Thursday, August 6, 2026

उत्तरविहीन गणतंत्र के प्रवक्ता

उत्तरविहीन गणतंत्र के प्रवक्ता

राजनीति में पहले दो ही प्रजातियाँ मानी जाती थीं—नेता और कार्यकर्ता। नेता बोलता था, कार्यकर्ता उसे सही सिद्ध करता था। नेता चलता था, कार्यकर्ता पीछे-पीछे चलता था। नेता यदि भूल से गलत दिशा में भी निकल पड़ता, तो कार्यकर्ता उसी रास्ते को ऐतिहासिक बताकर उसके दोनों ओर झंडे लगा देता था। लोकतंत्र की यही सरल जैविक संरचना थी।

फिर समय बदला। टेलीविजन आया। कैमरे आए। प्राइम टाइम आया। और राजनीति ने विकास की एक नई प्रजाति को जन्म दिया—प्रवक्ता।

कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। लेकिन राजनीतिक दलों में प्रवक्ता का जन्म आवश्यकता से अधिक टीवी चैनलों की भूख का परिणाम था। चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों को हर शाम युद्ध चाहिए था। युद्ध के लिए योद्धा चाहिए थे। नेता व्यस्त थे, कार्यकर्ता अनुभवहीन थे। इसलिए दोनों के बीच से एक ऐसा जीव विकसित हुआ जो हर विषय पर बोल सकता था, चाहे उसे विषय का ज्ञान हो या न हो। ज्ञान से अधिक आवश्यक था आत्मविश्वास और आवाज़ का वॉल्यूम।

धीरे-धीरे प्रवक्ता पार्टी का चेहरा नहीं, उसका कवच बन गया। नेता गलती करे तो प्रवक्ता सफाई देता है। नेता चुप रहे तो प्रवक्ता बोलता है। नेता कुछ ऐसा बोल दे जिसकी सफाई देना भी कठिन हो, तब भी प्रवक्ता मुस्कराते हुए उसे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैचारिक और संदर्भगत बताकर राष्ट्रहित में समाहित कर देता है।

टीवी स्टूडियो आजकल लोकतंत्र के अस्थायी युद्धक्षेत्र हैं। यहाँ तलवारें नहीं चलतीं, तथ्यों के नाम पर पुराने वीडियो चलते हैं। गोले नहीं दागे जाते, बल्कि स्क्रीन पर लाल रंग की पट्टियाँ फटती रहती हैं—"बड़ी खबर", "सबसे बड़ा खुलासा", "देश पूछ रहा है।"

देश बेचारा शायद उस समय रिमोट ढूँढ़ रहा होता है।

स्टूडियो में बैठा एंकर स्वयं न्यायपालिका, अभियोजन पक्ष, विपक्ष, गवाह और कभी-कभी जनता भी बन जाता है। उसके प्रश्नों की गति इतनी तेज़ होती है कि उत्तर यदि कहीं मौजूद भी हो तो घबराकर बाहर आने से इनकार कर देता है।

प्रवक्ता भी कम साधक नहीं होते। वर्षों के अभ्यास के बाद वे उत्तर देने की कला से ऊपर उठ चुके हैं। अब वे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते, प्रश्नों का पुनर्जन्म कराते हैं।

"महँगाई क्यों बढ़ी?"

"पहले यह बताइए, आपके समय में क्या फूल बरस रहे थे?"

"बेरोज़गारी पर क्या कहेंगे?"

"आपको पिछले पचास वर्षों की बेरोज़गारी दिखाई नहीं देती?"

"इस मुद्दे पर आपका उत्तर क्या है?"

"पहले आप यह स्पष्ट कीजिए कि आपका प्रश्न निष्पक्ष है भी या नहीं?"

प्रश्न बेचारा अपने उत्तर की प्रतीक्षा करता रह जाता है और बहस अगले प्रश्न की ओर प्रस्थान कर जाती है।

मुझे लगता है कि भविष्य में विश्वविद्यालयों में 'प्रवक्ता विज्ञान' नाम का नया विषय शुरू होना चाहिए। उसके पाठ्यक्रम में कुछ अनिवार्य अध्याय होंगे—बिना उत्तर दिए पाँच मिनट बोलना, विषय बदलने की उन्नत तकनीक, प्रतिप्रश्न का व्यावहारिक प्रशिक्षण, मुस्कराते हुए क्रोधित दिखना और समय समाप्त होने तक मूल मुद्दे को सुरक्षित रूप से गायब कर देना।

अंतिम वर्ष में शोध प्रबंध का विषय होगा—"उत्तर लोकतंत्र के लिए कितना आवश्यक है?"

टीवी बहसें देखकर मुझे अब शैलेन्द्र का गीत थोड़ा संशोधित रूप में याद आता है—

"एक सवाल तुम करो,

एक सवाल मैं करूँ,

उत्तर कहीं न मिल सके,

बस सिलसिला यही चलूँ।"

अब लगता है कि हमारे समय में उत्तर सबसे असुरक्षित प्राणी है। वह स्टूडियो में प्रवेश करने से पहले ही लापता हो जाता है। चारों ओर सवालों का विराट उद्योग चल रहा है, लेकिन उत्तर का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।

हो सकता है किसी दिन संसद में नहीं, किसी टीवी स्टूडियो में यह घोषणा हो—

"देश में उत्तरों की भारी कमी है। फिलहाल अगले आदेश तक काम चलाने के लिए प्रश्नों से ही काम लिया जाए।"

ब्रजेश कानूनगो 


चड्डी-बनियान लिमिटेड : चौर्य प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल

चड्डी-बनियान लिमिटेड : चौर्य प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल

बेचारे चड्डी-बनियान यूँ ही चर्चा में आ जाते हैं। देश में चाहे कुछ भी हो जाए, पुलिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक न एक बार उनका नाम अवश्य आ जाता है। किसी मोहल्ले में चोरी हुई नहीं कि घोषणा हो जाती है—"यह चड्डी-बनियान गिरोह का काम है।"

मुझे हमेशा इन गरीब कपड़ों पर दया आती है। अपराध उनका नहीं, बदनामी उनकी। जैसे अपराधी ने चोरी नहीं की, चड्डी और बनियान ने मिलकर षड्यंत्र रच दिया हो।

वैसे अगर ऊपरी कपड़ों का लोकतंत्र समाप्त कर दिया जाए तो हम सब मूलतः इसी बिरादरी के सदस्य हैं। अंतर केवल इतना है कि किसी के ऊपर कुर्ता है, किसी के ऊपर सूट है, किसी के ऊपर सत्ता है और किसी के ऊपर सदाचार का इस्त्री किया हुआ कोट। भीतर सबकी नागरिकता चड्डी-बनियान ही है।

मुझे लगता है कि इस गिरोह की सबसे बड़ी कमजोरी उसका प्रबंधन है। आज सफलता का पहला सूत्र है—अपराध नहीं, उसका मैनेजमेंट। अकेला चोर पकड़ा जाता है, संगठित चौर्य व्यवस्था सम्मानित कहलाती है।

अब जमाना बदल गया है। चोरी भी स्टार्टअप की तरह चलती है। पहले सेंध लगती थी, अब सर्वर हैक होते हैं। पहले ताला टूटता था, अब ओटीपी टूटता है। पहले जेब कटती थी, अब बैंक खाते मुस्कुराते-मुस्कुराते खाली हो जाते हैं। पहले चोर रात में आता था, अब दिनदहाड़े वीडियो कॉन्फ़्रेंस में शामिल रहता है।

हर सफल अभियान की तरह चोरी के भी विभाग होते हैं—रणनीति प्रकोष्ठ, कानूनी सलाहकार, डिजिटल विशेषज्ञ, जनसंपर्क अधिकारी, सोशल मीडिया प्रबंधक और आवश्यकता पड़ने पर चरित्र प्रमाणपत्र देने वाले शुभचिंतक भी। इसे आधुनिक भाषा में इकोसिस्टम कहते हैं।

हमारे समाज ने भी शब्दों का बड़ा सुंदर वर्गीकरण किया है। सेवा करने वालों का दल, विचार रखने वालों का समूह, चुनाव लड़ने वालों का मोर्चा, कारोबार करने वालों का नेटवर्क और चोरी करने वालों का गिरोह। फर्क केवल शब्दों का है, संगठन की कार्यप्रणाली लगभग एक जैसी रहती है।

हर संगठन की अपनी वर्दी होती है। कहीं खादी पहचान है, कहीं भगवा, कहीं हरा, कहीं सफेद, कहीं काला कोट, कहीं महँगा सूट और कहीं केवल चड्डी-बनियान। वर्दी देखकर आदमी का चरित्र नहीं, उसका विभाग पता चलता है।

पुराने डाकू कम से कम ईमानदार थे। घोड़े पर आते थे, बंदूक दिखाते थे और साफ़-साफ़ कह देते थे—"जो है, निकाल दो।" आज के सभ्य लुटेरे पहले मुस्कराते हैं, फिर आश्वासन देते हैं, उसके बाद नियम समझाते हैं और अंत में आपकी जेब को राष्ट्रहित में हल्का कर देते हैं। आप लुट भी जाते हैं और धन्यवाद भी कहते हैं।

चड्डी-बनियान गिरोह की एक और त्रासदी है। यह बेचारा कैमरे में जल्दी आ जाता है। सीसीटीवी उसे पहचान लेता है, पुलिस पकड़ लेती है और मीडिया उसे राष्ट्र का सबसे बड़ा खतरा घोषित कर देती है।

लेकिन जिनके अपराधों पर ब्रांडेड कपड़ों की प्रेस इतनी शानदार होती है कि सिलवटें तक दिखाई नहीं देतीं, वे वर्षों तक सम्मानित नागरिक बने रहते हैं। उनका अपराध कभी "अनियमितता", कभी "वित्तीय गड़बड़ी", कभी "प्रक्रियागत त्रुटि" और कभी "जांच का विषय" बन जाता है। अपराध भी कपड़ों की तरह वर्गभेदी होता है।

छोटा चोर माल लेकर भागता है, बड़ा चोर व्यवस्था लेकर चलता है। छोटा चोर जेल जाता है, बड़ा चोर जमानत, बहस, समिति, आयोग और प्रेस विज्ञप्तियों के बीच अपना भविष्य सुरक्षित कर लेता है। छोटे चोर के पास चड्डी-बनियान होती है, बड़े चोर के पास प्रतिष्ठा का ब्लेज़र।

कभी-कभी लगता है कि चड्डी-बनियान गिरोह को किसी बड़े प्रबंधन संस्थान में भेज देना चाहिए। वहां उन्हें सिखाया जाएगा कि चोरी से अधिक महत्वपूर्ण है छवि प्रबंधन, अपराध से अधिक उपयोगी है कथानक प्रबंधन, और पकड़े जाने से बचने का सबसे आसान उपाय है—इतने सम्मानित दिखाई दीजिए कि किसी को आप पर संदेह ही न हो।

तब शायद पुलिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पहली बार यह सुनने को मिले—"इस बार चड्डी-बनियान गिरोह नहीं, सूट-बूट प्रबंधन समूह सक्रिय था।"

उस दिन चड्डी और बनियान पहली बार सम्मान के साथ अलमारी में टाँग दिए जाएँगे और कहेंगे—"देखा, बदनाम हम थे, हुनर किसी और का था।"

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, August 4, 2026

माई री, मैं कापे लिखूँ...!

माई री, मैं कापे लिखूँ...!

सुबह से वह देश बचाने में लगा था।

देश बचाने का उसका तरीका थोड़ा अलग था। उसने घर की सारी खिड़कियाँ खोल रखी थीं, लैपटॉप की भी। एक स्क्रीन पर समाचार चैनल बिना आवाज़ के चिल्ला रहे थे, दूसरी पर एक्स हर तीसरे सेकंड नया राष्ट्रनिर्माण कर रहा था, तीसरी पर फेसबुक अपने पुराने झगड़ों को नए कमेंटों से सींच रहा था और चौथी पर एक खाली डॉक्यूमेंट उसका मुँह चिढ़ा रहा था।

उस डॉक्यूमेंट में उसने शीर्षक लिखा—"लोकतंत्र की नई विडंबना।"

तभी किसी मंत्री ने बयान बदल दिया।

शीर्षक मिटा दिया।

लिखा—"बयानों का मौसम।"

इतने में एक अभिनेता ने माफ़ी माँग ली।

फिर मिटा दिया।

लिखा—"माफ़ियों का महोत्सव।"

तभी एक बाबा गिरफ्तार हो गए।

शीर्षक फिर बदल गया।

इतने में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी आ गई। उधर किसी खिलाड़ी ने संन्यास वापस ले लिया। इधर एक इन्फ्लुएंसर ने राष्ट्रहित में नया वीडियो डाल दिया।

अब शीर्षक लिखने की बजाय उसने माथा पकड़ लिया।

वह सोचने लगा—समाचार अब घटनाएँ नहीं रहे, फटाफट बनने वाले इंस्टैंट नूडल्स हो गए हैं। जब तक पानी उबलता है, नया पैकेट खुल जाता है।

व्यंग्यकार की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि विषय कम हैं; त्रासदी यह है कि विषय इतने अधिक हैं कि किसी एक का अपमान किए बिना दूसरे का सम्मान नहीं हो सकता।

कभी सरकार बुलाती है—"हम पर लिखो।"

विपक्ष पीछे से खींचता है—"पहले इन पर लिखो।"

सेलिब्रिटी कहते हैं—"हम ट्रेंड कर रहे हैं।"

बाबा कहते हैं—"हमारे बिना व्यंग्य अधूरा रहेगा।"

एंकर गरजते हैं—"आज रात का मुद्दा यही है।"

और एआई विनम्रता से पूछता है—"क्या मैं आपका व्यंग्य और बेहतर बना दूँ?"

बेचारा व्यंग्यकार सोचता है—"अब मैं रह ही किसलिए गया हूँ?"

पहले व्यंग्यकार विषय खोजता था। अब विषय व्यंग्यकार को खोज लेते हैं। मोबाइल पर घंटी बजती है और हर नोटिफिकेशन कहता है—"मुझे छोड़कर किसी और पर लिखा तो पछताओगे।"

एक ज़माना था जब लेखक डाकखाने की गति से चलता था। अब उसे इंटरनेट की गति से भी तेज़ भागना पड़ता है। रचना पूरी होने से पहले उसका विषय बूढ़ा हो जाता है। अब साहित्य में कालजयी होने से पहले कालसंगत होना ज़रूरी है।

संपादक भी बेचारा क्या करे! उसे व्यंग्य नहीं, ताज़गी चाहिए। कल का शानदार व्यंग्य आज बासी कचौरी की तरह दिखता है। चाहे उसमें विचारों का कितना ही शुद्ध घी क्यों न लगा हो।

व्यंग्यकार भी कम चतुर नहीं है। वह पहले रचना लिखता था, अब पहले शीर्षक सोचता है। शीर्षक में "वायरल", "ब्रेकिंग", "ट्रोल", "एआई", "लोकतंत्र", "जुमला", "रील", "नैरेटिव" जैसे दो-चार शब्द डाल देता है। आधा व्यंग्य तो वहीं बिक जाता है। बाक़ी आधा फेसबुक के कमेंट बॉक्स में लोग स्वयं लिख देते हैं।

आजकल व्यंग्य लिखना आसान नहीं है। हर पाठक अपने भीतर एक व्यंग्यकार लिए घूम रहा है। अंतर बस इतना है कि वह बिना लिखे ही लेखक को व्यंग्य का विषय बना देता है।

और मानदेय? उसका उल्लेख करना साहित्य का नहीं, हास्य का विषय है। कुछ संपादक आज भी मानदेय भेज देते हैं। अधिकांश लेखक को लिंक भेजते हैं। कुछ तो केवल स्क्रीनशॉट भेजकर ही साहित्यिक ऋण से मुक्त हो जाते हैं। लेखक भी प्रसन्न हो जाता है कि चलो, कम-से-कम प्रमाण तो मिल गया कि उसने लिखा था।

आख़िर में व्यंग्यकार ने लैपटॉप बंद किया। सोचा—आज कुछ नहीं लिखूँगा।

तभी मोबाइल पर सूचना आई—

"देश में अभी-अभी एक नई बहस शुरू हुई है..."

उसने फिर लैपटॉप खोल लिया। बुदबुदाया—

"माई री... मैं कापे लिखूँ...?"

ब्रजेश कानूनगो



Monday, August 3, 2026

सोशल मीडिया के सुभाषित

सोशल मीडिया के सुभाषित

पहले सुभाषित ऋषि-मुनि लिखा करते थे। वर्षों का तप, अनुभव और जीवन-दर्शन उनमें निचुड़कर आता था। अब सुभाषित सोशल मीडिया लिखता है। उसके लिए तपस्या की आवश्यकता नहीं, केवल एक स्मार्टफोन, थोड़ा-सा डेटा और भरपूर अधैर्य चाहिए। पहले लोग नीति पढ़ते थे, अब नोटिफिकेशन पढ़ते हैं। वही आज का नया नीतिशास्त्र है।

सोशल मीडिया का पहला सुभाषित कहता है— यदि किसी पुस्तक के हाशिये पर लिखे नोट्स को इतना बड़ा कर दो कि वही पूरी किताब बन जाए, तो मूल पाठ अपने आप गायब हो जाएगा। आज किसी लेख, भाषण या बातचीत का सार समझने की फुरसत किसे है? एक वाक्य पकड़ो, आधा काटो, चौथाई चिपकाओ और फिर उस पर ऐसा रण छेड़ दो कि बेचारा मूल विचार फ्रेम से बाहर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता रह जाए।

यहाँ संवाद नहीं, धावा बोला जाता है। सोशल मीडिया का दूसरा सुभाषित है— "गालियाँ दो... पीछे पड़े रहो... मटियामेट कर दो!" तर्क अब बूढ़ी चीज़ हो गई है। प्रमाण भी पिछली सदी की आदत है। अब किसी मतभेद का सबसे आधुनिक समाधान है— उसे ट्रोल कर दो। यदि सामने वाला फिर भी बच जाए तो उसकी पुरानी पोस्टें खोद लाओ। मनुष्य के वर्तमान से नहीं, उसके डिजिटल पुरातत्त्व से न्याय किया जाएगा।

भीड़ पहले चौक-चौराहों पर इकट्ठी होती थी, अब टाइमलाइन पर होती है। फर्क इतना है कि पहले चेहरे दिखाई देते थे, अब प्रोफ़ाइल फोटो दिखाई देती है। मॉब लिंचिंग अब केवल सड़क पर नहीं होती; शब्दों से भी लोग रोज़ मारे जाते हैं। किसी के घर में दुःख आया हो तो उसे ढाढ़स बँधाने वालों से अधिक ऐसे लोग मिल जाते हैं जो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आँसू जल्दी सूख न जाएँ। दुःख जितना पारदर्शी होगा, उसे उतना ही गाढ़ा रंग देने वाले लोग मिल जाएँगे। करुणा का स्थान 'कमेंट सेक्शन' ने ले लिया है।

एक और अद्भुत खोज हुई है। अपनी लकीर बड़ी करने में मेहनत लगती है, इसलिए दूसरों की लकीर मिटा देना अधिक सुविधाजनक है। यह काम अब उँगली से हो जाता है। किसी की उपलब्धि पर संदेह कर दीजिए, किसी की भाषा में दोष निकाल दीजिए, किसी की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा दीजिए। आपके भीतर प्रतिभा हो या न हो, आलोचक होने का लाइसेंस तुरंत मिल जाता है। सोशल मीडिया ने यह लोकतंत्र सबको दे दिया है।

मित्रता भी अब बड़ी विचित्र वस्तु हो गई है। पाँच हजार मित्रों का स्वामी व्यक्ति कभी-कभी अस्पताल के बाहर अकेला खड़ा दिखाई देता है। जो रोज़ मानवता, समाजवाद, क्रांति और संवेदना की पोस्टें लिखता है, उससे यदि एक शाम घर बदलवाने या रक्तदान की विनती कर दीजिए तो उसका मोबाइल प्रायः 'नेटवर्क से बाहर' हो जाता है। तब याद आता है कि जीवन में अभी भी 'लँगोटिया यार' जैसी एक पुरानी तकनीक बची हुई है, जिसका कोई डिजिटल विकल्प नहीं बना।

और सेल्फी! यह आधुनिक दर्शन का सर्वोच्च अध्याय है। कैमरा हमें सिखाता है कि यदि अपना चेहरा सबसे बड़ा दिखाना है तो बाकी सबको छोटा कर दीजिए। परिणाम यह होता है कि पीछे खड़ा ताजमहल भी ऐसा लगता है जैसे किसी ने गलती से फोटो में घुसने की कोशिश कर दी हो। तस्वीर विकृत हो जाती है, पर टिप्पणियाँ फिर भी आती हैं— "वाह!", "लाजवाब!", "क्या पर्सनैलिटी है!" सोशल मीडिया पर प्रशंसा कभी-कभी सौंदर्यबोध से नहीं, सामाजिक कर्तव्यबोध से जन्म लेती है।

सोशल मीडिया का संसार बड़ा उदार है। यहाँ हर व्यक्ति न्यायाधीश भी है, अभियोजक भी, इतिहासकार भी और भविष्यवक्ता भी। केवल एक पद रिक्त है— श्रोता। सुनने का विभाग शायद किसी अपडेट में हट गया है।

फिर भी दोष अकेले सोशल मीडिया का नहीं है। आईना कभी चेहरा नहीं बनाता, केवल दिखाता है। यदि हमारे भीतर अधैर्य, अहंकार, ईर्ष्या और भीड़ का रोमांच भरा है, तो स्क्रीन पर वही चमकेगा। और यदि भीतर थोड़ा-सा विवेक, थोड़ा-सा हास्य और थोड़ी-सी मनुष्यता बची है, तो वही पोस्टों के बीच कहीं मुस्कुराती मिलेगी।

इसलिए आज का सबसे उपयोगी सोशल मीडिया सुभाषित शायद यही होना चाहिए— पोस्ट करने से पहले एक बार पढ़ लीजिए, और टिप्पणी करने से पहले एक बार स्वयं को पढ़ लीजिए। दोनों में यदि थोड़ा-सा भी अंतर दिखाई दे जाए, तो समझिए अभी मनुष्य पूरी तरह ऑफ़लाइन नहीं हुआ है।

ब्रजेश कानूनगो


Wednesday, February 28, 2024

आओ जोड़ने पर जोर लगाएं

आओ जोड़ने पर जोर लगाएं

जोड़ने का उपक्रम हर कोई करता आया है। देश जोड़ने के लिए पद यात्राएं और मन जोड़ने के लिए भीतर का द्वेष बाहर निकालना पड़ता है।

जोड़ने के लिए कुछ तोड़ना भी पड़े तो लोग कोई कसर नहीं छोड़ते। बनी बनाई सरकार को भी विपक्ष की पार्टियां सत्ताधारियों को अपने में जोड़कर तोड़ डालने में संकोच नहीं करतीं। सरकार को बचाने में भी ऐसा ही कुछ जोड़तोड़ हमेशा से होता रहा है।

आज थोड़ा सकारात्मक ही बात करते हैं। तोड़ने की बजाए थोड़ी जोड़ने की क्रिया को समझने की कोशिश करते हैं।


बिना जोड़ लगाए कोई बात बनती नहीं। जोड़ना बहुत जरूरी है। यह कोई नई बात नहीं है। बिना जोड़ लगाए कोई बात बनती नहीं।  प्रभु राम के लंका प्रवेश को सुगम बनाने के लिए वानरों ने बिना किसी साधन के मात्र पत्थर से पत्थर जोड़कर सेतु निर्मित कर दिया था। आज तो ऐसे ऐसे पदार्थ बाजार में उपलब्ध हुए हैं कि सब कुछ जोड़ा जा सकता है। हाथियों से खींचकर भी कपलिंग तोड़े नहीं जा सकते। हरियाणा का लकड़ा पंजाब के पीतल से जुड़ जाता है और कर्नाटक का ग्रेनाइट राजस्थान के मार्बल से।


बोलचाल की भाषा में कहें तो ’कपलिंग’ चाहे जीवन की कठिन डगर पर निकले स्त्री-पुरुष के बीच दाम्पत्य का हो या लोहे की चिकनी पटरियों पर फिसलती तेज रफ़्तार रेलगाड़ी के डिब्बों के बीच के लीवर का, इनकी मजबूती ही सुखद यात्रा की गारंटी होती है। इस कपलिंग में की गयी ज़रा-सी लापरवाही रेलगाड़ी को दो हिस्सों में विभक्त कर देती है।


सच तो यह है कि बिना जोड़ लगाए कोई बात बनती नहीं। जोड़ना बहुत जरूरी है। जोड़ लगाए बगैर कोई फर्नीचर भी तैयार नहीं किया जा सकता। कुर्सी भी नहीं बनाई जा सकती। जरा देखिए, सत्ता की कुर्सी के लिए तो राजनीतिक दलों को कितनी कपलिंग करना पड़ती हैं। कपलिंग बोले तो गठबंधन। कई बार तो ऐसी कपलिंगों में कोई मेल ही नहीं होता, मजबूरी होती है। प्रजातंत्र की रेल दौड़ाने के लिए बेमेल कपलिंग भी करना पड़ जाती हैं। लोकतंत्र की गाड़ी फिर जहां तक पहुँच जाए... जब की तब देखेंगे। कपलिंग टूटेगा तो नए लीवर लगाकर आगे का सफ़र पूरा कर लिया जाएगा। चिंता में अभी से दुबले होने से क्या फ़ायदा।


चीजों के जुड़ाव में कड़ियों का बहुत महत्त्व होता है। रेल डिब्बों को कड़ियों से कपलिंग किया जाता है। जब तक कड़ियाँ आपस में नहीं जुड़ती निर्माण को विस्तार नहीं मिलता।

रेलगाड़ी बनती है, मकान हो या देश, कड़ी से कड़ी मिलती है तब ही दिखाई देता है कि भवन बन रहा है, देश बन रहा है। ईंट से ईंट मिलती है तो दीवार खडी होती है। आदमी से आदमी जुड़ता है तो देश खडा होता है।


कई कड़ियाँ होती हैं जिनसे आदमी से आदमी जुड़ता चला जाता है।  प्रेम, सौहार्द , भाई चारे और शान्ति में जो यकीन रखते हैं वे हमेशा इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि कड़ियाँ जुडी रहें। अपने अपने हाथों की कड़ियाँ जोड़कर मानव श्रंखलाएं बनाते हैं, मगर विघ्न संतोषी सांड हर क्षेत्र में बहुतायत से पाए जाते हैं। कुछ निरंकुश सांड अक्सर इन शांतिप्रिय लोगों के बीच घुस आते हैं एक दूसरे का हाथ थामें लोगों की कड़ियों को तोड़ने के उपक्रम में उत्पात मचाने लगते हैं। इसके बावजूद विभिन्न भाषाओं, धर्मों, रीति रिवाजों और संस्कारों के इतने बड़े देश में भी ऐसी अनेक कड़ियाँ हैं जिन्होंने राष्ट्र को एक साथ जोड़ रखा है।


हर हाल में यह जरूरी होगा कि जोड़ने वाली हरेक कपलिंग को मजबूती देने का हर संभव उपाय सुनिश्चित किया जाए। किसी ने कहा भी है किसी चीज को तोड देना बहुत आसान होता है लेकिन जोड़ना बहुत मुश्किल काम है। जीवन में विवाह हो,लोकतंत्र में राजनीति की रेल हो या देश दुनिया के हालात, ऐसी ही कपलिंग से सुचारू संचार संभव हो पाता है। रहस्यों के राज तक पहुंचने के लिए कई कड़ियों को जोड़ना जरूरी होता है। हाथ से हाथ जोड़ते हुए लोगों तक पहुंचने में सफलता मिलती है। दिल के दरिया मिल जाते हैं तो सौहार्द्र का सागर लहराने लगता है। बस ध्यान इतना जरूर रखना पड़ता है कि सभी कड़ियों की मजबूत कपलिंग करने में कोई कसर न रहे। बाकी तो जो है सो है।


ब्रजेश कानूनगो

शिकारी की सबसे बड़ी ताकत

शिकारी की सबसे बड़ी ताकत 

यदि आप किसी से पूछें कि किसी कुशल शिकारी की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है? तो संभवतः इसका उत्तर यही मिलेगा, उसकी बंदूक या वह हथियार ही असली चीज है जिससे वह लक्ष्य पर वार करता है। लेकिन यह पूरा सच और जवाब नहीं है। दरअसल शिकारी की सबसे बड़ी ताकत उसके कान होते हैं।


जंगल का राजा जब शिकार की तलाश में निकलता है तो जरा सी हलचल या आहट उसके कान खड़े कर देती है। आम बस्तियों में भी चूहों के इंतजार में बिल्लियां सदैव अपने कान खड़े किए इधर उधर सूंघती फिरती हैं। शिकारियों के मजबूत इरादे उनके कान से होकर गुजरते हैं। शिकार को कानों कान ख़बर नहीं होने देते कि कभी भी उन्हें दबोचा जा सकता है।  कानों को लेकर यह प्रवृत्ति इंसानों  में भी प्रायः देखी जा सकती है।


कुछ लोग कान के बड़े कच्चे होते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे लोगों के कान बहुत नाजुक होते हैं और हल्की सी बात का भार वे अधिक देर तक उठा नहीं पाते होंगे। बात ठीक इससे उलट है।दरअसल किसी व्यक्ति का कान का कच्चा होना इस बात का प्रमाण होता है कि उस व्यक्ति का कान नहीं बल्कि मन बड़ा कोमल होता है। ऐसे लोगों को सच्चा,झूठा कुछ भी कह दो वे विश्वास कर लिया करते हैं।  चतुर और अपना हित साधने वाले पक्के लोग सदैव कच्चे कानों की तलाश में रहते हैं। मौका मिलते ही उनके कानों पर कब्जा कर लेते हैं।


कान के कच्चे होने को गुण या दुर्गुण जो भी कह लें किंतु  धारण करने वाले सुपात्रों के कानों में स्वार्थ सिद्धि का मंत्र फूंक कर मंतव्य साधा जा सकता है। उन्हें बड़ी आसानी से बरगलाया जा सकता है। इन दिनों यह अभियान हर क्षेत्र में जोर शोर से जारी है। चाहे आपको अपना उत्पाद बेचना हो या विचार। धरती, समुद्र और आकाश की बोलियां लगानी हो। लोकतंत्र के बाजार में वोटर खरीदना हो या विधायक, कच्चे कान वाले भोले लोगों का शिकार जारी है। हमारे इस प्रलाप से कहीं आपके कान ही न पकने लगे हों लेकिन यह हकीकत है। सोशल मीडिया,अखबारों और टीवी चैनलों के जरिए हम सबके कानों में ऐसे ही मंत्र फूंके जा रहे हैं।


पुराने जमाने में कभी गुणी उस्ताद और आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्य और भक्तों के कानों जीवन में सुख शांति के लिए 'गुरुमंत्र' फूंक दिया करते थे। इसी मंत्र के नियमित मनन और पारायण से भक्त का कल्याण हो जाता था। अब भी छद्म गुरुओं द्वारा भक्तों के कानों में मंत्र फूंके जा रहे हैं लेकिन उनसे कल्याण भी इन सौदागर गुरुओं का ही हो रहा, भक्त बेचारा तो अपनी जेब और जीवन खाली कर देने को विवश है।


आंखों देखी और कानों सुनी का मुहावरा अब अर्धसत्य है। किसी की आंखों देखी,कानों तक पहुंचते पहुंचते सच्चाई खो देती है।

झूठ की चाकलेट सच के रैपर में पैक होकर हम तक पहुंचने लगती है। हमारी आंखों देखी हमारे ही कानों में झूठ की झंकार बनकर लौट आती है। सच की पड़ताल की फाइलों को झूठ की तिजोरियों में बंद कर दिया जाता है। दीवारों के कान तो होते ही नहीं, दीवारों की जुबानें भी नहीं होती।


अच्छे अच्छे मजबूत कान वालों की भी अपनी कुछ समस्याएं होती हैं। आपने सुना होगा,ऊंचाई पर पहुंचने पर हमारे कान बंद हो जाते हैं। लोग पहाड़ चढें या हवाई जहाज में उड़ें, सत्ता का सिंहासन हो या समृद्धि का शिखर, कानों पर एक सा असर डालते हैं। ऊपर वाले को कुछ सुनाई नहीं देता। यह स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है। नीचे खड़ा आदमी गलत कहता है कि ऊपर वाले ने कानों में तेल डाला हुआ है। दरअसल वह सुनने की स्थिति में होता ही नहीं। यह उसकी चढ़ाई का अंतिम पड़ाव होता है। प्रारंभ में उसे एक कान से सुनाई भी देता है लेकिन दूसरे कान से निकल जाता है। कान से वह अनुलोम विलोम भी नहीं कर पाता है। कान बंद हो जाते हैं। उसके कानों पर किसी भी पुकार से जूं तक नहीं रेंगती। घंटे,घड़ियाल और नगाड़ों के भारी शोर से भी इस समस्या का उपचार नहीं हो पाता।  हम आप जैसे कान के कच्चे लोग इन पक्के लोगों की इस परेशानी को समझ ही नहीं सकते! शिकार कभी भी शिकारी की समस्या को महसूस ही नहीं कर सकता। 


ब्रजेश कानूनगो

Monday, February 26, 2024

महानता के ताज की आकांक्षा

महानता के ताज की आकांक्षा 


कभी कभी जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखाई नहीं देता। अनेक ढपोरशंखों के आगे लोग नतमस्तक होते रहते हैं और वास्तविक गुणवानों की पूछ परख पर ध्यान ही नही दिया जाता। वे नजर ही नहीं आते।
बिना योजना बनाए हर ऐरा गैरा लक्ष्य हासिल करने की तमन्ना मन में पाले रखता है। ऐसा कोई मन नहीं जिसमें देश दुनिया और समाज में नाम कमाने की कोई ख्वाहिश न रही हो। रथ पर सवार हुए बिना 'रथी' नहीं नहीं कहला सकता और फिर 'महारथी' को तो  महानता का कोई न कोई ताज सिर पर धारित करना ही होता है। बस लफड़ा यहीं से शुरू हो जाता है। ताज के चक्कर में महानता के अनेक उपक्रम चलाए जाने लगते हैं। सच्चे हकदार कछुए की तरह पीछे रह जाते हैं और तेज तर्रार खरगोश आगे निकल जाते हैं। अबकी बार खरगोश रास्ते में सोता नहीं है बल्कि देखने समझने वालों की आंखों पर चतुराई से झूठ व भ्रम का पर्दा तान देता है। 
सब जानते हैं कि महानता के लिए व्यक्ति की किसी भी विधा या विद्या में निपुणता या कुशलता जरूरी मानी गई है। कुशल निशानेबाज को केवल टारगेट दिखाई देता है। कुछ प्राकृतिक रूप से टारगेट होते हैं, कुछ को टारगेट किया जाता है। जैसे अर्जुन ने चिड़िया की आँख को टारगेट किया था।

अर्जुन अपने फन में उस्ताद था। लक्ष्य भेदन के वक्त अर्जुन का लक्ष्य केवल चिड़िया की आँख होती थी। कुशल निशानेबाज था, इसलिए महान भी था। मगर इन दिनों महानता के मर्म को जाने बिना हर कोई महान कहलाने को लालायित दिखाई देता है।

बिना महान कार्य किए 'महान' नहीं बना जा सकता। यही परम्परा रही है। इससे उलट अब व्यक्ति को पहले ही 'महामानव' घोषित कर दिया जाता है। फिर वह अपने कारनामें करने लगता है। जयकारों और प्रशस्तियों से आभासी प्रभामण्डल उसके आसपास जगमग करने लगता है। तदनुसार वह क्रमशः महान से महानतम बनता जाता है।

कुछ महात्वाकांक्षी लोग बिना विचारे इसी जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किसी तरह वे ‘महामानव’ कहला सकें। परन्तु इस बात को नजर अंदाज कर जाते हैं कि जो महान हुए वे लक्ष्य साधने के लिए पहले उचित योजना बनाते रहे हैं और पूर्व तैयारी और अभ्यास भी करते रहते
 हैं।

राजनीति में भी ऐसा ही होता है। नेता विजेता बनने के लिए वोटर को टारगेट करता है। जब तक आप लक्ष्य नहीं भेद देते, तब तक महान नहीं बन सकते। महान बनने के लिए योद्धा भी बनना पड़ता है। ठीक ठाक निशानेबाज होना भी जरूरी है। वरना गोली चलती तो है मगर घायल कोई और हो जाता है। महानता की चाह में योंही कुछ लोग लक्ष्य की दिशा में चाक़ू सन्नाते रहते हैं।

अज्ञान और जल्दबाजी में कभी-कभी महानता की आकांक्षा का मरण हो जाता है। कभी वार खाली चला जाता है तो कभी सिर पर रखे तरबूज की बजाय आदमी की गरदन उतर जाती है। इसे ही बिना तैयारी के नदी में कूदना कहते हैं। नदी पार करने का लक्ष्य अधूरा रह जाता है तैराक का। समुद्र लांघ जाने का बड़ा लक्ष्य धरा का धरा रह जाता है। उथले जल में डूब जाने से एक महान तैराक के महान हो जाने की संभावना असमय काल कलवित हो जाती है।

इसलिए संत भी कह गए हैं, ‘हे राजन! पूरी तैयारी के साथ महायज्ञ में  ज्वाला को प्रज्वलित करें! हवन सामग्री की शुद्धता का भी ख़याल रखें। अशुद्ध सामग्री से धूम्र उत्पन्न होता है। यह धुंआ प्रासाद के गुम्बद में उपस्थित मधुमक्खियों को कदापि प्रिय नहीं होता। वे महानता के महोत्सव के आनन्द और उल्लास में बाधक होने को तत्पर हो उठती है।

बिना तैयारी कोई महान तो क्या साधारण लक्ष्य भी हासिल नहीं होता। सामान्य जन तक आवश्यक तैयारी रखते हैं। बिजली गुल होगी तो अन्धेरा घिर आएगा इसलिए रात को दियासलाई और मोमबत्ती साथ में रखकर सोते हैं। बारिश आने के पहले किसान अपने खेत जोत लेता है। बेशक उन्हें भी महानता की उतनी ही चाह होती है जितनी किसी सम्राट और योद्धा को।

महान तो वे भी हैं जिन्होंने दूरदृष्टि रख हमारे लिए कुएँ खोदे, तालाब बनाए। आज की तरह उनकी भी सोच रही होती तो शायद हमारे खेत प्यासे रह जाते, बस्ती में आग लगती तो हम शायद तुरंत उसे बुझा भी नहीं पाते।  विडम्बना यही है कि महानता की सूची में उनके नाम कहीं दिखाई नहीं देते।  ताज तो किसी और के माथे पर ही जगमगाना तय होता है। बदलते समय की अब यही रीत है। 

ब्रजेश कानूनगो