Sunday, August 23, 2026

लोकतंत्र में सब ठीक है

लोकतंत्र में सब ठीक है

लोकतंत्र में सब ठीक है। यह बात मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ, क्योंकि आजकल विश्वास ही सबसे बड़ा प्रमाण है। प्रमाण माँगना संदेह पैदा करता है और संदेह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता।

हमारे यहाँ हर चीज लोकतांत्रिक है। सरकार लोकतांत्रिक है, चुनाव लोकतांत्रिक हैं, योजनाएँ लोकतांत्रिक हैं, भाषण लोकतांत्रिक हैं और यहाँ तक कि झूठ भी लोकतांत्रिक ढंग से बोला जाता है। फर्क इतना है कि झूठ बोलने वाला जितने अधिक लोगों को विश्वास दिला दे, उसका झूठ उतना ही लोकतांत्रिक हो जाता है।

सच बेचारा इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में थोड़ा असहज है। उसे बार-बार अपना परिचय देना पड़ता है। प्रमाणपत्र दिखाने पड़ते हैं। स्रोत बताने पड़ते हैं। वह सामने खड़ा होकर कहता है—“मैं सच हूँ।”

लोग पूछते हैं—“किसके पक्ष में?”

सच कहता है—“किसी के पक्ष में नहीं।”

बस, यहीं से उसकी परेशानी शुरू हो जाती है।


आजकल निष्पक्ष होना भी संदेहास्पद चरित्र का प्रमाण है। यदि आप सत्ता की आलोचना करते हैं तो आप विरोधी हैं। यदि विपक्ष की आलोचना करते हैं तो आप सत्ता के आदमी हैं। और यदि दोनों की आलोचना कर दें तो आप बुद्धिजीवी हैं—यह एक ऐसा शब्द है जिसे अब प्रशंसा और गाली के बीच कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

आप ज्ञान की बात करें तो लोग पूछते हैं—“आप किस खेमे के हैं?” आप तर्क दें तो पूछा जाता है—“आपकी विचारधारा क्या है?” आप तथ्य रखें तो सामने वाला अपना मोबाइल निकालकर आपके खिलाफ कोई पुराना स्क्रीनशॉट ढूँढ़ने लगता है।

तथ्य का उत्तर अब तथ्य से देना जरूरी नहीं है। एक आरोप पर्याप्त है।


लोकतंत्र में आरोप बहुत उपयोगी वस्तु है। वह सस्ता है, आसानी से उपलब्ध है और उसकी कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

आपने सवाल पूछा—आप पर आरोप। आपने सवाल का उत्तर माँगा—आप पर दूसरा आरोप। आपने कहा कि आरोप गलत है—आप पर तीसरा आरोप। अंततः आप अपने सवाल को भूलकर अपने ऊपर लगे आरोप का स्पष्टीकरण देने लगते हैं। यही लोकतांत्रिक संवाद की सफलता है।


हमारे यहाँ अभिव्यक्ति का भी बड़ा महत्व है। एक मन धतूरा भीतर रखिए और जुबान पर शहद लगाइए। मुस्कुराते हुए ऐसी बातें कहिए कि सामने वाला आपको अपना हितैषी समझे और पीछे से आप उसकी जेब हल्की कर दें। लोकतंत्र में छुरी को भी मुस्कुराना आ गया है।

लोकतंत्र में प्रेम भी खूब है। प्रेम के ढाई आखर पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती। यहाँ प्रेम का अर्थ है—आप मेरे साथ, मैं आपके साथ।

जो कल तक सबसे बड़ा विरोधी था, आज सबसे बड़ा मित्र हो सकता है। जो कल तक लोकतंत्र का दुश्मन था, आज लोकतंत्र बचाने के लिए आपके साथ मंच पर खड़ा दिखाई दे सकता है।

जनता पूछती है—“यह कैसे हुआ ?”

नेता मुस्कुराकर कहता है—“राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता।”

जनता कहती है—“फिर स्थायी क्या होता है?”

नेता कहता है—“कुर्सी।”

यह उत्तर लोकतंत्र का सबसे छोटा और सबसे प्रामाणिक राजनीतिक दर्शन हो सकता है।


कुर्सी बड़ी अद्भुत चीज है। वह आदमी को बदलती नहीं, उसके भीतर छिपे आदमी को बाहर निकालती है। जो आदमी चुनाव से पहले जनता के घर की चौखट पर बैठकर चाय पीता है, वही चुनाव के बाद जनता को मिलने के लिए अपॉइंटमेंट माँगने को कहता है। चुनाव के समय नेता जनता के बीच होता है और चुनाव के बाद जनता नेता के काफिले के बीच फँसी रहती है।

पहले राजा घोड़े पर निकलता था तो रास्ता खाली कराया जाता था। आज लोकतंत्र में नेता मोटरगाड़ियों के लंबे काफिले में निकलता है तो भी रास्ता खाली कराया जाता है। अंतर केवल इतना है कि तब इसे राजशाही कहा जाता था और अब इसे प्रोटोकॉल कहा जाता है। लोकतंत्र ने बस राजशाही की पोशाक बदल दी है।

रंग-बिरंगी पोशाकें दिन में चार बार बदलना अब राजनीतिक कला है। सुबह किसान के साथ खड़े होकर कुर्ता पहनिए, दोपहर में युवाओं के साथ जींस पहन उनके जैसी भाषा बोलिए, शाम को उद्योगपतियों के साथ सूट पहनिए और रात में टीवी पर राष्ट्र की चिंता करते हुए गंभीर हो जाइए। राजनीति में कपड़े केवल शरीर नहीं ढँकते, विचार भी ढँकते हैं।


किसान की पत्तल में काजू सुहाता नहीं , लेकिन किसी बड़े सेठ के समारोह में काजू न हो तो मेन्यू अधूरा माना जाता है। देवताओं को छप्पन भोग लगते हैं। नेताओं के स्वागत में भी छप्पन व्यंजन सजते हैं। गरीब की थाली में सरकारी योजना की तस्वीर सजती है। मुफ़्त राशन की डिजिटल तस्वीरें भूख नहीं मिटाती, भूख डिजिटल नहीं होती, राशन भिजवाना जरूरी हो जाता है। वोटर खुश होकर मतदान करके अपना दायित्व निभा आता है। 

गरीबी हटाने की योजनाएँ इतनी सफल हैं कि गरीबी अब भी वहीं है और अमीरी कई नए पते खोज चुकी है।

कभी-कभी लगता है हमने गरीबी हटाई नहीं, गरीबी की परिभाषा बदल दी।

जिसके घर में दो वक्त का भोजन नहीं था, वह गरीब था। अब जिसके पास पाँच करोड़ नहीं हैं, उसे शायद आर्थिक रूप से पीछे कहा जा सकता है।


सरकार की उपलब्धियों का हिसाब अलग है और जनता की जिंदगी का हिसाब अलग। सरकारी रिपोर्ट कहती है—“विकास हुआ।”जनता पूछती है—“कहाँ?” रिपोर्ट कहती है—“देखिए आँकड़े।”जनता कहती है—“मगर मेरे गाँव में अस्पताल में डॉक्टर नहीं है।” उत्तर आता है—“अस्पताल तो है न!” स्कूल है, शिक्षक नहीं। पुस्तकालय है, पुस्तकें नहीं। सड़क है, गड्ढे भी हैं। नल है, पानी भी है कभी-कभी। योजना है, लाभार्थी सूची है। और सबसे बड़ी बात—उद्घाटन की तस्वीर है।

लोकतंत्र में तस्वीर का महत्व समझिए। काम हो या न हो, तस्वीर होनी चाहिए। पुल का उद्घाटन हो जाए, पुल बाद में बने तो भी चलेगा। शिलान्यास हो जाए तो काम की आधी जिम्मेदारी पूरी मानी जा सकती है।


सरकारें आती-जाती हैं, उद्घाटन पट्टिकाएँ रह जाती हैं। उन पर नाम बदलते रहते हैं। एक दिन कोई इतिहासकार आएगा और पट्टिकाएँ देखकर तय करेगा कि देश में जितना विकास हुआ, उसका आधा तो उद्घाटन समारोहों में ही हो गया था। जनता के लिए योजनाएँ आती हैं। योजनाओं के साथ विज्ञापन आते हैं। विज्ञापनों के साथ चेहरे आते हैं। चेहरे के साथ प्रशस्ति मंडली आती है।

मंडली का काम सरल है—जो हुआ है उसे महान बताना और जो नहीं हुआ है उसे होने वाला बताना।

मंडली को कभी-कभी यह भी पता नहीं होता कि उपलब्धि क्या है, लेकिन तालियाँ कब बजानी हैं, इसका उसे पूरा ज्ञान होता है।

नेता बोलता है। मंडली तालियाँ बजाती है। नेता रुकता है। मंडली फिर तालियाँ बजाती है। नेता पानी पीता है। मंडली मुस्कुराती है।

नेता कुछ भूल जाता है। मंडली कहती है—“ऐतिहासिक!”

लोकतंत्र में प्रशंसा का बाजार बहुत बड़ा है। आलोचना करने के लिए बुद्धि चाहिए, प्रशंसा करने के लिए केवल अवसर पहचानने की क्षमता। और अवसर पहचानने वाले लोग कभी बेरोजगार नहीं रहते।

सत्ता के आसपास मंडली क्यों रहती है, इसका उत्तर बहुत कठिन नहीं है। सत्ता के पास संसाधन होते हैं और संसाधनों के आसपास प्रशंसा स्वतः उत्पन्न होती है।


नेता सामने दिखाई देता है। पीछे कौन है, यह दिखाई नहीं देता।नीति सामने बनती है। उसका मसौदा कहाँ तैयार हुआ, यह दिखाई नहीं देता। जनहित सामने लिखा होता है। हित किसका हुआ, यह पीछे की पंक्ति में छूट जाता है।

लोकतंत्र में पूँजी और सत्ता का रिश्ता भी अब बहुत सभ्य हो गया है। पहले इसे देखकर लोग असहज होते थे। अब इसे ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ जैसे सुंदर नाम मिल गए हैं।


नाम बदलते ही रिश्ते की मर्यादा बदल जाती है। भ्रष्टाचार भी इसीलिए अपने पुराने कपड़े उतारकर नए शब्द पहन रहा है। जो कभी घूस कहलाता था, वह अब सुविधा शुल्क हो सकता है। जो कभी पक्षपात था, वह अब रणनीतिक सहयोग हो सकता है। जो कभी अपने लोगों को लाभ पहुँचाना था, वह अब हितधारकों की भागीदारी हो सकती है। चीजें मिटती नहीं हैं। उनके नाम बदल जाते हैं।

गणतंत्र का यह सबसे आधुनिक चमत्कार है। भ्रष्टाचार को समाप्त करना कठिन हो तो उसे वैधता देने पर विचार किया जा सकता है। आखिर समस्या को समाप्त करने और समस्या को स्वीकार कर लेने में लोकतांत्रिक अंतर कितना है?


कानून बनते हैं। कभी-कभी इतनी तेजी से बनते हैं कि कानून पढ़ने वाले पीछे रह जाते हैं। ध्वनि मत से कानून पारित हो जाता है।

कुछ आवाजें विरोध में उठती हैं। वे रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती हैं। और फिर लोकतंत्र आगे बढ़ जाता है।किस दिशा में? यह प्रश्न पूछना अभी बाकी है।

विपक्ष भी है। होना ही चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष का होना उतना ही जरूरी है जितना घर में आईना। लेकिन आईना बहुत बड़ा हो जाए तो असुविधा होती है। इसलिए उसे छोटा रखना बुद्धिमानी है। इतना छोटा कि चेहरा दिखाई दे, चेहरे के पीछे की चीजें नहीं।

कभी विपक्ष के पास संख्या कम पड़ जाए तो लोकतांत्रिक गणित काम आता है। किसी को थोड़ा समझाइए, किसी को थोड़ा मनाइए, किसी को थोड़ा अवसर दीजिए। दुर्बल विपक्षी अश्व को थोड़ी दूब खिला दीजिए, वह सत्ता की अस्तबल में आकर स्वस्थ हो सकता है। फिर संख्या बढ़ जाती है। लोकतंत्र बच जाता है। सरकार स्थिर हो जाती है।


जनता फिर से आश्वस्त हो जाती है कि उसका प्रतिनिधि उसके हित में काम कर रहा है। सत्ता का सबसे बड़ा कौशल यही है कि वह अपनी सुविधा को जनहित की भाषा में बोल सके। विपक्ष का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वह सत्ता की सुविधा को पहचान सके।

और जनता का सबसे बड़ा कौशल है—इन दोनों के बीच अपने जीवन की जगह तलाशना। समाचार चैनलों ने लोकतंत्र को और सरल बना दिया है। अब जनता को यह तय करने की आवश्यकता नहीं कि सच क्या है। चैनल तय कर देते हैं कि आज किस बात पर नाराज होना है। सुबह एक मुद्दा। दोपहर दूसरा। शाम तीसरा। रात को बहस।

बारह लोग चिल्ला रहे हैं। बीच में एंकर राष्ट्र बचा रहा है। नीचे पट्टी पर लिखा है—“सबसे बड़ा सवाल।” लेकिन सबसे बड़ा सवाल अक्सर पूछा ही नहीं जाता। वह गहरे पानी में पड़ा रहता है। खबरें उसके ऊपर बैठी रहती हैं।


हम खबरों को पढ़ते हैं और समझते हैं कि हमने सत्य पढ़ लिया। जबकि सत्य कभी-कभी खबरों के नीचे दबा होता है।

सत्य का दुर्भाग्य यह है कि वह सनसनीखेज नहीं होता। झूठ को कहानी बनाना आता है। सच को केवल सच होना आता है।

इसीलिए झूठ कैमरे पर अधिक सुंदर दिखाई देता है। आज झूठ के पास प्रोडक्शन वैल्यू है। उसके पास ग्राफिक्स हैं, संगीत है, स्लोगन है, सोशल मीडिया है और हजारों लोग हैं जो उसे आगे बढ़ा सकते हैं।

सच बेचारा अभी भी पैदल चलता है। और लोकतंत्र में पैदल चलने वालों को अक्सर विकास के रास्ते से हटा दिया जाता है।

फिर भी हम कहते हैं—लोकतंत्र में सब ठीक है।

क्योंकि चुनाव होते हैं। क्योंकि सरकारें बदलती हैं। क्योंकि भाषण होते हैं। क्योंकि योजनाएँ आती हैं।क्योंकि विज्ञापन आते हैं।

क्योंकि प्रशस्ति मंडलियाँ सक्रिय हैं। 


लोकतंत्र में सब ठीक है , वह जनता द्वारा, जनता के लिए है, लेकिन - “जनता कहाँ है?”

यही प्रश्न शायद सबसे असुविधाजनक है।

क्योंकि जनता चुनाव में दिखाई देती है, रैलियों में दिखाई देती है, आँकड़ों में दिखाई देती है, विज्ञापनों में दिखाई देती है, भाषणों में दिखाई देती है—लेकिन निर्णय की मेज पर अक्सर दिखाई नहीं देती।

फिर भी जनता उम्मीद करती है। वह हर चुनाव में अपनी उंगली पर स्याही लगाती है और सोचती है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। कभी चेहरा बदलता है। कभी नारा बदलता है। कभी गठबंधन बदलता है।कभी कानून बदलता है। कभी इतिहास की भाषा बदलती है।

लेकिन जनता की जिंदगी? वह धीरे-धीरे बदलती है। इतनी धीरे कि उसे विकास कहने के लिए सरकार को विज्ञापन देना पड़ता है।

और शायद इसीलिए आज - सत्य संदिग्ध हो जाता है और झूठ प्रमाणित।


ब्रजेश कानूनगो 


Saturday, August 22, 2026

महंगाई के दौर में शकर का शोर

महंगाई के दौर में शकर का शोर

जैसे कोई अफसर बोतल खुलते ही खुलने लगता है, जैसे कोई मिनिस्टर कड़कनाथ खाने के बाद अपनी कड़कता भूलकर ढीला पड़ने लगता है, जैसे कोई प्रेमिका बादल घिरते ही प्रियतम की याद में बेचैन होने लगती है, वैसे ही साधुरामजी मिठाई देखकर भीतर तक मीठे हो जाते हैं। मीठा उनकी कमजोरी है और कमजोरी भी ऐसी कि मिठाई की दुकान के सामने से गुजरते हुए उनका लोकतंत्र तक डगमगाने लगता है।

लेकिन अब वह जमाना नहीं रहा कि मेहमान के आने पर मोतीचूर के लड्डू, गुलाबजामुन या बालूशाही की खुशबू से ड्राइंग रूम को लोकतांत्रिक बनाया जा सके। चीनी के दाम जिस तरह ऊपर जा रहे हैं, लगता है मिठाई अब खाने की वस्तु कम और निवेश का साधन अधिक हो गई है। बाजार में चीनी के भाव सात साल के ऊंचे स्तर तक पहुंचने की खबरें हैं और पिछले एक महीने में कीमतों में तेज उछाल आया है। त्योहारों का मौसम सामने है और सरकार को जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा लगाने से लेकर शुल्क-मुक्त आयात तक के उपाय करने पड़ रहे हैं।

ऐसे समय में साधुरामजी का मेरे घर पधारना किसी आर्थिक सर्वेक्षण से कम नहीं था।

उनके सत्कार में चाय के अलावा कुछ परोसने का साहस हममें नहीं था। मिठाई की प्लेट निकालते हुए मुझे लगता कि मैं घर के बजट पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा हूं।

उनके आते ही मैंने बिटिया को आदेश दिया—

“आज का अमृत ले आओ।”

चाय आई तो साधुरामजी ने प्याली को ऐसे देखा जैसे कोई विपक्षी नेता सरकार की बजट पुस्तिका को देखता है। एक चुस्की ली और प्रश्नवाचक नजरों से मुझे घूरने लगे। उनकी मुद्रा किसी खबरिया चैनल के उस एंकर जैसी थी, जो पहले सवाल पूछता है और फिर जवाब भी स्वयं ही दे देता है।

मैंने भी चाय पी।

चाय में शकर कम थी।

बहुत कम।

इतनी कम कि चाय ने स्वयं को चाय साबित करने के लिए भी संघर्ष शुरू कर दिया था।

मैंने पत्नी को पुकारा। उन्होंने बेटी को भेज दिया।

“बेटे, चाय में शकर नहीं डाली क्या?”

“डाली तो है पापा, मगर रोज से कम। मम्मी कहती हैं अब ऐसी ही कम शकर वाली चाय पीनी पड़ेगी।”

कहकर वह भीतर चली गई।

मैंने संकोच से साधुरामजी की ओर देखा।

“ओ हां, याद आया। साधुरामजी, वह क्या है कि अब शकर हमारी औकात से दूर होती जा रही है। हमने सोचा, खुद ही इसके खर्च पर लगाम लगा लें। सरकार का रुख कुछ ठीक दिखाई नहीं देता।”

साधुरामजी ने चाय की प्याली नीचे रखी और अपने चेहरे को ऐसा विकृत ज्यामितीय आकार दिया, जैसे किसी चुनावी नक्शे में अचानक कोई नई सीमा खिंच गई हो।

बोले—

“लगता है राजनीति में फिर कुछ न कुछ घटेगा। महंगाई की मार वैसी ही बनी हुई है और अब यह शकर का नया किस्सा! पहले प्याज, फिर तेल, कभी दाल, कभी दूध और अब शकर। जनता के जीवन से मिठास गायब होती जा रही है। इसके कारण लोगों के दिलों में बढ़ती कड़वाहट का राजनीतिक मूल्य कहीं सरकार को न चुकाना पड़ जाए। त्योहार सामने हैं। गणेशोत्सव से लेकर दशहरा और दीपावली तक मिठाई की मांग बढ़ेगी। ऐसे में शकर राजनीति का नया चुनावी मुद्दा बन सकती है।”

साधुरामजी के भीतर का नेता जाग गया था।

“लेकिन हमें राजनीति से क्या?” मैंने कहा, “हमें तो शकर चाहिए, वह भी सस्ते दामों पर।”

यह सुनते ही उनके भीतर का सत्ता समर्थित राजनीतिज्ञ बाहर आ गया।

“क्या शकर का इस्तेमाल इतना जरूरी है तुम्हारे लिए?”

मुझे लगा जैसे कोई मधुमक्खी गुलाब से उसकी मिठास की आवश्यकता पर प्रश्नचिह्न लगा रही हो।

मैंने कहा—

“हां, मिठास भी मनुष्य की जरूरत है। और अगर आप सोचते हैं कि खाने में हम मिठास त्याग दें तो चलिए आप हमें अपनी व्यवस्था में, अपने तंत्र में ‘मीठा व्यवहार’ ही दिलवा दीजिए। हम शकर का उपयोग छोड़ देंगे।”

साधुरामजी चुप रहे।

मैंने बात आगे बढ़ाई—

“वैसे भी जब चारों तरफ कड़वाहट फैली हो तो चाय में शकर के दो चम्मच डाल देने से जिंदगी कितनी मीठी हो जाएगी? मेरा तो सुझाव है कि सरकार घरेलू बाजार की चिंता छोड़कर पूरी शकर विदेश भेज दे। उसके बदले कुछ हेलिकॉप्टर और राफेल खरीद ले। देश सुरक्षित रहेगा और संसद में जब महंगाई पर बहस होगी तो पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने में ही समय काट लेंगे। जनता को लगेगा कि उसकी शकर भले गायब हो गई, मगर राष्ट्र की सुरक्षा मीठी हो गई।”

मेरा रक्तचाप बढ़ चुका था।

साधुरामजी ने मुझे समझाने के अंदाज में कहा—

“तुम तो ख्वामखाह नाराज हो गए। मेरा मतलब यह थोड़े था। ये सब तात्कालिक स्थितियां हैं। बाजार में चीजें महंगी-सस्ती होती रहती हैं। अभी सरकार ने चीनी के स्टॉक पर सीमा लगाई है। जमाखोरी रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई जा रही है। जरूरत पड़ी तो आयात भी किया जा रहा है। सरकार सब देख रही है।”

“लेकिन कीमत तो हम देख रहे हैं।”

“तुम्हें बस कीमत दिखाई देती है। सरकार को पूरा परिदृश्य देखना पड़ता है।”

“परिदृश्य पेट में नहीं जाता, शकर जाती है।”

वे थोड़े असहज हुए।

“तुम जरा जीना सीखो। ये छोटे-छोटे अभावों से क्यों प्रभावित होते हो? तुम एक महान देश के समझदार और राष्ट्रवादी नागरिक हो। उन अमर क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करो, जिन्होंने भारी अभावों और कष्टों के बीच देश को आजाद कराया था।”

मैंने कहा—

“उन्होंने देश आजाद कराया था, चाय की प्याली नहीं।”

साधुरामजी ने मेरी बात अनसुनी कर दी।

“और आज भी तुम एक नई आजादी के दौर से गुजर रहे हो। महंगाई से आजादी, बेरोजगारी से आजादी, भ्रष्टाचार से आजादी...”

मैंने टोका—

“शकर से आजादी?”

“बिल्कुल! हर चीज का एक सकारात्मक पक्ष होता है। शकर कम खाओगे तो स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। मधुमेह का खतरा कम होगा। मोटापा घटेगा। डॉक्टर खुश होंगे। बीमा कंपनियां खुश होंगी।”

“और मेरा चाय का स्वाद?”

“राष्ट्रहित में स्वाद का त्याग करना पड़े तो करना चाहिए।”

अब साधुरामजी के शब्दों में निरंतर शकर घुल रही थी।

“हम तुम्हें क्या नहीं दे रहे! थोड़ा-सा इंतजार तो करो। इतना अधीर भी मत बनो। अच्छी चीजें आसानी से नहीं मिलतीं। अच्छे दिनों के लिए थोड़ा-बहुत सेक्रिफाइस और त्याग तो हर नागरिक को करना पड़ेगा। तुम भी क्या इस तुच्छ-सी शकर का रोना लेकर बैठ गए!”

मैंने कहा—

“साधुरामजी, मैं आपकी मीठी-मीठी बातों में आने वाला नहीं हूं। सरकार को चाहिए कि शकर सस्ते दामों पर उपलब्ध कराए। बस।”

वे क्रोधित हो गए।

“तुम भी अजीब आदमी हो! एक मामूली-सी चीज के लिए अड़े हो। मांगना ही है तो महंगाई भत्ते की किश्त मांगो। जो दिया जा सके, वह मांगो। वेतन बढ़ेगा तो शकर महंगी होने का दुख कुछ कम होगा।”

“लेकिन अगर वेतन बढ़ने से पहले शकर और महंगी हो गई तो?”

उन्होंने मेरी ओर देखा।

“तुम हर बात में समस्या क्यों खोजते हो?”

“क्योंकि समस्या हर बात में खुद को खोज लेती है।”

साधुरामजी ने चाय की अंतिम चुस्की ली। प्याली में बची हुई चाय में शकर का इतना कम अंश था कि शायद वह स्वयं भी सरकार की तरह यह बताने की स्थिति में नहीं थी कि उसमें मिठास है या सिर्फ मिठास का वादा।

साधुरामजी आंखें लाल किए, पैर पटकते हुए लौट गए।

मैं काफी देर तक खाली प्याली को देखता रहा।

अचानक मुझे लगा कि असली संकट शकर का नहीं, मिठास का है।

शकर महंगी हुई तो हमने चाय में कम कर दी। मिठाई महंगी हुई तो हमने मिठाई कम कर दी। सब्जी महंगी हुई तो मात्रा घटा दी। पेट्रोल महंगा हुआ तो यात्राएं कम कर दीं। बिजली महंगी हुई तो पंखे की गति कम कर दी।

हमने हर चीज में समझौता कर लिया।

सिर्फ एक चीज है जिसकी कीमत बढ़ने के बावजूद हम उसे कम नहीं कर पा रहे—

राजनीतिक वादों की मिठास।

वह आज भी भरपूर है।

इतनी भरपूर कि महंगाई की कड़वी चाय भी पी जाए तो गले से उतर जाती है।


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ब्रजेश कानूनगो 

Friday, August 21, 2026

महाराज श्रृंखला 19 : आक्रोश का प्रबंधन

 महाराज श्रृंखला 19 : आक्रोश का प्रबंधन


पीपी गणराज्य में युवा आक्रोश अब केवल आक्रोश नहीं रह गया था। वह धीरे-धीरे संगठित होने लगा था।
पहले युवा अलग-अलग चौराहों पर खड़े होकर सरकार को कोसते थे। फिर वे एक-दूसरे से मिलने लगे। फिर उन्होंने एक-दूसरे के मोबाइल नंबर लिए। फिर व्हाट्सऐप समूह बने। फिर उन समूहों के नाम रखे गए।
किसी का नाम था—‘रोजगार चाहिए’।
किसी का—‘पेपर लीक बंद करो’।
किसी का—‘डिग्री का सम्मान करो’।
और एक समूह का नाम था—‘अबकी बार जवाब’।
सरकार के खुफिया विभाग ने इन सभी समूहों की जानकारी महाराज को भेजी।
महाराज ने रिपोर्ट पढ़ी और मुस्कराए।
“इतने सारे समूह हैं?”
ज्ञान रिपु बोले—
“जी महाराज।”
“तो इनमें एकता कैसे आएगी?”
“यही तो चिंता है महाराज।”
महाराज कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“तो चिंता किस बात की? एकता नहीं है तो आंदोलन कैसे होगा?”
ज्ञान रिपु ने धीरे से कहा—
“महाराज, यही तो खतरा है। यदि अलग-अलग नदियां मिल गईं तो बाढ़ आ सकती है।”
महाराज का चेहरा गंभीर हो गया।
“फिर नदियों को अलग-अलग ही रखना होगा।”
यह वाक्य उसी दिन से सरकार की नई नीति का आधार बन गया।
आंदोलन का पहला चरण
सरकार ने सबसे पहले युवाओं को समझाने का फैसला किया।
एक विशाल सम्मेलन बुलाया गया।
नाम रखा गया—
‘युवा संवाद : विकसित पीपी गणराज्य में युवाओं की भूमिका’
हॉल में वातानुकूलन था।
मंच पर महाराज की विशाल तस्वीर थी।
पीछे लिखा था—
“युवा ही भविष्य हैं।”
हॉल के बाहर हजारों बेरोजगार युवा धूप में खड़े थे।
अंदर चुनिंदा युवाओं को बुलाया गया था।
वे युवा जिनकी नियुक्ति हो चुकी थी।
कुछ युवा संगठन के पदाधिकारी थे।
कुछ मंत्रियों के रिश्तेदार।
कुछ ऐसे थे जिन्हें हाल ही में किसी सरकारी योजना में ‘युवा प्रतिनिधि’ बना दिया गया था।
महाराज मंच पर आए।
तालियां बजीं।
उन्होंने कहा—
“मेरे प्यारे युवाओं! तुम देश का भविष्य हो।”
पीछे बैठे एक युवक ने धीरे से अपने साथी से कहा—
“वर्तमान कौन है?”
दूसरे ने कहा—
“वर्तमान तो महाराज हैं।”
दोनों हंस पड़े।
महाराज ने भाषण जारी रखा—
“हमने युवाओं के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं।”
बाहर खड़ा बेरोजगार युवक अपने मित्र से पूछ रहा था—
“कहां?”
मित्र बोला—
“शायद अंदर।”

दूसरा चरण : समिति
सम्मेलन से कोई समाधान नहीं निकला।
इसलिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई।
समिति का नाम था—
‘युवा आकांक्षा एवं रोजगार संवर्धन आयोग।’
उसमें अध्यक्ष बनाया गया एक ऐसे व्यक्ति को, जो पिछले चालीस वर्षों से सरकारी सेवा में था और जिसकी उम्र सेवानिवृत्ति के करीब थी।
समिति ने युवाओं से सुझाव मांगे।
सुझावों के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया।
युवाओं ने हजारों सुझाव भेजे।
किसी ने कहा—नौकरियां बढ़ाइए।
किसी ने कहा—पेपर लीक रोकिए।
किसी ने कहा—भर्ती समय पर कराइए।
किसी ने कहा—शिक्षकों के पद भरिए।
किसी ने कहा—सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता लाइए।
समिति ने सभी सुझावों को स्वीकार किया।
फिर उन्हें एक फाइल में रख दिया।
फाइल पर लिखा गया—
“अत्यंत महत्वपूर्ण।”
और फाइल अलमारी में रख दी गई।
अलमारी पर लिखा था—
“कार्यवाही हेतु।”

तीसरा चरण : आंदोलन
इस बीच आंदोलन बढ़ता गया।
अब राजधानी में प्रतिदिन प्रदर्शन होने लगे।
युवा नारे लगाते—
“रोजगार दो!”
“भर्ती दो!”
“पेपर लीक बंद करो!”
“शिक्षा बचाओ!”
“सिफारिश बंद करो!”
सरकार ने पहले इसे छोटा आंदोलन बताया।
फिर असामाजिक तत्वों का आंदोलन बताया।
फिर विपक्ष की साजिश बताया।
फिर विदेशी शक्तियों का षड्यंत्र बताया।
और अंत में जब भीड़ कम नहीं हुई तो सरकार ने कहा—
“हम युवाओं की भावनाओं का सम्मान करते हैं।”
यह सरकार का वह वाक्य था जिसका अर्थ था कि अब कुछ करने का समय आ गया है।

दमन की पहली बारिश
एक रात आंदोलनकारियों के शिविरों पर पुलिस पहुंची।
कहा गया—
“यह क्षेत्र खाली कर दीजिए।”
युवाओं ने पूछा—
“क्यों?”
पुलिस ने कहा—
“व्यवस्था बनाए रखने के लिए।”
एक युवक ने पूछा—
“व्यवस्था किसकी?”
पुलिस अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“सरकार की।”
युवक ने कहा—
“हम भी तो सरकार के ही नागरिक हैं।”
अधिकारी ने कहा—
“बहुत सवाल करते हो।”
उस रात कई तंबू उखाड़ दिए गए।
कई पोस्टर फाड़ दिए गए।
कुछ युवाओं को हिरासत में लिया गया।
सुबह अखबारों में खबर आई—
“राजधानी में यातायात व्यवस्था बाधित करने वाले कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया।”
‘बेरोजगार युवा’ शब्द खबर में कहीं नहीं था।

चौथा चरण : प्रलोभन
दमन से आंदोलन कम नहीं हुआ।
तब महाराज ने नीति बदली।
उन्होंने घोषणा की—
“हर जिले में युवा सलाहकार परिषद बनाई जाएगी।”
कुछ युवाओं को सदस्य बनाया गया।
उन्हें पहचान-पत्र मिले।
कुछ को यात्रा भत्ता मिला।
कुछ को सरकारी कार्यक्रमों में मंच मिला।
कुछ को समितियों में पद मिला।
कुछ को ठेके मिले।
कुछ को छात्रवृत्ति मिली।
और कुछ को वह मिला जो सबसे प्रभावी था—
महाराज के साथ सेल्फी।
धीरे-धीरे आंदोलन में दरार दिखाई देने लगी।
कुछ युवाओं ने कहा—
“सरकार हमारी बात सुन रही है।”
दूसरों ने कहा—
“सरकार हमें खरीद रही है।”
पहले वाले युवाओं को दूसरा समूह ‘व्यावहारिक’ कहता था।
दूसरा समूह पहले वालों को ‘बिकाऊ’ कहता था।
सरकार चुपचाप दोनों को देख रही थी।
पांचवां चरण : अपने आंदोलनकारी
महाराज ने एक दिन ज्ञान रिपु को बुलाया।
“आंदोलन अभी भी चल रहा है?”
“जी महाराज।”
“उसमें हमारे लोग कितने हैं?”
ज्ञान रिपु चौंके।
“महाराज?”
“मेरा मतलब है—सरकार की नीतियों को समझने वाले कितने लोग हैं?”
ज्ञान रिपु समझ गए।

कुछ दिनों बाद राजधानी में एक नया युवा संगठन सामने आया—
‘राष्ट्र युवा विकास मंच।’
उसका अध्यक्ष एक ऐसा युवक था जो पिछले महीने तक सरकार की आलोचना करता था।
अब वह सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करता था।
उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा—
“कुछ लोग बेरोजगारी के नाम पर देश को बदनाम कर रहे हैं।”
एक पत्रकार ने पूछा—
“लेकिन आप तो स्वयं बेरोजगार थे?”
युवक मुस्कराया—
“अब मैं रोजगारयुक्त विचारधारा का प्रतिनिधि हूं।”
पत्रकार चुप हो गया।
आंदोलन की भाषा बदल गई
अब आंदोलन में दो तरह के नारे लगने लगे।
एक तरफ—
“रोजगार दो!”
दूसरी तरफ—
“राष्ट्र विरोधियों से सावधान!”
एक तरफ—
“पेपर लीक बंद करो!”
दूसरी तरफ—
“पेपर लीक का मुद्दा उठाना विपक्ष की साजिश है!”
एक तरफ—
“युवाओं का भविष्य बचाओ!”
दूसरी तरफ—
“महाराज के नेतृत्व में भविष्य सुरक्षित है!”
युवाओं का मूल प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक बहस में बदल गया।
नौकरी गायब हो गई।
पेपर लीक गायब हो गया।
शिक्षा गायब हो गई।
बेरोजगारी गायब हो गई।
अब सवाल था—
“महाराज के साथ कौन है?”
और—
“महाराज के खिलाफ कौन है?”
जिस युवक ने कल तक नौकरी मांगी थी, आज उससे पूछा जा रहा था—
“तुम महाराज के पक्ष में हो या विपक्ष में?”
वह कहता—
“मैं तो नौकरी के पक्ष में हूं।”
लोग हंसते।
उसे समझाया जाता—
“इतना सरल मत बनो। यह राजनीति है।”
महाराज की सफलता
एक दिन महाराज ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक में घोषणा की—
“युवा आंदोलन अब नियंत्रण में है।”
सभी मंत्रियों ने मेज थपथपाई।

ज्ञान रिपु ने कहा—
“महाराज, आपने आक्रोश को अवसर में बदल दिया।”
मोटाभाई काला बोले—
“और अवसर को संगठन में।”
एक मंत्री ने कहा—
“और संगठन को समर्थन में।”
महाराज मुस्कराए।
“यही शासन कला है।”
लेकिन उसी समय राजधानी से बहुत दूर एक छोटे कस्बे में कुछ बेरोजगार युवक एक पुराने पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठे थे।
उनके पास न कोई नेता था।
न कोई संगठन।
न कोई सरकारी पद।
न कोई मंच।
वे बस आपस में बात कर रहे थे।
एक युवक ने कहा—
“हमने आंदोलन इसलिए शुरू नहीं किया था कि हमें महाराज के पक्ष या विपक्ष में बांटा जाए।”
दूसरे ने कहा—
“हमने नौकरी मांगी थी।”
तीसरे ने कहा—
“हमने शिक्षा मांगी थी।”
चौथे ने कहा—
“हमने अपने भविष्य पर अपना अधिकार मांगा था।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर सबसे शांत बैठे युवक ने कहा—
“तो फिर हमें वापस उसी सवाल पर जाना होगा।”
“कौन-सा सवाल?”
उसने कहा—
“हमारा भविष्य किसका है?”
सभी चुप हो गए।
पुराने पुस्तकालय की बंद खिड़की के पीछे धूल से ढकी किताबें उन्हें देख रही थीं।
शायद वर्षों बाद किसी पीढ़ी ने किताबों से बाहर निकलकर सवाल करना शुरू किया था।
और पीपी गणराज्य के लिए असली खतरा यही था।
क्योंकि सत्ता नारों से नहीं डरती।
सत्ता विरोध से भी नहीं डरती।
सत्ता तो उस दिन डरती है जब नागरिक सवाल पूछना सीख जाते हैं—और सवाल का उत्तर मिलने तक चुप नहीं बैठते।

महल में उस रात महाराज देर तक सो नहीं सके।
उन्हें पहली बार लगा कि आंदोलन को दबाना आसान था।
उसे खरीदना भी आसान था।
उसे बांटना भी आसान था।
लेकिन अगर आंदोलन ने सोचना सीख लिया, तो उसका प्रबंधन कठिन हो जाएगा।
महाराज ने खिड़की खोली।
दूर कहीं युवाओं की आवाज आ रही थी—
“हमें भविष्य चाहिए।”
महाराज ने खिड़की बंद कर दी।
ज्ञान रिपु ने पूछा—
“महाराज, आवाज तेज थी?”
महाराज ने कहा—
“नहीं।”
फिर कुछ सोचकर बोले—
“लेकिन पहली बार मुझे साफ सुनाई दी।”

***

महाराज श्रृंखला 18 :विकास की आत्मा और बेरोजगारों की बारात

 महाराज श्रृंखला  18 :विकास की आत्मा और बेरोजगारों की बारात

पाषाणपुष्प गणराज्य का नाम अब देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंच चुका था। दुनिया के लोग उसे प्यार से पी पी रिपब्लिक कहने लगे थे। देश के भीतर भी हिंदी प्रेमियों ने अपनी सुविधा के लिए उसे पीपी गणराज्य कहना शुरू कर दिया था।

महाराज को यह नाम बहुत पसंद आया।

उन्हें लगा कि छोटे नामों में बड़ा प्रभाव होता है। उन्होंने अपने सलाहकारों से कहा—

“देखो, नाम ऐसा होना चाहिए जिसे दुनिया का हर आदमी आसानी से बोल सके। इसमें आधुनिकता भी हो और मौलिकता भी।”

ज्ञान रिपु ने तत्काल समर्थन किया—

“महाराज, पीपी का अर्थ हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी सुविधा के अनुसार कुछ भी बता सकते हैं। पाषाणपुष्प तो वैसे भी बहुत लंबा हो जाता है।”

महाराज प्रसन्न हुए।


उधर पीपी गणराज्य विकास के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा था। हर दिन कोई न कोई नई परियोजना उद्घाटित होती। फीते कटते, पट्टिकाएं लगतीं, ड्रोन उड़ते और समाचार चैनलों पर विकास की ऐसी तस्वीरें दिखाई जातीं कि लगता था देश अब सीधे स्वर्ग से जुड़ने वाला है।

सड़कों पर चमकदार डिवाइडर थे। पुल थे। भवन थे। अस्पताल थे। विश्वविद्यालय थे। विद्यालय थे। पुस्तकालय भी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते थे।

बस, इन सबमें एक छोटी-सी कमी थी।

इनमें जीवन कम था।

अस्पतालों में भवन थे, बिस्तर थे, उद्घाटन की तस्वीरें थीं, लेकिन डॉक्टर कम थे।

विद्यालयों में कमरे थे, स्मार्ट बोर्ड थे, कंप्यूटर थे, लेकिन शिक्षक कम थे।

विश्वविद्यालयों में विशाल भवन थे, सभागार थे, दीक्षांत समारोह थे, लेकिन पढ़ाने वाले लोग कम थे।

पुस्तकालयों में अलमारियां थीं, मगर किताबों से अधिक धूल थी।

सरकार ने इसे भी उपलब्धि माना।

एक अधिकारी ने कहा—

“पहले हमारे पास पुस्तकालय ही नहीं थे। अब पुस्तकालय हैं और धूल भी है। इसका मतलब है कि हमने आधारभूत संरचना के साथ पर्यावरण संरक्षण भी कर दिया है।”

महाराज ने इस उपलब्धि को अपनी अगली उपलब्धियों की सूची में जोड़ लिया।


पीपी गणराज्य की एक विशेषता यह भी थी कि यहां प्रतिभाएं पैदा खूब होती थीं, मगर टिकती नहीं थीं।

जो बच्चा पढ़ाई में अच्छा निकलता, वह आगे चलकर देश छोड़ने की तैयारी करने लगता। जो शिक्षक योग्य होता, वह किसी दूसरे देश के विश्वविद्यालय में आवेदन कर देता। जो वैज्ञानिक कुछ नया सोचता, उसे किसी और देश की प्रयोगशाला अधिक आकर्षक लगती।

सरकार इसे ब्रेन ड्रेन कहती थी।

युवक इसे ब्रेन का पलायन कहते थे।

और मंत्री इसे वैश्विक अवसरों का लाभ उठाना कहते थे।

ज्ञान रिपु ने इस समस्या पर एक कविता भी लिखी—

“मस्तिष्क जहां सम्मान पाए,

वहीं उड़ जाए, वहीं समाए।”

महाराज ने कविता सुनकर कहा—

“बहुत सुंदर! इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे देश के मस्तिष्क इतने स्वतंत्र हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”

किसी ने धीरे से कहा—

“मगर महाराज, उन्हें रोकना कौन चाहता है? लोग तो चाहते हैं कि वे यहां रहें।”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

वह चुप हो गया।



शिक्षा का अर्थ भी धीरे-धीरे बदल रहा था।

पहले शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, विवेक और मनुष्य को बेहतर नागरिक बनाना माना जाता था। अब उसका उद्देश्य किसी तरह प्रमाणपत्र प्राप्त करना और फिर किसी नौकरी की खोज में वर्षों तक भटकना रह गया था।

स्कूलों में बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जाता था।

भविष्य में क्या होगा, यह किसी को पता नहीं था।

कॉलेजों में डिग्रियां मिलती थीं।

डिग्री लेने के बाद युवा पूछता—

“अब इसका क्या करूं?”

उत्तर मिलता—

“प्रतियोगी परीक्षा दो।”

प्रतियोगी परीक्षा देने के लिए कोचिंग करो।

कोचिंग के लिए पैसा चाहिए।

पैसे के लिए नौकरी चाहिए।

नौकरी के लिए डिग्री चाहिए।

डिग्री के लिए कॉलेज चाहिए।

और कॉलेज की फीस के लिए फिर पैसा चाहिए।

युवक इस चक्र को समझते-समझते प्रतियोगिता परीक्षा की उम्र पार कर जाता।

फिर सरकार उसे समझाती—

“युवा धैर्य रखें। अवसर बहुत हैं।”

युवक पूछता—

“कहां हैं?”

सरकार कहती—

“अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं, लेकिन आएंगे।”

युवक पूछता—

“कब?”

सरकार कहती—

“उचित समय पर।”

उचित समय पीपी गणराज्य का सबसे रहस्यमय समय था। वह कभी आता नहीं था, मगर हर घोषणा में मौजूद रहता था।



आखिरकार युवाओं ने रोजगार का अपना रास्ता खोज लिया।

डिलीवरी कंपनियों के दरवाजे खुल गए।

कुरियर कंपनियां बढ़ गईं।

ऐप आधारित काम ने बेरोजगारी को एक नया नाम दे दिया—गिग इकॉनमी।

अब बेरोजगार युवक बेरोजगार नहीं कहलाता था।

वह ‘डिलीवरी पार्टनर’ था।

उसके पास नौकरी नहीं थी, लेकिन एक ऐप था।

उसके पास निश्चित वेतन नहीं था, लेकिन प्रोत्साहन था।

उसके पास भविष्य की सुरक्षा नहीं थी, लेकिन रेटिंग थी।

उसके पास छुट्टी नहीं थी, मगर ‘लॉग आउट’ करने की सुविधा थी।

वह सुबह घर से निकलता और रात तक शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक भोजन, दवाइयां, कपड़े, दस्तावेज और कभी-कभी लोगों की उम्मीदें भी पहुंचाता।

लोग उसे देखकर कहते—

“बहुत मेहनती लड़का है।”

वह मुस्करा देता।

उसे मालूम था कि वह मेहनती कम और मजबूर ज्यादा है।

उसकी बाइक पर किसी और का खाना था और उसके मन में अपने घर का राशन।


जो युवक डिलीवरी नहीं करना चाहता था, वह प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करता।

उसके कमरे की दीवारों पर महान लोगों के चित्र लगे होते।

टेबल पर किताबों का ढेर होता।

मोबाइल में ऑनलाइन क्लासें चलतीं।

मां चाय रखकर जाती और पूछती—

“बेटा, इस बार हो जाएगा न?”

बेटा कहता—

“हां मां।”

वह खुद भी यही विश्वास करना चाहता था।

फिर एक सुबह खबर आती—

“प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही लीक।”

युवक कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहता।

फिर किताब बंद कर देता।

दूसरे दिन सरकार जांच समिति बना देती।

तीसरे दिन समिति के अध्यक्ष का नाम घोषित होता।

चौथे दिन विपक्ष आरोप लगाता।

पांचवें दिन सरकार आरोपों को राजनीति बताती।

छठे दिन एक नया मुद्दा आ जाता।

और सातवें दिन युवक फिर किताब खोल लेता।

क्योंकि उसके पास किताब के अलावा था ही क्या?

कुछ युवक दूसरी बार परीक्षा देते।

कुछ तीसरी बार।

कुछ चौथी बार।

फिर एक दिन वे परीक्षा देना छोड़ देते।

किसी ने कहा—

“मैं पढ़ाई नहीं छोड़ रहा हूं। मैंने सिर्फ व्यवस्था पर विश्वास करना छोड़ दिया है।”

उसकी यह बात सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

सरकार ने इसे युवाओं में नकारात्मकता फैलाने का प्रयास बताया।


पीपी गणराज्य में योग्यता का अर्थ भी धीरे-धीरे बदल रहा था।

योग्य वह नहीं था जो सबसे अधिक पढ़ा हो।

योग्य वह था जो सही व्यक्ति को जानता हो।

योग्य वह नहीं था जो परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाता हो।

योग्य वह था जिसके पास सही सिफारिश हो।

योग्य वह नहीं था जो गरीब घर में बैठकर रात-रात भर पढ़ता हो।

योग्य वह था जिसके परिवार के पास अवसर खरीदने की क्षमता हो।

गरीब बच्चे किताबों के पन्ने पलटते रहे और समर्थ बच्चों ने अवसरों के दरवाजे।

धीरे-धीरे युवाओं को समझ आने लगा कि प्रतियोगिता केवल परीक्षा में नहीं है।

प्रतियोगिता तो पहले ही कहीं और तय हो चुकी है।

परीक्षा सिर्फ परिणाम घोषित करने की रस्म है।


शहरों के चौराहों पर अब युवा दिखाई देने लगे थे।

पहले वे राजनीतिक रैलियों में दिखाई देते थे।

अब वे अपनी रैलियां करने लगे।

पहले वे नेताओं के भाषण सुनते थे।

अब नेता उनके भाषण सुनने लगे।

पहले वे सरकार से नौकरी मांगते थे।

अब वे सरकार से सवाल पूछने लगे।

और सवाल सरकार के लिए सबसे असुविधाजनक आविष्कार था।


एक दिन कुछ युवाओं ने राजधानी के मुख्य चौक पर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया।

उनके हाथों में डिग्रियां थीं।

किसी के हाथ में बी.ए. था, किसी के हाथ में एम.ए., किसी के हाथ में इंजीनियरिंग की डिग्री, किसी के हाथ में शोध की उपाधि।

एक युवक ने अपनी डिग्री ऊपर उठाकर कहा—

“यह मेरी योग्यता है।”

दूसरे ने कहा—

“और यह मेरी बेरोजगारी।”

तीसरे ने कहा—

“यह मेरी प्रतियोगिता परीक्षा की किताब है।”

चौथे ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला—

“और यह उस प्रश्नपत्र का स्क्रीनशॉट है जो परीक्षा से पहले बिक चुका था।”

भीड़ में एक डिलीवरी बॉय भी खड़ा था।

उसने अपनी पीठ पर लटका बैग उतारा और कहा—

“इसमें दूसरों का खाना है। घर पर मेरे बच्चे भूखे हैं।”


कुछ देर के लिए पूरा चौक शांत हो गया।

फिर किसी ने नारा लगाया—

“हमें भाषण नहीं, रोजगार चाहिए!”

दूसरी ओर से आवाज आई—

“हमें भवन नहीं, शिक्षक चाहिए!”

तीसरी आवाज आई—

“हमें परीक्षा चाहिए, परीक्षा का तमाशा नहीं!”

और फिर हजारों कंठ एक साथ बोल उठे।

महाराज के सलाहकारों ने तुरंत आपात बैठक बुलाई।

ज्ञान रिपु ने कहा—

“महाराज, इसे युवाओं का भावनात्मक उत्सर्जन समझना चाहिए।”

मोटाभाई काला बोले—

“नहीं, इसे सोशल मीडिया की साजिश बताइए।”

एक अन्य मंत्री ने सुझाव दिया—

“युवाओं को देश के उज्ज्वल भविष्य की तस्वीर दिखाइए।”

महाराज ने पूछा—

“लेकिन तस्वीर में भविष्य कहां है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

काफी देर बाद ज्ञान रिपु ने धीरे से कहा—

“महाराज, भविष्य अभी निर्माणाधीन है।”

महाराज को यह उत्तर पसंद आया।

उन्होंने तत्काल घोषणा करवा दी—

“पीपी गणराज्य के युवाओं का भविष्य निर्माणाधीन है।”

अगले दिन सरकारी विज्ञापन छपे।

बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

“युवा शक्ति, राष्ट्र शक्ति!”

नीचे महाराज की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी।

युवाओं ने विज्ञापन देखा।

कुछ हंसे।

कुछ नाराज हुए।

और कुछ ने पहली बार सोचा—

“अगर हम ही राष्ट्र की शक्ति हैं, तो फिर हमारी आवाज इतनी कमजोर क्यों है?”

उस दिन से पीपी गणराज्य में एक नया शब्द जन्मा—

युवा आक्रोश।

महाराज को अभी इसकी गंभीरता समझ में नहीं आई थी।

वे समझ रहे थे कि आक्रोश भी बाकी चीजों की तरह एक अभियान है।

एक पोस्टर लगेगा।

एक भाषण होगा।

एक समिति बनेगी।

कुछ घोषणाएं होंगी।

और सब शांत हो जाएगा।

मगर इस बार समस्या कुछ अलग थी।

यह आक्रोश किसी विपक्षी दल ने पैदा नहीं किया था।

यह किसी विदेशी शक्ति की देन नहीं था।

यह किसी सोशल मीडिया अभियान से पैदा नहीं हुआ था।

यह उन युवाओं के भीतर पैदा हुआ था जिन्होंने वर्षों तक पढ़ाई की थी, सपने देखे थे, परीक्षाएं दी थीं, इंतजार किया था और अंततः पाया था कि उनके सामने अवसरों से अधिक बहाने खड़े हैं।

और जब किसी पीढ़ी को बार-बार भविष्य का वादा दिया जाता है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से केवल प्रतीक्षा आती है, तो एक दिन वह प्रतीक्षा करना बंद कर देती है।

पीपी गणराज्य में वह दिन धीरे-धीरे नजदीक आ रहा था।

महाराज को अभी खबर नहीं थी।

क्योंकि राजधानी के महल की खिड़कियां बहुत ऊंची थीं।

और नीचे खड़े युवाओं की आवाज अभी महल की दीवारों तक पहुंचनी शुरू ही हुई थी।

***

ब्रजेश कानूनगो 

Thursday, August 20, 2026

महाराज श्रृंखला 17 : विकास का भवन

महाराज श्रृंखला 17 : विकास का भवन

महाराज ने जब अपना मंत्रिमंडल नए सिरे से गठित किया तो रियासत में एक बार फिर विकास की हवा चलने लगी।

हवा चलने के लिए वैसे भी किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। बस दिशा तय करने वाला कोई होना चाहिए। महाराज दिशा तय करने में सिद्धहस्त थे।

उन्होंने शुरुआत में इतने सारे विभाग अपने पास रख लिए कि देखने वालों को लगा, महाराज अब अकेले ही सरकार चलाएंगे। पर महाराज का उद्देश्य सरकार चलाना नहीं, सरकार को चलाते रहना था।

दरअसल कई सांसद ऐसे थे जिन्हें मंत्री बनने की बीमारी लग चुकी थी। वे लोकतंत्र में विश्वास करते थे और लोकतंत्र का अर्थ उनके लिए मंत्री पद था। जो मंत्री नहीं बन पाता था, वह लोकतंत्र को अधूरा मानता था।

महाराज जानते थे कि ऐसे लोगों को एकदम से मंत्री बना देना भी ठीक नहीं। लालच का स्वाद थोड़ी देर लगाकर दिया जाए तो उसकी भूख बढ़ती रहती है।

इसलिए महाराज ने कुछ विभाग अपने पास रखे।

दरबार में किसी ने पूछा—

“महाराज, इतने विभाग आप अकेले कैसे संभालेंगे?”

महाराज मुस्कराए।

“हम विभाग संभालने के लिए नहीं रखते। समय आने पर किसी को देने के लिए रखते हैं।”

दरबारी ने इस उत्तर को शासन-कला की नई परिभाषा समझकर अपनी डायरी में लिख लिया।

सबसे पहले शिक्षा का विभाग राजकवि ज्ञान रिपु को मिला।

ज्ञान रिपु अब तक साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे। साहित्य परिषद की अध्यक्षता में उन्होंने बहुत कुछ सीखा था—कविता से अधिक प्रशंसा करना, आलोचना से अधिक प्रशस्ति लिखना और साहित्य से अधिक सत्ता की भाषा समझना।

महाराज ने उन्हें शिक्षा मंत्री बनाते हुए कहा—

“ज्ञान रिपु, अब शिक्षा को नई दिशा देनी है।”

ज्ञान रिपु ने सिर झुकाया।

“महाराज, दिशा आप बताइए, हम पाठ्यक्रम बना देंगे।”

शिक्षा मंत्रालय में उनका स्वागत ऐसे हुआ जैसे साहित्य में कोई नई विधा जन्मी हो।

उन्होंने आते ही घोषणा की—

“शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन होगा।”

शिक्षा विभाग के पुराने अधिकारियों ने राहत की साँस ली। आमूलचूल परिवर्तन का अर्थ वे जानते थे। इसका मतलब था कि कुछ पुरानी फाइलें हटेंगी, कुछ नई फाइलें आएंगी और बीच में एक नई समिति बनेगी।

उधर महाराज ने अपने पुराने निजी सचिव काकदंत को भी सरकार में ले लिया।

काकदंत ने वर्षों तक महाराज की निजी सेवा में रहते हुए एक महत्वपूर्ण कला विकसित कर ली थी—महाराज के कहने से पहले उनकी इच्छा समझ लेना।

यह गुण सामान्य प्रशासन में बहुत उपयोगी माना जाता था।

काकदंत ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया और अगले ही दिन उच्च सदन में पार्टी की ओर से मनोनीत होकर गृह मंत्री बन गए।

लोगों ने पूछा—

“उन्होंने चुनाव कब लड़ा था?”

उत्तर मिला—

“चुनाव लड़ने की जरूरत ही क्या थी?”

लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुना जाना एक रास्ता था, महाराज के द्वारा चुना जाना दूसरा।

काकदंत दूसरे रास्ते से आए थे और सीधे गृह मंत्रालय पहुंच गए।

उन्होंने पद संभालते ही कहा—

“देश में कानून-व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

उनसे किसी पत्रकार ने पूछा—

“और लोकतंत्र?”

काकदंत ने क्षण भर सोचा और बोले—

“वह भी कानून-व्यवस्था के अंतर्गत ही आता है।”

पत्रकार ने आगे प्रश्न नहीं किया।

उधर उद्योगपति मोटा भाई काला जी ने इस बार इतिहास रच दिया था।

उन्होंने चुनाव भी लड़ा था और पूरे चुनाव अभियान में पार्टी की सेवा भी की थी। सेवा का स्वरूप आर्थिक था, इसलिए उसका उल्लेख पार्टी की बैठकों में ‘समर्पित सहयोग’ के रूप में किया गया।

काला जी भारी मतों से जीतकर आए।

कहा गया कि जनता ने उन्हें विकास के लिए चुना है।

कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि विकास ने उन्हें चुना है।

महाराज ने उन्हें उद्योग मंत्रालय दिया और साथ में परिवहन का अतिरिक्त प्रभार भी।

यह देखकर कुछ पुराने मंत्रियों को आश्चर्य हुआ।

महाराज ने समझाया—

“उद्योग और परिवहन में गहरा संबंध है। उद्योग बनेगा तो माल चलेगा, माल चलेगा तो सड़कें बनेंगी, सड़कें बनेंगी तो टोल आएगा, टोल आएगा तो विकास होगा।”

दरबार में तालियां बजीं।

किसी ने यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि माल किसका होगा और टोल किसके पास जाएगा।

इस प्रकार महाराज, ज्ञान रिपु, काकदंत और काला जी—चारों के समन्वय से देश के विकास का नया युग आरंभ हुआ।

विकास का सबसे सरल अर्थ तय किया गया—

निर्माण।

जहां कुछ दिखाई दे रहा हो, समझो विकास हो रहा है।

जहां कुछ बनाया जा रहा हो, वहां विकास हो रहा है।

जहां कुछ तोड़ा जा रहा हो ताकि नया बनाया जा सके, वहां तो और भी अधिक विकास हो रहा है।

इस पर किसी अर्थशास्त्री ने पूछा—

“लेकिन मनुष्य?”

उसे विकास विरोधी घोषित कर दिया गया।

स्कूलों के भवन बनने लगे।

एक से एक सुंदर भवन।

कहीं चार कमरे, कहीं आठ कमरे, कहीं रंगीन दीवारें, कहीं बड़े-बड़े प्रवेश द्वार।

उद्घाटन के दिन बच्चों को कतार में खड़ा किया जाता। मंत्री जी आते। फीता कटता। नारियल फूटता। फोटो खिंचती। अखबार में छपता—

“शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि।”

अगले दिन बच्चे फिर उसी पुराने कमरे में बैठ जाते।

नया भवन बंद रहता।

क्योंकि शिक्षक नहीं थे।

शिक्षा मंत्री ज्ञान रिपु ने इस समस्या को गंभीरता से लिया।

उन्होंने अधिकारियों की बैठक बुलाई।

“शिक्षक कम क्यों हैं?”

अधिकारी ने कहा—

“भर्ती नहीं हुई, मंत्री जी।”

“क्यों नहीं हुई?”

“पद खाली हैं।”

“पद खाली क्यों हैं?”

“क्योंकि नियुक्तियां नहीं हुईं।”

ज्ञान रिपु कुछ देर तक सोचते रहे। फिर बोले—

“इस समस्या का स्थायी समाधान खोजिए।”

अधिकारी ने पूछा—

“क्या शिक्षक भर्ती करें?”

ज्ञान रिपु ने चश्मा उतारकर उसे देखा।

“इतनी जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुंचिए। पहले एक समिति बनाइए।”

समिति बनी।

समिति ने रिपोर्ट दी—

“शिक्षकों की कमी है।”

रिपोर्ट के विमोचन का भव्य समारोह हुआ।

मंत्री जी ने कहा—

“सरकार इस कमी को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

अगले वर्ष फिर स्कूलों के भवन बने।

शिक्षक फिर कम हो गए।

विकास जारी रहा।

इसी बीच अस्पतालों का भी कायाकल्प होने लगा।

पुराने अस्पतालों के स्थान पर नए भवन बनने लगे।

शीशे की दीवारें, चमकदार फर्श, बड़े बोर्ड और विशाल प्रवेश द्वार।

अस्पताल देखकर लगता कि बीमारी से पहले ही स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा।

लेकिन भीतर जाने पर पता चलता कि डॉक्टरों के पद रिक्त हैं।

नर्सें कम हैं।

दवाएं भी बहुत कम हैं।

मशीनें हैं, मगर उन्हें चलाने वाला कोई नहीं।

मरीज हैं, मगर देखने वाला डॉक्टर नहीं।

एक ग्रामीण ने नए बने अस्पताल के बाहर खड़े होकर पूछा—

“डॉक्टर कब आएंगे?”

कर्मचारी ने कहा—

“पद स्वीकृत हो चुका है।”

ग्रामीण प्रसन्न हुआ।

“तो डॉक्टर भी आएगा?”

“अभी नहीं।”

“क्यों?”

“अभी नियुक्ति नहीं हुई।”

“कब होगी?”

“सरकार विचार कर रही है।”

ग्रामीण ने अस्पताल की चमचमाती इमारत की ओर देखा।

उसे लगा शायद इमारत ही इलाज करेगी।

उधर सड़कें बन रही थीं।

हाईवे बन रहे थे।

फ्लाईओवर बन रहे थे।

पुरानी सड़क के ऊपर नई सड़क, नई सड़क के ऊपर चौड़ी सड़क और चौड़ी सड़क के ऊपर फ्लाईओवर।

शहर के लोग ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाते हुए विकास को प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे थे।

काला जी का परिवहन मंत्रालय बहुत प्रसन्न था।

वे कहते—

“जहां सड़क है, वहां गति है। जहां गति है, वहां प्रगति है।”

किसी ने पूछा—

“और जहां रोजगार नहीं है?”

काला जी ने उत्तर दिया—

“वहां भी हाईवे है।”

युवाओं ने इस उत्तर को बहुत ध्यान से सुना।

देश में बेरोजगार युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही थी।

हर वर्ष नई डिग्रियां निकलतीं।

नई डिग्रियों के साथ नए बेरोजगार निकलते।

विश्वविद्यालयों के बाहर नौकरी के आवेदन पत्रों की लाइनें लंबी होती गईं।

सरकारी दफ्तरों में खाली पदों की सूची भी लंबी होती गई।

युवा कहते—

“पद खाली हैं तो भर्ती क्यों नहीं होती?”

सरकार कहती—

“प्रक्रिया चल रही है।”

युवा पूछते—

“प्रक्रिया कब पूरी होगी?”

सरकार कहती—

“उचित समय पर।”

युवा पूछते—

“उचित समय कब आएगा?”

सरकार कहती—

“यह सरकार तय करेगी।”

इस बीच युवाओं की उम्र निकलती रही।

फॉर्म भरने की फीस बढ़ती रही।

परीक्षाएं होती रहीं।

कभी परीक्षा स्थगित हुई, कभी परिणाम।

कभी नियुक्ति रुकी, कभी भर्ती न्यायालय पहुंची।

युवा धीरे-धीरे प्रतियोगी परीक्षाओं के विशेषज्ञ होते गए।

वे इतिहास, भूगोल, संविधान और सामान्य ज्ञान पढ़ते-पढ़ते यह भी सीख गए कि बेरोजगार रहने का धैर्य कैसे रखा जाता है।

देश में बेरोजगारी बढ़ी।

लेकिन विकास दर भी बढ़ी।

इमारतें बढ़ीं।

सड़कें बढ़ीं।

फ्लाईओवर बढ़े।

उद्घाटन बढ़े।

समारोह बढ़े।

भाषण बढ़े।

बैनर बढ़े।

लेकिन नौकरी घटती गई।

शिक्षा मंत्री ज्ञान रिपु ने एक दिन संसद में घोषणा की—

“देश में शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।”

सांसदों ने मेज थपथपाई।

गृह मंत्री काकदंत ने कहा—

“देश में कानून-व्यवस्था मजबूत हुई है।”

मेज फिर थपथपाई गई।

उद्योग मंत्री काला जी ने कहा—

“देश में उद्योगों का विस्तार हुआ है।”

मेज इतनी जोर से थपथपाई गई कि एक सांसद की उंगली में चोट आ गई।

महाराज अंत में उठे।

उन्होंने कहा—

“हमने देश को बदल दिया है।”

सभी खड़े हो गए।

तालियां बजने लगीं।

बाहर सड़क पर एक बेरोजगार युवक हाथ में अपनी डिग्री लिए खड़ा था।

सड़क के दूसरी ओर नया अस्पताल था।

उसके पीछे नया स्कूल था।

ऊपर नया फ्लाईओवर था।

और इन सबके बीच वह सोच रहा था—

“देश तो बदल गया, लेकिन मेरे जीवन में क्या बदला?”

उसे कोई उत्तर नहीं मिला।

शायद उत्तर किसी नई निर्माणाधीन इमारत में रखा था।

वह इमारत अभी अधूरी थी।

और सरकार के अनुसार—

अधूरी चीजों में ही विकास की सबसे अधिक संभावनाएं होती हैं।

महाराज श्रृंखला 16 : चेहरा ही घोषणा-पत्र था

महाराज श्रृंखला 16 : चेहरा ही घोषणा-पत्र था

शिक्षा मंत्री महाराज की प्रसिद्धि अब शिक्षा मंत्रालय की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी थी।

पहले लोग उन्हें शिक्षा मंत्री के रूप में जानते थे। फिर उन्हें ऐसा शिक्षा मंत्री मानने लगे, जो शिक्षा के अलावा सब कुछ जानता है। धीरे-धीरे यह धारणा भी बनने लगी कि वे जो कुछ जानते हैं, वही देश के लिए जानना आवश्यक है और जो वे नहीं जानते, उसे जानने की नागरिकों को कोई जरूरत नहीं।

ज्ञान रिपु की लेखनी का इसमें विशेष योगदान था।

ज्ञान रिपु ने महाराज के भाषणों में इतने अलंकार भर दिए थे कि साधारण वाक्य भी दर्शन का रूप लेने लगे थे। महाराज यदि कहते—

“हम शिक्षा को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।”

तो ज्ञान रिपु उसी बात को लिखते—

“हम उस ज्ञान-सूर्य का उदय करेंगे, जिसकी स्वर्णिम किरणें अज्ञान के अंतिम अंधकार को चीरते हुए राष्ट्र की आत्मा के प्रत्येक कोने को आलोकित करेंगी।”

महाराज मंच पर आते, दो क्षण आंखें बंद करते, फिर धीरे से खोलते।

नटराज ने उन्हें सिखाया था कि आंखें खोलने का भी एक समय होता है और जनता के सामने आंखें खोलने से पहले थोड़ी देर बंद रखना चाहिए। इससे जनता को लगता है कि नेता अभी-अभी भीतर से कोई बहुत बड़ा सत्य खोजकर लाया है।

महाराज ने अभिनय को भी अपनी राजनीति का आवश्यक अंग बना लिया था।

कभी वे किसान के बीच जाकर मिट्टी हाथ में उठा लेते।

कभी किसी विद्यालय में बच्चे के सिर पर हाथ रख देते।

कभी किसी मजदूर से गले मिलते।

कभी किसी बूढ़ी महिला की बात सुनकर इतने भावुक हो जाते कि कैमरे स्वयं भावुक होकर उनके चारों ओर घूमने लगते।

इन दृश्यों का प्रसारण होता।

अगले दिन अखबारों में शीर्षक छपते—

“महाराज ने फिर जीता जनता का दिल।”

जनता सचमुच दिल हारती जा रही थी।

किसी को यह पूछने की फुर्सत नहीं थी कि दिल हारने के बाद जेब में क्या बचा है।

महाराज की घोषणाओं का भी अपना एक अलग संसार था।

वे रोज कोई न कोई घोषणा करते।

कभी देश में ज्ञान क्रांति की घोषणा होती।

कभी रोजगार क्रांति की।

कभी गांवों को शहर बनाने की।

कभी शहरों को विश्वस्तरीय बनाने की।

कभी नदियों को स्वच्छ करने की।

कभी हवा को शुद्ध करने की।

कभी युवाओं को अवसर देने की।

कभी बुजुर्गों को सम्मान देने की।

और कभी यह घोषणा कि अब घोषणाओं को भी परिणामों से जोड़ दिया जाएगा।

जनता इन घोषणाओं को सुनती और आश्वस्त होती।

जनता को अब परिणामों की आदत कम और आश्वासन की आदत अधिक हो गई थी।

इसी बीच देश में आम चुनाव घोषित हो गए।

पार्टी के पुराने नेता चुनाव की तैयारी में जुट गए।

बैठकें हुईं।

समितियां बनीं।

रणनीतियां बनीं।

रणनीतियों पर उप-रणनीतियां बनीं।

फिर सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

तय हुआ कि इस बार पार्टी को किसी रणनीति की जरूरत नहीं है।

महाराज ही पर्याप्त हैं।

पार्टी ने अपने चुनाव अभियान का नया सूत्र वाक्य बनाया—

“चेहरा वही, भरोसा वही।”

फिर किसी ने सुझाव दिया कि चेहरा बड़ा होना चाहिए।

पोस्टर पर।

बैनर पर।

होर्डिंग पर।

दीवारों पर।

मोबाइल स्क्रीन पर।

टीवी पर।

चौराहों पर।

सरकारी विज्ञापनों में।

जहां जगह मिले वहां।

और जहां जगह न मिले, वहां जगह बनाकर।

कुछ दिनों में ऐसा लगने लगा जैसे देश में चुनाव नहीं, महाराज का जन्मदिन मनाया जा रहा हो।

पार्टी का चुनाव चिह्न छोटा पड़ गया था।

महाराज का चेहरा बड़ा हो गया था।

उम्मीदवारों के नाम छोटे हो गए थे।

महाराज का नाम बड़ा हो गया था।

घोषणा-पत्र मोटा था, लेकिन उसे पढ़ने वाला कोई नहीं था।

क्योंकि घोषणा-पत्र के ऊपर महाराज की तस्वीर इतनी बड़ी थी कि नीचे लिखी बातें दिखाई ही नहीं देती थीं।

पार्टी के एक वरिष्ठ रणनीतिकार ने कहा—

“अब मतदाता को उम्मीदवार की जरूरत नहीं। उसे केवल यह पता होना चाहिए कि उम्मीदवार महाराज के साथ है।”

दूसरे ने कहा—

“और यदि उम्मीदवार के साथ महाराज की तस्वीर है तो उम्मीदवार का परिचय देने की भी जरूरत नहीं।”

तीसरे ने बात को और आगे बढ़ाते हुए कहा—

“जहां उम्मीदवार कमजोर हो, वहां महाराज की तस्वीर और बड़ी कर दीजिए।”

यह सुझाव सर्वसम्मति से पारित हुआ।

चुनाव अभियान शुरू हुआ।

महाराज जहां जाते, भीड़ उमड़ती।

भीड़ जहां नहीं उमड़ती, वहां व्यवस्था की ओर से भीड़ उपलब्ध कराई जाती।

मंच सजते।

गीत बजते।

नारे लगते।

और फिर महाराज आते।

उनके आने से पहले उनके आने की घोषणा होती।

उनके आने के बाद उनके आने की सफलता की घोषणा होती।

और अगले दिन उनके आने की लोकप्रियता की घोषणा होती।

महाराज कहते—

“यह चुनाव देश के भविष्य का चुनाव है।”

जनता तालियां बजाती।

महाराज कहते—

“यह चुनाव विकास की दिशा तय करेगा।”

तालियां और तेज हो जातीं।

महाराज कहते—

“आपने मुझे शिक्षा मंत्री के रूप में देखा है। अब मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि देश को भी एक नई शिक्षा मिलेगी।”

लोगों को इस वाक्य का अर्थ समझ में नहीं आया, लेकिन वे फिर भी तालियां बजाते रहे।

ज्ञान रिपु मंच के पीछे खड़े मुस्करा रहे थे।

उन्होंने महाराज से कहा—

“महाराज, आपने बहुत अच्छा कहा।”

महाराज ने पूछा—

“मैंने क्या कहा?”

ज्ञान रिपु ने उत्तर दिया—

“यही तो आपकी सबसे बड़ी विशेषता है महाराज। जनता को यह पता नहीं चलता कि आपने क्या कहा, लेकिन उसे विश्वास रहता है कि आपने बहुत महत्वपूर्ण कुछ कहा है।”

नटराज ने भी मुस्कराकर सिर हिलाया।

अभिनय सफल था।

भाषण सफल था।

चेहरा सफल था।

चुनाव भी सफल हो गया।

परिणाम आए।

पार्टी फिर सत्ता में आ गई।

पुराने प्रधानमंत्री ने परिणाम सुनकर मुस्कराते हुए कहा—

“जनता ने फिर आशीर्वाद दिया है।”

किसी पत्रकार ने पूछा—

“अब आगे क्या?”

प्रधानमंत्री ने कहा—

“अब पार्टी तय करेगी।”

पार्टी ने तय कर लिया।

कुछ पुराने नेता, जो वर्षों से सत्ता में थे, अचानक राष्ट्र के लिए बहुत मूल्यवान हो गए।

इतने मूल्यवान कि उन्हें अब सक्रिय राजनीति से हटाकर सलाहकार मंडल में सुरक्षित रख दिया गया।

सलाहकार मंडल ऐसा स्थान था जहां अनुभव की कोई कमी नहीं थी और अधिकार की कोई अधिकता नहीं थी।

वयोवृद्ध नेता वहां बैठकर देश, लोकतंत्र, राजनीति और अपने पुराने अनुभवों पर विचार कर सकते थे।

उनकी सलाह ली भी जा सकती थी।

और यदि सलाह बहुत उपयोगी हो तो उसे सम्मानपूर्वक सुना भी जा सकता था।

बस उसे मानना आवश्यक नहीं था।

एक वरिष्ठ नेता ने नए प्रधानमंत्री से पूछा—

“हमारी भूमिका क्या होगी?”

उत्तर मिला—

“आप राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं।”

“और निर्णय?”

“वह नई पीढ़ी करेगी।”

“और हमारी सलाह?”

“वह इतिहास में दर्ज होगी।”

वयोवृद्ध नेता संतुष्ट हो गए।

इतिहास में दर्ज होना बुरा नहीं होता।

सत्ता में दर्ज होना कठिन होता है।

उधर पार्टी के भीतर एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ।

प्रधानमंत्री कौन बने?

नामों की चर्चा हुई।

कुछ अनुभवी नेताओं के नाम आए।

कुछ युवा नेताओं के नाम आए।

कुछ ऐसे नेताओं के नाम आए जिन्हें स्वयं भी पता नहीं था कि उनका नाम चल रहा है।

लेकिन हर चर्चा अंततः महाराज के नाम पर आकर रुक जाती।

महाराज अब केवल लोकप्रिय नहीं थे।

वे अपरिहार्य हो चुके थे।

पार्टी के एक नेता ने कहा—

“देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए, जिसे जनता अपना समझे।”

दूसरे ने कहा—

“महाराज को जनता अपना समझती है।”

तीसरे ने कहा—

“तो फिर समस्या क्या है?”

समस्या कोई नहीं थी।

और इसीलिए महाराज को देश का नया प्रधानमंत्री चुन लिया गया।

शपथ ग्रहण का दिन आया।

महाराज ने सफेद वस्त्र पहने।

चेहरे पर वही गंभीरता थी, जो नटराज ने सिखाई थी।

ज्ञान रिपु ने शपथ के आसपास के वातावरण को भी साहित्यिक बना दिया था।

हवा चल रही थी।

ध्वज लहरा रहा था।

सूरज चमक रहा था।

और देश का भविष्य भी कहीं न कहीं चमक रहा था।

महाराज ने शपथ ली।

कैमरे उनकी ओर मुड़ गए।

देश ने पहली बार उन्हें शिक्षा मंत्री के रूप में नहीं, प्रधानमंत्री के रूप में देखा।

ज्ञान रिपु ने उसी रात अपनी डायरी में लिखा—

“आज महाराज ने पद नहीं संभाला। आज पद ने महाराज को संभाला है।”

फिर उन्होंने उस वाक्य को काट दिया।

उन्हें लगा, यह कुछ कम प्रभावशाली है।

उन्होंने दूसरा वाक्य लिखा—

“आज राष्ट्र ने अपने भाग्य का नया अध्याय महाराज के करकमलों से लिखवाया।”

यह उन्हें बेहतर लगा।

उन्होंने अगले दिन इसे अखबार के लिए भेज दिया।

अखबार में वह शीर्षक बन गया।

और उसी दिन देश के अधिकांश सरकारी कार्यालयों में महाराज के नए चित्र लगाए जाने लगे।

शिक्षा मंत्रालय से लेकर ग्राम पंचायत तक।

जहां पहले महाराज की तस्वीर के नीचे लिखा था—

“शिक्षा मंत्री”

वहां अब केवल लिखा था—

“प्रधानमंत्री।”

कई जगह पदनाम भी हट गया।

क्योंकि अब लोगों को पद बताने की आवश्यकता नहीं थी।

चेहरा ही पद था।

चेहरा ही संदेश था।

चेहरा ही भरोसा था।

और धीरे-धीरे ऐसा समय आने लगा जब लोग घोषणाओं पर विश्वास करने से पहले यह नहीं देखते थे कि घोषणा क्या है।

वे केवल यह देखते थे कि घोषणा किस चेहरे से निकली है।

महाराज के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं थी कि देश को कैसे चलाया जाए।

चुनौती यह थी कि देश को यह कैसे विश्वास दिलाया जाए कि वह ठीक उसी दिशा में चल रहा है, जिस दिशा में महाराज देख रहे हैं।

और महाराज जिस दिशा में देखते थे, उधर कैमरे पहले से लगे रहते थे।


ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, August 19, 2026

महाराज श्रृंखला 15: विकास की धूल

महाराज श्रृंखला 15: विकास की धूल

मोटाभाई काला की पहली सीमेंट फैक्ट्री चल पड़ी तो उनके भीतर देशसेवा की भावना और भी प्रबल हो गई। आखिर देशसेवा में जितना अधिक माल लगता है, उतनी ही अधिक देशसेवा करने की क्षमता पैदा होती है।

पहली फैक्ट्री के बाद दूसरी फैक्ट्री लगी और दूसरी के बाद तीसरी की योजना बनने लगी।

मोटाभाई ने एक दिन अपने मुनीम से पूछा—

“हमारे पास अब कितनी जमीन है?”

मुनीम ने कहा—

“सेठजी, आपके नाम पर कम है, कंपनियों के नाम पर ज्यादा है।”

मोटाभाई ने प्रसन्न होकर कहा—

“यही तो कॉरपोरेट संस्कृति है। आदमी एक, कंपनियाँ अनेक और देश एक।”

मुनीम ने सिर झुका लिया।

वह जानता था कि सेठजी जब देश की बात करते हैं तो बीच में परिवार को सुनाई देना चाहिए।

फैक्ट्री के लिए नई जमीन चाहिए थी।

जमीन के बीच में गाँव था।

गाँव के बीच में लोग थे।

और लोगों के बीच में उनकी यादें, खेत, कुएँ, पेड़, मंदिर और पुरखे थे।

कंपनी के सलाहकार ने समझाया—

“ये सब भावनात्मक संपत्तियाँ हैं। इन्हें आर्थिक संपत्ति में बदलना होगा।”

मोटाभाई ने पूछा—

“कैसे?”

सलाहकार ने कहा—

“मुआवजा देकर।”

“लोग मानेंगे?”

“नहीं मानेंगे तो विकास समझाइए।”

“विकास से भी नहीं मानें?”

“तो पुनर्वास समझाइए।”

“फिर भी?”

सलाहकार ने मुस्कुराकर कहा—

“तब प्रशासन है न।”

मोटाभाई को प्रशासन की याद आते ही उनका चेहरा खिल उठा।

देश में लोकतंत्र था और लोकतंत्र में प्रशासन जनता के लिए था।

कंपनी भी जनता के लिए थी।

इसलिए दोनों के बीच बातचीत में कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए थी।

महाराज से बात की गई।

महाराज अब शिक्षा मंत्री थे, लेकिन शिक्षा मंत्री होने का अर्थ यह नहीं था कि वे केवल किताबों और स्कूलों की चिंता करें। मंत्री का अनुभव जितना व्यापक हो, उसकी उपयोगिता उतनी ही अधिक होती है।

उन्होंने कहा—

“विकास रुकना नहीं चाहिए।”

गोपाल सेठ ने कहा—

“बिल्कुल नहीं।”

महाराज ने पूछा—

“गाँव वालों की क्या समस्या है?”

गोपाल सेठ बोले—

“वे विकास को समझ नहीं रहे हैं।”

महाराज ने गंभीर होकर कहा—

“तो उन्हें समझाना चाहिए।”

गोपाल सेठ ने राहत की साँस ली।

समझाने का काम प्रशासन को सौंप दिया गया।

अगले सप्ताह गाँव में अधिकारियों की बैठक हुई।

अधिकारी ने नक्शा खोलकर कहा—

“यहाँ से सड़क जाएगी।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा खेत जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“विकास आएगा।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा कुआँ जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“रोजगार आएगा।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा घर जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“मुआवजा मिलेगा।”

एक बूढ़े किसान ने पूछा—

“मुआवजे से घर वापस आ जाएगा?”

अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने सरकारी भाषा में कहा—

“आप भावुक न हों। राष्ट्र निर्माण में भावनाओं का स्थान नहीं होता।”

बूढ़ा किसान चुप हो गया।

उसे पहली बार पता चला कि जिस जमीन पर उसके बाप-दादा की हड्डियाँ मिली हुई हैं, वह अब भावना कहलाती है।

फैक्ट्री का निर्माण शुरू हो गया।

पेड़ काटे गए।

पहाड़ काटे गए।

मिट्टी हटाई गई।

धूल उड़ी।

और इस धूल को देखकर मोटाभाई बहुत प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा—

“यह धूल नहीं है। यह विकास का दृश्य प्रमाण है।”

उनकी बात पर उपस्थित अधिकारी ने तुरंत सिर हिलाया।

अधिकारी सिर हिलाने में कभी देर नहीं करते थे। उन्हें मालूम था कि फाइलों में सिर हिलाने से बहुत काम होते हैं और न हिलाने से बहुत काम रुक जाते हैं।

पर्यावरण विभाग की टीम निरीक्षण के लिए आई।

उन्होंने हवा में उड़ती धूल देखी।

एक अधिकारी ने मास्क लगाया।

मोटाभाई ने पूछा—

“क्या प्रदूषण बहुत ज्यादा है?”

अधिकारी ने कहा—

“थोड़ा है।”

“कितना?”

“रिपोर्ट में देखा जाएगा।”

“रिपोर्ट में क्या आएगा?”

अधिकारी ने कहा—

“वही जो वैज्ञानिक आधार पर उचित होगा।”

मोटाभाई ने संतोष की साँस ली।

वैज्ञानिक आधार बहुत सुविधाजनक चीज थी।

उसका निर्णय विज्ञान करता था, लेकिन विज्ञान को रिपोर्ट लिखने वाला अधिकारी समझता था।

फैक्ट्री की चिमनी से धुआँ निकलता रहा।

गाँव के बच्चों को खाँसी होने लगी।

तालाब का पानी बदलने लगा।

खेतों पर सफेद धूल जमने लगी।

मोटाभाई ने तुरंत एक स्वास्थ्य शिविर लगवाया।

बैनर पर लिखा था—

“मोटाभाई काला समूह द्वारा निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा।”

डॉक्टरों ने बच्चों को दवाइयाँ दीं।

अखबार में अगले दिन खबर छपी—

“उद्योगपति मोटाभाई काला ने सामाजिक दायित्व निभाते हुए ग्रामीणों के स्वास्थ्य की चिंता की।”

किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस बीमारी के इलाज के लिए शिविर लगाया गया, वह पैदा किससे हुई।

देशसेवा का यह भी एक सुंदर मॉडल था।

पहले समस्या पैदा करो।

फिर समाधान की कंपनी खोलो।

फिर समाधान के लिए पुरस्कार लो।

मोटाभाई को पुरस्कार मिलने लगे।

एक संस्था ने उन्हें ‘हरित उद्योग सम्मान’ दिया।

दूसरी ने ‘ग्रामीण विकास रत्न’।

तीसरी ने ‘राष्ट्र निर्माण गौरव’।

मोटाभाई ने तीनों पुरस्कार अपने कार्यालय की उसी दीवार पर लगाए जहाँ गांधी बाबा की तस्वीर लगी थी।

बापू अब भी मुस्कुरा रहे थे।

उन्हें शायद आदत हो गई थी।

उधर साहित्य परिषद के अध्यक्ष ज्ञान रिपु ने विकास पर एक विशेष संगोष्ठी आयोजित की—

“धूल से धरा तक : आधुनिक राष्ट्र निर्माण में उद्योग की भूमिका।”

मुख्य वक्ता मोटाभाई थे।

ज्ञान रिपु ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा—

“आज साहित्य को उद्योग के साथ संवाद करना चाहिए। कारखाने केवल सीमेंट नहीं बनाते, वे भविष्य बनाते हैं।”

तालियाँ बजीं।

मजदूर पीछे बैठे थे।

उनमें से एक ने दूसरे से कहा—

“हम क्या बनाते हैं?”

दूसरे ने कहा—

“सीमेंट।”

पहला बोला—

“और ये लोग?”

दूसरा बोला—

“भविष्य।”

पहला कुछ देर सोचता रहा।

फिर बोला—

“हमारा भविष्य कौन बनाएगा?”

दूसरे ने कहा—

“शायद वही कंपनी।”

दोनों हँस दिए।

उनकी हँसी किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं हुई।

इधर महाराज ने शिक्षा विभाग में नई योजना घोषित की—

“उद्योग-शिक्षा समन्वय अभियान।”

इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को उद्योगों का भ्रमण कराया जाना था।

महाराज का मानना था कि बच्चे किताबों से जितना सीखते हैं, उतना ही कारखानों से भी सीख सकते हैं।

पहली यात्रा मोटाभाई की फैक्ट्री में हुई।

बच्चों को बताया गया—

“यह क्लिंकर है।”

“यह सीमेंट है।”

“यह कन्वेयर बेल्ट है।”

एक बच्चे ने पूछा—

“सर, यह जो सामने गाँव था, वह कहाँ गया?”

अध्यापक ने कहा—

“वह विकास में समाहित हो गया।”

बच्चे ने फिर पूछा—

“समाहित मतलब?”

अध्यापक ने कहा—

“बड़े होकर समझोगे।”

शिक्षा मंत्री को यह उत्तर बहुत पसंद आया।

उन्हें लगा कि शिक्षा का असली उद्देश्य यही है—कुछ बातें इतनी देर से समझ में आएँ कि तब तक सवाल पूछने की आदत समाप्त हो जाए।

मोटाभाई की तीसरी फैक्ट्री के लिए खनन पट्टा भी मिल गया।

अब सीमेंट बनाने के लिए पत्थर चाहिए था।

पत्थर पहाड़ में था।

पहाड़ जंगल में था।

जंगल आदिवासियों की जमीन पर था।

और आदिवासियों को बताया गया कि यह सब राष्ट्र की संपत्ति है।

एक अधिकारी ने सभा में कहा—

“यह खनिज देश का है।”

एक आदिवासी ने पूछा—

“तो हमारी जमीन?”

अधिकारी ने कहा—

“वह भी देश की है।”

आदिवासी ने पूछा—

“हम?”

अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा—

“आप भी देश के हैं।”

आदिवासी चुप हो गया।

उसे पहली बार लगा कि देश का होना शायद जमीन पर अपना होना नहीं है।

मोटाभाई की कंपनी को खनन की अनुमति मिल गई।

पहाड़ों में विस्फोट होने लगे।

हर विस्फोट के साथ पत्थर टूटता था।

और हर टूटे पत्थर से सीमेंट बनता था।

सीमेंट से इमारतें बनती थीं।

इमारतों में सरकारी कार्यालय बनते थे।

सरकारी कार्यालयों में विकास की योजनाएँ बनती थीं।

विकास की योजनाओं में फिर नई सड़कें बनती थीं।

सड़कों के किनारे फिर नए उद्योग आते थे।

और उद्योगों के लिए फिर पहाड़ टूटते थे।

देश एक वृत्त में घूम रहा था।

इतनी तेजी से कि किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि वह आगे जा रहा है या उसी जगह लौट रहा है।

एक दिन महाराज ने गोपाल सेठ से कहा—

“देश में विकास की गति बहुत बढ़ गई है।”

गोपाल सेठ बोले—

“महाराज, गति और बढ़नी चाहिए।”

“क्यों?”

“ताकि लोग सोचने के लिए पीछे मुड़कर न देख सकें।”

महाराज ने उनकी ओर देखा।

फिर दोनों हँस पड़े।

उनकी हँसी में अनुभव था।

अनुभव में सत्ता थी।

सत्ता में विकास था।

और विकास में बहुत सारा सीमेंट।

उसी शाम मोटाभाई के बंगले पर एक नया बोर्ड लगाया गया—

“राष्ट्र निर्माण कार्यालय।”

नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—

“मोटाभाई काला समूह।”

बोर्ड देखकर मोटाभाई देर तक खड़े रहे।

उन्हें अपने बाप-दादा याद आए।

गधे पर राख लादकर चलने वाले वे लोग आज कहाँ होते?

शायद किसी पुराने गाँव की स्मृति में।

लेकिन राख से सीमेंट तक की यात्रा ने उन्हें एक नई शिक्षा दी थी—

जिसके हाथ में राख हो, वह गरीब हो सकता है;

जिसके हाथ में सीमेंट की फैक्ट्री हो, वह राष्ट्र निर्माता कहलाता है।

और जिस राष्ट्र में राष्ट्र निर्माण का ठेका कुछ ही हाथों में चला जाए, वहाँ विकास की धूल सबकी आँखों में बराबर पड़ती है।

बस फर्क इतना रहता है कि कुछ लोग आँखें बंद कर लेते हैं।

और कुछ लोग उसी धूल से अपना अगला महल बना लेते हैं।