Thursday, July 20, 2023

वीडियो जनित संवेदना

वीडियो जनित संवेदना

साधुरामजी क्षुब्ध थे। आते ही बोले, मणिपुर की शर्मनाक घटना का वीडियो आज ही आना था क्या? यह सब षड्यंत्र है। देश विरोधी ताकतें ऐसे मौकों का इंतजार करती रहती हैं,जब हमारी संसद या विधान सभा का सत्र शुरू होता है तब ही ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं। हमारे देश और प्रजातंत्र को बदनाम करने का शर्मनाक तरीका है यह।

लेकिन साधुरामजी मणिपुर तो कई महीनों से जल रहा है। इंटरनेट भी बंद हैं। खुद वहां के मुख्यमंत्री ने कहा है कि ऐसी अनेक घटनाएं हुईं हैं, जिन पर जल्दी ही सख्त कदम उठाए जाएंगे। अपराधियों को छोड़ा नहीं जाएगा। मैने कहा।

राज्य ने केंद्र को खबर देने में लगता है विलंब कर दिया। वो तो अच्छा हुआ कहीं से यह वीडियो देश के लोगों तक पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर सरकारों से अपनी ओर से जवाब तलब किया। तब जाकर...। मैं अपनी बात पूरी करता उसके पहले ही साधुरामजी बोल पड़े...

सच कहा आपने। पीएम भी इस अप्रत्याशित घटना और आकस्मिक सूचना से कितने दुखी हो उठे हैं। घटना घटते ही खबर मिल जाती तो अब तक तो अपराधी फांसी पर झूल रहे होते।

लेकिन गृह विभाग की अपनी भी प्रणाली होती है, गुप्तचर होते हैं,एजेंसियां होती हैं जो गृहमंत्रालय को सचेत कर सकती थीं। मैने बात आगे बढ़ाई।

वो सब तो ठीक है,पर वीडियो कहां आया था अब तक। वीडियो आना जरूरी है। संवेदना और चेतना तभी जागृत हो पाती है जब वीडियो आता है। 

यह ग्लोबल विश्व का डिजिटल भारत है, बिना वीडियो साक्ष्य के कार्यवाही आगे नहीं बढ़ती। महिला पहलवान भी वीडियो नहीं दे पाए थे तो न्याय में विलंब होता गया। कोई वीडियो आता है तभी माहौल बनता है, चेतना जागृत होती है,क्षोभ या गौरव का भाव स्खलित होने की स्थितियां निर्मित हो पाती हैं। किसी वायरल वीडियो से ही पता चलता है कि हम तरक्की कर रहे हैं, सम्मानित हो रहे हैं,विश्व में हमारा डंका बज रहा है। वीडियो आता है तभी पता चलता है कि बाहर के मुल्कों में किस तरह कुछ लोग हमें बदनाम कर रहे हैं। साधुरामजी ने स्पष्ट किया।

ये बात तो ठीक कही आपने। कुछ समय पहले एक मुख्यमंत्री ने भी भ्रष्टाचार रोकने के उपाय करते हुए अपने नागरिकों से कहा था, आप लोग रिश्वत मांगने वाले व्यक्ति को रिश्वत दे दें लेकिन उसका वीडियो बनाकर मुझे भेज दें। हम कारवाही करेंगें। मैने ज्ञान बघारा।

तो क्या वह प्रदेश अब भ्रष्टाचार मुक्त हो गया है? साधुरामजी ने जिज्ञासा व्यक्त की। 

पता नहीं! फिलहाल तो वहां के मंत्रीगण ही भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद हैं और किसी वीडियो के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि आरोप से मुक्त हो सकें। 

लेकिन यह जरूरी तो नहीं कि कोई वीडियो सच्चा ही होगा। आजकल तो तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि साधुरामजी के चेहरे पर किंग चार्ल्स की मुंडी चिपकाई जा सकती है। किसी की आवाज में अमिताभ बच्चन की खनक पैदा की जा सकती है। सुपर स्टार राजेश खन्ना की कही बात ही ठीक लगती है, दिल सच्चा और चेहरा झूठा!  मैने चुहुल की।

झूठ के बहुत सारे गवाह और सच के साक्ष्य भले ही कम ही क्यों न हों लेकिन न्यायमूर्ति की अदालत में सच्चाई आज भी प्रायः सामने आ ही जाती है, वीडियो उपलब्ध हो या न हो।  वे बोले।

पर यह तो तय है कि नींद उड़ाने के लिए वीडियो बहुत जरूरी होता है। मैने कहा। लेकिन ऐन संसद सत्र के शुरू होते ही वीडियो का आना तो निश्चित ही कोई षडयंत्र होगा। साधुरामजी बात पर अब भी दृढ़ थे।

जो भी हो मैं तो बिग बी साहब की बात पर विश्वास करता हूं जो उन्होंने त्रिशूल फिल्म में कहे थे, कोई चीज सही वक्त और सही मौके पर की जाए तो उसकी बात ही कुछ और होती है। उसका असर होता है। किसी को इसी मौके और वक्त का इंतजार रहा होगा साधुरामजी! मैने कहा तो वे खिन्न हो गए।

ब्रजेश कानूनगो  



Monday, July 17, 2023

डूबे हुए लोग

डूबे हुए लोग 


दुनिया में कुछ भी होता रहे,यदि अपने मतलब का नहीं है तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यह वह समय है जब हर व्यक्ति अपने में ही डूबा रहता है। पहले आदमी कुएं,बावड़ी,तालाब या नदी में डूबता था। समुद्र में डूबने के लिए थोड़ी तैयारी और प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। अब अपने ही भीतर के महासागर में कभी भी डूबा जा सकता है। तैरना नहीं आने पर डूबने वाला आदमी ज्यादातर हमेशा के लिए डूब जाता था, लेकिन अपने में डूबे आदमी को बाहर निकलने की सुविधा रहती है। वह जब चाहे डूब सकता है और जब चाहे बाहर निकलकर औरों को डूबने के लिए प्रेरित कर सकता है। 

बहरहाल महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी के कुछ भी हो जाने को कोई अब रोक नहीं सकता। न ही किसी को कोई फर्क पड़ता है कि वह क्यों कर ऐसा हो गया। वो जमाना लद गया जब बाप गुस्से में आग बबूला होते हुए माँ पर आँखें तरेरता हुआ चीख उठता था- 'सुनती हो भागवान! तुम्हारा लाडला 'आवारा' हो गया है।'

समय समय की बात है। अब बाप अपने में ही ऐसा डूबा रहता है कि बेटा हत्यारा हो जाए तो भी बाप के माथे पर शिकन तक नहीं आती। ‘न्यू इंडिया’ का नया बाप जानता है कि बेटा अब 'भारत' नहीं रहा। भारत के भीतर के ‘प्रेम’ और आदर्शों को वक्त नें 'प्रेम चोपड़ा’ ने बदल कर रख दिया है। 

‘मदन’ का चाकू 'पुरी' हो या 'भटिंडा' कहीं भी खुले आम अपने जलवे दिखा सकता है। अब कोई ‘बलराज’ अपने बेटे को ‘परीक्षित’ का तमगा लगवाना नहीं चाहता। नए जमाने मे सब बेटे बिना मेहनत किये 'अजेय' बने रहना चाहते हैं। कोई बाप उन्हें बदलने का दुस्साहस चाहकर भी कर नहीं सकता। यह मजबूरी है माँ बाप की। दौलत और जायदाद के लालच में बाप की जान को बेटे की लायसेंसी बन्दूक से खतरा है। 

खतरा तो बाप से बेटी को भी हो गया है। अब ‘ओमप्रकाश’ या ‘नाजिर हुसैन’ से भावुक बाप भी कहाँ देखने को मिलते हैं। ‘जीवन’ दादा और ‘के एन सिंह’ के क्लोन मुहल्ले मुहल्ले बेटा बेटियों पर अत्याचार में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

बात केवल घर परिवार की ही नहीं है। बदलाव की यह प्रवत्ति इससे आगे बढ़कर नागरिक समाज की रगो में प्रवेश कर चुकी है। लोग क्या हो जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। अच्छा भला आदमी न जाने कब रूप बदलकर भेड़ में बदल जाए और किसी गड़रिये के पीछे पीछे  भेड़ों का कोई झुंड लहलहाती खुशहाल फसल को बर्बाद कर दे। गड़रिये को चतुर लोमड़ ‘कन्हैयालाल’ या खूंखार लॉयन ‘अजीत’ हो जाने से कोई रोक नहीं सकता।

अब कोई कभी भी शेर हो सकता है, गधा, बन्दर, चूहा भी हो सकता है। भैंस भी हो सकता है। कोई भरोसा नहीं रहा कि कौन कब क्या हो जाए। भरोसे की भैंस पाड़ा जने या फिर कीचड़ में उतर कर मजे करे, किसी को क्या फर्क पड़ने वाला। नेता अभिनेता हो जाए, अभिनेता अर्थशास्त्री, योगाचार्य व्यवसायी,पड़ोसी थानेदार, टीवी एंकर जज में बदल जाए... कोई फर्क नहीं पड़ता कि टीवी चैनल का एंकर पत्रकार नहीं किसी राजनीतिक दल का वकील होता गया है...अब न्यायाधीश के पद पर है तब ऑन लाइन कार्यक्रम में उत्तेजित प्रवक्ता विरोधी प्रवक्ता का कॉलर पकड़ लेता है। यारां! की फरक पैंदा जी !!

किसी पाठक को कोई फर्क नहीं पड़ता कि नए लेखक की पुस्तक का ब्लर्व किसी गुणी विद्वान के नाम से खुद प्रकाशक ने ही लिख दिया है। अखबार में साहित्य पृष्ठ पर पुस्तक की छपी समीक्षा खुद लेखक ने ही तैयार करके संपादक को प्रेषित कर दी है। 
जब लेखक खुद ही अपने आपको 'प्रेमचंद ' या  ‘परसाई’ समझने लगे तो पाठकों को क्या फर्क पड़ने वाला है। वाट्सएप यनिवर्सिटी से कितने ही नए ‘गुलजार’,’नीरज’, ‘बच्चन’ और ‘अटल बिहारी’ निकलकर आ रहे हैं। अब कोई प्रदीप के गीत को बीन की तरह सुन रहा हो तो जरूरी नहीं कि वह रसिक श्रोता ही होगा। वह इच्छाधारी भैंस भी हो सकती है। क्या फर्क पड़ता है इससे किसी को। आप तो बस डूबे रहिए और दूसरों को भी डूबे रहने को प्रेरित करते रहिए। यह डूबे हुए नए समाज का नया दौर है !  

ब्रजेश कानूनगो 

पारदर्शिता : एक समदर्शी चिंतन

पारदर्शिता : एक समदर्शी चिंतन


आज जरा दर्शन की बात करते हैं। मैं कोई दार्शनिक नहीं हूं और नहीं दर्शन का कोई अध्येता। हां,एक दर्शक जरूर हूं किंतु दृष्टा नहीं। बस चुपचाप दर्शन में लगा रहता हूं। दर्शन बोले तो देखना,निहारना, टापते रहना वाला दर्शन। गांधी या मार्क्स वाला मत समझ लीजियेगा इसे। 

जब कहीं कोई अवांछित बाल देखता हूं उसकी खाल उधेड़ने में मुझे बड़ा मजा आता है। इसलिए मैं जो इन दिनों देख रहा हूं उसमें मुझे कुछ बाल नजर आए तो मन किया कि थोड़ा प्रलाप किया जाए।  यों जब भी भोजन करते वक्त मेरी दाल या सब्जी में कोई बाल निकल आता है, मैं चुपचाप उसे हटा देता हूं कुछ बोलता नहीं। लेकिन कहीं और नजर आ जाए तो हाजमा खराब हो जाता है। किसी सुंदरी की फटी जींस में से घुटना दिखने पर भी मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यह मेरा सौंदर्य बोध है। लेकिन  प्रायः भाषाई दर्शन में कुछ आपत्तिजनक दिख जाता है तो मैं बौखला जाता हूं। आज ऐसा ही कुछ हो रहा है मेरे साथ। 

एक होता है समदर्शी और एक होता है पारदर्शी। बड़े कमाल के होते हैं ये दोनों शब्द। समदर्शी तो एक मायने में ठीक ही लगता है, सबको एक निगाह से देखना और एक लाठी से हांक देना जैसी फिजूल बातों को यदि छोड़ दें तो समान नागरिकता कानून की तरह यह एक बेहतरीन राष्ट्रवादी विचार है। आज मुझे पारदर्शी शब्द में कुछ काला काला नजर आ रहा है। उसी पर विमर्श को केंद्रित रखते हैं।

जब भी कोई घोटाला उजागर होता है अपने बचाव में आरोपी पक्ष कहता है –'हमने तो सम्पूर्ण पारदर्शिता बरती थी. 'लेकिन घोटाला हो गया है।' घोटाले के दैत्य पर पारदर्शिता के सुकोमल शब्द-पंख  चिपका कर पूरे प्रकरण को अक्सर मनोहारी रूप देकर उड़ा देने  के प्रयास होने लगते हैं।

पारदर्शिता का यह नया मुहावरा इन दिनों बहुतायत से चलन में है।व्यक्ति हो, प्रशासन हो या नीति या प्रक्रिया अपनाने की बात हो, हर कहीं  'पारदर्शिता' की फिटकरी घुमाकर गन्दगी का तलछट हटाने की कोशिश की जाने लगती है। आदमी भले ही बेईमान हो लेकिन उसका व्यक्तित्व पारदर्शी कहा जाता है, ऐसी प्रक्रिया भले ही अपनाई गई हो जिससे देश के राजस्व को चूना लगा हो लेकिन उसे सौ प्रतिशत पारदर्शी सिद्ध करने की कोशिश की जाने लगती है।

आखिर यह पारदर्शी क्या है? शाब्दिक रूप से समझा जाए तो ऐसी चीज जिसके आर-पार देखा जा सके, जैसे कांच  होता है, ठहरा हुआ जल होता है, चश्मे का लेंस होता है। पारदर्शी व्यक्तित्व के अन्दर और उसकी पीठ के पीछे जो कुछ छुपा हुआ हो स्पष्ट नजर आ सकता है,वह छुपा नही रह सकता,बल्कि देखा जा सकता है।

प्रश्न यह उठता है कि अगर किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व पारदर्शी है तो क्या वह इतना पारदर्शी हो सकता है कि अपने अन्दर होने वाली या उसकी आड लेकर की जानेवाली सारी   बेइमानियों को स्पष्ट नजर आने देगा ? 

क्या उसमे इतनी पारदर्शिता बनी रह सकेगी या वह स्वार्थ  की धुन्ध से  अपनी असली  पहचान को ही ओझल बना कर लोगों को   भ्रमित करने की  चेष्टा करेगा ?  यह भी हो सकता है कि उसकी पारदर्शिता किसी लेंस की तरह हो जो वास्तविकताओं को छोटा या  बडा अथवा विकृत बना कर प्रस्तुत कर दे।

कई राज्यों  के दावे रहते हैं कि उनकी सरकार और उनका प्रशासन जनता को  पारदर्शिता उपलब्ध कराने को प्राथमिकता दे रहा है। यह सुखद लगता है कि प्रशासन पारदर्शी हो। प्रशासन की मशीन मे होने वाले भ्रष्टाचार और उसमे व्याप्त गन्दगियां नागरिकों को स्पष्ट नजर आ  सकें। आम आदमी देख सके कि अपना काम करवाने के लिए कहाँ और कितनी भेंट चढानी है, कहाँ और किसकी एप्रोच से काम बन जाएगा।  पारदर्शिता के कारण डीलिंग  के सूत्र और  गलियारे खोजने मे आसानी  हो सकती है। पारदर्शी प्रशासन मे सब कुछ साफ साफ  नजर आ सकेगा कि किस लीडर को साधने से उत्पादक क्षेत्र मे स्थानांतर करवाया जा सकता है। प्रशासन के किस पेंच मे तेल डालकर प्रशासनिक घर्षण को कम किया जा सकता है। प्रशासन का पारदर्शी होना अधनंगे सुखिया से लेकर करोडपति  सेठ सुखनन्दन तक के लिए हितकारी है।    

बहरहाल, उम्मीद की जाना चाहिए कि हमारे देश को खोद डालने के उपक्रम में लगे आकाओं का ध्यान कोयला ढोहती लछमा की पारदर्शी आँखों और उसके पारदर्शी पेट पर भी जाएगा जहाँ आँसुओं और भूख के अलावा कुछ और नजर नहीं आता।

ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 25, 2023

उक्तियों पर सवार युक्तियाँ

क्तियों पर सवार युक्तियाँ

तूफान आता है तो जनजीवन अस्तव्यस्त हो जाता है। बाढ़ आती है तो सब कुछ बहा ले जाती है। सूखा पड़ता है तो लोग भूखों मरने लगते हैं। इन्हे कोई रोक नहीं सकता। ये आपदाएं वे कुल्हाड़ियां हैं जो खुद हमने अपने पैरों पर मारी हैं। अब हम इनमें अवसर तलाशते हैं। आपदा में अवसर, यह कहने में कोई लज्जा नहीं आती हमें। अपने अपराध पर परदा डालने की युक्तियां खोज कर नई उक्तियां हमने बना ली हैं।

पुरानी कहावत है कि न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। वह कोई और वक्त रहा होगा, अब ऐसा नहीं होता। राधा नाचने के लिए नौ मन तेल का इंतजार नहीं करती। उसका मन हो तो वह बगैर तेल के इंतजाम के भी डिस्को कर सकती है। पुरानी उक्तियां और कहावतें नए संसार में कोई खास मायने नहीं रखती। कीमत मिले तो इंसान खुद अपना घर बार छोड़कर फकीर हो जाए। गंगू सेठ अपनी गद्दी त्याग कर महाबली भोजराज के साथ साथ पार्टी का झंडा पकडे उन्ही का सिंहासन हथिया लें। यह दौर उक्तियों का नहीं युक्तियों का है।

कभी कभी ऐसा वक्त भी आता है जब परम्परागत उक्तियाँ फेल हो जाती हैं। यह ऐसा ही वक्त है। नई युक्तियाँ पुरानी उक्तियों पर भारी पड़ने लगती हैं। कहा जाता रहा है कि आग लगने से पहले कुआँ खोद लिया जाना चाहिए। लेकिन यह वह दौर है जब बस्ती में आग लग जाए तब भी तुरन्त जमीन खोद कर पानी निकाला जा सकता है। यह वही महान देश है जहां शय्यासीन भीष्म पितामह की प्यास शांत करने के लिए अर्जुन का एक तीर काफी होता है। बुजुर्ग दादाजी अपने पोते को पाजामें में हवा भरकर बावड़ी में धकेल दिया करते थे। पोता खुद हाथ पैर मारते हुए तैरना सीख ही लेता था।

कभी दो नावों में सवारी करना ठीक नहीं माना जाता था। इससे दुर्घटना होने की शत प्रतिशत संभावना बनी रहती है। मगर अब शायद ऐसा नहीं है। एक पाँव एक नाव में और दूसरा दूसरी नाव में रखकर नदी पार करना अब कौशल का काम है। एडवेंचर का रोमांच होता है इसमें। इस काम के लिए आदमी में जोखिम उठाने की क्षमता और इच्छा शक्ति भी होना जरूरी है।

साधुरामजी बड़े साहसी व्यक्ति हैं और जोखिम लेते रहते हैं। कविता और व्यंग्य लेखन जैसी दो विधाओं पर सवार होकर साहित्य की नदी को पार करने की अभिलाषा में एडवेंचर स्पोर्ट्स करते  रहते हैं। इस अभियान में होता यह है कि कविता की कमजोरियां यह कहकर नजर अंदाज हो जाती हैं कि भाई एक व्यंग्यकार और क्या लिखेगा, ठीक ठाक लिखा है। दूसरी तरफ कमतर व्यंग्य भी धक जाता है कि कवि महोदय बेचारे सह्रदय व्यक्ति हैं, कितना कुछ कटाक्ष कर पाएंगे। अपवाद स्वरूप कभी कभार नुकसान भी हो जाता है। खुदा न खास्ता कभी कुछ बेहतर रच दिया तो कवि बिरादरी उनकी श्रेष्ठ  कविता को भी नजर अंदाज कर देती है। दूसरी तरफ उनका लिखा शानदार मारक व्यंग्य लेख भी ‘जमात-ए-व्यंग्य’ द्वारा नोटिस में ही नहीं लिया जाता। चूंकि इतने वृहद साहित्य समाज में ऐसी छोटी मोटी बातें तो होती ही रहती हैं इसलिए उनकी सवारी सदैव जारी रहती है। 

सरकारी फैसलों को लेकर भी कुछ लोग दो नावों की सवारी करते दिखाई देते हैं। निर्णय के साथ भी दिखाई देते हैं और लागू करने के तरीके के विरोध में मंत्रीजी का पुतला भी जला देते हैं। अजीब स्थिति बनती रहती है। भ्रम की ऐसी धुंध में एक दिशा में सोचते दो समूहों के साथ जुड़े होने पर मतिभ्रम भी हो जाता है। लगता है दोनों पक्ष विरोधी हैं। दोनों समझते हैं कि हम दूसरे वाले के गुट में हैं। इसीलिये एक साथ होते हुए भी दुर्घटनाएं होती रहती है। इसके बावजूद सबकी ख्वाहिश यही होती है कि किसी तरह नाव और यात्री सुरक्षित किनारे लग जाएं।

सच तो यह है कि यह बदलाव का महत्वपूर्ण समय है। देश समाज से लेकर नीतियों और व्यवस्थाओं तक में आमूल चूल परिवर्तन हर घड़ी हो रहे हैं। यों कहें सूरज की हर किरण बदलाव की नई रोशनी लेकर आ रही है। ऐसे में आग लगने पर कुआँ खोदना और दो नावों की सवारी करने जैसी उक्तियाँ अप्रासंगिक हो गईं हैं। युक्तियाँ अब उक्तियों की पीठ पर सवार हैं।

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, June 14, 2023

नींद हराम होने से निकला ज्ञान

 नींद हराम होने से निकला ज्ञान 


जिस दौर में खबरिया चैनलों पर समाचार वाचक 'कर्मचारी' को 'करमचारी' उच्चारित करते हों। 'संभावना' और 'आशंका' जैसे शब्द  समानार्थी समझे जाते हों, तब मेरे किसी भाषाई 'आलाप'  के कोई ख़ास मायने नहीं हैं। मेरी बात  को  किसी बेसुरे राग में घोषित हो जाने की पूरी आशंका है। इसे  बेवजह और असमय के  ‘प्रलाप’ का  आरोप भी झेलना पड़ सकता है। फिर भी  दुस्साहस की प्रबल इच्छा से मैं बेहाल हूँ।

दरअसल बात कुछ ऐसी है कि गत रात मेरी नींद हराम हो गई। हालांकि मैं शेयर बाजार का कोई ध्यानमग्न खिलाड़ी भी नहीं हूं कि उठते गिरते सेंसेक्स से मेरी धड़कने बड़ गई हों। न मैं किसी सरकार में किसी मंत्रालय का कोई गुमनाम मंत्री हूं जिसे आने वाले समय में पदच्युत होने का कोई खतरा हो। एक सामान्य सा पेंशनर व्यक्ति जो दिन भर लोकरंजन और राष्ट्रप्रेम से भरे संदेशों को पूरी निष्ठा से जनजागरण हेतु समूची मानव जाति के बीच विस्तारित करने का पवित्र काम करने में लगा रहता है, उसे ऐसी क्या चिंता हो सकती है जिससे उसकी नींद गड़बड़ा जाए।

बहरहाल कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम आंखें बंद किए बिस्तर पर पड़े रहते हैं लेकिन नींद नहीं आती। घड़ी की हर टिक पर हमें आशा रहती है कि शायद अगली टिक हम नहीं सुन पाएँ और नींद के रेशमी जाल में जकड़ लिए जाएं। लेकिन वह नहीं आती तो नहीं आती। 

नींद नहीं आने के अनेक कारण हो सकते हैं। मच्छर आपके शरीर पर आतंकवाद फैला रहे हों, गर्मी पड़ रही हो, हवा चलना बन्द हो। ये नींद नहीं आने के सामान्य कारण हैं। नींद हराम होना इससे थोड़ा अलग है। परोक्ष भावनात्मक कारणों से इंसान की नींद हराम होती रही है। मन में कोई डर बैठा हो कोई दुखद घटना से  कोई दुख साल रहा हो या किसी सुखद समाचार से मन अधिक प्रफुल्लित हो , मनचाही बात अकस्मात फलीफूत हो गई हो अथवा अनचाही पीड़ा ने तन मन को झकझोर दिया हो तब भी  प्यारी निंदिया रानी बाहें नहीं फैलाती।

किसी छोटे दुकानदार से पूछिए जिसका दिवाला निकल रहा हो,किसी युवा से पूछिए जिसने वर्षों मेहनत करने के बाद किसी परीक्षा में सफलता पाई हो लेकिन नौकरी नहीं मिल सकी हो, किसी आम निवेशक से पूछें जिसके शेयरों के भाव अचानक गिर गए हों ... रात भर करवटें बदलने के बहुत से कारण होते हैं। सभी पीड़ितों का जवाब एक ही होगा कि कोशिश करते हैं लेकिन रात को नींद नहीं आती। नींद की चोरी हो जाती है। यह भी सच है कि चोर उनके अंदर ही मौजूद होता है। 

मेरी व्यथा इन सबसे बिल्कुल अलग थी। जब बड़ी मुश्किल से  किसी तरह काल्पनिक भेड़ों की गिनती करते हुए आँख लगी ही थी कि मोहल्ले के कुत्तों ने सामूहिक स्वर में कोई 'श्वान गीत' छेड़ दिया। जब नींद उचट ही गयी और वाट्सएप के सारे जीव-जंतु स्वप्नदर्शी हो चुके तो मेरे लिए इसके अलावा कोई चारा नहीं रह गया कि मैं उस अद्भुत और सुरीले 'डॉग्स गान' के आनंद में डूब जाऊं।

क्या वह कोई विलाप था कुत्तों का?  विलाप था तो उन कुत्तों को आखिर क्या दुःख रहा होगा जो इस तरह समूह गान की शक्ल में यकायक वह फूट पड़ा था। यह दुःख कुत्तों को  सामान्यतः रात में ही क्यों सताता है? क्या दिन के उजाले में कुत्तों के अपने कोई  दुःख नहीं होते? अगर होते हैं तो वे उसे दिन में अभिव्यक्त क्यों नहीं करते। दिन में आखिर कुत्तों को किसका और कौनसा डर सताता है जो वे दुपहरी में अपना मुंह खोलकर विलाप नहीं करते?  

कुछ लोग दिन के कुम्भकर्ण होते हैं। दोपहर की नींद निठल्लों की नींद होती है। इन नींद प्रेमियों को देश प्रेमी बनाने के लिए जगाना जरूरी है, किन्तु यह कैसी हिमाकत है दुष्ट कुत्तों की जो वे थककर सोए मेरे जैसे कर्तव्यनिष्ठ और देश भक्त लोगों की नींद हराम कर देते हैं, रात के दो बजे।

थोड़ा सकारात्मक सोंचें तो यह भी संभव है कि ये कुत्ते अपनी विलुप्त हो रही किसी गायन परंपरा को जिन्दा रखने के महान उद्देश्य से रात को समवेत स्वर में 'आलाप' लेने का अभ्यास करते हों।  जो भी हो इनकी  निष्ठा असंदिग्ध है । पूरे मन से एक साथ, एक स्वर में इनकी तेजस्वी  प्रस्तुति न सिर्फ प्रशंसनीय बल्कि अनुकरणीय कही जा सकती है। अन्य प्राणी जगत में पुरानी परंपराओं को बचाने की यह प्रवत्ति दिखाई देना अब दुर्लभ है। मनुष्य समाज में तो अब हरेक का अपना अलग राग है, अपना अलग रोना है। हमें यह सामूहिकता कुत्तों से सीखनी चाहिए। क्या ख्याल है आपका !! 

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, May 8, 2023

राजनीति और आलू मार्का नेता

राजनीति और आलू मार्का नेता 

राजनीतिक व्यक्ति हो या कंद मूल, उसके जमीन से जुड़े होने का अपना अलग महत्व होता है। खासतौर से यदि जमींकंद की बात करें तो ऐसा कंद जो पूरी तरह धरती से जुड़ा होता है। बीजारोपण से लेकर उसका सारा विकास सतह के भीतर मिट्टी के सानिध्य में होता है। वह चाहे गाजर,मूली हो,रतालू हो,गराडू हो,मूंगफली हो या आलू,सब जमीन के भीतर माटी से एकाकार होकर विकसित होते हैं। 

चुनाओं के समय खासतौर पर जब विशेषज्ञ त्रिशंकु सरकार का अनुमान लगाने लगते हैं ‘आलू मार्का’ नेताओं और दलों की पूछ परख बहुत बढ़ जाती है। हालांकि ऐसे लोगों को कटाक्ष के लिए ‘आयाराम गयाराम’,’दल बदलू’ या ‘पलटू राम’ जैसे संबोधनों से अलंकृत किया जाता है लेकिन इन पर इन बातों का कोई ख़ास असर नहीं होता। जैसे भारतीय भोजन में आलू की लोकप्रियता निर्विवाद है उसी प्रकार भारतीय राजनीति में ‘आलू मार्का’ लोगों का महत्त्व बना हुआ है। 

जो नेताजी एक दल से दूसरे में कूद जाते हैं दरअसल वे समय रहते अपनी राजनीतिक रोटियां एक तवे से दूसरे तवे पर शिफ्ट कर देते हैं। उनकी दृष्टि इसी पर रहती है कि किस चूल्हे की आंच कम हो रही है और किस चूल्हे को बेहतर ईंधन से उसे ज्यादा आंचदार बनाया जा रहा है। रोटियां भी वही रहतीं हैं और उनमें भरा हुआ आलू भी। बस सिकाई का तवा और बटर या घी का ब्रांड बदल जाता है। 

चलिए आज अब थोड़ी आलू की ही बात करते हैं। एक तरह से इसे राष्ट्रीय कन्द के खिताब से नवाजा जा सकता है। कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानियों से लेकर लीडरकिंग लालू प्रसाद के गुण-गौरव तक में ‘आलू’ की उपस्थिति चर्चित रही है। हमारे भोजन में आलू ठीक उसी प्रकार उपस्थित रहता है, जैसे शरीर के साथ आत्मा, आतंकवाद के साथ खात्मा, नेता के साथ भाषण, यूनियन के साथ ज्ञापन, मास्टर के साथ ट्यूशन,वोटर के साथ कन्फ्यूजन, टेलर के साथ टेप, भूगोल के साथ मैप, पुलिस के साथ डंडा और इलाहाबाद के साथ पंडा, अर्थात भोजन है तो आलू है। आलू है तो समझो भोजन की तैयारी है। 

राजनीति की तरह आलू समाज में जायके के लिए ध्रुवीकरण के प्रयास नहीं होते। अर्थ का अनर्थ और साम्प्रदायिकता का तड़का नहीं दिखाई देता। आलू पूरी तरह धर्म निरपेक्ष होता है। हर सब्जी का धर्म उसका अपना धर्म है। हर सब्जी के रंग में डूबकर वह उसके साथ एकाकार हो जाता है। बैगन,पालक,गोभी,टमाटर,बटला,दही,खिचडी,पुलाव, आलू सभी में अपने को जोड़े रखता है। आपसी मेल-मिलाप हमारी परम्परा रही है, यही संस्कार हमारे आलू में भी देखे जा सकते हैं। विनम्रता और और दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार अपने को ढाल लेना हमारे चरित्र की विशेषताएं होती हैं.उबलने के बाद आलू भी हमारी तरह नरम और लोचदार होकर अपने आपको समर्पित कर देता है। चाहो तो आटे में गूंथकर पराठा सेंक लो या मैदे में लपेटकर समोसा तल लो अथवा किसनी पर किस कर चिप्स का आनंद उठा लो। 

आलू की नियति से हमारी नियति बहुत मिलती है. राजनीतिक नेता और पार्टियां जिस तरह हमारी भावनाओं को उबालकर उनके पराठें सेंकते हैं, समोसा तलते हैं या चिप्स बनाकर वोटों के रूप में उदरस्थ करते हैं, उसी तरह आलू हमारे पेट में जाता है। 

हमारे परम मित्र साधुरामजी ने बताया कि जहां हम आलू के दीवाने हैं,वहीं रूसियों को मूली, गाजर और गोभी बहुत पसंद है। इसी तरह अमेरिकियों को शकरकन्द खाने का बहुत शौक होता है। पिछले रविवार जब हमने साधुरामजी के यहाँ भोजन ग्रहण किया तो तो उन्होंने एक नई सब्जी परोसी जिसका नाम था- ‘इंडो-रशिया फ्रेंडशिप वेजिटेबल’ (भारत-रूस मित्रता सब्जी)। जब मैंने वह खाई तो मुझे आलू, मूली और गोभी का मिला-जुला जायका आया. मित्रता की खुशबू दिलों से होकर सब्जियों तक महसूस कर मुझे अपने आलुओं पर गर्व हुआ। अब तो शकरकंद में आलू मिलाकर बनाई गयी सब्जी भी हम बड़े चाव से खा रहे हैं, परोस रहे हैं। दुनिया में यह एक मिसाल भी है जब हमारा देश, दुनिया में हमारी आलू-प्रवत्ति का कायल हो गया है। ऐसे में ‘आलू मार्का’ व्यक्तियों और दलों द्वारा विचारधारा निरपेक्ष होकर सरकारों के बनने बिगड़ने में जो गौरवशाली योगदान दिया जाने लगा है उससे उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान के भाव से मन भर उठता है। 

जिंदाबाद प्यारे आलू। तुम्हारी सदा जय हो! 

 ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, May 2, 2023

ठोकर में है जमाना

ठोकर में है जमाना


जहां चौखट है, वहां ठोकर है। ठोकर और पैरों का बड़ा सीधा रिश्ता होता है। ईश्वर की दहलीज में हमेशा से याचक ठोकर में पड़े रहने को अपना सौभाग्य मानते रहे हैं। ये ठोकरें पवित्र चरण होती हैं जिन पर श्रद्धालु सीस नवाते हैं।
जहां आस्था की ठोकर का अपना बड़ा आशावादी और विनम्र अहसास होता है वहीं दूसरी तरफ कुछ और भी ठोकरें होती है। जिनके तेवर कुछ अलग होते हैं। ऐसी ठोकरें खाई भी जाती हैं और मारी भी जाती हैं। अच्छे अच्छे बदमाश ठोकर खाकर संस्कारी होने लगते हैं। कई बार कई लोग अच्छे अवसरों को ठोकर मारकर आगे बड़ जाते हैं। कुछ ठोकर खा कर औंधे मुंह आ गिरते हैं।

जैसे ही कहीं चुनाव की घोषणा की जाती है वैसे ही चुनाव आयोग एक संहिता लागू कर देता है। आदर्श आचार संहिता लागू करना चुनाव आयोग का धर्म  है। धर्म और कर्म दोनों एक साथ चला करते हैं इसलिए आचार संहिता को ठोकर मारने का उपक्रम भी खूब दिखाई देने लगते हैं।
यदि पैर मिले हैं तो ठोकर मारना भी उसकी एक कला का ही रूप है।

हर एक व्यक्ति को ईश्वर ने चलने के लिए दो अदद टांगें दी हैं। दुनिया नाप लेने की क्षमता व शक्ति इनमें पाई जाती है।
जब बालक पहले पहल चलना सीखता है तब देखिए इन पैरों का आकर्षण और उनकी लड़खड़ाती मोहक चाल। 'ठुमक चलत रामचन्द्र'। उसके बाद तो व्यक्ति ऐसी चाल पकड़ता है कि पीछे मुड़कर नहीं देखता। बाद में वह न सिर्फ चलता है, दौड़ता है बल्कि वह ठोकर भी मारने लगता है। कभी कभी असावधान कदमों के कारण वह स्वयं ठोकर खा भी जाता है। अपनी गलती पर उसे क्षोभ होने लगता है।

अब इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिसके पैर हैं वह ठोकर मार भी सकता है, ऐसा थोड़ी है कि दूरियां नापने के लिए मात्र आप चलते ही रहें... भोपाल दिल्ली या फिर पूरे देश प्रदेश की पदयात्रा ही करना ही तो हमारा उद्देश्य नहीं हो सकता ना।

मनुष्य सदा से प्रयोग शील प्रवृत्ति का रहा है और उसने पैरों को लेकर कई नए नए प्रयोग भी किए हैं। अगर ऐसा न हुआ होता तो देवकी पुत्र यशोदानंदन कालिया नाग की जहरीली फुंकार से कृष्ण कैसे बन पाते। न गोविंद गेंद को जोरदार ठोकर मारते और ना ही वह जमुना जी में जा गिरती। वह गोविंद की ठोकर ही थी जिसने कालिया नाग के गुरूर को चूर-चूर कर के रख दिया था। सही और उचित ठोकर से अच्छे अच्छों की अकड़ खत्म हो जाती है। कोई ज्यादा ही अकड़ रहा हो तो जमाइए एक जोरदार लात या ठोकर, भूल जाएगा वह अपनी सारी हेकड़ी।

बिना ठोकर मारे कोई 'खेला'  संभव ही नहीं। वह कुर्सी का हो या फुटबॉल का। बिना ठोकर के फुटबॉल की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सही निशाने को लक्ष्य करके विवेकपूर्ण ढंग से मारी गई ठोकर फुटबॉल को सीधे गोलपोस्ट की राह दिखाती है, और पेनल्टी कॉर्नर को गोल में तब्दील किया जा सकता है।

इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में कई लोग ठोकर खाते रहते हैं,ठोकर मारते रहते हैं। मारने वाले अपने प्रतिस्पर्धी को पीछे धकेल कर आगे बढ़ जाते हैं। पीछे रह जाने वाला, गिरने वाला फिर संभल कर, उठकर दूसरों को ठोकर मारने लगता है।
वैसे जो व्यक्ति जीवन में एक बार ठोकर खा लेता है उसकी राह आसान हो जाती है, शर्त यह है कि वह अपनी ठोकर से सबक ले वरना ठोकरें जीवनभर  उसका पीछा नहीं छोड़ती। किसी लुप्त होते राजनीतिक दल की तरह गोल पर गोल खाते रहना उसका दुर्भाग्य बन जाता है। ठोकर मारना हरेक के लिए आसान भी नहीं होता। इसके लिए बहुत बड़ा जिगर और मजबूत कदम होना चाहिए। युवराज सिद्धार्थ अपने साम्राज्य को ठोकर मार कर यूं ही वन को नहीं निकल गए थे। हर कोई वैसा महात्यागी और महाबली नहीं हो सकता, जो उसी को लेकर ठोकर मार दे जिसके कारण उसका जीवन सुखी हो सकता है।
यह भी सही बात है कि हर व्यक्ति कहीं भी ठोकर मारने के लिए स्वतंत्र है, चाहे किसी व्यक्ति को मारे, किसी खेल में मारे, या आचार संहिता पर प्रहार करे। बस थोड़ा सा विवेक और निशाना ठीक बनाए रखना जरूरी होता है। अन्यथा खुद का पैर भी घायल हो सकता है। जरा सोचिए!

ब्रजेश कानूनगो