दाग अच्छे हैं, बशर्ते चुनाव जीतें!
राजनीति में अब दाग धुलते नहीं, तौले जाते हैं। टिकट देने से पहले उम्मीदवार का चरित्र नहीं, उसका चुनावी वजन देखा जाता है। ईमानदारी, स्वच्छ छवि और जनसेवा एक पलड़े में रखी जाती हैं; धनबल, बाहुबल और जीतने की गारंटी दूसरे में। फिर पार्टी बड़ी गंभीरता से लोकतंत्र के हित में वही पलड़ा चुनती है जो भारी हो। नैतिकता भाषणों में जितनी भी भारी पड़े, टिकट की तराजू पर अक्सर हल्की साबित होती है।
टिकट वितरण समिति की बैठक में एक सदस्य ने आपत्ति की, “इस उम्मीदवार पर कई आपराधिक मामले हैं। इसकी छवि ठीक नहीं है।”
दूसरे ने पूछा, “जीतने की संभावना कैसी है?”
“बहुत अच्छी है।”
“तो फिर छवि ठीक ही होगी!”
पहला सदस्य चुप हो गया। उसे समझ में आ गया कि वह चरित्र की भाषा बोल रहा था, जबकि बैठक चुनावी गणित में चल रही थी।
स्वच्छ छवि वाला उम्मीदवार कहता है, “मैंने जीवन भर ईमानदारी से काम किया है।”
पार्टी पूछती है, “बहुत अच्छी बात है। लेकिन चुनाव में कितना खर्च कर सकते हैं?”
“मेरे पास सीमित साधन हैं।”
“और समर्थक?”
“कुछ लोग हैं, जो मेरे विचारों से सहमत हैं।”
पार्टी समझाती है, “विचारों से सहमत लोग अच्छे होते हैं, भाई साहब! लेकिन चुनाव जीतने के लिए विचारों से ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है।”
उम्मीदवार निराश होकर लौट जाता है। पार्टी को एक अच्छा आदमी नहीं मिल पाता, लेकिन चुनाव के लिए एक अच्छा उम्मीदवार मिल जाता है। दोनों में अंतर अब राजनीति का गोपनीय रहस्य है।
दागी उम्मीदवार की अपनी खूबियाँ होती हैं। उसके समर्थक दावा करते हैं कि वह काम करवाने वाला आदमी है। उसके विरुद्ध मामलों की चर्चा हो तो सफाई मिलती है, “यह सब राजनीतिक साजिश है।” विपक्ष से पूछिए तो वह भी अपने उम्मीदवार के मामलों को साजिश बताता है। बस, समझ में नहीं आता कि यदि सारे मामले राजनीतिक साजिश हैं, तो राजनीति में इतने साजिशकर्ता आते कहाँ से हैं!
चुनाव के समय धनबल को लोकतंत्र के महापर्व का खर्च बताया जाता है। जनता की गरीबी पर चिंता जताने वाले नेताओं के प्रचार में करोड़ों की चमक दिखाई देती है। बाहुबल को भी नए नाम मिल जाते हैं। कहीं वह संगठन की मजबूती कहलाता है, कहीं जनाधार और कहीं प्रभावशाली नेतृत्व। भाषा का कमाल देखिए कि लाठी हाथ में हो तो भय पैदा करती है, लेकिन उसी लाठी के पीछे भीड़ खड़ी हो जाए तो राजनीतिक शक्ति बन जाती है।
इस पूरे तमाशे में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण पात्र है—और सबसे आसानी से भुला दिया जाने वाला भी। चुनाव के दिन वह लोकतंत्र का राजा होता है। नेता उसके दरवाजे पर हाथ जोड़ता है, उसकी गरीबी पर आँसू बहाता है और उसकी हर समस्या को अपनी निजी समस्या बताता है। वोट पड़ते ही राजा का राजतिलक समाप्त हो जाता है और वह फिर प्रजा की कतार में खड़ा मिलता है। कल तक जो नेता उसके दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, आज उससे मिलने के लिए मतदाता को सिफारिश ढूँढ़नी पड़ती है। पाँच साल तक जनता सरकार को खोजती है और चुनाव आते ही सरकार जनता को खोज लेती है। लोकतंत्र का यह अद्भुत चक्र है—मतदाता हर बार अपना प्रतिनिधि चुनता है, लेकिन प्रतिनिधि चुनते ही अपनी ही हैसियत भूल जाता है।
समस्या यह नहीं कि राजनीति में दागी लोग आ जाते हैं। समस्या यह है कि दाग अब कई बार अयोग्यता नहीं, योग्यता समझे जाने लगे हैं। जब चुनाव जीतना ही एकमात्र उद्देश्य हो जाए, तब साधनों की पवित्रता पर सवाल उठाना समय की बर्बादी माना जाता है।
लोकतंत्र की विडंबना देखिए—जनता से ईमानदार प्रतिनिधि चुनने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उम्मीदवार चुनने वाले दलों से यह पूछना कठिन हो जाता है कि वे ईमानदारी को कितनी प्राथमिकता देते हैं।
राजनीति में अब दाग मिटाने की नहीं, उन्हें भुनाने की कला काम आती है। जनता हर चुनाव में उम्मीदों पर मुहर लगाती है और बदले में उसे वादों की नई पैकिंग मिल जाती है। आखिर दाग अच्छे हैं—यदि उनसे टिकट मिले, टिकट से सत्ता मिले और सत्ता से दागों पर पर्दा डालने का अवसर मिले। लोकतंत्र चलता रहता है, बस नैतिकता हर चुनाव में जमानत जब्त करवा बैठती है!