उनींदे नागरिक का गड़बड़ सपना
सुबह उठते ही मुझे लगा कि रात में कोई बहुत बड़ी गड़बड़ हुई है।
गड़बड़ सपने में नहीं, देश में हुई थी।
हालाँकि सपने में भी बहुत कुछ गड़बड़ था, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित गड़बड़ी थी कि उसे सपना मानने का मन नहीं हो रहा था। मैंने घबराकर अपना अखबार उठाया। अखबार वही था, कागज वही था, विज्ञापन वही थे, चेहरे भी लगभग वही थे, केवल उसका नाम बदल गया था। हिंदी अखबार का नाम अब अंग्रेजी में था और इतना अंग्रेजी में कि मुझे उसे पढ़ने के लिए हिंदी की जरूरत पड़ रही थी।
मैंने सोचा, शायद अखबार ने अपना अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकाल लिया है।
फिर ध्यान आया कि यह तो मेरा ही अखबार है।
मुखपृष्ठ पर एक बड़ी खबर थी—‘हिंदी दिवस की तैयारी’। खबर अंग्रेजी में थी। उसके नीचे एक विज्ञापन था—‘अपनी मातृभाषा से जुड़िए’। विज्ञापन की भाषा ऐसी थी कि मातृभाषा को पहले अंग्रेजी सीखनी पड़ती।
मैंने संपादकीय पृष्ठ खोला। वहाँ संपादकीय की जगह किसी विदेशी भाषा में ‘मन की बात’ छपी थी। मुझे राहत मिली कि मन अभी भी वही है, केवल भाषा बदल गई है।
नीचे महान हिंदी साहित्यकारों के नामों के साथ उनके सोशल मीडिया अकाउंट दिए हुए थे। कबीर के फॉलोअर्स लाखों में थे, तुलसीदास ट्रेंड कर रहे थे और रामचंद्र शुक्ल को किसी ने ‘कंटेंट क्रिएटर’ बता दिया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी की पोस्ट पर किसी युवा विचारक ने टिप्पणी की थी—‘सर, आपको अपडेट होने की जरूरत है।’
मैंने देखा, टिप्पणी देवनागरी में थी और उसमें सभी सुझाव अंग्रेजी में थे।
यह देखकर मेरी नींद में ही नींद उड़ गई।
तभी सपना आगे बढ़ गया।
एक सफेद इमारत के सामने परेड हो रही थी। सैनिकों के कंधों पर बंदूकें नहीं, लैपटॉप थे। वे इतने अनुशासित ढंग से कदमताल कर रहे थे कि लगा, अब युद्ध भी शायद पासवर्ड डालकर ही शुरू होगा।
एक अधिकारी चिल्लाया—‘फॉरवर्ड मार्च!’
सैनिक आगे बढ़े।
फिर शिक्षकों की एक विशाल टुकड़ी आई। सभी ने तिरंगे रंग की टोपियाँ पहन रखी थीं। वे शिक्षा की गुणवत्ता, नई शिक्षा नीति और डिजिटल भविष्य का प्रदर्शन करते हुए निकल रहे थे। उनके हाथों में किताबें नहीं, टैबलेट थे। किसी के टैबलेट में बच्चा नहीं खुल रहा था, किसी में नेटवर्क नहीं आ रहा था और किसी में पासवर्ड भूल जाने की सूचना थी।
परेड का सबसे आकर्षक दृश्य तब आया जब अतिथि और मेजबान ने अपनी-अपनी कुर्सियाँ बदल लीं।
मेजबान अतिथि की कुर्सी पर बैठ गया और अतिथि मेजबान की कुर्सी पर।
तालियाँ बजीं।
किसी ने कहा—‘यह हमारी लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक है।’
मैंने पूछा—‘लेकिन कुर्सी तो वही है?’
जवाब मिला—‘कुर्सी वही है, आदमी बदल गए हैं।’
मुझे लगा, यही तो असली लोकतंत्र है।
सपना अब किसी टीवी धारावाहिक की तरह एपिसोड-दर-एपिसोड चल रहा था।
अगले दृश्य में कुछ बंदूकधारी एक स्कूल को घेरे खड़े थे। स्कूल के भीतर से बच्चों के रोने की आवाजें आ रही थीं। आवाजों में ऐसी लय थी कि समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे डर के कारण रो रहे हैं या परीक्षा के कारण।
किसी ने कहा—‘शांत रहो, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।’
दूसरे ने कहा—‘नहीं, यह शिक्षा व्यवस्था का मामला है।’
तीसरे ने कहा—‘पहले इसकी जाँच के लिए एक समिति बनाओ।’
बच्चे तब तक रोते रहे।
बाहर समिति की बैठक शुरू हो गई।
उधर एक चित्रकार पेंसिल की नोक पर भीष्म की तरह लेटा हुआ था। उसके आसपास दुनिया भर की कूंचियाँ, रंग और स्याही जमा थी। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।
मैंने पूछा—‘आप क्या बना रहे हैं?’
उसने कहा—‘शांति।’
मैंने चित्र देखा। उसमें हर तरफ बंदूकें थीं।
मैंने कहा—‘इसमें शांति कहाँ है?’
वह मुस्कराया—‘आप आधुनिक कला नहीं समझते।’
सपना और बिगड़ गया।
मुंबई के एक फ्रेंच रेस्तराँ में आतंकवादी घुस आए थे। उन्होंने ब्रिटेन के नागरिकों को बंधक बना लिया था। उनका उद्देश्य पाकिस्तान की जेल में बंद अपने साथी को छुड़ाना था।
मुझे लगा, आतंकवाद भी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मल्टीपर्पज हो गया है। घटना कहीं होती है, नागरिक किसी और देश के होते हैं, माँग किसी तीसरे देश से होती है और बयान चौथे देश की राजधानी से आता है।
इतने में ट्विन टावर ध्वस्त हुए और विमान अचानक नाव में बदल गया।
मैंने सपना देखने वाले अपने ही दिमाग से पूछा—‘यह क्या हो रहा है?’
दिमाग बोला—‘प्रतीक समझो।’
मैंने कहा—‘किस बात का?’
वह बोला—‘अब हर चीज प्रतीक है। वास्तविकता बहुत पुरानी चीज हो चुकी है।’
इसके बाद कुछ युवक गालियों को नारों की तरह बोलते हुए प्रबुद्ध बुजुर्गों की सभा में घुस आए।
बुजुर्गों ने कहा—‘बेटा, तर्क से बात करो।’
युवकों ने कहा—‘तर्क पुराना हो गया।’
बुजुर्गों ने कहा—‘तो संवाद करो।’
युवकों ने मोबाइल निकाला और लाइव हो गए।
अब सभा में कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। सभी अपने-अपने दर्शकों से बात कर रहे थे।
वहीं दूसरी ओर पेरिस में कुछ नागरिक मोमबत्तियाँ जलाकर एक मूर्ति के सामने खड़े थे। चेहरे पर दुख था। कैमरे उनके चेहरों पर घूम रहे थे। कुछ लोग रो रहे थे, कुछ तस्वीरें ले रहे थे और कुछ इस बात पर बहस कर रहे थे कि मोमबत्ती किस ब्रांड की है।
मुझे लगा, दुनिया में दुःख भी अब मीडिया-फ्रेंडली होना चाहिए।
तभी सपना अचानक फिर बदला।
मैंने देखा, शांति समिति की बैठक होने वाली है।
मैं खुश हुआ।
चलो, इतनी सारी गड़बड़ी के बाद कहीं तो शांति की बात होगी।
मोबाइल की घंटी बजी।
रात के तीन बजकर पैंतालीस मिनट थे।
मोबाइल की स्क्रीन पर संदेश चमक रहा था—
‘विश्व शांति एवं भाईचारे पर विमर्श हेतु बैठक दोपहर एक बजे गांधी हाल में आयोजित की गई है।’
मैंने राहत की साँस ली।
कम-से-कम शांति बची हुई थी।
फिर मैंने संदेश दोबारा पढ़ा।
नीचे लिखा था—
‘बैठक में प्रवेश हेतु अपना आधार, मोबाइल नंबर और ओटीपी साथ लाएँ।’
मैं फिर चौंक गया।
शांति के लिए भी ओटीपी जरूरी हो गया था।
सुबह हो चुकी थी। अखबार अब भी मेरे हाथ में था। उसका नाम वही था जो कल था। संपादकीय भी हिंदी में था। गांधी की तस्वीर भी थी। मोबाइल पर शांति समिति का संदेश भी नहीं आया था।
मैंने सोचा—अच्छा हुआ, सब सपना था।
तभी पत्नी ने आवाज लगाई—
‘सुनते हो, आज स्वतंत्रता दिवस पर होने वाली गोष्ठी में जाना है न?’
मैंने पूछा—‘किस विषय पर?’
वह बोलीं—‘ भारतीय नागरिक और राष्ट्र भाषा पर।’
मैंने राहत की साँस ली।
‘और संवाद किस भाषा में होगा?’
उन्होंने कहा—‘अंग्रेजी में। मुख्य अतिथि अमेरिका से आ रहे हैं।’
मैं कुछ देर चुप रहा।
फिर अखबार समेटा और सोचने लगा—
शायद सपना अभी खत्म नहीं हुआ है।
ब्रजेश कानूनगो
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