Wednesday, September 30, 2026

कोई है जो धड़कनों को सुनता है !

कोई है जो धड़कनों को सुनता है !

शहर में इन दिनों संगीत बहुत है, सुनने वाला कोई नहीं। इधर सारंगी बज रही है, उधर सितार। मंचों पर सुरों की ऐसी बहार है कि लगता है शहर की सारी संवेदनाएँ संगीत विभाग को ठेके पर दे दी गई हैं। बस एक छोटी-सी समस्या है, जिस आदमी के घर में मातम पसरा है, उसे इन सुरों में अपनी धड़कन सुनाई नहीं देती। धड़कनों का भी अपना स्वभाव होता है। वे सच बोलती हैं। शायद इसी कारण उनसे बचने के लिए चारों तरफ संगीत बजता रहता है।

लोगों ने जीवन भर जो थोड़ा-बहुत जमा किया था, उसे बड़ी उम्मीद से संभालकर रखा। सोचा था, मुश्किल समय में काम आएगा। लेकिन मुश्किल समय आने से पहले ही मालूम हुआ कि उसकी निगरानी करने वाले ही उसे दुश्मनों में बाँट चुके हैं। अब शिकायत किससे करें? जिसे घर का चौकीदार समझकर चाबी सौंपी थी, उसी ने पड़ोसियों को बुलाकर संदूक खोल दिया। और कमाल यह कि संदूक अब भी हमारे घर में ही पड़ा है, बस उसकी चाबी किसी और की जेब में है।

लूट की यह नई व्यवस्था बड़ी विनम्र है। लुटेरा घर में घुसता नहीं, पहले अनुमति लेता है। संदूक उठाता नहीं, उसे वहीं रहने देता है। बस खूंटी बदल देता है। फिर समझाता है कि संपत्ति सुरक्षित है। सुरक्षित है—यह बात सही है। बस मालिक बदल गया है।

उधर घर के आगे अंधेरा घना होता जा रहा है। मगर इस अंधेरे को लेकर भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। शहर के दूसरे छोर पर चकाचौंध की पर्याप्त व्यवस्था है। वहाँ रोशनी इतनी है कि अंधेरे में खड़े लोगों को भी विश्वास होने लगता है कि वे उजाले में हैं।

दुःख का समंदर जरूर गहरा है। उसमें खार भी कम नहीं हुई। फिर भी जाने कैसे दिल में मोहब्बत का थोड़ा-सा नीर बचा हुआ है। लोग अब भी किसी डूबते हुए आदमी की तरफ हाथ बढ़ा देते हैं।शायद यही आखिरी मुसीबत है। क्योंकि जिस दिन आदमी दूसरे आदमी का दुःख पहचानने लगेगा, उस दिन उसे यह समझाना कठिन होगा कि उसका असली दुश्मन कौन है।

इसलिए सच और झूठ के बीच एक दुधारी तलवार टाँग दी गई है। तलवार दिखाई नहीं देती, मगर हर आदमी उसके नीचे खड़ा है। वह जो कहता है, उस पर शक है; जो सुनता है, उस पर भी शक है; और जो चुप रहता है, उसकी चुप्पी पर सबसे ज्यादा शक है।

सच बेचारा अपनी सफाई देता रहता है। झूठ को सफाई की जरूरत नहीं पड़ती। वह बस चमकता है। और हाकिम को चमक बहुत पसंद है। उसे लगता है कि चकाचौंध ही विकास का प्रमाण है। वह जब रोशनी में खड़ा होता है तो उसे अंधेरे की शिकायत दिखाई नहीं देती। जब संगीत बजता है तो उसे धड़कनों की आवाज नहीं सुनाई देती। जब तालियाँ बजती हैं तो उसे दुःख के समंदर की लहरें सुनाई नहीं देतीं।

फिर वह घोषणा करता है - मसले खत्म होंगे। मुश्किलें कम होंगी।अंधेरा छँटेगा।संदूक सुरक्षित रहेंगे। सच की जीत होगी।

जनता सुनती है। फिर अपने घर लौटती है। संदूक उसी खूंटी से बंधा मिलता है, अंधेरा वहीं खड़ा मिलता है, दिल में मोहब्बत का नीर अब भी बाकी मिलता है और सीने पर संदेह की वही अदृश्य तलवार तनी मिलती है। बस एक चीज बदलती है, सारंगी और सितार की आवाज कुछ और तेज हो जाती है।

कोई यह पूछ ही नहीं पाता कि धड़कनों को सुनने वाला आखिर है कौन?


ब्रजेश कानूनगो 


Tuesday, September 22, 2026

फॉर्म भरता हुआ आदमी

फॉर्म भरता हुआ आदमी

भारत के आम आदमी की सबसे बड़ी व्यस्तता क्या है?  सोशल मीडिया, रोज़गार की जद्दोजहद, परिवार की देखभाल, महँगाई से निपटना, बच्चों की पढ़ाई? नहीं। फॉर्म भरना।

उसका जीवन जन्म प्रमाणपत्र के फॉर्म से शुरू होता है और मृत्यु प्रमाणपत्र के फॉर्म पर जाकर भी खत्म नहीं होता। बीच में जितनी जिंदगी है, उतने ही फॉर्म हैं।

स्कूल में प्रवेश के लिए फॉर्म। परीक्षा के लिए फॉर्म। छात्रवृत्ति के लिए फॉर्म। नौकरी के लिए फॉर्म। नौकरी लगने के बाद भी फॉर्म। छुट्टी के लिए फॉर्म। तबादले के लिए फॉर्म। पेंशन के लिए फॉर्म।

नाम जुड़वाना हो—फॉर्म।नाम कटवाना हो—फॉर्म। नाम में गलती हो—संशोधन का फॉर्म। संशोधन में गलती हो जाए—फिर संशोधन का फॉर्म। आम आदमी का जीवन अब जीवन कम और आवेदन-पत्र अधिक है।

काम करवाना हो तो फॉर्म। शिकायत करनी हो तो फॉर्म। शिकायत पर कार्रवाई न हो तो फिर फॉर्म। कार्रवाई क्यों नहीं हुई, यह पूछने के लिए भी फॉर्म। फॉर्म भरते-भरते आदमी को अपने बारे में इतना कुछ बताना पड़ता है कि कभी-कभी लगता है, सरकार नागरिक से अधिक परिचित हो गई है, नागरिक खुद से नहीं।

नाम, पता, उम्र, आय, व्यवसाय, परिवार, मोबाइल, पहचान। फिर इनके प्रमाण। आधार का आधार बताइए। पहचान का प्रमाण, पते का प्रमाण, आय का प्रमाण। अंततः सामने खड़ा आदमी भी अपने अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करता रहता है।

डिजिटल युग आया तो लगा, अब फॉर्म से मुक्ति मिलेगी। मुक्ति नहीं मिली, फॉर्म स्क्रीन पर आ गया। अब लाइन में खड़े होने के बजाय वेबसाइट के खुलने की प्रतीक्षा है। ओटीपी की प्रतीक्षा है। सर्वर की कृपा की प्रतीक्षा है। फोटो के सही आकार की प्रतीक्षा है। दस्तावेज अपलोड होने की प्रतीक्षा है। पहले बाबू फाइल रोकता था, अब सर्वर रोकता है। तकनीक ने व्यवस्था को तेज नहीं किया, बस उसकी देरी को आधुनिक बना दिया।

फॉर्मों की दुनिया में हर सुविधा के साथ पात्रता जुड़ी है और हर पात्रता के साथ एक नया फॉर्म।सुविधा चाहिए तो आवेदन कीजिए। पात्रता के लिए प्रमाण दीजिए। प्रमाण के लिए दूसरा प्रमाण दीजिए। फिर प्रमाणित कीजिए कि आपने प्रमाण सही दिया है। इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ी सुविधा और है—आदमी को अपनी परेशानियों के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता।

महँगाई है, मगर फॉर्म भरना है। बेरोजगारी है, मगर आवेदन करना है। अस्पताल में इलाज महँगा है, मगर स्वास्थ्य योजना का फॉर्म भरना है। बच्चे की फीस की चिंता है, मगर छात्रवृत्ति का फॉर्म भरना है। पानी नहीं आ रहा, सड़क टूटी है, नौकरी नहीं है—लेकिन पहले शिकायत का फॉर्म भरिए। आदमी समस्या से ज्यादा उसके समाधान का फॉर्म भरने में व्यस्त है।

यही व्यस्तता व्यवस्था के लिए बड़ी सुविधा है। नागरिक यदि लगातार फॉर्म भरता रहे तो उसके पास सवाल पूछने का समय कम बचता है। वह अपनी वास्तविक जिंदगी के अभावों को कुछ देर के लिए भूल जाता है और आवेदन की स्थिति देखने में लग जाता है। उसकी जिंदगी की स्थिति भले ही ‘प्रक्रिया में’ हो, लेकिन सरकारी वेबसाइट पर उसकी सुविधा की स्थिति ‘सफल’ दिखाई दे सकती है।

यह व्यवस्था की एक अद्भुत प्रशासनिक उपलब्धि है। नागरिक लगातार व्यस्त रहता है और उसके पास यह सोचने का समय कम बचता है कि उसके जीवन में वास्तव में क्या बदल रहा है। वह सुविधा पाने से पहले सुविधा के लिए आवेदन करने में ही संतोष खोज लेता है।

यहीं से खुशहाली का एक नया गणित शुरू होता है। जितने अधिक फॉर्म, उतनी अधिक योजनाएँ; जितनी अधिक योजनाएँ,  उतनी अधिक खुशहाली।

जमीन पर आदमी परेशान हो सकता है, लेकिन कागज और पोर्टल पर वह सुखी, संतुष्ट और लाभान्वित नागरिक है।

फॉर्म भरते-भरते आदमी इतना व्यस्त हो जाता है कि देश और समाज के बड़े प्रश्न उसकी नजर से ओझल हो जाते हैं। उसे अगला फॉर्म दिखाई देता है, अगला सवाल नहीं।

शायद यही आधुनिक प्रशासन का सबसे बड़ा कौशल है—नागरिक को सुविधा देने से पहले उसे सुविधा के फॉर्म  भरने में व्यस्त कर देना।


ब्रजेश कानूनगो 


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Friday, September 18, 2026

सुविधाजनक फिल्टर हैं कान

सुविधाजनक फिल्टर हैं कान 

कानों का काम सिर्फ़ सुनना नहीं होता। कभी-कभी अनसुना भी करना पड़ता है। हमारे समय में तो यह एक जरूरी सामाजिक कौशल बन गया है। जो हर बात सुन ले, वह परेशान रहता है; जो सुविधानुसार सुनता है, वह चैन से रहता है।

पहले कान सुनते थे, दिमाग समझता था और फिर आदमी प्रतिक्रिया देता था। अब कान और दिमाग के बीच एक सुविधाजनक फिल्टर लग गया है। जो बात अच्छी लगे, उसे भीतर जाने दो। जो सवाल खड़ा करे, उसे बाहर ही रोक दो।

घर में इसकी शुरुआत होती है। पत्नी कहती है—सब्जी लेते आइए, आवाज साफ सुनाई देती है। बच्चा फीस की याद दिलाता है, वह भी सुनाई देता है। लेकिन जैसे ही पत्नी शॉपिंग के लिए जाने की बात करती है, कान अचानक तकनीकी खराबी की चपेट में आ जाते हैं—“क्या कहा? आवाज नहीं आई।”

राजनीति में यह कला और परिष्कृत है। जनता बेरोजगारी, महंगाई और खराब सड़कों की शिकायत करे तो आवाज धीमी पड़ जाती है। मगर प्रशंसा का एक वाक्य हजारों किलोमीटर दूर से भी साफ सुनाई देता है। आलोचना शोर है, प्रशंसा संगीत।

सोशल मीडिया ने अनसुना करना और आसान कर दिया है। कोई तथ्य रखे, सवाल पूछे, तर्क दे—अंगूठा चलाइए और अगली पोस्ट पर पहुँच जाइए। जवाब देने की झंझट भी खत्म, असहमति सुनने की मजबूरी भी।

अब सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले से सवाल किया जाता है। व्यवस्था की कमी बताइए तो पूछा जाएगा—“पहले अपने घर का हिसाब दो।” भ्रष्टाचार की बात कीजिए तो आपकी नीयत पर चर्चा शुरू हो जाएगी। अन्याय की ओर ध्यान दिलाइए तो विषय बदलकर देशभक्ति पर बहस शुरू हो जाएगी।

यह तकनीक बड़ी सुविधाजनक है—मुद्दा सुनना ही नहीं , मुद्दा उठाने वाले को सुनाते रहो।

धीरे-धीरे यही आदत समाज में उतरती है। सड़क पर घायल आदमी पड़ा हो तो हम आगे बढ़ जाते हैं। पड़ोसी के साथ अन्याय हो तो दरवाजा बंद कर लेते हैं। किसी कमजोर की आवाज उठे तो सोचते हैं—“हमारा क्या लेना-देना?”

बेशक, हर आवाज सुनना जरूरी नहीं। अफवाह, शोर और निरर्थक बहस से दूरी रखना समझदारी है। लेकिन सच और असुविधाजनक सवालों से बचना समझदारी नहीं, सुविधा है।

कान का बहरा होना दुर्भाग्य है, मगर विवेक का बहरा हो जाना उससे भी बड़ा संकट है। क्योंकि तब आदमी सुनता सब है—लेकिन वही, जो उसे सुनना अच्छा लगता है।

लगातार अनसुना करने का एक खतरा अवश्य है। एक दिन आदमी बाहर की आवाजों के साथ अपने भीतर की आवाज भी सुनना बंद कर देता है। अंतरात्मा पहले धीरे-धीरे बोलती है, फिर थककर चुप हो जाती है। उसे भी पता चल जाता है कि इस समय उसकी शायद कोई खास राजनीतिक उपयोगिता नहीं रही है। 

ब्रजेश कानूनगो


Thursday, September 17, 2026

हीनता के रोग में अहित का इंजेक्शन

हीनता के रोग में अहित का इंजेक्शन

हीनता बड़ा लोकतांत्रिक रोग है। इसमें गरीब-अमीर, नेता-जनता, पढ़े-लिखे-अनपढ़—सब बराबर संक्रमित हो सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आम आदमी इसे मन में रखता है और राजनीति इसे माइक पर बोल देती है।

इस रोग की सबसे कारगर दवा है—दूसरे का अहित। किसी को गिरते देखिए, मरीज के चेहरे पर तुरंत रौनक लौट आएगी। किसी की दुकान बंद हो जाए, नौकरी चली जाए, चुनाव हार जाए या प्रतिष्ठा पर दाग लग जाए—हीनताग्रस्त आत्मा को तत्काल ऑक्सीजन मिलने लगती है।

राजनीति ने इस चिकित्सा-पद्धति को बाकायदा संस्थागत रूप दे दिया है। सरकार कोई योजना शुरू करे तो विपक्ष पूछता है—इसमें घोटाला कहाँ है? विपक्ष कोई सुझाव दे तो सरकार पूछती है—पहले अपने समय का हिसाब दो। जनता पूछती है—सड़क कब बनेगी? दोनों पक्ष पूछते हैं—सड़क का श्रेय किसे मिलेगा? यही लोकतांत्रिक चिकित्सा की असली उपलब्धि है।

किसी नेता की सभा में भीड़ हो तो समर्थक कहते हैं—जनता उमड़ पड़ी। विरोधी कहते हैं—सरकारी भीड़ थी। विरोधी की सभा में भीड़ हो तो समीकरण बदल जाते हैं। कैमरा वही रहता है, भीड़ वही रहती है, मगर सत्य पार्टी के रंग के अनुसार बदल जाता है।

अब उपलब्धि की भी अपनी पार्टी होती है। यदि दूसरा अचानक जीत जाए तो पुराना बयान खोज लिया जाता है। राजनीति में भविष्यवाणी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह परिणाम आने के बाद भी की जा सकती है।

टीवी की बहसें इस रोग की खुली प्रयोगशाला हैं। एक प्रवक्ता दूसरे को बोलने नहीं देता और दूसरा पहले को। बीच में एंकर पूछता है—“सवाल यह है कि देश जानना चाहता है...” देश बेचारा घर में बैठा सोचता है कि उसने कब पूछा था।

सोशल मीडिया ने तो अहित को चौबीस घंटे की सेवा बना दिया है। किसी की तस्वीर पर पुरस्कार दिखे तो बधाई देने से पहले उसकी पुरानी पोस्ट खोजी जाती है। कोई लोकप्रिय हो जाए तो उसके अनुयायियों की गिनती पर संदेह किया जाता है। कोई चुनाव जीत जाए तो मशीनें संदिग्ध हो जाती हैं; हार जाए तो मशीनें अचानक निष्पक्ष हो जाती हैं।

दलबदल इस चिकित्सा का प्रीमियम पैकेज है। कल तक जो व्यक्ति लोकतंत्र का संकट था, आज वही लोकतंत्र का नया प्रहरी हो सकता है। कल जिस दल में जाना राजनीतिक पाप था, आज उसी में जाना जनसेवा है। विचारधारा इतनी लचीली हो गई है कि आवश्यकता पड़ने पर उसे मोड़कर जेब में रखा जा सकता है।

असल समस्या विरोध में नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना, असहमति रखना और आलोचना करना जरूरी है। समस्या तब शुरू होती है जब आलोचना का उद्देश्य सुधार नहीं, दूसरे को छोटा करना हो। तब राजनीति नीति की प्रतियोगिता नहीं रहती; वह प्रतिष्ठा की कुश्ती बन जाती है।

हीनता का स्थायी इलाज आत्मविश्वास है। लेकिन आत्मविश्वास की गोली धीरे असर करती है। उसमें अपने भीतर झाँकना पड़ता है, अपनी कमी स्वीकार करनी पड़ती है और यह मानना पड़ता है कि सामने वाला अच्छा काम करे तो उससे हमारा कद अपने आप छोटा नहीं हो जाता।

अहित का इंजेक्शन सबसे आसान है। सामने वाला गिरा और हम ऊँचे दिखाई देने लगे।

लेकिन यह ऊँचाई असली नहीं होती। दूसरों को लगातार गिराते-गिराते आदमी अंततः इतनी नीचे उतर जाता है कि ऊपर देखने पर भी उसे अपने से ऊँचा कोई दिखाई नहीं देता।

और शायद यही इस इंजेक्शन का अंतिम साइड इफेक्ट है—दूसरे का अहित करते-करते हम अपनी हीनता का इलाज नहीं करा पाते और ईवीएम का बटन हित अहित का सोचे बिना फिर दबा आते हैं।


ब्रजेश कानूनगो 

Monday, September 14, 2026

शर्म की उपलब्धि

शर्म की उपलब्धि

किसी जमाने में शर्म की बात पर आदमी सिर झुका लिया करता था। अब सिर ऊँचा करने का जमाना है—खासकर तब, जब सिर ऊँचा करने के लिए कोई उपलब्धि न हो। ऐसे में शर्म की बात को ही गर्व की बात घोषित कर दिया जाता है। आत्मसम्मान भी बचा रहता है और उपलब्धि का भ्रम भी।

लोकतंत्र की असली सफलता शायद यही है कि अब हमें शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं पड़ती। जो बात कभी व्यवस्था की नाक कटने का कारण बनती थी, आज वही उसकी नाक की ऊँचाई मापने का पैमाना है।

सड़क में गड्ढे हों तो कहिए—यह विकास की गहराई है। अस्पताल में डॉक्टर न मिले तो स्वास्थ्य व्यवस्था आत्मनिर्भर है। स्कूल में शिक्षक न हों तो बच्चों में स्वावलंबन पैदा किया जा रहा है। रोजगार न मिले तो युवाओं को नौकरी की मानसिकता से बाहर निकाला जा रहा है। महँगाई बढ़े तो जनता को कम में जीने की कला सिखाई जा रही है।

किसान की फसल खराब हो जाए तो यह संकट नहीं, उसके धैर्य की परीक्षा है। शहर पानी में डूब जाए तो जलभराव नहीं, प्रकृति से आत्मीय संवाद है।

सबसे सुविधाजनक उपाय है—समस्या को समस्या मानने से इनकार कर देना।

कोई सवाल पूछे तो सवाल से ज्यादा सवाल पूछने वाले की नीयत पर बहस होने लगती है। आंकड़े मांगने वाला नकारात्मक है, जवाब मांगने वाला व्यवस्था-विरोधी और असहमति जताने वाला विकास-विरोधी। इस तरह समस्या अपनी जगह रहती है, बस चर्चा का विषय बदल जाता है।

लोकतंत्र में जनता को बोलने की पूरी आजादी है। वह चाहे तो चुप भी रह सकती है। बल्कि कई बार चुप रहना ही समझदार नागरिकता का प्रमाण माना जाता है। सवाल पूछने वाला नागरिक असुविधाजनक होता है; वह हिसाब मांगता है। सुविधाजनक नागरिक तालियां बजाता है।

उपलब्धियों का व्याकरण भी सरल हो गया है। योजना की घोषणा हो गई—उपलब्धि। शिलान्यास हो गया—विकास। उद्घाटन हो गया—राष्ट्र निर्माण। परिणाम कब आएगा, यह अगली घोषणा के भरोसे छोड़ दिया जाता है। जनता भी इस व्याकरण में अभ्यस्त हो रही है। जिस चीज की कल शिकायत थी, आज उसी पर गर्व करना सीख रही है। परेशानी को नियति मान लेना और फिर नियति का उत्सव मनाना—नागरिक परिपक्वता का नया मॉडल है।

बेचारी शर्म अब बेरोजगार है। जिस दृश्य को देखकर उसे पैदा होना था, उसी दृश्य पर आज सम्मान समारोह हो रहा है। शर्म को छिपाया नहीं जाता, उसका पोस्टर लगाया जाता है।

इसलिए अगली बार आपको लगे कि हालात बिगड़ रहे हैं, समस्याएँ बढ़ रही हैं और जिम्मेदारी तय नहीं हो रही, तो परेशान मत होइए। संभव है, कल उसी समस्या को किसी आकर्षक नाम के साथ उपलब्धि घोषित कर दिया जाए।

और जिस दिन जनता भी उस पर गर्व करने लगे, समझ लीजिए—जनतंत्र बढ़िया चल रहा है।

बस यह पता नहीं कि चल कहाँ रहा है।

ब्रजेश कानूनगो

Sunday, September 13, 2026

सोचना एक रोग है

सोचना एक रोग है

सोचना एक रोग है। इस रोग से जो मुक्त हैं, वे धन्य हैं। वे स्वस्थ हैं, प्रसन्न हैं और सबसे बड़ी बात—निश्चिंत हैं। उन्हें किसी बात की तह में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। जो बताया गया, मान लिया; जो दिखाया गया, देख लिया; जो कहा गया, आगे कह दिया। जीवन इससे सरल और क्या हो सकता है!

मुसीबत उन लोगों की है जो सोचते हैं। सड़क बनी तो वे पूछेंगे—कितने में बनी? टूट गई तो पूछेंगे—क्यों टूटी? अस्पताल खुला तो डॉक्टर खोजेंगे और स्कूल बना तो शिक्षक। उपलब्धियाँ गिनाई जाएँगी तो आँकड़े माँग बैठेंगे। यानी जहाँ बाकी लोग तालियाँ बजा रहे हैं, वहाँ ये लोग प्रश्न लेकर खड़े हैं।

यह स्वस्थ समाज के लक्षण नहीं हैं। आजकल स्वस्थ नागरिक वह है जिसे घोषणा में ही उपलब्धि दिखाई दे जाए। उद्घाटन का फीता कटते ही विकास नजर आने लगे। भाषण सुनकर वह आश्वस्त हो जाए कि सब ठीक है। जमीन पर कुछ दिखाई न दे तो भी कोई बात नहीं - विश्वास बचा रहना चाहिए।

सोचने की बीमारी के साथ संदेह भी आता है। मोबाइल पर कोई संदेश आया कि अमुक चीज खाने से सौ वर्ष की उम्र मिलेगी, स्वस्थ व्यक्ति उसे तुरंत आगे बढ़ा देता है। बीमार व्यक्ति स्रोत पूछता है। वह प्रमाण माँगता है, तथ्य देखता है और फिर भी आश्वस्त नहीं होता।

आजकल स्रोत पूछना ही एक तरह की असामाजिक गतिविधि है। लेकिन इस दौर में केवल सोचने से काम नहीं चलता। सोचने वाला दिखना भी खतरनाक हो सकता है। आपके पास दिमाग हो, यह आपकी निजी सुविधा है; उसका इस्तेमाल करते हुए दिखाई देना सामाजिक जोखिम। दिमागी आदमी को हर जगह कुछ न कुछ सूझता रहता है। वह सवाल कर सकता है, असहमति जता सकता है, तर्क दे सकता है और कभी-कभी यह भी पूछ सकता है कि जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है।

इतनी सारी परेशानियाँ एक साथ पैदा करने की क्या जरूरत है? समझदार व्यक्ति इसलिए भी सावधान रहता है कि उसकी समझ दिखाई न दे। वह जानता है कि बहुत अधिक बुद्धिमान दिखाई देने से लोग उससे सलाह माँग सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं और सबसे बड़ी मुसीबत—उससे उम्मीद भी कर सकते हैं। इसके अलावा उसकी अपनी राय भी उसके लिए संकट बन सकती है।

आज का सफल नागरिक अपनी बुद्धिमत्ता को यथासंभव निजी रखता है। सार्वजनिक रूप से वह वही कहता है जो सुरक्षित हो। निजी तौर पर जो चाहे सोचता रहे। बल्कि कई बार निजी तौर पर भी न सोचना ही बेहतर है।

स्वतंत्र विचार आदमी को भीड़ से अलग खड़ा कर देता है। और भीड़ को सबसे ज्यादा आपत्ति उसी व्यक्ति से होती है जो उसके बीच रुककर पूछ दे—“हम जा कहाँ रहे हैं?” भीड़ को दिशा चाहिए, सवाल नहीं। इसलिए अपने समय का सबसे सुरक्षित मंत्र है—दिमाग का उपयोग कीजिए, लेकिन उसका प्रदर्शन मत कीजिए। विचार रखिए, पर उन्हें इतना निजी रखिए कि किसी को पता न चले। सवाल हों तो मन में रखिए। असहमति हो तो चेहरे पर मत आने दीजिए। स्वस्थ रहने का यही नया व्यायाम है।

ऐसे में सबसे बड़ी समझदारी शायद यही है— दिमाग रखिए, मगर उसकी सक्रियता को छुपा कर रखिए। सोचिए, मगर पता मत चलने दीजिए। स्वस्थ रहना है तो समझदार बनिए।


ब्रजेश कानूनगो 


Thursday, September 10, 2026

रिश्वत का नया राशन कार्ड

रिश्वत का नया राशन कार्ड

भ्रष्टाचार भी समय के साथ आधुनिक होता जा रहा है। पहले रिश्वत खुलेआम माँगी जाती थी। फिर धीरे-धीरे उसमें संकोच आया। अब तो रिश्वत माँगने वाला भी शर्माता है और देने वाला भी। इसलिए दोनों ने मिलकर एक नई भाषा विकसित कर ली है—कोड वर्ड की भाषा।

बिहार से खबर आई कि रिश्वत के लिए अब सीधे एक लाख रुपये नहीं कहे जाते। उसके लिए कहा जाता है—एक बोरा चावल। सुनने में लगता है कि कोई गरीब परिवार राशन की व्यवस्था कर रहा है, लेकिन जानकार जानते हैं कि यहाँ चावल अनाज नहीं, नोटों का प्रतीक है।

इस व्यवस्था में सबसे अच्छी बात यह है कि रिश्वत लेने वाला अब रिश्वत नहीं लेता, वह तो केवल ‘चावल’ स्वीकार करता है। बाद में उस चावल को किसी अदृश्य मिल में ले जाकर रुपये में बदल दिया जाता है। इससे भ्रष्टाचार भी शाकाहारी हो गया है।

कल तक रिश्वत के लिए ‘लिफाफा’ चलता था। फिर ‘मिठाई का डिब्बा’ आया। अब लगता है कि भ्रष्टाचार विभाग ने अपनी शब्दावली का विस्तार कर लिया है। एक बोरा चावल एक लाख का, आधा बोरा पचास हजार का और शायद भविष्य में किलो के हिसाब से भी दरें तय हो जाएँगी।

मसलन, किसी काम की कीमत पंद्रह हजार हो तो कहा जाएगा—‘डेढ़ कट्टा चावल।’ दस हजार के लिए ‘दस किलो गेहूँ’। पाँच हजार के लिए ‘एक छोटा पैकेट दाल।’ रिश्वत की यह नई कृषि अर्थव्यवस्था इतनी विकसित हो सकती है कि सरकारी कार्यालयों में फाइलों के साथ अनाज की मंडी भी लगने लगे।

इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि निगरानी करने वाले भी भ्रमित रहेंगे। अधिकारी पूछेगा—‘किस बात की चर्चा हो रही थी?’

जवाब मिलेगा—‘साहब, फसल की।’

‘कौन-सी फसल?’

‘वही, जो फाइल पास होने के बाद पकती है।’

भ्रष्टाचार की यह कोड भाषा वास्तव में केवल शब्दों का खेल नहीं है। यह उस मानसिकता का संकेत है जिसमें गलत काम को सामान्य और रिश्वत को एक व्यवस्थित लेन-देन मान लिया गया है। शब्द बदलने से अपराध का चरित्र नहीं बदलता। एक लाख को ‘एक बोरा चावल’ कह देने से वह चावल नहीं हो जाता।

मजेदार बात यह है कि हमारे यहाँ भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कानून बनते हैं और भ्रष्टाचार कानून से बचने के लिए शब्दकोश बनाता है। कानून कहता है—रिश्वत मत लो। भ्रष्टाचार कहता है—ठीक है, हम उसे रिश्वत कहेंगे ही नहीं।

आज ‘चावल’ है, कल ‘सीमेंट’ होगा, परसों ‘सरसों का तेल’। फिर शायद सरकारी दफ्तर में काम कराने के लिए नया रेट कार्ड भी छपे—

जन्म प्रमाणपत्र—दो किलो दाल। नक्शा पास—आधा ट्रॉली सीमेंट। ठेका—एक ट्रक ईंट। बड़ी फाइल—एक पूरा गोदाम।

और जनता सोचती रहेगी कि देश में महँगाई क्यों बढ़ रही है।

दरअसल महँगाई केवल बाजार में नहीं बढ़ रही। रिश्वत की भाषा भी महँगी हो रही है।

एक समय था जब रिश्वत छिपाकर ली जाती थी। अब रिश्वत को छिपाने के लिए उसके ऊपर एक पूरा बोरा डाल दिया गया है।

बस डर यही है कि कहीं कल सरकार यह घोषणा न कर दे कि देश में खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार है—और भ्रष्टाचार विरोधी विभाग पूछता रह जाए कि इतने बोरे चावल आखिर गए कहाँ?


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, September 8, 2026

भौंकते - काटते माहौल में जीवन

भौंकते - काटते माहौल में जीवन

साधुरामजी आजकल बहुत चिंतित हैं। चिंता का कारण महँगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण या लोकतंत्र पर मंडराता कोई संकट नहीं, बल्कि मनुष्य में बढ़ती भौंकने और काटने की प्रवृत्ति है।

उनका मानना है कि आदमी और कुत्ते में अंतर तेजी से कम होता जा रहा है। कुत्ता सामने वाले को देखकर भौंकता है, आदमी मोबाइल देखकर। अंतर केवल इतना है कि कुत्ते का भौंकना गली तक सीमित रहता है और आदमी का भौंकना सोशल मीडिया के रास्ते पूरी दुनिया का चक्कर लगा आता है।

वैसे भौंकना कोई अस्वाभाविक क्रिया नहीं है। चिड़िया चहचहाती है, बकरी मिमियाती है, कौआ काँव-काँव करता है, कोयल कूकती है, गधा रेंकता है और मनुष्य बोलता है। बोलने से काम न चले तो वह चिल्लाता है, चिल्लाने से काम न चले तो गरजता है और गरजने से भी काम न बने तो भौंकने लगता है। लोकतंत्र ने उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है और सोशल मीडिया ने चौबीस घंटे का लाउडस्पीकर।

भौंकने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें तर्क की जरूरत नहीं पड़ती। तर्क देने के लिए पढ़ना पड़ता है, सोचना पड़ता है, तथ्य जुटाने पड़ते हैं। भौंकने के लिए केवल आवाज और आत्मविश्वास चाहिए। आजकल दोनों प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

पहले लोग अपनी बात कहते थे, फिर अपनी बात मनवाने लगे और अब अपनी बात ट्रेंड करवाने लगे हैं। विचार की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है। किसी खबर का सच सामने आने में समय लगता है, लेकिन उस पर भौंकने में एक सेकंड भी नहीं लगता। सोशल मीडिया ने इस कला को इतना लोकतांत्रिक बना दिया है कि अब हर जेब में एक छोटा-सा मंच और हर हाथ में एक अदृश्य माइक है।

लेकिन भौंकना अभी भी अपेक्षाकृत अहिंसक क्रिया है। असली समस्या काटने की है।

काटना केवल दाँतों से नहीं होता। शब्द भी काटते हैं, आरोप भी, व्यंग्य भी और कभी-कभी प्रेम भी। राजनीति में तो काटने की अनेक प्रजातियाँ विकसित हो चुकी हैं—टिकट काटना, पत्ता काटना, कद काटना, पद काटना और अंततः कुर्सी काटना। आज जो गले मिल रहा है, वह कल अवसर मिलते ही आपकी राजनीतिक जड़ काट सकता है।

सार्वजनिक जीवन में असहमति आवश्यक है। मगर असहमति जब तर्क छोड़कर व्यक्तिगत आक्रमण बन जाए तो लोकतांत्रिक संवाद की जगह दाँत दिखाई देने लगते हैं। विचार कमजोर पड़ते ही आवाज ऊँची होती है और तर्क समाप्त होते ही भाषा में नाखून निकल आते हैं।

सबसे विचित्र स्थिति यह है कि सब बोलना चाहते हैं, कोई सुनना नहीं चाहता। हर व्यक्ति प्रसारण केंद्र बना हुआ है और दूसरे के सिग्नल को जाम करने में व्यस्त है। परिणाम सामने है—संवाद कम हो रहा है, शोर बढ़ रहा है।

ऐसे में सरकार को ‘राष्ट्रीय भौंकन नियंत्रण मिशन’ शुरू कर देना चाहिए। विद्यालयों में बच्चों को सिखाया जाए कि असहमति जताने के लिए दाँत दिखाना जरूरी नहीं। सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले एक छोटी-सी मशीन पूछे—‘क्या आपने सोचा भी है?’ और उत्तर ‘नहीं’ होने पर पोस्ट अपने आप ड्राफ्ट में चली जाए।

हालाँकि यह योजना सफल होगी, इसकी संभावना कम है। क्योंकि जिस समाज में भौंकने को विचार और काटने को तर्क समझने का चलन बढ़ रहा हो, वहाँ सबसे पहले उसी मशीन को ही संदिग्ध घोषित कर दिया जाएगा।

साधुरामजी ने जाते-जाते कहा—‘मित्र, भौंकने वालों से तो फिर भी बचा जा सकता है, काटने वालों से कैसे बचेंगे?’

मैंने कहा—‘बहुत आसान है। भौंकने वाले को देखकर रास्ता बदल लेना, काटने वाले को देखकर दूरी बना लेना और जो भौंकते भी हैं और काटते भी—उनका बहिष्कार करिए।’

साधुरामजी मेरी ओर देखने लगे। फिर बोले—‘और अगर वही लोग हमे घेर बैठे हों?’

मैंने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर एक कुत्ता लगातार भौंक रहा था और सामने से एक हाथी निर्विकार चला जा रहा था।

मैंने कहा—‘तब हाथी बन जाइए साधुरामजी। लोकतंत्र में भौंकने वालों की संख्या कभी कम नहीं होगी; असली संकट तब है, जब हाथी भी डरकर दिशा बदलने लगे।’

पता नहीं साधुरामजी मेरे सुझाव से संतुष्ट हुए या नहीं। 


ब्रजेश कानूनगो 

Monday, September 7, 2026

बेइज्ज़ती बटकर इज्जत पाती है

बेइज्ज़ती बटकर इज्जत पाती है

बेइज्जती भी बड़ी अदभुत चीज है। अकेले आपकी हो तो पूरी होती है, लेकिन उसमें किसी दूसरे को शामिल कर लिया जाए तो आधी रह जाती है। और अगर दूसरे के साथ तीसरे-चौथे को भी जोड़ लें तो बेइज्जती का प्रतिशत इतना कम हो जाता है कि आदमी उसे उपलब्धि बताकर घर लौट सकता है।

मान लीजिए आप किसी दफ्तर में गए और बाबू ने सबके सामने आपको डांट दिया। पहले जमाने में आदमी चुपचाप सिर झुकाकर बाहर निकल आता था। अब वह तुरंत किसी साथी को फोन करता है—“तुम्हें भी तो कल इसी बाबू ने सुनाया था?” साथी ने यदि कह दिया, “हाँ”, तो आत्मसम्मान को तत्काल प्राथमिक उपचार मिल जाता है। अब यह आपकी बेइज्जती नहीं रही, व्यवस्था की बेइज्जती हो गई।

स्कूल में बच्चा परीक्षा में फेल हो जाए तो मां-बाप कहते हैं, “इस बार तो पूरी क्लास ने ही खराब  प्रदर्शन किया है।” बच्चा घर में प्रवेश करते ही राहत की सांस लेता है। उसे शून्य मिले हों, लेकिन जब शून्य सामूहिक हो जाए तो वह सांख्यिकी बन जाता है। अकेला फेल छात्र असफल होता है, पूरी कक्षा फेल हो जाए तो शिक्षा व्यवस्था असफल हो जाती है।

राजनीति ने तो इस सिद्धांत को विज्ञान का दर्जा दे दिया है। चुनाव में हार हुई तो हार स्वीकार करने की जरूरत नहीं। तुरंत बताया जाता है कि फलां नेता भी हारा, फलां पार्टी भी हारी, दुनिया के इतने देशों में भी सत्ताधारी दल हारे हैं। अपनी हार को वैश्विक प्रवृत्ति में मिला देने से इज्जत का कुछ हिस्सा बचा रहता है। यदि हार बहुत बड़ी हो तो हारने वालों का सम्मेलन बुला लिया जाता है। वहां हर व्यक्ति दूसरे की हार देखकर अपनी हार को सांत्वना पुरस्कार समझता है।

व्यापार में भी यही नीति है। दुकान पर ग्राहक न आएं तो दुकानदार अकेले उदास क्यों हो? सामने वाले दुकानदार को भी बुलाकर पूछता है—“तुम्हारे यहां कितने ग्राहक आए?” जवाब अगर शून्य हुआ तो दोनों के चेहरे खिल जाते हैं। बाजार मंदा है, यह निष्कर्ष निकलता है। अपनी दुकान की कमजोरी अब राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की समस्या बन चुकी होती है। मंदी वैश्विक होने पर तो यह गौरव की बात है, हम दुनिया के साथ जो हो जाते हैं।

सोशल मीडिया ने इस कला को और लोकप्रिय कर दिया है। किसी की तस्वीर पर दस लोगों ने भद्दी टिप्पणी कर दी तो वह अकेला अपमानित नहीं होता। वह स्क्रीनशॉट लेकर सार्वजनिक कर देता है। अब अपमान करने वाले दस हैं और अपमानित होने वाला अकेला नहीं। भीड़ जितनी बड़ी, आत्मसम्मान उतना सुरक्षित।

मनुष्य ने शायद इसी कारण भीड़ का आविष्कार किया था। अकेले डर लगता है, भीड़ में बहादुरी आती है। अकेले गलत बोलने में शर्म आती है, दस लोग वही गलत बात बोलें तो वह विचारधारा बन जाती है। अकेले भ्रष्टाचार अपराध लगता है, सब मिलकर करें तो व्यवस्था कहलाता है। अकेले मूर्ख दिखना कठिन है, लेकिन समूह में मूर्खता सामूहिक बुद्धिमत्ता का रूप धारण कर लेती है।

इसलिए आज का समझदार आदमी बेइज्जती से बचता नहीं, उसका साझीदार खोजता है। वह कहता है—“मेरी ही क्यों? तुम्हारी भी हुई थी न?”

और यही वह क्षण है जब आधी इज्जत बच जाती है। बाकी आधी इज्जत के लिए वह किसी तीसरे की तलाश में निकल पड़ता है।

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, September 3, 2026

भाषा में स्लैंग : जिंदगी का कपड़ा पॉलिएस्टर हो गया है

भाषा में स्लैंग : जिंदगी का कपड़ा पॉलिएस्टर हो गया है

भाषा बड़ी लोकतांत्रिक चीज है। वह संसद से पास होकर नहीं आती, न शब्दकोश से अनुमति लेकर जन्म लेती है। लोग बोलते-बोलते शब्द गढ़ते हैं, फिर उन शब्दों को चलन में लाते हैं और एक दिन भाषा के पंडित उन्हें स्लैंग कहकर अलग खाने में रख देते हैं। स्लैंग दरअसल भाषा की वह गली है जहाँ व्याकरण जूते उतारकर बैठ जाता है और रचनात्मकता बिना टिकट अंदर चली जाती है।

हर पीढ़ी ने अपनी स्लैंग बनाई है। कभी ‘कूल’, ‘हिप’, ‘ड्यूड’, ‘भौकाल’, ‘झकास’, ‘चमचा’ और ‘फंडा’ जैसे शब्द अपनी धाक जमाते थे। ‘चमचा’ रसोई का उपकरण कम और राजनीतिक चरित्र का प्रमाणपत्र अधिक था। ‘कूल’ का तापमान से कोई संबंध नहीं था। आदमी पसीने में तर हो सकता था, फिर भी कूल कहलाता था।

आज जेन जी ने स्लैंग को सोशल मीडिया की स्पीड दे दी है। ‘Rizz’- 'रिज ' आकर्षण की क्षमता है, ‘Ghosting’-  'घोस्टिंग' बिना बताए  बताए किसी रिश्ते से गायब हो जाना, ‘Delulu’ - 'डेलुलु'  अपनी कल्पनाओं को वास्तविकता से ज्यादा सच मानना और ‘NPC’ -  'एनपीसी' ऐसे व्यक्ति के लिए है जो अपनी स्वतंत्र सोच खोकर किसी डिजिटल किरदार जैसा व्यवहार करता दिखाई दे। ‘Aura’- 'औरा' अब आभा से ज्यादा किसी व्यक्ति के प्रभाव और स्टाइल का प्रमाण है। और अब नया शब्द है—पॉलिएस्टर।

पहले पॉलिएस्टर कपड़े में होता था, अब जिंदगी में होने लगा है। जेन जी के स्लैंग में ‘पॉलिएस्टर’ उस बनावटी, कृत्रिम और जरूरत से ज्यादा चमकदार जीवन का संकेत बन रहा है जो देखने में आकर्षक हो, लेकिन भीतर से नकली हो। सोशल मीडिया पर ऐसी जिंदगी की भरमार है। सुबह योग, फिर ऑर्गेनिक नाश्ता, उसके बाद समुद्र किनारे लैपटॉप, दोपहर में ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ पर पोस्ट और शाम को सूर्यास्त के सामने मुस्कराता चेहरा। पूरा दिन देखकर लगता है आदमी जीवन नहीं जी रहा, जीवन की विज्ञापन फिल्म शूट कर रहा है। यही पॉलिएस्टर है।

मजेदार बात यह है कि पुरानी पीढ़ी भी इस बीमारी को पहचानती थी। वह कहती थी—‘दिखावा मत करो’, ‘नौटंकी मत करो’, ‘बनावटी मत बनो।’ नई पीढ़ी ने वही बात कहने के लिए एक शब्द खोज लिया। अंतर सिर्फ इतना है कि पहले उपदेश मिलता था, अब स्लैंग में व्यंग्य मिलता है।

सोशल मीडिया ने आदमी को जीवन का अभिनेता ही नहीं, निर्देशक, कैमरामैन और प्रचारक भी बना दिया है। पहले लोग अच्छा जीवन जीते थे और उसकी तस्वीर कभी-कभार दिखाते थे। अब तस्वीर अच्छी दिखे, इसके लिए जीवन को व्यवस्थित किया जाता है। पहले यात्रा याद रखने के लिए फोटो खींची जाती थी, अब फोटो डालने के लिए यात्रा की जाती है। पहले खाना खाया जाता था, फिर कभी उसकी तस्वीर दिखाई जाती थी। अब खाना आने से पहले कैमरा आ जाता है।

विडंबना यह है कि नकलीपन की आलोचना भी उसी सोशल मीडिया पर हो रही है जिसने नकलीपन को सबसे बड़ा बाजार दिया है। कोई ‘पॉलिएस्टर लाइफ’ पर पोस्ट डालकर अपनी ही जिंदगी को फिल्टर कर रहा है। नकलीपन का विरोध भी कभी-कभी नकली हो जाता है। यहीं स्लैंग महज युवा फैशन नहीं रह जाती, वह सामाजिक टिप्पणी बन जाती है। ‘प्लास्टिक’ कभी कृत्रिम मुस्कान और बनावटी व्यवहार का रूपक बना था। ‘फेक’ ने नकली पहचान और झूठी सूचनाओं की दुनिया को नाम दिया। अब ‘पॉलिएस्टर’ शायद उस समय का रूपक है जिसमें मनुष्य ने अपनी वास्तविकता पर भी चमकदार आवरण चढ़ा लिया है।

भाषा में नए शब्दों का आना अच्छी बात है। भाषा तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ियाँ उसमें अपने अनुभवों के लिए नए नाम खोजती हैं। आज का स्लैंग कल का सामान्य शब्द बन सकता है। ‘कूल’ कभी नया था, आज सामान्य है। कई शब्द जिन्हें कभी अशिष्ट समझा गया, बाद में शब्दकोश में सम्मानपूर्वक बैठ गए।

लेकिन खतरा शब्दों में नहीं, जीवन में है। स्लैंग बदलती रहे, कोई समस्या नहीं। समस्या तब है जब हमारी असल जिंदगी भी स्लैंग बन जाए—क्षणिक, चमकदार और संदर्भ बदलते ही बेकार। इसलिए ‘पॉलिएस्टर’ को सिर्फ जेन जी का नया मजाक समझना भूल होगी। यह हमारे समय का आईना भी है।

कपड़े में पॉलिएस्टर सस्ता, टिकाऊ और चमकदार हो सकता है। लेकिन चरित्र में पॉलिएस्टर हो तो चमक जितनी बढ़ेगी, नकलीपन उतना ही साफ दिखाई देगा।

ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, September 2, 2026

जब तर्क की छुट्टी हो जाती है

जब तर्क की छुट्टी हो जाती है

विचार मनुष्य को मनुष्य बनाता है और तर्क उसे सभ्य बनाए रखता है। लेकिन जब विचार रास्ते में ही दम तोड़ दे और तर्क घर से निकलने से पहले ही डर जाए, तब आदमी के पास बचता क्या है? आवाज। और आवाज भी ऐसी कि पड़ोसी का कुत्ता तक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर विचार करने लगे।

सभ्यता ने मनुष्य को बोलने की आजादी दी थी, लेकिन हमने उसका एक नया संस्करण खोज लिया है—दूसरे को बोलने न देने की आजादी। अब बहस में सबसे ताकतवर तर्क वह नहीं है जो सही हो, बल्कि वह है जो सबसे ज्यादा शोर पैदा कर सके। विचार कमजोर पड़ते ही माइक मजबूत हो जाता है। तथ्य पीछे हटते हैं और हुल्लड़ आगे आकर कुर्सी संभाल लेता है।

पहले किसी मत से असहमति होती थी तो उसके जवाब में दूसरा मत प्रस्तुत किया जाता था। अब असहमति का सबसे आसान उपाय है—असहमत व्यक्ति की आवाज बंद कर दो। वह कुछ कहे तो उसे देशद्रोही, मूर्ख, बिकाऊ, नासमझ या किसी सुविधाजनक विशेषण से सम्मानित कर दो। इससे बहस भी समाप्त और बुद्धि की मेहनत भी बची।

तर्क में एक बड़ी समस्या है। उसमें तैयारी करनी पड़ती है। पढ़ना पड़ता है, सोचना पड़ता है और सामने वाले की बात भी सुननी पड़ती है। हुल्लड़ में ऐसा कोई झंझट नहीं। वहाँ केवल फेफड़ों की क्षमता और चेहरे की कठोरता चाहिए। जिसे अपनी बात पर भरोसा नहीं होता, वह अपनी मुट्ठी पर भरोसा करने लगता है।

आजकल तर्क-वितर्क का स्तर भी आधुनिक हो गया है। पहले कहा जाता था—‘मैं आपकी बात से सहमत नहीं।’ अब कहा जाता है—‘आप बोलिए मत।’ पहले प्रश्न का उत्तर दिया जाता था, अब प्रश्न पूछने वाले की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। प्रश्न कठिन हो तो उत्तर देने के बजाय प्रश्नकर्ता को ही कठिन बना दो।

हुल्लड़ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसमें जीतने के लिए सही होना जरूरी नहीं। बस इतना जरूरी है कि सामने वाला बोल न पाए। लोकतंत्र में बहुमत की आवाज सुनी जाती है, लेकिन हुल्लड़तंत्र में सबसे ऊँची आवाज ही बहुमत मान ली जाती है।

इसका असर समाज के हर कोने में दिखाई देता है। घर में बहस हो तो आवाज ऊँची, दफ्तर में मतभेद हो तो मेज पर मुक्का, सड़क पर विवाद हो तो भीड़ तैयार। सोशल मीडिया ने तो इस कला को विश्वव्यापी बना दिया है। वहाँ तर्क का जवाब गाली से और तथ्य का जवाब ट्रोल से दिया जा सकता है।

दरअसल गुंडागर्दी अक्सर विचारहीनता की लाठी होती है। जिसके पास विचार है, वह समझाता है; जिसके पास तर्क है, वह प्रमाण देता है; जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह धमकाता है।

इसलिए जब किसी बहस में अचानक शोर बढ़ने लगे तो समझ लेना चाहिए कि विचार की बैटरी खत्म हो चुकी है। अब तर्क चार्जर खोज रहा है और हुल्लड़ ने सत्ता की कुर्सी पर कब्जा कर लिया है।

सभ्यता की असली परीक्षा यह नहीं कि हम कितनी जोर से बोल सकते हैं, बल्कि यह है कि विरोधी की बात सुनते समय हम कितनी देर तक चुप रह सकते हैं।

ब्रजेश कानूनगो 

Tuesday, September 1, 2026

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है

बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है 

व्यस्त आदमी को देखकर हमें हमेशा लगता है कि वह बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहा है। उसके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें होती हैं, हाथ में मोबाइल होता है, कान पर फोन और चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के निर्णय पर टिकी हो। वह सुबह से शाम तक इधर-उधर भागता रहता है। उसके पास किसी से मिलने का समय नहीं होता, आराम करने का समय नहीं होता और कभी-कभी अपने बारे में सोचने का भी समय नहीं होता। फिर भी वह संतुष्ट रहता है कि वह व्यस्त है।

बेकार आदमी की स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है। उसके पास समय ही समय होता है और यही उसका सबसे बड़ा संकट है। समय काटना कोई साधारण काम नहीं है। व्यस्त आदमी तो अपना काम करके समय निकाल लेता है, लेकिन बेकार आदमी को समय निकालने के लिए पहले समय काटना पड़ता है। इसके लिए जिस अक्ल की आवश्यकता होती है, वह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती।

बेकार आदमी सुबह उठकर सबसे पहले यह तय करता है कि आज उसे करना क्या नहीं है। यह निर्णय ही दिन का पहला महत्वपूर्ण कार्य होता है। इसके बाद वह मोबाइल उठाता है और संसार की सारी समस्याओं का समाधान करने निकल पड़ता है। वह उन खबरों पर टिप्पणी करता है जिन्हें उसने पढ़ा नहीं, उन विषयों पर विशेषज्ञ राय देता है जिन्हें वह समझता नहीं और उन लोगों को सलाह देता है जिन्होंने उससे सलाह मांगी ही नहीं।

सोशल मीडिया ने बेकार आदमी को समय काटने का ऐसा विराट औजार दे दिया है कि अब उसे अपने बेकार होने का अहसास भी नहीं होता। वह सुबह किसी पोस्ट पर ‘शुभ प्रभात’ लिखकर राष्ट्रनिर्माण शुरू करता है और रात को ‘शुभ रात्रि’ लिखकर राष्ट्र को विश्राम देता है। बीच में वह दर्जनों वीडियो देखता है, सैकड़ों संदेश आगे बढ़ाता है और कई महत्वपूर्ण लोगों को यह बताता है कि देश की हालत बहुत खराब है।

व्यस्त आदमी की अक्ल समस्या हल करने में लगती है, जबकि बेकार आदमी की अक्ल समस्या खोजने में। घर में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो वह पूछेगा—इतना ठीक कैसे चल रहा है? कोई बीमार न हो तो बीमारी की संभावना तलाशेगा। पड़ोसी के घर शांति हो तो उसे शक होगा कि जरूर कोई बड़ी बात छिपाई जा रही है।

बेकार आदमी को दूसरों के काम में विशेष रुचि होती है। उसे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं कि उसकी अपनी अलमारी कब साफ होगी, लेकिन पड़ोसी ने नया पर्दा क्यों लगाया, यह राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है। उसे अपने खर्च का हिसाब नहीं मालूम, पर मोहल्ले में किसने कितना खर्च किया, इसकी पूरी जानकारी होती है।

हमारे समाज ने भी बेकार आदमी को कभी बेकार नहीं रहने दिया। कहीं समिति बना दी, कहीं सलाहकार मंडल, कहीं व्हाट्सऐप समूह। जिसे कोई काम नहीं मिला, उसे पद मिल गया। जिसे पद नहीं मिला, उसे प्रवक्ता बना दिया गया। जिसे प्रवक्ता भी नहीं बनाया जा सका, उसने स्वयं को विशेषज्ञ घोषित कर लिया।

दरअसल बेकारी हमेशा निष्क्रियता नहीं होती। कई बार यह अत्यधिक सक्रियता का दूसरा नाम होती है। बेकार आदमी दौड़ता बहुत है, बस किसी मंजिल की ओर नहीं जाता। वह बोलता बहुत है, पर कहता कुछ नहीं। वह व्यस्त दिखाई देने की कला में इतना निपुण हो जाता है कि कभी-कभी व्यस्त आदमी भी उससे ईर्ष्या करने लगता है।

व्यस्त आदमी के पास घड़ी होती है और बेकार आदमी के पास समय। व्यस्त आदमी समय बचाता है, बेकार आदमी समय की ऐसी धुलाई करता है कि दिन समाप्त होने पर भी उसे लगता है कि आज कुछ किया ही नहीं।

और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—उसने कुछ न करते हुए भी  दिन  पूरा कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो 


आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता

आत्मविश्वास  के बाजार में मूर्खता 

आत्मविश्वास आदमी की बड़ी संपत्ति है। जिसके पास धन है, उसे धन का आत्मविश्वास होता है। जिसके पास बल है, वह अपनी भुजाओं पर भरोसा करता है। जिसके पास ज्ञान है, वह तर्क और तथ्यों के सहारे खड़ा रहता है। लेकिन इन सब आत्मविश्वासों में मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अलग है। यह न धन माँगता है, न बल और न ज्ञान। यह अपने आप पैदा होता है और बढ़ते-बढ़ते इतना विराट हो जाता है कि उसके सामने ज्ञान स्वयं असहाय दिखाई देने लगता है।

ज्ञानी व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है। मूर्ख व्यक्ति सोचने को समय की बर्बादी मानता है। ज्ञानी कहता है—‘मुझे इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है।’ मूर्ख कहता है—‘इसमें जानने जैसा है ही क्या?’ यही उसकी महानता है। उसे किसी विषय को जानने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वह पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना चुका होता है।

मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अधिक तब दिखाई देता है जब सामने प्रमाण रख दिया जाए। प्रमाण मूर्ख के लिए परेशानी की वस्तु है। वह प्रमाण को देखकर विचलित नहीं होता, बल्कि प्रमाण देने वाले की नीयत पर संदेह करने लगता है। आँकड़े गलत हो सकते हैं, किताबें पक्षपाती हो सकती हैं, वैज्ञानिक बिके हुए हो सकते हैं, विशेषज्ञ किसी साजिश का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी समझ में कभी कोई दोष नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया ने इस आत्मविश्वास को चार चाँद लगा दिए हैं। पहले किसी विषय का जानकार बनने के लिए वर्षों पढ़ना पड़ता था। अब किसी संदेश को तीन बार पढ़कर आगे भेज देना ही पर्याप्त है। सुबह आदमी डॉक्टर बनकर स्वास्थ्य सलाह देता है, दोपहर को अर्थशास्त्री बनकर महँगाई का इलाज बताता है और शाम को अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ बनकर विश्वशांति की योजना पेश कर देता है। उसकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि उसके पास मोबाइल है और उसे ‘फॉरवर्ड’ का बटन दबाना आता है।

लोकतंत्र में मूर्खता का आत्मविश्वास और भी उपयोगी सिद्ध होता है। यहाँ हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है और मूर्ख इस अधिकार का सबसे अधिक सम्मान करता है। वह बोलता है—लगातार बोलता है—और इतनी निश्चितता से बोलता है कि सुनने वाला अपने ज्ञान पर ही संदेह करने लगता है। कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित व्यक्ति वही है जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान नहीं है।

कार्यालयों में भी इसका महत्व कम नहीं। जो कर्मचारी काम जानता है, वह समस्या बताता है। जो नहीं जानता, वह समाधान बताता है। काम बिगड़ जाए तो कह देता है कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। काम बन जाए तो श्रेय उसका। इस प्रकार मूर्खता का आत्मविश्वास व्यक्ति को हर परिणाम में विजेता बनाए रखता है।

राजनीति में तो यह आत्मविश्वास वरदान है। आज कही गई बात कल बदल जाए तो कोई समस्या नहीं। चेहरे पर शिकन नहीं आनी चाहिए। जनता भूल जाएगी, रिकॉर्ड बदल जाएगा, बयान का अर्थ बदल दिया जाएगा। सबसे जरूरी है कि वक्ता स्वयं अपनी बात पर विश्वास करता हुआ दिखाई दे। आखिर जनता को सत्य नहीं, आत्मविश्वास भी तो चाहिए।

मूर्ख व्यक्ति की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि उसे कभी अपने भीतर झाँकना नहीं पड़ता। आत्ममंथन ज्ञानी की बीमारी है। मूर्ख के पास इसका समय नहीं होता। वह दूसरों की कमियाँ खोजने में व्यस्त रहता है। दुनिया गलत है, व्यवस्था गलत है, लोग गलत हैं—बस वह सही है।

इसलिए आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता सबसे महँगी बिक रही है। ज्ञान प्रमाण माँगता है, धन सुरक्षा माँगता है और बल अवसर। मूर्खता को केवल एक खुला मुँह चाहिए।

और शायद इसी कारण मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि है—क्योंकि बाकी सभी आत्मविश्वासों को कभी न कभी अपनी सीमा का पता चल जाता है, मूर्खता को अपनी सीमा का पता ही नहीं चलता।

ब्रजेश कानूनगो