Sunday, August 9, 2026

उनींदे नागरिक का गड़बड़ सपना

उनींदे नागरिक का गड़बड़ सपना

सुबह उठते ही मुझे लगा कि रात में कोई बहुत बड़ी गड़बड़ हुई है।

गड़बड़ सपने में नहीं, देश में हुई थी।

हालाँकि सपने में भी बहुत कुछ गड़बड़ था, लेकिन वह इतनी व्यवस्थित गड़बड़ी थी कि उसे सपना मानने का मन नहीं हो रहा था। मैंने घबराकर अपना अखबार उठाया। अखबार वही था, कागज वही था, विज्ञापन वही थे, चेहरे भी लगभग वही थे, केवल उसका नाम बदल गया था। हिंदी अखबार का नाम अब अंग्रेजी में था और इतना अंग्रेजी में कि मुझे उसे पढ़ने के लिए हिंदी की जरूरत पड़ रही थी।

मैंने सोचा, शायद अखबार ने अपना अंतरराष्ट्रीय संस्करण निकाल लिया है।

फिर ध्यान आया कि यह तो मेरा ही अखबार है।

मुखपृष्ठ पर एक बड़ी खबर थी—‘हिंदी दिवस की तैयारी’। खबर अंग्रेजी में थी। उसके नीचे एक विज्ञापन था—‘अपनी मातृभाषा से जुड़िए’। विज्ञापन की भाषा ऐसी थी कि मातृभाषा को पहले अंग्रेजी सीखनी पड़ती।

मैंने संपादकीय पृष्ठ खोला। वहाँ संपादकीय की जगह किसी विदेशी भाषा में ‘मन की बात’ छपी थी। मुझे राहत मिली कि मन अभी भी वही है, केवल भाषा बदल गई है।

नीचे महान हिंदी साहित्यकारों के नामों के साथ उनके सोशल मीडिया अकाउंट दिए हुए थे। कबीर के फॉलोअर्स लाखों में थे, तुलसीदास ट्रेंड कर रहे थे और रामचंद्र शुक्ल को किसी ने ‘कंटेंट क्रिएटर’ बता दिया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी की पोस्ट पर किसी युवा विचारक ने टिप्पणी की थी—‘सर, आपको अपडेट होने की जरूरत है।’

मैंने देखा, टिप्पणी देवनागरी में थी और उसमें सभी सुझाव अंग्रेजी में थे।

यह देखकर मेरी नींद में ही नींद उड़ गई।

तभी सपना आगे बढ़ गया।

एक सफेद इमारत के सामने परेड हो रही थी। सैनिकों के कंधों पर बंदूकें नहीं, लैपटॉप थे। वे इतने अनुशासित ढंग से कदमताल कर रहे थे कि लगा, अब युद्ध भी शायद पासवर्ड डालकर ही शुरू होगा।

एक अधिकारी चिल्लाया—‘फॉरवर्ड मार्च!’

सैनिक आगे बढ़े।

फिर शिक्षकों की एक विशाल टुकड़ी आई। सभी ने तिरंगे रंग की टोपियाँ पहन रखी थीं। वे शिक्षा की गुणवत्ता, नई शिक्षा नीति और डिजिटल भविष्य का प्रदर्शन करते हुए निकल रहे थे। उनके हाथों में किताबें नहीं, टैबलेट थे। किसी के टैबलेट में बच्चा नहीं खुल रहा था, किसी में नेटवर्क नहीं आ रहा था और किसी में पासवर्ड भूल जाने की सूचना थी।

परेड का सबसे आकर्षक दृश्य तब आया जब अतिथि और मेजबान ने अपनी-अपनी कुर्सियाँ बदल लीं।

मेजबान अतिथि की कुर्सी पर बैठ गया और अतिथि मेजबान की कुर्सी पर।

तालियाँ बजीं।

किसी ने कहा—‘यह हमारी लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक है।’

मैंने पूछा—‘लेकिन कुर्सी तो वही है?’

जवाब मिला—‘कुर्सी वही है, आदमी बदल गए हैं।’

मुझे लगा, यही तो असली लोकतंत्र है।

सपना अब किसी टीवी धारावाहिक की तरह एपिसोड-दर-एपिसोड चल रहा था।

अगले दृश्य में कुछ बंदूकधारी एक स्कूल को घेरे खड़े थे। स्कूल के भीतर से बच्चों के रोने की आवाजें आ रही थीं। आवाजों में ऐसी लय थी कि समझ में नहीं आ रहा था कि बच्चे डर के कारण रो रहे हैं या परीक्षा के कारण।

किसी ने कहा—‘शांत रहो, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।’

दूसरे ने कहा—‘नहीं, यह शिक्षा व्यवस्था का मामला है।’

तीसरे ने कहा—‘पहले इसकी जाँच के लिए एक समिति बनाओ।’

बच्चे तब तक रोते रहे।

बाहर समिति की बैठक शुरू हो गई।

उधर एक चित्रकार पेंसिल की नोक पर भीष्म की तरह लेटा हुआ था। उसके आसपास दुनिया भर की कूंचियाँ, रंग और स्याही जमा थी। उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।

मैंने पूछा—‘आप क्या बना रहे हैं?’

उसने कहा—‘शांति।’

मैंने चित्र देखा। उसमें हर तरफ बंदूकें थीं।

मैंने कहा—‘इसमें शांति कहाँ है?’

वह मुस्कराया—‘आप आधुनिक कला नहीं समझते।’

सपना और बिगड़ गया।

मुंबई के एक फ्रेंच रेस्तराँ में आतंकवादी घुस आए थे। उन्होंने ब्रिटेन के नागरिकों को बंधक बना लिया था। उनका उद्देश्य पाकिस्तान की जेल में बंद अपने साथी को छुड़ाना था।

मुझे लगा, आतंकवाद भी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मल्टीपर्पज हो गया है। घटना कहीं होती है, नागरिक किसी और देश के होते हैं, माँग किसी तीसरे देश से होती है और बयान चौथे देश की राजधानी से आता है।

इतने में ट्विन टावर ध्वस्त हुए और विमान अचानक नाव में बदल गया।

मैंने सपना देखने वाले अपने ही दिमाग से पूछा—‘यह क्या हो रहा है?’

दिमाग बोला—‘प्रतीक समझो।’

मैंने कहा—‘किस बात का?’

वह बोला—‘अब हर चीज प्रतीक है। वास्तविकता बहुत पुरानी चीज हो चुकी है।’

इसके बाद कुछ युवक गालियों को नारों की तरह बोलते हुए प्रबुद्ध बुजुर्गों की सभा में घुस आए।

बुजुर्गों ने कहा—‘बेटा, तर्क से बात करो।’

युवकों ने कहा—‘तर्क पुराना हो गया।’

बुजुर्गों ने कहा—‘तो संवाद करो।’

युवकों ने मोबाइल निकाला और लाइव हो गए।

अब सभा में कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। सभी अपने-अपने दर्शकों से बात कर रहे थे।

वहीं दूसरी ओर पेरिस में कुछ नागरिक मोमबत्तियाँ जलाकर एक मूर्ति के सामने खड़े थे। चेहरे पर दुख था। कैमरे उनके चेहरों पर घूम रहे थे। कुछ लोग रो रहे थे, कुछ तस्वीरें ले रहे थे और कुछ इस बात पर बहस कर रहे थे कि मोमबत्ती किस ब्रांड की है।

मुझे लगा, दुनिया में दुःख भी अब मीडिया-फ्रेंडली होना चाहिए।

तभी सपना अचानक फिर बदला।

मैंने देखा, शांति समिति की बैठक होने वाली है।

मैं खुश हुआ।

चलो, इतनी सारी गड़बड़ी के बाद कहीं तो शांति की बात होगी।

मोबाइल की घंटी बजी।

रात के तीन बजकर पैंतालीस मिनट थे।

मोबाइल की स्क्रीन पर संदेश चमक रहा था—

‘विश्व शांति एवं भाईचारे पर विमर्श हेतु बैठक दोपहर एक बजे गांधी हाल में आयोजित की गई है।’

मैंने राहत की साँस ली।

कम-से-कम शांति बची हुई थी।

फिर मैंने संदेश दोबारा पढ़ा।

नीचे लिखा था—

‘बैठक में प्रवेश हेतु अपना आधार, मोबाइल नंबर और ओटीपी साथ लाएँ।’

मैं फिर चौंक गया।

शांति के लिए भी ओटीपी जरूरी हो गया था।

सुबह हो चुकी थी। अखबार अब भी मेरे हाथ में था। उसका नाम वही था जो कल था। संपादकीय भी हिंदी में था। गांधी की तस्वीर भी थी। मोबाइल पर शांति समिति का संदेश भी नहीं आया था।

मैंने सोचा—अच्छा हुआ, सब सपना था।

तभी पत्नी ने आवाज लगाई—

‘सुनते हो, आज स्वतंत्रता दिवस पर होने वाली गोष्ठी में जाना है न?’

मैंने पूछा—‘किस विषय पर?’

वह बोलीं—‘ भारतीय नागरिक और राष्ट्र भाषा पर।’

मैंने राहत की साँस ली।

‘और संवाद किस भाषा में होगा?’

उन्होंने कहा—‘अंग्रेजी में। मुख्य अतिथि अमेरिका से आ रहे हैं।’

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर अखबार समेटा और सोचने लगा—

शायद सपना अभी खत्म नहीं हुआ है।


ब्रजेश कानूनगो 

Saturday, August 8, 2026

छौंक लगाने वाले

छौंक लगाने वाले

मोहल्ले में पहले भी छौंक लगता था।

दाल में। सब्जी में। कभी-कभी कढ़ी में भी।

छौंक की खुशबू घर की चारदीवारी का सम्मान नहीं करती थी। वह पड़ोसी के घर चली जाती थी। कोई रोकता नहीं था। खुशबू को कौन रोक सकता था?

शाम को किसी के घर से अगरबत्ती की महक आती तो पता नहीं चलता था कि किसकी है। लोबान का धुआँ हवा के साथ घूमता हुआ गली के दूसरे छोर तक पहुँच जाता। चिड़िया किसी की छत पर बैठती, फिर किसी दूसरे की छत पर चली जाती। तितली को फूल का धर्म मालूम नहीं था और हवा को दीवारों का।


मोहल्ला चलता था।

फिर कुछ लोगों ने तय किया कि मोहल्ले को चलने नहीं देना चाहिए।

उन्होंने सबसे पहले बकरी को पकड़ा।

रामचरण की बगीची में सलीम की बकरी घुस गई थी।

पुराने जमाने में इसका इलाज बड़ा सरल था। रामचरण बकरी को भगाता, सलीम उसे पकड़ता और दोनों कुछ देर एक-दूसरे को देखकर अपने-अपने काम में लग जाते।

लेकिन अब जमाना बदल गया था।

बकरी के बगीची में घुसने को किसी ने मोबाइल पर रिकॉर्ड कर लिया।

वीडियो बना।

वीडियो के ऊपर संगीत लगा।

फिर एक उत्तेजक शीर्षक लगा।

फिर किसी ने कहा—“यह सिर्फ बकरी का मामला नहीं है।”

बस, यहीं से असली छौंक शुरू हुआ।

बकरी ने लौकी खाई थी, मगर चर्चा लोकतंत्र की होने लगी।

किसी ने कहा—“साजिश है।”

दूसरे ने कहा—“पुरानी साजिश है।”

तीसरे ने कहा—“हमने पहले ही चेतावनी दी थी।”

चौथे ने पूछा—“बकरी किसकी थी?”

पाँचवें ने कहा—“यही तो असली सवाल है।”

छठे ने कहा—“सवाल पूछने वाले से पूछिए कि वह किसके साथ है।”


अब तक बकरी चुपचाप जुगाली कर रही थी।

उसे शायद समझ नहीं आ रहा था कि उसने लौकी खाई है या देश की अखंडता।

टीवी पर बहस शुरू हो गई।

एक तरफ पाँच लोग थे, दूसरी तरफ पाँच लोग थे और बीच में एक एंकर था जो सबको एक साथ बोलने का राष्ट्रीय अवसर दे रहा था।

एंकर ने घोषणा की—

“आज का सबसे बड़ा सवाल—बकरी बगीची में क्यों घुसी? क्या इसके पीछे कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है? हमारे साथ विशेषज्ञ मौजूद हैं।”

विशेषज्ञों में एक कृषि वैज्ञानिक था, एक पूर्व अधिकारी, एक सोशल मीडिया विश्लेषक और एक ऐसा व्यक्ति भी था जिसने पिछले पंद्रह वर्षों में हर विषय पर अपनी राय दी थी।

कृषि वैज्ञानिक ने कहा—“बकरी हरी सब्जियों की ओर आकर्षित होती है।”

एंकर ने उन्हें बीच में रोक दिया।

“लेकिन आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह सामान्य घटना है? क्या आप किसी बड़ी साजिश से इनकार कर रहे हैं?”

वैज्ञानिक चुप हो गया।

उसे पहली बार लगा कि विज्ञान से ज्यादा ताकतवर चीज होती है—टीआरपी।

अगले दिन सोशल मीडिया पर हैशटैग चल रहा था—

बकरी का सच,

कुछ ही देर में दूसरा हैशटैग आया—

बगीची खतरे में,

फिर तीसरा—

कौन है बकरी के पीछे,

लोगों ने बकरी के पुराने फोटो खोज लिए।

किसी ने दावा किया कि बकरी छह महीने पहले भी रामचरण की बगीची के आसपास देखी गई थी।

किसी ने उसके चलने के ढंग से उसकी मानसिकता समझ ली।

किसी ने उसके सींगों में षड्यंत्र देख लिया।

किसी ने कहा—“बकरी तो केवल मोहरा है।”

अब बकरी मोहरा थी।

रामचरण मोहरा था।

सलीम मोहरा था।

मोहल्ला मोहरा था।

बस, छौंक लगाने वाले खिलाड़ी थे।

उन्होंने घटना को कड़ाही में डाला और उसमें अपनी-अपनी मिर्च डालते गए।

किसी ने इतिहास का मसाला डाला।

किसी ने धर्म का।

किसी ने जाति का।

किसी ने राष्ट्र का।

किसी ने अपमान का।

और सोशल मीडिया ने ऊपर से इतना गरम तेल डाला कि देखते-देखते पूरी बस्ती धुआँ-धुआँ हो गई।


अब किसी को यह याद नहीं था कि विवाद शुरू किस बात पर हुआ था।

यह छौंक की सफलता थी।

छौंक लगाने वाले हमेशा यही चाहते हैं।

लोग कारण भूल जाएँ और स्वाद याद रखें।


अब मोहल्ले में नई सावधानियाँ बरती जाने लगीं।

किसी के घर से खुशबू आए तो पहले उसकी पहचान करो।

किसी की छत पर चिड़िया बैठे तो देखो कहाँ से आई है।

किसी की खिड़की से आती छाया पर भरोसा मत करो।

किसी के घर की अगरबत्ती तुम्हारे घर तक पहुँच जाए तो यह भी जाँच का विषय हो सकता है।

हवा पर तो विशेष निगरानी रखी गई।

हवा ने आपत्ति की।

कहा—“मैं तो हवा हूँ।”

लोगों ने कहा—“यही तो समस्या है। तुम कहीं की भी हो सकती हो।”

हवा चुप हो गई।

उसे पहली बार मनुष्य की राजनीति समझ में आई।

जिस हवा ने सदियों से मंदिर की घंटी और मस्जिद की अजान को एक ही आकाश में ढोया था, अब उससे पूछा जा रहा था कि वह किस ओर से आती है।

जिस धूप ने किसी का आँगन छोटा-बड़ा नहीं समझा था, उसके भी आने-जाने पर संदेह होने लगा।

मोहल्ले में लोग अब एक-दूसरे से कम और मोबाइल से ज्यादा बातें करने लगे।

सुबह उठते ही पड़ोसी का चेहरा देखने से पहले फोन देखा जाता।

कौन नाराज है?

कौन आहत है?

किसने किसे जवाब दिया?

किसने किसका वीडियो साझा किया?

किसने किसे देशद्रोही कहा?

किसने किसे प्रमाणपत्र दिया?

किसी को समय नहीं था कि वह सामने बैठे आदमी से पूछ सके—

“भाई, तुम्हारे घर में सब ठीक है?”


क्योंकि यह सवाल वायरल नहीं होता।

दुःख वायरल नहीं होता।

भूख वायरल नहीं होती।

बेरोजगारी वायरल नहीं होती।

बुजुर्ग की दवा वायरल नहीं होती।

पड़ोसी की बीमारी वायरल नहीं होती।

हाँ, एक आदमी दूसरे आदमी से नफरत करता दिखाई दे जाए तो वह खूब वायरल होता है।

क्योंकि नफरत में मसाला है।

और मसाले का बाजार बहुत बड़ा है।


मुझे लगता है, हमारे समय का सबसे सफल उद्योग यही है—छौंक उद्योग।

इसमें कच्ची घटनाएँ कहीं से भी उठाई जाती हैं।

उन्हें कड़ाही में डाला जाता है।

फिर मिर्च, नमक, इतिहास, धर्म, अपमान और शक मिलाया जाता है।

तेज आँच पर पकाया जाता है।

फिर सोशल मीडिया की प्लेट में परोसा जाता है।

लोग खाते हैं।

पचाते नहीं।

फिर अगली थाली माँगते हैं।


इस पूरे उद्योग में सबसे दुखद बात यह है कि असली बकरी अब भी वही है।

वह न राजनीति समझती है, न इतिहास।

उसे बस हरी सब्जी दिखाई देती है।

वह आज भी कभी-कभी किसी की बगीची में चली जाती है।

रामचरण आज भी उसे भगाता है।

सलीम आज भी उसे पकड़कर ले जाता है।

दोनों कभी-कभी अब भी एक-दूसरे को देखते हैं।

शायद दोनों के मन में आता है कि पहले ऐसा नहीं था।

पहले हम बकरी को बकरी समझते थे।

अब हम बकरी में इतिहास खोजते हैं।

सब्जी में पहचान।

खुशबू में षड्यंत्र।

हवा में पक्ष।

और पड़ोसी में दुश्मन।


मगर छौंक लगाने वाले संतुष्ट हैं।

उनका धंधा चल रहा है।

कड़ाही गरम है।

तेल पर्याप्त है।

मसाला भरपूर है।

और सबसे अच्छी बात यह है कि धुआँ उठते ही हमें दिखाई देना बंद हो जाता है कि सामने खड़ा आदमी कौन है।

हम आँखों में पानी लिए पूछते हैं—

“इतना धुआँ कहाँ से आ रहा है?”

छौंक लगाने वाला मुस्कराता है।

वह जानता है।

धुआँ दाल से नहीं उठ रहा।

धुआँ हमारे भीतर पकाई जा रही नफरत से उठ रहा है।

और जब तक हम यह पहचानेंगे, तब तक शायद रामचरण की बगीची में सब्जियाँ कम और राख ज्यादा बची होगी।

बकरी फिर भी कहीं न कहीं हरी घास खोज लेगी।

और आदमी?

उसे फिर से आदमी खोजने में बहुत समय लगेगा।

 

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, August 6, 2026

उत्तरविहीन गणतंत्र के प्रवक्ता

उत्तरविहीन गणतंत्र के प्रवक्ता

राजनीति में पहले दो ही प्रजातियाँ मानी जाती थीं—नेता और कार्यकर्ता। नेता बोलता था, कार्यकर्ता उसे सही सिद्ध करता था। नेता चलता था, कार्यकर्ता पीछे-पीछे चलता था। नेता यदि भूल से गलत दिशा में भी निकल पड़ता, तो कार्यकर्ता उसी रास्ते को ऐतिहासिक बताकर उसके दोनों ओर झंडे लगा देता था। लोकतंत्र की यही सरल जैविक संरचना थी।

फिर समय बदला। टेलीविजन आया। कैमरे आए। प्राइम टाइम आया। और राजनीति ने विकास की एक नई प्रजाति को जन्म दिया—प्रवक्ता।

कहते हैं, आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। लेकिन राजनीतिक दलों में प्रवक्ता का जन्म आवश्यकता से अधिक टीवी चैनलों की भूख का परिणाम था। चौबीस घंटे चलने वाले समाचार चैनलों को हर शाम युद्ध चाहिए था। युद्ध के लिए योद्धा चाहिए थे। नेता व्यस्त थे, कार्यकर्ता अनुभवहीन थे। इसलिए दोनों के बीच से एक ऐसा जीव विकसित हुआ जो हर विषय पर बोल सकता था, चाहे उसे विषय का ज्ञान हो या न हो। ज्ञान से अधिक आवश्यक था आत्मविश्वास और आवाज़ का वॉल्यूम।

धीरे-धीरे प्रवक्ता पार्टी का चेहरा नहीं, उसका कवच बन गया। नेता गलती करे तो प्रवक्ता सफाई देता है। नेता चुप रहे तो प्रवक्ता बोलता है। नेता कुछ ऐसा बोल दे जिसकी सफाई देना भी कठिन हो, तब भी प्रवक्ता मुस्कराते हुए उसे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैचारिक और संदर्भगत बताकर राष्ट्रहित में समाहित कर देता है।

टीवी स्टूडियो आजकल लोकतंत्र के अस्थायी युद्धक्षेत्र हैं। यहाँ तलवारें नहीं चलतीं, तथ्यों के नाम पर पुराने वीडियो चलते हैं। गोले नहीं दागे जाते, बल्कि स्क्रीन पर लाल रंग की पट्टियाँ फटती रहती हैं—"बड़ी खबर", "सबसे बड़ा खुलासा", "देश पूछ रहा है।"

देश बेचारा शायद उस समय रिमोट ढूँढ़ रहा होता है।

स्टूडियो में बैठा एंकर स्वयं न्यायपालिका, अभियोजन पक्ष, विपक्ष, गवाह और कभी-कभी जनता भी बन जाता है। उसके प्रश्नों की गति इतनी तेज़ होती है कि उत्तर यदि कहीं मौजूद भी हो तो घबराकर बाहर आने से इनकार कर देता है।

प्रवक्ता भी कम साधक नहीं होते। वर्षों के अभ्यास के बाद वे उत्तर देने की कला से ऊपर उठ चुके हैं। अब वे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते, प्रश्नों का पुनर्जन्म कराते हैं।

"महँगाई क्यों बढ़ी?"

"पहले यह बताइए, आपके समय में क्या फूल बरस रहे थे?"

"बेरोज़गारी पर क्या कहेंगे?"

"आपको पिछले पचास वर्षों की बेरोज़गारी दिखाई नहीं देती?"

"इस मुद्दे पर आपका उत्तर क्या है?"

"पहले आप यह स्पष्ट कीजिए कि आपका प्रश्न निष्पक्ष है भी या नहीं?"

प्रश्न बेचारा अपने उत्तर की प्रतीक्षा करता रह जाता है और बहस अगले प्रश्न की ओर प्रस्थान कर जाती है।

मुझे लगता है कि भविष्य में विश्वविद्यालयों में 'प्रवक्ता विज्ञान' नाम का नया विषय शुरू होना चाहिए। उसके पाठ्यक्रम में कुछ अनिवार्य अध्याय होंगे—बिना उत्तर दिए पाँच मिनट बोलना, विषय बदलने की उन्नत तकनीक, प्रतिप्रश्न का व्यावहारिक प्रशिक्षण, मुस्कराते हुए क्रोधित दिखना और समय समाप्त होने तक मूल मुद्दे को सुरक्षित रूप से गायब कर देना।

अंतिम वर्ष में शोध प्रबंध का विषय होगा—"उत्तर लोकतंत्र के लिए कितना आवश्यक है?"

टीवी बहसें देखकर मुझे अब शैलेन्द्र का गीत थोड़ा संशोधित रूप में याद आता है—

"एक सवाल तुम करो,

एक सवाल मैं करूँ,

उत्तर कहीं न मिल सके,

बस सिलसिला यही चलूँ।"

अब लगता है कि हमारे समय में उत्तर सबसे असुरक्षित प्राणी है। वह स्टूडियो में प्रवेश करने से पहले ही लापता हो जाता है। चारों ओर सवालों का विराट उद्योग चल रहा है, लेकिन उत्तर का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है।

हो सकता है किसी दिन संसद में नहीं, किसी टीवी स्टूडियो में यह घोषणा हो—

"देश में उत्तरों की भारी कमी है। फिलहाल अगले आदेश तक काम चलाने के लिए प्रश्नों से ही काम लिया जाए।"

ब्रजेश कानूनगो 


चड्डी-बनियान लिमिटेड : चौर्य प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल

चड्डी-बनियान लिमिटेड : चौर्य प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल

बेचारे चड्डी-बनियान यूँ ही चर्चा में आ जाते हैं। देश में चाहे कुछ भी हो जाए, पुलिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक न एक बार उनका नाम अवश्य आ जाता है। किसी मोहल्ले में चोरी हुई नहीं कि घोषणा हो जाती है—"यह चड्डी-बनियान गिरोह का काम है।"

मुझे हमेशा इन गरीब कपड़ों पर दया आती है। अपराध उनका नहीं, बदनामी उनकी। जैसे अपराधी ने चोरी नहीं की, चड्डी और बनियान ने मिलकर षड्यंत्र रच दिया हो।

वैसे अगर ऊपरी कपड़ों का लोकतंत्र समाप्त कर दिया जाए तो हम सब मूलतः इसी बिरादरी के सदस्य हैं। अंतर केवल इतना है कि किसी के ऊपर कुर्ता है, किसी के ऊपर सूट है, किसी के ऊपर सत्ता है और किसी के ऊपर सदाचार का इस्त्री किया हुआ कोट। भीतर सबकी नागरिकता चड्डी-बनियान ही है।

मुझे लगता है कि इस गिरोह की सबसे बड़ी कमजोरी उसका प्रबंधन है। आज सफलता का पहला सूत्र है—अपराध नहीं, उसका मैनेजमेंट। अकेला चोर पकड़ा जाता है, संगठित चौर्य व्यवस्था सम्मानित कहलाती है।

अब जमाना बदल गया है। चोरी भी स्टार्टअप की तरह चलती है। पहले सेंध लगती थी, अब सर्वर हैक होते हैं। पहले ताला टूटता था, अब ओटीपी टूटता है। पहले जेब कटती थी, अब बैंक खाते मुस्कुराते-मुस्कुराते खाली हो जाते हैं। पहले चोर रात में आता था, अब दिनदहाड़े वीडियो कॉन्फ़्रेंस में शामिल रहता है।

हर सफल अभियान की तरह चोरी के भी विभाग होते हैं—रणनीति प्रकोष्ठ, कानूनी सलाहकार, डिजिटल विशेषज्ञ, जनसंपर्क अधिकारी, सोशल मीडिया प्रबंधक और आवश्यकता पड़ने पर चरित्र प्रमाणपत्र देने वाले शुभचिंतक भी। इसे आधुनिक भाषा में इकोसिस्टम कहते हैं।

हमारे समाज ने भी शब्दों का बड़ा सुंदर वर्गीकरण किया है। सेवा करने वालों का दल, विचार रखने वालों का समूह, चुनाव लड़ने वालों का मोर्चा, कारोबार करने वालों का नेटवर्क और चोरी करने वालों का गिरोह। फर्क केवल शब्दों का है, संगठन की कार्यप्रणाली लगभग एक जैसी रहती है।

हर संगठन की अपनी वर्दी होती है। कहीं खादी पहचान है, कहीं भगवा, कहीं हरा, कहीं सफेद, कहीं काला कोट, कहीं महँगा सूट और कहीं केवल चड्डी-बनियान। वर्दी देखकर आदमी का चरित्र नहीं, उसका विभाग पता चलता है।

पुराने डाकू कम से कम ईमानदार थे। घोड़े पर आते थे, बंदूक दिखाते थे और साफ़-साफ़ कह देते थे—"जो है, निकाल दो।" आज के सभ्य लुटेरे पहले मुस्कराते हैं, फिर आश्वासन देते हैं, उसके बाद नियम समझाते हैं और अंत में आपकी जेब को राष्ट्रहित में हल्का कर देते हैं। आप लुट भी जाते हैं और धन्यवाद भी कहते हैं।

चड्डी-बनियान गिरोह की एक और त्रासदी है। यह बेचारा कैमरे में जल्दी आ जाता है। सीसीटीवी उसे पहचान लेता है, पुलिस पकड़ लेती है और मीडिया उसे राष्ट्र का सबसे बड़ा खतरा घोषित कर देती है।

लेकिन जिनके अपराधों पर ब्रांडेड कपड़ों की प्रेस इतनी शानदार होती है कि सिलवटें तक दिखाई नहीं देतीं, वे वर्षों तक सम्मानित नागरिक बने रहते हैं। उनका अपराध कभी "अनियमितता", कभी "वित्तीय गड़बड़ी", कभी "प्रक्रियागत त्रुटि" और कभी "जांच का विषय" बन जाता है। अपराध भी कपड़ों की तरह वर्गभेदी होता है।

छोटा चोर माल लेकर भागता है, बड़ा चोर व्यवस्था लेकर चलता है। छोटा चोर जेल जाता है, बड़ा चोर जमानत, बहस, समिति, आयोग और प्रेस विज्ञप्तियों के बीच अपना भविष्य सुरक्षित कर लेता है। छोटे चोर के पास चड्डी-बनियान होती है, बड़े चोर के पास प्रतिष्ठा का ब्लेज़र।

कभी-कभी लगता है कि चड्डी-बनियान गिरोह को किसी बड़े प्रबंधन संस्थान में भेज देना चाहिए। वहां उन्हें सिखाया जाएगा कि चोरी से अधिक महत्वपूर्ण है छवि प्रबंधन, अपराध से अधिक उपयोगी है कथानक प्रबंधन, और पकड़े जाने से बचने का सबसे आसान उपाय है—इतने सम्मानित दिखाई दीजिए कि किसी को आप पर संदेह ही न हो।

तब शायद पुलिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पहली बार यह सुनने को मिले—"इस बार चड्डी-बनियान गिरोह नहीं, सूट-बूट प्रबंधन समूह सक्रिय था।"

उस दिन चड्डी और बनियान पहली बार सम्मान के साथ अलमारी में टाँग दिए जाएँगे और कहेंगे—"देखा, बदनाम हम थे, हुनर किसी और का था।"

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, August 4, 2026

माई री, मैं कापे लिखूँ...!

माई री, मैं कापे लिखूँ...!

सुबह से वह देश बचाने में लगा था।

देश बचाने का उसका तरीका थोड़ा अलग था। उसने घर की सारी खिड़कियाँ खोल रखी थीं, लैपटॉप की भी। एक स्क्रीन पर समाचार चैनल बिना आवाज़ के चिल्ला रहे थे, दूसरी पर एक्स हर तीसरे सेकंड नया राष्ट्रनिर्माण कर रहा था, तीसरी पर फेसबुक अपने पुराने झगड़ों को नए कमेंटों से सींच रहा था और चौथी पर एक खाली डॉक्यूमेंट उसका मुँह चिढ़ा रहा था।

उस डॉक्यूमेंट में उसने शीर्षक लिखा—"लोकतंत्र की नई विडंबना।"

तभी किसी मंत्री ने बयान बदल दिया।

शीर्षक मिटा दिया।

लिखा—"बयानों का मौसम।"

इतने में एक अभिनेता ने माफ़ी माँग ली।

फिर मिटा दिया।

लिखा—"माफ़ियों का महोत्सव।"

तभी एक बाबा गिरफ्तार हो गए।

शीर्षक फिर बदल गया।

इतने में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी आ गई। उधर किसी खिलाड़ी ने संन्यास वापस ले लिया। इधर एक इन्फ्लुएंसर ने राष्ट्रहित में नया वीडियो डाल दिया।

अब शीर्षक लिखने की बजाय उसने माथा पकड़ लिया।

वह सोचने लगा—समाचार अब घटनाएँ नहीं रहे, फटाफट बनने वाले इंस्टैंट नूडल्स हो गए हैं। जब तक पानी उबलता है, नया पैकेट खुल जाता है।

व्यंग्यकार की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि विषय कम हैं; त्रासदी यह है कि विषय इतने अधिक हैं कि किसी एक का अपमान किए बिना दूसरे का सम्मान नहीं हो सकता।

कभी सरकार बुलाती है—"हम पर लिखो।"

विपक्ष पीछे से खींचता है—"पहले इन पर लिखो।"

सेलिब्रिटी कहते हैं—"हम ट्रेंड कर रहे हैं।"

बाबा कहते हैं—"हमारे बिना व्यंग्य अधूरा रहेगा।"

एंकर गरजते हैं—"आज रात का मुद्दा यही है।"

और एआई विनम्रता से पूछता है—"क्या मैं आपका व्यंग्य और बेहतर बना दूँ?"

बेचारा व्यंग्यकार सोचता है—"अब मैं रह ही किसलिए गया हूँ?"

पहले व्यंग्यकार विषय खोजता था। अब विषय व्यंग्यकार को खोज लेते हैं। मोबाइल पर घंटी बजती है और हर नोटिफिकेशन कहता है—"मुझे छोड़कर किसी और पर लिखा तो पछताओगे।"

एक ज़माना था जब लेखक डाकखाने की गति से चलता था। अब उसे इंटरनेट की गति से भी तेज़ भागना पड़ता है। रचना पूरी होने से पहले उसका विषय बूढ़ा हो जाता है। अब साहित्य में कालजयी होने से पहले कालसंगत होना ज़रूरी है।

संपादक भी बेचारा क्या करे! उसे व्यंग्य नहीं, ताज़गी चाहिए। कल का शानदार व्यंग्य आज बासी कचौरी की तरह दिखता है। चाहे उसमें विचारों का कितना ही शुद्ध घी क्यों न लगा हो।

व्यंग्यकार भी कम चतुर नहीं है। वह पहले रचना लिखता था, अब पहले शीर्षक सोचता है। शीर्षक में "वायरल", "ब्रेकिंग", "ट्रोल", "एआई", "लोकतंत्र", "जुमला", "रील", "नैरेटिव" जैसे दो-चार शब्द डाल देता है। आधा व्यंग्य तो वहीं बिक जाता है। बाक़ी आधा फेसबुक के कमेंट बॉक्स में लोग स्वयं लिख देते हैं।

आजकल व्यंग्य लिखना आसान नहीं है। हर पाठक अपने भीतर एक व्यंग्यकार लिए घूम रहा है। अंतर बस इतना है कि वह बिना लिखे ही लेखक को व्यंग्य का विषय बना देता है।

और मानदेय? उसका उल्लेख करना साहित्य का नहीं, हास्य का विषय है। कुछ संपादक आज भी मानदेय भेज देते हैं। अधिकांश लेखक को लिंक भेजते हैं। कुछ तो केवल स्क्रीनशॉट भेजकर ही साहित्यिक ऋण से मुक्त हो जाते हैं। लेखक भी प्रसन्न हो जाता है कि चलो, कम-से-कम प्रमाण तो मिल गया कि उसने लिखा था।

आख़िर में व्यंग्यकार ने लैपटॉप बंद किया। सोचा—आज कुछ नहीं लिखूँगा।

तभी मोबाइल पर सूचना आई—

"देश में अभी-अभी एक नई बहस शुरू हुई है..."

उसने फिर लैपटॉप खोल लिया। बुदबुदाया—

"माई री... मैं कापे लिखूँ...?"

ब्रजेश कानूनगो



Monday, August 3, 2026

सोशल मीडिया के सुभाषित

सोशल मीडिया के सुभाषित

पहले सुभाषित ऋषि-मुनि लिखा करते थे। वर्षों का तप, अनुभव और जीवन-दर्शन उनमें निचुड़कर आता था। अब सुभाषित सोशल मीडिया लिखता है। उसके लिए तपस्या की आवश्यकता नहीं, केवल एक स्मार्टफोन, थोड़ा-सा डेटा और भरपूर अधैर्य चाहिए। पहले लोग नीति पढ़ते थे, अब नोटिफिकेशन पढ़ते हैं। वही आज का नया नीतिशास्त्र है।

सोशल मीडिया का पहला सुभाषित कहता है— यदि किसी पुस्तक के हाशिये पर लिखे नोट्स को इतना बड़ा कर दो कि वही पूरी किताब बन जाए, तो मूल पाठ अपने आप गायब हो जाएगा। आज किसी लेख, भाषण या बातचीत का सार समझने की फुरसत किसे है? एक वाक्य पकड़ो, आधा काटो, चौथाई चिपकाओ और फिर उस पर ऐसा रण छेड़ दो कि बेचारा मूल विचार फ्रेम से बाहर खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता रह जाए।

यहाँ संवाद नहीं, धावा बोला जाता है। सोशल मीडिया का दूसरा सुभाषित है— "गालियाँ दो... पीछे पड़े रहो... मटियामेट कर दो!" तर्क अब बूढ़ी चीज़ हो गई है। प्रमाण भी पिछली सदी की आदत है। अब किसी मतभेद का सबसे आधुनिक समाधान है— उसे ट्रोल कर दो। यदि सामने वाला फिर भी बच जाए तो उसकी पुरानी पोस्टें खोद लाओ। मनुष्य के वर्तमान से नहीं, उसके डिजिटल पुरातत्त्व से न्याय किया जाएगा।

भीड़ पहले चौक-चौराहों पर इकट्ठी होती थी, अब टाइमलाइन पर होती है। फर्क इतना है कि पहले चेहरे दिखाई देते थे, अब प्रोफ़ाइल फोटो दिखाई देती है। मॉब लिंचिंग अब केवल सड़क पर नहीं होती; शब्दों से भी लोग रोज़ मारे जाते हैं। किसी के घर में दुःख आया हो तो उसे ढाढ़स बँधाने वालों से अधिक ऐसे लोग मिल जाते हैं जो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आँसू जल्दी सूख न जाएँ। दुःख जितना पारदर्शी होगा, उसे उतना ही गाढ़ा रंग देने वाले लोग मिल जाएँगे। करुणा का स्थान 'कमेंट सेक्शन' ने ले लिया है।

एक और अद्भुत खोज हुई है। अपनी लकीर बड़ी करने में मेहनत लगती है, इसलिए दूसरों की लकीर मिटा देना अधिक सुविधाजनक है। यह काम अब उँगली से हो जाता है। किसी की उपलब्धि पर संदेह कर दीजिए, किसी की भाषा में दोष निकाल दीजिए, किसी की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा दीजिए। आपके भीतर प्रतिभा हो या न हो, आलोचक होने का लाइसेंस तुरंत मिल जाता है। सोशल मीडिया ने यह लोकतंत्र सबको दे दिया है।

मित्रता भी अब बड़ी विचित्र वस्तु हो गई है। पाँच हजार मित्रों का स्वामी व्यक्ति कभी-कभी अस्पताल के बाहर अकेला खड़ा दिखाई देता है। जो रोज़ मानवता, समाजवाद, क्रांति और संवेदना की पोस्टें लिखता है, उससे यदि एक शाम घर बदलवाने या रक्तदान की विनती कर दीजिए तो उसका मोबाइल प्रायः 'नेटवर्क से बाहर' हो जाता है। तब याद आता है कि जीवन में अभी भी 'लँगोटिया यार' जैसी एक पुरानी तकनीक बची हुई है, जिसका कोई डिजिटल विकल्प नहीं बना।

और सेल्फी! यह आधुनिक दर्शन का सर्वोच्च अध्याय है। कैमरा हमें सिखाता है कि यदि अपना चेहरा सबसे बड़ा दिखाना है तो बाकी सबको छोटा कर दीजिए। परिणाम यह होता है कि पीछे खड़ा ताजमहल भी ऐसा लगता है जैसे किसी ने गलती से फोटो में घुसने की कोशिश कर दी हो। तस्वीर विकृत हो जाती है, पर टिप्पणियाँ फिर भी आती हैं— "वाह!", "लाजवाब!", "क्या पर्सनैलिटी है!" सोशल मीडिया पर प्रशंसा कभी-कभी सौंदर्यबोध से नहीं, सामाजिक कर्तव्यबोध से जन्म लेती है।

सोशल मीडिया का संसार बड़ा उदार है। यहाँ हर व्यक्ति न्यायाधीश भी है, अभियोजक भी, इतिहासकार भी और भविष्यवक्ता भी। केवल एक पद रिक्त है— श्रोता। सुनने का विभाग शायद किसी अपडेट में हट गया है।

फिर भी दोष अकेले सोशल मीडिया का नहीं है। आईना कभी चेहरा नहीं बनाता, केवल दिखाता है। यदि हमारे भीतर अधैर्य, अहंकार, ईर्ष्या और भीड़ का रोमांच भरा है, तो स्क्रीन पर वही चमकेगा। और यदि भीतर थोड़ा-सा विवेक, थोड़ा-सा हास्य और थोड़ी-सी मनुष्यता बची है, तो वही पोस्टों के बीच कहीं मुस्कुराती मिलेगी।

इसलिए आज का सबसे उपयोगी सोशल मीडिया सुभाषित शायद यही होना चाहिए— पोस्ट करने से पहले एक बार पढ़ लीजिए, और टिप्पणी करने से पहले एक बार स्वयं को पढ़ लीजिए। दोनों में यदि थोड़ा-सा भी अंतर दिखाई दे जाए, तो समझिए अभी मनुष्य पूरी तरह ऑफ़लाइन नहीं हुआ है।

ब्रजेश कानूनगो


Wednesday, February 28, 2024

आओ जोड़ने पर जोर लगाएं

आओ जोड़ने पर जोर लगाएं

जोड़ने का उपक्रम हर कोई करता आया है। देश जोड़ने के लिए पद यात्राएं और मन जोड़ने के लिए भीतर का द्वेष बाहर निकालना पड़ता है।

जोड़ने के लिए कुछ तोड़ना भी पड़े तो लोग कोई कसर नहीं छोड़ते। बनी बनाई सरकार को भी विपक्ष की पार्टियां सत्ताधारियों को अपने में जोड़कर तोड़ डालने में संकोच नहीं करतीं। सरकार को बचाने में भी ऐसा ही कुछ जोड़तोड़ हमेशा से होता रहा है।

आज थोड़ा सकारात्मक ही बात करते हैं। तोड़ने की बजाए थोड़ी जोड़ने की क्रिया को समझने की कोशिश करते हैं।


बिना जोड़ लगाए कोई बात बनती नहीं। जोड़ना बहुत जरूरी है। यह कोई नई बात नहीं है। बिना जोड़ लगाए कोई बात बनती नहीं।  प्रभु राम के लंका प्रवेश को सुगम बनाने के लिए वानरों ने बिना किसी साधन के मात्र पत्थर से पत्थर जोड़कर सेतु निर्मित कर दिया था। आज तो ऐसे ऐसे पदार्थ बाजार में उपलब्ध हुए हैं कि सब कुछ जोड़ा जा सकता है। हाथियों से खींचकर भी कपलिंग तोड़े नहीं जा सकते। हरियाणा का लकड़ा पंजाब के पीतल से जुड़ जाता है और कर्नाटक का ग्रेनाइट राजस्थान के मार्बल से।


बोलचाल की भाषा में कहें तो ’कपलिंग’ चाहे जीवन की कठिन डगर पर निकले स्त्री-पुरुष के बीच दाम्पत्य का हो या लोहे की चिकनी पटरियों पर फिसलती तेज रफ़्तार रेलगाड़ी के डिब्बों के बीच के लीवर का, इनकी मजबूती ही सुखद यात्रा की गारंटी होती है। इस कपलिंग में की गयी ज़रा-सी लापरवाही रेलगाड़ी को दो हिस्सों में विभक्त कर देती है।


सच तो यह है कि बिना जोड़ लगाए कोई बात बनती नहीं। जोड़ना बहुत जरूरी है। जोड़ लगाए बगैर कोई फर्नीचर भी तैयार नहीं किया जा सकता। कुर्सी भी नहीं बनाई जा सकती। जरा देखिए, सत्ता की कुर्सी के लिए तो राजनीतिक दलों को कितनी कपलिंग करना पड़ती हैं। कपलिंग बोले तो गठबंधन। कई बार तो ऐसी कपलिंगों में कोई मेल ही नहीं होता, मजबूरी होती है। प्रजातंत्र की रेल दौड़ाने के लिए बेमेल कपलिंग भी करना पड़ जाती हैं। लोकतंत्र की गाड़ी फिर जहां तक पहुँच जाए... जब की तब देखेंगे। कपलिंग टूटेगा तो नए लीवर लगाकर आगे का सफ़र पूरा कर लिया जाएगा। चिंता में अभी से दुबले होने से क्या फ़ायदा।


चीजों के जुड़ाव में कड़ियों का बहुत महत्त्व होता है। रेल डिब्बों को कड़ियों से कपलिंग किया जाता है। जब तक कड़ियाँ आपस में नहीं जुड़ती निर्माण को विस्तार नहीं मिलता।

रेलगाड़ी बनती है, मकान हो या देश, कड़ी से कड़ी मिलती है तब ही दिखाई देता है कि भवन बन रहा है, देश बन रहा है। ईंट से ईंट मिलती है तो दीवार खडी होती है। आदमी से आदमी जुड़ता है तो देश खडा होता है।


कई कड़ियाँ होती हैं जिनसे आदमी से आदमी जुड़ता चला जाता है।  प्रेम, सौहार्द , भाई चारे और शान्ति में जो यकीन रखते हैं वे हमेशा इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि कड़ियाँ जुडी रहें। अपने अपने हाथों की कड़ियाँ जोड़कर मानव श्रंखलाएं बनाते हैं, मगर विघ्न संतोषी सांड हर क्षेत्र में बहुतायत से पाए जाते हैं। कुछ निरंकुश सांड अक्सर इन शांतिप्रिय लोगों के बीच घुस आते हैं एक दूसरे का हाथ थामें लोगों की कड़ियों को तोड़ने के उपक्रम में उत्पात मचाने लगते हैं। इसके बावजूद विभिन्न भाषाओं, धर्मों, रीति रिवाजों और संस्कारों के इतने बड़े देश में भी ऐसी अनेक कड़ियाँ हैं जिन्होंने राष्ट्र को एक साथ जोड़ रखा है।


हर हाल में यह जरूरी होगा कि जोड़ने वाली हरेक कपलिंग को मजबूती देने का हर संभव उपाय सुनिश्चित किया जाए। किसी ने कहा भी है किसी चीज को तोड देना बहुत आसान होता है लेकिन जोड़ना बहुत मुश्किल काम है। जीवन में विवाह हो,लोकतंत्र में राजनीति की रेल हो या देश दुनिया के हालात, ऐसी ही कपलिंग से सुचारू संचार संभव हो पाता है। रहस्यों के राज तक पहुंचने के लिए कई कड़ियों को जोड़ना जरूरी होता है। हाथ से हाथ जोड़ते हुए लोगों तक पहुंचने में सफलता मिलती है। दिल के दरिया मिल जाते हैं तो सौहार्द्र का सागर लहराने लगता है। बस ध्यान इतना जरूर रखना पड़ता है कि सभी कड़ियों की मजबूत कपलिंग करने में कोई कसर न रहे। बाकी तो जो है सो है।


ब्रजेश कानूनगो