Tuesday, September 1, 2026

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है 

व्यस्त आदमी को देखकर हमें हमेशा लगता है कि वह बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहा है। उसके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें होती हैं, हाथ में मोबाइल होता है, कान पर फोन और चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के निर्णय पर टिकी हो। वह सुबह से शाम तक इधर-उधर भागता रहता है। उसके पास किसी से मिलने का समय नहीं होता, आराम करने का समय नहीं होता और कभी-कभी अपने बारे में सोचने का भी समय नहीं होता। फिर भी वह संतुष्ट रहता है कि वह व्यस्त है।

बेकार आदमी की स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है। उसके पास समय ही समय होता है और यही उसका सबसे बड़ा संकट है। समय काटना कोई साधारण काम नहीं है। व्यस्त आदमी तो अपना काम करके समय निकाल लेता है, लेकिन बेकार आदमी को समय निकालने के लिए पहले समय काटना पड़ता है। इसके लिए जिस अक्ल की आवश्यकता होती है, वह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती।

बेकार आदमी सुबह उठकर सबसे पहले यह तय करता है कि आज उसे करना क्या नहीं है। यह निर्णय ही दिन का पहला महत्वपूर्ण कार्य होता है। इसके बाद वह मोबाइल उठाता है और संसार की सारी समस्याओं का समाधान करने निकल पड़ता है। वह उन खबरों पर टिप्पणी करता है जिन्हें उसने पढ़ा नहीं, उन विषयों पर विशेषज्ञ राय देता है जिन्हें वह समझता नहीं और उन लोगों को सलाह देता है जिन्होंने उससे सलाह मांगी ही नहीं।

सोशल मीडिया ने बेकार आदमी को समय काटने का ऐसा विराट औजार दे दिया है कि अब उसे अपने बेकार होने का अहसास भी नहीं होता। वह सुबह किसी पोस्ट पर ‘शुभ प्रभात’ लिखकर राष्ट्रनिर्माण शुरू करता है और रात को ‘शुभ रात्रि’ लिखकर राष्ट्र को विश्राम देता है। बीच में वह दर्जनों वीडियो देखता है, सैकड़ों संदेश आगे बढ़ाता है और कई महत्वपूर्ण लोगों को यह बताता है कि देश की हालत बहुत खराब है।

व्यस्त आदमी की अक्ल समस्या हल करने में लगती है, जबकि बेकार आदमी की अक्ल समस्या खोजने में। घर में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो वह पूछेगा—इतना ठीक कैसे चल रहा है? कोई बीमार न हो तो बीमारी की संभावना तलाशेगा। पड़ोसी के घर शांति हो तो उसे शक होगा कि जरूर कोई बड़ी बात छिपाई जा रही है।

बेकार आदमी को दूसरों के काम में विशेष रुचि होती है। उसे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं कि उसकी अपनी अलमारी कब साफ होगी, लेकिन पड़ोसी ने नया पर्दा क्यों लगाया, यह राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है। उसे अपने खर्च का हिसाब नहीं मालूम, पर मोहल्ले में किसने कितना खर्च किया, इसकी पूरी जानकारी होती है।

हमारे समाज ने भी बेकार आदमी को कभी बेकार नहीं रहने दिया। कहीं समिति बना दी, कहीं सलाहकार मंडल, कहीं व्हाट्सऐप समूह। जिसे कोई काम नहीं मिला, उसे पद मिल गया। जिसे पद नहीं मिला, उसे प्रवक्ता बना दिया गया। जिसे प्रवक्ता भी नहीं बनाया जा सका, उसने स्वयं को विशेषज्ञ घोषित कर लिया।

दरअसल बेकारी हमेशा निष्क्रियता नहीं होती। कई बार यह अत्यधिक सक्रियता का दूसरा नाम होती है। बेकार आदमी दौड़ता बहुत है, बस किसी मंजिल की ओर नहीं जाता। वह बोलता बहुत है, पर कहता कुछ नहीं। वह व्यस्त दिखाई देने की कला में इतना निपुण हो जाता है कि कभी-कभी व्यस्त आदमी भी उससे ईर्ष्या करने लगता है।

व्यस्त आदमी के पास घड़ी होती है और बेकार आदमी के पास समय। व्यस्त आदमी समय बचाता है, बेकार आदमी समय की ऐसी धुलाई करता है कि दिन समाप्त होने पर भी उसे लगता है कि आज कुछ किया ही नहीं।

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—उसने कुछ न करते हुए भी  दिन  पूरा कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो 


आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता

आत्मविश्वास  के बाजार में मूर्खता 

आत्मविश्वास आदमी की बड़ी संपत्ति है। जिसके पास धन है, उसे धन का आत्मविश्वास होता है। जिसके पास बल है, वह अपनी भुजाओं पर भरोसा करता है। जिसके पास ज्ञान है, वह तर्क और तथ्यों के सहारे खड़ा रहता है। लेकिन इन सब आत्मविश्वासों में मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अलग है। यह न धन माँगता है, न बल और न ज्ञान। यह अपने आप पैदा होता है और बढ़ते-बढ़ते इतना विराट हो जाता है कि उसके सामने ज्ञान स्वयं असहाय दिखाई देने लगता है।

ज्ञानी व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है। मूर्ख व्यक्ति सोचने को समय की बर्बादी मानता है। ज्ञानी कहता है—‘मुझे इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है।’ मूर्ख कहता है—‘इसमें जानने जैसा है ही क्या?’ यही उसकी महानता है। उसे किसी विषय को जानने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वह पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना चुका होता है।

मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अधिक तब दिखाई देता है जब सामने प्रमाण रख दिया जाए। प्रमाण मूर्ख के लिए परेशानी की वस्तु है। वह प्रमाण को देखकर विचलित नहीं होता, बल्कि प्रमाण देने वाले की नीयत पर संदेह करने लगता है। आँकड़े गलत हो सकते हैं, किताबें पक्षपाती हो सकती हैं, वैज्ञानिक बिके हुए हो सकते हैं, विशेषज्ञ किसी साजिश का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी समझ में कभी कोई दोष नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया ने इस आत्मविश्वास को चार चाँद लगा दिए हैं। पहले किसी विषय का जानकार बनने के लिए वर्षों पढ़ना पड़ता था। अब किसी संदेश को तीन बार पढ़कर आगे भेज देना ही पर्याप्त है। सुबह आदमी डॉक्टर बनकर स्वास्थ्य सलाह देता है, दोपहर को अर्थशास्त्री बनकर महँगाई का इलाज बताता है और शाम को अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ बनकर विश्वशांति की योजना पेश कर देता है। उसकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि उसके पास मोबाइल है और उसे ‘फॉरवर्ड’ का बटन दबाना आता है।

लोकतंत्र में मूर्खता का आत्मविश्वास और भी उपयोगी सिद्ध होता है। यहाँ हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है और मूर्ख इस अधिकार का सबसे अधिक सम्मान करता है। वह बोलता है—लगातार बोलता है—और इतनी निश्चितता से बोलता है कि सुनने वाला अपने ज्ञान पर ही संदेह करने लगता है। कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित व्यक्ति वही है जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान नहीं है।

कार्यालयों में भी इसका महत्व कम नहीं। जो कर्मचारी काम जानता है, वह समस्या बताता है। जो नहीं जानता, वह समाधान बताता है। काम बिगड़ जाए तो कह देता है कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। काम बन जाए तो श्रेय उसका। इस प्रकार मूर्खता का आत्मविश्वास व्यक्ति को हर परिणाम में विजेता बनाए रखता है।

राजनीति में तो यह आत्मविश्वास वरदान है। आज कही गई बात कल बदल जाए तो कोई समस्या नहीं। चेहरे पर शिकन नहीं आनी चाहिए। जनता भूल जाएगी, रिकॉर्ड बदल जाएगा, बयान का अर्थ बदल दिया जाएगा। सबसे जरूरी है कि वक्ता स्वयं अपनी बात पर विश्वास करता हुआ दिखाई दे। आखिर जनता को सत्य नहीं, आत्मविश्वास भी तो चाहिए।

मूर्ख व्यक्ति की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि उसे कभी अपने भीतर झाँकना नहीं पड़ता। आत्ममंथन ज्ञानी की बीमारी है। मूर्ख के पास इसका समय नहीं होता। वह दूसरों की कमियाँ खोजने में व्यस्त रहता है। दुनिया गलत है, व्यवस्था गलत है, लोग गलत हैं—बस वह सही है।

इसलिए आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता सबसे महँगी बिक रही है। ज्ञान प्रमाण माँगता है, धन सुरक्षा माँगता है और बल अवसर। मूर्खता को केवल एक खुला मुँह चाहिए।

और शायद इसी कारण मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि है—क्योंकि बाकी सभी आत्मविश्वासों को कभी न कभी अपनी सीमा का पता चल जाता है, मूर्खता को अपनी सीमा का पता ही नहीं चलता।

ब्रजेश कानूनगो 



Tuesday, August 25, 2026

महंगाई सुरसा भई!

महंगाई सुरसा भई! 

महंगाई अब आर्थिक समस्या भर नहीं रही। वह हमारे राष्ट्रीय जीवन की स्थायी सदस्य बन चुकी है। महंगाई सुरसा हो गई है। आदमी अपने खर्च को जितना छोटा करता है, उसका मुँह उतना ही बड़ा होता जाता है। पहले सब्जी महँगी हुई तो दाल का सहारा लिया। दाल महँगी हुई तो आलू बचा। आलू ने भी आँखें तरेरीं तो दूध रोटी की ओर देखा। दूध महंगा हुआ तो चटनी की ओर देखा। अब रोटी भी ऐसी लगती है जैसे कोई पुराना रिश्तेदार हो। 

घर का बजट अब बजट नहीं, शोकपत्र हो गया है। वेतन आते ही राशन, बिजली, गैस, स्कूल की फीस, दवा और किराया उसे बाँट लेते हैं। महीने के अंत में जेब में जो बचता है, उसे बचत कहा जाता है। यह अलग बात है कि उसे बचाने के लिए आदमी को अपने कई छोटे-छोटे सुखों की हत्या करनी पड़ती है।

महंगाई ने आदमी को अर्थशास्त्री बना दिया है। गृहिणी बाजार जाने से पहले ऐसी गणना करती है कि बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के ग्राफ उसके सामने फीके लगें। बाजार में अब लोग खरीदारी कम और कीमत पूछने का अभ्यास अधिक करते हैं। कीमत सुनकर ग्राहक वस्तु को देखता है, फिर दुकानदार को और अंततः अपनी जेब को। तीनों के बीच एक मौन समझौता होता है और वस्तु वहीं रह जाती है।

राजनीतिज्ञों  का महंगाई से पुराना रिश्ता है। चुनाव के पहले नेता जनता के सामने याचक होता है। हाथ जुड़े होते हैं, आवाज में मिठास होती है और जनता को मालिक बताया जाता है। सत्ता मिलते ही दृश्य बदल जाता है। याचक भरतार हो जाता है और जनता फिर याचक।

जनता पूछती है—महंगाई क्यों बढ़ी?

उत्तर आता है—वैश्विक परिस्थितियाँ कठिन हैं।

जनता कहती है—घर चलाना मुश्किल है।

उत्तर मिलता है—अर्थव्यवस्था मजबूत है।

जनता रोजगार पूछती है तो आत्मनिर्भर बनने की सलाह मिलती है। कीमत पूछती है तो विकास का आँकड़ा सामने रख दिया जाता है। इस तरह हर सवाल का उत्तर मिल जाता है, सिवाय उस सवाल के जो वास्तव में पूछा गया था।

आँकड़े महंगाई का सबसे सुविधाजनक पर्दा हैं। जनता कहती है कि थैला खाली हो गया, विशेषज्ञ बताते हैं कि महंगाई दर नियंत्रित है। जनता अपनी जेब दिखाती है, सरकार ग्राफ दिखाती है। ग्राफ ऊपर-नीचे होता रहता है, लेकिन रसोई का खर्च लगातार ऊपर जाता रहता है।

कुर्सी पर बैठते ही आदमी जमीन से थोड़ा दूर हो जाता है। नीचे खड़ी जनता कहती है कि दाल महँगी है, ऊपर बैठे लोग बताते हैं कि देश विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है। जनता पूछती है कि उस बड़ी अर्थव्यवस्था में उसकी छोटी-सी रोटी कहाँ है, तो उत्तर राष्ट्रहित की ऊँचाई पर चला जाता है।

महंगाई केवल कीमतें नहीं बढ़ाती, इच्छाएँ घटाती है। बच्चे की छोटी माँग टलती है, बीमारी का इलाज टलता है, कपड़ों की खरीद टलती है, घूमना टलता है। धीरे-धीरे आदमी जीवन जीने के बजाय केवल जीवन चलाने लगता है।

जनता को शरबत पीने की सलाह देने से पहले यह देखना होगा कि उसके घर में पानी तो है, शकर किस भाव मिल रही है ।

महंगाई का दैत्य अब इतना बड़ा हो गया है कि उससे लड़ना समय की मांग है। सत्ता चाहे जिसकी हो, जनता का सवाल वही रहेगा—रोटी कितनी महँगी है और जीवन कितना बचा है? बाकी सब जवाब हैं। बस हिसाब नहीं।


ब्रजेश कानूनगो 

Sunday, August 23, 2026

लोकतंत्र में सब ठीक है

लोकतंत्र में सब ठीक है

लोकतंत्र में सब ठीक है। यह बात मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ, क्योंकि आजकल विश्वास ही सबसे बड़ा प्रमाण है। प्रमाण माँगना संदेह पैदा करता है और संदेह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता।

हमारे यहाँ हर चीज लोकतांत्रिक है। सरकार लोकतांत्रिक है, चुनाव लोकतांत्रिक हैं, योजनाएँ लोकतांत्रिक हैं, भाषण लोकतांत्रिक हैं और यहाँ तक कि झूठ भी लोकतांत्रिक ढंग से बोला जाता है। फर्क इतना है कि झूठ बोलने वाला जितने अधिक लोगों को विश्वास दिला दे, उसका झूठ उतना ही लोकतांत्रिक हो जाता है।

सच बेचारा इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ा असहज है। उसे बार-बार अपना परिचय देना पड़ता है। प्रमाणपत्र दिखाने पड़ते हैं। स्रोत बताने पड़ते हैं। वह सामने खड़ा होकर कहता है—“मैं सच हूँ।”

लोग पूछते हैं—“किसके पक्ष में?”

सच कहता है—“किसी के पक्ष में नहीं।”

बस, यहीं से उसकी परेशानी शुरू हो जाती है।


आजकल निष्पक्ष होना भी संदेहास्पद चरित्र का प्रमाण है। यदि आप सत्ता की आलोचना करते हैं तो आप विरोधी हैं। यदि विपक्ष की आलोचना करते हैं तो आप सत्ता के आदमी हैं। और यदि दोनों की आलोचना कर दें तो आप बुद्धिजीवी हैं—यह एक ऐसा शब्द है जिसे अब प्रशंसा और गाली के बीच कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आप ज्ञान की बात करें तो लोग पूछते हैं—“आप किस खेमे के हैं?” आप तर्क दें तो पूछा जाता है—“आपकी विचारधारा क्या है?” आप तथ्य रखें तो सामने वाला अपना मोबाइल निकालकर आपके खिलाफ कोई पुराना स्क्रीनशॉट ढूँढ़ने लगता है।

तथ्य का उत्तर अब तथ्य से देना जरूरी नहीं है। एक आरोप पर्याप्त है।


लोकतंत्र में आरोप बहुत उपयोगी वस्तु है। वह सस्ता है, आसानी से उपलब्ध है और उसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

आपने सवाल पूछा—आप पर आरोप। आपने सवाल का उत्तर माँगा—आप पर दूसरा आरोप। आपने कहा कि आरोप गलत है—आप पर तीसरा आरोप। अंततः आप अपने सवाल को भूलकर अपने ऊपर लगे आरोप का स्पष्टीकरण देने लगते हैं। यही लोकतांत्रिक संवाद की सफलता है।


हमारे यहाँ अभिव्यक्ति का भी बड़ा महत्व है। एक मन धतूरा भीतर रखिए और जुबान पर शहद लगाइए। मुस्कुराते हुए ऐसी बातें कहिए कि सामने वाला आपको अपना हितैषी समझे और पीछे से आप उसकी जेब हल्की कर दें। लोकतंत्र में छुरी को भी मुस्कुराना आ गया है।

लोकतंत्र में प्रेम भी खूब है। प्रेम के ढाई आखर पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। यहाँ प्रेम का अर्थ है—आप मेरे साथ, मैं आपके साथ।

जो कल तक सबसे बड़ा विरोधी था, आज सबसे बड़ा मित्र हो सकता है। जो कल तक लोकतंत्र का दुश्मन था, आज लोकतंत्र बचाने के लिए आपके साथ मंच पर खड़ा दिखाई दे सकता है।

जनता पूछती है—“यह कैसे हुआ ?”

नेता मुस्कुराकर कहता है—“राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता।”

जनता कहती है—“फिर स्थायी क्या होता है?”

नेता कहता है—“कुर्सी।”

यह उत्तर लोकतंत्र का सबसे छोटा और सबसे प्रामाणिक राजनीतिक दर्शन हो सकता है।


कुर्सी बड़ी अद्भुत चीज है। वह आदमी को बदलती नहीं, उसके भीतर छिपे आदमी को बाहर निकालती है। जो आदमी चुनाव से पहले जनता के घर की चौखट पर बैठकर चाय पीता है, वही चुनाव के बाद जनता को मिलने के लिए अपॉइंटमेंट माँगने को कहता है। चुनाव के समय नेता जनता के बीच होता है और चुनाव के बाद जनता नेता के काफिले के बीच फँसी रहती है।

पहले राजा घोड़े पर निकलता था तो रास्ता खाली कराया जाता था। आज लोकतंत्र में नेता मोटरगाड़ियों के लंबे काफिले में निकलता है तो भी रास्ता खाली कराया जाता है। अंतर केवल इतना है कि तब इसे राजशाही कहा जाता था और अब इसे प्रोटोकॉल कहा जाता है। लोकतंत्र ने बस राजशाही की पोशाक बदल दी है।

रंग-बिरंगी पोशाकें दिन में चार बार बदलना अब राजनीतिक कला है। सुबह किसान के साथ खड़े होकर कुर्ता पहनिए, दोपहर में युवाओं के साथ जींस पहन उनके जैसी भाषा बोलिए, शाम को उद्योगपतियों के साथ सूट पहनिए और रात में टीवी पर राष्ट्र की चिंता करते हुए गंभीर हो जाइए। राजनीति में कपड़े केवल शरीर नहीं ढँकते, विचार भी ढँकते हैं।


किसान की पत्तल में काजू सुहाता नहीं , लेकिन किसी बड़े सेठ के समारोह में काजू न हो तो मेन्यू अधूरा माना जाता है। देवताओं को छप्पन भोग लगते हैं। नेताओं के स्वागत में भी छप्पन व्यंजन सजते हैं। गरीब की थाली में सरकारी योजना की तस्वीर सजती है। मुफ़्त राशन की डिजिटल तस्वीरें भूख नहीं मिटाती, भूख डिजिटल नहीं होती, राशन भिजवाना जरूरी हो जाता है। वोटर खुश होकर मतदान करके अपना दायित्व निभा आता है। 

गरीबी हटाने की योजनाएँ इतनी सफल हैं कि गरीबी अब भी वहीं है और अमीरी कई नए पते खोज चुकी है।

कभी-कभी लगता है हमने गरीबी हटाई नहीं, गरीबी की परिभाषा बदल दी।

जिसके घर में दो वक्त का भोजन नहीं था, वह गरीब था। अब जिसके पास पाँच करोड़ नहीं हैं, उसे शायद आर्थिक रूप से पीछे कहा जा सकता है।


सरकार की उपलब्धियों का हिसाब अलग है और जनता की जिंदगी का हिसाब अलग। सरकारी रिपोर्ट कहती है—“विकास हुआ।”जनता पूछती है—“कहाँ?” रिपोर्ट कहती है—“देखिए आँकड़े।”जनता कहती है—“मगर मेरे गाँव में अस्पताल में डॉक्टर नहीं है।” उत्तर आता है—“अस्पताल तो है न!” स्कूल है, शिक्षक नहीं। पुस्तकालय है, पुस्तकें नहीं। सड़क है, गड्ढे भी हैं। नल है, पानी भी है कभी-कभी। योजना है, लाभार्थी सूची है। और सबसे बड़ी बात—उद्घाटन की तस्वीर है।

लोकतंत्र में तस्वीर का महत्व समझिए। काम हो या न हो, तस्वीर होनी चाहिए। पुल का उद्घाटन हो जाए, पुल बाद में बने तो भी चलेगा। शिलान्यास हो जाए तो काम की आधी जिम्मेदारी पूरी मानी जा सकती है।


सरकारें आती-जाती हैं, उद्घाटन पट्टिकाएँ रह जाती हैं। उन पर नाम बदलते रहते हैं। एक दिन कोई इतिहासकार आएगा और पट्टिकाएँ देखकर तय करेगा कि देश में जितना विकास हुआ, उसका आधा तो उद्घाटन समारोहों में ही हो गया था। जनता के लिए योजनाएँ आती हैं। योजनाओं के साथ विज्ञापन आते हैं। विज्ञापनों के साथ चेहरे आते हैं। चेहरे के साथ प्रशस्ति मंडली आती है।

मंडली का काम सरल है—जो हुआ है उसे महान बताना और जो नहीं हुआ है उसे होने वाला बताना।

मंडली को कभी-कभी यह भी पता नहीं होता कि उपलब्धि क्या है, लेकिन तालियाँ कब बजानी हैं, इसका उसे पूरा ज्ञान होता है।

नेता बोलता है। मंडली तालियाँ बजाती है। नेता रुकता है। मंडली फिर तालियाँ बजाती है। नेता पानी पीता है। मंडली मुस्कुराती है।

नेता कुछ भूल जाता है। मंडली कहती है—“ऐतिहासिक!”

लोकतंत्र में प्रशंसा का बाजार बहुत बड़ा है। आलोचना करने के लिए बुद्धि चाहिए, प्रशंसा करने के लिए केवल अवसर पहचानने की क्षमता। और अवसर पहचानने वाले लोग कभी बेरोजगार नहीं रहते।

सत्ता के आसपास मंडली क्यों रहती है, इसका उत्तर बहुत कठिन नहीं है। सत्ता के पास संसाधन होते हैं और संसाधनों के आसपास प्रशंसा स्वतः उत्पन्न होती है।


नेता सामने दिखाई देता है। पीछे कौन है, यह दिखाई नहीं देता।नीति सामने बनती है। उसका मसौदा कहाँ तैयार हुआ, यह दिखाई नहीं देता। जनहित सामने लिखा होता है। हित किसका हुआ, यह पीछे की पंक्ति में छूट जाता है।

लोकतंत्र में पूँजी और सत्ता का रिश्ता भी अब बहुत सभ्य हो गया है। पहले इसे देखकर लोग असहज होते थे। अब इसे ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ जैसे सुंदर नाम मिल गए हैं।


नाम बदलते ही रिश्ते की मर्यादा बदल जाती है। भ्रष्टाचार भी इसीलिए अपने पुराने कपड़े उतारकर नए शब्द पहन रहा है। जो कभी घूस कहलाता था, वह अब सुविधा शुल्क हो सकता है। जो कभी पक्षपात था, वह अब रणनीतिक सहयोग हो सकता है। जो कभी अपने लोगों को लाभ पहुँचाना था, वह अब हितधारकों की भागीदारी हो सकती है। चीजें मिटती नहीं हैं। उनके नाम बदल जाते हैं।

गणतंत्र का यह सबसे आधुनिक चमत्कार है। भ्रष्टाचार को समाप्त करना कठिन हो तो उसे वैधता देने पर विचार किया जा सकता है। आखिर समस्या को समाप्त करने और समस्या को स्वीकार कर लेने में लोकतांत्रिक अंतर कितना है?


कानून बनते हैं। कभी-कभी इतनी तेजी से बनते हैं कि कानून पढ़ने वाले पीछे रह जाते हैं। ध्वनि मत से कानून पारित हो जाता है।

कुछ आवाजें विरोध में उठती हैं। वे रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती हैं। और फिर लोकतंत्र आगे बढ़ जाता है।किस दिशा में? यह प्रश्न पूछना अभी बाकी है।

विपक्ष भी है। होना ही चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष का होना उतना ही जरूरी है जितना घर में आईना। लेकिन आईना बहुत बड़ा हो जाए तो असुविधा होती है। इसलिए उसे छोटा रखना बुद्धिमानी है। इतना छोटा कि चेहरा दिखाई दे, चेहरे के पीछे की चीजें नहीं।

कभी विपक्ष के पास संख्या कम पड़ जाए तो लोकतांत्रिक गणित काम आता है। किसी को थोड़ा समझाइए, किसी को थोड़ा मनाइए, किसी को थोड़ा अवसर दीजिए। दुर्बल विपक्षी अश्व को थोड़ी दूब खिला दीजिए, वह सत्ता की अस्तबल में आकर स्वस्थ हो सकता है। फिर संख्या बढ़ जाती है। लोकतंत्र बच जाता है। सरकार स्थिर हो जाती है।


जनता फिर से आश्वस्त हो जाती है कि उसका प्रतिनिधि उसके हित में काम कर रहा है। सत्ता का सबसे बड़ा कौशल यही है कि वह अपनी सुविधा को जनहित की भाषा में बोल सके। विपक्ष का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वह सत्ता की सुविधा को पहचान सके।

और जनता का सबसे बड़ा कौशल है—इन दोनों के बीच अपने जीवन की जगह तलाशना। समाचार चैनलों ने लोकतंत्र को और सरल बना दिया है। अब जनता को यह तय करने की आवश्यकता नहीं कि सच क्या है। चैनल तय कर देते हैं कि आज किस बात पर नाराज होना है। सुबह एक मुद्दा। दोपहर दूसरा। शाम तीसरा। रात को बहस।

बारह लोग चिल्ला रहे हैं। बीच में एंकर राष्ट्र बचा रहा है। नीचे पट्टी पर लिखा है—“सबसे बड़ा सवाल।” लेकिन सबसे बड़ा सवाल अक्सर पूछा ही नहीं जाता। वह गहरे पानी में पड़ा रहता है। खबरें उसके ऊपर बैठी रहती हैं।


हम खबरों को पढ़ते हैं और समझते हैं कि हमने सत्य पढ़ लिया। जबकि सत्य कभी-कभी खबरों के नीचे दबा होता है।

सत्य का दुर्भाग्य यह है कि वह सनसनीखेज नहीं होता। झूठ को कहानी बनाना आता है। सच को केवल सच होना आता है।

इसीलिए झूठ कैमरे पर अधिक सुंदर दिखाई देता है। आज झूठ के पास प्रोडक्शन वैल्यू है। उसके पास ग्राफिक्स हैं, संगीत है, स्लोगन है, सोशल मीडिया है और हजारों लोग हैं जो उसे आगे बढ़ा सकते हैं।

सच बेचारा अभी भी पैदल चलता है। और लोकतंत्र में पैदल चलने वालों को अक्सर विकास के रास्ते से हटा दिया जाता है।

फिर भी हम कहते हैं—लोकतंत्र में सब ठीक है।

क्योंकि चुनाव होते हैं। क्योंकि सरकारें बदलती हैं। क्योंकि भाषण होते हैं। क्योंकि योजनाएँ आती हैं।क्योंकि विज्ञापन आते हैं।

क्योंकि प्रशस्ति मंडलियाँ सक्रिय हैं। 


लोकतंत्र में सब ठीक है , वह जनता द्वारा, जनता के लिए है, लेकिन - “जनता कहाँ है?”

यही प्रश्न शायद सबसे असुविधाजनक है।

क्योंकि जनता चुनाव में दिखाई देती है, रैलियों में दिखाई देती है, आँकड़ों में दिखाई देती है, विज्ञापनों में दिखाई देती है, भाषणों में दिखाई देती है—लेकिन निर्णय की मेज पर अक्सर दिखाई नहीं देती।

फिर भी जनता उम्मीद करती है। वह हर चुनाव में अपनी उंगली पर स्याही लगाती है और सोचती है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। कभी चेहरा बदलता है। कभी नारा बदलता है। कभी गठबंधन बदलता है।कभी कानून बदलता है। कभी इतिहास की भाषा बदलती है।

लेकिन जनता की जिंदगी? वह धीरे-धीरे बदलती है। इतनी धीरे कि उसे विकास कहने के लिए सरकार को विज्ञापन देना पड़ता है।

और शायद इसीलिए आज - सत्य संदिग्ध हो जाता है और झूठ प्रमाणित।


ब्रजेश कानूनगो 


Saturday, August 22, 2026

महंगाई के दौर में शकर का शोर

महंगाई के दौर में शकर का शोर

जैसे कोई अफसर बोतल खुलते ही खुलने लगता है, जैसे कोई मिनिस्टर कड़कनाथ खाने के बाद अपनी कड़कता भूलकर ढीला पड़ने लगता है, जैसे कोई प्रेमिका बादल घिरते ही प्रियतम की याद में बेचैन होने लगती है, वैसे ही साधुरामजी मिठाई देखकर भीतर तक मीठे हो जाते हैं। मीठा उनकी कमजोरी है और कमजोरी भी ऐसी कि मिठाई की दुकान के सामने से गुजरते हुए उनका लोकतंत्र तक डगमगाने लगता है।

लेकिन अब वह जमाना नहीं रहा कि मेहमान के आने पर मोतीचूर के लड्डू, गुलाबजामुन या बालूशाही की खुशबू से ड्राइंग रूम को लोकतांत्रिक बनाया जा सके। चीनी के दाम जिस तरह ऊपर जा रहे हैं, लगता है मिठाई अब खाने की वस्तु कम और निवेश का साधन अधिक हो गई है। बाजार में चीनी के भाव सात साल के ऊंचे स्तर तक पहुंचने की खबरें हैं और पिछले एक महीने में कीमतों में तेज उछाल आया है। त्योहारों का मौसम सामने है और सरकार को जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा लगाने से लेकर शुल्क-मुक्त आयात तक के उपाय करने पड़ रहे हैं।

ऐसे समय में साधुरामजी का मेरे घर पधारना किसी आर्थिक सर्वेक्षण से कम नहीं था।

उनके सत्कार में चाय के अलावा कुछ परोसने का साहस हममें नहीं था। मिठाई की प्लेट निकालते हुए मुझे लगता कि मैं घर के बजट पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा हूं।

उनके आते ही मैंने बिटिया को आदेश दिया—

“आज का अमृत ले आओ।”

चाय आई तो साधुरामजी ने प्याली को ऐसे देखा जैसे कोई विपक्षी नेता सरकार की बजट पुस्तिका को देखता है। एक चुस्की ली और प्रश्नवाचक नजरों से मुझे घूरने लगे। उनकी मुद्रा किसी खबरिया चैनल के उस एंकर जैसी थी, जो पहले सवाल पूछता है और फिर जवाब भी स्वयं ही दे देता है।

मैंने भी चाय पी।

चाय में शकर कम थी।

बहुत कम।

इतनी कम कि चाय ने स्वयं को चाय साबित करने के लिए भी संघर्ष शुरू कर दिया था।

मैंने पत्नी को पुकारा। उन्होंने बेटी को भेज दिया।

“बेटे, चाय में शकर नहीं डाली क्या?”

“डाली तो है पापा, मगर रोज से कम। मम्मी कहती हैं अब ऐसी ही कम शकर वाली चाय पीनी पड़ेगी।”

कहकर वह भीतर चली गई।

मैंने संकोच से साधुरामजी की ओर देखा।

“ओ हां, याद आया। साधुरामजी, वह क्या है कि अब शकर हमारी औकात से दूर होती जा रही है। हमने सोचा, खुद ही इसके खर्च पर लगाम लगा लें। सरकार का रुख कुछ ठीक दिखाई नहीं देता।”

साधुरामजी ने चाय की प्याली नीचे रखी और अपने चेहरे को ऐसा विकृत ज्यामितीय आकार दिया, जैसे किसी चुनावी नक्शे में अचानक कोई नई सीमा खिंच गई हो।

बोले—

“लगता है राजनीति में फिर कुछ न कुछ घटेगा। महंगाई की मार वैसी ही बनी हुई है और अब यह शकर का नया किस्सा! पहले प्याज, फिर तेल, कभी दाल, कभी दूध और अब शकर। जनता के जीवन से मिठास गायब होती जा रही है। इसके कारण लोगों के दिलों में बढ़ती कड़वाहट का राजनीतिक मूल्य कहीं सरकार को न चुकाना पड़ जाए। त्योहार सामने हैं। गणेशोत्सव से लेकर दशहरा और दीपावली तक मिठाई की मांग बढ़ेगी। ऐसे में शकर राजनीति का नया चुनावी मुद्दा बन सकती है।”

साधुरामजी के भीतर का नेता जाग गया था।

“लेकिन हमें राजनीति से क्या?” मैंने कहा, “हमें तो शकर चाहिए, वह भी सस्ते दामों पर।”

यह सुनते ही उनके भीतर का सत्ता समर्थित राजनीतिज्ञ बाहर आ गया।

“क्या शकर का इस्तेमाल इतना जरूरी है तुम्हारे लिए?”

मुझे लगा जैसे कोई मधुमक्खी गुलाब से उसकी मिठास की आवश्यकता पर प्रश्नचिह्न लगा रही हो।

मैंने कहा—

“हां, मिठास भी मनुष्य की जरूरत है। और अगर आप सोचते हैं कि खाने में हम मिठास त्याग दें तो चलिए आप हमें अपनी व्यवस्था में, अपने तंत्र में ‘मीठा व्यवहार’ ही दिलवा दीजिए। हम शकर का उपयोग छोड़ देंगे।”

साधुरामजी चुप रहे।

मैंने बात आगे बढ़ाई—

“वैसे भी जब चारों तरफ कड़वाहट फैली हो तो चाय में शकर के दो चम्मच डाल देने से जिंदगी कितनी मीठी हो जाएगी? मेरा तो सुझाव है कि सरकार घरेलू बाजार की चिंता छोड़कर पूरी शकर विदेश भेज दे। उसके बदले कुछ हेलिकॉप्टर और राफेल खरीद ले। देश सुरक्षित रहेगा और संसद में जब महंगाई पर बहस होगी तो पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने में ही समय काट लेंगे। जनता को लगेगा कि उसकी शकर भले गायब हो गई, मगर राष्ट्र की सुरक्षा मीठी हो गई।”

मेरा रक्तचाप बढ़ चुका था।

साधुरामजी ने मुझे समझाने के अंदाज में कहा—

“तुम तो ख्वामखाह नाराज हो गए। मेरा मतलब यह थोड़े था। ये सब तात्कालिक स्थितियां हैं। बाजार में चीजें महंगी-सस्ती होती रहती हैं। अभी सरकार ने चीनी के स्टॉक पर सीमा लगाई है। जमाखोरी रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई जा रही है। जरूरत पड़ी तो आयात भी किया जा रहा है। सरकार सब देख रही है।”

“लेकिन कीमत तो हम देख रहे हैं।”

“तुम्हें बस कीमत दिखाई देती है। सरकार को पूरा परिदृश्य देखना पड़ता है।”

“परिदृश्य पेट में नहीं जाता, शकर जाती है।”

वे थोड़े असहज हुए।

“तुम जरा जीना सीखो। ये छोटे-छोटे अभावों से क्यों प्रभावित होते हो? तुम एक महान देश के समझदार और राष्ट्रवादी नागरिक हो। उन अमर क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करो, जिन्होंने भारी अभावों और कष्टों के बीच देश को आजाद कराया था।”

मैंने कहा—

“उन्होंने देश आजाद कराया था, चाय की प्याली नहीं।”

साधुरामजी ने मेरी बात अनसुनी कर दी।

“और आज भी तुम एक नई आजादी के दौर से गुजर रहे हो। महंगाई से आजादी, बेरोजगारी से आजादी, भ्रष्टाचार से आजादी...”

मैंने टोका—

“शकर से आजादी?”

“बिल्कुल! हर चीज का एक सकारात्मक पक्ष होता है। शकर कम खाओगे तो स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। मधुमेह का खतरा कम होगा। मोटापा घटेगा। डॉक्टर खुश होंगे। बीमा कंपनियां खुश होंगी।”

“और मेरा चाय का स्वाद?”

“राष्ट्रहित में स्वाद का त्याग करना पड़े तो करना चाहिए।”

अब साधुरामजी के शब्दों में निरंतर शकर घुल रही थी।

“हम तुम्हें क्या नहीं दे रहे! थोड़ा-सा इंतजार तो करो। इतना अधीर भी मत बनो। अच्छी चीजें आसानी से नहीं मिलतीं। अच्छे दिनों के लिए थोड़ा-बहुत सेक्रिफाइस और त्याग तो हर नागरिक को करना पड़ेगा। तुम भी क्या इस तुच्छ-सी शकर का रोना लेकर बैठ गए!”

मैंने कहा—

“साधुरामजी, मैं आपकी मीठी-मीठी बातों में आने वाला नहीं हूं। सरकार को चाहिए कि शकर सस्ते दामों पर उपलब्ध कराए। बस।”

वे क्रोधित हो गए।

“तुम भी अजीब आदमी हो! एक मामूली-सी चीज के लिए अड़े हो। मांगना ही है तो महंगाई भत्ते की किश्त मांगो। जो दिया जा सके, वह मांगो। वेतन बढ़ेगा तो शकर महंगी होने का दुख कुछ कम होगा।”

“लेकिन अगर वेतन बढ़ने से पहले शकर और महंगी हो गई तो?”

उन्होंने मेरी ओर देखा।

“तुम हर बात में समस्या क्यों खोजते हो?”

“क्योंकि समस्या हर बात में खुद को खोज लेती है।”

साधुरामजी ने चाय की अंतिम चुस्की ली। प्याली में बची हुई चाय में शकर का इतना कम अंश था कि शायद वह स्वयं भी सरकार की तरह यह बताने की स्थिति में नहीं थी कि उसमें मिठास है या सिर्फ मिठास का वादा।

साधुरामजी आंखें लाल किए, पैर पटकते हुए लौट गए।

मैं काफी देर तक खाली प्याली को देखता रहा।

अचानक मुझे लगा कि असली संकट शकर का नहीं, मिठास का है।

शकर महंगी हुई तो हमने चाय में कम कर दी। मिठाई महंगी हुई तो हमने मिठाई कम कर दी। सब्जी महंगी हुई तो मात्रा घटा दी। पेट्रोल महंगा हुआ तो यात्राएं कम कर दीं। बिजली महंगी हुई तो पंखे की गति कम कर दी।

हमने हर चीज में समझौता कर लिया।

सिर्फ एक चीज है जिसकी कीमत बढ़ने के बावजूद हम उसे कम नहीं कर पा रहे—

राजनीतिक वादों की मिठास।

वह आज भी भरपूर है।

इतनी भरपूर कि महंगाई की कड़वी चाय भी पी जाए तो गले से उतर जाती है।


****

ब्रजेश कानूनगो 

Friday, August 21, 2026

महाराज श्रृंखला 19 : आक्रोश का प्रबंधन

 महाराज श्रृंखला 19 : आक्रोश का प्रबंधन


पीपी गणराज्य में युवा आक्रोश अब केवल आक्रोश नहीं रह गया था। वह धीरे-धीरे संगठित होने लगा था।
पहले युवा अलग-अलग चौराहों पर खड़े होकर सरकार को कोसते थे। फिर वे एक-दूसरे से मिलने लगे। फिर उन्होंने एक-दूसरे के मोबाइल नंबर लिए। फिर व्हाट्सऐप समूह बने। फिर उन समूहों के नाम रखे गए।
किसी का नाम था—‘रोजगार चाहिए’।
किसी का—‘पेपर लीक बंद करो’।
किसी का—‘डिग्री का सम्मान करो’।
और एक समूह का नाम था—‘अबकी बार जवाब’।
सरकार के खुफिया विभाग ने इन सभी समूहों की जानकारी महाराज को भेजी।
महाराज ने रिपोर्ट पढ़ी और मुस्कराए।
“इतने सारे समूह हैं?”
ज्ञान रिपु बोले—
“जी महाराज।”
“तो इनमें एकता कैसे आएगी?”
“यही तो चिंता है महाराज।”
महाराज कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“तो चिंता किस बात की? एकता नहीं है तो आंदोलन कैसे होगा?”
ज्ञान रिपु ने धीरे से कहा—
“महाराज, यही तो खतरा है। यदि अलग-अलग नदियां मिल गईं तो बाढ़ आ सकती है।”
महाराज का चेहरा गंभीर हो गया।
“फिर नदियों को अलग-अलग ही रखना होगा।”
यह वाक्य उसी दिन से सरकार की नई नीति का आधार बन गया।
आंदोलन का पहला चरण
सरकार ने सबसे पहले युवाओं को समझाने का फैसला किया।
एक विशाल सम्मेलन बुलाया गया।
नाम रखा गया—
‘युवा संवाद : विकसित पीपी गणराज्य में युवाओं की भूमिका’
हॉल में वातानुकूलन था।
मंच पर महाराज की विशाल तस्वीर थी।
पीछे लिखा था—
“युवा ही भविष्य हैं।”
हॉल के बाहर हजारों बेरोजगार युवा धूप में खड़े थे।
अंदर चुनिंदा युवाओं को बुलाया गया था।
वे युवा जिनकी नियुक्ति हो चुकी थी।
कुछ युवा संगठन के पदाधिकारी थे।
कुछ मंत्रियों के रिश्तेदार।
कुछ ऐसे थे जिन्हें हाल ही में किसी सरकारी योजना में ‘युवा प्रतिनिधि’ बना दिया गया था।
महाराज मंच पर आए।
तालियां बजीं।
उन्होंने कहा—
“मेरे प्यारे युवाओं! तुम देश का भविष्य हो।”
पीछे बैठे एक युवक ने धीरे से अपने साथी से कहा—
“वर्तमान कौन है?”
दूसरे ने कहा—
“वर्तमान तो महाराज हैं।”
दोनों हंस पड़े।
महाराज ने भाषण जारी रखा—
“हमने युवाओं के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं।”
बाहर खड़ा बेरोजगार युवक अपने मित्र से पूछ रहा था—
“कहां?”
मित्र बोला—
“शायद अंदर।”

दूसरा चरण : समिति
सम्मेलन से कोई समाधान नहीं निकला।
इसलिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई।
समिति का नाम था—
‘युवा आकांक्षा एवं रोजगार संवर्धन आयोग।’
उसमें अध्यक्ष बनाया गया एक ऐसे व्यक्ति को, जो पिछले चालीस वर्षों से सरकारी सेवा में था और जिसकी उम्र सेवानिवृत्ति के करीब थी।
समिति ने युवाओं से सुझाव मांगे।
सुझावों के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया।
युवाओं ने हजारों सुझाव भेजे।
किसी ने कहा—नौकरियां बढ़ाइए।
किसी ने कहा—पेपर लीक रोकिए।
किसी ने कहा—भर्ती समय पर कराइए।
किसी ने कहा—शिक्षकों के पद भरिए।
किसी ने कहा—सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता लाइए।
समिति ने सभी सुझावों को स्वीकार किया।
फिर उन्हें एक फाइल में रख दिया।
फाइल पर लिखा गया—
“अत्यंत महत्वपूर्ण।”
और फाइल अलमारी में रख दी गई।
अलमारी पर लिखा था—
“कार्यवाही हेतु।”

तीसरा चरण : आंदोलन
इस बीच आंदोलन बढ़ता गया।
अब राजधानी में प्रतिदिन प्रदर्शन होने लगे।
युवा नारे लगाते—
“रोजगार दो!”
“भर्ती दो!”
“पेपर लीक बंद करो!”
“शिक्षा बचाओ!”
“सिफारिश बंद करो!”
सरकार ने पहले इसे छोटा आंदोलन बताया।
फिर असामाजिक तत्वों का आंदोलन बताया।
फिर विपक्ष की साजिश बताया।
फिर विदेशी शक्तियों का षड्यंत्र बताया।
और अंत में जब भीड़ कम नहीं हुई तो सरकार ने कहा—
“हम युवाओं की भावनाओं का सम्मान करते हैं।”
यह सरकार का वह वाक्य था जिसका अर्थ था कि अब कुछ करने का समय आ गया है।

दमन की पहली बारिश
एक रात आंदोलनकारियों के शिविरों पर पुलिस पहुंची।
कहा गया—
“यह क्षेत्र खाली कर दीजिए।”
युवाओं ने पूछा—
“क्यों?”
पुलिस ने कहा—
“व्यवस्था बनाए रखने के लिए।”
एक युवक ने पूछा—
“व्यवस्था किसकी?”
पुलिस अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“सरकार की।”
युवक ने कहा—
“हम भी तो सरकार के ही नागरिक हैं।”
अधिकारी ने कहा—
“बहुत सवाल करते हो।”
उस रात कई तंबू उखाड़ दिए गए।
कई पोस्टर फाड़ दिए गए।
कुछ युवाओं को हिरासत में लिया गया।
सुबह अखबारों में खबर आई—
“राजधानी में यातायात व्यवस्था बाधित करने वाले कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया।”
‘बेरोजगार युवा’ शब्द खबर में कहीं नहीं था।

चौथा चरण : प्रलोभन
दमन से आंदोलन कम नहीं हुआ।
तब महाराज ने नीति बदली।
उन्होंने घोषणा की—
“हर जिले में युवा सलाहकार परिषद बनाई जाएगी।”
कुछ युवाओं को सदस्य बनाया गया।
उन्हें पहचान-पत्र मिले।
कुछ को यात्रा भत्ता मिला।
कुछ को सरकारी कार्यक्रमों में मंच मिला।
कुछ को समितियों में पद मिला।
कुछ को ठेके मिले।
कुछ को छात्रवृत्ति मिली।
और कुछ को वह मिला जो सबसे प्रभावी था—
महाराज के साथ सेल्फी।
धीरे-धीरे आंदोलन में दरार दिखाई देने लगी।
कुछ युवाओं ने कहा—
“सरकार हमारी बात सुन रही है।”
दूसरों ने कहा—
“सरकार हमें खरीद रही है।”
पहले वाले युवाओं को दूसरा समूह ‘व्यावहारिक’ कहता था।
दूसरा समूह पहले वालों को ‘बिकाऊ’ कहता था।
सरकार चुपचाप दोनों को देख रही थी।
पांचवां चरण : अपने आंदोलनकारी
महाराज ने एक दिन ज्ञान रिपु को बुलाया।
“आंदोलन अभी भी चल रहा है?”
“जी महाराज।”
“उसमें हमारे लोग कितने हैं?”
ज्ञान रिपु चौंके।
“महाराज?”
“मेरा मतलब है—सरकार की नीतियों को समझने वाले कितने लोग हैं?”
ज्ञान रिपु समझ गए।

कुछ दिनों बाद राजधानी में एक नया युवा संगठन सामने आया—
‘राष्ट्र युवा विकास मंच।’
उसका अध्यक्ष एक ऐसा युवक था जो पिछले महीने तक सरकार की आलोचना करता था।
अब वह सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करता था।
उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा—
“कुछ लोग बेरोजगारी के नाम पर देश को बदनाम कर रहे हैं।”
एक पत्रकार ने पूछा—
“लेकिन आप तो स्वयं बेरोजगार थे?”
युवक मुस्कराया—
“अब मैं रोजगारयुक्त विचारधारा का प्रतिनिधि हूं।”
पत्रकार चुप हो गया।
आंदोलन की भाषा बदल गई
अब आंदोलन में दो तरह के नारे लगने लगे।
एक तरफ—
“रोजगार दो!”
दूसरी तरफ—
“राष्ट्र विरोधियों से सावधान!”
एक तरफ—
“पेपर लीक बंद करो!”
दूसरी तरफ—
“पेपर लीक का मुद्दा उठाना विपक्ष की साजिश है!”
एक तरफ—
“युवाओं का भविष्य बचाओ!”
दूसरी तरफ—
“महाराज के नेतृत्व में भविष्य सुरक्षित है!”
युवाओं का मूल प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक बहस में बदल गया।
नौकरी गायब हो गई।
पेपर लीक गायब हो गया।
शिक्षा गायब हो गई।
बेरोजगारी गायब हो गई।
अब सवाल था—
“महाराज के साथ कौन है?”
और—
“महाराज के खिलाफ कौन है?”
जिस युवक ने कल तक नौकरी मांगी थी, आज उससे पूछा जा रहा था—
“तुम महाराज के पक्ष में हो या विपक्ष में?”
वह कहता—
“मैं तो नौकरी के पक्ष में हूं।”
लोग हंसते।
उसे समझाया जाता—
“इतना सरल मत बनो। यह राजनीति है।”
महाराज की सफलता
एक दिन महाराज ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक में घोषणा की—
“युवा आंदोलन अब नियंत्रण में है।”
सभी मंत्रियों ने मेज थपथपाई।

ज्ञान रिपु ने कहा—
“महाराज, आपने आक्रोश को अवसर में बदल दिया।”
मोटाभाई काला बोले—
“और अवसर को संगठन में।”
एक मंत्री ने कहा—
“और संगठन को समर्थन में।”
महाराज मुस्कराए।
“यही शासन कला है।”
लेकिन उसी समय राजधानी से बहुत दूर एक छोटे कस्बे में कुछ बेरोजगार युवक एक पुराने पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठे थे।
उनके पास न कोई नेता था।
न कोई संगठन।
न कोई सरकारी पद।
न कोई मंच।
वे बस आपस में बात कर रहे थे।
एक युवक ने कहा—
“हमने आंदोलन इसलिए शुरू नहीं किया था कि हमें महाराज के पक्ष या विपक्ष में बांटा जाए।”
दूसरे ने कहा—
“हमने नौकरी मांगी थी।”
तीसरे ने कहा—
“हमने शिक्षा मांगी थी।”
चौथे ने कहा—
“हमने अपने भविष्य पर अपना अधिकार मांगा था।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर सबसे शांत बैठे युवक ने कहा—
“तो फिर हमें वापस उसी सवाल पर जाना होगा।”
“कौन-सा सवाल?”
उसने कहा—
“हमारा भविष्य किसका है?”
सभी चुप हो गए।
पुराने पुस्तकालय की बंद खिड़की के पीछे धूल से ढकी किताबें उन्हें देख रही थीं।
शायद वर्षों बाद किसी पीढ़ी ने किताबों से बाहर निकलकर सवाल करना शुरू किया था।
और पीपी गणराज्य के लिए असली खतरा यही था।
क्योंकि सत्ता नारों से नहीं डरती।
सत्ता विरोध से भी नहीं डरती।
सत्ता तो उस दिन डरती है जब नागरिक सवाल पूछना सीख जाते हैं—और सवाल का उत्तर मिलने तक चुप नहीं बैठते।

महल में उस रात महाराज देर तक सो नहीं सके।
उन्हें पहली बार लगा कि आंदोलन को दबाना आसान था।
उसे खरीदना भी आसान था।
उसे बांटना भी आसान था।
लेकिन अगर आंदोलन ने सोचना सीख लिया, तो उसका प्रबंधन कठिन हो जाएगा।
महाराज ने खिड़की खोली।
दूर कहीं युवाओं की आवाज आ रही थी—
“हमें भविष्य चाहिए।”
महाराज ने खिड़की बंद कर दी।
ज्ञान रिपु ने पूछा—
“महाराज, आवाज तेज थी?”
महाराज ने कहा—
“नहीं।”
फिर कुछ सोचकर बोले—
“लेकिन पहली बार मुझे साफ सुनाई दी।”

***

महाराज श्रृंखला 18 :विकास की आत्मा और बेरोजगारों की बारात

 महाराज श्रृंखला  18 :विकास की आत्मा और बेरोजगारों की बारात

पाषाणपुष्प गणराज्य का नाम अब देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंच चुका था। दुनिया के लोग उसे प्यार से पी पी रिपब्लिक कहने लगे थे। देश के भीतर भी हिंदी प्रेमियों ने अपनी सुविधा के लिए उसे पीपी गणराज्य कहना शुरू कर दिया था।

महाराज को यह नाम बहुत पसंद आया।

उन्हें लगा कि छोटे नामों में बड़ा प्रभाव होता है। उन्होंने अपने सलाहकारों से कहा—

“देखो, नाम ऐसा होना चाहिए जिसे दुनिया का हर आदमी आसानी से बोल सके। इसमें आधुनिकता भी हो और मौलिकता भी।”

ज्ञान रिपु ने तत्काल समर्थन किया—

“महाराज, पीपी का अर्थ हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी सुविधा के अनुसार कुछ भी बता सकते हैं। पाषाणपुष्प तो वैसे भी बहुत लंबा हो जाता है।”

महाराज प्रसन्न हुए।


उधर पीपी गणराज्य विकास के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा था। हर दिन कोई न कोई नई परियोजना उद्घाटित होती। फीते कटते, पट्टिकाएं लगतीं, ड्रोन उड़ते और समाचार चैनलों पर विकास की ऐसी तस्वीरें दिखाई जातीं कि लगता था देश अब सीधे स्वर्ग से जुड़ने वाला है।

सड़कों पर चमकदार डिवाइडर थे। पुल थे। भवन थे। अस्पताल थे। विश्वविद्यालय थे। विद्यालय थे। पुस्तकालय भी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते थे।

बस, इन सबमें एक छोटी-सी कमी थी।

इनमें जीवन कम था।

अस्पतालों में भवन थे, बिस्तर थे, उद्घाटन की तस्वीरें थीं, लेकिन डॉक्टर कम थे।

विद्यालयों में कमरे थे, स्मार्ट बोर्ड थे, कंप्यूटर थे, लेकिन शिक्षक कम थे।

विश्वविद्यालयों में विशाल भवन थे, सभागार थे, दीक्षांत समारोह थे, लेकिन पढ़ाने वाले लोग कम थे।

पुस्तकालयों में अलमारियां थीं, मगर किताबों से अधिक धूल थी।

सरकार ने इसे भी उपलब्धि माना।

एक अधिकारी ने कहा—

“पहले हमारे पास पुस्तकालय ही नहीं थे। अब पुस्तकालय हैं और धूल भी है। इसका मतलब है कि हमने आधारभूत संरचना के साथ पर्यावरण संरक्षण भी कर दिया है।”

महाराज ने इस उपलब्धि को अपनी अगली उपलब्धियों की सूची में जोड़ लिया।


पीपी गणराज्य की एक विशेषता यह भी थी कि यहां प्रतिभाएं पैदा खूब होती थीं, मगर टिकती नहीं थीं।

जो बच्चा पढ़ाई में अच्छा निकलता, वह आगे चलकर देश छोड़ने की तैयारी करने लगता। जो शिक्षक योग्य होता, वह किसी दूसरे देश के विश्वविद्यालय में आवेदन कर देता। जो वैज्ञानिक कुछ नया सोचता, उसे किसी और देश की प्रयोगशाला अधिक आकर्षक लगती।

सरकार इसे ब्रेन ड्रेन कहती थी।

युवक इसे ब्रेन का पलायन कहते थे।

और मंत्री इसे वैश्विक अवसरों का लाभ उठाना कहते थे।

ज्ञान रिपु ने इस समस्या पर एक कविता भी लिखी—

“मस्तिष्क जहां सम्मान पाए,

वहीं उड़ जाए, वहीं समाए।”

महाराज ने कविता सुनकर कहा—

“बहुत सुंदर! इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे देश के मस्तिष्क इतने स्वतंत्र हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”

किसी ने धीरे से कहा—

“मगर महाराज, उन्हें रोकना कौन चाहता है? लोग तो चाहते हैं कि वे यहां रहें।”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

वह चुप हो गया।



शिक्षा का अर्थ भी धीरे-धीरे बदल रहा था।

पहले शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, विवेक और मनुष्य को बेहतर नागरिक बनाना माना जाता था। अब उसका उद्देश्य किसी तरह प्रमाणपत्र प्राप्त करना और फिर किसी नौकरी की खोज में वर्षों तक भटकना रह गया था।

स्कूलों में बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जाता था।

भविष्य में क्या होगा, यह किसी को पता नहीं था।

कॉलेजों में डिग्रियां मिलती थीं।

डिग्री लेने के बाद युवा पूछता—

“अब इसका क्या करूं?”

उत्तर मिलता—

“प्रतियोगी परीक्षा दो।”

प्रतियोगी परीक्षा देने के लिए कोचिंग करो।

कोचिंग के लिए पैसा चाहिए।

पैसे के लिए नौकरी चाहिए।

नौकरी के लिए डिग्री चाहिए।

डिग्री के लिए कॉलेज चाहिए।

और कॉलेज की फीस के लिए फिर पैसा चाहिए।

युवक इस चक्र को समझते-समझते प्रतियोगिता परीक्षा की उम्र पार कर जाता।

फिर सरकार उसे समझाती—

“युवा धैर्य रखें। अवसर बहुत हैं।”

युवक पूछता—

“कहां हैं?”

सरकार कहती—

“अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं, लेकिन आएंगे।”

युवक पूछता—

“कब?”

सरकार कहती—

“उचित समय पर।”

उचित समय पीपी गणराज्य का सबसे रहस्यमय समय था। वह कभी आता नहीं था, मगर हर घोषणा में मौजूद रहता था।



आखिरकार युवाओं ने रोजगार का अपना रास्ता खोज लिया।

डिलीवरी कंपनियों के दरवाजे खुल गए।

कुरियर कंपनियां बढ़ गईं।

ऐप आधारित काम ने बेरोजगारी को एक नया नाम दे दिया—गिग इकॉनमी।

अब बेरोजगार युवक बेरोजगार नहीं कहलाता था।

वह ‘डिलीवरी पार्टनर’ था।

उसके पास नौकरी नहीं थी, लेकिन एक ऐप था।

उसके पास निश्चित वेतन नहीं था, लेकिन प्रोत्साहन था।

उसके पास भविष्य की सुरक्षा नहीं थी, लेकिन रेटिंग थी।

उसके पास छुट्टी नहीं थी, मगर ‘लॉग आउट’ करने की सुविधा थी।

वह सुबह घर से निकलता और रात तक शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक भोजन, दवाइयां, कपड़े, दस्तावेज और कभी-कभी लोगों की उम्मीदें भी पहुंचाता।

लोग उसे देखकर कहते—

“बहुत मेहनती लड़का है।”

वह मुस्करा देता।

उसे मालूम था कि वह मेहनती कम और मजबूर ज्यादा है।

उसकी बाइक पर किसी और का खाना था और उसके मन में अपने घर का राशन।


जो युवक डिलीवरी नहीं करना चाहता था, वह प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करता।

उसके कमरे की दीवारों पर महान लोगों के चित्र लगे होते।

टेबल पर किताबों का ढेर होता।

मोबाइल में ऑनलाइन क्लासें चलतीं।

मां चाय रखकर जाती और पूछती—

“बेटा, इस बार हो जाएगा न?”

बेटा कहता—

“हां मां।”

वह खुद भी यही विश्वास करना चाहता था।

फिर एक सुबह खबर आती—

“प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही लीक।”

युवक कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहता।

फिर किताब बंद कर देता।

दूसरे दिन सरकार जांच समिति बना देती।

तीसरे दिन समिति के अध्यक्ष का नाम घोषित होता।

चौथे दिन विपक्ष आरोप लगाता।

पांचवें दिन सरकार आरोपों को राजनीति बताती।

छठे दिन एक नया मुद्दा आ जाता।

और सातवें दिन युवक फिर किताब खोल लेता।

क्योंकि उसके पास किताब के अलावा था ही क्या?

कुछ युवक दूसरी बार परीक्षा देते।

कुछ तीसरी बार।

कुछ चौथी बार।

फिर एक दिन वे परीक्षा देना छोड़ देते।

किसी ने कहा—

“मैं पढ़ाई नहीं छोड़ रहा हूं। मैंने सिर्फ व्यवस्था पर विश्वास करना छोड़ दिया है।”

उसकी यह बात सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

सरकार ने इसे युवाओं में नकारात्मकता फैलाने का प्रयास बताया।


पीपी गणराज्य में योग्यता का अर्थ भी धीरे-धीरे बदल रहा था।

योग्य वह नहीं था जो सबसे अधिक पढ़ा हो।

योग्य वह था जो सही व्यक्ति को जानता हो।

योग्य वह नहीं था जो परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाता हो।

योग्य वह था जिसके पास सही सिफारिश हो।

योग्य वह नहीं था जो गरीब घर में बैठकर रात-रात भर पढ़ता हो।

योग्य वह था जिसके परिवार के पास अवसर खरीदने की क्षमता हो।

गरीब बच्चे किताबों के पन्ने पलटते रहे और समर्थ बच्चों ने अवसरों के दरवाजे।

धीरे-धीरे युवाओं को समझ आने लगा कि प्रतियोगिता केवल परीक्षा में नहीं है।

प्रतियोगिता तो पहले ही कहीं और तय हो चुकी है।

परीक्षा सिर्फ परिणाम घोषित करने की रस्म है।


शहरों के चौराहों पर अब युवा दिखाई देने लगे थे।

पहले वे राजनीतिक रैलियों में दिखाई देते थे।

अब वे अपनी रैलियां करने लगे।

पहले वे नेताओं के भाषण सुनते थे।

अब नेता उनके भाषण सुनने लगे।

पहले वे सरकार से नौकरी मांगते थे।

अब वे सरकार से सवाल पूछने लगे।

और सवाल सरकार के लिए सबसे असुविधाजनक आविष्कार था।


एक दिन कुछ युवाओं ने राजधानी के मुख्य चौक पर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया।

उनके हाथों में डिग्रियां थीं।

किसी के हाथ में बी.ए. था, किसी के हाथ में एम.ए., किसी के हाथ में इंजीनियरिंग की डिग्री, किसी के हाथ में शोध की उपाधि।

एक युवक ने अपनी डिग्री ऊपर उठाकर कहा—

“यह मेरी योग्यता है।”

दूसरे ने कहा—

“और यह मेरी बेरोजगारी।”

तीसरे ने कहा—

“यह मेरी प्रतियोगिता परीक्षा की किताब है।”

चौथे ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला—

“और यह उस प्रश्नपत्र का स्क्रीनशॉट है जो परीक्षा से पहले बिक चुका था।”

भीड़ में एक डिलीवरी बॉय भी खड़ा था।

उसने अपनी पीठ पर लटका बैग उतारा और कहा—

“इसमें दूसरों का खाना है। घर पर मेरे बच्चे भूखे हैं।”


कुछ देर के लिए पूरा चौक शांत हो गया।

फिर किसी ने नारा लगाया—

“हमें भाषण नहीं, रोजगार चाहिए!”

दूसरी ओर से आवाज आई—

“हमें भवन नहीं, शिक्षक चाहिए!”

तीसरी आवाज आई—

“हमें परीक्षा चाहिए, परीक्षा का तमाशा नहीं!”

और फिर हजारों कंठ एक साथ बोल उठे।

महाराज के सलाहकारों ने तुरंत आपात बैठक बुलाई।

ज्ञान रिपु ने कहा—

“महाराज, इसे युवाओं का भावनात्मक उत्सर्जन समझना चाहिए।”

मोटाभाई काला बोले—

“नहीं, इसे सोशल मीडिया की साजिश बताइए।”

एक अन्य मंत्री ने सुझाव दिया—

“युवाओं को देश के उज्ज्वल भविष्य की तस्वीर दिखाइए।”

महाराज ने पूछा—

“लेकिन तस्वीर में भविष्य कहां है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

काफी देर बाद ज्ञान रिपु ने धीरे से कहा—

“महाराज, भविष्य अभी निर्माणाधीन है।”

महाराज को यह उत्तर पसंद आया।

उन्होंने तत्काल घोषणा करवा दी—

“पीपी गणराज्य के युवाओं का भविष्य निर्माणाधीन है।”

अगले दिन सरकारी विज्ञापन छपे।

बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

“युवा शक्ति, राष्ट्र शक्ति!”

नीचे महाराज की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी।

युवाओं ने विज्ञापन देखा।

कुछ हंसे।

कुछ नाराज हुए।

और कुछ ने पहली बार सोचा—

“अगर हम ही राष्ट्र की शक्ति हैं, तो फिर हमारी आवाज इतनी कमजोर क्यों है?”

उस दिन से पीपी गणराज्य में एक नया शब्द जन्मा—

युवा आक्रोश।

महाराज को अभी इसकी गंभीरता समझ में नहीं आई थी।

वे समझ रहे थे कि आक्रोश भी बाकी चीजों की तरह एक अभियान है।

एक पोस्टर लगेगा।

एक भाषण होगा।

एक समिति बनेगी।

कुछ घोषणाएं होंगी।

और सब शांत हो जाएगा।

मगर इस बार समस्या कुछ अलग थी।

यह आक्रोश किसी विपक्षी दल ने पैदा नहीं किया था।

यह किसी विदेशी शक्ति की देन नहीं था।

यह किसी सोशल मीडिया अभियान से पैदा नहीं हुआ था।

यह उन युवाओं के भीतर पैदा हुआ था जिन्होंने वर्षों तक पढ़ाई की थी, सपने देखे थे, परीक्षाएं दी थीं, इंतजार किया था और अंततः पाया था कि उनके सामने अवसरों से अधिक बहाने खड़े हैं।

और जब किसी पीढ़ी को बार-बार भविष्य का वादा दिया जाता है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से केवल प्रतीक्षा आती है, तो एक दिन वह प्रतीक्षा करना बंद कर देती है।

पीपी गणराज्य में वह दिन धीरे-धीरे नजदीक आ रहा था।

महाराज को अभी खबर नहीं थी।

क्योंकि राजधानी के महल की खिड़कियां बहुत ऊंची थीं।

और नीचे खड़े युवाओं की आवाज अभी महल की दीवारों तक पहुंचनी शुरू ही हुई थी।

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ब्रजेश कानूनगो