लोकतंत्र में सब ठीक है
लोकतंत्र में सब ठीक है। यह बात मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ, क्योंकि आजकल विश्वास ही सबसे बड़ा प्रमाण है। प्रमाण माँगना संदेह पैदा करता है और संदेह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता।
हमारे यहाँ हर चीज लोकतांत्रिक है। सरकार लोकतांत्रिक है, चुनाव लोकतांत्रिक हैं, योजनाएँ लोकतांत्रिक हैं, भाषण लोकतांत्रिक हैं और यहाँ तक कि झूठ भी लोकतांत्रिक ढंग से बोला जाता है। फर्क इतना है कि झूठ बोलने वाला जितने अधिक लोगों को विश्वास दिला दे, उसका झूठ उतना ही लोकतांत्रिक हो जाता है।
सच बेचारा इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ा असहज है। उसे बार-बार अपना परिचय देना पड़ता है। प्रमाणपत्र दिखाने पड़ते हैं। स्रोत बताने पड़ते हैं। वह सामने खड़ा होकर कहता है—“मैं सच हूँ।”
लोग पूछते हैं—“किसके पक्ष में?”
सच कहता है—“किसी के पक्ष में नहीं।”
बस, यहीं से उसकी परेशानी शुरू हो जाती है।
आजकल निष्पक्ष होना भी संदेहास्पद चरित्र का प्रमाण है। यदि आप सत्ता की आलोचना करते हैं तो आप विरोधी हैं। यदि विपक्ष की आलोचना करते हैं तो आप सत्ता के आदमी हैं। और यदि दोनों की आलोचना कर दें तो आप बुद्धिजीवी हैं—यह एक ऐसा शब्द है जिसे अब प्रशंसा और गाली के बीच कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
आप ज्ञान की बात करें तो लोग पूछते हैं—“आप किस खेमे के हैं?” आप तर्क दें तो पूछा जाता है—“आपकी विचारधारा क्या है?” आप तथ्य रखें तो सामने वाला अपना मोबाइल निकालकर आपके खिलाफ कोई पुराना स्क्रीनशॉट ढूँढ़ने लगता है।
तथ्य का उत्तर अब तथ्य से देना जरूरी नहीं है। एक आरोप पर्याप्त है।
लोकतंत्र में आरोप बहुत उपयोगी वस्तु है। वह सस्ता है, आसानी से उपलब्ध है और उसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।
आपने सवाल पूछा—आप पर आरोप। आपने सवाल का उत्तर माँगा—आप पर दूसरा आरोप। आपने कहा कि आरोप गलत है—आप पर तीसरा आरोप। अंततः आप अपने सवाल को भूलकर अपने ऊपर लगे आरोप का स्पष्टीकरण देने लगते हैं। यही लोकतांत्रिक संवाद की सफलता है।
हमारे यहाँ अभिव्यक्ति का भी बड़ा महत्व है। एक मन धतूरा भीतर रखिए और जुबान पर शहद लगाइए। मुस्कुराते हुए ऐसी बातें कहिए कि सामने वाला आपको अपना हितैषी समझे और पीछे से आप उसकी जेब हल्की कर दें। लोकतंत्र में छुरी को भी मुस्कुराना आ गया है।
लोकतंत्र में प्रेम भी खूब है। प्रेम के ढाई आखर पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। यहाँ प्रेम का अर्थ है—आप मेरे साथ, मैं आपके साथ।
जो कल तक सबसे बड़ा विरोधी था, आज सबसे बड़ा मित्र हो सकता है। जो कल तक लोकतंत्र का दुश्मन था, आज लोकतंत्र बचाने के लिए आपके साथ मंच पर खड़ा दिखाई दे सकता है।
जनता पूछती है—“यह कैसे हुआ ?”
नेता मुस्कुराकर कहता है—“राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता।”
जनता कहती है—“फिर स्थायी क्या होता है?”
नेता कहता है—“कुर्सी।”
यह उत्तर लोकतंत्र का सबसे छोटा और सबसे प्रामाणिक राजनीतिक दर्शन हो सकता है।
कुर्सी बड़ी अद्भुत चीज है। वह आदमी को बदलती नहीं, उसके भीतर छिपे आदमी को बाहर निकालती है। जो आदमी चुनाव से पहले जनता के घर की चौखट पर बैठकर चाय पीता है, वही चुनाव के बाद जनता को मिलने के लिए अपॉइंटमेंट माँगने को कहता है। चुनाव के समय नेता जनता के बीच होता है और चुनाव के बाद जनता नेता के काफिले के बीच फँसी रहती है।
पहले राजा घोड़े पर निकलता था तो रास्ता खाली कराया जाता था। आज लोकतंत्र में नेता मोटरगाड़ियों के लंबे काफिले में निकलता है तो भी रास्ता खाली कराया जाता है। अंतर केवल इतना है कि तब इसे राजशाही कहा जाता था और अब इसे प्रोटोकॉल कहा जाता है। लोकतंत्र ने बस राजशाही की पोशाक बदल दी है।
रंग-बिरंगी पोशाकें दिन में चार बार बदलना अब राजनीतिक कला है। सुबह किसान के साथ खड़े होकर कुर्ता पहनिए, दोपहर में युवाओं के साथ जींस पहन उनके जैसी भाषा बोलिए, शाम को उद्योगपतियों के साथ सूट पहनिए और रात में टीवी पर राष्ट्र की चिंता करते हुए गंभीर हो जाइए। राजनीति में कपड़े केवल शरीर नहीं ढँकते, विचार भी ढँकते हैं।
किसान की पत्तल में काजू सुहाता नहीं , लेकिन किसी बड़े सेठ के समारोह में काजू न हो तो मेन्यू अधूरा माना जाता है। देवताओं को छप्पन भोग लगते हैं। नेताओं के स्वागत में भी छप्पन व्यंजन सजते हैं। गरीब की थाली में सरकारी योजना की तस्वीर सजती है। मुफ़्त राशन की डिजिटल तस्वीरें भूख नहीं मिटाती, भूख डिजिटल नहीं होती, राशन भिजवाना जरूरी हो जाता है। वोटर खुश होकर मतदान करके अपना दायित्व निभा आता है।
गरीबी हटाने की योजनाएँ इतनी सफल हैं कि गरीबी अब भी वहीं है और अमीरी कई नए पते खोज चुकी है।
कभी-कभी लगता है हमने गरीबी हटाई नहीं, गरीबी की परिभाषा बदल दी।
जिसके घर में दो वक्त का भोजन नहीं था, वह गरीब था। अब जिसके पास पाँच करोड़ नहीं हैं, उसे शायद आर्थिक रूप से पीछे कहा जा सकता है।
सरकार की उपलब्धियों का हिसाब अलग है और जनता की जिंदगी का हिसाब अलग। सरकारी रिपोर्ट कहती है—“विकास हुआ।”जनता पूछती है—“कहाँ?” रिपोर्ट कहती है—“देखिए आँकड़े।”जनता कहती है—“मगर मेरे गाँव में अस्पताल में डॉक्टर नहीं है।” उत्तर आता है—“अस्पताल तो है न!” स्कूल है, शिक्षक नहीं। पुस्तकालय है, पुस्तकें नहीं। सड़क है, गड्ढे भी हैं। नल है, पानी भी है कभी-कभी। योजना है, लाभार्थी सूची है। और सबसे बड़ी बात—उद्घाटन की तस्वीर है।
लोकतंत्र में तस्वीर का महत्व समझिए। काम हो या न हो, तस्वीर होनी चाहिए। पुल का उद्घाटन हो जाए, पुल बाद में बने तो भी चलेगा। शिलान्यास हो जाए तो काम की आधी जिम्मेदारी पूरी मानी जा सकती है।
सरकारें आती-जाती हैं, उद्घाटन पट्टिकाएँ रह जाती हैं। उन पर नाम बदलते रहते हैं। एक दिन कोई इतिहासकार आएगा और पट्टिकाएँ देखकर तय करेगा कि देश में जितना विकास हुआ, उसका आधा तो उद्घाटन समारोहों में ही हो गया था। जनता के लिए योजनाएँ आती हैं। योजनाओं के साथ विज्ञापन आते हैं। विज्ञापनों के साथ चेहरे आते हैं। चेहरे के साथ प्रशस्ति मंडली आती है।
मंडली का काम सरल है—जो हुआ है उसे महान बताना और जो नहीं हुआ है उसे होने वाला बताना।
मंडली को कभी-कभी यह भी पता नहीं होता कि उपलब्धि क्या है, लेकिन तालियाँ कब बजानी हैं, इसका उसे पूरा ज्ञान होता है।
नेता बोलता है। मंडली तालियाँ बजाती है। नेता रुकता है। मंडली फिर तालियाँ बजाती है। नेता पानी पीता है। मंडली मुस्कुराती है।
नेता कुछ भूल जाता है। मंडली कहती है—“ऐतिहासिक!”
लोकतंत्र में प्रशंसा का बाजार बहुत बड़ा है। आलोचना करने के लिए बुद्धि चाहिए, प्रशंसा करने के लिए केवल अवसर पहचानने की क्षमता। और अवसर पहचानने वाले लोग कभी बेरोजगार नहीं रहते।
सत्ता के आसपास मंडली क्यों रहती है, इसका उत्तर बहुत कठिन नहीं है। सत्ता के पास संसाधन होते हैं और संसाधनों के आसपास प्रशंसा स्वतः उत्पन्न होती है।
नेता सामने दिखाई देता है। पीछे कौन है, यह दिखाई नहीं देता।नीति सामने बनती है। उसका मसौदा कहाँ तैयार हुआ, यह दिखाई नहीं देता। जनहित सामने लिखा होता है। हित किसका हुआ, यह पीछे की पंक्ति में छूट जाता है।
लोकतंत्र में पूँजी और सत्ता का रिश्ता भी अब बहुत सभ्य हो गया है। पहले इसे देखकर लोग असहज होते थे। अब इसे ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ जैसे सुंदर नाम मिल गए हैं।
नाम बदलते ही रिश्ते की मर्यादा बदल जाती है। भ्रष्टाचार भी इसीलिए अपने पुराने कपड़े उतारकर नए शब्द पहन रहा है। जो कभी घूस कहलाता था, वह अब सुविधा शुल्क हो सकता है। जो कभी पक्षपात था, वह अब रणनीतिक सहयोग हो सकता है। जो कभी अपने लोगों को लाभ पहुँचाना था, वह अब हितधारकों की भागीदारी हो सकती है। चीजें मिटती नहीं हैं। उनके नाम बदल जाते हैं।
गणतंत्र का यह सबसे आधुनिक चमत्कार है। भ्रष्टाचार को समाप्त करना कठिन हो तो उसे वैधता देने पर विचार किया जा सकता है। आखिर समस्या को समाप्त करने और समस्या को स्वीकार कर लेने में लोकतांत्रिक अंतर कितना है?
कानून बनते हैं। कभी-कभी इतनी तेजी से बनते हैं कि कानून पढ़ने वाले पीछे रह जाते हैं। ध्वनि मत से कानून पारित हो जाता है।
कुछ आवाजें विरोध में उठती हैं। वे रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती हैं। और फिर लोकतंत्र आगे बढ़ जाता है।किस दिशा में? यह प्रश्न पूछना अभी बाकी है।
विपक्ष भी है। होना ही चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष का होना उतना ही जरूरी है जितना घर में आईना। लेकिन आईना बहुत बड़ा हो जाए तो असुविधा होती है। इसलिए उसे छोटा रखना बुद्धिमानी है। इतना छोटा कि चेहरा दिखाई दे, चेहरे के पीछे की चीजें नहीं।
कभी विपक्ष के पास संख्या कम पड़ जाए तो लोकतांत्रिक गणित काम आता है। किसी को थोड़ा समझाइए, किसी को थोड़ा मनाइए, किसी को थोड़ा अवसर दीजिए। दुर्बल विपक्षी अश्व को थोड़ी दूब खिला दीजिए, वह सत्ता की अस्तबल में आकर स्वस्थ हो सकता है। फिर संख्या बढ़ जाती है। लोकतंत्र बच जाता है। सरकार स्थिर हो जाती है।
जनता फिर से आश्वस्त हो जाती है कि उसका प्रतिनिधि उसके हित में काम कर रहा है। सत्ता का सबसे बड़ा कौशल यही है कि वह अपनी सुविधा को जनहित की भाषा में बोल सके। विपक्ष का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वह सत्ता की सुविधा को पहचान सके।
और जनता का सबसे बड़ा कौशल है—इन दोनों के बीच अपने जीवन की जगह तलाशना। समाचार चैनलों ने लोकतंत्र को और सरल बना दिया है। अब जनता को यह तय करने की आवश्यकता नहीं कि सच क्या है। चैनल तय कर देते हैं कि आज किस बात पर नाराज होना है। सुबह एक मुद्दा। दोपहर दूसरा। शाम तीसरा। रात को बहस।
बारह लोग चिल्ला रहे हैं। बीच में एंकर राष्ट्र बचा रहा है। नीचे पट्टी पर लिखा है—“सबसे बड़ा सवाल।” लेकिन सबसे बड़ा सवाल अक्सर पूछा ही नहीं जाता। वह गहरे पानी में पड़ा रहता है। खबरें उसके ऊपर बैठी रहती हैं।
हम खबरों को पढ़ते हैं और समझते हैं कि हमने सत्य पढ़ लिया। जबकि सत्य कभी-कभी खबरों के नीचे दबा होता है।
सत्य का दुर्भाग्य यह है कि वह सनसनीखेज नहीं होता। झूठ को कहानी बनाना आता है। सच को केवल सच होना आता है।
इसीलिए झूठ कैमरे पर अधिक सुंदर दिखाई देता है। आज झूठ के पास प्रोडक्शन वैल्यू है। उसके पास ग्राफिक्स हैं, संगीत है, स्लोगन है, सोशल मीडिया है और हजारों लोग हैं जो उसे आगे बढ़ा सकते हैं।
सच बेचारा अभी भी पैदल चलता है। और लोकतंत्र में पैदल चलने वालों को अक्सर विकास के रास्ते से हटा दिया जाता है।
फिर भी हम कहते हैं—लोकतंत्र में सब ठीक है।
क्योंकि चुनाव होते हैं। क्योंकि सरकारें बदलती हैं। क्योंकि भाषण होते हैं। क्योंकि योजनाएँ आती हैं।क्योंकि विज्ञापन आते हैं।
क्योंकि प्रशस्ति मंडलियाँ सक्रिय हैं।
लोकतंत्र में सब ठीक है , वह जनता द्वारा, जनता के लिए है, लेकिन - “जनता कहाँ है?”
यही प्रश्न शायद सबसे असुविधाजनक है।
क्योंकि जनता चुनाव में दिखाई देती है, रैलियों में दिखाई देती है, आँकड़ों में दिखाई देती है, विज्ञापनों में दिखाई देती है, भाषणों में दिखाई देती है—लेकिन निर्णय की मेज पर अक्सर दिखाई नहीं देती।
फिर भी जनता उम्मीद करती है। वह हर चुनाव में अपनी उंगली पर स्याही लगाती है और सोचती है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। कभी चेहरा बदलता है। कभी नारा बदलता है। कभी गठबंधन बदलता है।कभी कानून बदलता है। कभी इतिहास की भाषा बदलती है।
लेकिन जनता की जिंदगी? वह धीरे-धीरे बदलती है। इतनी धीरे कि उसे विकास कहने के लिए सरकार को विज्ञापन देना पड़ता है।
और शायद इसीलिए आज - सत्य संदिग्ध हो जाता है और झूठ प्रमाणित।
ब्रजेश कानूनगो