दीपावली पर ठंड और जैकेटों की गर्माहट
दीपावली आते ही मौसम में ठंडक घुलने लगती है। घरों की अलमारियों से गर्म कपड़े बाहर निकलने लगते हैं। कोई स्वेटर झाड़ता है तो कोई जैकेट की धूल साफ करता है। बाजार में भी गर्म कपड़ों की रौनक बढ़ने लगती है। लेकिन इस मौसम में एक और दिलचस्प नजारा देखने को मिलता है। अखबार भी जैकेट पहनने लगते हैं।
यह जैकेट ऊन या किसी गर्म कपड़े की नहीं होती। इसे विज्ञापनों की रंगीन परतों से तैयार किया जाता है। अखबार के ऊपर एक पूरा पन्ना किसी आभूषण विक्रेता का होता है तो भीतर के पन्नों में कार, मकान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, मोबाइल और तरह-तरह के महंगे उत्पाद अपनी चमक बिखेर रहे होते हैं। कई बार तो अखबार को खोलने से पहले यह समझना मुश्किल हो जाता है कि असली अखबार कहां है और विज्ञापन कहां से शुरू हो रहा है। लगता है जैसे समाचारों ने विज्ञापनों के बीच थोड़ी-सी जगह किराये पर ले रखी हो।
दीपावली का मौसम अखबारों के लिए कमाई का सबसे सुहाना मौसम होता है। रत्नों और महंगी धातुओं की चमक से लेकर सोने-चांदी के सिक्कों तक, सबकी गर्मी अखबारों के पन्नों में उतर आती है। विज्ञापनदाता भी जानते हैं कि इस समय लोगों की खरीदारी की इच्छा अपने चरम पर होती है। लक्ष्मीजी के स्वागत की तैयारी में लोग अपनी जेब और बैंक खाते दोनों खोलने को तैयार रहते हैं। अखबार इस पवित्र अवसर पर उनकी सहायता के लिए पूरी तरह तत्पर रहते हैं। वे सुबह-सुबह बता देते हैं कि लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए कौन-सा हार पहनना चाहिए, किस कंपनी की कार खरीदनी चाहिए और किस मकान में उनका स्थायी निवास संभव है।
इस पूरे आयोजन में अखबारों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वे अब केवल खबरें देने का काम नहीं करते, बल्कि लोगों की इच्छाओं को जगाने और उन्हें खरीदारी की दिशा दिखाने का सामाजिक दायित्व भी निभाते हैं। कभी अखबार में खबरें पढ़कर पाठक दुनिया को समझता था। अब विज्ञापन देखकर उसे यह समझने में मदद मिलती है कि दुनिया में वह कितना पीछे रह गया है। पड़ोसी ने नई कार खरीद ली, रिश्तेदार ने सोने का हार बनवा लिया और मित्र ने नया फ्लैट बुक कर लिया। इन सबके बीच अपना पुराना स्कूटर, पुरानी साड़ी और पुराना मकान अचानक आत्मसम्मान पर बोझ लगने लगते हैं।
विज्ञापन की खूबी यही है कि वह हमारी जरूरतों को इच्छाओं में और इच्छाओं को अनिवार्य जरूरतों में बदल देता है। दीपावली का त्योहार तो वैसे भी सफाई, रोशनी और खुशियों का पर्व है, लेकिन बाजार ने इसमें एक नया अध्याय जोड़ दिया है। अब घर की सफाई के साथ बैंक खाते की सफाई भी जरूरी समझी जाने लगी है। लक्ष्मी पूजन के बाद लक्ष्मीजी को घर में रोकने की चिंता कम और उन्हें बाजार तक पहुंचाने की जल्दी अधिक दिखाई देती है।
अखबारों की इस मौसमी गर्मी का एक दूसरा पहलू भी है। विज्ञापनों की मोटी जैकेट के भीतर समाचारों के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जाती है। नागरिक समस्याएं, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, अस्पतालों की बदहाली और सरकारी व्यवस्थाओं की खामियां शायद इसलिए कम दिखाई देती हैं कि वे खरीदारी का उत्साह खराब कर सकती हैं। त्योहार के दिनों में पाठक को उदास करने वाली खबरों से बचाना भी बाजार की दृष्टि में एक तरह की सामाजिक सेवा है। आखिर जब चारों ओर रोशनी का उत्सव है तो अंधेरे की चर्चा कौन करना चाहेगा!
हालांकि इस मौसम में सबसे अधिक ठंड उन लोगों को लगती है जिनके पास खरीदारी के लिए अतिरिक्त पैसा नहीं है। उनके लिए अखबार की चमक कुछ वैसी ही है जैसे ठिठुरते हुए आदमी के सामने किसी महंगे शोरूम की रोशनी। भीतर गर्मी और बाहर ठंड। विज्ञापनों में परिवार मुस्करा रहे होते हैं, घर जगमगा रहे होते हैं और खुशियां पैक होकर बिक रही होती हैं। मगर वास्तविक जीवन में अनेक परिवार दीपावली का बजट बनाते हुए जरूरी खर्चों में कटौती कर रहे होते हैं। किसी के लिए मिठाई खरीदना भी हिसाब-किताब का विषय है तो किसी के लिए बच्चों के नए कपड़े खरीदना एक छोटी आर्थिक चुनौती।
अखबारों की जैकेट जितनी मोटी होती जाती है, आम आदमी की जेब उतनी ही हल्की होती जाती है। यह भी एक विचित्र अर्थशास्त्र है कि विज्ञापनों की गर्मी बढ़ने के साथ उपभोक्ता के बैंक बैलेंस का तापमान गिरता जाता है। बाजार इसे समृद्धि का संकेत बताता है और अखबार इसे त्योहार की रौनक की तरह प्रस्तुत करते हैं।
इसमें अखबारों को दोष देने से पहले यह भी समझना होगा कि विज्ञापन उनकी आय का बड़ा स्रोत हैं। लेकिन अखबार का एक सामाजिक दायित्व भी है। उसे बाजार का हिस्सा होते हुए भी बाजार का मुखपत्र नहीं बन जाना चाहिए। पाठक अखबार खरीदता है तो केवल सामान की सूची देखने के लिए नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और व्यवस्था की सच्चाई जानने के लिए भी खरीदता है।
बहरहाल, दीपावली पर अखबारों को जैकेट पहनने का पूरा अधिकार है। मौसम ठंडा हो तो कारोबार गर्म रखना भी जरूरी है। बस इतनी-सी गुजारिश है कि जैकेट इतनी मोटी न हो जाए कि भीतर खबरों का दम ही घुटने लगे। और हां, विज्ञापनों की इस रोशनी में अखबार यह भी देख लें कि कहीं उनके पाठकों की जेबों में अंधेरा तो नहीं बढ़ रहा है। क्योंकि दीपावली का असली उजाला अखबारों के पन्नों पर चमकते सोने-चांदी से नहीं, लोगों के जीवन में बची हुई खुशियों से तय होना चाहिए।
ब्रजेश कानूनगो