Monday, August 10, 2026

दिखाई नहीं देती फूलों की धार

दिखाई नहीं देती फूलों की धार 

आजकल धार की बड़ी पूछ है।

हर चीज में धार चाहिए—भाषण में धार, बयान में धार, बहस में धार, ट्वीट में धार और सबसे बढ़कर विरोधी के चरित्र पर लगाए गए आरोपों में धार। धार नहीं है तो समझिए आपकी बात में जान नहीं है। आप कितने ही सही क्यों न हों, यदि आपकी बात से किसी की गर्दन न झुके तो आपकी बात किस काम की?

इसलिए हमने धार का मतलब भी बदल दिया है।

पहले धार हथियार में होती थी। अब धार भाषा में होती है। फर्क इतना है कि पहले तलवार दिखाई देती थी, अब शब्द दिखाई नहीं देते। तलवार से बचने के लिए आदमी पीछे हट सकता था, शब्दों से बचने के लिए मोबाइल बंद करना पड़ता है। लेकिन मोबाइल बंद कर देने से भी शब्द कहाँ बंद होते हैं! वे स्क्रीन से उतरकर पड़ोस की बातचीत में, चाय की दुकान पर और फिर परिवार के व्हाट्सऐप समूह में पहुँच जाते हैं।

वहाँ उनकी धार और तेज हो जाती है।


हालाँकि हर धार चमकती नहीं।

कुएँ की रस्सी को देखिए। वह बेचारा वर्षों से पत्थर से रगड़ खा रहा है। न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है, न अपनी उपलब्धियों का विज्ञापन। बस पानी निकालने के लिए आती-जाती रहती है। लेकिन लगातार रगड़ खाते-खाते पत्थर के सीने पर अपनी लकीर छोड़ देती है।

यह धार हमें पसंद नहीं।

क्योंकि इसमें न शोर है, न उद्घोषणा।

आजकल उपलब्धि वही मानी जाती है जिसकी घोषणा की जा सके। आपने चुपचाप किसी की मदद कर दी—यह खबर नहीं। आपने मदद करने से पहले कैमरा बुला लिया—अब यह उपलब्धि है।

किसी ने जीवन भर ईमानदारी से काम किया—किसी को पता नहीं।

किसी ने ईमानदारी पर भाषण दे दिया—तालियाँ बजने लगती हैं।

हमारा समय काम से अधिक उसके प्रचार की धार पहचानता है।


फिर भी कुछ चीजें हैं जिनका प्रचार नहीं किया जा सकता।

मसलन सर्दियों की हवा।

वह आती है और बिना किसी अनुमति के देह काटने लगती है। उसके पास कोई हथियार नहीं। फिर भी हम काँपने लगते हैं।

प्रकृति की यह पुरानी आदत है—वह प्रमाणपत्र लेकर नहीं आती।

हवा अमीर के घर में भी प्रवेश करती है और गरीब की झोपड़ी में भी। फर्क सिर्फ इतना है कि अमीर के कमरे में उसका मुकाबला हीटर करता है और गरीब के शरीर को हीटर समझ लिया जाता है।


इसी तरह भूख की भी धार होती है।

वह किसी संसद में भाषण नहीं देती। कोई नारा नहीं लगाती। बस पेट में धीरे-धीरे बजती रहती है। लेकिन पेट की वह आवाज कभी-कभी सत्ता के सबसे ऊँचे भाषण से अधिक तीखी होती है।

इसलिए भूख को आँकड़ों में बदल देना सुविधाजनक है।

भूख को संख्या बना दीजिए।

संख्या को रिपोर्ट बना दीजिए।

रिपोर्ट को समिति के हवाले कर दीजिए।

समिति को अगले वित्तीय वर्ष के हवाले कर दीजिए।

तब तक भूख स्वयं ही किसी दूसरी सूची में चली जाएगी।

जंगल में घायल जानवर की चीख भी कुछ ऐसी ही है।

वह किसी हत्यारे की तलवार से अधिक धारदार होती है। तलवार केवल शरीर को काटती है, चीख सुनने वाले के भीतर कुछ काटती है।


हमने चीखों के साथ भी सुविधा का व्यवहार सीख लिया है।

किसी की चीख को ‘शोर’ कह दो।

किसी की पीड़ा को ‘नकारात्मकता’ कह दो।

किसी के सवाल को ‘विकास विरोधी मानसिकता’ कह दो।

और यदि वह फिर भी चुप न हो तो कह दो कि वह किसी के इशारे पर बोल रहा है।

अब आदमी को चुप कराने के लिए उसका मुँह बंद करना जरूरी नहीं। उसके बोलने की विश्वसनीयता बंद कर देना पर्याप्त है।

यही आधुनिक धार है।


कबीर होते तो शायद इस समय बहुत परेशान होते।

उन्होंने बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी थी। सीधे आदमी से सवाल करते थे। न किसी चैनल की अनुमति लेते थे, न किसी प्रवक्ता की सलाह। उनकी भाषा में ऐसी धार थी कि आदमी अपने भीतर झाँकने को मजबूर हो जाता था।

आज आदमी भीतर झाँकने से बचता है।

उसे आईना चाहिए, लेकिन ऐसा आईना जिसमें चेहरा अच्छा दिखाई दे।

कबीर का आईना खतरनाक था।

उसमें चेहरा ही नहीं, चरित्र भी दिखाई देता था।

इसलिए कबीर को पढ़ना आसान है, कबीर को मानना कठिन।

हमने उनके दोहे बचा लिए हैं, उनके सवाल छोड़ दिए हैं।

यही हमारी संस्कृति की सुविधा है।


हम विचारों की माला बनाकर पहन लेते हैं, विचारों को जीवन में उतारने की जरूरत नहीं समझते।

फूलों के साथ भी हमने यही किया।

फूल को पूजा में रख दिया।

मूर्ति पर चढ़ा दिया।

नेता के गले में डाल दिया।

शहीद की तस्वीर पर रख दिया।

और फिर फूल को भूल गए।

फूल बहुत खतरनाक चीज है।

वह किसी को घायल करने के लिए नहीं खिलता, फिर भी घायल मनुष्य के पास जाकर बैठ जाता है।

वह किसी से बदला नहीं लेता, फिर भी हिंसा पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।

इसीलिए इतिहास में कई बार फूलों ने तलवारों को शर्मिंदा किया है।


एक हाथ में पत्थर हो तो सत्ता को पुलिस मिल जाती है।

एक हाथ में बंदूक हो तो सरकार को कानून मिल जाता है।

लेकिन एक हाथ में फूल हो तो?

यह समस्या है।

फूल के विरुद्ध कौन-सी धारा लगाएँ?

‘अत्यधिक सुगंध फैलाने’ की?

‘शांति भंग करने’ की?

‘अहिंसा के माध्यम से व्यवस्था को असहज करने’ की?

या फिर फूल को भी किसी संगठन का सदस्य घोषित कर दें?

हमारे समय में यह भी संभव है।


फूल यदि अकेला है तो संदिग्ध है।

उसके पीछे कौन है, यह जानना जरूरी है।

उसने फूल क्यों पकड़ा?

किसने दिया?

कहाँ से खरीदा?

किस विचारधारा की नर्सरी में उगा?

फूल का चरित्र प्रमाणपत्र कहाँ है?

फूल बेचारा सोचता होगा—मैं तो बस फूल हूँ।

लेकिन आजकल सिर्फ फूल होना पर्याप्त नहीं है।

आपको अपना पक्ष भी बताना पड़ता है।

फिर भी फूल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पक्ष नहीं चुनता।

वह मंदिर में भी खिल सकता है, कब्रिस्तान में भी।

प्रेमी के हाथ में भी जा सकता है, शहीद की तस्वीर पर भी।

वह किसी पार्टी का नहीं होता।

शायद इसीलिए वह मनुष्य का होता है।

और यहीं से उसकी असली धार शुरू होती है।


आज जब हर बात को पक्ष और विपक्ष में बाँटने की कोशिश हो रही है, तब एक फूल कहता है—मैं किसी पक्ष में नहीं, जीवन के पक्ष में हूँ।

जब हर चीख को शोर कहा जा रहा है, फूल कहता है—पहले सुनो।

जब हर असहमति को दुश्मनी कहा जा रहा है, फूल कहता है—असहमति भी मनुष्य की भाषा है।

जब हिंसा को शक्ति समझा जा रहा है, फूल कहता है—शक्ति वह भी है जो चोट किए बिना तुम्हें बदल दे।

और शायद इसी कारण हमारी दुनिया फूलों से लहूलुहान है।

यह रक्त फूलों का नहीं, हमारी संवेदनहीनता का है।

हमने फूलों को सजावट समझा और उनकी धार को पहचानने में देर कर दी।

अब फूलों की जरूरत पहले से ज्यादा है।

क्योंकि तलवारें बहुत हैं।

शब्द भी बहुत हैं।

आवाजें भी बहुत हैं।

लेकिन मनुष्य कम होता जा रहा है।

और जब मनुष्य कम होने लगे, तब सबसे धारदार हथियार कोई हथियार नहीं होता।

वह एक फूल होता है।

जिसे हाथ में लेकर कोई कह सके—

मैं तुम्हें मारना नहीं चाहता।

मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि तुम मुझे मनुष्य समझो।

यही वाक्य शायद आज की सबसे बड़ी धार है।

और इससे डरने वाले बहुत हैं।


ब्रजेश कानूनगो 

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