रिश्वत का नया राशन कार्ड
भ्रष्टाचार भी समय के साथ आधुनिक होता जा रहा है। पहले रिश्वत खुलेआम माँगी जाती थी। फिर धीरे-धीरे उसमें संकोच आया। अब तो रिश्वत माँगने वाला भी शर्माता है और देने वाला भी। इसलिए दोनों ने मिलकर एक नई भाषा विकसित कर ली है—कोड वर्ड की भाषा।
बिहार से खबर आई कि रिश्वत के लिए अब सीधे एक लाख रुपये नहीं कहे जाते। उसके लिए कहा जाता है—एक बोरा चावल। सुनने में लगता है कि कोई गरीब परिवार राशन की व्यवस्था कर रहा है, लेकिन जानकार जानते हैं कि यहाँ चावल अनाज नहीं, नोटों का प्रतीक है।
इस व्यवस्था में सबसे अच्छी बात यह है कि रिश्वत लेने वाला अब रिश्वत नहीं लेता, वह तो केवल ‘चावल’ स्वीकार करता है। बाद में उस चावल को किसी अदृश्य मिल में ले जाकर रुपये में बदल दिया जाता है। इससे भ्रष्टाचार भी शाकाहारी हो गया है।
कल तक रिश्वत के लिए ‘लिफाफा’ चलता था। फिर ‘मिठाई का डिब्बा’ आया। अब लगता है कि भ्रष्टाचार विभाग ने अपनी शब्दावली का विस्तार कर लिया है। एक बोरा चावल एक लाख का, आधा बोरा पचास हजार का और शायद भविष्य में किलो के हिसाब से भी दरें तय हो जाएँगी।
मसलन, किसी काम की कीमत पंद्रह हजार हो तो कहा जाएगा—‘डेढ़ कट्टा चावल।’ दस हजार के लिए ‘दस किलो गेहूँ’। पाँच हजार के लिए ‘एक छोटा पैकेट दाल।’ रिश्वत की यह नई कृषि अर्थव्यवस्था इतनी विकसित हो सकती है कि सरकारी कार्यालयों में फाइलों के साथ अनाज की मंडी भी लगने लगे।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि निगरानी करने वाले भी भ्रमित रहेंगे। अधिकारी पूछेगा—‘किस बात की चर्चा हो रही थी?’
जवाब मिलेगा—‘साहब, फसल की।’
‘कौन-सी फसल?’
‘वही, जो फाइल पास होने के बाद पकती है।’
भ्रष्टाचार की यह कोड भाषा वास्तव में केवल शब्दों का खेल नहीं है। यह उस मानसिकता का संकेत है जिसमें गलत काम को सामान्य और रिश्वत को एक व्यवस्थित लेन-देन मान लिया गया है। शब्द बदलने से अपराध का चरित्र नहीं बदलता। एक लाख को ‘एक बोरा चावल’ कह देने से वह चावल नहीं हो जाता।
मजेदार बात यह है कि हमारे यहाँ भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कानून बनते हैं और भ्रष्टाचार कानून से बचने के लिए शब्दकोश बनाता है। कानून कहता है—रिश्वत मत लो। भ्रष्टाचार कहता है—ठीक है, हम उसे रिश्वत कहेंगे ही नहीं।
आज ‘चावल’ है, कल ‘सीमेंट’ होगा, परसों ‘सरसों का तेल’। फिर शायद सरकारी दफ्तर में काम कराने के लिए नया रेट कार्ड भी छपे—
जन्म प्रमाणपत्र—दो किलो दाल। नक्शा पास—आधा ट्रॉली सीमेंट। ठेका—एक ट्रक ईंट। बड़ी फाइल—एक पूरा गोदाम।
और जनता सोचती रहेगी कि देश में महँगाई क्यों बढ़ रही है।
दरअसल महँगाई केवल बाजार में नहीं बढ़ रही। रिश्वत की भाषा भी महँगी हो रही है।
एक समय था जब रिश्वत छिपाकर ली जाती थी। अब रिश्वत को छिपाने के लिए उसके ऊपर एक पूरा बोरा डाल दिया गया है।
बस डर यही है कि कहीं कल सरकार यह घोषणा न कर दे कि देश में खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार है—और भ्रष्टाचार विरोधी विभाग पूछता रह जाए कि इतने बोरे चावल आखिर गए कहाँ?
ब्रजेश कानूनगो
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