घर की अर्थव्यवस्था में डिजिटल क्रांति का स्वाद
घर में शकर खत्म हो गई थी। पत्नी ने चाय का कप सामने रखते हुए पूछा, “जरा बाजार से शकर लेते आना। और हाँ, आटा भी खत्म होने वाला है, तेल भी बस दो दिन का बचा है।”
पति मोबाइल में आँखें गड़ाए बैठा था। बोला, “अभी देश में महँगाई पर बड़ी गंभीर बहस चल रही है। जरा खत्म हो जाए तो निकलता हूँ।”
पत्नी ने स्क्रीन पर झाँका। वहाँ महँगाई पर बहस नहीं, एक वीडियो में कोई महाशय बता रहे थे कि सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से शरीर के सारे रोग दूर हो जाते हैं।
“यह क्या देख रहे हो?”
“ज्ञान प्राप्त कर रहा हूँ। आजकल ज्ञान मुफ्त है, बस डाटा खर्च होता है।”
पत्नी ने ताना मारा, “ज्ञान से पेट भरता हो तो रसोई में रखे खाली डिब्बे भी भर दो।”
पति ने बात अनसुनी कर दी। दरअसल, उसे महँगाई से कोई खास शिकायत नहीं थी। शकर महँगी हो, तेल महँगा हो, आटा महँगा हो, गैस सिलेंडर बजट बिगाड़ दे, इससे उसकी डिजिटल दिनचर्या पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। महीने की शुरुआत में वह सबसे पहले मोबाइल का रिचार्ज करवाता था। बाकी खर्चे बाद में देखे जाते थे। रोटी एक समय कम खाई जा सकती थी, लेकिन मोबाइल का डाटा खत्म हो जाए तो जीवन में एकाएक राष्ट्रीय आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती थी।
उसके लिए महँगाई का असली पैमाना बाजार में सब्जियों के भाव नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाला डाटा बैलेंस था। सब्जीवाला उधार देने से मना कर दे तो कोई बात नहीं, लेकिन इंटरनेट की गति धीमी हो जाए तो वह सेवा प्रदाता कंपनी को देश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा संकट मानने लगता था।
उसका तर्क भी सीधा था। “भाई, शकर से मिठास आती है, मान लिया। लेकिन मोबाइल से जीवन में मिठास आती है। रिश्तेदारों के जन्मदिन याद रहते हैं, मित्रों की उपलब्धियों का पता चलता है, त्योहारों पर शुभकामनाएँ भेजी जाती हैं। दुनिया भर के लोग घर बैठे मिल जाते हैं। अब बताइए, इतने लाभ के सामने दो रोटी कम खाने में क्या हर्ज है?”
पत्नी ने कहा, “रिश्तेदारों को शुभकामनाएँ भेजने से अच्छा है, कभी किसी के घर जाकर मिल भी आया करो।”
“तुम पुराने जमाने की बातें करती हो। अब रिश्ते निभाने के लिए कहीं आने-जाने की जरूरत नहीं। एक फूल, दो हाथ जोड़ते इमोजी और नीचे लिख दो—सपरिवार शुभकामनाएँ। रिश्ता भी निभ गया, पेट्रोल भी बच गया और समय भी।”
वह सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय था। सुबह उठते ही देशभक्ति का संदेश, फिर संस्कृति बचाने की अपील, दोपहर में पर्यावरण पर चिंता, शाम को महँगाई के विरुद्ध आक्रोश और रात को किसी आध्यात्मिक गुरु का प्रवचन। दिन भर में उसने देश की लगभग सारी समस्याएँ हल कर दी थीं। बस अपने घर की समस्याओं के लिए उसके पास समय नहीं था।
एक दिन पड़ोसी ने बताया कि उसकी नौकरी चली गई है। वह बहुत परेशान है। पति ने तुरंत उसके मोबाइल पर एक संदेश भेजा—‘हिम्मत मत हारिए, हर अँधेरी रात के बाद सुबह होती है।’
पड़ोसी ने फोन करके कहा, “भाई, सुबह तो होगी, लेकिन कल बच्चों की फीस कैसे भरूँ?”
पति कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “देखो, इस समय मैं थोड़ी जरूरी ऑनलाइन मीटिंग में हूँ। बाद में बात करता हूँ।”
मीटिंग दरअसल मित्रों के व्हाट्सऐप समूह में चल रही थी, जहाँ एक नया चुटकुला आया था और उस पर ठहाकों की प्रतियोगिता हो रही थी।
धीरे-धीरे उसे विश्वास हो गया था कि आभासी दुनिया में कोई नुकसान नहीं होता। वहाँ झूठी खबर आगे बढ़ा दो तो उँगली भर हिलानी पड़ती है, किसी को अपमानित कर दो तो चेहरा सामने नहीं होता, किसी की पीड़ा पर हँस दो तो उसकी आँखों में आँसू भी नहीं दिखते। वास्तविक दुनिया में किसी की मदद करने के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है, समय देना पड़ता है, कभी-कभी अपने आराम का त्याग भी करना पड़ता है। आभासी दुनिया में केवल एक क्लिक से दयालु, देशभक्त, संवेदनशील और क्रांतिकारी बना जा सकता है।
हाँ, कभी-कभी कोई ठगी का संदेश आ जाता, कोई निजी जानकारी चुरा लेता या किसी फर्जी लिंक से खाते में सेंध लग जाती। तब उसे आभासी दुनिया के खतरों का एहसास होता। लेकिन अगले ही दिन कोई नया वीडियो, नया विवाद और नया संदेश उसे फिर उसी दुनिया में खींच लेता। आखिर खतरे भी तो वहीं थे जहाँ जीवन था!
एक शाम पत्नी ने फिर हिसाब सामने रख दिया। बिजली का बिल, स्कूल की फीस, राशन का खर्च और दवाइयों की पर्चियाँ मेज पर फैली थीं। पति ने सब देखा और गंभीरता से सिर हिलाया।
“स्थिति सचमुच चिंताजनक है,” उसने कहा, “हमें खर्चों में कटौती करनी होगी।”
पत्नी को पहली बार लगा कि शायद आदमी में कुछ विवेक जागा है।
पति ने आगे कहा, “कल से हम दिन में कम-से-कम दो घंटे मोबाइल कम चलाएँगे। इससे डाटा बचेगा। उसी पैसे से कुछ और रिचार्ज करा लेंगे।”
पत्नी ने माथा पीट लिया।
अगले दिन पति ने नया रिचार्ज कराया और सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली—‘महँगाई के इस दौर में आम आदमी का जीवन कठिन होता जा रहा है। सरकार को जनता की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।’
पोस्ट पर खूब लाइक आए। एक मित्र ने लिखा—‘बिल्कुल सही बात।’
दूसरे ने टिप्पणी की—‘आपकी चिंता जायज है।’
तीसरे ने सुझाव दिया—‘इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।’
पति का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उसे लगा कि जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँचने लगी है। उधर रसोई में पत्नी ने चाय बनाते समय शकर की जगह गुड़ डाल दिया था और रात के खाने में रोटियों की संख्या भी घटा दी थी।
पति ने चाय पीते हुए कहा, “आज मिठास कुछ अलग है!”
पत्नी मुस्कराई, “हाँ, घर की अर्थव्यवस्था में डिजिटल क्रांति का स्वाद है।”
पति ने बात समझने की कोशिश नहीं की। तभी मोबाइल पर संदेश आया—‘आपका डाटा पैक समाप्त होने वाला है।’
वह घबरा उठा। चाय का कप मेज पर रखकर तुरंत रिचार्ज कराने दौड़ा। जाते-जाते पत्नी से बोला, “रात के खाने में थोड़ा समझौता कर लेना, लेकिन डाटा खत्म नहीं होना चाहिए। आखिर दुनिया से जुड़े रहना भी तो जरूरी है!”
पत्नी ने खाली होते राशन के डिब्बों की ओर देखा और बुदबुदाई—इस घर में अब पेट की भूख से बड़ी समस्या मोबाइल की भूख हो गई है।
ब्रजेश कानूनगो