Tuesday, September 1, 2026

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है 

व्यस्त आदमी को देखकर हमें हमेशा लगता है कि वह बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहा है। उसके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें होती हैं, हाथ में मोबाइल होता है, कान पर फोन और चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के निर्णय पर टिकी हो। वह सुबह से शाम तक इधर-उधर भागता रहता है। उसके पास किसी से मिलने का समय नहीं होता, आराम करने का समय नहीं होता और कभी-कभी अपने बारे में सोचने का भी समय नहीं होता। फिर भी वह संतुष्ट रहता है कि वह व्यस्त है।

बेकार आदमी की स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है। उसके पास समय ही समय होता है और यही उसका सबसे बड़ा संकट है। समय काटना कोई साधारण काम नहीं है। व्यस्त आदमी तो अपना काम करके समय निकाल लेता है, लेकिन बेकार आदमी को समय निकालने के लिए पहले समय काटना पड़ता है। इसके लिए जिस अक्ल की आवश्यकता होती है, वह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती।

बेकार आदमी सुबह उठकर सबसे पहले यह तय करता है कि आज उसे करना क्या नहीं है। यह निर्णय ही दिन का पहला महत्वपूर्ण कार्य होता है। इसके बाद वह मोबाइल उठाता है और संसार की सारी समस्याओं का समाधान करने निकल पड़ता है। वह उन खबरों पर टिप्पणी करता है जिन्हें उसने पढ़ा नहीं, उन विषयों पर विशेषज्ञ राय देता है जिन्हें वह समझता नहीं और उन लोगों को सलाह देता है जिन्होंने उससे सलाह मांगी ही नहीं।

सोशल मीडिया ने बेकार आदमी को समय काटने का ऐसा विराट औजार दे दिया है कि अब उसे अपने बेकार होने का अहसास भी नहीं होता। वह सुबह किसी पोस्ट पर ‘शुभ प्रभात’ लिखकर राष्ट्रनिर्माण शुरू करता है और रात को ‘शुभ रात्रि’ लिखकर राष्ट्र को विश्राम देता है। बीच में वह दर्जनों वीडियो देखता है, सैकड़ों संदेश आगे बढ़ाता है और कई महत्वपूर्ण लोगों को यह बताता है कि देश की हालत बहुत खराब है।

व्यस्त आदमी की अक्ल समस्या हल करने में लगती है, जबकि बेकार आदमी की अक्ल समस्या खोजने में। घर में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो वह पूछेगा—इतना ठीक कैसे चल रहा है? कोई बीमार न हो तो बीमारी की संभावना तलाशेगा। पड़ोसी के घर शांति हो तो उसे शक होगा कि जरूर कोई बड़ी बात छिपाई जा रही है।

बेकार आदमी को दूसरों के काम में विशेष रुचि होती है। उसे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं कि उसकी अपनी अलमारी कब साफ होगी, लेकिन पड़ोसी ने नया पर्दा क्यों लगाया, यह राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है। उसे अपने खर्च का हिसाब नहीं मालूम, पर मोहल्ले में किसने कितना खर्च किया, इसकी पूरी जानकारी होती है।

हमारे समाज ने भी बेकार आदमी को कभी बेकार नहीं रहने दिया। कहीं समिति बना दी, कहीं सलाहकार मंडल, कहीं व्हाट्सऐप समूह। जिसे कोई काम नहीं मिला, उसे पद मिल गया। जिसे पद नहीं मिला, उसे प्रवक्ता बना दिया गया। जिसे प्रवक्ता भी नहीं बनाया जा सका, उसने स्वयं को विशेषज्ञ घोषित कर लिया।

दरअसल बेकारी हमेशा निष्क्रियता नहीं होती। कई बार यह अत्यधिक सक्रियता का दूसरा नाम होती है। बेकार आदमी दौड़ता बहुत है, बस किसी मंजिल की ओर नहीं जाता। वह बोलता बहुत है, पर कहता कुछ नहीं। वह व्यस्त दिखाई देने की कला में इतना निपुण हो जाता है कि कभी-कभी व्यस्त आदमी भी उससे ईर्ष्या करने लगता है।

व्यस्त आदमी के पास घड़ी होती है और बेकार आदमी के पास समय। व्यस्त आदमी समय बचाता है, बेकार आदमी समय की ऐसी धुलाई करता है कि दिन समाप्त होने पर भी उसे लगता है कि आज कुछ किया ही नहीं।

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—उसने कुछ न करते हुए भी  दिन  पूरा कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो 


आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता

आत्मविश्वास  के बाजार में मूर्खता 

आत्मविश्वास आदमी की बड़ी संपत्ति है। जिसके पास धन है, उसे धन का आत्मविश्वास होता है। जिसके पास बल है, वह अपनी भुजाओं पर भरोसा करता है। जिसके पास ज्ञान है, वह तर्क और तथ्यों के सहारे खड़ा रहता है। लेकिन इन सब आत्मविश्वासों में मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अलग है। यह न धन माँगता है, न बल और न ज्ञान। यह अपने आप पैदा होता है और बढ़ते-बढ़ते इतना विराट हो जाता है कि उसके सामने ज्ञान स्वयं असहाय दिखाई देने लगता है।

ज्ञानी व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है। मूर्ख व्यक्ति सोचने को समय की बर्बादी मानता है। ज्ञानी कहता है—‘मुझे इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है।’ मूर्ख कहता है—‘इसमें जानने जैसा है ही क्या?’ यही उसकी महानता है। उसे किसी विषय को जानने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वह पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना चुका होता है।

मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अधिक तब दिखाई देता है जब सामने प्रमाण रख दिया जाए। प्रमाण मूर्ख के लिए परेशानी की वस्तु है। वह प्रमाण को देखकर विचलित नहीं होता, बल्कि प्रमाण देने वाले की नीयत पर संदेह करने लगता है। आँकड़े गलत हो सकते हैं, किताबें पक्षपाती हो सकती हैं, वैज्ञानिक बिके हुए हो सकते हैं, विशेषज्ञ किसी साजिश का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी समझ में कभी कोई दोष नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया ने इस आत्मविश्वास को चार चाँद लगा दिए हैं। पहले किसी विषय का जानकार बनने के लिए वर्षों पढ़ना पड़ता था। अब किसी संदेश को तीन बार पढ़कर आगे भेज देना ही पर्याप्त है। सुबह आदमी डॉक्टर बनकर स्वास्थ्य सलाह देता है, दोपहर को अर्थशास्त्री बनकर महँगाई का इलाज बताता है और शाम को अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ बनकर विश्वशांति की योजना पेश कर देता है। उसकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि उसके पास मोबाइल है और उसे ‘फॉरवर्ड’ का बटन दबाना आता है।

लोकतंत्र में मूर्खता का आत्मविश्वास और भी उपयोगी सिद्ध होता है। यहाँ हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है और मूर्ख इस अधिकार का सबसे अधिक सम्मान करता है। वह बोलता है—लगातार बोलता है—और इतनी निश्चितता से बोलता है कि सुनने वाला अपने ज्ञान पर ही संदेह करने लगता है। कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित व्यक्ति वही है जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान नहीं है।

कार्यालयों में भी इसका महत्व कम नहीं। जो कर्मचारी काम जानता है, वह समस्या बताता है। जो नहीं जानता, वह समाधान बताता है। काम बिगड़ जाए तो कह देता है कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। काम बन जाए तो श्रेय उसका। इस प्रकार मूर्खता का आत्मविश्वास व्यक्ति को हर परिणाम में विजेता बनाए रखता है।

राजनीति में तो यह आत्मविश्वास वरदान है। आज कही गई बात कल बदल जाए तो कोई समस्या नहीं। चेहरे पर शिकन नहीं आनी चाहिए। जनता भूल जाएगी, रिकॉर्ड बदल जाएगा, बयान का अर्थ बदल दिया जाएगा। सबसे जरूरी है कि वक्ता स्वयं अपनी बात पर विश्वास करता हुआ दिखाई दे। आखिर जनता को सत्य नहीं, आत्मविश्वास भी तो चाहिए।

मूर्ख व्यक्ति की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि उसे कभी अपने भीतर झाँकना नहीं पड़ता। आत्ममंथन ज्ञानी की बीमारी है। मूर्ख के पास इसका समय नहीं होता। वह दूसरों की कमियाँ खोजने में व्यस्त रहता है। दुनिया गलत है, व्यवस्था गलत है, लोग गलत हैं—बस वह सही है।

इसलिए आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता सबसे महँगी बिक रही है। ज्ञान प्रमाण माँगता है, धन सुरक्षा माँगता है और बल अवसर। मूर्खता को केवल एक खुला मुँह चाहिए।

और शायद इसी कारण मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि है—क्योंकि बाकी सभी आत्मविश्वासों को कभी न कभी अपनी सीमा का पता चल जाता है, मूर्खता को अपनी सीमा का पता ही नहीं चलता।

ब्रजेश कानूनगो