Tuesday, April 18, 2023

क्रांतिमुक्त दल बदल

क्रांतिमुक्त दल बदल  

जब कोई राजनीतिक व्यक्ति एक दल छोड़कर दूसरे दल में प्रवेश करता है मुझे कुछ जासूसी और अपराध फिल्में याद आने लगती हैं। उनमें होता यह था कि किसी एक गैंग का कोई व्यक्ति चतुराई से दूसरी गैंग के सरगना का दिल जीतकर उसके दल में शामिल हो जाता था। उचित समय आने पर वहां के भेद जानकर उसका सफाया या भंडाफोड़ कर देता था। लेकिन यह विश्वासघात और जासूसी रोमांच राजनीतिक क्षेत्रों में सामान्यतः नहीं दिखाई देता। मैं उम्मीद लगाए ही रह जाता हूं की एक दल से दूसरे दल में गया व्यक्ति वहां भूचाल ला देगा और उस दल को तबाह कर देगा। लेकिन ऐसा होता नहीं। वह घुसपेठिया धीरे धीरे उसी रंग में रंग जाता है।

बहरहाल, जाना-आना दुनिया की रीत है। जो आता है वह जाता भी है। किसे यहाँ हमेशा के लिए रह जाना है। जब सारी सम्भावनाएँ खत्म हो गईं हों तो रह कर कोई करेगा भी क्या। एकरसता कोई अच्छी चीज नही होती। थोडे ही दिनों में बोरियत होने लगती है। डिप्रेशन में आ जाता है भला चंगा आदमी। जीवन का आनन्द ही इसी मे है कि उत्साह बना रहे। निराशा सब बीमारियों की जड है, इसलिए हवा-बदली की भी जरूरत पडती है। हवा बदली के लिए भी कभी कभी स्थान परिवर्तन करना पडता है। इसलिए भी आना-जाना लगा रहता है। कोई हवा बदली के लिए आता है तो कोई हवा बदली के लिए चला जाता है।

ऐसा ही होता आया है सदा से। जो कभी बीहडों में भटका करते थे, हवा बदली के लिए नगरों-महानगरों में सुपारी लेने लगे हैं। जो जनता की सेवा का दम भरते थे, वे अब राजनीति के बगीचे में चले आए हैं, संसद की हवा उन्हे स्वास्थ्य के लिए बडी मुफीद लगने लगी है। हाल यह है कि सेना की कमान सम्भालते सम्भालते कोई सेनापति इतना ऊब जाता है कि वह जनता की कमान सम्भालने के लिए लालायित दिखाई देने लगता है।

अब भाई ! इस आने-जाने को कौन रोक सकता है भला। जहाँ जिसे अच्छा लगे, वहाँ वह पलायन करने को स्वतंत्र है। चाहें तो सरकारी नौकरी  छोडकर कोई एनजीओ बना लो या एनजीओ चलाते-चलाते  इसे आन्दोलन का रूप दे दो। मन करे तो आन्दोलन को राजनीतिक दल में परिवर्तित कर डालो। चुनाव जीतने पर यदि सत्ता का सिंहासन रास न आए  तो दन्न से सडक पर धरने पर बैठ जाओ। ऐसे में कुछ और लोग भी आपके साथ जुडने को आतुर हो सकते हैं। आप उन्हे रोकें नही। उन्हे रोका नही जा सकता। बड़ी बारात में सम्मिलित होने से किसे रोका जा सकता है।

खैर, जो आते हैं वे चले भी जाते हैं। जमे जमाए घरों से लोग निकल लेते हैं। टीवी स्टूडियो की बहसों में कभी लगता ही नही था कि सबसे पुराने घराने का प्रतिष्ठित प्रवक्ता अचानक घर-परिवार छोडकर किसी और परिवार की गोद में जाकर बैठ जाएगा। कभी रुबाबदार प्रशासनिक अधिकारी  रहा और सत्ताधारी दल की बैसाखियों के सहारे राजनीति में राजनीति में आनेवाला व्यक्ति भी सत्ता सुन्दरी के आकर्षण में अचानक  अपने पितृ दल की उम्मीदवारी को तिलांजली देकर विरोधी दल में छलांग लगा देता है।

इस आने-जाने में कभी-कभी बडी होड दिखाई देती है। रोज पल पल  किसी न किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के पार्टी ज्वाइन करने की खबरें सुर्खियाँ बटोरने लगतीं हैं. जैसे इन दिनों हो रहा है.  कई बार आने-जाने वालों के सामने बडे भ्रम की स्थिति निर्मित हो जाती है। ‘मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ’ वाली स्थिति । चुनाओं की घोषणाओं के साथ ही राजनैतिक पार्टियों का सूचकांक रोज बदलता रहता  है। नेता ही क्या स्वयं पार्टियाँ तक समझ नही पाती कि वे किस के साथ जाएं? किसके साथ गठबन्धन करें। आज जिस नेता या दल की तूती बजती है अगले ही दिन किसी समन  के पहुंच जाने की खबर सामने आ जाती है। संभावनाओं के आकाश में शंकाओं के बादल घिरे रहते हैं। कोई जानता ही नही कि चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा। ऐसे आयाराम गयारामों को निर्णय लेने में भारी कठिनाई का सामना करना पड जाता है।  सत्ता सुन्दरी के खयालों में खोए इन सभी के अंतर्मन में एक ही धुन गूंजती रहती है-‘एक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती हो।’ लेकिन दिक्कत यह होती है कि इस राह पर अक्सर कोहरा छाया रहता है, जब भी कोई कृत्रिम प्रकाश पुंज दिखाई देने लगता है ये उस ओर ही दौडने लगते हैं।

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, March 1, 2023

वाट्सएप पर महाकवि

वाट्सएप पर महाकवि


किसी ने कहा है जीवन एक कविता है। कई पद हैं इसमें। चौपाइयां हैं, दोहे, सोरठा,कुंडलियां, क्या नहीं है इस कविता में। लय है, तुक है, तो कभी बेतुकी भी हो जाती है जीवन की कविता।  हुनर चाहिए जीवन कविता को मनोहारी बनाने के लिए।


मैं कुछ इस तरह लिखते हुए अपने लेख की शुरुआत कर ही रहा था कि मित्र साधुरामजी आ धमके। बोले- 'यह क्या दिन भर टेबल पर झुके रहते हो! और कुछ काम धाम भी है या नहीं। जब देखो साहित्य, साहित्य करते रहते हो...'


उन्हें रात को लिखी अपनी नई कविता सुनाई। कविता को उन्होंने सराहा भी मगर थोड़ा निराश होते हुए गोकुलधाम सोसायटी के एकमेव सेक्रेटरी आत्माराम तुकाराम भिड़े की तरह अतीत गमन करते हुए बोले-‘हमारे जमाने में कविताएँ कभी इतनी रूखी-सूखी नहीं हुआ करती थीं, उनमें रस होता, पढ़ते-सुनते समय मन आनंद से सराबोर हो जाता था. तुम्हारी कविताएँ दुखीं कर देती हैं, वो आनंद नहीं रहा अब की कविताओं में।’


‘मगर अब कविताएँ यथार्थवादी होती हैं साधुरामजी, कला की बजाए इनमें कथ्य महत्वपूर्ण होता है,’ मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की।


'क्या मिल जाएगा ऐसे यथार्थवादी लेखन से तुम्हे?' वे बोले।

'लिखने से मुझे आत्म संतोष मिलता है,साधुरामजी।' मैने कहा।

'अब ज्यादा बातें मत बनाओ! कोई पद्मश्री नहीं मिल जाएगा तुम्हे इससे!' वे बोले।

'मैं किसी सम्मान,पुरस्कार की आकांक्षा से नहीं लिखता, मेरा लेखन स्वान्तः सुखाय है साधुरामजी।' मैने कहा तो वे चिढ़ गए-'अरे छोड़ो भी अब, इतना समय घर के कामकाज में देते, भाभीजी को सहयोग करते तो उनकी दुआएं लगतीं।'

'उनकी दुआएं तो सदैव मेरे साथ ही हैं। उनका सहयोग नहीं होता तो मैंने जो थोड़ा बहुत लिखा पढा है वह भी नहीं कर पाता।' मैंने तनिक खिसियाते हुए कहा।

'और सुनो बन्धु ! ये जो तुम लिखते हो क्या सब तुम्हारा अपना  है? ये देखो तुम्हारी वह ग़ज़ल जो तुमने पिछले हफ्ते गोष्ठी में सुनाई थी, वह तो गुलजार साहब की है। यह देखो!' साधुरामजी ने उनका मोबाइल में मेरी ओर बढ़ा दिया।


वहां एक वाट्सएप समूह में मेरी वही कविता शेयर की गई थी, किन्तु नीचे शायर का नाम 'गुलजार' लिखा हुआ था। अब यह मेरे लिए सम्मान की बात थी या गुलजार साहब के लिए सिर पीट लेने वाली, कह नहीं सकता।


'अरे भाई आप तो 'गुलजार साहब' हो गए हैं अब! सफेद कुर्ता पहनों और पहुंच जाओ मुम्बई। खूब काम मिलेगा और अवार्ड भी।' साधुरामजी मजे लेने के मूड में आ गए थे।


'और बंधु जरा कभी अपना रोल बदल कर भी देखो...मसलन कभी पत्नी के काम अपने हाथ में ले लो...बडा मजा है... महरी नही आने पर बरतन मांजने में भी बडा मजा है...अपनी इस कला को भी सार्थकता देकर  चमकाया जा सकता है... कपडे धोना-सुखाना किसी तार पर...छत पर...अपने हाथों से आटा मथ कर गर्मा-गर्म रोटियाँ अपनों को खिलाना...वाह! अद्भुत आनन्द... एक नई कहानी...नई कविता लिखने के संतोष से भरा-भरा सा ... जैसे विविध-भारती पर नीरज या साहिर का गीत सुन रहे हों...!'

अब साधुरामजी जैसे पूरे साहित्य जगत को ही संबोधित कर रहे थे मानो वहां सारे रचनाकार अपनी घर गृहस्थी से विरक्त होकर सिर्फ सृजन में ही संलग्न हो गए हों।


तभी मेरे मोबाइल में चिड़िया चहकी। एक वाट्सएप मेसेज आया था। खोलकर पढा तो चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई। मैंने मोबाइल साधुरामजी के आगे कर दिया। वहां साधुरामजी की एक नज्म हरिवंशराय बच्चन जी के नाम से शेयर हुई थी।


ब्रजेश कानूनगो

उपन्यास लिख रहे हैं वे

उपन्यास लिख रहे हैं वे

लेखन उनके डीएनए में बसा हुआ है। कुछ सालों पहले तक वे कहा करते थे कि साहित्य उनके खून में है। लोगों को भी लगता है कि उनके रोम –रोम से पसीने की बजाए काव्य की गन्ध आती रहती है। यहाँ काव्य को शास्त्रीय अर्थों में व्यापकता से देखा जाना अपेक्षित होगा। क्योंकि उन्होने अपने लेखन को कभी विधाओं की सीमा में नही बान्धा है। जब चाहा, जिस विषय पर लिखना चाहा और जिस विधा में लिखना चाहा, पूरे जोशो-खरोश के साथ अपने को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।

अपने लेखन के प्रारम्भिक दिनों में उन्होने नगर पालिका और कोर्ट परिसर में लोगों के आवेदनों और प्रार्थना पत्रों में भी अपनी प्रतिभा का बहुत सार्थक रूप से उपयोग किया था। लोगों का मानना था कि उनके लिखे आवेदन पत्र पर कारर्वाई जरूर होती थी। उनके पूज्य पिता भी अपने जमाने के जाने-माने अर्जीनवीस थे साथ ही अभिनन्दन पत्र और लग्न-पत्रिकाएँ लिखने में भी उन्हे महारत हाँसिल थी। उनका यह गुण बेटे के खून में भी आया और जब चिकित्सा-विज्ञान ने तरक्की कर ली तब खून के अलावा उनके डीएनए में भी यह गुण दिखाई देने लगा।


दरअसल उनके एक क्लाइंट वैद्य होने के साथ-साथ कविता भी लिखा करते थे। आदर से उन्हे कविराज के नाम से सम्बोधित किया जाता था। कविराज खुद तो साहित्य मनीषी थे ही परंतु साहित्य अभिलाषियों को साहित्य विशारद और साहित्य रत्न जैसी उपाधियों के लिए परीक्षाएँ भी दिलवाया करते थे। उनके सानिध्य में ही इन्होने लेखन को भी साध लिया था। बाद में कविराज की गद्दी भी इन्होने सम्भाल ली और स्वयं कविराज कहलाने लगे ।

कुछ दिनों में ही इन्होने अपने गुरूजी के अप्रकाशित खंड काव्य ‘मारा जो ढेपा-पहुंच गया नेफा’ की पांडुलिपी से रचनाएँ यहाँ-वहाँ छपवाकर ख्याति अर्जित कर ली। फिर इन्होने मुडकर नही देखा और सृजन की रेलगाडी ब्रोडगेज पर न सही पर मीटर और नेरो गेज पर तेजी से दौडने लगी। अखबारों में सम्पादक के नाम पत्रों से लेकर जहाँ मौका लगता इनकी रचनाएँ मय नाम और फोटो के प्रकाशित होने लगीं। लिखना और छपना इनके लिए प्राण वायु सा बन गया। इतना छपने लगे कि जब नही छपते तो लोग पूछ ही बैठते- कविराज बहुत दिनों से कुछ लिख नही रहे?


बस यही वह टर्निंग पॉइंट है जहाँ से कविराज की कहानी और इस लेख को नई दिशा मिलती है। कविराज भी आखिर कितना लिखे और कितना छपें! और भी कई महत्वाकांक्षी नवलेखक लाइन में लगे होते हैं, अखबार और सम्पादक की अपनी सीमाएँ भी होती हैं। थोडा अंतराल तो आ ही जाता है बीच बीच में। दूसरे लेखकों को भी मौका देना होता है।

दरअसल कविराज यह समझते थे कि छपना ही असली लिखना होता है। छपे नही तो वह भी क्या लिखना। जंगल में मोर नाचा किसने देखा? नही छपने पर उन्हे ऐसा महसूस होता जैसे वे निष्क्रीय हो गए हैं और उनकी सृजनशीलता खत्म हो गई है। यही बात उन्हे कष्ट देती रहती थी। लोगों की निगाह में उनका सक्रीय रचनाकार दिखाई देते रहना ही उनकी असली खुशी होती थी। किसी भी कीमत पर वे इसे खोना नही चाहते थे।


यद्यपि वे अपनी रचनाओं में मौलिकता बनाए रखने की दृष्टि से किसी और का लिखा हुआ पढना बिल्कुल पसन्द नही करते थे, फिर भी मुंशी प्रेमचन्द का ‘गोदान’ उनके स्कूल के समय कोर्स में था, इसलिए उसे तो मजबूरन किसी तरह  पढना ही पडा था। पढते हुए वे यह भी सोचा करते थे कि मुंशी जी ने आखिर इतना बडा उपन्यास कैसे लिख डाला होगा? और फिर जब लिख ही लिया होगा तो उसको छपवाने के लिए कितनी प्रतीक्षा करनी पडी होगी उन्हे?


बस इन्ही प्रेमचन्दजी और उनके ‘गोदान’ ने कविराज की समस्या का हल उन्हे सुझा दिया। नही लिखने और निष्क्रीयता के समय लोगों के कष्टदायक सवालों का आसान जवाब अब उन्हे मिल गया था। कल किसी ने उनसे जब पूछ लिया- ‘कविराज बहुत दिन हो गए कहीं नजर नही आए, क्या बात है आजकल कुछ छप नही रहा?’ कविराज मुस्कुराकर बोले- ‘भाई क्या बताऊँ, बहुत व्यस्त हूँ, इन दिनों एक उपन्यास लिख रहा हूँ। थोडी प्रतीक्षा तो आपको करनी ही पडेगी।’

कविराज के साथ मैं भी अब अच्छी तरह जान गया हूँ कि हरेक लेखक अक्सर कभी-कभी उपन्यास लिखने में क्यों इतना व्यस्त हो जाता है।


 ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, January 24, 2023

चर्म मिसाइल का चूकना

चर्म मिसाइल का चूकना

संत बोलते हैं तो लगता है जैसे शब्द नहीं शीतल जल की बूंदें बरस रहीं हो। उद्वेलित मन शांत हो जाता है। आम व्यक्ति मन में उठती कठिनाइयों, वेदनाओं,पीड़ाओं की अग्नि को शांत करने के लिए महात्माओं की शरण में जाता है। उनके चरणों में पुष्प अर्पित करता है।

कई नेताओं के मन में भी भक्तों की चाह होती है।महान कहलाने की ख्वाहिश  में नेताजी संत तो नहीं बन पाते किंतु अभिनेता बन जाते हैं। उनके मुंह से फूल नहीं झरते बल्कि आग के गोले बरसने लगते हैं।

प्रत्येक क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है। आग के गोले की प्रतिक्रिया में कभी कभी श्रोताओं की ओर से जूता चला आता है।

कभी कभी वह लक्ष्य से चूक भी जाता है। टमाटर हो,अंडा हो या जूता हो,अक्सर लक्ष्य से चूकते भी रहे हैं। चूक किससे नहीं होती। भगवान भी चूक जाता है। किसी जीव को जिस पूर्व निर्धारित योनि में जन्म देना होता है ज़रा सी चूक से उसे किसी और योनि का नागरिक बना देता है। शेर के शरीर में गीदड़ की आत्मा और आदमी के सिर में लोमड़ी का दिमाग खुराफात करने से चूकता नहीं। लोग समझते हैं, आदमी चूक गया है,शेर गीदड़ हो गया है। प्रत्यक्ष तो यही दिखता है।

उस दिन नेताजी मंच से दहाड़ रहे थे कि कहीं से एक चर्म मिसाइल सन्नाती हुई उनके बगल से बिना उन्हे क्षति पहुंचाए गुजर गई। निशाना साधकर फैंका गया जूता नेताजी को बगैर क्षति पहुंचाए चुपचाप गुजर जाए तो बताइये इसमें चूक किसकी है? सोचने वाली बात है। जूते में खोट है या कि निशानेबाज से चूक हुई है।

यदि जूते में तनिक भी ईमानदारी हो तो कोई कैसे उसके प्रहार से बच सकता है। कहीं तो लोचा हुआ होगा। निशानेबाज की निपुणता पर भी संदेह होता है। जब गुरुकुल में निशानेबाजी सिखाई जा रही होगी तब उसका ध्यान जरूर कहीं ओर होगा. चिड़ियाँ की आँख की बजाय वह सुन्दर हिरणियों को निहारने में लगा होगा। 

यह भी हो सकता है कि वह जूता किन्ही प्रतिद्वंदी ताकतों के हाथों बिक चुका हो। बाजार युग में सब कुछ खरीदा-बेचा जा सकता है। शरीर और आत्मा की बोली लग जाती है, फिर बेचारी चरण पादुका कौन मंत्रीजी की डिग्री है।

जूता प्रहार की प्रक्रिया को भी प्रायोजित किया जा सकता है। किसी अन्य बहुराष्ट्रीय ब्रांड की चालाकी या कूटनीति भी हो सकती है। जमे जमाये कारोबार पर आरोप लग सकता है कि अमुक कंपनी के जूते  की मारक क्षमता क्वालिटी कंट्रोल की कसौटी पर फेल है। इसलिए विश्वसनीय प्रकृति प्रदत्त और पूर्णतः वेज जूता अपनाएं, पूरी तरह स्वदेशी और गुणकारी। सिर पर लगे तो दिमाग की गर्मी भी निकाले और गंज पर अंकुरण भी सम्भव हो सके।

यह बहुत मानी हुई बात है कि जिस काम के लिए जिम्मेदारी सौंपी गयी हो उसे पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। यही आदर्श मूल्य हैं हमारे। यदि तंत्र को सौ रूपये आख़िरी आदमी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गयी हो और लक्ष्य तक सिर्फ पंद्रह पहुँच रहे तो संदेह होता है। इसका सीधा मतलब है कि तंत्र कही रास्ता भटक गया है। योजनाओं की आत्मा इसी तरह भटक जाती है। भटकाव की इसी अवधारणा को आगे चलकर भ्रष्टाचार जैसी अवधारणा से विद्वजन व्याख्यायित करते रहते हैं।

बहरहाल, कर्म को पूरे मन से सम्पन्न किया जाए और नेक इरादे से सम्पन्न किया जाए तो सफलता अवश्यम्भावी है। यदि मिसाइल को सचमुच सम्पूर्ण इच्छा शक्ति के साथ दुश्मन की ओर दागा जाए तो लक्ष्य भेद अवश्य होगा। मिसाइल हो या जूता, ये सब भौतिक और ठोस वस्तुएं हैं, इनमें पर्याप्त गतिबल होता है, ये जुमलों या उद्घोषों की तरह अदृश्य और हवा हवाई तरंगें नहीं होतीं। इनके टकराने के बाद टारगेट तरंगित होता ही है।

नेताजी की दिशा में सन्नाया गया जूता यदि बगैर लक्ष्य भेदन के गुजर जाए तो इसमें कुछ न कुछ षडयंत्र जरूर शामिल होगा। जरा सोचिए साहब!

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, December 15, 2022

सेवा का मेवा

सेवा का मेवा


गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, फल की चिंता किए बगैर कर्म किए जाओ। समय आने पर फल अवश्य मिलेगा। धैर्य रखिए। पर धैर्य रखना ही तो मुश्किल है। कब तक कोई धीरज धरे। मन रे तू काहे न धीर धरे। कर्म करे तो कब तक करे बेचारा प्राणी। प्राण निकल जाएं तब फल मिले तो क्या करे उसका वह। मरणोपरांत मिले सम्मान की तरह संततियां अपनी बैठक की दीवार पर मढवाकर इतरा सकती हैं बस।

बहुत से लोग अब कर्म करने को सेवा करना कहते हैं। सेवा शब्द में स्निग्धता है। कर्म थोड़ा खुरादरा सा लगता है। पसीने की गंध आती है इसमें से। सेवा में पावनता है, इसमें केवड़े सी पवित्र महक महसूस होती है। भवन बनाने वाले कर्म करके पसीना बहाते हैं। सदन में सेवा की शपथ लेते नेताओं के शब्द मंत्र की तरह बिखरकर सदन को पवित्रता की सुगंध से भर देते हैं। सेवा की सुवास से प्रजातंत्र का मंदिर महकने लगता है।

तमाम खट कर्म करके चुनाव में विजयश्री मिलने के बाद हर चुने हुए जनप्रतिनिधि की दिली तमन्ना होती है कि वह लोगों की सेवा कर सके। लेकिन क्या सेवा के लिए अपने आपको समर्पित कर देना अब इतना सहज रह गया है? सेवाभावियों की बड़ी भीड़ उमड़ती है अब। हर कोई सेवा करना चाहता है। जो सेवा करता है मेवा उसे ही मिलता है।


क्या क्या सपने देखे होंगे विजयी नेता जी ने। जल सेवा करेंगे,अपने क्षेत्र में नल लगवाएंगे। किसानों के खेतों तक नहरें बनवाएंगे। अस्पताल और स्कूल खुलवाएंगे गली गली। जर जर स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प करने का प्रयास करेंगे। पर ये हो न सका। विजयश्री का मुकुट धारण करने के बावजूद सेवा कार्य के अवसर नहीं दिखाई दे रहे। कर्म करने से फल मिलता है और सेवा करने से मेवा।

जी,हां,चौंकिए नहीं! फल को सुखा लिया जाए तो वह मेवा बन जाता है। ताजे से ज्यादा सूखे में ज्यादा सुख है। फल से ज्यादा मेवा मूल्यवान होता है। नेताजी यह बात अच्छे से समझते हैं। मेवा चाहते हैं इसलिए सेवा करना चाहते हैं। पर दिक्कत यह है कि जिस दल के टिकट पर चुनाव जीतकर आए हैं,उसकी सरकार नहीं बन सकती। सत्ता के बगैर कैसे करें सेवा? सेवा का संकल्प कैसे पूरा हो। मेवा पाने की ख्वाहिश अधूरी रह जाने की आशंका सामने खड़ी हो गई है। उनको लगता है कि सेवा का मेवा उनसे दूर खिसक गया है। वे कहते हैं सत्ता में रहे बगैर सेवा करना संभव नहीं। सत्ता में नहीं तो मेवा नहीं। चुनावी संग्राम में उनके कर्मों का विजय फल तो मिल गया है, परंतु उसे मेवा में रूपांतरित किया जाना संभव नहीं है। सत्ता की उम्मीद लिए थोड़े दिन पहले जिस दल में शामिल हुए वह भारी अल्प मत में आ गया है।
वे इसी जीवन में सेवा का मेवा सेवन करना चाहते हैं। देर रात उन्होंने बहुत विचार मंथन किया और सुबह उठकर बहुमत वाले दल में छलांग लगा दी।

ब्रजेश कानूनगो
 

Thursday, November 17, 2022

कुत्तों का खलल

कुत्तों का खलल


अक्सर वीकेंड पर साधुरामजी और मैं लांग ड्राइव के लिए निकल जाते हैं। इससे मेरी पुरानी कार भी हमारे साथ थोड़ी सी ताजगी प्राप्त कर लेती है। साधुरामजी के साथ देश दुनिया की खट्टी मीठी खबरों की चर्चा करके हम भी नई ताजगी से भर जाते हैं। बड़ा आनंद आता है।

'इन दिनों हमारे यहां कुत्तों ने बड़ा आतंक मचाया हुआ है बंधु!' साधुरामजी ने कार में बैठते ही चर्चा के विषय को आगे बढ़ाया।
'हां,बिलकुल! अभी हाल ही में एक बच्चे को लिफ्ट में  पालतू कुत्ते ने काट लिया। थोड़े दिन पहले एक सुरक्षा गार्ड को घायल कर दिया। हर कहीं लोग कुत्तों के इस खतरनाक व्यवहार से चिंतित हैं। हमारे जीवन में इनका अवांछित अतिक्रमण सबको परेशान कर रहा है।' मैने कार स्टार्ट करते हुए कहा।
'कुछ न कुछ इनका करना ही पड़ेगा!' साधुरामजी बोले।

तभी एक पिल्ले ने मेरी कार के सामने आकर खुदकुशी करने का विचार बनाया। मैं कह नहीं सकता किस वजह से उसने मेरी ही कार को आत्महत्या का माध्यम बनाया होगा।

'कुत्ता कहीं का, इसे मेरी ही कार मिली मरने के लिए!'  घबराहट में मेरे मुंह से उसके लिए कुत्ते की ही गाली निकली। मुझे गुस्से के साथ साथ एतराज भी था कि वह इंसानों के लिए बनाई गई सड़क पर आया ही क्यों!'

'तुम्हारा मतलब है कि जब कुत्ते के पिल्ले कोई सड़क पार करें तब उन्हे इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि वह उनके बाप दादा की जागीर नही है कि यहाँ वहाँ ताकते हुए उस पर आराम से चहल कदमी करते फिरें। सड़क सरकार मनुष्य के लिए बनाती है। यह सरकार की मर्जी पर है कि उस पर भ्रमण करने की इजाजत वह किसे दे और किसे नही दे। कुत्ते और अन्य प्राणियों के पिल्ले कोई टैक्स नही चुकाते कि वे भी उसका उपयोग करें और फ्री-फोकट में हमारी गाड़ियों के सामने आकर हमारी जान को मुसीबत में डालें।' साधुरामजी चुहुल के मूड में आकर मजे लेने लगे।

'और नहीं तो क्या! न कुत्ते का बच्चा सड़क का साझेदार बनने की कोशिश करता न वह हमारी गाड़ी के रास्ते में रुकावट बन पाता।  स्वयं की गलती का खामियाजा तो उसको भुगतना ही पडेगा साधुरामजी।'  अब थोड़ा मूड मेरा भी बनने लगा था।

'जब हम बडे आराम से कैलाश खैर के सूफियाना प्रेम गीतों के रस में सराबोर होते हुए सफर का मजा ले रहे थे कि साले इस कम्बख्त कुत्ते के पिल्ले ने सारा मजा किरकिरा करके रख दिया। यह तो अच्छा हुआ कि सामने कुत्ते का पिल्ला ही आया, खुदा ना खास्ता कोई आदमी का बच्चा आ गया होता तो...!' साधुरामजी पूरे मूड में आ गए।

हम कहां पीछे रहने वाले थे थोड़े दार्शनिक अंदाज में कहने लगे-'यों देखा जाए तो यह बात केवल डामर और सीमेंट से बनाई गई सड़कों तक ही सीमित नही है मित्र, जहाँ अनाधिकृत जीवों का आना-जाना बना रहता है...देश में कई प्रकार की अन्य सड़कें भी हैं और उन पर कई प्रकार की गाड़ियां दौड लगा रहीं हैं।'
'जैसे? जरा स्पष्ट तो करो...' साधुरामजी ने मेरी तरफ ताकते हुए कहा।

'मसलन राजनीति को ही लें। यह भी सत्ता तक पहुंचने की एक सड़क ही है। अनेक पार्टियाँ अपनी अपनी विचारधाराओं के रंगों और रणनीति के दुपट्टे टोपियां डाले, विभिन्न तकनीकों से लेस होकर, सत्ता प्राप्ति का महान लक्ष्य लिए प्रजातंत्र की सड़क पर दौड़ लगा रही हैं। अब इस दौड़ में यदि कोई अवांछित आपके राजनीतिक हितों की राह में आकर बाधक बन जाए तो उसका तो कुत्ते के पिल्ले की तरह कुचल जाना निश्चित ही है।' मैंने साधुरामजी की कमजोर नस को दबाया।

'तो भैया, इस बात को तो अब यहीं खत्म करो और जरा इन बेलगाम पिल्लों के आतंक पर अंकुश लगाने का उपाय करो वरना ये इसी तरह हमारे जीवन की खुशनुमा राह में आकर हमें मुश्किल में डालते रहेंगे।' कहते हुए साधुरामजी ने प्रसंग का लगभग पटाक्षेप ही कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, November 8, 2022

रोबोट भी बन रहा है मानव

रोबोट भी बन रहा है मानव  


सुबह की चाय की चुस्की भरी ही थी कि साधुरामजी अखबार थामें बड़ी ही चिंतित मुद्रा में उपस्थित हो गए। 

'मैंने कहा था ना कि एक दिन विज्ञान हमारे लिए अभिशाप बन जाएगा!' आते ही बोले।

'ऐसा क्या हो गया?' मैंने उत्सुकता से पूछा। 
'हो क्या गया! गजब हो गया है! अब हज्जाम, पुलिसकर्मी जैसे लोग बेकार हो जाएंगे। ऐसे यंत्र मानव याने रोबोट बनाए जा चुके हैं जो बहुत ही कुशलता से अपना काम कर सकते हैं।'  वह बोले।

'क्या रोबोट भी बाल काटते समय अपनी कैंची से ज्यादा जीभ चलाएगा?' मैंने पूछा। 
'पता नहीं।' बे बोले। 'हमारी दाढ़ी बनाते समय वह भी राजनीति के गिरते स्तर पर अपनी राय प्रकट करेगा?' मैंने पूछा तो वे बोले, 'तुम्हें मजाक सूझ रहा है अगर ये रोबोट मानव बहुतायत से वाकई हमारे देश में छा गए तो बेचारे कितने गरीब मजदूरों, कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों की छुट्टी हो जाएगी, उनके परिवार भूखे मरेंगे।
दुनिया के कई देशों में तो काफी पहले ही रोबोट को नौकरी पर रखा जा चुका है। जहां जहां रोबोट नियुक्त किए गए हैं, उनके व्यवहार में बदलाव देखा जा रहा है। अभी अपने इंदौर जैसे शहर में एक ही रोबोट ट्रैफिक पुलिस यातायात को कंट्रोल कर रहा है,यदि वह कंट्रोल से बाहर हो जाए तो जरा सोचिए क्या हाल हो।

हाल ही के एक सर्वे के अनुसार रोबोटों में जो लक्षण नजर आ रहे उनसे उनके अंदर मानवीय गुण आ जाने के खतरे संभावित हैं।' साधुरामजी अपनी रौ में बोले चले जा रहे थे।

'कहने का मतलब अब रोबोट भी बलात्कार कर पाएगा,भ्रष्टाचार कर सकेगा। वाकई विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है।' मैंने कहा तो साधुरामजी थोड़ा झुंझलाकर कर बोले,'हां, हां वह बलात्कार करेगा पैसे खाएगा और और...!' 
'और रोबोट अधिकारी के आदेश से एनकाउंटर भी करेगा।' मैंने बात पूरी की। 

साधुरामजी उठ कर जाने ही लगे थे कि श्रीमतीजी चाय का प्याला ले कर आ गईं। मैंने कहा, 'अजी बैठिए, बैठिए!  रोबोट पत्नी चाय ले आई है।' वे मुस्कुरा दिए और पुनः अपनी कुर्सी पर जम गए।

'मेरे ख्याल से जैसे हमने परमाणु बम नहीं बनाया है उसी तरह यह फैसला भी कर लेना चाहिए कि देशहित में हम रोबोट को भी बढ़ावा नहीं देंगे। डिजिटलाइजेशन व तरक्की के ढोल नगाड़ों के बीच भी हमें मशीनों की बजाय मजदूरों के श्रम का ही उपयोग करना चाहिए। देश में बेरोजगारी और गरीबी का स्तर अभी भी कम नहीं हुआ है। हंगर इंडेक्स में हमारा बड़ा बुरा हाल है।'  चाय का घूंट उतरते ही साधुरामजी का कामरेड जाग उठा। 

'लेकिन हमने रोबोट नहीं बनाए और पड़ोसियों ने रोबोट सैनिक बना लिए तो?' मैंने पूछा।

'नहीं वे ऐसा नहीं करेंगे। वे ऐसा तभी करेंगे जब हम वैसा करें। वे अक्सर हमारा अनुसरण करते हैं। महात्मा गांधी पर फ़िल्म बनने के काफी बाद उनके यहां भी कायदे आदम जिन्ना पर फ़िल्म बनीं। वे बस हमारी नकल करते हैं।'   

बात पुरानी थी पर कुछ ठीक ही लगी। 'हां गांधी फिल्म ने तो वाकई कमाल ही कर दिया था। शायद यह कमाल कोई रोबोट भी नहीं कर पाता जो अभिनेता बेन किंग्सले ने कर दिखाया। रोबोट से तो आदमी ही बेहतर होता है।' मैंने कहा तो वे फिर उत्तेजित हो गए। 'तुम्हें फिर मजाक सूझ रहा है।' 

'मैं मजाक नहीं, सच कह रहा हूं। इन रोबोटों का उपयोग आपकी राजनीति में बहुत अच्छी तरह किया जा सकता है। इन दिनों तो सब राजनीतिक कार्यकर्ता रोबोट की तरह ही तो कार्य करते हैं। जैसा ऊपर से आदेश होता है, करने लगते हैं। सब अलग अलग रंगों की टोपी और दुपट्टा पहने रोबोट हैं।' मैंने साधुराम जी की दुखती रग पर उंगली रख दी। 

'तुम तो राजनीति को बहुत ही गिरी हुई चीज समझते हो। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक होकर ऐसी घटिया बातें तुम्हे शोभा नहीं देती।' वे गुस्से से लाल हो गए।

मैंने चुटकी लेते हुए कहा, 'नहीं नहीं राजनीति तो बहुत अच्छी चीज है। रोबोट और राजनीतिज्ञों की क्या तुलना। रोबोट वह नहीं कर सकता जो राजनेता करते हैं। रोबोट कुर्सी से प्यार नहीं कर सकता। रोबोट असंतुष्ट नहीं हो सकता। वह कोई गुट नहीं बना सकता। रोबोट दल नहीं बदल सकता। रोबोट की राजनीतिज्ञ से क्या तुलना। आप ठीक कहते हैं।' 

साधुरामजी की चाय खत्म हो गई। गुस्से से लाल पीले होते लौट गए। शायद कल फिर कोई नया समाचार लेकर आएं।

ब्रजेश कानूनगो