Tuesday, August 18, 2026

महाराज श्रृंखला 13 : गुरुमंत्र का विस्तार

महाराज श्रृंखला 13 : गुरुमंत्र का विस्तार

रियासतें इतिहास की किताबों में जितनी जल्दी समाप्त होती हैं, उतनी जल्दी उनके संस्कार समाप्त नहीं होते। राजतंत्र का औपचारिक विलय लोकतंत्र में हो सकता है, पर राजसी आदतों का विलय होने में कई पीढ़ियाँ लगती हैं। और कभी-कभी तो वे लोकतंत्र में इस तरह घुल-मिल जाती हैं कि लोकतंत्र को ही पता नहीं चलता कि उसके भीतर कौन-सी चीज राजतंत्र है और कौन-सी प्रजा।

महाराज की रियासत भी अंततः लोकतांत्रिक देश में विलीन हो गई। राजमहल के ऊपर फहराता राजचिह्न उतार लिया गया। हाथी-घोड़ों की जगह सरकारी मोटरें आ गईं। दरबार समाप्त हुआ और जनता का शासन आरंभ हो गया।

बस एक छोटी-सी समस्या थी।

महाराज को किसी ने यह नहीं बताया था कि अब वे महाराज नहीं रहे।

सरकार ने शायद यह बात बताने की आवश्यकता भी नहीं समझी। लोकतंत्र में बड़े लोगों को बहुत-सी बातें बताने की जरूरत नहीं होती। वे अपने अनुभव और पुराने संपर्कों से स्वयं समझ लेते हैं कि नई व्यवस्था में पुराने पदों के नए नाम क्या हो सकते हैं।

कुछ ही दिनों बाद राजधानी से समाचार आया कि महाराज को राज्य मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री बनाया जा रहा है।

राजमहल में उत्सव का वातावरण था।

काक दन्त ने सबसे पहले महाराज को बधाई दी।

“हुजूर! अब तो रियासत का ज्ञान पूरे प्रदेश में फैलेगा।”

महाराज मुस्कुराए।

“ज्ञान फैलाना हमारा पुराना काम है।”

“जी हुजूर। पहले आप राजाज्ञा से फैलाते थे, अब शासनादेश से फैलाइएगा।”

महाराज ने उसे घूरकर देखा। काक दन्त तुरंत संभल गया।

“मेरा आशय है कि शिक्षा का विभाग आपके हाथ में आना प्रदेश का सौभाग्य है।”

शिक्षा मंत्री के रूप में महाराज का पहला कार्यक्रम राजमहल के पुराने दरबार हॉल में ही आयोजित हुआ। फर्क केवल इतना था कि जहां पहले दरबारियों की पंक्ति लगती थी, वहां अब अधिकारियों की पंक्ति थी और जहां पहले राजदंड रखा रहता था, वहां अब सरकारी फाइलों का ढेर था।

महाराज ने फाइलों को देखा।

“इनमें से कितनी महत्वपूर्ण हैं?”

शिक्षा सचिव ने कहा, “लगभग सभी, मान्यवर।”

महाराज ने सहजता से कहा, “तो फिर इन्हें पढ़ने की आवश्यकता नहीं। महत्वपूर्ण चीजें पढ़ने में समय बहुत लगता है। सारांश बताइए।”

सचिव ने राहत की सांस ली।

लोकतंत्र को एक और कुशल प्रशासक मिल गया था।

इसी बीच ज्ञानरिपु का भी भाग्योदय हुआ।

राजकवि ज्ञानरिपु को राज्य साहित्य परिषद का अध्यक्ष मनोनीत कर दिया गया।

इस नियुक्ति का समाचार सुनकर वे कुछ देर तक कुर्सी पर बैठे रहे। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। कल तक वे महाराज के भाषण लिखते थे और आज साहित्य का भविष्य लिखने वाली संस्था के अध्यक्ष बना दिए गए थे।

उन्होंने सबसे पहले अपने गुरु आचार्य विद्यादमन को प्रणाम किया।

“गुरुदेव! आपका गुरुमंत्र काम कर गया।”

आचार्य मुस्कुराए।

“मैंने कहा था न, स्वतंत्र विचारों को मन के ताम्रपात्र में बंद करके रख दो। देखो, अब वही ताम्रपात्र तुम्हें अध्यक्ष की कुर्सी पर ले आया।”

ज्ञानरिपु ने विनम्रता से पूछा, “लेकिन गुरुदेव, साहित्य परिषद का काम तो साहित्य की स्वतंत्रता, प्रश्नाकुलता और सत्ता से असहमति को प्रोत्साहित करना भी है।”

गुरु ने चश्मा ठीक किया।

“बिल्कुल।”

“तो फिर?”

“तो फिर तुम अध्यक्ष हो। तुम्हें तय करना है कि स्वतंत्रता कितनी स्वतंत्र होनी चाहिए।”

ज्ञानरिपु ने सिर झुका लिया।

गुरुमंत्र का विस्तार हो चुका था।

नई सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में बड़े सुधारों की घोषणा की। महाराज ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि संस्कार देना है।

एक पत्रकार ने पूछ लिया, “मंत्री जी, किस तरह के संस्कार?”

महाराज ने कहा, “जो व्यवस्था के अनुकूल हों।”

पत्रकार ने फिर पूछा, “और जो व्यवस्था पर प्रश्न उठाएं?”

महाराज ने मुस्कुराकर कहा, “वह शोध का विषय है।”

प्रेस कांफ्रेंस समाप्त हो गई।

साहित्य परिषद में भी नई ऊर्जा का संचार हुआ। ज्ञानरिपु ने अध्यक्ष पद संभालते ही घोषणा की कि परिषद साहित्य में नए मूल्यों की स्थापना करेगी।

उन्होंने कहा, “साहित्य समाज का दर्पण है।”

एक सदस्य ने पूछा, “दर्पण में चेहरा जैसा है वैसा ही दिखाई देगा न?”

ज्ञानरिपु ने उसकी ओर देखा।

“दर्पण परिषद द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।”

सदस्य चुप हो गया।

अगले महीने साहित्य परिषद ने ‘राष्ट्रीय साहित्यिक उत्कर्ष’ पर एक संगोष्ठी आयोजित की। विषय था—“साहित्य और राष्ट्र निर्माण।”

उद्घाटन भाषण शिक्षा मंत्री महाराज ने दिया।

उन्होंने कहा—

“साहित्यकारों का काम समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। उन्हें ऐसी रचनाएं करनी चाहिए जिनसे जनता में आशा, विश्वास और विकास की भावना पैदा हो।”

तालियां बजीं।

ज्ञानरिपु सबसे जोर से ताली बजा रहे थे।

उन्हें अपना पहला भाषण याद आ गया—वही पाषाण पुष्प वाला भाषण, जिसमें जंगल के नीचे दबे स्वर्ण को निकालने के लिए जंगल के ऊपर खड़े लोगों को समझाया गया था कि यह सब उनके ही हित में है।

आज उन्हें लगा कि गुरुमंत्र केवल एक भाषण लिखने के लिए नहीं था।

वह तो करियर बनाने का मंत्र था।

संगोष्ठी के बाद एक युवा कवि ने ज्ञानरिपु से पूछा—

“अध्यक्ष जी, क्या साहित्य को सत्ता से सवाल नहीं करना चाहिए?”

ज्ञानरिपु ने उसे स्नेह से देखा।

“करना चाहिए।”

युवा कवि प्रसन्न हुआ।

“सच?”

“हाँ। मगर पहले यह देख लेना चाहिए कि सवाल पूछने का समय उपयुक्त है या नहीं।”

“और उपयुक्त समय कब आता है?”

ज्ञानरिपु ने कहा—

“जब सत्ता स्वयं सवाल पूछने को कहे।”

युवा कवि ने उस दिन पहली बार समझा कि साहित्य परिषद की अध्यक्षता साहित्य से अधिक समय की समझ मांगती है।

उधर शिक्षा मंत्री महाराज ने पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन का प्रस्ताव रखा।

इतिहास की किताबों में रियासत का अध्याय छोटा कर दिया गया था, पर महाराज के शासनकाल का अध्याय विशेष रूप से विस्तृत किया जाना था।

एक अधिकारी ने साहस करके पूछा—

“मान्यवर, लोकतंत्र में व्यक्ति से अधिक संस्थाओं का महत्व नहीं होना चाहिए?”

महाराज ने कहा—

“बिल्कुल होना चाहिए।”

“तो फिर आपका अध्याय इतना बड़ा क्यों?”

महाराज ने गंभीर होकर उत्तर दिया—

“क्योंकि यह संस्था के विकास का ऐतिहासिक प्रमाण है।”

अधिकारी ने फाइल बंद कर दी।

लोकतंत्र में तर्क का भी एक राजकीय पद होता है—वह परिस्थिति देखकर छुट्टी पर चला जाता है।

धीरे-धीरे लोगों ने देखा कि महाराज के पुराने दरबारी अब सरकारी समितियों में दिखाई देने लगे हैं। पुराने प्रशंसक सलाहकार बन गए थे। पुराने भाट सांस्कृतिक संस्थाओं में नियुक्त हो गए थे। और पुराने राजकवि अब साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे।

राजतंत्र समाप्त हो चुका था।

केवल उसकी नियुक्तियां बची थीं।

एक दिन ज्ञानरिपु फिर गुरु के पास पहुंचे।

“गुरुदेव, एक बात समझ में नहीं आ रही।”

“क्या?”

“अब महाराज राजा नहीं हैं, फिर भी सब कुछ पहले जैसा क्यों लगता है?”

आचार्य विद्यादमन ने गहरी सांस ली।

“रिपु, तुम्हे अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।”

“क्या?”

“राजा का पद समाप्त हो सकता है। राजकीय मानसिकता का नहीं।”

ज्ञानरिपु चुप रहे।

गुरु ने आगे कहा—

“और याद रखो, लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह पुराने राजा को हटाकर नया राजा नहीं बनाता।”

ज्ञानरिपु ने राहत की सांस ली।

गुरु बोले—

“वह पुराने राजा को नया पद दे देता है।”

ज्ञानरिपु ने सिर झुका लिया।

उन्हें लगा, इतिहास सचमुच बहुत कठिन विषय है।

खासकर तब, जब उसे पढ़ाने वाला शिक्षा मंत्री स्वयं उसका पात्र हो।

और साहित्य परिषद का अध्यक्ष उसका कवि।


ब्रजेश कानूनगो 

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