Tuesday, September 22, 2026

फॉर्म भरता हुआ आदमी

फॉर्म भरता हुआ आदमी

भारत के आम आदमी की सबसे बड़ी व्यस्तता क्या है?  सोशल मीडिया, रोज़गार की जद्दोजहद, परिवार की देखभाल, महँगाई से निपटना, बच्चों की पढ़ाई? नहीं। फॉर्म भरना।

उसका जीवन जन्म प्रमाणपत्र के फॉर्म से शुरू होता है और मृत्यु प्रमाणपत्र के फॉर्म पर जाकर भी खत्म नहीं होता। बीच में जितनी जिंदगी है, उतने ही फॉर्म हैं।

स्कूल में प्रवेश के लिए फॉर्म। परीक्षा के लिए फॉर्म। छात्रवृत्ति के लिए फॉर्म। नौकरी के लिए फॉर्म। नौकरी लगने के बाद भी फॉर्म। छुट्टी के लिए फॉर्म। तबादले के लिए फॉर्म। पेंशन के लिए फॉर्म।

नाम जुड़वाना हो—फॉर्म।नाम कटवाना हो—फॉर्म। नाम में गलती हो—संशोधन का फॉर्म। संशोधन में गलती हो जाए—फिर संशोधन का फॉर्म। आम आदमी का जीवन अब जीवन कम और आवेदन-पत्र अधिक है।

काम करवाना हो तो फॉर्म। शिकायत करनी हो तो फॉर्म। शिकायत पर कार्रवाई न हो तो फिर फॉर्म। कार्रवाई क्यों नहीं हुई, यह पूछने के लिए भी फॉर्म। फॉर्म भरते-भरते आदमी को अपने बारे में इतना कुछ बताना पड़ता है कि कभी-कभी लगता है, सरकार नागरिक से अधिक परिचित हो गई है, नागरिक खुद से नहीं।

नाम, पता, उम्र, आय, व्यवसाय, परिवार, मोबाइल, पहचान। फिर इनके प्रमाण। आधार का आधार बताइए। पहचान का प्रमाण, पते का प्रमाण, आय का प्रमाण। अंततः सामने खड़ा आदमी भी अपने अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करता रहता है।

डिजिटल युग आया तो लगा, अब फॉर्म से मुक्ति मिलेगी। मुक्ति नहीं मिली, फॉर्म स्क्रीन पर आ गया। अब लाइन में खड़े होने के बजाय वेबसाइट के खुलने की प्रतीक्षा है। ओटीपी की प्रतीक्षा है। सर्वर की कृपा की प्रतीक्षा है। फोटो के सही आकार की प्रतीक्षा है। दस्तावेज अपलोड होने की प्रतीक्षा है। पहले बाबू फाइल रोकता था, अब सर्वर रोकता है। तकनीक ने व्यवस्था को तेज नहीं किया, बस उसकी देरी को आधुनिक बना दिया।

फॉर्मों की दुनिया में हर सुविधा के साथ पात्रता जुड़ी है और हर पात्रता के साथ एक नया फॉर्म।सुविधा चाहिए तो आवेदन कीजिए। पात्रता के लिए प्रमाण दीजिए। प्रमाण के लिए दूसरा प्रमाण दीजिए। फिर प्रमाणित कीजिए कि आपने प्रमाण सही दिया है। इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ी सुविधा और है—आदमी को अपनी परेशानियों के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिलता।

महँगाई है, मगर फॉर्म भरना है। बेरोजगारी है, मगर आवेदन करना है। अस्पताल में इलाज महँगा है, मगर स्वास्थ्य योजना का फॉर्म भरना है। बच्चे की फीस की चिंता है, मगर छात्रवृत्ति का फॉर्म भरना है। पानी नहीं आ रहा, सड़क टूटी है, नौकरी नहीं है—लेकिन पहले शिकायत का फॉर्म भरिए। आदमी समस्या से ज्यादा उसके समाधान का फॉर्म भरने में व्यस्त है।

यही व्यस्तता व्यवस्था के लिए बड़ी सुविधा है। नागरिक यदि लगातार फॉर्म भरता रहे तो उसके पास सवाल पूछने का समय कम बचता है। वह अपनी वास्तविक जिंदगी के अभावों को कुछ देर के लिए भूल जाता है और आवेदन की स्थिति देखने में लग जाता है। उसकी जिंदगी की स्थिति भले ही ‘प्रक्रिया में’ हो, लेकिन सरकारी वेबसाइट पर उसकी सुविधा की स्थिति ‘सफल’ दिखाई दे सकती है।

यह व्यवस्था की एक अद्भुत प्रशासनिक उपलब्धि है। नागरिक लगातार व्यस्त रहता है और उसके पास यह सोचने का समय कम बचता है कि उसके जीवन में वास्तव में क्या बदल रहा है। वह सुविधा पाने से पहले सुविधा के लिए आवेदन करने में ही संतोष खोज लेता है।

यहीं से खुशहाली का एक नया गणित शुरू होता है। जितने अधिक फॉर्म, उतनी अधिक योजनाएँ; जितनी अधिक योजनाएँ,  उतनी अधिक खुशहाली।

जमीन पर आदमी परेशान हो सकता है, लेकिन कागज और पोर्टल पर वह सुखी, संतुष्ट और लाभान्वित नागरिक है।

फॉर्म भरते-भरते आदमी इतना व्यस्त हो जाता है कि देश और समाज के बड़े प्रश्न उसकी नजर से ओझल हो जाते हैं। उसे अगला फॉर्म दिखाई देता है, अगला सवाल नहीं।

शायद यही आधुनिक प्रशासन का सबसे बड़ा कौशल है—नागरिक को सुविधा देने से पहले उसे सुविधा के फॉर्म  भरने में व्यस्त कर देना।


ब्रजेश कानूनगो 


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