Monday, September 7, 2026

बेइज्ज़ती बटकर इज्जत पाती है

बेइज्ज़ती बटकर इज्जत पाती है

बेइज्जती भी बड़ी अदभुत चीज है। अकेले आपकी हो तो पूरी होती है, लेकिन उसमें किसी दूसरे को शामिल कर लिया जाए तो आधी रह जाती है। और अगर दूसरे के साथ तीसरे-चौथे को भी जोड़ लें तो बेइज्जती का प्रतिशत इतना कम हो जाता है कि आदमी उसे उपलब्धि बताकर घर लौट सकता है।

मान लीजिए आप किसी दफ्तर में गए और बाबू ने सबके सामने आपको डांट दिया। पहले जमाने में आदमी चुपचाप सिर झुकाकर बाहर निकल आता था। अब वह तुरंत किसी साथी को फोन करता है—“तुम्हें भी तो कल इसी बाबू ने सुनाया था?” साथी ने यदि कह दिया, “हाँ”, तो आत्मसम्मान को तत्काल प्राथमिक उपचार मिल जाता है। अब यह आपकी बेइज्जती नहीं रही, व्यवस्था की बेइज्जती हो गई।

स्कूल में बच्चा परीक्षा में फेल हो जाए तो मां-बाप कहते हैं, “इस बार तो पूरी क्लास ने ही खराब  प्रदर्शन किया है।” बच्चा घर में प्रवेश करते ही राहत की सांस लेता है। उसे शून्य मिले हों, लेकिन जब शून्य सामूहिक हो जाए तो वह सांख्यिकी बन जाता है। अकेला फेल छात्र असफल होता है, पूरी कक्षा फेल हो जाए तो शिक्षा व्यवस्था असफल हो जाती है।

राजनीति ने तो इस सिद्धांत को विज्ञान का दर्जा दे दिया है। चुनाव में हार हुई तो हार स्वीकार करने की जरूरत नहीं। तुरंत बताया जाता है कि फलां नेता भी हारा, फलां पार्टी भी हारी, दुनिया के इतने देशों में भी सत्ताधारी दल हारे हैं। अपनी हार को वैश्विक प्रवृत्ति में मिला देने से इज्जत का कुछ हिस्सा बचा रहता है। यदि हार बहुत बड़ी हो तो हारने वालों का सम्मेलन बुला लिया जाता है। वहां हर व्यक्ति दूसरे की हार देखकर अपनी हार को सांत्वना पुरस्कार समझता है।

व्यापार में भी यही नीति है। दुकान पर ग्राहक न आएं तो दुकानदार अकेले उदास क्यों हो? सामने वाले दुकानदार को भी बुलाकर पूछता है—“तुम्हारे यहां कितने ग्राहक आए?” जवाब अगर शून्य हुआ तो दोनों के चेहरे खिल जाते हैं। बाजार मंदा है, यह निष्कर्ष निकलता है। अपनी दुकान की कमजोरी अब राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की समस्या बन चुकी होती है। मंदी वैश्विक होने पर तो यह गौरव की बात है, हम दुनिया के साथ जो हो जाते हैं।

सोशल मीडिया ने इस कला को और लोकप्रिय कर दिया है। किसी की तस्वीर पर दस लोगों ने भद्दी टिप्पणी कर दी तो वह अकेला अपमानित नहीं होता। वह स्क्रीनशॉट लेकर सार्वजनिक कर देता है। अब अपमान करने वाले दस हैं और अपमानित होने वाला अकेला नहीं। भीड़ जितनी बड़ी, आत्मसम्मान उतना सुरक्षित।

मनुष्य ने शायद इसी कारण भीड़ का आविष्कार किया था। अकेले डर लगता है, भीड़ में बहादुरी आती है। अकेले गलत बोलने में शर्म आती है, दस लोग वही गलत बात बोलें तो वह विचारधारा बन जाती है। अकेले भ्रष्टाचार अपराध लगता है, सब मिलकर करें तो व्यवस्था कहलाता है। अकेले मूर्ख दिखना कठिन है, लेकिन समूह में मूर्खता सामूहिक बुद्धिमत्ता का रूप धारण कर लेती है।

इसलिए आज का समझदार आदमी बेइज्जती से बचता नहीं, उसका साझीदार खोजता है। वह कहता है—“मेरी ही क्यों? तुम्हारी भी हुई थी न?”

और यही वह क्षण है जब आधी इज्जत बच जाती है। बाकी आधी इज्जत के लिए वह किसी तीसरे की तलाश में निकल पड़ता है।

ब्रजेश कानूनगो

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