महाराज श्रृंखला 16 : चेहरा ही घोषणा-पत्र था
शिक्षा मंत्री महाराज की प्रसिद्धि अब शिक्षा मंत्रालय की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी थी।
पहले लोग उन्हें शिक्षा मंत्री के रूप में जानते थे। फिर उन्हें ऐसा शिक्षा मंत्री मानने लगे, जो शिक्षा के अलावा सब कुछ जानता है। धीरे-धीरे यह धारणा भी बनने लगी कि वे जो कुछ जानते हैं, वही देश के लिए जानना आवश्यक है और जो वे नहीं जानते, उसे जानने की नागरिकों को कोई जरूरत नहीं।
ज्ञान रिपु की लेखनी का इसमें विशेष योगदान था।
ज्ञान रिपु ने महाराज के भाषणों में इतने अलंकार भर दिए थे कि साधारण वाक्य भी दर्शन का रूप लेने लगे थे। महाराज यदि कहते—
“हम शिक्षा को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।”
तो ज्ञान रिपु उसी बात को लिखते—
“हम उस ज्ञान-सूर्य का उदय करेंगे, जिसकी स्वर्णिम किरणें अज्ञान के अंतिम अंधकार को चीरते हुए राष्ट्र की आत्मा के प्रत्येक कोने को आलोकित करेंगी।”
महाराज मंच पर आते, दो क्षण आंखें बंद करते, फिर धीरे से खोलते।
नटराज ने उन्हें सिखाया था कि आंखें खोलने का भी एक समय होता है और जनता के सामने आंखें खोलने से पहले थोड़ी देर बंद रखना चाहिए। इससे जनता को लगता है कि नेता अभी-अभी भीतर से कोई बहुत बड़ा सत्य खोजकर लाया है।
महाराज ने अभिनय को भी अपनी राजनीति का आवश्यक अंग बना लिया था।
कभी वे किसान के बीच जाकर मिट्टी हाथ में उठा लेते।
कभी किसी विद्यालय में बच्चे के सिर पर हाथ रख देते।
कभी किसी मजदूर से गले मिलते।
कभी किसी बूढ़ी महिला की बात सुनकर इतने भावुक हो जाते कि कैमरे स्वयं भावुक होकर उनके चारों ओर घूमने लगते।
इन दृश्यों का प्रसारण होता।
अगले दिन अखबारों में शीर्षक छपते—
“महाराज ने फिर जीता जनता का दिल।”
जनता सचमुच दिल हारती जा रही थी।
किसी को यह पूछने की फुर्सत नहीं थी कि दिल हारने के बाद जेब में क्या बचा है।
महाराज की घोषणाओं का भी अपना एक अलग संसार था।
वे रोज कोई न कोई घोषणा करते।
कभी देश में ज्ञान क्रांति की घोषणा होती।
कभी रोजगार क्रांति की।
कभी गांवों को शहर बनाने की।
कभी शहरों को विश्वस्तरीय बनाने की।
कभी नदियों को स्वच्छ करने की।
कभी हवा को शुद्ध करने की।
कभी युवाओं को अवसर देने की।
कभी बुजुर्गों को सम्मान देने की।
और कभी यह घोषणा कि अब घोषणाओं को भी परिणामों से जोड़ दिया जाएगा।
जनता इन घोषणाओं को सुनती और आश्वस्त होती।
जनता को अब परिणामों की आदत कम और आश्वासन की आदत अधिक हो गई थी।
इसी बीच देश में आम चुनाव घोषित हो गए।
पार्टी के पुराने नेता चुनाव की तैयारी में जुट गए।
बैठकें हुईं।
समितियां बनीं।
रणनीतियां बनीं।
रणनीतियों पर उप-रणनीतियां बनीं।
फिर सबने एक-दूसरे की ओर देखा।
तय हुआ कि इस बार पार्टी को किसी रणनीति की जरूरत नहीं है।
महाराज ही पर्याप्त हैं।
पार्टी ने अपने चुनाव अभियान का नया सूत्र वाक्य बनाया—
“चेहरा वही, भरोसा वही।”
फिर किसी ने सुझाव दिया कि चेहरा बड़ा होना चाहिए।
पोस्टर पर।
बैनर पर।
होर्डिंग पर।
दीवारों पर।
मोबाइल स्क्रीन पर।
टीवी पर।
चौराहों पर।
सरकारी विज्ञापनों में।
जहां जगह मिले वहां।
और जहां जगह न मिले, वहां जगह बनाकर।
कुछ दिनों में ऐसा लगने लगा जैसे देश में चुनाव नहीं, महाराज का जन्मदिन मनाया जा रहा हो।
पार्टी का चुनाव चिह्न छोटा पड़ गया था।
महाराज का चेहरा बड़ा हो गया था।
उम्मीदवारों के नाम छोटे हो गए थे।
महाराज का नाम बड़ा हो गया था।
घोषणा-पत्र मोटा था, लेकिन उसे पढ़ने वाला कोई नहीं था।
क्योंकि घोषणा-पत्र के ऊपर महाराज की तस्वीर इतनी बड़ी थी कि नीचे लिखी बातें दिखाई ही नहीं देती थीं।
पार्टी के एक वरिष्ठ रणनीतिकार ने कहा—
“अब मतदाता को उम्मीदवार की जरूरत नहीं। उसे केवल यह पता होना चाहिए कि उम्मीदवार महाराज के साथ है।”
दूसरे ने कहा—
“और यदि उम्मीदवार के साथ महाराज की तस्वीर है तो उम्मीदवार का परिचय देने की भी जरूरत नहीं।”
तीसरे ने बात को और आगे बढ़ाते हुए कहा—
“जहां उम्मीदवार कमजोर हो, वहां महाराज की तस्वीर और बड़ी कर दीजिए।”
यह सुझाव सर्वसम्मति से पारित हुआ।
चुनाव अभियान शुरू हुआ।
महाराज जहां जाते, भीड़ उमड़ती।
भीड़ जहां नहीं उमड़ती, वहां व्यवस्था की ओर से भीड़ उपलब्ध कराई जाती।
मंच सजते।
गीत बजते।
नारे लगते।
और फिर महाराज आते।
उनके आने से पहले उनके आने की घोषणा होती।
उनके आने के बाद उनके आने की सफलता की घोषणा होती।
और अगले दिन उनके आने की लोकप्रियता की घोषणा होती।
महाराज कहते—
“यह चुनाव देश के भविष्य का चुनाव है।”
जनता तालियां बजाती।
महाराज कहते—
“यह चुनाव विकास की दिशा तय करेगा।”
तालियां और तेज हो जातीं।
महाराज कहते—
“आपने मुझे शिक्षा मंत्री के रूप में देखा है। अब मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि देश को भी एक नई शिक्षा मिलेगी।”
लोगों को इस वाक्य का अर्थ समझ में नहीं आया, लेकिन वे फिर भी तालियां बजाते रहे।
ज्ञान रिपु मंच के पीछे खड़े मुस्करा रहे थे।
उन्होंने महाराज से कहा—
“महाराज, आपने बहुत अच्छा कहा।”
महाराज ने पूछा—
“मैंने क्या कहा?”
ज्ञान रिपु ने उत्तर दिया—
“यही तो आपकी सबसे बड़ी विशेषता है महाराज। जनता को यह पता नहीं चलता कि आपने क्या कहा, लेकिन उसे विश्वास रहता है कि आपने बहुत महत्वपूर्ण कुछ कहा है।”
नटराज ने भी मुस्कराकर सिर हिलाया।
अभिनय सफल था।
भाषण सफल था।
चेहरा सफल था।
चुनाव भी सफल हो गया।
परिणाम आए।
पार्टी फिर सत्ता में आ गई।
पुराने प्रधानमंत्री ने परिणाम सुनकर मुस्कराते हुए कहा—
“जनता ने फिर आशीर्वाद दिया है।”
किसी पत्रकार ने पूछा—
“अब आगे क्या?”
प्रधानमंत्री ने कहा—
“अब पार्टी तय करेगी।”
पार्टी ने तय कर लिया।
कुछ पुराने नेता, जो वर्षों से सत्ता में थे, अचानक राष्ट्र के लिए बहुत मूल्यवान हो गए।
इतने मूल्यवान कि उन्हें अब सक्रिय राजनीति से हटाकर सलाहकार मंडल में सुरक्षित रख दिया गया।
सलाहकार मंडल ऐसा स्थान था जहां अनुभव की कोई कमी नहीं थी और अधिकार की कोई अधिकता नहीं थी।
वयोवृद्ध नेता वहां बैठकर देश, लोकतंत्र, राजनीति और अपने पुराने अनुभवों पर विचार कर सकते थे।
उनकी सलाह ली भी जा सकती थी।
और यदि सलाह बहुत उपयोगी हो तो उसे सम्मानपूर्वक सुना भी जा सकता था।
बस उसे मानना आवश्यक नहीं था।
एक वरिष्ठ नेता ने नए प्रधानमंत्री से पूछा—
“हमारी भूमिका क्या होगी?”
उत्तर मिला—
“आप राष्ट्र के मार्गदर्शक हैं।”
“और निर्णय?”
“वह नई पीढ़ी करेगी।”
“और हमारी सलाह?”
“वह इतिहास में दर्ज होगी।”
वयोवृद्ध नेता संतुष्ट हो गए।
इतिहास में दर्ज होना बुरा नहीं होता।
सत्ता में दर्ज होना कठिन होता है।
उधर पार्टी के भीतर एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ।
प्रधानमंत्री कौन बने?
नामों की चर्चा हुई।
कुछ अनुभवी नेताओं के नाम आए।
कुछ युवा नेताओं के नाम आए।
कुछ ऐसे नेताओं के नाम आए जिन्हें स्वयं भी पता नहीं था कि उनका नाम चल रहा है।
लेकिन हर चर्चा अंततः महाराज के नाम पर आकर रुक जाती।
महाराज अब केवल लोकप्रिय नहीं थे।
वे अपरिहार्य हो चुके थे।
पार्टी के एक नेता ने कहा—
“देश को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए, जिसे जनता अपना समझे।”
दूसरे ने कहा—
“महाराज को जनता अपना समझती है।”
तीसरे ने कहा—
“तो फिर समस्या क्या है?”
समस्या कोई नहीं थी।
और इसीलिए महाराज को देश का नया प्रधानमंत्री चुन लिया गया।
शपथ ग्रहण का दिन आया।
महाराज ने सफेद वस्त्र पहने।
चेहरे पर वही गंभीरता थी, जो नटराज ने सिखाई थी।
ज्ञान रिपु ने शपथ के आसपास के वातावरण को भी साहित्यिक बना दिया था।
हवा चल रही थी।
ध्वज लहरा रहा था।
सूरज चमक रहा था।
और देश का भविष्य भी कहीं न कहीं चमक रहा था।
महाराज ने शपथ ली।
कैमरे उनकी ओर मुड़ गए।
देश ने पहली बार उन्हें शिक्षा मंत्री के रूप में नहीं, प्रधानमंत्री के रूप में देखा।
ज्ञान रिपु ने उसी रात अपनी डायरी में लिखा—
“आज महाराज ने पद नहीं संभाला। आज पद ने महाराज को संभाला है।”
फिर उन्होंने उस वाक्य को काट दिया।
उन्हें लगा, यह कुछ कम प्रभावशाली है।
उन्होंने दूसरा वाक्य लिखा—
“आज राष्ट्र ने अपने भाग्य का नया अध्याय महाराज के करकमलों से लिखवाया।”
यह उन्हें बेहतर लगा।
उन्होंने अगले दिन इसे अखबार के लिए भेज दिया।
अखबार में वह शीर्षक बन गया।
और उसी दिन देश के अधिकांश सरकारी कार्यालयों में महाराज के नए चित्र लगाए जाने लगे।
शिक्षा मंत्रालय से लेकर ग्राम पंचायत तक।
जहां पहले महाराज की तस्वीर के नीचे लिखा था—
“शिक्षा मंत्री”
वहां अब केवल लिखा था—
“प्रधानमंत्री।”
कई जगह पदनाम भी हट गया।
क्योंकि अब लोगों को पद बताने की आवश्यकता नहीं थी।
चेहरा ही पद था।
चेहरा ही संदेश था।
चेहरा ही भरोसा था।
और धीरे-धीरे ऐसा समय आने लगा जब लोग घोषणाओं पर विश्वास करने से पहले यह नहीं देखते थे कि घोषणा क्या है।
वे केवल यह देखते थे कि घोषणा किस चेहरे से निकली है।
महाराज के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं थी कि देश को कैसे चलाया जाए।
चुनौती यह थी कि देश को यह कैसे विश्वास दिलाया जाए कि वह ठीक उसी दिशा में चल रहा है, जिस दिशा में महाराज देख रहे हैं।
और महाराज जिस दिशा में देखते थे, उधर कैमरे पहले से लगे रहते थे।
ब्रजेश कानूनगो
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