Thursday, October 8, 2026

लाठी किसके हाथ में

 लाठी किसके हाथ में 

लाठी बड़ी विचित्र चीज है। अपने हाथ में हो तो सहारा देती है, दूसरे के हाथ में हो तो डराती है। अपनी लाठी में आत्मविश्वास दिखाई देता है, दूसरे की लाठी में कानून-व्यवस्था का संकट।

लाठी की सबसे बड़ी खूबी है कि उसे अपना पक्ष रखने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। वह बहस में शामिल नहीं होती, बहस खत्म कर देती है। तर्क कहता है—“मेरी बात सुनिए”, लाठी कहती है—“पहले मेरी बात मानिए।”

इसीलिए लाठी केवल लकड़ी नहीं, ताकत का सबसे सरल व्याकरण है। जिसके हाथ में होती है, वह वाक्य बनाता है; जिसके सामने होती है, वह विराम चिह्न बन जाता है।

बचपन में हमने लाठी को बुजुर्गों का सहारा माना था। तब लगता था कि आदमी कमजोर होता है, इसलिए लाठी पकड़ता है। उम्र बढ़ी तो समझ आया कि मामला उलटा भी हो सकता है—कभी-कभी आदमी इसलिए लाठी पकड़ता है ताकि बाकी लोग खुद को कमजोर महसूस करें।

सत्ता के गलियारों में लाठी थोड़ी सभ्य हो जाती है। वहाँ वह हाथ में कम, अधिकार में अधिक दिखाई देती है। आदेश उसकी आवाज है और असहमति उसकी परीक्षा। अपनी लाठी को व्यवस्था कहा जाता है, दूसरे की लाठी को अराजकता।

राजनीति में लाठी का एक और कमाल है। जब अपनी तरफ उठे तो वह संघर्ष का प्रतीक होती है, दूसरी तरफ उठे तो हिंसा का। अपनी लाठी जनता की आवाज है, विपक्ष की लाठी कानून की समस्या। यानी लाठी की नैतिकता भी हाथ देखकर तय होती है।

समाज में भी यही नियम चलता है। आदमी तो क्या भैंसे भी लाठी का महत्व समझती रही हैं, चुपचाप लाठीवाले के पीछे पीछे हो लेती हैं। सवाल लाठी का नहीं, अधिकार का है। जीवन का लोकतंत्र भी शायद इसी सिद्धांत पर टिका है कि लाठी सबसे पहले किसकी आवाज का रुख करती है।

समय के साथ लाठी ने अपना रूप जरूर बदला है, स्वभाव नहीं। हर बार वह लकड़ी की नहीं होती। कभी पद उसका डंडा बन जाता है, कभी प्रभाव उसका सिरा, कभी पैसा उसकी पकड़। मगर सिद्धांत वही रहता है—जिसके हाथ में वह है, उसकी बात में वजन है। 

हमें लाठी से कोई एतराज नहीं है, बस उसकी दिशा से आपत्ति हो जाती है। जब वह हमारी तरफ से उठती है तो न्याय की रक्षा करती है। जब हमारी तरफ उठकर आती है तो न्याय की याद दिलाने लगती है।

वस्तुतः समाज में लाठी का सबसे बड़ा सम्मान उसके आकार का नहीं, उसके मालिक का होता है। हाथ बदलते ही वही लाठी कभी कानून बन जाती है, कभी अत्याचार।

सच तो यह है कि अपने हाथ की लाठी सहारा है तो सामने वाले के हाथ की लाठी इशारा, और इशारा न समझने वालों के लिए लाठी की अपनी खास भाषा होती है।

ब्रजेश कानूनगो



 

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