बीती काहे बिसार दें?
समझदार लोग हमेशा से कहते आए हैं—बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले। जीवन में आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखते रहना ठीक नहीं। पीछे बहुत कुछ ऐसा पड़ा रहता है जिसे देखकर आदमी आगे बढ़ने का उत्साह ही खो दे। इसलिए समझदार आदमी स्मृतियों की गठरी हल्की करता रहता है।
लेकिन हमारे समय में भूलना भी कोई निजी मामला नहीं रह गया है। क्या भूलना है और क्या याद रखना है, इसका निर्णय अब व्यक्ति अकेले नहीं करता। इसके लिए बाकायदा वातावरण बनाया जाता है। कभी कोई नई घटना पुरानी घटना पर डाल दी जाती है, कभी कोई नया विवाद पुराने विवाद को ढक लेता है और कभी पुरानी बात अचानक नए संदर्भ में ऐसी लौटती है जैसे वह कल ही हुई हो।
हमारे लोकतंत्र में स्मृति भी मौसम की तरह है। चुनाव आया तो कुछ बातें याद आने लगती हैं, चुनाव गया तो वही बातें इतिहास की अलमारी में रख दी जाती हैं। पाँच साल तक जिन सवालों पर धूल जमती रहती है, चुनाव के मौसम में उन पर अचानक झाड़न चलने लगती है। जनता को बताया जाता है कि उसे क्या याद रखना चाहिए और क्या भूल जाना चाहिए।
सरकारें चाहती हैं कि जनता भविष्य की ओर देखे। यह अच्छी बात है। भविष्य में विकास है, नई सड़क है, नया एक्सप्रेसवे है, नया पुल है, नया ऐप है और नया उद्घाटन है। अतीत में जाने पर कुछ असुविधाजनक प्रश्न खड़े हो सकते हैं—किसने क्या वादा किया था, किसका क्या हुआ, किसकी जमीन गई, किसकी नौकरी गई, किसका घर टूटा और किसका सपना अधूरा रह गया।
इसलिए भविष्य बहुत सुविधाजनक चीज है। उसमें हिसाब नहीं देना पड़ता।
अतीत में हिसाब-किताब रहता है।
हमने देखा है कि एक समय में घोटालों की संख्या इतनी बढ़ जाती थी कि नया घोटाला पुराने घोटाले को भुलाने का काम करता था। आज तकनीक ने इस व्यवस्था को और सरल कर दिया है। अब किसी घोटाले को भुलाने के लिए नया घोटाला जरूरी नहीं। एक वायरल वीडियो, एक उत्तेजक बयान, एक धार्मिक विवाद, कोई भावुक भाषण या सोशल मीडिया का नया ट्रेंड पर्याप्त है।
सुबह जो मुद्दा देश की सबसे बड़ी चिंता था, शाम तक वह किसी और मुद्दे के नीचे दबा मिलता है।
अगले दिन कोई पूछे—“कल क्या हुआ था?”
उत्तर मिलता है—“कल? कौन-सा कल?”
स्मृति अब चौबीस घंटे की हो गई है।
लेकिन विचित्र बात यह है कि जब सत्ता को अतीत की जरूरत होती है तो स्मृति अचानक बहुत लंबी हो जाती है। कई दशक पीछे जाकर घटनाओं की फाइलें खुल जाती हैं। इतिहास के पुराने पन्ने झाड़-पोंछकर सामने रख दिए जाते हैं। तब बताया जाता है कि देखिए, यह सब पहले हुआ था। इसलिए आज का प्रश्न मत पूछिए।
यानी इतिहास कभी सबक है, कभी हथियार।
कभी वह आईना है और कभी पर्दा।
महाभारत से लेकर आज तक मनुष्य को स्मरण कराने के लिए किसी न किसी ‘मुद्रिका’ की जरूरत पड़ती रही है। शकुंतला की मुद्रिका ने दुष्यंत को वह याद दिलाया जिसे वे भूल चुके थे। आज हमारे पास मुद्रिकाओं की कमी नहीं है। फर्क इतना है कि अब मुद्रिका अंगूठी के रूप में नहीं आती। वह कभी चुनावी नारा होती है, कभी वायरल पोस्ट, कभी पुराना भाषण, कभी किसी नेता का बयान, कभी किसी जाँच की फाइल और कभी किसी स्मारक के रूप में सामने आ जाती है।
इन मुद्रिकाओं का उपयोग बड़ा समझदारी से होता है।
जब जरूरी हो तो कहा जाता है—“इतिहास को भूलना नहीं चाहिए।”
जब इतिहास असुविधाजनक हो जाए तो कहा जाता है—“पुरानी बातों को कुरेदने से क्या फायदा?”
जब किसी पुराने अपराध का उल्लेख अपने पक्ष में हो तो वह राष्ट्र की स्मृति बन जाता है और जब वही स्मृति प्रश्न पूछने लगे तो उसे ‘नकारात्मकता’ कह दिया जाता है।
भोपाल की गैस त्रासदी हो, आपातकाल हो, बाबरी मस्जिद का विध्वंस हो, गुजरात के दंगे हों, विभाजन की त्रासदी हो, युद्धों की स्मृतियाँ हों या बड़े आर्थिक घोटाले—हमारा इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है जिन्हें भूलना भी आसान नहीं और याद रखना भी हमेशा सुविधाजनक नहीं।
ऐसी स्मृतियों से कोई कहे कि ‘बीती ताहि बिसार दे’, तो शायद बीती हुई बात पूछेगी—“किसके लिए?”
जिसे नुकसान हुआ, उसके लिए अतीत बीता हुआ नहीं होता।
जिसने लाभ उठाया, उसके लिए वह इतिहास हो सकता है।
यही हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है।
स्मृति का भी वर्ग-विभाजन हो गया है।
जिसके पास सत्ता है, उसके पास स्मृति को व्यवस्थित करने की सुविधा है। वह तय कर सकता है कि कौन-सी घटना राष्ट्रीय स्मृति बनेगी, कौन-सी स्थानीय घटना रह जाएगी और कौन-सी घटना इतनी पुरानी घोषित कर दी जाएगी कि उसके बारे में प्रश्न पूछना ही अनुचित लगे।
जनता भी कमाल की है। उसे रोज इतनी नई सूचनाएँ मिलती हैं कि पुरानी बात याद रखना कठिन हो गया है। मोबाइल की स्क्रीन पर सुबह का आक्रोश दोपहर तक मनोरंजन में बदल जाता है और शाम तक किसी नई बहस का शिकार हो जाता है।
पहले लोग कहते थे—समय बड़े से बड़े घाव को भर देता है।
अब सोशल मीडिया कहता है—समय बड़े से बड़े घाव को ट्रेंड से बाहर कर देता है।
फर्क मामूली नहीं है।
घाव भरा या नहीं, यह शरीर बताता है।
फिर भी कुछ लोग हैं जो बार-बार पुरानी बातें याद दिलाते रहते हैं। वे पूछते हैं—वादा क्या था? हुआ क्या? जिम्मेदार कौन था? न्याय कहाँ तक पहुँचा? मुआवजा किसे मिला? विस्थापित कहाँ गए? जिनके नाम पर राजनीति हुई, उनका जीवन कितना बदला?
ऐसे लोगों को अक्सर सलाह दी जाती है—“आगे देखिए।”
वे कहते हैं—“आगे देखने में हमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन आगे जाने के लिए पीछे की सड़क भी तो देखनी पड़ेगी।”
यही बात समझने में सबसे अधिक कठिनाई होती है।
अतीत को ढोना और अतीत से सीखना दो अलग बातें हैं। अतीत में फँसे रहना समाज को आगे नहीं ले जाता, लेकिन अतीत को मिटा देना समाज को बार-बार उसी गड्ढे में गिरा सकता है।
इतिहास की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि वह हमें बताता रहे—हम पहले कहाँ गिरे थे।
वरना सत्ता अपनी सुविधा से मुद्रिका दिखाती रहेगी, जनता अपनी सुविधा से भूलती रहेगी और हम हर पाँच साल बाद उसी पुराने मंच पर नए नाटक के टिकट खरीदते रहेंगे।
कहानी वही होगी।
केवल पोस्टर नया होगा।
ब्रजेश कानूनगो