।

आजकल तर्क-वितर्क का स्तर भी आधुनिक हो गया है। पहले कहा जाता था—‘मैं आपकी बात से सहमत नहीं।’ अब कहा जाता है—‘आप बोलिए मत।’ पहले प्रश्न का उत्तर दिया जाता था, अब प्रश्न पूछने वाले की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। प्रश्न कठिन हो तो उत्तर देने के बजाय प्रश्नकर्ता को ही कठिन बना दो।

हुल्लड़ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसमें जीतने के लिए सही होना जरूरी नहीं। बस इतना जरूरी है कि सामने वाला बोल न पाए। लोकतंत्र में बहुमत की आवाज सुनी जाती है, लेकिन हुल्लड़तंत्र में सबसे ऊँची आवाज ही बहुमत मान ली जाती है।

इसका असर समाज के हर कोने में दिखाई देता है। घर में बहस हो तो आवाज ऊँची, दफ्तर में मतभेद हो तो मेज पर मुक्का, सड़क पर विवाद हो तो भीड़ तैयार। सोशल मीडिया ने तो इस कला को विश्वव्यापी बना दिया है। वहाँ तर्क का जवाब गाली से और तथ्य का जवाब ट्रोल से दिया जा सकता है।

दरअसल गुंडागर्दी अक्सर विचारहीनता की लाठी होती है। जिसके पास विचार है, वह समझाता है; जिसके पास तर्क है, वह प्रमाण देता है; जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह धमकाता है।

इसलिए जब किसी बहस में अचानक शोर बढ़ने लगे तो समझ लेना चाहिए कि विचार की बैटरी खत्म हो चुकी है। अब तर्क चार्जर खोज रहा है और हुल्लड़ ने सत्ता की कुर्सी पर कब्जा कर लिया है।

सभ्यता की असली परीक्षा यह नहीं कि हम कितनी जोर से बोल सकते हैं, बल्कि यह है कि विरोधी की बात सुनते समय हम कितनी देर तक चुप रह सकते हैं।

ब्रजेश कानूनगो 

Tuesday, September 1, 2026

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है 

व्यस्त आदमी को देखकर हमें हमेशा लगता है कि वह बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहा है। उसके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें होती हैं, हाथ में मोबाइल होता है, कान पर फोन और चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के निर्णय पर टिकी हो। वह सुबह से शाम तक इधर-उधर भागता रहता है। उसके पास किसी से मिलने का समय नहीं होता, आराम करने का समय नहीं होता और कभी-कभी अपने बारे में सोचने का भी समय नहीं होता। फिर भी वह संतुष्ट रहता है कि वह व्यस्त है।

बेकार आदमी की स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है। उसके पास समय ही समय होता है और यही उसका सबसे बड़ा संकट है। समय काटना कोई साधारण काम नहीं है। व्यस्त आदमी तो अपना काम करके समय निकाल लेता है, लेकिन बेकार आदमी को समय निकालने के लिए पहले समय काटना पड़ता है। इसके लिए जिस अक्ल की आवश्यकता होती है, वह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती।

बेकार आदमी सुबह उठकर सबसे पहले यह तय करता है कि आज उसे करना क्या नहीं है। यह निर्णय ही दिन का पहला महत्वपूर्ण कार्य होता है। इसके बाद वह मोबाइल उठाता है और संसार की सारी समस्याओं का समाधान करने निकल पड़ता है। वह उन खबरों पर टिप्पणी करता है जिन्हें उसने पढ़ा नहीं, उन विषयों पर विशेषज्ञ राय देता है जिन्हें वह समझता नहीं और उन लोगों को सलाह देता है जिन्होंने उससे सलाह मांगी ही नहीं।

सोशल मीडिया ने बेकार आदमी को समय काटने का ऐसा विराट औजार दे दिया है कि अब उसे अपने बेकार होने का अहसास भी नहीं होता। वह सुबह किसी पोस्ट पर ‘शुभ प्रभात’ लिखकर राष्ट्रनिर्माण शुरू करता है और रात को ‘शुभ रात्रि’ लिखकर राष्ट्र को विश्राम देता है। बीच में वह दर्जनों वीडियो देखता है, सैकड़ों संदेश आगे बढ़ाता है और कई महत्वपूर्ण लोगों को यह बताता है कि देश की हालत बहुत खराब है।

व्यस्त आदमी की अक्ल समस्या हल करने में लगती है, जबकि बेकार आदमी की अक्ल समस्या खोजने में। घर में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो वह पूछेगा—इतना ठीक कैसे चल रहा है? कोई बीमार न हो तो बीमारी की संभावना तलाशेगा। पड़ोसी के घर शांति हो तो उसे शक होगा कि जरूर कोई बड़ी बात छिपाई जा रही है।

बेकार आदमी को दूसरों के काम में विशेष रुचि होती है। उसे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं कि उसकी अपनी अलमारी कब साफ होगी, लेकिन पड़ोसी ने नया पर्दा क्यों लगाया, यह राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है। उसे अपने खर्च का हिसाब नहीं मालूम, पर मोहल्ले में किसने कितना खर्च किया, इसकी पूरी जानकारी होती है।

हमारे समाज ने भी बेकार आदमी को कभी बेकार नहीं रहने दिया। कहीं समिति बना दी, कहीं सलाहकार मंडल, कहीं व्हाट्सऐप समूह। जिसे कोई काम नहीं मिला, उसे पद मिल गया। जिसे पद नहीं मिला, उसे प्रवक्ता बना दिया गया। जिसे प्रवक्ता भी नहीं बनाया जा सका, उसने स्वयं को विशेषज्ञ घोषित कर लिया।

दरअसल बेकारी हमेशा निष्क्रियता नहीं होती। कई बार यह अत्यधिक सक्रियता का दूसरा नाम होती है। बेकार आदमी दौड़ता बहुत है, बस किसी मंजिल की ओर नहीं जाता। वह बोलता बहुत है, पर कहता कुछ नहीं। वह व्यस्त दिखाई देने की कला में इतना निपुण हो जाता है कि कभी-कभी व्यस्त आदमी भी उससे ईर्ष्या करने लगता है।

व्यस्त आदमी के पास घड़ी होती है और बेकार आदमी के पास समय। व्यस्त आदमी समय बचाता है, बेकार आदमी समय की ऐसी धुलाई करता है कि दिन समाप्त होने पर भी उसे लगता है कि आज कुछ किया ही नहीं।

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—उसने कुछ न करते हुए भी  दिन  पूरा कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो 


आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता

आत्मविश्वास  के बाजार में मूर्खता 

आत्मविश्वास आदमी की बड़ी संपत्ति है। जिसके पास धन है, उसे धन का आत्मविश्वास होता है। जिसके पास बल है, वह अपनी भुजाओं पर भरोसा करता है। जिसके पास ज्ञान है, वह तर्क और तथ्यों के सहारे खड़ा रहता है। लेकिन इन सब आत्मविश्वासों में मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अलग है। यह न धन माँगता है, न बल और न ज्ञान। यह अपने आप पैदा होता है और बढ़ते-बढ़ते इतना विराट हो जाता है कि उसके सामने ज्ञान स्वयं असहाय दिखाई देने लगता है।

ज्ञानी व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है। मूर्ख व्यक्ति सोचने को समय की बर्बादी मानता है। ज्ञानी कहता है—‘मुझे इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है।’ मूर्ख कहता है—‘इसमें जानने जैसा है ही क्या?’ यही उसकी महानता है। उसे किसी विषय को जानने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वह पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना चुका होता है।

मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अधिक तब दिखाई देता है जब सामने प्रमाण रख दिया जाए। प्रमाण मूर्ख के लिए परेशानी की वस्तु है। वह प्रमाण को देखकर विचलित नहीं होता, बल्कि प्रमाण देने वाले की नीयत पर संदेह करने लगता है। आँकड़े गलत हो सकते हैं, किताबें पक्षपाती हो सकती हैं, वैज्ञानिक बिके हुए हो सकते हैं, विशेषज्ञ किसी साजिश का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी समझ में कभी कोई दोष नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया ने इस आत्मविश्वास को चार चाँद लगा दिए हैं। पहले किसी विषय का जानकार बनने के लिए वर्षों पढ़ना पड़ता था। अब किसी संदेश को तीन बार पढ़कर आगे भेज देना ही पर्याप्त है। सुबह आदमी डॉक्टर बनकर स्वास्थ्य सलाह देता है, दोपहर को अर्थशास्त्री बनकर महँगाई का इलाज बताता है और शाम को अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ बनकर विश्वशांति की योजना पेश कर देता है। उसकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि उसके पास मोबाइल है और उसे ‘फॉरवर्ड’ का बटन दबाना आता है।

लोकतंत्र में मूर्खता का आत्मविश्वास और भी उपयोगी सिद्ध होता है। यहाँ हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है और मूर्ख इस अधिकार का सबसे अधिक सम्मान करता है। वह बोलता है—लगातार बोलता है—और इतनी निश्चितता से बोलता है कि सुनने वाला अपने ज्ञान पर ही संदेह करने लगता है। कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित व्यक्ति वही है जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान नहीं है।

कार्यालयों में भी इसका महत्व कम नहीं। जो कर्मचारी काम जानता है, वह समस्या बताता है। जो नहीं जानता, वह समाधान बताता है। काम बिगड़ जाए तो कह देता है कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। काम बन जाए तो श्रेय उसका। इस प्रकार मूर्खता का आत्मविश्वास व्यक्ति को हर परिणाम में विजेता बनाए रखता है।

राजनीति में तो यह आत्मविश्वास वरदान है। आज कही गई बात कल बदल जाए तो कोई समस्या नहीं। चेहरे पर शिकन नहीं आनी चाहिए। जनता भूल जाएगी, रिकॉर्ड बदल जाएगा, बयान का अर्थ बदल दिया जाएगा। सबसे जरूरी है कि वक्ता स्वयं अपनी बात पर विश्वास करता हुआ दिखाई दे। आखिर जनता को सत्य नहीं, आत्मविश्वास भी तो चाहिए।

मूर्ख व्यक्ति की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि उसे कभी अपने भीतर झाँकना नहीं पड़ता। आत्ममंथन ज्ञानी की बीमारी है। मूर्ख के पास इसका समय नहीं होता। वह दूसरों की कमियाँ खोजने में व्यस्त रहता है। दुनिया गलत है, व्यवस्था गलत है, लोग गलत हैं—बस वह सही है।

इसलिए आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता सबसे महँगी बिक रही है। ज्ञान प्रमाण माँगता है, धन सुरक्षा माँगता है और बल अवसर। मूर्खता को केवल एक खुला मुँह चाहिए।

और शायद इसी कारण मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि है—क्योंकि बाकी सभी आत्मविश्वासों को कभी न कभी अपनी सीमा का पता चल जाता है, मूर्खता को अपनी सीमा का पता ही नहीं चलता।

ब्रजेश कानूनगो 



Tuesday, August 25, 2026

महंगाई सुरसा भई!

महंगाई सुरसा भई! 

महंगाई अब आर्थिक समस्या भर नहीं रही। वह हमारे राष्ट्रीय जीवन की स्थायी सदस्य बन चुकी है। महंगाई सुरसा हो गई है। आदमी अपने खर्च को जितना छोटा करता है, उसका मुँह उतना ही बड़ा होता जाता है। पहले सब्जी महँगी हुई तो दाल का सहारा लिया। दाल महँगी हुई तो आलू बचा। आलू ने भी आँखें तरेरीं तो दूध रोटी की ओर देखा। दूध महंगा हुआ तो चटनी की ओर देखा। अब रोटी भी ऐसी लगती है जैसे कोई पुराना रिश्तेदार हो। 

घर का बजट अब बजट नहीं, शोकपत्र हो गया है। वेतन आते ही राशन, बिजली, गैस, स्कूल की फीस, दवा और किराया उसे बाँट लेते हैं। महीने के अंत में जेब में जो बचता है, उसे बचत कहा जाता है। यह अलग बात है कि उसे बचाने के लिए आदमी को अपने कई छोटे-छोटे सुखों की हत्या करनी पड़ती है।

महंगाई ने आदमी को अर्थशास्त्री बना दिया है। गृहिणी बाजार जाने से पहले ऐसी गणना करती है कि बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के ग्राफ उसके सामने फीके लगें। बाजार में अब लोग खरीदारी कम और कीमत पूछने का अभ्यास अधिक करते हैं। कीमत सुनकर ग्राहक वस्तु को देखता है, फिर दुकानदार को और अंततः अपनी जेब को। तीनों के बीच एक मौन समझौता होता है और वस्तु वहीं रह जाती है।

राजनीतिज्ञों  का महंगाई से पुराना रिश्ता है। चुनाव के पहले नेता जनता के सामने याचक होता है। हाथ जुड़े होते हैं, आवाज में मिठास होती है और जनता को मालिक बताया जाता है। सत्ता मिलते ही दृश्य बदल जाता है। याचक भरतार हो जाता है और जनता फिर याचक।

जनता पूछती है—महंगाई क्यों बढ़ी?

उत्तर आता है—वैश्विक परिस्थितियाँ कठिन हैं।

जनता कहती है—घर चलाना मुश्किल है।

उत्तर मिलता है—अर्थव्यवस्था मजबूत है।

जनता रोजगार पूछती है तो आत्मनिर्भर बनने की सलाह मिलती है। कीमत पूछती है तो विकास का आँकड़ा सामने रख दिया जाता है। इस तरह हर सवाल का उत्तर मिल जाता है, सिवाय उस सवाल के जो वास्तव में पूछा गया था।

आँकड़े महंगाई का सबसे सुविधाजनक पर्दा हैं। जनता कहती है कि थैला खाली हो गया, विशेषज्ञ बताते हैं कि महंगाई दर नियंत्रित है। जनता अपनी जेब दिखाती है, सरकार ग्राफ दिखाती है। ग्राफ ऊपर-नीचे होता रहता है, लेकिन रसोई का खर्च लगातार ऊपर जाता रहता है।

कुर्सी पर बैठते ही आदमी जमीन से थोड़ा दूर हो जाता है। नीचे खड़ी जनता कहती है कि दाल महँगी है, ऊपर बैठे लोग बताते हैं कि देश विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है। जनता पूछती है कि उस बड़ी अर्थव्यवस्था में उसकी छोटी-सी रोटी कहाँ है, तो उत्तर राष्ट्रहित की ऊँचाई पर चला जाता है।

महंगाई केवल कीमतें नहीं बढ़ाती, इच्छाएँ घटाती है। बच्चे की छोटी माँग टलती है, बीमारी का इलाज टलता है, कपड़ों की खरीद टलती है, घूमना टलता है। धीरे-धीरे आदमी जीवन जीने के बजाय केवल जीवन चलाने लगता है।

जनता को शरबत पीने की सलाह देने से पहले यह देखना होगा कि उसके घर में पानी तो है, शकर किस भाव मिल रही है ।

महंगाई का दैत्य अब इतना बड़ा हो गया है कि उससे लड़ना समय की मांग है। सत्ता चाहे जिसकी हो, जनता का सवाल वही रहेगा—रोटी कितनी महँगी है और जीवन कितना बचा है? बाकी सब जवाब हैं। बस हिसाब नहीं।


ब्रजेश कानूनगो