Friday, August 21, 2026

महाराज श्रृंखला 18 :विकास की आत्मा और बेरोजगारों की बारात

 महाराज श्रृंखला  18 :विकास की आत्मा और बेरोजगारों की बारात

पाषाणपुष्प गणराज्य का नाम अब देश की सीमाओं से बाहर भी पहुंच चुका था। दुनिया के लोग उसे प्यार से पी पी रिपब्लिक कहने लगे थे। देश के भीतर भी हिंदी प्रेमियों ने अपनी सुविधा के लिए उसे पीपी गणराज्य कहना शुरू कर दिया था।

महाराज को यह नाम बहुत पसंद आया।

उन्हें लगा कि छोटे नामों में बड़ा प्रभाव होता है। उन्होंने अपने सलाहकारों से कहा—

“देखो, नाम ऐसा होना चाहिए जिसे दुनिया का हर आदमी आसानी से बोल सके। इसमें आधुनिकता भी हो और मौलिकता भी।”

ज्ञान रिपु ने तत्काल समर्थन किया—

“महाराज, पीपी का अर्थ हम अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी सुविधा के अनुसार कुछ भी बता सकते हैं। पाषाणपुष्प तो वैसे भी बहुत लंबा हो जाता है।”

महाराज प्रसन्न हुए।


उधर पीपी गणराज्य विकास के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा था। हर दिन कोई न कोई नई परियोजना उद्घाटित होती। फीते कटते, पट्टिकाएं लगतीं, ड्रोन उड़ते और समाचार चैनलों पर विकास की ऐसी तस्वीरें दिखाई जातीं कि लगता था देश अब सीधे स्वर्ग से जुड़ने वाला है।

सड़कों पर चमकदार डिवाइडर थे। पुल थे। भवन थे। अस्पताल थे। विश्वविद्यालय थे। विद्यालय थे। पुस्तकालय भी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते थे।

बस, इन सबमें एक छोटी-सी कमी थी।

इनमें जीवन कम था।

अस्पतालों में भवन थे, बिस्तर थे, उद्घाटन की तस्वीरें थीं, लेकिन डॉक्टर कम थे।

विद्यालयों में कमरे थे, स्मार्ट बोर्ड थे, कंप्यूटर थे, लेकिन शिक्षक कम थे।

विश्वविद्यालयों में विशाल भवन थे, सभागार थे, दीक्षांत समारोह थे, लेकिन पढ़ाने वाले लोग कम थे।

पुस्तकालयों में अलमारियां थीं, मगर किताबों से अधिक धूल थी।

सरकार ने इसे भी उपलब्धि माना।

एक अधिकारी ने कहा—

“पहले हमारे पास पुस्तकालय ही नहीं थे। अब पुस्तकालय हैं और धूल भी है। इसका मतलब है कि हमने आधारभूत संरचना के साथ पर्यावरण संरक्षण भी कर दिया है।”

महाराज ने इस उपलब्धि को अपनी अगली उपलब्धियों की सूची में जोड़ लिया।


पीपी गणराज्य की एक विशेषता यह भी थी कि यहां प्रतिभाएं पैदा खूब होती थीं, मगर टिकती नहीं थीं।

जो बच्चा पढ़ाई में अच्छा निकलता, वह आगे चलकर देश छोड़ने की तैयारी करने लगता। जो शिक्षक योग्य होता, वह किसी दूसरे देश के विश्वविद्यालय में आवेदन कर देता। जो वैज्ञानिक कुछ नया सोचता, उसे किसी और देश की प्रयोगशाला अधिक आकर्षक लगती।

सरकार इसे ब्रेन ड्रेन कहती थी।

युवक इसे ब्रेन का पलायन कहते थे।

और मंत्री इसे वैश्विक अवसरों का लाभ उठाना कहते थे।

ज्ञान रिपु ने इस समस्या पर एक कविता भी लिखी—

“मस्तिष्क जहां सम्मान पाए,

वहीं उड़ जाए, वहीं समाए।”

महाराज ने कविता सुनकर कहा—

“बहुत सुंदर! इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे देश के मस्तिष्क इतने स्वतंत्र हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”

किसी ने धीरे से कहा—

“मगर महाराज, उन्हें रोकना कौन चाहता है? लोग तो चाहते हैं कि वे यहां रहें।”

महाराज ने उसकी ओर देखा।

वह चुप हो गया।



शिक्षा का अर्थ भी धीरे-धीरे बदल रहा था।

पहले शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, विवेक और मनुष्य को बेहतर नागरिक बनाना माना जाता था। अब उसका उद्देश्य किसी तरह प्रमाणपत्र प्राप्त करना और फिर किसी नौकरी की खोज में वर्षों तक भटकना रह गया था।

स्कूलों में बच्चों को भविष्य के लिए तैयार किया जाता था।

भविष्य में क्या होगा, यह किसी को पता नहीं था।

कॉलेजों में डिग्रियां मिलती थीं।

डिग्री लेने के बाद युवा पूछता—

“अब इसका क्या करूं?”

उत्तर मिलता—

“प्रतियोगी परीक्षा दो।”

प्रतियोगी परीक्षा देने के लिए कोचिंग करो।

कोचिंग के लिए पैसा चाहिए।

पैसे के लिए नौकरी चाहिए।

नौकरी के लिए डिग्री चाहिए।

डिग्री के लिए कॉलेज चाहिए।

और कॉलेज की फीस के लिए फिर पैसा चाहिए।

युवक इस चक्र को समझते-समझते प्रतियोगिता परीक्षा की उम्र पार कर जाता।

फिर सरकार उसे समझाती—

“युवा धैर्य रखें। अवसर बहुत हैं।”

युवक पूछता—

“कहां हैं?”

सरकार कहती—

“अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं, लेकिन आएंगे।”

युवक पूछता—

“कब?”

सरकार कहती—

“उचित समय पर।”

उचित समय पीपी गणराज्य का सबसे रहस्यमय समय था। वह कभी आता नहीं था, मगर हर घोषणा में मौजूद रहता था।



आखिरकार युवाओं ने रोजगार का अपना रास्ता खोज लिया।

डिलीवरी कंपनियों के दरवाजे खुल गए।

कुरियर कंपनियां बढ़ गईं।

ऐप आधारित काम ने बेरोजगारी को एक नया नाम दे दिया—गिग इकॉनमी।

अब बेरोजगार युवक बेरोजगार नहीं कहलाता था।

वह ‘डिलीवरी पार्टनर’ था।

उसके पास नौकरी नहीं थी, लेकिन एक ऐप था।

उसके पास निश्चित वेतन नहीं था, लेकिन प्रोत्साहन था।

उसके पास भविष्य की सुरक्षा नहीं थी, लेकिन रेटिंग थी।

उसके पास छुट्टी नहीं थी, मगर ‘लॉग आउट’ करने की सुविधा थी।

वह सुबह घर से निकलता और रात तक शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक भोजन, दवाइयां, कपड़े, दस्तावेज और कभी-कभी लोगों की उम्मीदें भी पहुंचाता।

लोग उसे देखकर कहते—

“बहुत मेहनती लड़का है।”

वह मुस्करा देता।

उसे मालूम था कि वह मेहनती कम और मजबूर ज्यादा है।

उसकी बाइक पर किसी और का खाना था और उसके मन में अपने घर का राशन।


जो युवक डिलीवरी नहीं करना चाहता था, वह प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करता।

उसके कमरे की दीवारों पर महान लोगों के चित्र लगे होते।

टेबल पर किताबों का ढेर होता।

मोबाइल में ऑनलाइन क्लासें चलतीं।

मां चाय रखकर जाती और पूछती—

“बेटा, इस बार हो जाएगा न?”

बेटा कहता—

“हां मां।”

वह खुद भी यही विश्वास करना चाहता था।

फिर एक सुबह खबर आती—

“प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही लीक।”

युवक कुछ देर तक मोबाइल को देखता रहता।

फिर किताब बंद कर देता।

दूसरे दिन सरकार जांच समिति बना देती।

तीसरे दिन समिति के अध्यक्ष का नाम घोषित होता।

चौथे दिन विपक्ष आरोप लगाता।

पांचवें दिन सरकार आरोपों को राजनीति बताती।

छठे दिन एक नया मुद्दा आ जाता।

और सातवें दिन युवक फिर किताब खोल लेता।

क्योंकि उसके पास किताब के अलावा था ही क्या?

कुछ युवक दूसरी बार परीक्षा देते।

कुछ तीसरी बार।

कुछ चौथी बार।

फिर एक दिन वे परीक्षा देना छोड़ देते।

किसी ने कहा—

“मैं पढ़ाई नहीं छोड़ रहा हूं। मैंने सिर्फ व्यवस्था पर विश्वास करना छोड़ दिया है।”

उसकी यह बात सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

सरकार ने इसे युवाओं में नकारात्मकता फैलाने का प्रयास बताया।


पीपी गणराज्य में योग्यता का अर्थ भी धीरे-धीरे बदल रहा था।

योग्य वह नहीं था जो सबसे अधिक पढ़ा हो।

योग्य वह था जो सही व्यक्ति को जानता हो।

योग्य वह नहीं था जो परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाता हो।

योग्य वह था जिसके पास सही सिफारिश हो।

योग्य वह नहीं था जो गरीब घर में बैठकर रात-रात भर पढ़ता हो।

योग्य वह था जिसके परिवार के पास अवसर खरीदने की क्षमता हो।

गरीब बच्चे किताबों के पन्ने पलटते रहे और समर्थ बच्चों ने अवसरों के दरवाजे।

धीरे-धीरे युवाओं को समझ आने लगा कि प्रतियोगिता केवल परीक्षा में नहीं है।

प्रतियोगिता तो पहले ही कहीं और तय हो चुकी है।

परीक्षा सिर्फ परिणाम घोषित करने की रस्म है।


शहरों के चौराहों पर अब युवा दिखाई देने लगे थे।

पहले वे राजनीतिक रैलियों में दिखाई देते थे।

अब वे अपनी रैलियां करने लगे।

पहले वे नेताओं के भाषण सुनते थे।

अब नेता उनके भाषण सुनने लगे।

पहले वे सरकार से नौकरी मांगते थे।

अब वे सरकार से सवाल पूछने लगे।

और सवाल सरकार के लिए सबसे असुविधाजनक आविष्कार था।


एक दिन कुछ युवाओं ने राजधानी के मुख्य चौक पर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया।

उनके हाथों में डिग्रियां थीं।

किसी के हाथ में बी.ए. था, किसी के हाथ में एम.ए., किसी के हाथ में इंजीनियरिंग की डिग्री, किसी के हाथ में शोध की उपाधि।

एक युवक ने अपनी डिग्री ऊपर उठाकर कहा—

“यह मेरी योग्यता है।”

दूसरे ने कहा—

“और यह मेरी बेरोजगारी।”

तीसरे ने कहा—

“यह मेरी प्रतियोगिता परीक्षा की किताब है।”

चौथे ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला—

“और यह उस प्रश्नपत्र का स्क्रीनशॉट है जो परीक्षा से पहले बिक चुका था।”

भीड़ में एक डिलीवरी बॉय भी खड़ा था।

उसने अपनी पीठ पर लटका बैग उतारा और कहा—

“इसमें दूसरों का खाना है। घर पर मेरे बच्चे भूखे हैं।”


कुछ देर के लिए पूरा चौक शांत हो गया।

फिर किसी ने नारा लगाया—

“हमें भाषण नहीं, रोजगार चाहिए!”

दूसरी ओर से आवाज आई—

“हमें भवन नहीं, शिक्षक चाहिए!”

तीसरी आवाज आई—

“हमें परीक्षा चाहिए, परीक्षा का तमाशा नहीं!”

और फिर हजारों कंठ एक साथ बोल उठे।

महाराज के सलाहकारों ने तुरंत आपात बैठक बुलाई।

ज्ञान रिपु ने कहा—

“महाराज, इसे युवाओं का भावनात्मक उत्सर्जन समझना चाहिए।”

मोटाभाई काला बोले—

“नहीं, इसे सोशल मीडिया की साजिश बताइए।”

एक अन्य मंत्री ने सुझाव दिया—

“युवाओं को देश के उज्ज्वल भविष्य की तस्वीर दिखाइए।”

महाराज ने पूछा—

“लेकिन तस्वीर में भविष्य कहां है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

काफी देर बाद ज्ञान रिपु ने धीरे से कहा—

“महाराज, भविष्य अभी निर्माणाधीन है।”

महाराज को यह उत्तर पसंद आया।

उन्होंने तत्काल घोषणा करवा दी—

“पीपी गणराज्य के युवाओं का भविष्य निर्माणाधीन है।”

अगले दिन सरकारी विज्ञापन छपे।

बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

“युवा शक्ति, राष्ट्र शक्ति!”

नीचे महाराज की मुस्कुराती हुई तस्वीर थी।

युवाओं ने विज्ञापन देखा।

कुछ हंसे।

कुछ नाराज हुए।

और कुछ ने पहली बार सोचा—

“अगर हम ही राष्ट्र की शक्ति हैं, तो फिर हमारी आवाज इतनी कमजोर क्यों है?”

उस दिन से पीपी गणराज्य में एक नया शब्द जन्मा—

युवा आक्रोश।

महाराज को अभी इसकी गंभीरता समझ में नहीं आई थी।

वे समझ रहे थे कि आक्रोश भी बाकी चीजों की तरह एक अभियान है।

एक पोस्टर लगेगा।

एक भाषण होगा।

एक समिति बनेगी।

कुछ घोषणाएं होंगी।

और सब शांत हो जाएगा।

मगर इस बार समस्या कुछ अलग थी।

यह आक्रोश किसी विपक्षी दल ने पैदा नहीं किया था।

यह किसी विदेशी शक्ति की देन नहीं था।

यह किसी सोशल मीडिया अभियान से पैदा नहीं हुआ था।

यह उन युवाओं के भीतर पैदा हुआ था जिन्होंने वर्षों तक पढ़ाई की थी, सपने देखे थे, परीक्षाएं दी थीं, इंतजार किया था और अंततः पाया था कि उनके सामने अवसरों से अधिक बहाने खड़े हैं।

और जब किसी पीढ़ी को बार-बार भविष्य का वादा दिया जाता है, लेकिन वर्तमान में उसके हिस्से केवल प्रतीक्षा आती है, तो एक दिन वह प्रतीक्षा करना बंद कर देती है।

पीपी गणराज्य में वह दिन धीरे-धीरे नजदीक आ रहा था।

महाराज को अभी खबर नहीं थी।

क्योंकि राजधानी के महल की खिड़कियां बहुत ऊंची थीं।

और नीचे खड़े युवाओं की आवाज अभी महल की दीवारों तक पहुंचनी शुरू ही हुई थी।

***

ब्रजेश कानूनगो 

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