कोई है जो धड़कनों को सुनता है !
शहर में इन दिनों संगीत बहुत है, सुनने वाला कोई नहीं। इधर सारंगी बज रही है, उधर सितार। मंचों पर सुरों की ऐसी बहार है कि लगता है शहर की सारी संवेदनाएँ संगीत विभाग को ठेके पर दे दी गई हैं। बस एक छोटी-सी समस्या है, जिस आदमी के घर में मातम पसरा है, उसे इन सुरों में अपनी धड़कन सुनाई नहीं देती। धड़कनों का भी अपना स्वभाव होता है। वे सच बोलती हैं। शायद इसी कारण उनसे बचने के लिए चारों तरफ संगीत बजता रहता है।
लोगों ने जीवन भर जो थोड़ा-बहुत जमा किया था, उसे बड़ी उम्मीद से संभालकर रखा। सोचा था, मुश्किल समय में काम आएगा। लेकिन मुश्किल समय आने से पहले ही मालूम हुआ कि उसकी निगरानी करने वाले ही उसे दुश्मनों में बाँट चुके हैं। अब शिकायत किससे करें? जिसे घर का चौकीदार समझकर चाबी सौंपी थी, उसी ने पड़ोसियों को बुलाकर संदूक खोल दिया। और कमाल यह कि संदूक अब भी हमारे घर में ही पड़ा है, बस उसकी चाबी किसी और की जेब में है।
लूट की यह नई व्यवस्था बड़ी विनम्र है। लुटेरा घर में घुसता नहीं, पहले अनुमति लेता है। संदूक उठाता नहीं, उसे वहीं रहने देता है। बस खूंटी बदल देता है। फिर समझाता है कि संपत्ति सुरक्षित है। सुरक्षित है—यह बात सही है। बस मालिक बदल गया है।
उधर घर के आगे अंधेरा घना होता जा रहा है। मगर इस अंधेरे को लेकर भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। शहर के दूसरे छोर पर चकाचौंध की पर्याप्त व्यवस्था है। वहाँ रोशनी इतनी है कि अंधेरे में खड़े लोगों को भी विश्वास होने लगता है कि वे उजाले में हैं।
दुःख का समंदर जरूर गहरा है। उसमें खार भी कम नहीं हुई। फिर भी जाने कैसे दिल में मोहब्बत का थोड़ा-सा नीर बचा हुआ है। लोग अब भी किसी डूबते हुए आदमी की तरफ हाथ बढ़ा देते हैं।शायद यही आखिरी मुसीबत है। क्योंकि जिस दिन आदमी दूसरे आदमी का दुःख पहचानने लगेगा, उस दिन उसे यह समझाना कठिन होगा कि उसका असली दुश्मन कौन है।
इसलिए सच और झूठ के बीच एक दुधारी तलवार टाँग दी गई है। तलवार दिखाई नहीं देती, मगर हर आदमी उसके नीचे खड़ा है। वह जो कहता है, उस पर शक है; जो सुनता है, उस पर भी शक है; और जो चुप रहता है, उसकी चुप्पी पर सबसे ज्यादा शक है।
सच बेचारा अपनी सफाई देता रहता है। झूठ को सफाई की जरूरत नहीं पड़ती। वह बस चमकता है। और हाकिम को चमक बहुत पसंद है। उसे लगता है कि चकाचौंध ही विकास का प्रमाण है। वह जब रोशनी में खड़ा होता है तो उसे अंधेरे की शिकायत दिखाई नहीं देती। जब संगीत बजता है तो उसे धड़कनों की आवाज नहीं सुनाई देती। जब तालियाँ बजती हैं तो उसे दुःख के समंदर की लहरें सुनाई नहीं देतीं।
फिर वह घोषणा करता है - मसले खत्म होंगे। मुश्किलें कम होंगी।अंधेरा छँटेगा।संदूक सुरक्षित रहेंगे। सच की जीत होगी।
जनता सुनती है। फिर अपने घर लौटती है। संदूक उसी खूंटी से बंधा मिलता है, अंधेरा वहीं खड़ा मिलता है, दिल में मोहब्बत का नीर अब भी बाकी मिलता है और सीने पर संदेह की वही अदृश्य तलवार तनी मिलती है। बस एक चीज बदलती है, सारंगी और सितार की आवाज कुछ और तेज हो जाती है।
कोई यह पूछ ही नहीं पाता कि धड़कनों को सुनने वाला आखिर है कौन?
ब्रजेश कानूनगो