महंगाई के दौर में शकर का शोर
जैसे कोई अफसर बोतल खुलते ही खुलने लगता है, जैसे कोई मिनिस्टर कड़कनाथ खाने के बाद अपनी कड़कता भूलकर ढीला पड़ने लगता है, जैसे कोई प्रेमिका बादल घिरते ही प्रियतम की याद में बेचैन होने लगती है, वैसे ही साधुरामजी मिठाई देखकर भीतर तक मीठे हो जाते हैं। मीठा उनकी कमजोरी है और कमजोरी भी ऐसी कि मिठाई की दुकान के सामने से गुजरते हुए उनका लोकतंत्र तक डगमगाने लगता है।
लेकिन अब वह जमाना नहीं रहा कि मेहमान के आने पर मोतीचूर के लड्डू, गुलाबजामुन या बालूशाही की खुशबू से ड्राइंग रूम को लोकतांत्रिक बनाया जा सके। चीनी के दाम जिस तरह ऊपर जा रहे हैं, लगता है मिठाई अब खाने की वस्तु कम और निवेश का साधन अधिक हो गई है। बाजार में चीनी के भाव सात साल के ऊंचे स्तर तक पहुंचने की खबरें हैं और पिछले एक महीने में कीमतों में तेज उछाल आया है। त्योहारों का मौसम सामने है और सरकार को जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा लगाने से लेकर शुल्क-मुक्त आयात तक के उपाय करने पड़ रहे हैं।
ऐसे समय में साधुरामजी का मेरे घर पधारना किसी आर्थिक सर्वेक्षण से कम नहीं था।
उनके सत्कार में चाय के अलावा कुछ परोसने का साहस हममें नहीं था। मिठाई की प्लेट निकालते हुए मुझे लगता कि मैं घर के बजट पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रहा हूं।
उनके आते ही मैंने बिटिया को आदेश दिया—
“आज का अमृत ले आओ।”
चाय आई तो साधुरामजी ने प्याली को ऐसे देखा जैसे कोई विपक्षी नेता सरकार की बजट पुस्तिका को देखता है। एक चुस्की ली और प्रश्नवाचक नजरों से मुझे घूरने लगे। उनकी मुद्रा किसी खबरिया चैनल के उस एंकर जैसी थी, जो पहले सवाल पूछता है और फिर जवाब भी स्वयं ही दे देता है।
मैंने भी चाय पी।
चाय में शकर कम थी।
बहुत कम।
इतनी कम कि चाय ने स्वयं को चाय साबित करने के लिए भी संघर्ष शुरू कर दिया था।
मैंने पत्नी को पुकारा। उन्होंने बेटी को भेज दिया।
“बेटे, चाय में शकर नहीं डाली क्या?”
“डाली तो है पापा, मगर रोज से कम। मम्मी कहती हैं अब ऐसी ही कम शकर वाली चाय पीनी पड़ेगी।”
कहकर वह भीतर चली गई।
मैंने संकोच से साधुरामजी की ओर देखा।
“ओ हां, याद आया। साधुरामजी, वह क्या है कि अब शकर हमारी औकात से दूर होती जा रही है। हमने सोचा, खुद ही इसके खर्च पर लगाम लगा लें। सरकार का रुख कुछ ठीक दिखाई नहीं देता।”
साधुरामजी ने चाय की प्याली नीचे रखी और अपने चेहरे को ऐसा विकृत ज्यामितीय आकार दिया, जैसे किसी चुनावी नक्शे में अचानक कोई नई सीमा खिंच गई हो।
बोले—
“लगता है राजनीति में फिर कुछ न कुछ घटेगा। महंगाई की मार वैसी ही बनी हुई है और अब यह शकर का नया किस्सा! पहले प्याज, फिर तेल, कभी दाल, कभी दूध और अब शकर। जनता के जीवन से मिठास गायब होती जा रही है। इसके कारण लोगों के दिलों में बढ़ती कड़वाहट का राजनीतिक मूल्य कहीं सरकार को न चुकाना पड़ जाए। त्योहार सामने हैं। गणेशोत्सव से लेकर दशहरा और दीपावली तक मिठाई की मांग बढ़ेगी। ऐसे में शकर राजनीति का नया चुनावी मुद्दा बन सकती है।”
साधुरामजी के भीतर का नेता जाग गया था।
“लेकिन हमें राजनीति से क्या?” मैंने कहा, “हमें तो शकर चाहिए, वह भी सस्ते दामों पर।”
यह सुनते ही उनके भीतर का सत्ता समर्थित राजनीतिज्ञ बाहर आ गया।
“क्या शकर का इस्तेमाल इतना जरूरी है तुम्हारे लिए?”
मुझे लगा जैसे कोई मधुमक्खी गुलाब से उसकी मिठास की आवश्यकता पर प्रश्नचिह्न लगा रही हो।
मैंने कहा—
“हां, मिठास भी मनुष्य की जरूरत है। और अगर आप सोचते हैं कि खाने में हम मिठास त्याग दें तो चलिए आप हमें अपनी व्यवस्था में, अपने तंत्र में ‘मीठा व्यवहार’ ही दिलवा दीजिए। हम शकर का उपयोग छोड़ देंगे।”
साधुरामजी चुप रहे।
मैंने बात आगे बढ़ाई—
“वैसे भी जब चारों तरफ कड़वाहट फैली हो तो चाय में शकर के दो चम्मच डाल देने से जिंदगी कितनी मीठी हो जाएगी? मेरा तो सुझाव है कि सरकार घरेलू बाजार की चिंता छोड़कर पूरी शकर विदेश भेज दे। उसके बदले कुछ हेलिकॉप्टर और राफेल खरीद ले। देश सुरक्षित रहेगा और संसद में जब महंगाई पर बहस होगी तो पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाने में ही समय काट लेंगे। जनता को लगेगा कि उसकी शकर भले गायब हो गई, मगर राष्ट्र की सुरक्षा मीठी हो गई।”
मेरा रक्तचाप बढ़ चुका था।
साधुरामजी ने मुझे समझाने के अंदाज में कहा—
“तुम तो ख्वामखाह नाराज हो गए। मेरा मतलब यह थोड़े था। ये सब तात्कालिक स्थितियां हैं। बाजार में चीजें महंगी-सस्ती होती रहती हैं। अभी सरकार ने चीनी के स्टॉक पर सीमा लगाई है। जमाखोरी रोकने के लिए निगरानी बढ़ाई जा रही है। जरूरत पड़ी तो आयात भी किया जा रहा है। सरकार सब देख रही है।”
“लेकिन कीमत तो हम देख रहे हैं।”
“तुम्हें बस कीमत दिखाई देती है। सरकार को पूरा परिदृश्य देखना पड़ता है।”
“परिदृश्य पेट में नहीं जाता, शकर जाती है।”
वे थोड़े असहज हुए।
“तुम जरा जीना सीखो। ये छोटे-छोटे अभावों से क्यों प्रभावित होते हो? तुम एक महान देश के समझदार और राष्ट्रवादी नागरिक हो। उन अमर क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करो, जिन्होंने भारी अभावों और कष्टों के बीच देश को आजाद कराया था।”
मैंने कहा—
“उन्होंने देश आजाद कराया था, चाय की प्याली नहीं।”
साधुरामजी ने मेरी बात अनसुनी कर दी।
“और आज भी तुम एक नई आजादी के दौर से गुजर रहे हो। महंगाई से आजादी, बेरोजगारी से आजादी, भ्रष्टाचार से आजादी...”
मैंने टोका—
“शकर से आजादी?”
“बिल्कुल! हर चीज का एक सकारात्मक पक्ष होता है। शकर कम खाओगे तो स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। मधुमेह का खतरा कम होगा। मोटापा घटेगा। डॉक्टर खुश होंगे। बीमा कंपनियां खुश होंगी।”
“और मेरा चाय का स्वाद?”
“राष्ट्रहित में स्वाद का त्याग करना पड़े तो करना चाहिए।”
अब साधुरामजी के शब्दों में निरंतर शकर घुल रही थी।
“हम तुम्हें क्या नहीं दे रहे! थोड़ा-सा इंतजार तो करो। इतना अधीर भी मत बनो। अच्छी चीजें आसानी से नहीं मिलतीं। अच्छे दिनों के लिए थोड़ा-बहुत सेक्रिफाइस और त्याग तो हर नागरिक को करना पड़ेगा। तुम भी क्या इस तुच्छ-सी शकर का रोना लेकर बैठ गए!”
मैंने कहा—
“साधुरामजी, मैं आपकी मीठी-मीठी बातों में आने वाला नहीं हूं। सरकार को चाहिए कि शकर सस्ते दामों पर उपलब्ध कराए। बस।”
वे क्रोधित हो गए।
“तुम भी अजीब आदमी हो! एक मामूली-सी चीज के लिए अड़े हो। मांगना ही है तो महंगाई भत्ते की किश्त मांगो। जो दिया जा सके, वह मांगो। वेतन बढ़ेगा तो शकर महंगी होने का दुख कुछ कम होगा।”
“लेकिन अगर वेतन बढ़ने से पहले शकर और महंगी हो गई तो?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“तुम हर बात में समस्या क्यों खोजते हो?”
“क्योंकि समस्या हर बात में खुद को खोज लेती है।”
साधुरामजी ने चाय की अंतिम चुस्की ली। प्याली में बची हुई चाय में शकर का इतना कम अंश था कि शायद वह स्वयं भी सरकार की तरह यह बताने की स्थिति में नहीं थी कि उसमें मिठास है या सिर्फ मिठास का वादा।
साधुरामजी आंखें लाल किए, पैर पटकते हुए लौट गए।
मैं काफी देर तक खाली प्याली को देखता रहा।
अचानक मुझे लगा कि असली संकट शकर का नहीं, मिठास का है।
शकर महंगी हुई तो हमने चाय में कम कर दी। मिठाई महंगी हुई तो हमने मिठाई कम कर दी। सब्जी महंगी हुई तो मात्रा घटा दी। पेट्रोल महंगा हुआ तो यात्राएं कम कर दीं। बिजली महंगी हुई तो पंखे की गति कम कर दी।
हमने हर चीज में समझौता कर लिया।
सिर्फ एक चीज है जिसकी कीमत बढ़ने के बावजूद हम उसे कम नहीं कर पा रहे—
राजनीतिक वादों की मिठास।
वह आज भी भरपूर है।
इतनी भरपूर कि महंगाई की कड़वी चाय भी पी जाए तो गले से उतर जाती है।
****
ब्रजेश कानूनगो