Wednesday, August 19, 2026

महाराज श्रृंखला 15: विकास की धूल

महाराज श्रृंखला 15: विकास की धूल

मोटाभाई काला की पहली सीमेंट फैक्ट्री चल पड़ी तो उनके भीतर देशसेवा की भावना और भी प्रबल हो गई। आखिर देशसेवा में जितना अधिक माल लगता है, उतनी ही अधिक देशसेवा करने की क्षमता पैदा होती है।

पहली फैक्ट्री के बाद दूसरी फैक्ट्री लगी और दूसरी के बाद तीसरी की योजना बनने लगी।

मोटाभाई ने एक दिन अपने मुनीम से पूछा—

“हमारे पास अब कितनी जमीन है?”

मुनीम ने कहा—

“सेठजी, आपके नाम पर कम है, कंपनियों के नाम पर ज्यादा है।”

मोटाभाई ने प्रसन्न होकर कहा—

“यही तो कॉरपोरेट संस्कृति है। आदमी एक, कंपनियाँ अनेक और देश एक।”

मुनीम ने सिर झुका लिया।

वह जानता था कि सेठजी जब देश की बात करते हैं तो बीच में परिवार को सुनाई देना चाहिए।

फैक्ट्री के लिए नई जमीन चाहिए थी।

जमीन के बीच में गाँव था।

गाँव के बीच में लोग थे।

और लोगों के बीच में उनकी यादें, खेत, कुएँ, पेड़, मंदिर और पुरखे थे।

कंपनी के सलाहकार ने समझाया—

“ये सब भावनात्मक संपत्तियाँ हैं। इन्हें आर्थिक संपत्ति में बदलना होगा।”

मोटाभाई ने पूछा—

“कैसे?”

सलाहकार ने कहा—

“मुआवजा देकर।”

“लोग मानेंगे?”

“नहीं मानेंगे तो विकास समझाइए।”

“विकास से भी नहीं मानें?”

“तो पुनर्वास समझाइए।”

“फिर भी?”

सलाहकार ने मुस्कुराकर कहा—

“तब प्रशासन है न।”

मोटाभाई को प्रशासन की याद आते ही उनका चेहरा खिल उठा।

देश में लोकतंत्र था और लोकतंत्र में प्रशासन जनता के लिए था।

कंपनी भी जनता के लिए थी।

इसलिए दोनों के बीच बातचीत में कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए थी।

महाराज से बात की गई।

महाराज अब शिक्षा मंत्री थे, लेकिन शिक्षा मंत्री होने का अर्थ यह नहीं था कि वे केवल किताबों और स्कूलों की चिंता करें। मंत्री का अनुभव जितना व्यापक हो, उसकी उपयोगिता उतनी ही अधिक होती है।

उन्होंने कहा—

“विकास रुकना नहीं चाहिए।”

गोपाल सेठ ने कहा—

“बिल्कुल नहीं।”

महाराज ने पूछा—

“गाँव वालों की क्या समस्या है?”

गोपाल सेठ बोले—

“वे विकास को समझ नहीं रहे हैं।”

महाराज ने गंभीर होकर कहा—

“तो उन्हें समझाना चाहिए।”

गोपाल सेठ ने राहत की साँस ली।

समझाने का काम प्रशासन को सौंप दिया गया।

अगले सप्ताह गाँव में अधिकारियों की बैठक हुई।

अधिकारी ने नक्शा खोलकर कहा—

“यहाँ से सड़क जाएगी।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा खेत जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“विकास आएगा।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा कुआँ जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“रोजगार आएगा।”

गाँव वाले बोले—

“हमारा घर जाएगा।”

अधिकारी ने कहा—

“मुआवजा मिलेगा।”

एक बूढ़े किसान ने पूछा—

“मुआवजे से घर वापस आ जाएगा?”

अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने सरकारी भाषा में कहा—

“आप भावुक न हों। राष्ट्र निर्माण में भावनाओं का स्थान नहीं होता।”

बूढ़ा किसान चुप हो गया।

उसे पहली बार पता चला कि जिस जमीन पर उसके बाप-दादा की हड्डियाँ मिली हुई हैं, वह अब भावना कहलाती है।

फैक्ट्री का निर्माण शुरू हो गया।

पेड़ काटे गए।

पहाड़ काटे गए।

मिट्टी हटाई गई।

धूल उड़ी।

और इस धूल को देखकर मोटाभाई बहुत प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा—

“यह धूल नहीं है। यह विकास का दृश्य प्रमाण है।”

उनकी बात पर उपस्थित अधिकारी ने तुरंत सिर हिलाया।

अधिकारी सिर हिलाने में कभी देर नहीं करते थे। उन्हें मालूम था कि फाइलों में सिर हिलाने से बहुत काम होते हैं और न हिलाने से बहुत काम रुक जाते हैं।

पर्यावरण विभाग की टीम निरीक्षण के लिए आई।

उन्होंने हवा में उड़ती धूल देखी।

एक अधिकारी ने मास्क लगाया।

मोटाभाई ने पूछा—

“क्या प्रदूषण बहुत ज्यादा है?”

अधिकारी ने कहा—

“थोड़ा है।”

“कितना?”

“रिपोर्ट में देखा जाएगा।”

“रिपोर्ट में क्या आएगा?”

अधिकारी ने कहा—

“वही जो वैज्ञानिक आधार पर उचित होगा।”

मोटाभाई ने संतोष की साँस ली।

वैज्ञानिक आधार बहुत सुविधाजनक चीज थी।

उसका निर्णय विज्ञान करता था, लेकिन विज्ञान को रिपोर्ट लिखने वाला अधिकारी समझता था।

फैक्ट्री की चिमनी से धुआँ निकलता रहा।

गाँव के बच्चों को खाँसी होने लगी।

तालाब का पानी बदलने लगा।

खेतों पर सफेद धूल जमने लगी।

मोटाभाई ने तुरंत एक स्वास्थ्य शिविर लगवाया।

बैनर पर लिखा था—

“मोटाभाई काला समूह द्वारा निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा।”

डॉक्टरों ने बच्चों को दवाइयाँ दीं।

अखबार में अगले दिन खबर छपी—

“उद्योगपति मोटाभाई काला ने सामाजिक दायित्व निभाते हुए ग्रामीणों के स्वास्थ्य की चिंता की।”

किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस बीमारी के इलाज के लिए शिविर लगाया गया, वह पैदा किससे हुई।

देशसेवा का यह भी एक सुंदर मॉडल था।

पहले समस्या पैदा करो।

फिर समाधान की कंपनी खोलो।

फिर समाधान के लिए पुरस्कार लो।

मोटाभाई को पुरस्कार मिलने लगे।

एक संस्था ने उन्हें ‘हरित उद्योग सम्मान’ दिया।

दूसरी ने ‘ग्रामीण विकास रत्न’।

तीसरी ने ‘राष्ट्र निर्माण गौरव’।

मोटाभाई ने तीनों पुरस्कार अपने कार्यालय की उसी दीवार पर लगाए जहाँ गांधी बाबा की तस्वीर लगी थी।

बापू अब भी मुस्कुरा रहे थे।

उन्हें शायद आदत हो गई थी।

उधर साहित्य परिषद के अध्यक्ष ज्ञान रिपु ने विकास पर एक विशेष संगोष्ठी आयोजित की—

“धूल से धरा तक : आधुनिक राष्ट्र निर्माण में उद्योग की भूमिका।”

मुख्य वक्ता मोटाभाई थे।

ज्ञान रिपु ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा—

“आज साहित्य को उद्योग के साथ संवाद करना चाहिए। कारखाने केवल सीमेंट नहीं बनाते, वे भविष्य बनाते हैं।”

तालियाँ बजीं।

मजदूर पीछे बैठे थे।

उनमें से एक ने दूसरे से कहा—

“हम क्या बनाते हैं?”

दूसरे ने कहा—

“सीमेंट।”

पहला बोला—

“और ये लोग?”

दूसरा बोला—

“भविष्य।”

पहला कुछ देर सोचता रहा।

फिर बोला—

“हमारा भविष्य कौन बनाएगा?”

दूसरे ने कहा—

“शायद वही कंपनी।”

दोनों हँस दिए।

उनकी हँसी किसी रिपोर्ट में दर्ज नहीं हुई।

इधर महाराज ने शिक्षा विभाग में नई योजना घोषित की—

“उद्योग-शिक्षा समन्वय अभियान।”

इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को उद्योगों का भ्रमण कराया जाना था।

महाराज का मानना था कि बच्चे किताबों से जितना सीखते हैं, उतना ही कारखानों से भी सीख सकते हैं।

पहली यात्रा मोटाभाई की फैक्ट्री में हुई।

बच्चों को बताया गया—

“यह क्लिंकर है।”

“यह सीमेंट है।”

“यह कन्वेयर बेल्ट है।”

एक बच्चे ने पूछा—

“सर, यह जो सामने गाँव था, वह कहाँ गया?”

अध्यापक ने कहा—

“वह विकास में समाहित हो गया।”

बच्चे ने फिर पूछा—

“समाहित मतलब?”

अध्यापक ने कहा—

“बड़े होकर समझोगे।”

शिक्षा मंत्री को यह उत्तर बहुत पसंद आया।

उन्हें लगा कि शिक्षा का असली उद्देश्य यही है—कुछ बातें इतनी देर से समझ में आएँ कि तब तक सवाल पूछने की आदत समाप्त हो जाए।

मोटाभाई की तीसरी फैक्ट्री के लिए खनन पट्टा भी मिल गया।

अब सीमेंट बनाने के लिए पत्थर चाहिए था।

पत्थर पहाड़ में था।

पहाड़ जंगल में था।

जंगल आदिवासियों की जमीन पर था।

और आदिवासियों को बताया गया कि यह सब राष्ट्र की संपत्ति है।

एक अधिकारी ने सभा में कहा—

“यह खनिज देश का है।”

एक आदिवासी ने पूछा—

“तो हमारी जमीन?”

अधिकारी ने कहा—

“वह भी देश की है।”

आदिवासी ने पूछा—

“हम?”

अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा—

“आप भी देश के हैं।”

आदिवासी चुप हो गया।

उसे पहली बार लगा कि देश का होना शायद जमीन पर अपना होना नहीं है।

मोटाभाई की कंपनी को खनन की अनुमति मिल गई।

पहाड़ों में विस्फोट होने लगे।

हर विस्फोट के साथ पत्थर टूटता था।

और हर टूटे पत्थर से सीमेंट बनता था।

सीमेंट से इमारतें बनती थीं।

इमारतों में सरकारी कार्यालय बनते थे।

सरकारी कार्यालयों में विकास की योजनाएँ बनती थीं।

विकास की योजनाओं में फिर नई सड़कें बनती थीं।

सड़कों के किनारे फिर नए उद्योग आते थे।

और उद्योगों के लिए फिर पहाड़ टूटते थे।

देश एक वृत्त में घूम रहा था।

इतनी तेजी से कि किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि वह आगे जा रहा है या उसी जगह लौट रहा है।

एक दिन महाराज ने गोपाल सेठ से कहा—

“देश में विकास की गति बहुत बढ़ गई है।”

गोपाल सेठ बोले—

“महाराज, गति और बढ़नी चाहिए।”

“क्यों?”

“ताकि लोग सोचने के लिए पीछे मुड़कर न देख सकें।”

महाराज ने उनकी ओर देखा।

फिर दोनों हँस पड़े।

उनकी हँसी में अनुभव था।

अनुभव में सत्ता थी।

सत्ता में विकास था।

और विकास में बहुत सारा सीमेंट।

उसी शाम मोटाभाई के बंगले पर एक नया बोर्ड लगाया गया—

“राष्ट्र निर्माण कार्यालय।”

नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—

“मोटाभाई काला समूह।”

बोर्ड देखकर मोटाभाई देर तक खड़े रहे।

उन्हें अपने बाप-दादा याद आए।

गधे पर राख लादकर चलने वाले वे लोग आज कहाँ होते?

शायद किसी पुराने गाँव की स्मृति में।

लेकिन राख से सीमेंट तक की यात्रा ने उन्हें एक नई शिक्षा दी थी—

जिसके हाथ में राख हो, वह गरीब हो सकता है;

जिसके हाथ में सीमेंट की फैक्ट्री हो, वह राष्ट्र निर्माता कहलाता है।

और जिस राष्ट्र में राष्ट्र निर्माण का ठेका कुछ ही हाथों में चला जाए, वहाँ विकास की धूल सबकी आँखों में बराबर पड़ती है।

बस फर्क इतना रहता है कि कुछ लोग आँखें बंद कर लेते हैं।

और कुछ लोग उसी धूल से अपना अगला महल बना लेते हैं।

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