Tuesday, September 1, 2026

आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता

आत्मविश्वास  के बाजार में मूर्खता 

आत्मविश्वास आदमी की बड़ी संपत्ति है। जिसके पास धन है, उसे धन का आत्मविश्वास होता है। जिसके पास बल है, वह अपनी भुजाओं पर भरोसा करता है। जिसके पास ज्ञान है, वह तर्क और तथ्यों के सहारे खड़ा रहता है। लेकिन इन सब आत्मविश्वासों में मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अलग है। यह न धन माँगता है, न बल और न ज्ञान। यह अपने आप पैदा होता है और बढ़ते-बढ़ते इतना विराट हो जाता है कि उसके सामने ज्ञान स्वयं असहाय दिखाई देने लगता है।

ज्ञानी व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है। मूर्ख व्यक्ति सोचने को समय की बर्बादी मानता है। ज्ञानी कहता है—‘मुझे इस विषय की पूरी जानकारी नहीं है।’ मूर्ख कहता है—‘इसमें जानने जैसा है ही क्या?’ यही उसकी महानता है। उसे किसी विषय को जानने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वह पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना चुका होता है।

मूर्खता का आत्मविश्वास सबसे अधिक तब दिखाई देता है जब सामने प्रमाण रख दिया जाए। प्रमाण मूर्ख के लिए परेशानी की वस्तु है। वह प्रमाण को देखकर विचलित नहीं होता, बल्कि प्रमाण देने वाले की नीयत पर संदेह करने लगता है। आँकड़े गलत हो सकते हैं, किताबें पक्षपाती हो सकती हैं, वैज्ञानिक बिके हुए हो सकते हैं, विशेषज्ञ किसी साजिश का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उसकी अपनी समझ में कभी कोई दोष नहीं हो सकता।

सोशल मीडिया ने इस आत्मविश्वास को चार चाँद लगा दिए हैं। पहले किसी विषय का जानकार बनने के लिए वर्षों पढ़ना पड़ता था। अब किसी संदेश को तीन बार पढ़कर आगे भेज देना ही पर्याप्त है। सुबह आदमी डॉक्टर बनकर स्वास्थ्य सलाह देता है, दोपहर को अर्थशास्त्री बनकर महँगाई का इलाज बताता है और शाम को अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ बनकर विश्वशांति की योजना पेश कर देता है। उसकी सबसे बड़ी योग्यता यह है कि उसके पास मोबाइल है और उसे ‘फॉरवर्ड’ का बटन दबाना आता है।

लोकतंत्र में मूर्खता का आत्मविश्वास और भी उपयोगी सिद्ध होता है। यहाँ हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है और मूर्ख इस अधिकार का सबसे अधिक सम्मान करता है। वह बोलता है—लगातार बोलता है—और इतनी निश्चितता से बोलता है कि सुनने वाला अपने ज्ञान पर ही संदेह करने लगता है। कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित व्यक्ति वही है जिसे अपने अज्ञान का ज्ञान नहीं है।

कार्यालयों में भी इसका महत्व कम नहीं। जो कर्मचारी काम जानता है, वह समस्या बताता है। जो नहीं जानता, वह समाधान बताता है। काम बिगड़ जाए तो कह देता है कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं। काम बन जाए तो श्रेय उसका। इस प्रकार मूर्खता का आत्मविश्वास व्यक्ति को हर परिणाम में विजेता बनाए रखता है।

राजनीति में तो यह आत्मविश्वास वरदान है। आज कही गई बात कल बदल जाए तो कोई समस्या नहीं। चेहरे पर शिकन नहीं आनी चाहिए। जनता भूल जाएगी, रिकॉर्ड बदल जाएगा, बयान का अर्थ बदल दिया जाएगा। सबसे जरूरी है कि वक्ता स्वयं अपनी बात पर विश्वास करता हुआ दिखाई दे। आखिर जनता को सत्य नहीं, आत्मविश्वास भी तो चाहिए।

मूर्ख व्यक्ति की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि उसे कभी अपने भीतर झाँकना नहीं पड़ता। आत्ममंथन ज्ञानी की बीमारी है। मूर्ख के पास इसका समय नहीं होता। वह दूसरों की कमियाँ खोजने में व्यस्त रहता है। दुनिया गलत है, व्यवस्था गलत है, लोग गलत हैं—बस वह सही है।

इसलिए आत्मविश्वास के बाजार में मूर्खता सबसे महँगी बिक रही है। ज्ञान प्रमाण माँगता है, धन सुरक्षा माँगता है और बल अवसर। मूर्खता को केवल एक खुला मुँह चाहिए।

और शायद इसी कारण मूर्खता का आत्मविश्वास सर्वोपरि है—क्योंकि बाकी सभी आत्मविश्वासों को कभी न कभी अपनी सीमा का पता चल जाता है, मूर्खता को अपनी सीमा का पता ही नहीं चलता।

ब्रजेश कानूनगो 



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