Monday, August 10, 2026

महाराज श्रृंखला : 12 समन्वय का महाअभियान

 महाराज श्रृंखला : 12

समन्वय का महाअभियान

खनन स्थल की ओर महाराज का काफिला आगे बढ़ा तो उसके पीछे धूल का एक ऐसा बादल उठने लगा, जैसे विकास स्वयं अपने आने की घोषणा कर रहा हो। आगे-आगे पुलिस की गाड़ियां थीं, उनके पीछे प्रशासनिक अधिकारियों की गाड़ियां, फिर खनन कम्पनी के अधिकारी, उसके बाद स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के वाहन और सबसे पीछे कुछ पत्रकारों की गाड़ियां थीं।

महाराज की गाड़ी सबसे बीच में थी।

रियासत में व्यवस्था हमेशा इसी तरह चलती थी। जो सबसे महत्वपूर्ण होता था, वह बीच में रहता था और जो सबसे ज्यादा दिखाई देता था, वह सबसे आगे।

सड़क के दोनों ओर वनवासी खड़े होकर महाराज का स्वागत कर रहे थे। किसी के हाथ में फूल थे, किसी के हाथ में पत्तियों की डालियां और कुछ लोग अपनी खाली हथेलियां ही जोड़कर खड़े थे। खाली हथेलियों को देखकर महाराज को क्षणभर के लिए लगा कि शायद ये लोग बहुत सरल और संतोषी हैं।

फिर उन्होंने अपने सचिव से पूछा—

“इनके हाथों में कुछ दिया क्यों नहीं गया?”

सचिव ने धीरे से कहा—

“महाराज, सबको ग्राम भोज में भोजन मिलना है।”

महाराज संतुष्ट हो गए।

रियासत में भूख का समाधान भोजन से और प्रश्नों का समाधान घोषणा से किया जाता था।

खनन स्थल पर पहुंचते ही महाराज के स्वागत के लिए एक विशाल तोरण बनाया गया था। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

‘स्वर्ण समृद्धि परियोजना : पाषाण पुष्प के स्वर्णिम भविष्य की ओर एक ऐतिहासिक कदम।’

महाराज ने तोरण को देखा और प्रसन्न हुए।

“बहुत अच्छा लिखा है।”

राजकवि ज्ञानरिपु ने विनम्रता से कहा—

“महाराज, इसमें ‘सर्वांगीण समावेशी सतत समृद्धि’ भी जोड़ दिया जाए तो भविष्य और भी उज्ज्वल हो सकता है।”

महाराज ने तत्काल स्वीकृति दे दी।

उन्हें भविष्य की चिंता बहुत थी।

वर्तमान तो उनके नियंत्रण में था।

शिलान्यास के लिए मंच तैयार था। मंच पर एक ओर संतश्री रगडू महाराज विराजमान थे और दूसरी ओर गोपाल सेठ। उनके बीच खनन कम्पनी के प्रबंध निदेशक प्रशांत कुमार बैठे थे। तीनों के बीच ऐसी आत्मीयता दिखाई दे रही थी जैसे वे बहुत पुराने परिचित हों।

हालांकि गांव के लोग जानते थे कि तीनों की पहली औपचारिक मुलाकात कुछ महीने पहले ही हुई थी।

लेकिन कारोबार में परिचय का इतिहास बहुत लंबा रखने की आवश्यकता नहीं होती। लाभ का अनुमान हो तो संबंध तत्काल प्राचीन हो जाते हैं।

महाराज ने मंच पर पहुंचकर सबसे पहले संतश्री के चरण स्पर्श किए। फिर गोपाल सेठ से हाथ मिलाया। प्रशांत कुमार ने झुककर महाराज को प्रणाम किया।

महाराज ने तीनों की ओर देखते हुए कहा—

“यही है हमारा समन्वय।”

तालियां बजीं।

किसी ने पूछा नहीं कि समन्वय किस-किस का है।

पूछने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी।

महाराज ने शिलापट्ट का अनावरण किया। पर्दा हटते ही उस पर खुदे अक्षर चमक उठे—

‘पाषाण पुष्प स्वर्ण उत्खनन परियोजना—जनहित में समर्पित।’

जनहित शब्द देखकर एक वनवासी बूढ़ा मुस्कुराया।

उसने अपने पास खड़े युवक से पूछा—

“जनहित कौन है?”

युवक ने कहा—

“पता नहीं बाबा। शायद कोई बड़ा आदमी होगा।”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“बड़ा आदमी ही होगा। हमारा हित तो हमें दिखाई नहीं देता।”

उधर मंच पर महाराज ने नारियल फोड़ा।

नारियल फूटा।

फोटोग्राफरों के कैमरे चमके।

परियोजना आरम्भ हो गई।

उसी शाम राजधानी में महाराज के निजी सचिवालय में एक छोटी-सी बैठक हुई।

बैठक छोटी थी, पर विषय बहुत बड़ा था।

मेज के एक ओर महाराज के विश्वस्त अधिकारी बैठे थे। दूसरी ओर गोपाल सेठ, प्रशांत कुमार और रियासत के कुछ प्रमुख व्यापारी। संतश्री का प्रतिनिधि भी उपस्थित था।

बैठक को सरकारी कागजों में ‘परियोजना समन्वय समिति की अनौपचारिक बैठक’ कहा जाना था।

अनौपचारिक इसलिए कि इसकी कोई कार्यवाही नहीं होनी थी।

और समन्वय इसलिए कि सबको अपने-अपने हिस्से का काम समझना था।

गोपाल सेठ ने धीरे से कहा—

“महाराज, परियोजना में कुछ प्रशासनिक अड़चनें आ सकती हैं।”

“कैसी अड़चनें?”

“पर्यावरण, भूमि, पुनर्वास, अनुमति... कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं।”

महाराज ने गंभीर होकर कहा—

“जनहित के कार्य में अड़चन डालना उचित नहीं है।”

प्रशांत कुमार ने कहा—

“महाराज, कम्पनी सारे नियमों का पालन करेगी।”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

“नियमों का पालन होना चाहिए।”

कमरे में थोड़ी देर मौन रहा।

फिर महाराज ने मुस्कुराकर कहा—

“और नियमों की व्याख्या भी समयानुकूल होनी चाहिए।”

सभी मुस्कुराए।

राजकवि वहां नहीं थे, इसलिए अनुप्रास का कोई नया शब्द नहीं बना।

लेकिन सचिव ने तुरंत अपनी डायरी में लिख लिया—

‘नियमसम्मत, नियमनिष्ठ, राष्ट्रहितकारी त्वरित समन्वय।’

गोपाल सेठ ने आगे कहा—

“महाराज, कम्पनी चाहती है कि स्थानीय लोगों के लिए एक सामाजिक विकास कोष भी बनाया जाए।”

“बहुत अच्छा।”

“उस कोष से स्कूल, अस्पताल, पेयजल, सड़क और कौशल विकास जैसे काम किए जा सकते हैं।”

महाराज प्रसन्न हुए।

“यही तो हम चाहते हैं। विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें कम्पनी भी आगे बढ़े और जनता भी।”

प्रशांत कुमार ने विनम्रता से कहा—

“कम्पनी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

यह सुनकर संतश्री के प्रतिनिधि ने पहली बार मुंह खोला—

“आश्रम भी सहयोग करेगा।”

महाराज ने पूछा—

“कैसे?”

“आश्रम लोगों को समझाएगा कि परियोजना उनके कल्याण के लिए है।”

महाराज ने मेज पर हाथ रखकर कहा—

“यही तो चाहिए। सरकार नीति बनाए, कम्पनी विकास करे, संत समाज को समझाएं और समाज सरकार पर विश्वास रखे।”

गोपाल सेठ ने मुस्कुराकर कहा—

“और व्यापारी?”

महाराज भी मुस्कुराए।

“व्यापारी तो व्यवस्था को गति देगा।”

कमरे में फिर हंसी गूंजी।

व्यवस्था को गति देने वाले पहिए कौन थे और उस गति की कीमत कौन चुका रहा था, यह सवाल बैठक की कार्यवाही में शामिल नहीं किया गया।

कुछ ही दिनों बाद ‘जनहित विकास कोष’ का गठन हो गया।

कागजों में उसका उद्देश्य बहुत पवित्र था।

उससे विद्यालय बनेंगे।

अस्पताल बनेंगे।

सड़कें बनेंगी।

पानी पहुंचेगा।

वनवासियों के बच्चों को छात्रवृत्ति मिलेगी।

महिलाओं को रोजगार मिलेगा।

और सबसे महत्वपूर्ण—परियोजना के कारण प्रभावित होने वाले परिवारों का जीवन पहले से बेहतर होगा।

रियासत के अखबारों में अगले दिन इसका पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छपा।

विज्ञापन का खर्च कम्पनी ने उठाया।

विज्ञापन में महाराज की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी।

नीचे लिखा था—

‘सरकार और समाज की साझी पहल।’

साझेदारी का यह नया मॉडल बहुत सफल रहा।

सरकार अनुमति देती थी।

कम्पनी पैसा देती थी।

मीडिया खबर देता था।

संत आशीर्वाद देते थे।

राजनीतिज्ञ उद्घाटन करते थे।

और जनता विकास का इंतजार करती थी।

सबका काम बंट गया था।

सिर्फ भ्रष्टाचार का कोई अलग विभाग नहीं बनाया गया था।

उसकी आवश्यकता भी नहीं थी।

वह सभी विभागों के बीच समन्वित रूप से काम कर रहा था।

कुछ महीनों बाद परियोजना के विस्तार का प्रस्ताव आया।

मूल स्वीकृत क्षेत्र से अधिक भूमि की आवश्यकता बताई गई।

प्रशांत कुमार ने अधिकारियों को समझाया कि यदि अतिरिक्त क्षेत्र नहीं मिला तो परियोजना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं रहेगी।

अधिकारियों ने फाइल देखी।

फाइल में ‘आर्थिक व्यवहार्यता’ शब्द देखकर उनकी चिंता समाप्त हो गई।

जनहित के बाद आर्थिक व्यवहार्यता वह दूसरा शब्द था जिसके सामने बहुत-से प्रश्न स्वयं छोटे हो जाते थे।

अतिरिक्त भूमि के लिए नई अधिसूचना जारी हुई।

कुछ वनवासियों ने आपत्ति की।

उन्होंने कहा—

“यह हमारी जमीन है।”

अधिकारी ने समझाया—

“नहीं, यह विकास की जमीन है।”

उन्होंने कहा—

“यह जंगल है।”

अधिकारी ने कहा—

“नहीं, यह खनिज क्षेत्र है।”

उन्होंने कहा—

“यह हमारे पुरखों की जगह है।”

अधिकारी ने कहा—

“कृपया भावुक न हों। मुआवजा मिलेगा।”

वनवासी ने पूछा—

“मुआवजे में जंगल मिलेगा?”

अधिकारी चुप हो गया।

फिर बोला—

“उसकी व्यवस्था अलग से होगी।”

रियासत में हर समस्या की एक अलग व्यवस्था थी।

बस समाधान अक्सर एक ही होता था—

किसी और को लाभ।

इधर राजधानी में चुनाव नजदीक आ रहे थे।

महाराज को प्रजा की याद अचानक अधिक आने लगी थी।

गोपाल सेठ ने एक शाम महाराज से कहा—

“महाराज, चुनाव के समय जनता को विकास दिखाई देना चाहिए।”

“दिखेगा।”

“सड़कें?”

“बनेंगी।”

“रोजगार?”

“घोषित होगा।”

“कुछ बड़े कार्यक्रम?”

“करेंगे।”

गोपाल सेठ ने थोड़ा रुककर कहा—

“और सहयोग?”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

दोनों कुछ क्षण मौन रहे।

इस मौन में वर्षों की राजनीति, व्यापार और परस्पर विश्वास का अनुभव था।

गोपाल सेठ ने कोई रकम नहीं बताई।

महाराज ने कोई मांग नहीं रखी।

दोनों ने कुछ कहा ही नहीं।

फिर भी सब समझ लिया गया।

यही अप्रत्यक्ष गठबंधन की सबसे बड़ी विशेषता थी।

इसमें समझौते लिखे नहीं जाते थे।

वे समझे जाते थे।

चुनाव से कुछ दिन पहले ‘जनहित विकास कोष’ से कई नई घोषणाएं हुईं।

एक अस्पताल की आधारशिला रखी गई।

एक विद्यालय का उद्घाटन हुआ।

महिलाओं के लिए सिलाई केंद्र खुला।

युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम शुरू हुआ।

इन सभी कार्यक्रमों के मंच पर महाराज की तस्वीर थी।

कम्पनी का नाम कहीं छोटा-सा था।

संतश्री का नाम उससे थोड़ा बड़ा।

गोपाल सेठ का नाम आयोजक के रूप में नीचे।

और जनता का नाम सबसे ऊपर—

‘जनता की सेवा में समर्पित।’

महाराज ने उद्घाटन समारोह में कहा—

“हम राजनीति को सेवा का माध्यम मानते हैं।”

पीछे खड़े गोपाल सेठ ने धीरे से प्रशांत कुमार से कहा—

“और कारोबार को राजनीति का।”

प्रशांत कुमार ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—

“दोनों मिल जाएं तो सेवा अपने आप हो जाती है।”

दोनों हंस पड़े।

उनकी हंसी मंच तक नहीं पहुंची।

लेकिन मंच पर खड़े महाराज को शायद उसका अर्थ सुनाई दे गया था।

उन्होंने भाषण में तुरंत एक नया वाक्य जोड़ दिया—

“हमारे यहां राजनीति और व्यवसाय परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण के पूरक हैं।”

तालियां बजीं।

किसी ने यह नहीं पूछा कि राष्ट्रनिर्माण में किसका कितना हिस्सा है और राष्ट्र की जमीन में किसका कितना।

कुछ समय बाद एक पत्रकार ने इस पूरे प्रकरण पर सवाल उठाने का साहस किया।

उसने पूछा—

“महाराज, क्या यह सही है कि खनन कम्पनी को सरकार से कई महत्वपूर्ण रियायतें मिली हैं और उसी कम्पनी से जुड़े लोग सामाजिक विकास तथा राजनीतिक कार्यक्रमों को आर्थिक सहयोग भी दे रहे हैं?”

महाराज मुस्कुराए।

“आप बहुत अच्छी बात पूछ रहे हैं।”

पत्रकार प्रसन्न हुआ।

महाराज ने आगे कहा—

“व्यवसायी यदि समाजसेवा करता है तो क्या वह अपराध है?”

“नहीं।”

“सरकार यदि विकास के लिए उद्योग को सुविधा देती है तो क्या वह अपराध है?”

“नहीं।”

“संत यदि समाज को विकास के पक्ष में समझाते हैं तो क्या वह अपराध है?”

“नहीं।”

“और जनता यदि विकास चाहती है तो क्या उसे अपराधी कहा जाएगा?”

पत्रकार चुप रहा।

महाराज ने निष्कर्ष दिया—

“फिर समस्या कहां है?”

सभा में तालियां बजीं।

पत्रकार ने अपनी डायरी बंद कर दी।

उसे पहली बार समझ में आया कि भ्रष्टाचार हमेशा चोरी की तरह दिखाई नहीं देता।

कभी-कभी वह विकास की तरह आता है।

कभी सेवा की तरह।

कभी धर्म की तरह।

कभी दान की तरह।

कभी चुनावी सहयोग की तरह।

और कभी-कभी वह इतने सारे अच्छे शब्दों के बीच बैठा होता है कि उसे पहचानना ही अशिष्टता माना जाता है।

उस रात महाराज अपने महल की छत पर खड़े होकर दूर शहर की रोशनी देख रहे थे।

सचिव ने आकर पूछा—

“महाराज, आज का दिन कैसा रहा?”

महाराज ने कहा—

“बहुत अच्छा।”

“परियोजना?”

“चल रही है।”

“कम्पनी?”

“संतुष्ट है।”

“संतश्री?”

“प्रसन्न हैं।”

“गोपाल सेठ?”

महाराज कुछ क्षण चुप रहे।

फिर मुस्कुराए—

“वह तो अपना आदमी है।”

सचिव ने पूछा—

“और प्रजा?”

महाराज ने दूर अंधेरे में देखा।

“प्रजा?”

कुछ देर बाद बोले—

“उसके लिए अगली सभा में एक नई घोषणा कर देंगे।”

सचिव ने डायरी खोली।

“क्या घोषणा लिखूं, महाराज?”

महाराज ने आकाश की ओर देखा।

“कुछ ऐसा लिखो जिसमें विकास भी हो, विश्वास भी हो, व्यवस्था भी हो और समृद्धि भी।”

सचिव ने पूछा—

“और पारदर्शिता?”

महाराज ने पहली बार गंभीर होकर उसकी ओर देखा।

“वह भी लिख देना।”

“कहां?”

महाराज मुस्कुराए—

“वहीं, जहां दिखाई तो दे... पर दिखाई न दे।”

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