भाषा में स्लैंग : जिंदगी का कपड़ा पॉलिएस्टर हो गया है
भाषा बड़ी लोकतांत्रिक चीज है। वह संसद से पास होकर नहीं आती, न शब्दकोश से अनुमति लेकर जन्म लेती है। लोग बोलते-बोलते शब्द गढ़ते हैं, फिर उन शब्दों को चलन में लाते हैं और एक दिन भाषा के पंडित उन्हें स्लैंग कहकर अलग खाने में रख देते हैं। स्लैंग दरअसल भाषा की वह गली है जहाँ व्याकरण जूते उतारकर बैठ जाता है और रचनात्मकता बिना टिकट अंदर चली जाती है।
हर पीढ़ी ने अपनी स्लैंग बनाई है। कभी ‘कूल’, ‘हिप’, ‘ड्यूड’, ‘भौकाल’, ‘झकास’, ‘चमचा’ और ‘फंडा’ जैसे शब्द अपनी धाक जमाते थे। ‘चमचा’ रसोई का उपकरण कम और राजनीतिक चरित्र का प्रमाणपत्र अधिक था। ‘कूल’ का तापमान से कोई संबंध नहीं था। आदमी पसीने में तर हो सकता था, फिर भी कूल कहलाता था।
आज जेन जी ने स्लैंग को सोशल मीडिया की स्पीड दे दी है। ‘Rizz’- 'रिज ' आकर्षण की क्षमता है, ‘Ghosting’- 'घोस्टिंग' बिना बताए बताए किसी रिश्ते से गायब हो जाना, ‘Delulu’ - 'डेलुलु' अपनी कल्पनाओं को वास्तविकता से ज्यादा सच मानना और ‘NPC’ - 'एनपीसी' ऐसे व्यक्ति के लिए है जो अपनी स्वतंत्र सोच खोकर किसी डिजिटल किरदार जैसा व्यवहार करता दिखाई दे। ‘Aura’- 'औरा' अब आभा से ज्यादा किसी व्यक्ति के प्रभाव और स्टाइल का प्रमाण है। और अब नया शब्द है—पॉलिएस्टर।
पहले पॉलिएस्टर कपड़े में होता था, अब जिंदगी में होने लगा है। जेन जी के स्लैंग में ‘पॉलिएस्टर’ उस बनावटी, कृत्रिम और जरूरत से ज्यादा चमकदार जीवन का संकेत बन रहा है जो देखने में आकर्षक हो, लेकिन भीतर से नकली हो। सोशल मीडिया पर ऐसी जिंदगी की भरमार है। सुबह योग, फिर ऑर्गेनिक नाश्ता, उसके बाद समुद्र किनारे लैपटॉप, दोपहर में ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ पर पोस्ट और शाम को सूर्यास्त के सामने मुस्कराता चेहरा। पूरा दिन देखकर लगता है आदमी जीवन नहीं जी रहा, जीवन की विज्ञापन फिल्म शूट कर रहा है। यही पॉलिएस्टर है।
मजेदार बात यह है कि पुरानी पीढ़ी भी इस बीमारी को पहचानती थी। वह कहती थी—‘दिखावा मत करो’, ‘नौटंकी मत करो’, ‘बनावटी मत बनो।’ नई पीढ़ी ने वही बात कहने के लिए एक शब्द खोज लिया। अंतर सिर्फ इतना है कि पहले उपदेश मिलता था, अब स्लैंग में व्यंग्य मिलता है।
सोशल मीडिया ने आदमी को जीवन का अभिनेता ही नहीं, निर्देशक, कैमरामैन और प्रचारक भी बना दिया है। पहले लोग अच्छा जीवन जीते थे और उसकी तस्वीर कभी-कभार दिखाते थे। अब तस्वीर अच्छी दिखे, इसके लिए जीवन को व्यवस्थित किया जाता है। पहले यात्रा याद रखने के लिए फोटो खींची जाती थी, अब फोटो डालने के लिए यात्रा की जाती है। पहले खाना खाया जाता था, फिर कभी उसकी तस्वीर दिखाई जाती थी। अब खाना आने से पहले कैमरा आ जाता है।
विडंबना यह है कि नकलीपन की आलोचना भी उसी सोशल मीडिया पर हो रही है जिसने नकलीपन को सबसे बड़ा बाजार दिया है। कोई ‘पॉलिएस्टर लाइफ’ पर पोस्ट डालकर अपनी ही जिंदगी को फिल्टर कर रहा है। नकलीपन का विरोध भी कभी-कभी नकली हो जाता है। यहीं स्लैंग महज युवा फैशन नहीं रह जाती, वह सामाजिक टिप्पणी बन जाती है। ‘प्लास्टिक’ कभी कृत्रिम मुस्कान और बनावटी व्यवहार का रूपक बना था। ‘फेक’ ने नकली पहचान और झूठी सूचनाओं की दुनिया को नाम दिया। अब ‘पॉलिएस्टर’ शायद उस समय का रूपक है जिसमें मनुष्य ने अपनी वास्तविकता पर भी चमकदार आवरण चढ़ा लिया है।
भाषा में नए शब्दों का आना अच्छी बात है। भाषा तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ियाँ उसमें अपने अनुभवों के लिए नए नाम खोजती हैं। आज का स्लैंग कल का सामान्य शब्द बन सकता है। ‘कूल’ कभी नया था, आज सामान्य है। कई शब्द जिन्हें कभी अशिष्ट समझा गया, बाद में शब्दकोश में सम्मानपूर्वक बैठ गए।
लेकिन खतरा शब्दों में नहीं, जीवन में है। स्लैंग बदलती रहे, कोई समस्या नहीं। समस्या तब है जब हमारी असल जिंदगी भी स्लैंग बन जाए—क्षणिक, चमकदार और संदर्भ बदलते ही बेकार। इसलिए ‘पॉलिएस्टर’ को सिर्फ जेन जी का नया मजाक समझना भूल होगी। यह हमारे समय का आईना भी है।
कपड़े में पॉलिएस्टर सस्ता, टिकाऊ और चमकदार हो सकता है। लेकिन चरित्र में पॉलिएस्टर हो तो चमक जितनी बढ़ेगी, नकलीपन उतना ही साफ दिखाई देगा।
ब्रजेश कानूनगो
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