महाराज श्रृंखला 19 : आक्रोश का प्रबंधन
पीपी गणराज्य में युवा आक्रोश अब केवल आक्रोश नहीं रह गया था। वह धीरे-धीरे संगठित होने लगा था।
पहले युवा अलग-अलग चौराहों पर खड़े होकर सरकार को कोसते थे। फिर वे एक-दूसरे से मिलने लगे। फिर उन्होंने एक-दूसरे के मोबाइल नंबर लिए। फिर व्हाट्सऐप समूह बने। फिर उन समूहों के नाम रखे गए।
किसी का नाम था—‘रोजगार चाहिए’।
किसी का—‘पेपर लीक बंद करो’।
किसी का—‘डिग्री का सम्मान करो’।
और एक समूह का नाम था—‘अबकी बार जवाब’।
सरकार के खुफिया विभाग ने इन सभी समूहों की जानकारी महाराज को भेजी।
महाराज ने रिपोर्ट पढ़ी और मुस्कराए।
“इतने सारे समूह हैं?”
ज्ञान रिपु बोले—
“जी महाराज।”
“तो इनमें एकता कैसे आएगी?”
“यही तो चिंता है महाराज।”
महाराज कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“तो चिंता किस बात की? एकता नहीं है तो आंदोलन कैसे होगा?”
ज्ञान रिपु ने धीरे से कहा—
“महाराज, यही तो खतरा है। यदि अलग-अलग नदियां मिल गईं तो बाढ़ आ सकती है।”
महाराज का चेहरा गंभीर हो गया।
“फिर नदियों को अलग-अलग ही रखना होगा।”
यह वाक्य उसी दिन से सरकार की नई नीति का आधार बन गया।
आंदोलन का पहला चरण
सरकार ने सबसे पहले युवाओं को समझाने का फैसला किया।
एक विशाल सम्मेलन बुलाया गया।
नाम रखा गया—
‘युवा संवाद : विकसित पीपी गणराज्य में युवाओं की भूमिका’
हॉल में वातानुकूलन था।
मंच पर महाराज की विशाल तस्वीर थी।
पीछे लिखा था—
“युवा ही भविष्य हैं।”
हॉल के बाहर हजारों बेरोजगार युवा धूप में खड़े थे।
अंदर चुनिंदा युवाओं को बुलाया गया था।
वे युवा जिनकी नियुक्ति हो चुकी थी।
कुछ युवा संगठन के पदाधिकारी थे।
कुछ मंत्रियों के रिश्तेदार।
कुछ ऐसे थे जिन्हें हाल ही में किसी सरकारी योजना में ‘युवा प्रतिनिधि’ बना दिया गया था।
महाराज मंच पर आए।
तालियां बजीं।
उन्होंने कहा—
“मेरे प्यारे युवाओं! तुम देश का भविष्य हो।”
पीछे बैठे एक युवक ने धीरे से अपने साथी से कहा—
“वर्तमान कौन है?”
दूसरे ने कहा—
“वर्तमान तो महाराज हैं।”
दोनों हंस पड़े।
महाराज ने भाषण जारी रखा—
“हमने युवाओं के लिए अभूतपूर्व अवसर पैदा किए हैं।”
बाहर खड़ा बेरोजगार युवक अपने मित्र से पूछ रहा था—
“कहां?”
मित्र बोला—
“शायद अंदर।”
दूसरा चरण : समिति
सम्मेलन से कोई समाधान नहीं निकला।
इसलिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई।
समिति का नाम था—
‘युवा आकांक्षा एवं रोजगार संवर्धन आयोग।’
उसमें अध्यक्ष बनाया गया एक ऐसे व्यक्ति को, जो पिछले चालीस वर्षों से सरकारी सेवा में था और जिसकी उम्र सेवानिवृत्ति के करीब थी।
समिति ने युवाओं से सुझाव मांगे।
सुझावों के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया।
युवाओं ने हजारों सुझाव भेजे।
किसी ने कहा—नौकरियां बढ़ाइए।
किसी ने कहा—पेपर लीक रोकिए।
किसी ने कहा—भर्ती समय पर कराइए।
किसी ने कहा—शिक्षकों के पद भरिए।
किसी ने कहा—सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता लाइए।
समिति ने सभी सुझावों को स्वीकार किया।
फिर उन्हें एक फाइल में रख दिया।
फाइल पर लिखा गया—
“अत्यंत महत्वपूर्ण।”
और फाइल अलमारी में रख दी गई।
अलमारी पर लिखा था—
“कार्यवाही हेतु।”
तीसरा चरण : आंदोलन
इस बीच आंदोलन बढ़ता गया।
अब राजधानी में प्रतिदिन प्रदर्शन होने लगे।
युवा नारे लगाते—
“रोजगार दो!”
“भर्ती दो!”
“पेपर लीक बंद करो!”
“शिक्षा बचाओ!”
“सिफारिश बंद करो!”
सरकार ने पहले इसे छोटा आंदोलन बताया।
फिर असामाजिक तत्वों का आंदोलन बताया।
फिर विपक्ष की साजिश बताया।
फिर विदेशी शक्तियों का षड्यंत्र बताया।
और अंत में जब भीड़ कम नहीं हुई तो सरकार ने कहा—
“हम युवाओं की भावनाओं का सम्मान करते हैं।”
यह सरकार का वह वाक्य था जिसका अर्थ था कि अब कुछ करने का समय आ गया है।
दमन की पहली बारिश
एक रात आंदोलनकारियों के शिविरों पर पुलिस पहुंची।
कहा गया—
“यह क्षेत्र खाली कर दीजिए।”
युवाओं ने पूछा—
“क्यों?”
पुलिस ने कहा—
“व्यवस्था बनाए रखने के लिए।”
एक युवक ने पूछा—
“व्यवस्था किसकी?”
पुलिस अधिकारी कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“सरकार की।”
युवक ने कहा—
“हम भी तो सरकार के ही नागरिक हैं।”
अधिकारी ने कहा—
“बहुत सवाल करते हो।”
उस रात कई तंबू उखाड़ दिए गए।
कई पोस्टर फाड़ दिए गए।
कुछ युवाओं को हिरासत में लिया गया।
सुबह अखबारों में खबर आई—
“राजधानी में यातायात व्यवस्था बाधित करने वाले कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया।”
‘बेरोजगार युवा’ शब्द खबर में कहीं नहीं था।
चौथा चरण : प्रलोभन
दमन से आंदोलन कम नहीं हुआ।
तब महाराज ने नीति बदली।
उन्होंने घोषणा की—
“हर जिले में युवा सलाहकार परिषद बनाई जाएगी।”
कुछ युवाओं को सदस्य बनाया गया।
उन्हें पहचान-पत्र मिले।
कुछ को यात्रा भत्ता मिला।
कुछ को सरकारी कार्यक्रमों में मंच मिला।
कुछ को समितियों में पद मिला।
कुछ को ठेके मिले।
कुछ को छात्रवृत्ति मिली।
और कुछ को वह मिला जो सबसे प्रभावी था—
महाराज के साथ सेल्फी।
धीरे-धीरे आंदोलन में दरार दिखाई देने लगी।
कुछ युवाओं ने कहा—
“सरकार हमारी बात सुन रही है।”
दूसरों ने कहा—
“सरकार हमें खरीद रही है।”
पहले वाले युवाओं को दूसरा समूह ‘व्यावहारिक’ कहता था।
दूसरा समूह पहले वालों को ‘बिकाऊ’ कहता था।
सरकार चुपचाप दोनों को देख रही थी।
पांचवां चरण : अपने आंदोलनकारी
महाराज ने एक दिन ज्ञान रिपु को बुलाया।
“आंदोलन अभी भी चल रहा है?”
“जी महाराज।”
“उसमें हमारे लोग कितने हैं?”
ज्ञान रिपु चौंके।
“महाराज?”
“मेरा मतलब है—सरकार की नीतियों को समझने वाले कितने लोग हैं?”
ज्ञान रिपु समझ गए।
कुछ दिनों बाद राजधानी में एक नया युवा संगठन सामने आया—
‘राष्ट्र युवा विकास मंच।’
उसका अध्यक्ष एक ऐसा युवक था जो पिछले महीने तक सरकार की आलोचना करता था।
अब वह सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करता था।
उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा—
“कुछ लोग बेरोजगारी के नाम पर देश को बदनाम कर रहे हैं।”
एक पत्रकार ने पूछा—
“लेकिन आप तो स्वयं बेरोजगार थे?”
युवक मुस्कराया—
“अब मैं रोजगारयुक्त विचारधारा का प्रतिनिधि हूं।”
पत्रकार चुप हो गया।
आंदोलन की भाषा बदल गई
अब आंदोलन में दो तरह के नारे लगने लगे।
एक तरफ—
“रोजगार दो!”
दूसरी तरफ—
“राष्ट्र विरोधियों से सावधान!”
एक तरफ—
“पेपर लीक बंद करो!”
दूसरी तरफ—
“पेपर लीक का मुद्दा उठाना विपक्ष की साजिश है!”
एक तरफ—
“युवाओं का भविष्य बचाओ!”
दूसरी तरफ—
“महाराज के नेतृत्व में भविष्य सुरक्षित है!”
युवाओं का मूल प्रश्न धीरे-धीरे राजनीतिक बहस में बदल गया।
नौकरी गायब हो गई।
पेपर लीक गायब हो गया।
शिक्षा गायब हो गई।
बेरोजगारी गायब हो गई।
अब सवाल था—
“महाराज के साथ कौन है?”
और—
“महाराज के खिलाफ कौन है?”
जिस युवक ने कल तक नौकरी मांगी थी, आज उससे पूछा जा रहा था—
“तुम महाराज के पक्ष में हो या विपक्ष में?”
वह कहता—
“मैं तो नौकरी के पक्ष में हूं।”
लोग हंसते।
उसे समझाया जाता—
“इतना सरल मत बनो। यह राजनीति है।”
महाराज की सफलता
एक दिन महाराज ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक में घोषणा की—
“युवा आंदोलन अब नियंत्रण में है।”
सभी मंत्रियों ने मेज थपथपाई।
ज्ञान रिपु ने कहा—
“महाराज, आपने आक्रोश को अवसर में बदल दिया।”
मोटाभाई काला बोले—
“और अवसर को संगठन में।”
एक मंत्री ने कहा—
“और संगठन को समर्थन में।”
महाराज मुस्कराए।
“यही शासन कला है।”
लेकिन उसी समय राजधानी से बहुत दूर एक छोटे कस्बे में कुछ बेरोजगार युवक एक पुराने पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठे थे।
उनके पास न कोई नेता था।
न कोई संगठन।
न कोई सरकारी पद।
न कोई मंच।
वे बस आपस में बात कर रहे थे।
एक युवक ने कहा—
“हमने आंदोलन इसलिए शुरू नहीं किया था कि हमें महाराज के पक्ष या विपक्ष में बांटा जाए।”
दूसरे ने कहा—
“हमने नौकरी मांगी थी।”
तीसरे ने कहा—
“हमने शिक्षा मांगी थी।”
चौथे ने कहा—
“हमने अपने भविष्य पर अपना अधिकार मांगा था।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर सबसे शांत बैठे युवक ने कहा—
“तो फिर हमें वापस उसी सवाल पर जाना होगा।”
“कौन-सा सवाल?”
उसने कहा—
“हमारा भविष्य किसका है?”
सभी चुप हो गए।
पुराने पुस्तकालय की बंद खिड़की के पीछे धूल से ढकी किताबें उन्हें देख रही थीं।
शायद वर्षों बाद किसी पीढ़ी ने किताबों से बाहर निकलकर सवाल करना शुरू किया था।
और पीपी गणराज्य के लिए असली खतरा यही था।
क्योंकि सत्ता नारों से नहीं डरती।
सत्ता विरोध से भी नहीं डरती।
सत्ता तो उस दिन डरती है जब नागरिक सवाल पूछना सीख जाते हैं—और सवाल का उत्तर मिलने तक चुप नहीं बैठते।
महल में उस रात महाराज देर तक सो नहीं सके।
उन्हें पहली बार लगा कि आंदोलन को दबाना आसान था।
उसे खरीदना भी आसान था।
उसे बांटना भी आसान था।
लेकिन अगर आंदोलन ने सोचना सीख लिया, तो उसका प्रबंधन कठिन हो जाएगा।
महाराज ने खिड़की खोली।
दूर कहीं युवाओं की आवाज आ रही थी—
“हमें भविष्य चाहिए।”
महाराज ने खिड़की बंद कर दी।
ज्ञान रिपु ने पूछा—
“महाराज, आवाज तेज थी?”
महाराज ने कहा—
“नहीं।”
फिर कुछ सोचकर बोले—
“लेकिन पहली बार मुझे साफ सुनाई दी।”
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