छौंक लगाने वाले
मोहल्ले में पहले भी छौंक लगता था।
दाल में। सब्जी में। कभी-कभी कढ़ी में भी।
छौंक की खुशबू घर की चारदीवारी का सम्मान नहीं करती थी। वह पड़ोसी के घर चली जाती थी। कोई रोकता नहीं था। खुशबू को कौन रोक सकता था?
शाम को किसी के घर से अगरबत्ती की महक आती तो पता नहीं चलता था कि किसकी है। लोबान का धुआँ हवा के साथ घूमता हुआ गली के दूसरे छोर तक पहुँच जाता। चिड़िया किसी की छत पर बैठती, फिर किसी दूसरे की छत पर चली जाती। तितली को फूल का धर्म मालूम नहीं था और हवा को दीवारों का।
मोहल्ला चलता था।
फिर कुछ लोगों ने तय किया कि मोहल्ले को चलने नहीं देना चाहिए।
उन्होंने सबसे पहले बकरी को पकड़ा।
रामचरण की बगीची में सलीम की बकरी घुस गई थी।
पुराने जमाने में इसका इलाज बड़ा सरल था। रामचरण बकरी को भगाता, सलीम उसे पकड़ता और दोनों कुछ देर एक-दूसरे को देखकर अपने-अपने काम में लग जाते।
लेकिन अब जमाना बदल गया था।
बकरी के बगीची में घुसने को किसी ने मोबाइल पर रिकॉर्ड कर लिया।
वीडियो बना।
वीडियो के ऊपर संगीत लगा।
फिर एक उत्तेजक शीर्षक लगा।
फिर किसी ने कहा—“यह सिर्फ बकरी का मामला नहीं है।”
बस, यहीं से असली छौंक शुरू हुआ।
बकरी ने लौकी खाई थी, मगर चर्चा लोकतंत्र की होने लगी।
किसी ने कहा—“साजिश है।”
दूसरे ने कहा—“पुरानी साजिश है।”
तीसरे ने कहा—“हमने पहले ही चेतावनी दी थी।”
चौथे ने पूछा—“बकरी किसकी थी?”
पाँचवें ने कहा—“यही तो असली सवाल है।”
छठे ने कहा—“सवाल पूछने वाले से पूछिए कि वह किसके साथ है।”
अब तक बकरी चुपचाप जुगाली कर रही थी।
उसे शायद समझ नहीं आ रहा था कि उसने लौकी खाई है या देश की अखंडता।
टीवी पर बहस शुरू हो गई।
एक तरफ पाँच लोग थे, दूसरी तरफ पाँच लोग थे और बीच में एक एंकर था जो सबको एक साथ बोलने का राष्ट्रीय अवसर दे रहा था।
एंकर ने घोषणा की—
“आज का सबसे बड़ा सवाल—बकरी बगीची में क्यों घुसी? क्या इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है? हमारे साथ विशेषज्ञ मौजूद हैं।”
विशेषज्ञों में एक कृषि वैज्ञानिक था, एक पूर्व अधिकारी, एक सोशल मीडिया विश्लेषक और एक ऐसा व्यक्ति भी था जिसने पिछले पंद्रह वर्षों में हर विषय पर अपनी राय दी थी।
कृषि वैज्ञानिक ने कहा—“बकरी हरी सब्जियों की ओर आकर्षित होती है।”
एंकर ने उन्हें बीच में रोक दिया।
“लेकिन आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह सामान्य घटना है? क्या आप किसी बड़ी साजिश से इनकार कर रहे हैं?”
वैज्ञानिक चुप हो गया।
उसे पहली बार लगा कि विज्ञान से ज्यादा ताकतवर चीज होती है—टीआरपी।
अगले दिन सोशल मीडिया पर हैशटैग चल रहा था—
बकरी का सच,
कुछ ही देर में दूसरा हैशटैग आया—
बगीची खतरे में,
फिर तीसरा—
कौन है बकरी के पीछे,
लोगों ने बकरी के पुराने फोटो खोज लिए।
किसी ने दावा किया कि बकरी छह महीने पहले भी रामचरण की बगीची के आसपास देखी गई थी।
किसी ने उसके चलने के ढंग से उसकी मानसिकता समझ ली।
किसी ने उसके सींगों में षड्यंत्र देख लिया।
किसी ने कहा—“बकरी तो केवल मोहरा है।”
अब बकरी मोहरा थी।
रामचरण मोहरा था।
सलीम मोहरा था।
मोहल्ला मोहरा था।
बस, छौंक लगाने वाले खिलाड़ी थे।
उन्होंने घटना को कड़ाही में डाला और उसमें अपनी-अपनी मिर्च डालते गए।
किसी ने इतिहास का मसाला डाला।
किसी ने धर्म का।
किसी ने जाति का।
किसी ने राष्ट्र का।
किसी ने अपमान का।
और सोशल मीडिया ने ऊपर से इतना गरम तेल डाला कि देखते-देखते पूरी बस्ती धुआँ-धुआँ हो गई।
अब किसी को यह याद नहीं था कि विवाद शुरू किस बात पर हुआ था।
यह छौंक की सफलता थी।
छौंक लगाने वाले हमेशा यही चाहते हैं।
लोग कारण भूल जाएँ और स्वाद याद रखें।
अब मोहल्ले में नई सावधानियाँ बरती जाने लगीं।
किसी के घर से खुशबू आए तो पहले उसकी पहचान करो।
किसी की छत पर चिड़िया बैठे तो देखो कहाँ से आई है।
किसी की खिड़की से आती छाया पर भरोसा मत करो।
किसी के घर की अगरबत्ती तुम्हारे घर तक पहुँच जाए तो यह भी जाँच का विषय हो सकता है।
हवा पर तो विशेष निगरानी रखी गई।
हवा ने आपत्ति की।
कहा—“मैं तो हवा हूँ।”
लोगों ने कहा—“यही तो समस्या है। तुम कहीं की भी हो सकती हो।”
हवा चुप हो गई।
उसे पहली बार मनुष्य की राजनीति समझ में आई।
जिस हवा ने सदियों से मंदिर की घंटी और मस्जिद की अजान को एक ही आकाश में ढोया था, अब उससे पूछा जा रहा था कि वह किस ओर से आती है।
जिस धूप ने किसी का आँगन छोटा-बड़ा नहीं समझा था, उसके भी आने-जाने पर संदेह होने लगा।
मोहल्ले में लोग अब एक-दूसरे से कम और मोबाइल से ज्यादा बातें करने लगे।
सुबह उठते ही पड़ोसी का चेहरा देखने से पहले फोन देखा जाता।
कौन नाराज है?
कौन आहत है?
किसने किसे जवाब दिया?
किसने किसका वीडियो साझा किया?
किसने किसे देशद्रोही कहा?
किसने किसे प्रमाणपत्र दिया?
किसी को समय नहीं था कि वह सामने बैठे आदमी से पूछ सके—
“भाई, तुम्हारे घर में सब ठीक है?”
क्योंकि यह सवाल वायरल नहीं होता।
दुःख वायरल नहीं होता।
भूख वायरल नहीं होती।
बेरोजगारी वायरल नहीं होती।
बुजुर्ग की दवा वायरल नहीं होती।
पड़ोसी की बीमारी वायरल नहीं होती।
हाँ, एक आदमी दूसरे आदमी से नफरत करता दिखाई दे जाए तो वह खूब वायरल होता है।
क्योंकि नफरत में मसाला है।
और मसाले का बाजार बहुत बड़ा है।
मुझे लगता है, हमारे समय का सबसे सफल उद्योग यही है—छौंक उद्योग।
इसमें कच्ची घटनाएँ कहीं से भी उठाई जाती हैं।
उन्हें कड़ाही में डाला जाता है।
फिर मिर्च, नमक, इतिहास, धर्म, अपमान और शक मिलाया जाता है।
तेज आँच पर पकाया जाता है।
फिर सोशल मीडिया की प्लेट में परोसा जाता है।
लोग खाते हैं।
पचाते नहीं।
फिर अगली थाली माँगते हैं।
इस पूरे उद्योग में सबसे दुखद बात यह है कि असली बकरी अब भी वही है।
वह न राजनीति समझती है, न इतिहास।
उसे बस हरी सब्जी दिखाई देती है।
वह आज भी कभी-कभी किसी की बगीची में चली जाती है।
रामचरण आज भी उसे भगाता है।
सलीम आज भी उसे पकड़कर ले जाता है।
दोनों कभी-कभी अब भी एक-दूसरे को देखते हैं।
शायद दोनों के मन में आता है कि पहले ऐसा नहीं था।
पहले हम बकरी को बकरी समझते थे।
अब हम बकरी में इतिहास खोजते हैं।
सब्जी में पहचान।
खुशबू में षड्यंत्र।
हवा में पक्ष।
और पड़ोसी में दुश्मन।
मगर छौंक लगाने वाले संतुष्ट हैं।
उनका धंधा चल रहा है।
कड़ाही गरम है।
तेल पर्याप्त है।
मसाला भरपूर है।
और सबसे अच्छी बात यह है कि धुआँ उठते ही हमें दिखाई देना बंद हो जाता है कि सामने खड़ा आदमी कौन है।
हम आँखों में पानी लिए पूछते हैं—
“इतना धुआँ कहाँ से आ रहा है?”
छौंक लगाने वाला मुस्कराता है।
वह जानता है।
धुआँ दाल से नहीं उठ रहा।
धुआँ हमारे भीतर पकाई जा रही नफरत से उठ रहा है।
और जब तक हम यह पहचानेंगे, तब तक शायद रामचरण की बगीची में सब्जियाँ कम और राख ज्यादा बची होगी।
बकरी फिर भी कहीं न कहीं हरी घास खोज लेगी।
और आदमी?
उसे फिर से आदमी खोजने में बहुत समय लगेगा।
ब्रजेश कानूनगो
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