चड्डी-बनियान लिमिटेड : चौर्य प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल
बेचारे चड्डी-बनियान यूँ ही चर्चा में आ जाते हैं। देश में चाहे कुछ भी हो जाए, पुलिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक न एक बार उनका नाम अवश्य आ जाता है। किसी मोहल्ले में चोरी हुई नहीं कि घोषणा हो जाती है—"यह चड्डी-बनियान गिरोह का काम है।"
मुझे हमेशा इन गरीब कपड़ों पर दया आती है। अपराध उनका नहीं, बदनामी उनकी। जैसे अपराधी ने चोरी नहीं की, चड्डी और बनियान ने मिलकर षड्यंत्र रच दिया हो।
वैसे अगर ऊपरी कपड़ों का लोकतंत्र समाप्त कर दिया जाए तो हम सब मूलतः इसी बिरादरी के सदस्य हैं। अंतर केवल इतना है कि किसी के ऊपर कुर्ता है, किसी के ऊपर सूट है, किसी के ऊपर सत्ता है और किसी के ऊपर सदाचार का इस्त्री किया हुआ कोट। भीतर सबकी नागरिकता चड्डी-बनियान ही है।
मुझे लगता है कि इस गिरोह की सबसे बड़ी कमजोरी उसका प्रबंधन है। आज सफलता का पहला सूत्र है—अपराध नहीं, उसका मैनेजमेंट। अकेला चोर पकड़ा जाता है, संगठित चौर्य व्यवस्था सम्मानित कहलाती है।
अब जमाना बदल गया है। चोरी भी स्टार्टअप की तरह चलती है। पहले सेंध लगती थी, अब सर्वर हैक होते हैं। पहले ताला टूटता था, अब ओटीपी टूटता है। पहले जेब कटती थी, अब बैंक खाते मुस्कुराते-मुस्कुराते खाली हो जाते हैं। पहले चोर रात में आता था, अब दिनदहाड़े वीडियो कॉन्फ़्रेंस में शामिल रहता है।
हर सफल अभियान की तरह चोरी के भी विभाग होते हैं—रणनीति प्रकोष्ठ, कानूनी सलाहकार, डिजिटल विशेषज्ञ, जनसंपर्क अधिकारी, सोशल मीडिया प्रबंधक और आवश्यकता पड़ने पर चरित्र प्रमाणपत्र देने वाले शुभचिंतक भी। इसे आधुनिक भाषा में इकोसिस्टम कहते हैं।
हमारे समाज ने भी शब्दों का बड़ा सुंदर वर्गीकरण किया है। सेवा करने वालों का दल, विचार रखने वालों का समूह, चुनाव लड़ने वालों का मोर्चा, कारोबार करने वालों का नेटवर्क और चोरी करने वालों का गिरोह। फर्क केवल शब्दों का है, संगठन की कार्यप्रणाली लगभग एक जैसी रहती है।
हर संगठन की अपनी वर्दी होती है। कहीं खादी पहचान है, कहीं भगवा, कहीं हरा, कहीं सफेद, कहीं काला कोट, कहीं महँगा सूट और कहीं केवल चड्डी-बनियान। वर्दी देखकर आदमी का चरित्र नहीं, उसका विभाग पता चलता है।
पुराने डाकू कम से कम ईमानदार थे। घोड़े पर आते थे, बंदूक दिखाते थे और साफ़-साफ़ कह देते थे—"जो है, निकाल दो।" आज के सभ्य लुटेरे पहले मुस्कराते हैं, फिर आश्वासन देते हैं, उसके बाद नियम समझाते हैं और अंत में आपकी जेब को राष्ट्रहित में हल्का कर देते हैं। आप लुट भी जाते हैं और धन्यवाद भी कहते हैं।
चड्डी-बनियान गिरोह की एक और त्रासदी है। यह बेचारा कैमरे में जल्दी आ जाता है। सीसीटीवी उसे पहचान लेता है, पुलिस पकड़ लेती है और मीडिया उसे राष्ट्र का सबसे बड़ा खतरा घोषित कर देती है।
लेकिन जिनके अपराधों पर ब्रांडेड कपड़ों की प्रेस इतनी शानदार होती है कि सिलवटें तक दिखाई नहीं देतीं, वे वर्षों तक सम्मानित नागरिक बने रहते हैं। उनका अपराध कभी "अनियमितता", कभी "वित्तीय गड़बड़ी", कभी "प्रक्रियागत त्रुटि" और कभी "जांच का विषय" बन जाता है। अपराध भी कपड़ों की तरह वर्गभेदी होता है।
छोटा चोर माल लेकर भागता है, बड़ा चोर व्यवस्था लेकर चलता है। छोटा चोर जेल जाता है, बड़ा चोर जमानत, बहस, समिति, आयोग और प्रेस विज्ञप्तियों के बीच अपना भविष्य सुरक्षित कर लेता है। छोटे चोर के पास चड्डी-बनियान होती है, बड़े चोर के पास प्रतिष्ठा का ब्लेज़र।
कभी-कभी लगता है कि चड्डी-बनियान गिरोह को किसी बड़े प्रबंधन संस्थान में भेज देना चाहिए। वहां उन्हें सिखाया जाएगा कि चोरी से अधिक महत्वपूर्ण है छवि प्रबंधन, अपराध से अधिक उपयोगी है कथानक प्रबंधन, और पकड़े जाने से बचने का सबसे आसान उपाय है—इतने सम्मानित दिखाई दीजिए कि किसी को आप पर संदेह ही न हो।
तब शायद पुलिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पहली बार यह सुनने को मिले—"इस बार चड्डी-बनियान गिरोह नहीं, सूट-बूट प्रबंधन समूह सक्रिय था।"
उस दिन चड्डी और बनियान पहली बार सम्मान के साथ अलमारी में टाँग दिए जाएँगे और कहेंगे—"देखा, बदनाम हम थे, हुनर किसी और का था।"
ब्रजेश कानूनगो
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