Thursday, August 20, 2026

महाराज श्रृंखला 17 : विकास का भवन

महाराज श्रृंखला 17 : विकास का भवन

महाराज ने जब अपना मंत्रिमंडल नए सिरे से गठित किया तो रियासत में एक बार फिर विकास की हवा चलने लगी।

हवा चलने के लिए वैसे भी किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। बस दिशा तय करने वाला कोई होना चाहिए। महाराज दिशा तय करने में सिद्धहस्त थे।

उन्होंने शुरुआत में इतने सारे विभाग अपने पास रख लिए कि देखने वालों को लगा, महाराज अब अकेले ही सरकार चलाएंगे। पर महाराज का उद्देश्य सरकार चलाना नहीं, सरकार को चलाते रहना था।

दरअसल कई सांसद ऐसे थे जिन्हें मंत्री बनने की बीमारी लग चुकी थी। वे लोकतंत्र में विश्वास करते थे और लोकतंत्र का अर्थ उनके लिए मंत्री पद था। जो मंत्री नहीं बन पाता था, वह लोकतंत्र को अधूरा मानता था।

महाराज जानते थे कि ऐसे लोगों को एकदम से मंत्री बना देना भी ठीक नहीं। लालच का स्वाद थोड़ी देर लगाकर दिया जाए तो उसकी भूख बढ़ती रहती है।

इसलिए महाराज ने कुछ विभाग अपने पास रखे।

दरबार में किसी ने पूछा—

“महाराज, इतने विभाग आप अकेले कैसे संभालेंगे?”

महाराज मुस्कराए।

“हम विभाग संभालने के लिए नहीं रखते। समय आने पर किसी को देने के लिए रखते हैं।”

दरबारी ने इस उत्तर को शासन-कला की नई परिभाषा समझकर अपनी डायरी में लिख लिया।

सबसे पहले शिक्षा का विभाग राजकवि ज्ञान रिपु को मिला।

ज्ञान रिपु अब तक साहित्य परिषद के अध्यक्ष थे। साहित्य परिषद की अध्यक्षता में उन्होंने बहुत कुछ सीखा था—कविता से अधिक प्रशंसा करना, आलोचना से अधिक प्रशस्ति लिखना और साहित्य से अधिक सत्ता की भाषा समझना।

महाराज ने उन्हें शिक्षा मंत्री बनाते हुए कहा—

“ज्ञान रिपु, अब शिक्षा को नई दिशा देनी है।”

ज्ञान रिपु ने सिर झुकाया।

“महाराज, दिशा आप बताइए, हम पाठ्यक्रम बना देंगे।”

शिक्षा मंत्रालय में उनका स्वागत ऐसे हुआ जैसे साहित्य में कोई नई विधा जन्मी हो।

उन्होंने आते ही घोषणा की—

“शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन होगा।”

शिक्षा विभाग के पुराने अधिकारियों ने राहत की साँस ली। आमूलचूल परिवर्तन का अर्थ वे जानते थे। इसका मतलब था कि कुछ पुरानी फाइलें हटेंगी, कुछ नई फाइलें आएंगी और बीच में एक नई समिति बनेगी।

उधर महाराज ने अपने पुराने निजी सचिव काकदंत को भी सरकार में ले लिया।

काकदंत ने वर्षों तक महाराज की निजी सेवा में रहते हुए एक महत्वपूर्ण कला विकसित कर ली थी—महाराज के कहने से पहले उनकी इच्छा समझ लेना।

यह गुण सामान्य प्रशासन में बहुत उपयोगी माना जाता था।

काकदंत ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया और अगले ही दिन उच्च सदन में पार्टी की ओर से मनोनीत होकर गृह मंत्री बन गए।

लोगों ने पूछा—

“उन्होंने चुनाव कब लड़ा था?”

उत्तर मिला—

“चुनाव लड़ने की जरूरत ही क्या थी?”

लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुना जाना एक रास्ता था, महाराज के द्वारा चुना जाना दूसरा।

काकदंत दूसरे रास्ते से आए थे और सीधे गृह मंत्रालय पहुंच गए।

उन्होंने पद संभालते ही कहा—

“देश में कानून-व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

उनसे किसी पत्रकार ने पूछा—

“और लोकतंत्र?”

काकदंत ने क्षण भर सोचा और बोले—

“वह भी कानून-व्यवस्था के अंतर्गत ही आता है।”

पत्रकार ने आगे प्रश्न नहीं किया।

उधर उद्योगपति मोटा भाई काला जी ने इस बार इतिहास रच दिया था।

उन्होंने चुनाव भी लड़ा था और पूरे चुनाव अभियान में पार्टी की सेवा भी की थी। सेवा का स्वरूप आर्थिक था, इसलिए उसका उल्लेख पार्टी की बैठकों में ‘समर्पित सहयोग’ के रूप में किया गया।

काला जी भारी मतों से जीतकर आए।

कहा गया कि जनता ने उन्हें विकास के लिए चुना है।

कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि विकास ने उन्हें चुना है।

महाराज ने उन्हें उद्योग मंत्रालय दिया और साथ में परिवहन का अतिरिक्त प्रभार भी।

यह देखकर कुछ पुराने मंत्रियों को आश्चर्य हुआ।

महाराज ने समझाया—

“उद्योग और परिवहन में गहरा संबंध है। उद्योग बनेगा तो माल चलेगा, माल चलेगा तो सड़कें बनेंगी, सड़कें बनेंगी तो टोल आएगा, टोल आएगा तो विकास होगा।”

दरबार में तालियां बजीं।

किसी ने यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि माल किसका होगा और टोल किसके पास जाएगा।

इस प्रकार महाराज, ज्ञान रिपु, काकदंत और काला जी—चारों के समन्वय से देश के विकास का नया युग आरंभ हुआ।

विकास का सबसे सरल अर्थ तय किया गया—

निर्माण।

जहां कुछ दिखाई दे रहा हो, समझो विकास हो रहा है।

जहां कुछ बनाया जा रहा हो, वहां विकास हो रहा है।

जहां कुछ तोड़ा जा रहा हो ताकि नया बनाया जा सके, वहां तो और भी अधिक विकास हो रहा है।

इस पर किसी अर्थशास्त्री ने पूछा—

“लेकिन मनुष्य?”

उसे विकास विरोधी घोषित कर दिया गया।

स्कूलों के भवन बनने लगे।

एक से एक सुंदर भवन।

कहीं चार कमरे, कहीं आठ कमरे, कहीं रंगीन दीवारें, कहीं बड़े-बड़े प्रवेश द्वार।

उद्घाटन के दिन बच्चों को कतार में खड़ा किया जाता। मंत्री जी आते। फीता कटता। नारियल फूटता। फोटो खिंचती। अखबार में छपता—

“शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि।”

अगले दिन बच्चे फिर उसी पुराने कमरे में बैठ जाते।

नया भवन बंद रहता।

क्योंकि शिक्षक नहीं थे।

शिक्षा मंत्री ज्ञान रिपु ने इस समस्या को गंभीरता से लिया।

उन्होंने अधिकारियों की बैठक बुलाई।

“शिक्षक कम क्यों हैं?”

अधिकारी ने कहा—

“भर्ती नहीं हुई, मंत्री जी।”

“क्यों नहीं हुई?”

“पद खाली हैं।”

“पद खाली क्यों हैं?”

“क्योंकि नियुक्तियां नहीं हुईं।”

ज्ञान रिपु कुछ देर तक सोचते रहे। फिर बोले—

“इस समस्या का स्थायी समाधान खोजिए।”

अधिकारी ने पूछा—

“क्या शिक्षक भर्ती करें?”

ज्ञान रिपु ने चश्मा उतारकर उसे देखा।

“इतनी जल्दी निष्कर्ष पर मत पहुंचिए। पहले एक समिति बनाइए।”

समिति बनी।

समिति ने रिपोर्ट दी—

“शिक्षकों की कमी है।”

रिपोर्ट के विमोचन का भव्य समारोह हुआ।

मंत्री जी ने कहा—

“सरकार इस कमी को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है।”

अगले वर्ष फिर स्कूलों के भवन बने।

शिक्षक फिर कम हो गए।

विकास जारी रहा।

इसी बीच अस्पतालों का भी कायाकल्प होने लगा।

पुराने अस्पतालों के स्थान पर नए भवन बनने लगे।

शीशे की दीवारें, चमकदार फर्श, बड़े बोर्ड और विशाल प्रवेश द्वार।

अस्पताल देखकर लगता कि बीमारी से पहले ही स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा।

लेकिन भीतर जाने पर पता चलता कि डॉक्टरों के पद रिक्त हैं।

नर्सें कम हैं।

दवाएं भी बहुत कम हैं।

मशीनें हैं, मगर उन्हें चलाने वाला कोई नहीं।

मरीज हैं, मगर देखने वाला डॉक्टर नहीं।

एक ग्रामीण ने नए बने अस्पताल के बाहर खड़े होकर पूछा—

“डॉक्टर कब आएंगे?”

कर्मचारी ने कहा—

“पद स्वीकृत हो चुका है।”

ग्रामीण प्रसन्न हुआ।

“तो डॉक्टर भी आएगा?”

“अभी नहीं।”

“क्यों?”

“अभी नियुक्ति नहीं हुई।”

“कब होगी?”

“सरकार विचार कर रही है।”

ग्रामीण ने अस्पताल की चमचमाती इमारत की ओर देखा।

उसे लगा शायद इमारत ही इलाज करेगी।

उधर सड़कें बन रही थीं।

हाईवे बन रहे थे।

फ्लाईओवर बन रहे थे।

पुरानी सड़क के ऊपर नई सड़क, नई सड़क के ऊपर चौड़ी सड़क और चौड़ी सड़क के ऊपर फ्लाईओवर।

शहर के लोग ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाते हुए विकास को प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे थे।

काला जी का परिवहन मंत्रालय बहुत प्रसन्न था।

वे कहते—

“जहां सड़क है, वहां गति है। जहां गति है, वहां प्रगति है।”

किसी ने पूछा—

“और जहां रोजगार नहीं है?”

काला जी ने उत्तर दिया—

“वहां भी हाईवे है।”

युवाओं ने इस उत्तर को बहुत ध्यान से सुना।

देश में बेरोजगार युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही थी।

हर वर्ष नई डिग्रियां निकलतीं।

नई डिग्रियों के साथ नए बेरोजगार निकलते।

विश्वविद्यालयों के बाहर नौकरी के आवेदन पत्रों की लाइनें लंबी होती गईं।

सरकारी दफ्तरों में खाली पदों की सूची भी लंबी होती गई।

युवा कहते—

“पद खाली हैं तो भर्ती क्यों नहीं होती?”

सरकार कहती—

“प्रक्रिया चल रही है।”

युवा पूछते—

“प्रक्रिया कब पूरी होगी?”

सरकार कहती—

“उचित समय पर।”

युवा पूछते—

“उचित समय कब आएगा?”

सरकार कहती—

“यह सरकार तय करेगी।”

इस बीच युवाओं की उम्र निकलती रही।

फॉर्म भरने की फीस बढ़ती रही।

परीक्षाएं होती रहीं।

कभी परीक्षा स्थगित हुई, कभी परिणाम।

कभी नियुक्ति रुकी, कभी भर्ती न्यायालय पहुंची।

युवा धीरे-धीरे प्रतियोगी परीक्षाओं के विशेषज्ञ होते गए।

वे इतिहास, भूगोल, संविधान और सामान्य ज्ञान पढ़ते-पढ़ते यह भी सीख गए कि बेरोजगार रहने का धैर्य कैसे रखा जाता है।

देश में बेरोजगारी बढ़ी।

लेकिन विकास दर भी बढ़ी।

इमारतें बढ़ीं।

सड़कें बढ़ीं।

फ्लाईओवर बढ़े।

उद्घाटन बढ़े।

समारोह बढ़े।

भाषण बढ़े।

बैनर बढ़े।

लेकिन नौकरी घटती गई।

शिक्षा मंत्री ज्ञान रिपु ने एक दिन संसद में घोषणा की—

“देश में शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।”

सांसदों ने मेज थपथपाई।

गृह मंत्री काकदंत ने कहा—

“देश में कानून-व्यवस्था मजबूत हुई है।”

मेज फिर थपथपाई गई।

उद्योग मंत्री काला जी ने कहा—

“देश में उद्योगों का विस्तार हुआ है।”

मेज इतनी जोर से थपथपाई गई कि एक सांसद की उंगली में चोट आ गई।

महाराज अंत में उठे।

उन्होंने कहा—

“हमने देश को बदल दिया है।”

सभी खड़े हो गए।

तालियां बजने लगीं।

बाहर सड़क पर एक बेरोजगार युवक हाथ में अपनी डिग्री लिए खड़ा था।

सड़क के दूसरी ओर नया अस्पताल था।

उसके पीछे नया स्कूल था।

ऊपर नया फ्लाईओवर था।

और इन सबके बीच वह सोच रहा था—

“देश तो बदल गया, लेकिन मेरे जीवन में क्या बदला?”

उसे कोई उत्तर नहीं मिला।

शायद उत्तर किसी नई निर्माणाधीन इमारत में रखा था।

वह इमारत अभी अधूरी थी।

और सरकार के अनुसार—

अधूरी चीजों में ही विकास की सबसे अधिक संभावनाएं होती हैं।

No comments:

Post a Comment