Monday, August 3, 2026

सोशल मीडिया के सुभाषित

सोशल मीडिया के सुभाषित

पहले सुभाषित ऋषि-मुनि लिखा करते थे। वर्षों का तप, अनुभव और जीवन-दर्शन उनमें निचुड़कर आता था। अब सुभाषित सोशल मीडिया लिखता है। उसके लिए तपस्या की आवश्यकता नहीं, केवल एक स्मार्टफोन, थोड़ा-सा डेटा और भरपूर अधैर्य चाहिए। पहले लोग नीति पढ़ते थे, अब नोटिफिकेशन पढ़ते हैं। वही आज का नया नीतिशास्त्र है।

सोशल मीडिया का पहला सुभाषित कहता है— यदि किसी पुस्तक के हाशिये पर लिखे नोट्स को इतना बड़ा कर दो कि वही पूरी किताब बन जाए, तो मूल पाठ अपने आप गायब हो जाएगा। आज किसी लेख, भाषण या बातचीत का सार समझने की फुरसत किसे है? एक वाक्य पकड़ो, आधा काटो, चौथाई चिपकाओ और फिर उस पर ऐसा रण छेड़ दो कि बेचारा मूल विचार फ्रेम से बाहर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता रह जाए।

यहाँ संवाद नहीं, धावा बोला जाता है। सोशल मीडिया का दूसरा सुभाषित है— "गालियाँ दो... पीछे पड़े रहो... मटियामेट कर दो!" तर्क अब बूढ़ी चीज़ हो गई है। प्रमाण भी पिछली सदी की आदत है। अब किसी मतभेद का सबसे आधुनिक समाधान है— उसे ट्रोल कर दो। यदि सामने वाला फिर भी बच जाए तो उसकी पुरानी पोस्टें खोद लाओ। मनुष्य के वर्तमान से नहीं, उसके डिजिटल पुरातत्त्व से न्याय किया जाएगा।

भीड़ पहले चौक-चौराहों पर इकट्ठी होती थी, अब टाइमलाइन पर होती है। फर्क इतना है कि पहले चेहरे दिखाई देते थे, अब प्रोफ़ाइल फोटो दिखाई देती है। मॉब लिंचिंग अब केवल सड़क पर नहीं होती; शब्दों से भी लोग रोज़ मारे जाते हैं। किसी के घर में दुःख आया हो तो उसे ढाढ़स बँधाने वालों से अधिक ऐसे लोग मिल जाते हैं जो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आँसू जल्दी सूख न जाएँ। दुःख जितना पारदर्शी होगा, उसे उतना ही गाढ़ा रंग देने वाले लोग मिल जाएँगे। करुणा का स्थान 'कमेंट सेक्शन' ने ले लिया है।

एक और अद्भुत खोज हुई है। अपनी लकीर बड़ी करने में मेहनत लगती है, इसलिए दूसरों की लकीर मिटा देना अधिक सुविधाजनक है। यह काम अब उँगली से हो जाता है। किसी की उपलब्धि पर संदेह कर दीजिए, किसी की भाषा में दोष निकाल दीजिए, किसी की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा दीजिए। आपके भीतर प्रतिभा हो या न हो, आलोचक होने का लाइसेंस तुरंत मिल जाता है। सोशल मीडिया ने यह लोकतंत्र सबको दे दिया है।

मित्रता भी अब बड़ी विचित्र वस्तु हो गई है। पाँच हजार मित्रों का स्वामी व्यक्ति कभी-कभी अस्पताल के बाहर अकेला खड़ा दिखाई देता है। जो रोज़ मानवता, समाजवाद, क्रांति और संवेदना की पोस्टें लिखता है, उससे यदि एक शाम घर बदलवाने या रक्तदान की विनती कर दीजिए तो उसका मोबाइल प्रायः 'नेटवर्क से बाहर' हो जाता है। तब याद आता है कि जीवन में अभी भी 'लँगोटिया यार' जैसी एक पुरानी तकनीक बची हुई है, जिसका कोई डिजिटल विकल्प नहीं बना।

और सेल्फी! यह आधुनिक दर्शन का सर्वोच्च अध्याय है। कैमरा हमें सिखाता है कि यदि अपना चेहरा सबसे बड़ा दिखाना है तो बाकी सबको छोटा कर दीजिए। परिणाम यह होता है कि पीछे खड़ा ताजमहल भी ऐसा लगता है जैसे किसी ने गलती से फोटो में घुसने की कोशिश कर दी हो। तस्वीर विकृत हो जाती है, पर टिप्पणियाँ फिर भी आती हैं— "वाह!", "लाजवाब!", "क्या पर्सनैलिटी है!" सोशल मीडिया पर प्रशंसा कभी-कभी सौंदर्यबोध से नहीं, सामाजिक कर्तव्यबोध से जन्म लेती है।

सोशल मीडिया का संसार बड़ा उदार है। यहाँ हर व्यक्ति न्यायाधीश भी है, अभियोजक भी, इतिहासकार भी और भविष्यवक्ता भी। केवल एक पद रिक्त है— श्रोता। सुनने का विभाग शायद किसी अपडेट में हट गया है।

फिर भी दोष अकेले सोशल मीडिया का नहीं है। आईना कभी चेहरा नहीं बनाता, केवल दिखाता है। यदि हमारे भीतर अधैर्य, अहंकार, ईर्ष्या और भीड़ का रोमांच भरा है, तो स्क्रीन पर वही चमकेगा। और यदि भीतर थोड़ा-सा विवेक, थोड़ा-सा हास्य और थोड़ी-सी मनुष्यता बची है, तो वही पोस्टों के बीच कहीं मुस्कुराती मिलेगी।

इसलिए आज का सबसे उपयोगी सोशल मीडिया सुभाषित शायद यही होना चाहिए— पोस्ट करने से पहले एक बार पढ़ लीजिए, और टिप्पणी करने से पहले एक बार स्वयं को पढ़ लीजिए। दोनों में यदि थोड़ा-सा भी अंतर दिखाई दे जाए, तो समझिए अभी मनुष्य पूरी तरह ऑफ़लाइन नहीं हुआ है।

ब्रजेश कानूनगो