बेकार आदमी के पास सबसे अधिक काम होता है
व्यस्त आदमी को देखकर हमें हमेशा लगता है कि वह बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहा है। उसके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें होती हैं, हाथ में मोबाइल होता है, कान पर फोन और चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे देश की अर्थव्यवस्था उसी के निर्णय पर टिकी हो। वह सुबह से शाम तक इधर-उधर भागता रहता है। उसके पास किसी से मिलने का समय नहीं होता, आराम करने का समय नहीं होता और कभी-कभी अपने बारे में सोचने का भी समय नहीं होता। फिर भी वह संतुष्ट रहता है कि वह व्यस्त है।
बेकार आदमी की स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है। उसके पास समय ही समय होता है और यही उसका सबसे बड़ा संकट है। समय काटना कोई साधारण काम नहीं है। व्यस्त आदमी तो अपना काम करके समय निकाल लेता है, लेकिन बेकार आदमी को समय निकालने के लिए पहले समय काटना पड़ता है। इसके लिए जिस अक्ल की आवश्यकता होती है, वह किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाई जाती।
बेकार आदमी सुबह उठकर सबसे पहले यह तय करता है कि आज उसे करना क्या नहीं है। यह निर्णय ही दिन का पहला महत्वपूर्ण कार्य होता है। इसके बाद वह मोबाइल उठाता है और संसार की सारी समस्याओं का समाधान करने निकल पड़ता है। वह उन खबरों पर टिप्पणी करता है जिन्हें उसने पढ़ा नहीं, उन विषयों पर विशेषज्ञ राय देता है जिन्हें वह समझता नहीं और उन लोगों को सलाह देता है जिन्होंने उससे सलाह मांगी ही नहीं।
सोशल मीडिया ने बेकार आदमी को समय काटने का ऐसा विराट औजार दे दिया है कि अब उसे अपने बेकार होने का अहसास भी नहीं होता। वह सुबह किसी पोस्ट पर ‘शुभ प्रभात’ लिखकर राष्ट्रनिर्माण शुरू करता है और रात को ‘शुभ रात्रि’ लिखकर राष्ट्र को विश्राम देता है। बीच में वह दर्जनों वीडियो देखता है, सैकड़ों संदेश आगे बढ़ाता है और कई महत्वपूर्ण लोगों को यह बताता है कि देश की हालत बहुत खराब है।
व्यस्त आदमी की अक्ल समस्या हल करने में लगती है, जबकि बेकार आदमी की अक्ल समस्या खोजने में। घर में सब कुछ ठीक चल रहा हो तो वह पूछेगा—इतना ठीक कैसे चल रहा है? कोई बीमार न हो तो बीमारी की संभावना तलाशेगा। पड़ोसी के घर शांति हो तो उसे शक होगा कि जरूर कोई बड़ी बात छिपाई जा रही है।
बेकार आदमी को दूसरों के काम में विशेष रुचि होती है। उसे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं कि उसकी अपनी अलमारी कब साफ होगी, लेकिन पड़ोसी ने नया पर्दा क्यों लगाया, यह राष्ट्रीय महत्व का प्रश्न है। उसे अपने खर्च का हिसाब नहीं मालूम, पर मोहल्ले में किसने कितना खर्च किया, इसकी पूरी जानकारी होती है।
हमारे समाज ने भी बेकार आदमी को कभी बेकार नहीं रहने दिया। कहीं समिति बना दी, कहीं सलाहकार मंडल, कहीं व्हाट्सऐप समूह। जिसे कोई काम नहीं मिला, उसे पद मिल गया। जिसे पद नहीं मिला, उसे प्रवक्ता बना दिया गया। जिसे प्रवक्ता भी नहीं बनाया जा सका, उसने स्वयं को विशेषज्ञ घोषित कर लिया।
दरअसल बेकारी हमेशा निष्क्रियता नहीं होती। कई बार यह अत्यधिक सक्रियता का दूसरा नाम होती है। बेकार आदमी दौड़ता बहुत है, बस किसी मंजिल की ओर नहीं जाता। वह बोलता बहुत है, पर कहता कुछ नहीं। वह व्यस्त दिखाई देने की कला में इतना निपुण हो जाता है कि कभी-कभी व्यस्त आदमी भी उससे ईर्ष्या करने लगता है।
व्यस्त आदमी के पास घड़ी होती है और बेकार आदमी के पास समय। व्यस्त आदमी समय बचाता है, बेकार आदमी समय की ऐसी धुलाई करता है कि दिन समाप्त होने पर भी उसे लगता है कि आज कुछ किया ही नहीं।
और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—उसने कुछ न करते हुए भी दिन पूरा कर दिया।
ब्रजेश कानूनगो