महाराज श्रृंखला 14 : राख से राष्ट्र निर्माण तक
देश को स्वतंत्रता मिलने पर पाषाणपुष्प रियासत के महाराज नए गणराज्य में अब शिक्षा मंत्री हो चुके थे और राजकवि ज्ञानरिपु साहित्य परिषद के अध्यक्ष। दोनों के पद बदल गए थे, मगर उनके स्वभाव में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया था। आखिर पद बदलने से आदमी बदल जाए तो राजनीति और साहित्य दोनों की परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लग जाए।
महाराज शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए चिंतित थे और ज्ञानरिपु साहित्य में। दोनों की चिंता का एक सुखद पहलू यह था कि चिंता करते समय उन्हें अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं करनी पड़ती थी।
रियासत के प्रमुख कारोबारी गोपाल सेठ की चिंता भी अब समाप्त हो चुकी थी। उनके परिवार में कंपनियाँ इतनी तेजी से बढ़ रही थीं कि कभी-कभी खुद गोपाल सेठ को भी याद नहीं रहता था कि किस कंपनी का मालिक कौन है। एक कंपनी निर्माण करती थी, दूसरी निर्माण के लिए सामान देती थी, तीसरी उस सामान की ढुलाई करती थी और चौथी उन तीनों की सेवाओं की गुणवत्ता पर सलाह देती थी।
पाँचवीं कंपनी इस बात पर शोध करती थी कि देश में विकास की गति इतनी तेज क्यों है।
इस शोध का निष्कर्ष हमेशा यही निकलता था कि विकास को और तेज करने की जरूरत है।
देश सेवा के लिए कंपनियों का होना आवश्यक है—यह बात धीरे-धीरे देश को समझ में आने लगी थी।
गोपाल सेठ के परिजनों में देश सेवा की भावना इतनी प्रबल थी कि परिवार का शायद ही कोई सदस्य बेरोजगार रह गया था। किसी के पास खनन था, किसी के पास परिवहन, किसी के पास निर्माण, किसी के पास वित्त और किसी के पास सलाह देने का काम।
देश का विकास एक सामूहिक पारिवारिक जिम्मेदारी बन गया था।
इसी परिवार की दूर की शाखा में एक व्यक्ति थे—मोटाभाई काला। मोटाभाई काला न तो मोटे थे और न उनके शरीर और व्यक्तित्व से कृष्णता का कोई विकिरण प्रस्फुटित होता था। उनके बाप-दादा गधे पर लादकर राख के बदले पीली मिट्टी बेचने का धंधा करते थे। बाद में समय ने ऐसी करवट बदली कि उनके पिता सीमेंट के व्यापारी हो गए।
उन दिनों कंट्रोल पर बिकने वाले सीमेंट पर तो कंट्रोल था, लेकिन भ्रष्टाचार पर आज की तरह ही कोई खास रोक-टोक नहीं थी। गांधी बाबा की तस्वीर सीमेंट की दुकान पर ही नहीं, सभी प्रतिष्ठानों की दीवारों की शोभा बढ़ाती रहती थी।
तस्वीरों का यह अच्छा रहता है कि वे कुछ बोल नहीं सकतीं। इसलिए बापू की तस्वीर में मुस्कान बनी रही, जबकि सामने मोटाभाई के पिता मोटा माल बनाने में लगे रहे।
सेठजी का बेटा किसी तरह मैट्रिक पास करने के बाद एक दिन पिता के जूते में पैर डालने लगा तो पिता ने समझ लिया कि अब बेटे के मोटा माल बनाने के दिन आ गए हैं। बेटे को लाइन में डालने की चिंता हर पिता को होती है। यहाँ भी थी।
उन दिनों रेलवे तथा जंगल से चुराई गई लकड़ियों से बना कोयला अपने ताप से लोगों के पेट की आग शांत किया करता था। तभी ‘नलीदार कोयले’ के आविष्कार ने मोटाभाई के पिता की चिंता का निवारण कर दिया।
मोटाभाई के यहाँ भी कोयले की सस्ती चूरी, मिट्टी, लकड़ी का बुरादा आदि की मदद से कृत्रिम कोयला बनने लगा।
मोटाभाई ‘कोयलेवाले’ के नाम से मशहूर हो गए।
मोटाभाई का कोयले का धंधा कुछ वर्षों तक खूब अच्छा चला, लेकिन जनता पार्टी की तरह नलीदार कोयले का अस्तित्व भी बस स्मृतियों का हिस्सा रह गया। यह जरूर हुआ कि मोटाभाई के नाम के साथ ‘काला’ हमेशा के लिए चस्पा हो गया।
बाद में इस मोटे माल परंपरा का बहुत विकास हुआ। संसद के बाहर और भीतर ‘कोयला’ नेताओं की रचनात्मक समझ को प्रतिबिंबित करने का माध्यम भी बना। कोयले की दलाली में मोटा माल मिलने की बातें खूब कही गईं। यहाँ तक कि देश के एक पूर्व ईमानदार ‘मोटा भाई’ पर भी आरोप लगा कि उन्होंने अपने साथियों को मोटा माल बनाने में खूब मदद की थी।
लेकिन मोटाभाई काला ने इतिहास से एक महत्वपूर्ण शिक्षा ग्रहण की थी। सिर्फ राख में हाथ काला करने से काम नहीं चलेगा। राख को सीमेंट में बदलना होगा। और सीमेंट को विकास में। और विकास को देशसेवा में।
बस यहीं से मोटाभाई की असली यात्रा शुरू हुई।
राख बेचने वाला धीरे-धीरे सीमेंट बेचने लगा। सीमेंट बेचते-बेचते उसे यह बोध हुआ कि दूसरों की फैक्ट्री का सीमेंट बेचने में भी पैसा है, लेकिन अपनी फैक्ट्री का सीमेंट बेचने में देशसेवा अधिक है। उन्होंने अपनी पहली सीमेंट फैक्ट्री लगाने का निर्णय लिया।
मंत्रालयों में फाइलें चलीं। फाइलों के साथ कुछ और चीजें भी चलीं। फिर पर्यावरण विभाग आया। फिर अनुमति आई। फिर अनुमति की अनुमति आई।
फिर कुछ विशेषज्ञ आए जिन्होंने बताया कि फैक्ट्री से निकलने वाली धूल को विकास की धूल समझना चाहिए।
एक विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कहा कि जिस देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हों, वहाँ सीमेंट की धूल को प्रदूषण कहना राष्ट्रविरोधी मानसिकता है।
मोटाभाई ने उसी दिन तय कर लिया कि अब उनका कारखाना केवल कारखाना नहीं होगा—वह राष्ट्र निर्माण का मंदिर होगा।
उद्घाटन के लिए महाराज को बुलाया गया।
महाराज अब शिक्षा मंत्री थे। उन्होंने उद्घाटन भाषण में कहा—
“शिक्षा और निर्माण में बहुत गहरा संबंध है। शिक्षा मनुष्य का निर्माण करती है और सीमेंट राष्ट्र का।”
तालियाँ बजीं।
मोटाभाई ने तालियों को अपने पक्ष में जनादेश मान लिया।
राजकवि ज्ञानरिपु भी मंच पर थे। साहित्य परिषद के अध्यक्ष बनने के बाद उनके शब्दों में पहले से अधिक सरकारी गरिमा आ गई थी। उन्होंने तत्काल एक कविता सुनाई—
“भस्म से उठता देश हमारा,
अर्जित किया मजबूत किनारा।
श्रम की बहती बूंदों से
महका प्यारा देश प्यारा।”
कविता सुनकर मजदूरों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
उनमें से एक ने धीरे से पूछा—
“हमारा पसीना कविता में आ गया, हमारी मजदूरी कब आएगी?”
दूसरे ने उसे चुप करा दिया।
साहित्य परिषद के अध्यक्ष के सामने सवाल पूछना साहित्य के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता था।
उधर महाराज ने फैक्ट्री का फीता काटा। फीता कटते ही मोटाभाई का कारोबार बढ़ गया। देश भी आगे बढ़ा।
अखबारों में खबर छपी—
“प्रसिद्ध उद्योगपति मोटाभाई काला ने राष्ट्र निर्माण में एक और मील का पत्थर स्थापित किया।”
मील का पत्थर वास्तव में सीमेंट का था।
उस पर मोटाभाई का नाम भी खुदा हुआ था।
गोपाल सेठ ने समाचार पढ़कर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा—
“देखा! यही होता है विकास। परिवार का एक आदमी आगे बढ़ता है तो पूरा देश आगे बढ़ता है।”
किसी ने पूछा—
“सेठजी, देश आगे बढ़ता है या परिवार?”
गोपाल सेठ ने उसे देखा।
फिर मुस्कुराकर बोले—
“आजकल दोनों में अंतर कौन करता है?”
सवाल पूछने वाला चुप हो गया।
देश में सवाल पूछने वालों की संख्या कम हो रही थी और सलाहकारों की संख्या बढ़ रही थी।
महाराज की शिक्षा नीति का असर भी दिखाई देने लगा था। नई पीढ़ी को पढ़ाया जा रहा था कि सफलता के लिए मेहनत जरूरी है।
साथ ही कुछ बच्चों को यह भी समझ में आ रहा था कि मेहनत के अलावा कुछ और चीजें भी जरूरी होती हैं—संपर्क, अवसर, समय, परिस्थिति और सही व्यक्ति की सही जगह पर मौजूदगी।
महाराज शिक्षा मंत्री थे, इसलिए शिक्षा में ‘व्यावहारिक ज्ञान’ का महत्व बढ़ रहा था। इधर साहित्य परिषद में ज्ञान रिपु ने ‘राष्ट्र निर्माण साहित्य पुरस्कार’ शुरू कर दिया था। पहला पुरस्कार मोटाभाई काला को दिया गया।
पुरस्कार का नाम था—“राष्ट्रधूलि सम्मान।”
ज्ञानरिपु ने कहा—
“मोटाभाई ने राख को केवल राख नहीं समझा। उन्होंने उसमें राष्ट्र की संभावनाएँ देखीं।”
मोटाभाई भावुक हो गए।
उन्होंने पुरस्कार ग्रहण करते हुए कहा—
“मैंने जीवन में हमेशा पहले देश को ही दिया है।”
सभा में बैठे एक बुजुर्ग ने अपने पड़ोसी से पूछा—
“क्या दिया है ?”
पड़ोसी ने कहा—
“सीमेंट।”
बुजुर्ग ने पूछा—
“देश को?”
पड़ोसी ने कहा—
“नहीं, देश के नाम पर।”
बुजुर्ग मुस्कुराए।
उन्हें शायद पुरानी बातें याद आ गई थीं। राख से पीली मिट्टी बेचने वाले उनके बाप-दादा गधे पर माल ढोते थे। अब मोटाभाई के ट्रक सड़कों पर दौड़ रहे थे। फैक्ट्रियाँ खड़ी हो रही थीं। कंपनियाँ बढ़ रही थीं। परिवार समृद्ध हो रहा था।
महाराज मंत्री बन चुके थे। ज्ञानरिपु साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे। गोपाल सेठ के परिवार की कंपनियाँ देश की अर्थव्यवस्था में योगदान कर रही थीं। हर तरफ विकास था। बस इतना अंतर था कि पहले लोग राख बेचकर सीमेंट खरीदते थे और अब राख से सीमेंट बनाने वाले देश का भविष्य खरीदने लगे थे।
महाराज ने एक दिन गोपाल सेठ से कहा—
“देश बहुत तेजी से बदल रहा है।”
गोपाल सेठ ने कहा—
“महाराज, देश ही तो बदल रहा है।”
फिर दोनों कुछ देर चुप रहे।
दोनों जानते थे कि इस वाक्य का एक दूसरा अर्थ भी है। और वह अर्थ इतना गहरा था कि उसे समझने के लिए किसी साहित्य परिषद की जरूरत नहीं थी।
उधर मोटाभाई की दूसरी सीमेंट फैक्ट्री का शिलान्यास होने वाला था।
इस बार उन्होंने निश्चय किया कि उद्घाटन पट्टिका पर केवल अपना नाम नहीं होगा।
उस पर लिखा जाएगा—“जनता को समर्पित।”
मोटाभाई ने यह बात गर्व से बताई।
किसी ने पूछा—“जनता को क्या समर्पित है?”
मोटाभाई ने कहा—“फैक्ट्री।”
“और फैक्ट्री किसकी है?”
मोटाभाई ने मुस्कुराकर कहा—“जनता की।”
“तो मालिक कौन?”
मोटाभाई ने हँसते हुए कहा—
“देश का कानून।”
फिर उन्होंने अपनी कंपनी के कागजों की ओर देखा। कागजों पर उनका नाम था। कानून में कंपनी का। भाषण में जनता का।
और इतिहास में शायद किसी दिन देश का।
यही विकास की सबसे बड़ी खूबी थी।
हर चीज सबकी होती थी।
बस उसका मालिक अलग होता था।
***
ब्रजेश कानूनगो
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