Thursday, June 16, 2022

मुस्कुराइए और कत्ल कर दीजिए

मुस्कुराइए और कत्ल कर दीजिए

अगर विचार करें तो पाएंगे कि जिस तरह आदमी अलग अलग तरह से रोता है,उसी तरह अलग अलग प्रकार से हंसता भी है। कोई खुलकर ठहाके लगाता है तो कोई खिसियानी हंसी हंसता है। और भी भिन्न रूप देखे जा सकते हैं हंसी के, लेकिन जो बात 'मुस्कुराहट' में है वह भला और कहां! मुस्कुराहट को किसी ने मनमोहक मीठी छुरी भी कहा है, खून भी नहीं बहता और सामने वाला कत्ल हो जाता है।

बहरहाल, इन दिनों मैं उनकी मुस्कुराहट का कायल हो गया हूँ । वे अक्सर टीवी पर होने वाली बहसों में दिखाई देते हैं। बहस का मुद्दा कुछ भी रहा हो, चाहे जो दलीलें दी जा रहीं हों , मुझे कोई फर्क नही पडता, मैं तो बस उनकी मुस्कुराहट में डूबा रहता हूँ। विपक्षी वक्ता के वक्तव्य पर वे मुस्कुराहट की ऐसी छुरी चलाते हैं कि सामनेवाला लहुलुहान हो जाता है। निसन्देह उनकी मुस्कुराहट उनके व्यक्तित्व और आचरण पर कोई विपरीत प्रभाव नही छोडती लेकिन वह एक ऐसी ढाल जरूर बन जाती है जो विपक्षी प्रवक्ता के तीखे शब्द बाणों की मारक क्षमता को बोथरा कर देती है।

बहरहाल, बात मुस्कुराहट की निकली है तो मुझे चीन की वह लोकप्रिय कहावत याद आ रही है जिसमें कहा गया है कि ‘मुस्कुराएँ और सभ्य नागरिक बनें’। चीन और हमारे देश की संस्कृति में बहुत सी समानता होने के बावजूद मुझे नही लगता कि हमारे यहाँ मुस्कुराहट और सभ्यता के बीच ऐसा कोई रिश्ता सही बैठता होगा। यह सही है कि मुस्कुराहट एक संक्रामक क्रिया है,अगर आप मुस्कुरा रहे हैं तो सामनेवाला भी मुस्कुराने लगता है, लेकिन यह कतई जरूरी नही है कि हर मुस्कुराते व्यक्ति के भीतर सभ्यता या मूल्यों की मधुरता के सोते फूट रहे होंगे।

किसी व्यक्ति का जनाजा उठ रहा है और आप मुस्कुरा रहे हैं, पडोसी की बिटिया को मुहल्ले का गुंडा परेशान कर रहा है और आप गुंडे की हरकत पर उसके सम्मान में मुस्कुराहट के फूल बरसा देते हैं। आन्दोलनकारी किसानों और अपने हक के लिए प्रदर्शन करते मजदूरों पर पुलिस की लाठियों और पानी की बौछार से भागते गिरते लोगों को देखकर आपकी आंखों में पानी नही आता बल्कि आप खिलखिला उठते हैं। चीन की यह कहावत कोई गारटी नही देती कि जो मुस्कुरा रहा है वह सभ्य या सुसंस्कृत होगा ही। इसकी बजाय हमारे एक फिल्मी गीत का दर्शन शायद अधिक सटीक उत्तर देने की क्षमता रखता है। गीत में कहा गया है -‘मुस्कुराते हुए दिन बिताना..’ । गीत में आगे यह दावा नही किया गया है कि इससे आप सभ्य बन जाएँगे बल्कि समय की अनिश्चितता की आशंका व्यक्त करते हुए आगाह किया गया है कि-‘यहाँ कल क्या हो किसने जाना..’ आज तो जी भर कर मुस्कुरा लो ,कल का क्या भरोसा, मुस्कुराहट पर कल कोई नया नियम कानून लागू हो जाए या बुद्धिमत्ता और सहिष्णुता की तरह मुस्कुराने को भी हीनता के भाव से एक गलती की तरह देखा जाने लगे। तब शायद मुस्कुराना भी दूभर हो जाए। इसलिए जितना हो सके बस मुस्कुराते रहिए। चीन में मुस्कुराहट का कोई सम्बन्ध भले होता हो, हम तो अपनी सभ्यता खुद बनाते हैं। पेट्रोल के दाम बढ़ें या नींबू ,प्याज के। बकासुरों के आग उगलते बयान हों या बुलडोजरों से कुचले घरों से निकली सिसकारियां। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम चुपचाप मुस्कुराते रहते हैं। जितना चाहते हैं, जब चाहते हैं,मुस्कुराते हैं।

आप भी बेआवाज मुस्कुराइए। पर ध्यान रखें ठहाका मत लगाइए। वह लाउड होता है। महाभारत का कारण बनता है। अपने प्राकृतिक स्पीकर को लाउडस्पीकर न बनने दें। मुस्कुराहट में मोहकता है। मोहते रहिए। इसी में सबका कल्याण है। इति!!

ब्रजेश कानूनगो

Saturday, June 4, 2022

पानीपुरी है दुनिया का सबसे अहम जायका

पानीपुरी है दुनिया का सबसे अहम जायका

वे आए। पूरे लवाजमें के साथ आए। उन्होंने बहुत सी बातें कीं। गरीब के कंधे पर विश्वास का हाथ रखा। दुखी बिटिया के आंसू पौंछे। राज्य का मुखिया हो या देश का, उनका ऐसा करना भला लगता है। उनका मुस्कुराना, भावुक हो जाना एक ओर जहां मनुष्य के मन पर भावनाओं की फुहार करता है वहीं अगले चुनावों में वोट की बौछारों में बढ़ौतरी भी सुनिश्चित करता है।

वे सबके साथ भोजन करते हैं। चाट चौपाटी पर गोलगप्पे खाते हैं। अच्छा लगता है। वे हमारे जैसे हैं। हममें से ही एक होते हैं।  बहरहाल, उन्होंने पानीपूरी का भी आनंद लिया होगा।

मुझे लगता है दुनिया ‘नारंगी’ की तरह न होकर ‘पानीपूरी’ की तरह है। एक विशाल पानीपूरी जिसके भीतर जिन्दगी का जायका है। यदि नारंगी की तरह होती तो उसमें बस एक ही स्वाद होता। इस बहुरंगी दुनिया में कितने सारे रस भरे हुए हैं...जीवन के अनेक जायके इस बड़ी पानी पूरी के भीतर लबालब भरे पड़े हैं। और यह भी सच है कि प्राणीमात्र का जीवन जायके पर ही कायम है। रिश्तों की मिठास है, दुःख का खारापन, दुश्मनी की खटास, घृणा की कड़वाहट...और भी बहुत से जायके हैं... स्वाद नहीं तो जीवन बेकार है।


खाने के लिए जीने वाले लोग हों या जीने के लिए खाने वाले, जायका और स्वादिष्टता सबको आकर्षित करती है। सराफा बाजार के रात्रि कालीन ठीये हों या ‘खाऊगली’ की पैंतीस गुमटियां या इंदौर की छप्पन दुकान। स्वाद सागर के पास की ‘चाट चौपाटी’ हो या ‘ सिटी उद्यान ’ की छतरियाँ, जायके का यही आकर्षण जिव्हा की स्वाद ग्रंथियों को ललचाने लगता है और लोग अपनी दुनिया को स्वादिष्ट बनाने की तमन्ना लिए खिंचे चले आते हैं।

स्वाद से भरी इस महकती दुनिया के माथे की बिंदिया होती है ‘पानीपूरी’ की दूकान। इसके बिना बाजार सौभाग्यहीन है। गुलाब जामुन है, पेटिस है, कचोरी है, रबडी है, समोसा है, दही बड़ा है लेकिन पानी पतासे का ठेला नजर नहीं आए तो संसार नीरस लगेगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। हमारे विश्वास की तरह वह होता है और जरूर होता है। शरीर में आत्मा और भोजन में नमक की तरह ‘फूड बाजार’ के प्राण ‘पानीपूरी के ठिये’ में बसे होते हैं।


जहां ‘चाट’ होगी, वहां चटोरे भी होंगे। जो चटोरे नहीं भी हैं, लेकिन चाट के ठेले या दूकान के करीब हैं, उन्हें चटोरा होने से कोई रोक नहीं सकता। पानीपूरी चुम्बक है और यह शरीर मात्र लोहे का टुकड़ा...ऐसा नहीं कि ‘बाजार से निकला हूँ...खरीददार नहीं हूँ...!’  ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पडेगा...!’ गुनगुनाते हुए पानीपूरी की प्याली आगे बढाते हुए बोलना ही पडेगा..’भैया, ज़रा पुदीने वाली बनाना..!’

किसी गुब्बारे की तरह फूले हुए पतासे के भीतर स्वाद का सागर हिलोरें मारता रहता है। अब तो ‘ठेले पर हिमालय’ की बजाए विभिन्न जायकों के नौ समुद्र स्टील के मर्तबानों में पतासों के पेट से होकर हमारे भीतर उतर जाने को लालायित रहते हैं। इन समन्दरों के ज्वार-भाटे इतने तेज होते हैं की उनके प्रभाव से अगले पतासे के इंतज़ार में खडे जातक (बंदा) के भीतर की ग्रंथियों में अद्भुत रसयुक्त रिसन होने लगती है। वह बैचैन होने लगता है। लेकिन जैसे ही पानीपूरी वाला एक छलकती दुनिया उसके प्यालें में धर देता है, वह सर्वोच्च आनंद और संतोष से निहाल हो जाता है। इस पापी पेट की दुनिया में भी हमें इस ‘असीम सुख’ के अलावा और चाहिए भी क्या !

जैसे ही रस भरा गुब्बारा मुंह में पहुंचकर फटता है,स्वाद की नौ रसधार जिव्हा से होकर मन और आत्मा तक को आनंदित करने लगती है। कौन ऐसा व्यक्ति होगा जिसके इस अनुपम आनंद में बढ़ती महंगाई, नफरती बयानों या बेरोजगारों के बुझे हुए चेहरों का स्मरण हो पाता होगा।

राजा हो या रंक, नेता हो या वोटर, पार्षद हो या मंत्री सभी इस सुख की तमन्ना मन में बसाए रखते हैं। पानीपूरी का जायका इस दुनिया को एक बेहतरीन तोहफा है।

ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, May 11, 2022

भाषणवीरों पर भारी हैं आग उगलते बकासुर

भाषणवीरों पर भारी हैं आग उगलते बकासुर 

हेटस्पीच की बड़ी चर्चा है इन दिनों। स्पीच बोले तो भाषण। ऐसा है कि 'राशन पर भाषण तो बहुत हुए पर भाषण पर राशनिंग' कभी ठीक से हो नहीं पाई। जिसे जो मन पड़ता है बक देता है। संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है लेकिन 'बकासुर' हो जाने की नहीं। बोलते बोलते कौन कितना बकासुर हुआ है यह आखिर में कोर्ट को ही तय करना पड़ रहा है। क्लीन चिट भी वही देता है। आमतौर पर इसमें चीटिंग नहीं होती, गवाह दगा दे जाते हैं। समय रहते अपराध के दाग क्लीन हो जाएं तो कोई क्या कर सकता है।


बहरहाल, बात भाषणों की ही करते हैं। सभाओं में भाषणों की समकालीन शैली का इन दिनों हर कोई कायल हो गया है। वक्ता जनता के प्रश्नों का उत्तर नहीं देते बल्कि स्वयं उनसे सवाल पूछने लगते हैं। यही भाषणों की नई और रोमांचक शैली है। ऐसा ही कुछ ख्यात फ़िल्म 'शोले' में हुआ था।


इसी कारण मैं ‘शोले’ फिल्म का भी मुरीद हो गया था। कुछ चीजों का हमारे मन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ जाता है कि उन्हें भुला पाना बहुत कठिन होता है।


पैंतालीस साल पहले धधके ’शोले’ के संवादों की गर्मी आज भी वैसी ही बनी हुई है। ‘तेरा क्या होगा कालिया?’ ‘कितने आदमी थे?’ ‘कब है होली? होली कब है?’ ‘तेरा नाम क्या है बसन्ती?’ भुलाए नहीं भूलते।


कहने को ये एक फिल्म के संवाद थे, असल में ये कुछ सवाल थे। इनके उत्तर में क्या कहा गया ज्यादा मायने नहीं रखता मगर सवाल अब तक हमारी जबान पर थिरकते रहते हैं।आमतौर पर ज्यादातर सवाल बिलकुल साफ़ और स्पष्ट रहते  हैं लेकिन उनके जवाब विविधता के साथ आते हैं। परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों में भी केवल प्रश्न ही छपे होते हैं, हर ईमानदार परीक्षार्थी यदि व्यापम शैली के अपवाद को छोड़ दें तो भी अब तक उनके भिन्न-भिन्न उत्तर ही लिखता रहा है।


आइये ! इसे ज़रा यों समझने की कोशिश करते हैं, जैसे एक प्रश्न होता है - ‘कैसा समय है?’


मैं कहूंगा- अच्छा समय है। साधुरामजी कहेंगे- कहाँ अच्छा समय है..अच्छा समय तो आने वाला है। कोई कहता है- ‘दिन का समय है। वाट्सएप  पर कनाडा से बेटा बताता है –‘नहीं पापा रात है, मगर सूरज की रोशनी है अभी यहाँ। कहीं रात में उजाले का समय है, कहीं दिन में अन्धेरा घिर आया है। अजीब समय है ! लेकिन यह स्पष्ट है कि हर व्यक्ति का अपना विशिष्ठ उत्तर संभावित है।


सच तो यह है कि अक्सर प्रश्न ही महत्वपूर्ण होते हैं, उत्तर नहीं। विद्वानों का मत भी यही रहा है कि विकास के लिए सवाल होना बहुत जरूरी है। उत्तरों की विविधता के बीच से उन्नति की पगदंडी निकलती है। सवालों के उत्तर खोजता हुआ मनुष्य चाँद-सितारों तक पहुंच जाता है। ये सवाल ही हैं जो हमारे अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करते हैं।सही उत्तर वही जो प्रश्नकर्ता मन भाये ! ऐसे उत्तराकांक्षी सवाल करना भी एक कला है जो हर कोई नहीं कर सकता  इसके लिए गब्बर जैसा तन-मन, दमदार आवाज और स्टाइल भी होना चाहिए। सवाल पूछने की भी प्रभावी शैली होना चाहिए। जैसे भीड़ भरी सभा में अवाम से पूछा जाता है... बिजली आती है कि नहीं? तो लोग एक सुर में उत्तर देते हैं ‘नहीं.’ बिजली चाहिए कि नहीं?’ उत्तर आता है ’हाँ,चाहिए?’ ये होता है प्रश्न पूछने का प्रभावी तरीका। कोई ऐरा-गैरा क्या खा कर सवाल करेगा।


केबीसी की भारी लोकप्रियता के बावजूद मैं बिग बी के सवालों की शैली से से ज़रा कम सहमत रहा हूँ। यह भी क्या हुआ कि करोड़पति बनाने के लिए हॉट सीट पर बैठे प्रतियोगी से एक प्रश्न किया और उत्तरों के चार विकल्प दे दिए। यह तो कोई ठीक बात नहीं। एक प्रश्न हो, एक उत्तर हो। जैसे पूछा जाता है - ‘इस बार सरकार बदलना है कि नहीं.?’ उत्तर एक ही आता है- ‘हाँ, बदलना है।’ ये हुई न स्पष्टता। कोई विकल्प नहीं,कोई भ्रम की स्थिति नहीं उत्तर देने में।


यह सच है कि ‘शोले’ फिल्म के संवादों की लोकप्रियता का लंबा इतिहास रहा है।  मगर बदलाव के इस महत्वपूर्ण समय में अब पुराने रिकार्डों को ध्वस्त करने का वक्त आ गया है. इन दिनों जो डायलाग जन सभाओं सुनाई देने लगे हैं,उनसे तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि अब शोले के संवादों की दहक कम पड़ गई है। और अब हेटस्पीच के बकासुरों ने तो जनसभाओं के परंपरागत भाषणों को भी पीछे छोड़ दिया है। खुदा खैर करे!!


ब्रजेश कानूनगो

डर के आगे जीत है!

डर के आगे जीत है!

ऐसा व्यक्ति ढूंढ निकालना बड़ा मुश्किल है जो नितांत  निर्भय हो। जहां किसी परिंदे ने डर के डैने  कभी फड़फड़ाए ही नहीं हों। हर प्राणी किसी न किसी चीज से डरता है। कोई तो यह कहने तक से डरता है कि वह निडर है। कल से कह दिया और दुम दबाकर भागने की नौबत आ जाए तो फिर क्या होगा।


बहरहाल, डरना हमारा प्राकृतिक गुण है,सबके स्वभाव में थोड़ा बहुत शामिल है। डर है, तो डराने वाले भी हैं। हमेशा से दो तरह के हमारे हितैषी रहे हैं। एक वो जो डराने जैसा पुण्य का काम करते हैं, ताकि यह डर भाव जो सर्वदा प्रकृति प्रदत्त है कायम रह सके। दूसरे वे होते हैं जो डबल पुण्याई करते हुए सचेत करते हैं कि भाई डरो मत। दोनों तरह के लोग हमारे कल्याण के लिए ही सोचते हैं। ये तमाम व्यवसायी हमारी डर सम्पदा का दोहन करके लाभ कमाते हैं। इनके गिरगिटिया हितोपदेश में आत्महित अधिक समाया होता है।


जैसे ही वक्त बदलता है, ये अपनी भूमिकाएं बदल लेते हैं। डराने वाले डरो मत, डरो मत का उद्घोष करने लगते हैं और  निर्भयता की सब्सिडी  देने वाला, रंग बदल कर खुद डराने लग जाता है।


ये लोग यह जताने में सफल भी हो जाते हैं  कि इनमें लोकोपकार की भावना कूट-कूट कर भरी है। ये भलीप्रकार जानते हैं कि किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के अस्तित्व की तरह किसी भी व्यक्ति को ’भय मुक्त’ नहीं बनाया जा सकता। भय समस्त प्राणी मात्र का स्थायी भाव है, इसी भाव को ये भरपूर भाव देते हैं और लोकतंत्र की मंडी में ऊंचे भाव पर इसकी बोली लगा देते हैं। 

  ये लोग यह जताने में सफल भी हो जाते हैं  कि इनमें लोकोपकार की भावना कूट-कूट कर भरी है। ये भलीप्रकार जानते हैं कि किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के अस्तित्व की तरह किसी भी व्यक्ति को ’भय मुक्त’ नहीं बनाया जा सकता। भय समस्त प्राणी मात्र का स्थायी भाव है, इसी भाव को ये भरपूर भाव देते हैं और लोकतंत्र की मंडी में ऊंचे भाव पर इसकी बोली लगा देते हैं।   


दरअसल, जो डराते हैं, वे हमारे हितैषी हैं। डरने के बाद ही आदमी मजबूत होता है। उसके भीतर साहसी हो जाने की आकांक्षा बलवती होने लगती है। असीम शक्ति का संचार होता है,और अधिक बड़ी और भयावह स्थितियों से निपटने की क्षमता विकसित होने लगती है। अब देखिए, बरसों तक केरोसिन और राशन की कतार में लगने की आदत और अनुभव ने हमारी कितनी मदद की है कि नोट बंदी की राष्ट्रीय बेला में  निहायत अनपेक्षित बैंकों की दैत्याकार लाइन में लगने की भयावह स्थितियों का हम निडर होकर सामना कर पाए। चालीस पैंतालिस वर्षों तक छोटे-मोटे घोटालों के भय से डरते हुए पिछले वृहद घोटालों को हमने हंसते-हंसते सहन कर लिया। जाली नोटों के बार बार उजागर होते बड़े बाजार ने भी अब हमारा डर कितना कम कर दिया है कि ए टी एम से चूरन वाले नोट निकलने पर हम बस मुस्कुराकर रह जाते हैं।

प्राकृतिक आपदाओं से हम डरते हैं। महामारी हमें भयाक्रांत कर देती है। महंगाई से डरते हैं। ईडी से डरते हैं, आईटी से डरते हैं। फिर भी सब कुछ चंगा है जी!!  डर के आगे जीत है। यदि विजेता बनना चाहते हैं तो डर का सामना करना होगा। डर होगा तब ही आदमी डरेगा। यदि डर ही नहीं होगा तो वह किससे डरेगा। डर पर विजय के उसके संघर्ष का क्या होगा? संघर्षों से ही जीत का सच्चा आनन्द मिलता है। बिना डरे कुछ हासिल हो जाए तो मजा नहीं। इसलिये डर भी जरूरी है, डरना भी जरूरी है। डर से मुक्ति का संघर्ष भी जरूरी है।


डर का कोहरा छटने के बाद सूरज के दर्शन होते हैं। डर रात का अँधेरा है, सुबह उजियारा लाती है। सूरज की रौशनी में सब साफ़ दिखाई देने लगता है। क्या मोहक है और क्या डरावना है। अँधेरे में तो सुंदर भी खौफ़नाक हो जाता है। खुद आदमी अपने अक्स से डर जाता है। 


ब्रजेश कानूनगो

Thursday, April 7, 2022

भ्रातृप्रेम की महान परंपरा

भ्रातृप्रेम की महान परंपरा


जब भी हमारे पड़ोसी पर संकट आया है,हमने एक भाई की तरह उसकी मदद की है। उसका दुख हमारी आंखों में पानी ला देता है। चाहे वह पड़ोसी देश ही क्यों न रहा हो। श्रीलंका हो, नेपाल हो या बांग्लादेश रहा हो एक भाई की तरह हमने कठिन वक्त में उनकी मदद की है। पाकिस्तान माने न माने पर उसके दुखों पर भी हमारे मन में करुणा उमड़ ही जाती है। यही हमारी परंपरा रही है।

भारतीय भूत में भाई की बड़ी महत्ता रही है. भाई की खातिर भाई जान पर खेल जाया करते थे. राम को वनवास भेजने वाली सगी माँ को एक सोतेला भाई  आजीवन क्षमा नहीं कर पाता  और स्वयं राम की पादुकाएं सिंहासन पर रखकर वनवासी सा जीवन चौदह वर्षों तक व्यतीत करता है ,दूसरा अपनी नवब्याहता पत्नी को छोडकर भाई की सेवा में वन को चला जाता है. कहावत सी बन गई है कि इस युग में राम तो बहुत मिल जाएँगे लेकिन भरत और लक्ष्मण सा भाई  मिलना कठिन है.

फिल्मों में भी भाई—भाई को लेकर अनेक रोचक  कहानियां आती रहीं हैं.  अलग –अलग विचारधारा और चरित्र के भाई अंत में परम्परानुसार एक दूसरे के शुभचिंतक हो जाते हैं. लेकिन वास्तविक जीवन में भ्रातृप्रेम  के ऐसे सच्चे प्रसंग कभी-कभार ही देखने को मिल पाते हैं.

इसी भ्रातृप्रेम का निर्वाह करते हुए एक युवक परीक्षा देते हुए इंदौर में पकड़ लिया  गया था. यह हमारी  सामाजिक कमजोरी ही कहा जाएगा कि नियम कानून के तहत उनका केस बना दिया गया.  एक महान परम्परा जो साकार होने जा रही थी,एक इतिहास जो फिर अपने को दोहराने का प्रयास कर रहा था, ना-समझ निरीक्षकों की नादानी की वजह से संभव नहीं हो पाया.

बड़ा जालिम है यह ज़माना. जब-जब भाई ने भाई के लिए कुछ करना चाहा है ,तब तब फच्चर फसाया गया है. कुछ वर्ष पूर्व भी एक भाई के साथ ऐसा ही हुआ था, संयोग से वह पुलिसकर्मी था. उसने अपनी छुट्टी के लिए विभाग को आवेदन किया तो स्वीकृत नहीं हुई . तब अंतत: भाई ही भाई के काम आया. उसने अपने छोटे भाई  को वर्दी पहनाई और ड्यूटी पर तैनात कर दिया.   लेकिन वही हुआ , भाई का भाई से यह प्रेम जमाने की कुटिल निगाहों में आ गया. भाई पकड़ा गया और आदर्श का एक शिलालेख स्थापित होने के पहले ही खान नदी के पेंदे में पहुँच गया.

दोषी वही है जो पकड़ा जाए. ये भाई पकड़ लिया गया  इस लिए अपराधी हो गया. बड़ी विडम्बना है यह तो! वे अनेक लोग जो विभिन्न योजनाओं में दूसरों के हकों का लाभ ले रहे हैं, वे जो दूसरों के खेतों पर अपनी फसल काट रहे हैं, निर्दोष हैं. भाई भाई  के काम आ रहा है तो वह दोषी हो गया है.

भूल गए हैं हम अपनी परम्पराओं और अपनी महान संस्कृति को जब एक भाई दूसरे भाई की पादुकाएं सिंहासन पर रखकर राजकाज चलाया करते थे. और अब जब एक भाई दूसरे भाई की सहायता करना चाहता है उसे अपराधी घोषित कर दिया जाता है. परीक्षा में भाई के भले के लिए अपने ज्ञान का  मौन समर्पण करने पर उसे मुन्नाभाई जैसे  गुंडे की श्रेणी में ला खडा कर दिया जाता है.

हमारी संस्कृति रही है कि भाई भाई के काम आए. मुँह बोले भाईयों तक ने वक्त पड़ने पर एक दूसरे की मदद की है.  लेकिन  समय ने अब ऐसी करवट बदली है कि ऐसा आसानी से करने नहीं दिया जाता है. अब तो भाई तो क्या अपने स्वयं के खून को ही आगे बढाने का काम करते हैं तो 'परिवारवाद' को बढ़ावा देने का आरोप लगने लगता है। खासतौर पर लोकतंत्र में 'वंशवाद' को एक वायरस की तरह देखा जाने लगा है। जब राजनेता का बेटा तक मंत्रीपद की दौड़ में केवल इसी वजह पिछड़ जाता है तब किसी भाई या बहिन की महत्वाकांक्षा की पूर्ति तो बहुत दूर की बात होगी।

पूरे विश्व को अपना परिवार मानने वाले हमारे संस्कारों से प्रेरित होकर जब हम कदम उठाते हैं मन गर्व से भर जाता है। यह उचित समय है जब हम भ्रातृप्रेम की महान परम्परा को बचाने के लिए विमर्श की शुरुआत कर सकते है। ज़रा सोंचिए..!

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ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, April 5, 2022

व्यंग्य बाण : महंगाई पर कुछ दोहे

 व्यंग्य बाण : महंगाई पर कुछ दोहे

1
महंगाई सुरसा भई

याचक बन मत मांगते,
कैसे हो इंकार।
सत्ता पाते ही सभी,
बन जाते भरतार।

बड़ी चीज को लघु करें,
बोले बड़ी लकीर।
कुर्सी के मद में पड़ें,
खुद को कहें फकीर।

बात पुरानी हो गई,
जनता करे हिसाब।
सत्ता जिसकी आ जाए ,
देता नहीं जवाब।

दुनिया हुई उलट-पुलट,
जीवन है दुश्वार।
सुरसा महंगाई हुई,
प्रभु करो उद्धार।

000

2
महंगाई का वध करें

अपने घर की क्या कहें,
खस्ता सबका हाल।
कैसे शरबत खुद पिएं,
जब कोई बेहाल।

रोज बढ़ रही कीमतें,
जीना हुआ हराम।
रावण की लंका जली,
मदद करे श्रीराम।

महंगाई इक दैत्य है,
रोक रहा प्रवाह।
कुम्भकर्ण सी नींद में,
कैसे निकले राह।

यूँ हलाल सा लग रहा,
अनचाहा यह दर्द।
झटके में निपटाइए,
कहलाओगे मर्द।

महंगाई का वध करें,
यही वक्त की मांग।
सुख चैन की हवा बहे,
मिटे नफरती भांग।

000

ब्रजेश कानूनगो


Tuesday, March 22, 2022

परम्परागत घर की गुझिया

परम्परागत घर की गुझिया

त्यौहार आए तो समझ लीजिए घर मे गुझिया का बनना तय है। जैसे सर्दी पडती है तो स्वेटर बनना शुरू हो जाते हैं वैसे ही त्यौहार आता है तो गुझिया बनना निश्चित है। सर्दी है तो जर्सी है, बरसात है तो भजिया है ऐसे ही होली, दिवाली है तो गुझिया है। गुझिया बनी है तो समझ लो त्यौहार है या त्यौहार की तैयारी है। गुझिया बनी है तो आस पडोस को भी पता चलना चाहिए कि गुझिया बनी है, सो पडोसिने बाकायदा गुझिया के पैकेट पहुँचाकर सन्देश भिजवाने लगतीं हैं कि गुझिया बन चुकी है। पैकेट एक घर से दूसरे, फिर घरों घर पहुँचाए जाने लगते हैं। गुझिया चर्चा का मुख्य विषय बन जाती है। ‘शर्मा जी के यहाँ तो इस बार बहुत अच्छी गुझिया बनी है भाई।’ ‘वर्माजी के यहाँ कुछ ज्यादा ही तला गईं, कडक हो गई उनकी तरह।’  ‘माथुर साहब के यहाँ की गुझिया में तो बहुत मेवे डाले गए हैं , क्यों न डालें बेटा जो अमेरिका मे डॉक्टर है।’ ‘जैन साहब की ऊपरी कमाई इस बार उनके यहाँ की गुझिया मे भी ठूस ठूस कर भरी गई है।’  गुझिया की उत्कृष्टता परिवार के स्टेटस,स्तर का पैमाना बन जाता है। इसीलिए गृहस्वामिनियाँ दाल बघारने मे एक बार लापरवाही बरत सकतीं हैं लेकिन गुझिया पूरे मन और अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए बनातीं हैं। 


गुझिया का बनना,त्यौहार का आधा मन जाना होता है। त्यौहार आया तो मुझे वह सब सामग्री बाजार से लाकर देने का आदेश हुआ जिससे गुझिया बनती है। सामग्री लाकर देने के बाद गुझिया बनने का इंतजार करने लगा बल्कि यों कहिए कि गुझिया के बनाए जाने मे पूरी तरह सहयोग करने लगा। प्राय: देखा गया है कि गुझिया की कटिंग का भार पति पर ही पडता है, अगर पति गृह कार्य मे दक्ष हुआ तो ‘मुझे तो घी तेल से एलर्जी है या आप तो बहुत बढिया तल लेते हैं’ आदि शब्दों के वाक्यों मे प्रयोग से पत्नियाँ बडी चतुराई से पतियों को फुसला लेतीं हैं और उन्हे आसानी से गुझिया तलने के कार्य मे जोत देती हैं। सो मैने भी गुझिया काटी और गुलाबी होने तक तली, यह कार्य मेरे लिए कोई नया तो था नही।


गुझिया बहुत अच्छी बनी थी। श्रीमतीजी ने इस बात पर खुश होकर नई जुराबें खरीद कर देने का वायदा किया। यह अलग बात है कि जब जुराबें खरीदने बाजार गईं तो बार बार के चक्कर से बचने के लिए दो साडियाँ भी लेतीं आईं। खैर गुझिया बनी और पूरी कॉलोनी मे पहुँचाई गई। फिर शुरू हुआ गुझिया परोसने का सिलसिला। जो भी मिलने आता उसे गुझिया अवश्य खिलाई जाती। खानेवाला तारीफ करता तो श्रीमतीजी खिल जातीं। अपने घर की गुझिया खत्म हो गी तो पडोसी के यहाँ की आयातित गुझिया परोसी जाने लगी। मेहमान तो तारीफ करते ही,श्रीमतीजी भी यह कदापि नही बतातीं कि गुझिया पडोसी के यहाँ की हैं।


उल्टे गर्व से कहतीं ‘अब की बार तो बहुत रुचि से बनाई है हमने, तली भी बहुत बढिया है इन्होने।’ मै भी अपनी प्रशंसा सुनकर गुब्बारे की तरह फूल जाता।


जो फूलता है, वह फूटता है। दूसरों की मेहनत पर हम फूल रहे थे, इसलिए हमारी हवा निकल जाना निश्चित था। मल्होत्राजी गुझिया खाते जा रहे थे और तारीफ किए जारहे थे ‘बहुत खूब, क्या बढिया गुझिया बनाई है भाभी आपने, बिल्कुल पप्पू की मम्मी की तरह।’ अचानक वे उदास हो गए बोले ‘अबकी बार त्यौहार का मजा ही किरकिरा हो गया।’ ‘क्यों भला?’ मैने पूछा।


‘पप्पू की मम्मी की अँगूठी गुम हो गई, खाने पीने का मजा ही चला गया।’ मल्होत्राजी ने गुझिया का आखिरी हिस्सा मुँह मे रखते हुए कहा।               

तभी मल्होत्राजी ने दूसरी गुझिया तोडी तो उसकी भरावन स्टफिंग से एक अँगूठी बाहर निकल आई। अँगूठी निकली तो हमारी हवा भी निकल गई। मल्होत्राजी के यहाँ की गुझिया हम अपनी बताकर उन्ही को खिला रहे थे।


बहरहाल, जो होना था,  वह तो होचुका था,लेकिन भविष्य के लिए सबक भी मिल गया कि आयातित गुझिया न तो किसी को खिलानी चाहिए और न ही किसी के यहाँ भिजवानी चाहिए। गुझिया अपने घर की ही सबसे अच्छी होती है।

(मूल रचनाकाल : मार्च 1980)

ब्रजेश कानूनगो