सोचना एक रोग है
सोचना एक रोग है। इस रोग से जो मुक्त हैं, वे धन्य हैं। वे स्वस्थ हैं, प्रसन्न हैं और सबसे बड़ी बात—निश्चिंत हैं। उन्हें किसी बात की तह में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। जो बताया गया, मान लिया; जो दिखाया गया, देख लिया; जो कहा गया, आगे कह दिया। जीवन इससे सरल और क्या हो सकता है!
मुसीबत उन लोगों की है जो सोचते हैं। सड़क बनी तो वे पूछेंगे—कितने में बनी? टूट गई तो पूछेंगे—क्यों टूटी? अस्पताल खुला तो डॉक्टर खोजेंगे और स्कूल बना तो शिक्षक। उपलब्धियाँ गिनाई जाएँगी तो आँकड़े माँग बैठेंगे। यानी जहाँ बाकी लोग तालियाँ बजा रहे हैं, वहाँ ये लोग प्रश्न लेकर खड़े हैं।
यह स्वस्थ समाज के लक्षण नहीं हैं। आजकल स्वस्थ नागरिक वह है जिसे घोषणा में ही उपलब्धि दिखाई दे जाए। उद्घाटन का फीता कटते ही विकास नजर आने लगे। भाषण सुनकर वह आश्वस्त हो जाए कि सब ठीक है। जमीन पर कुछ दिखाई न दे तो भी कोई बात नहीं - विश्वास बचा रहना चाहिए।
सोचने की बीमारी के साथ संदेह भी आता है। मोबाइल पर कोई संदेश आया कि अमुक चीज खाने से सौ वर्ष की उम्र मिलेगी, स्वस्थ व्यक्ति उसे तुरंत आगे बढ़ा देता है। बीमार व्यक्ति स्रोत पूछता है। वह प्रमाण माँगता है, तथ्य देखता है और फिर भी आश्वस्त नहीं होता।
आजकल स्रोत पूछना ही एक तरह की असामाजिक गतिविधि है। लेकिन इस दौर में केवल सोचने से काम नहीं चलता। सोचने वाला दिखना भी खतरनाक हो सकता है। आपके पास दिमाग हो, यह आपकी निजी सुविधा है; उसका इस्तेमाल करते हुए दिखाई देना सामाजिक जोखिम। दिमागी आदमी को हर जगह कुछ न कुछ सूझता रहता है। वह सवाल कर सकता है, असहमति जता सकता है, तर्क दे सकता है और कभी-कभी यह भी पूछ सकता है कि जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है।
इतनी सारी परेशानियाँ एक साथ पैदा करने की क्या जरूरत है? समझदार व्यक्ति इसलिए भी सावधान रहता है कि उसकी समझ दिखाई न दे। वह जानता है कि बहुत अधिक बुद्धिमान दिखाई देने से लोग उससे सलाह माँग सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं और सबसे बड़ी मुसीबत—उससे उम्मीद भी कर सकते हैं। इसके अलावा उसकी अपनी राय भी उसके लिए संकट बन सकती है।
आज का सफल नागरिक अपनी बुद्धिमत्ता को यथासंभव निजी रखता है। सार्वजनिक रूप से वह वही कहता है जो सुरक्षित हो। निजी तौर पर जो चाहे सोचता रहे। बल्कि कई बार निजी तौर पर भी न सोचना ही बेहतर है।
स्वतंत्र विचार आदमी को भीड़ से अलग खड़ा कर देता है। और भीड़ को सबसे ज्यादा आपत्ति उसी व्यक्ति से होती है जो उसके बीच रुककर पूछ दे—“हम जा कहाँ रहे हैं?” भीड़ को दिशा चाहिए, सवाल नहीं। इसलिए अपने समय का सबसे सुरक्षित मंत्र है—दिमाग का उपयोग कीजिए, लेकिन उसका प्रदर्शन मत कीजिए। विचार रखिए, पर उन्हें इतना निजी रखिए कि किसी को पता न चले। सवाल हों तो मन में रखिए। असहमति हो तो चेहरे पर मत आने दीजिए। स्वस्थ रहने का यही नया व्यायाम है।
ऐसे में सबसे बड़ी समझदारी शायद यही है— दिमाग रखिए, मगर उसकी सक्रियता को छुपा कर रखिए। सोचिए, मगर पता मत चलने दीजिए। स्वस्थ रहना है तो समझदार बनिए।
ब्रजेश कानूनगो
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