Thursday, September 15, 2016

आदेश और आदेश

व्यंग्य
आदेश और आदेश
ब्रजेश कानूनगो  

लाखों शिव मंदिरों में भगवान भोलेनाथ के सामने नंदीगण केवल इस प्रतीक्षा में बैठे हैं कि आदेश हो तो वे उठ खड़े हो. बगैर आदेश के पत्ता भी नहीं खड़कता . तब वे कैसे खड़े हो सकते हैं, और फिर भगवान भोले भी लंबी समाधि लगाए बैठे हैं. वह कोई भारतीय प्रधानमंत्री तो हैं नहीं कि लाल किले की प्राचीर से आदेश दें कि उठो  नंदियों- गरीबी हटाओ और सारी व्यवस्था फावड़ा-कुदाली लेकर गरीबी हटाने में जुट जाएं. आदेश दें कि विचार करो और समूचा राष्ट्र विचार मग्न हो जाए, स्वच्छता के सन्देश के लिए आदेश दें कि राष्ट्र की गन्दगी दूर करो  और समूचा देश झाडुएँ थामें सड़कों पर उतर आएं.

आदेश नागरिक की रगो में रक्त संचार और ऊर्जा के उत्पादन के लिए आवश्यक उत्प्रेरक है. आदेश के अभाव में व्यक्ति मात्र एक रोबोट है. आदेश रूपी बटन के दबते ही वह गतिमान हो जाता है और आदेश के पालन में जुट जाता है.

भगवान भोले को आदेश देने का अधिकार है वहीं नंदी, गणेश, कार्तिकेय वगैरह द्वारा आदेश का पालन करना उनका धर्म है कर्तव्य है. आदेश होता है दुनिया की परिक्रमा करिए. कार्तिकेय दौड़ पढ़ते हैं अराउंड द वर्ल्ड, उधर गणेश भारी भरकम शरीर के स्वामी. दौड़ना नामुमकिन. तुरंत शरीर की बजाय बुद्धि दौड़ाई और लगा दिया माता-पिता का चक्कर. हो गया वर्ल्ड टूर. अपनी चतुराई और वाक्-पटुता से आदेश देने वाले पैरेंट्स को प्रभावित किया और जीत गए मैराथन. गणेश स्टाइल में आदेश का पालन करने वाले भगवान भोले को प्रिय होते हैं. उनकी गोद में बैठने के हकदार होते हैं. कार्तिकेय की नियति दुनिया का चक्कर लगाते रहना ही है. क्षण भर बैठने, सुस्ताने का समय नहीं है. और ना ही उन्हें दूर दूर तक कोई ठौर नजर आता है.

गुरुकुल में राजकुमार बैठे हैं. आदेश होता है पाठ याद किया जाए- सदा सच बोलो, क्रोध न करो. युधिष्ठिर पाठ याद करने और उनके क्रियान्वयन में जुट जाते हैं. आदेश का पालन दूसरे राजकुमार भी करते हैं लेकिन साथ-साथ अपना धनुष बाण भी चलाते रहते हैं. स्वयंवर में अर्जुन ने मछली की आंख का निशाना लगा कर गुरु और गुरूकुल का नाम रोशन कर दिखाया और युधिष्ठिर सिर्फ सच ही बोलते रह गए. इतिहास की सीख आज अर्जुन ही  अर्जुन नजर आते हैं. आदेश का पालन तो करते हैं मगर मछली की आंख का निशाना लगाने का अपना निजी अभ्यास भी जारी रखते हैं.

आदेश पालन एक हार्मलेस प्रक्रिया है. पालन करने वाले को कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ता. आदेश होता है- आन्दोलनकारियों पर  लाठी चलाओ. पुलिस वालों को निश्चिंत होकर प्रहार करने में कोई कष्ट नहीं है, उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा. पता आदेश देने वाले का पूछा जाएगा कि भाई किसके आदेश से लाठियां बरसाई गई. आदेश होता है वृक्षारोपण करिए. चारों ओर गड्ढे ही गड्ढे और छोटे छोटे से मुरझाए से पौधे नजर आने लगते हैं. अब अगर बगैर देखभाल के पौधे सूख जाते हैं या बकरियां चर जाती हैं तो जवाब आदेश देने वाले से मांगा जाएगा कि जनाब क्या हुआ आप के आदेश का? कहां है हरियाली आदेश पालन से अगर परिणाम अप्रिय आता है तो आदेशक कोसा जाएगा, यदि परिणाम अच्छा निकलता है तो आदेश देने वाले और आदेश का पालन करने वाले दोनों की वाहवाही होती है. मसलन मेहमान बैठे हैं, बेबी को आदेश होता है- बेटे आंटी को पोयम सुनाओ. बेबी आदेश का पालन करते हुए कुछ अंग्रेजी शब्द उगलती है. मेहमानों के सामने बेबी की प्रतिभा तो प्रदर्शित होती ही है, साथ ही डैडी-मम्मी का सीना भी गर्व से दो  इंच फूल जाता है.

बहरहाल, घर से लेकर दफ्तर बाजार से लेकर फ़ौज तक आदेश दिए जाते हैं, आदेश लिए  जाते हैं. कोई पालन करता है, कोई पालन करता हुआ प्रदर्शित करता है. सिलसिला जारी है, जारी रहेगा.

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018


छोटे भाषण के बड़े विषय

व्यंग्य
छोटे भाषण के बड़े विषय 
ब्रजेश कानूनगो

'क्या बात है साधुरामजी बड़े चिंतित नजर आ रहे हैं।मैंने साधुरामजी से पूछा।
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चिंता क्या! नाक ही कट गई हमारी तो।' वे झल्लाते हुए बोले। 'भला ऐसा क्या पहाड़ टूट पड़ा।मैंने पूछा तो वे बोले ' हमारे शहर के कॉलेज का कोई छात्र अंतर महाविद्यालयीन भाषण प्रतियोगिता में  भाग नहीं ले सका इस बार।क्या कॉलेज में छात्र वक्ताओं का अभाव हो गया था या प्रतियोगिता ही निरस्त हो गई।'  मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।  'विषय की कठिनता के कारण कोई छात्र प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए तैयार ही नहीं हुआ।' उन्होंने बताया। 
'ऐसा कौन सा विषय था जिस पर अमूमन ‘बहुत बोलने वाली’ यह नई पीढी के लिए बोलना इतना कठिन हो गया।' मैंने जानना चाहा तो साधुराम जी ने बताया- ‘वाट्सएप के माध्यम से जनजागृति और समाज कल्याण में फेसबुक जैसे नए माध्यमों का सदुपयोग। 

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हे भगवान ! इतना बड़ा और इतना कठिन विषय।' मैं  आश्चर्य से बोल उठा।
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क्या खाक कठिन विषय है!साधुरामजी बोले-  ‘दिन भर लगे रहतें हैं सोशल मीडिया पर, आँखें मोबाइल से हटती नहीं,..खाने –पीने तक की चिंता नहीं रहती..और जब इसी बात पर बोलने का वक्त आता है तो रणछोड़दास बन जाते हैं..' नई पीढी के वैचारिक खोखलेपन पर उनका दर्द ऊंची आवाज में बाहर आया।

'साधुरामजी, भाषण पर भाषण देना सरल है लेकिन किसी निश्चित विषय पर भाषण देना बहुत कठिन होता है। छात्र तो क्या इस विषय पर आप स्वयं भी बगलें झांकने लगेंगे।' मैंने उन्हें शांत करने की कोशिश की।
'भाषण के विषय भले ही बड़े हो, परंतु वे आसान और अपने जीवन परिवेश से जुड़े होना चाहिए। भाषण, भाषण होता है कोई शोध-प्रबंध तो है नहीं कि इतना लंबा चौड़ा क्लिष्ट विषय रखा जाए।' मैंने आगे कहा।
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तो क्या हम अभी भी 'चांदनी रात में नौका विहार' ,'कृषि प्रधान भारत में आबादी की समस्या,' विज्ञान वरदान या अभिशाप,' जैसे पुरातन विषयों पर ही प्रतियोगिताएं आयोजित करते रहें।' साधुरामजी बोले।
'नहीं, मेरा मतलब यह नहीं है, बहुत से सरल और साधारण विषय भी हो सकते हैं जो हमारे छात्रों के सामर्थ्य और रुचि के अनुकूल हों ।मैंने कहा।

‘और फिर भाषण तो भाषण होता है साधुरामजी, कोई शोध-प्रबंध तो है नहीं कि यहाँ-वहां से टीप-टाप कर लिख दिया, वरना पुरानी थीसिस में निशाँ लगाकर अपना शोध-प्रबंध पूरा करने में उन्हें महारत हासिल है ही. इतना लंबा चौड़ा क्लिष्ट विषय रखने की क्या जरूरत थी? ऐसे विषयों पर  लगाम लगानी होगी वरना आगे से आयोजकों का दुस्साहस और बढेगा. और वे भविष्य में 'नारी के अत्याचार में देश की आदिकाल से प्रचलित सामाजिक व्यवस्था जिम्मेदार है,  चुनाव प्रचार और सभाओं में खाटों आदि के बढ़ते नवोन्मेष प्रयोग, महंगाई के दौर में दालों के विकल्प के रूप में विटामिन युक्त वनस्पति और नए कंदों की खोज, आदि-आदि.. जैसे लम्बे-लम्बे विषय निर्धारित करने लगेंगे.’  मैंने कहा तो साधुरामजी गुस्सा करते अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए बोले- 'चलता हूँ, बच्चों को एक भाषण प्रतियोगिता के लिए जरा तैयारी करवानी है; जल्दी में हूँ.' 

'यह तो बताते जाइए भाषण का विषय क्या है और कितना बड़ा है?'  मैंने चुहुल करते हुए पूछा । ‘ऋण लेकर देश से बहिर्गमन करते कॉर्पोरेट्स और आत्महत्या करते किसानों के अंतरसंबंधों का सामाजिक पक्ष.’   उन्होंने बताया और अपनी फिशरकिंग मोपेड की चाबी घुमा दी।


ब्रजेश कानूनगो
503,
गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क,कनाड़िया रोड,इंदौर-452018




ढूंढ सके तो ढूंढ

व्यंग्य
ढूंढ सके तो ढूंढ 
ब्रजेश कानूनगो

जो व्यक्ति अरसे से फिल्मों का विरोधी रहा हो, टीवी  को बुद्धू बक्सा कहता हो, अचानक सिनेमा और टीवी की तकनीक पर मोहित हो उठे। अभिनय को जिंदगी की वास्तविकता से दूर निरुपित करने वाला शख्स, बात-बात पर अभिनय से लेकर फिल्मांकन से जुडे तमाम  तकनीकी विषयों पर चर्चा करने लगे तो उसमें आया ऐसा  परिवर्तन उसके हितैषियों  के लिए चिंता की बात  हो जाना स्वाभाविक  है । साधुरामजी के साथ भी कभी ऐसा ही हुआ था। किस्सा  उस समय का है जब  भारत में टीवी नया नया ही आया था।

उस दिन रविवार था। मैं उनके घर पहुंचा तो वे  रामायण धारावाहिक देख रहे थे । मैं चुपचाप उनके पास बैठ गया।
'देखो यह ट्राली शॉट है।साधुरामजी अचानक बोल उठे । मैंने कोई जवाब नहीं दिया। तभी रामायण सीरियल के उस दिन के एपिसोड में इंद्रजीत के शव को एक स्ट्रेचर नुमा पालकी में रखकर चार लोग उठा कर ले जाने लगे तो साधुरामजी फिर बोले- 'इंद्रजीत के रूप में यह मूल कलाकार का डुप्लीकेट है, यह एक एक्स्ट्रा कलाकार है जो लेटा हुआ है।' इसी तरह धारावाहिक के दौरान पूरे समय  साधुरामजी तकनीक और अभिनय पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणियां देते रहे। मैं मन ही मन सोचता रहा कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिससे अचानक साधुरामजी में  फिल्मांकन कला और उसकी  तकनीकी जानकारी का इतना बौद्धिक फव्वारा फूट पड़ा था। मैंने उनके मन को टटोलना चाहा और पूछा- 'पिछले दिनों आप कहीं बाहर गए थे शायद !' 
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हां ,शूटिंग पर गया था।' उन्होंने बताया।
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क्या किसी फिल्म की शूटिंग देखने गए था?' 
मैंने थोड़ा आश्चर्य से पूछा। 
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हाँ, उमरगांव रामायण की शूटिंग पर गया था।उन्होंने कहा। 
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अच्छा! रामायण धारावाहिक की शूटिंग देखने गए थे आप  वहां ' मैंने बात आगे बढ़ाई 
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शूटिंग देखने नहीं, शूटिंग में भाग लेने गया था।' वे बोले।
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अरे वाह!  रामायण धारावाहिक में काम करने के लिये बहुत-बहुत बधाई भाई। अब आपके कैरियर में  एक नया मोड़ आएगा, इस लोकल राजनीति से सिनेमा और टीवी  का कैनवास ज्यादा विशाल है  प्रतिभा प्रदर्शन के लिए।'   मैंने कहा तो वे मुस्कुरा दिए।
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आपके अभिनय वाला हिस्सा टीवी  पर कब तक आएगा?मैंने जिज्ञासा व्यक्त की तो वे बोले-   'शायद  अगले रविवार  को  ही  आप  मुझे छोटे पर्दे पर  देख सकेंगे।
एक सप्ताह बाद जैसे ही दूरदर्शन पर  रामायण धारावाहिक  शुरू हुआ, हमारा पूरा परिवार आंखें गड़ाए, साधुरामजी को  उसमें  शॉट दर शॉट खोजने लगा।  महाबली रावण  रथ पर सवार हुआ।  'जय लंकेश!' के घोष के साथ  लंका का पश्चिमी द्वार खुलते ही रावण के खूँखार सैनिक और  श्रीराम के वानर सैनिक एक दूसरे पर टूट पड़े। 

हम हर अभिनेता को  ध्यान से  देख रहे थे।  तभी अचानक  मेरी छोटी बिटिया  चिल्ला पड़ी - 'वह रहे! पापा, साधु अंकल ' 'कहां-कहां?'   'वह, वह। आगे से तीसरी पंक्ति में बांये से तीसरे गदा उठाएं, पूछ लगाएं। अरे ! वे  गिर पड़ेकिसी राक्षस ने उन्हें तलवार से घायल कर दिया है.. वे  अब नहीं दिख रहे पापा।'   
तभी महेंद्र कपूर की बुलंद आवाज में समापन चौपाई  'मंगल भवन अमंगल हारी' गूंजने लगी. उस दिन का एपिसोड समाप्त हो गया। 

मेरा दुर्भाग्य रहा कि  मैं अपने परम मित्र साधुरामजी के अभिनय की झलक तक चाहकर भी अंततः नहीं देख पाया। यह दुःख आज तक बना हुआ है. परंतु मुझे  यह जरूर समझ में आ गया  था कि साधुरामजी के कन्धों  पर  उन  दिनों अभिनय का वानर क्यों चढ़ा हुआ था।  साथ ही इस बात का भी विश्वास प्रबल हुआ था कि और भी कई साधुरामजी  जैसे अभिनेता इस रोग से पीड़ित हो रहे होंगे।  और उनके बहुत से मित्र  हर रविवार राम और रावण को देखने सुनने की बजाए  आगे से चौथी पांचवी पंक्ति के छठे सातवे नंबर पर  अपने अभिनेता दोस्त को तलाश करते करते बेहाल हो रहे होंगे। किसी को उअनकी पूंछ दिखी होगी तो किसी को उनकी गदा या तलवार.

ब्रजेश  कानूनगो
503,
गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क,कनाड़िया रोड, इंदौर - 452018


हम समुद्र को बचाना चाहते हैं

व्यंग्य
हम समुद्र को बचाना चाहते हैं  
ब्रजेश कानूनगो

नमक को लेकर हम लोग बहुत चिंतित रहते हैं। एक कवि ने तो कहा भी है कि हमें समुद्र को बचाना चाहिए क्योंकि  सारा नमक वहीं से आता है। कवि समुद्र को बचाने की बात करता है। बड़ी बात करता है वह।  यही दृष्टि उसे बड़ा और महत्वपूर्ण कवि बनाती है। साहित्य और कविता में ही नहीं जीवन में भी नमक का बड़ा महत्त्व है. नमक के बिना सब बेस्वाद होता है।

डॉक्टरों का हमेशा जोर रहता है कि लोग नमक से परहेज करें। इनकी बातों में आकर कल कहीं नमक पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो हम हिंदुस्तानियों का तो आधा खून ही  सूख जाएगा। हमारे  चेहरों की चमक और जोश इस नमक के कारण ही तो कायम  है। नमक का विज्ञापन जब-जब टीवी पर आता है, मेरा रक्तचाप बढ़ने लगता है. पांच रुपयों की वही नमक की थैली अब पच्चीस में जो मिलने लगी है. आप तो जानते ही हैं हरेक वजनदार विज्ञापन हमारी जेब को हल्का बना देता है.

कुदरती तौर पर शरीर में भले ही मौजूद होता है मगर ‘नमक’ तत्व भोजन से होते हुए जीवन में समाहित होता चला जाता है पहले जिह्वा पर उसके करिश्में होते हैं, फिर हमारे संस्कारों और आचरण में भी लगातार उसके जलवे दिखाई देने लगते हैं.

चाट, पकौड़ी, कचोरी ,समोसा, क्या बगैर नमक के इनकी  कल्पना की जा सकती है ? क्या बगैर नमक के  जीवन में कोई आनंद है। वह लोग भी भला कैसे जीते होंगे जिन्हे  नमक खाने से मना किया गया होता है। वह जीना भी कोई जीना है।

एक पड़ोसन  जब दूसरी पड़ोसन से  बात कर रही हो  तब चुपके से ज़रा उसका आनंद लीजिए.   मूल बात कैसी भी बोरिंग रही हो लेकिन नमक लगा लगा कर उसका बड़ा ही चटकारेदार  स्वरूप सुनने को मिलेगा. अपने दफ्तर के बड़े बाबू से अपने बॉस की कोई  कमजोरी पर बात करके देख लीजिए. फिर देखिये नमक का कमाल !  दूसरे दिन आपको बॉस का प्रेम-पत्र मिलना सुनिश्चित है.

यह  नमक बड़ा महा प्रतापी होता है. कई टीवी चैनल इसी की वजह से छाये रहते हैं और अपनी रोजी-रोटी को बनाए रखते हैं.  एक चैनल के संपादक को इसलिए निकाल दिया गया  कि वह खबरों में पर्याप्त नमक नहीं लगा रहा था . बाद में एक युवा रिपोर्टर को वरिष्ठ सम्पादक बना दिया गया क्योंकि वह  पहले नमक इकट्ठा करता था , फिर थोड़ी सी  खबर भी नमक के साथ प्रसारित कर देता था. नमक बड़ा ताकतवर होता है तथा किसी भी व्यक्ति को उठा-गिरा सकता है.
एक मंत्री महोदय ने अपने एक निकट संबंधी अफसर का स्थानांतरण उपजाऊ क्षेत्र में करवा कर उसको एवं उसके परिवार वालों को  नमक प्रदान किया.  बाद में  उन्हीं मंत्री महोदय के सत्ता से बाहर हो जाने पर अफसर ने मंत्रीजी के परिजनों को जहां-तहां  नौकरियां देकर  नमक का हक अदा कर दिया .  नमक अपना हक मांगता है. कोई नमकीन समोसा खिला कर अपना काम करवाना चाहता है तो आप उसे निराश कर ही नहीं सकते.

नमक का उपयोग अस्त्र के रूप में भी पर्याप्त रुप से किया जा सकता है. अगर आपको अपने विरोधी की कोई दुखती रग नजर आये तो उस पर तुरंत नमक रख दीजिए, वह तिलमिला उठेगा. उसका तिलमिलाना आपकी आत्मा को विशेष ठंडक पहुंचाएगा. केवल ध्यान इतना जरूर रखना होगा कि कहीं सामने वाला आपकी किसी दुखती रग या घाव न देख ले. क्योंकि पहले मारे सो मीर.

चारों ओर नमक का साम्राज्य दिखाई देता है. लोगों के लिए अलग-अलग धर्म स्वैच्छिक और निजी आस्था के भले ही हो सकते हैं, मगर ‘नमक का धर्म’ सभी में व्याप्त है. इसीलिए नमक को बचाने की चिंता में हम समुद्र को बचाना चाहते है.

ब्रजेश कानूनगो

503, गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर -452018