जब तर्क की छुट्टी हो जाती है
विचार मनुष्य को मनुष्य बनाता है और तर्क उसे सभ्य बनाए रखता है। लेकिन जब विचार रास्ते में ही दम तोड़ दे और तर्क घर से निकलने से पहले ही डर जाए, तब आदमी के पास बचता क्या है? आवाज। और आवाज भी ऐसी कि पड़ोसी का कुत्ता तक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर विचार करने लगे।
सभ्यता ने मनुष्य को बोलने की आजादी दी थी, लेकिन हमने उसका एक नया संस्करण खोज लिया है—दूसरे को बोलने न देने की आजादी। अब बहस में सबसे ताकतवर तर्क वह नहीं है जो सही हो, बल्कि वह है जो सबसे ज्यादा शोर पैदा कर सके। विचार कमजोर पड़ते ही माइक मजबूत हो जाता है। तथ्य पीछे हटते हैं और हुल्लड़ आगे आकर कुर्सी संभाल लेता है।
पहले किसी मत से असहमति होती थी तो उसके जवाब में दूसरा मत प्रस्तुत किया जाता था। अब असहमति का सबसे आसान उपाय है—असहमत व्यक्ति की आवाज बंद कर दो। वह कुछ कहे तो उसे देशद्रोही, मूर्ख, बिकाऊ, नासमझ या किसी सुविधाजनक विशेषण से सम्मानित कर दो। इससे बहस भी समाप्त और बुद्धि की मेहनत भी बची।
तर्क में एक बड़ी समस्या है। उसमें तैयारी करनी पड़ती है। पढ़ना पड़ता है, सोचना पड़ता है और सामने वाले की बात भी सुननी पड़ती है। हुल्लड़ में ऐसा कोई झंझट नहीं। वहाँ केवल फेफड़ों की क्षमता और चेहरे की कठोरता चाहिए। जिसे अपनी बात पर भरोसा नहीं होता, वह अपनी मुट्ठी पर भरोसा करने लगता है।
आजकल तर्क-वितर्क का स्तर भी आधुनिक हो गया है। पहले कहा जाता था—‘मैं आपकी बात से सहमत नहीं।’ अब कहा जाता है—‘आप बोलिए मत।’ पहले प्रश्न का उत्तर दिया जाता था, अब प्रश्न पूछने वाले की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। प्रश्न कठिन हो तो उत्तर देने के बजाय प्रश्नकर्ता को ही कठिन बना दो।
हुल्लड़ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसमें जीतने के लिए सही होना जरूरी नहीं। बस इतना जरूरी है कि सामने वाला बोल न पाए। लोकतंत्र में बहुमत की आवाज सुनी जाती है, लेकिन हुल्लड़तंत्र में सबसे ऊँची आवाज ही बहुमत मान ली जाती है।
इसका असर समाज के हर कोने में दिखाई देता है। घर में बहस हो तो आवाज ऊँची, दफ्तर में मतभेद हो तो मेज पर मुक्का, सड़क पर विवाद हो तो भीड़ तैयार। सोशल मीडिया ने तो इस कला को विश्वव्यापी बना दिया है। वहाँ तर्क का जवाब गाली से और तथ्य का जवाब ट्रोल से दिया जा सकता है।
दरअसल गुंडागर्दी अक्सर विचारहीनता की लाठी होती है। जिसके पास विचार है, वह समझाता है; जिसके पास तर्क है, वह प्रमाण देता है; जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह धमकाता है।
इसलिए जब किसी बहस में अचानक शोर बढ़ने लगे तो समझ लेना चाहिए कि विचार की बैटरी खत्म हो चुकी है। अब तर्क चार्जर खोज रहा है और हुल्लड़ ने सत्ता की कुर्सी पर कब्जा कर लिया है।
सभ्यता की असली परीक्षा यह नहीं कि हम कितनी जोर से बोल सकते हैं, बल्कि यह है कि विरोधी की बात सुनते समय हम कितनी देर तक चुप रह सकते हैं।
ब्रजेश कानूनगो
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