गड्ढों का लोकतांत्रिक योगदान और दर्शन
‘गड्ढा’ होना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। प्राकृतिक संरचना में सतह से थोड़ी-सी नीचे चली गई जगह ‘गड्ढा’ कहलाती है और वही धरती थोड़ी ऊपर उठ जाए तो ‘टीला’ हो जाती है। ऊपर उठना सम्मानजनक और नीचे धँसना अपमानजनक—मनुष्य ने विकास का शायद यही सबसे सरल पैमाना बनाया है। जबकि प्रकृति को इससे कोई शिकायत नहीं। उसके यहाँ पर्वत भी हैं और समुद्र भी, पठार भी हैं और घाटियाँ भी। सबका अपना महत्व है।
लेकिन हमारे समय में गड्ढों की बड़ी भद्द पिट रही है।
खासकर सड़कों के गड्ढों की। जैसे देश की सारी समस्याओं की जड़ यही हों। कोई व्यक्ति सड़क के गड्ढे में गिर जाए तो नगरपालिका को कोसता है, सरकार को कोसता है, ठेकेदार को याद करता है और अंत में अपने भाग्य को दोष देकर उठ खड़ा होता है। बेचारा गड्ढा चुपचाप वहीं पड़ा रहता है। उसका क्या दोष?
मुझे तो लगता है कि गड्ढों को बदनाम करने की कोई सुनियोजित साजिश चल रही है। पहचान के केवल एक पक्ष को बार-बार सामने रखकर उसके उजले पक्ष पर पर्दा डाल दिया गया है। गड्ढा सदियों से निर्विकार भाव से प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था की सेवा करता आया है, मगर उसका कभी सम्मान नहीं हुआ।
जरा धरती के नीचे झाँककर देखिए। सोना, चाँदी, लोहा, कोयला, तेल, गैस और न जाने कितनी बहुमूल्य संपदाएँ गड्ढों के रास्ते ही मनुष्य तक पहुँची हैं। खनन के लिए गड्ढे खोदिए, धरती का सीना चीरिए और फिर घोषणा कीजिए—देश विकास कर रहा है।
सड़क पर वही गड्ढा हो जाए तो विकास का पहिया अचानक पंचर हो जाता है।
यह कैसी विडंबना है!
धरती के नीचे का गड्ढा ‘खनन परियोजना’ है और सड़क के ऊपर का गड्ढा ‘लापरवाही’। एक से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, दूसरे से नागरिक की कमर।
वैसे गड्ढे का संबंध केवल अर्थव्यवस्था से नहीं, भूगोल और सौंदर्यशास्त्र से भी है। पृथ्वी का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं एक विराट गड्ढे में भरे पानी से बना है। हम उसे समुद्र कहते हैं। उसी समुद्र के भीतर न जाने कितने संसाधन, जीव-जंतु और रहस्य छिपे हैं। समुद्र न होता तो जमीन के ऊँचे हिस्से की ऊँचाई का पता कैसे चलता? घाटियाँ न होतीं तो पर्वतों का गौरव किसे समझ आता?
अर्थात गड्ढा ऊँचाई की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
फिर सड़क पर कुछ गड्ढे हो गए तो इतना हंगामा क्यों?
बरसात आई, पानी भरा, बच्चों ने कागज की नाव चला दी, किसी कलाकार ने कीचड़ में भारत का नक्शा खोज लिया—इसमें भी तो रचनात्मकता है। आजकल जब हर चीज में ‘कंटेंट’ खोजा जा रहा है, तब गड्ढे भी नागरिकों को मनोरंजन और सोशल मीडिया सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। कोई गड्ढे में गिरते हुए वीडियो बना रहा है, कोई उसके किनारे सेल्फी ले रहा है और कोई उसी गड्ढे को लेकर सरकार से सवाल पूछ रहा है।
लोकतंत्र में इससे अधिक उपयोगी गड्ढा और क्या होगा?
गड्ढे हमें धैर्य भी सिखाते हैं। सड़क पर गड्ढा आज बना है तो उसे भरने की जल्दी क्यों? पहले शिकायत होगी, फिर निरीक्षण होगा, फिर टेंडर निकलेगा, फिर स्वीकृति होगी, फिर ठेकेदार आएगा और तब तक अगली बारिश आ जाएगी। गड्ढा अपने चरित्र में कितना लोकतांत्रिक है—हर नागरिक को समान अवसर देता है। कार हो, बाइक हो, स्कूटर हो या पैदल आदमी—सबको अपनी क्षमता के अनुसार झटका मिलता है।
कहीं-कहीं तो गड्ढे इतने स्थायी हो चुके हैं कि सड़क उनसे जुड़ी हुई लगती है। सड़क गायब हो जाए तो शायद लोग परेशान हों, लेकिन गड्ढा गायब हो जाए तो उन्हें चिंता होने लगेगी कि आखिर विकास का प्रमाण कहाँ गया?
हमारी विकास-यात्रा में गड्ढों का योगदान कम करके नहीं आँका जा सकता। जितना बड़ा प्रोजेक्ट, उतना बड़ा उद्घाटन और कभी-कभी उतने ही बड़े गड्ढे। नई सड़क का उद्घाटन होने के कुछ समय बाद उसमें गड्ढा दिखाई दे जाए तो इसे केवल निर्माण की कमी समझना ठीक नहीं। इसे यह भी समझा जा सकता है कि सड़क अब लोकतांत्रिक जीवन में प्रवेश कर चुकी है।
और फिर गड्ढे केवल बाहर नहीं होते।
हमारी राजनीति में गड्ढे हैं, अर्थव्यवस्था में गड्ढे हैं, व्यवस्था में गड्ढे हैं, बजट में गड्ढे हैं और वादों में तो इतने गहरे गड्ढे हैं कि उनमें पूरा चुनावी घोषणापत्र समा जाए। इन गड्ढों पर हम अक्सर फूल डाल देते हैं और उद्घाटन कर देते हैं।
सड़क का गड्ढा कम से कम दिखाई तो देता है।
चेहरे पर पड़ने वाले गड्ढों को ही देखिए। गालों में पड़ने वाले डिम्पल कितने आकर्षक लगते हैं। वही गड्ढा सड़क पर हो तो दुर्घटना, चेहरे पर हो तो सौंदर्य। इससे सिद्ध होता है कि दोष गड्ढे में नहीं, हमारी दृष्टि में है।
इसलिए इन निरीह गड्ढों के कारण अधिक दुखी होना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। तनाव बढ़ेगा, चेहरा सिकुड़ेगा, माथे पर लकीरें आएँगी और गालों के प्राकृतिक गड्ढे भी कम आकर्षक लगने लगेंगे।
बेहतर है कि गड्ढों को नए नजरिए से देखें।
जहाँ सड़क में गड्ढा दिखे, वहाँ शिकायत करने से पहले एक क्षण रुकिए और सोचिए—यह केवल गड्ढा नहीं, हमारी व्यवस्था का खुला हुआ मुँह भी हो सकता है, जो पूछ रहा है कि विकास की बातें बहुत हो गईं, अब मुझे भरोगे भी या अगली बरसात का इंतजार करोगे?
फिर मुस्कुराइए।
आखिर गड्ढे हैं तो भरने की संभावना भी है। और जब तक भर नहीं जाते, तब तक उनमें छुपे सुख खोजते रहिए।
क्योंकि इस देश में कई बार गड्ढे भरने से पहले ही उनके नाम पर योजनाएँ, बजट और उद्घाटन भरपूर हो जाते हैं।
गड्ढे का इससे बड़ा लोकतांत्रिक योगदान और क्या होगा!
ब्रजेश कानूनगो
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