हीनता के रोग में अहित का इंजेक्शन
हीनता बड़ा लोकतांत्रिक रोग है। इसमें गरीब-अमीर, नेता-जनता, पढ़े-लिखे-अनपढ़—सब बराबर संक्रमित हो सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आम आदमी इसे मन में रखता है और राजनीति इसे माइक पर बोल देती है।
इस रोग की सबसे कारगर दवा है—दूसरे का अहित। किसी को गिरते देखिए, मरीज के चेहरे पर तुरंत रौनक लौट आएगी। किसी की दुकान बंद हो जाए, नौकरी चली जाए, चुनाव हार जाए या प्रतिष्ठा पर दाग लग जाए—हीनताग्रस्त आत्मा को तत्काल ऑक्सीजन मिलने लगती है।
राजनीति ने इस चिकित्सा-पद्धति को बाकायदा संस्थागत रूप दे दिया है। सरकार कोई योजना शुरू करे तो विपक्ष पूछता है—इसमें घोटाला कहाँ है? विपक्ष कोई सुझाव दे तो सरकार पूछती है—पहले अपने समय का हिसाब दो। जनता पूछती है—सड़क कब बनेगी? दोनों पक्ष पूछते हैं—सड़क का श्रेय किसे मिलेगा? यही लोकतांत्रिक चिकित्सा की असली उपलब्धि है।
किसी नेता की सभा में भीड़ हो तो समर्थक कहते हैं—जनता उमड़ पड़ी। विरोधी कहते हैं—सरकारी भीड़ थी। विरोधी की सभा में भीड़ हो तो समीकरण बदल जाते हैं। कैमरा वही रहता है, भीड़ वही रहती है, मगर सत्य पार्टी के रंग के अनुसार बदल जाता है।
अब उपलब्धि की भी अपनी पार्टी होती है। यदि दूसरा अचानक जीत जाए तो पुराना बयान खोज लिया जाता है। राजनीति में भविष्यवाणी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह परिणाम आने के बाद भी की जा सकती है।
टीवी की बहसें इस रोग की खुली प्रयोगशाला हैं। एक प्रवक्ता दूसरे को बोलने नहीं देता और दूसरा पहले को। बीच में एंकर पूछता है—“सवाल यह है कि देश जानना चाहता है...” देश बेचारा घर में बैठा सोचता है कि उसने कब पूछा था।
सोशल मीडिया ने तो अहित को चौबीस घंटे की सेवा बना दिया है। किसी की तस्वीर पर पुरस्कार दिखे तो बधाई देने से पहले उसकी पुरानी पोस्ट खोजी जाती है। कोई लोकप्रिय हो जाए तो उसके अनुयायियों की गिनती पर संदेह किया जाता है। कोई चुनाव जीत जाए तो मशीनें संदिग्ध हो जाती हैं; हार जाए तो मशीनें अचानक निष्पक्ष हो जाती हैं।
दलबदल इस चिकित्सा का प्रीमियम पैकेज है। कल तक जो व्यक्ति लोकतंत्र का संकट था, आज वही लोकतंत्र का नया प्रहरी हो सकता है। कल जिस दल में जाना राजनीतिक पाप था, आज उसी में जाना जनसेवा है। विचारधारा इतनी लचीली हो गई है कि आवश्यकता पड़ने पर उसे मोड़कर जेब में रखा जा सकता है।
असल समस्या विरोध में नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना, असहमति रखना और आलोचना करना जरूरी है। समस्या तब शुरू होती है जब आलोचना का उद्देश्य सुधार नहीं, दूसरे को छोटा करना हो। तब राजनीति नीति की प्रतियोगिता नहीं रहती; वह प्रतिष्ठा की कुश्ती बन जाती है।
हीनता का स्थायी इलाज आत्मविश्वास है। लेकिन आत्मविश्वास की गोली धीरे असर करती है। उसमें अपने भीतर झाँकना पड़ता है, अपनी कमी स्वीकार करनी पड़ती है और यह मानना पड़ता है कि सामने वाला अच्छा काम करे तो उससे हमारा कद अपने आप छोटा नहीं हो जाता।
अहित का इंजेक्शन सबसे आसान है। सामने वाला गिरा और हम ऊँचे दिखाई देने लगे।
लेकिन यह ऊँचाई असली नहीं होती। दूसरों को लगातार गिराते-गिराते आदमी अंततः इतनी नीचे उतर जाता है कि ऊपर देखने पर भी उसे अपने से ऊँचा कोई दिखाई नहीं देता।
और शायद यही इस इंजेक्शन का अंतिम साइड इफेक्ट है—दूसरे का अहित करते-करते हम अपनी हीनता का इलाज नहीं करा पाते और ईवीएम का बटन हित अहित का सोचे बिना फिर दबा आते हैं।
ब्रजेश कानूनगो