माई री, मैं कापे लिखूँ...!
सुबह से वह देश बचाने में लगा था।
देश बचाने का उसका तरीका थोड़ा अलग था। उसने घर की सारी खिड़कियाँ खोल रखी थीं, लैपटॉप की भी। एक स्क्रीन पर समाचार चैनल बिना आवाज़ के चिल्ला रहे थे, दूसरी पर एक्स हर तीसरे सेकंड नया राष्ट्रनिर्माण कर रहा था, तीसरी पर फेसबुक अपने पुराने झगड़ों को नए कमेंटों से सींच रहा था और चौथी पर एक खाली डॉक्यूमेंट उसका मुँह चिढ़ा रहा था।
उस डॉक्यूमेंट में उसने शीर्षक लिखा—"लोकतंत्र की नई विडंबना।"
तभी किसी मंत्री ने बयान बदल दिया।
शीर्षक मिटा दिया।
लिखा—"बयानों का मौसम।"
इतने में एक अभिनेता ने माफ़ी माँग ली।
फिर मिटा दिया।
लिखा—"माफ़ियों का महोत्सव।"
तभी एक बाबा गिरफ्तार हो गए।
शीर्षक फिर बदल गया।
इतने में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी आ गई। उधर किसी खिलाड़ी ने संन्यास वापस ले लिया। इधर एक इन्फ्लुएंसर ने राष्ट्रहित में नया वीडियो डाल दिया।
अब शीर्षक लिखने की बजाय उसने माथा पकड़ लिया।
वह सोचने लगा—समाचार अब घटनाएँ नहीं रहे, फटाफट बनने वाले इंस्टैंट नूडल्स हो गए हैं। जब तक पानी उबलता है, नया पैकेट खुल जाता है।
व्यंग्यकार की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि विषय कम हैं; त्रासदी यह है कि विषय इतने अधिक हैं कि किसी एक का अपमान किए बिना दूसरे का सम्मान नहीं हो सकता।
कभी सरकार बुलाती है—"हम पर लिखो।"
विपक्ष पीछे से खींचता है—"पहले इन पर लिखो।"
सेलिब्रिटी कहते हैं—"हम ट्रेंड कर रहे हैं।"
बाबा कहते हैं—"हमारे बिना व्यंग्य अधूरा रहेगा।"
एंकर गरजते हैं—"आज रात का मुद्दा यही है।"
और एआई विनम्रता से पूछता है—"क्या मैं आपका व्यंग्य और बेहतर बना दूँ?"
बेचारा व्यंग्यकार सोचता है—"अब मैं रह ही किसलिए गया हूँ?"
पहले व्यंग्यकार विषय खोजता था। अब विषय व्यंग्यकार को खोज लेते हैं। मोबाइल पर घंटी बजती है और हर नोटिफिकेशन कहता है—"मुझे छोड़कर किसी और पर लिखा तो पछताओगे।"
एक ज़माना था जब लेखक डाकखाने की गति से चलता था। अब उसे इंटरनेट की गति से भी तेज़ भागना पड़ता है। रचना पूरी होने से पहले उसका विषय बूढ़ा हो जाता है। अब साहित्य में कालजयी होने से पहले कालसंगत होना ज़रूरी है।
संपादक भी बेचारा क्या करे! उसे व्यंग्य नहीं, ताज़गी चाहिए। कल का शानदार व्यंग्य आज बासी कचौरी की तरह दिखता है। चाहे उसमें विचारों का कितना ही शुद्ध घी क्यों न लगा हो।
व्यंग्यकार भी कम चतुर नहीं है। वह पहले रचना लिखता था, अब पहले शीर्षक सोचता है। शीर्षक में "वायरल", "ब्रेकिंग", "ट्रोल", "एआई", "लोकतंत्र", "जुमला", "रील", "नैरेटिव" जैसे दो-चार शब्द डाल देता है। आधा व्यंग्य तो वहीं बिक जाता है। बाक़ी आधा फेसबुक के कमेंट बॉक्स में लोग स्वयं लिख देते हैं।
आजकल व्यंग्य लिखना आसान नहीं है। हर पाठक अपने भीतर एक व्यंग्यकार लिए घूम रहा है। अंतर बस इतना है कि वह बिना लिखे ही लेखक को व्यंग्य का विषय बना देता है।
और मानदेय? उसका उल्लेख करना साहित्य का नहीं, हास्य का विषय है। कुछ संपादक आज भी मानदेय भेज देते हैं। अधिकांश लेखक को लिंक भेजते हैं। कुछ तो केवल स्क्रीनशॉट भेजकर ही साहित्यिक ऋण से मुक्त हो जाते हैं। लेखक भी प्रसन्न हो जाता है कि चलो, कम-से-कम प्रमाण तो मिल गया कि उसने लिखा था।
आख़िर में व्यंग्यकार ने लैपटॉप बंद किया। सोचा—आज कुछ नहीं लिखूँगा।
तभी मोबाइल पर सूचना आई—
"देश में अभी-अभी एक नई बहस शुरू हुई है..."
उसने फिर लैपटॉप खोल लिया। बुदबुदाया—
"माई री... मैं कापे लिखूँ...?"
ब्रजेश कानूनगो
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