Monday, September 27, 2021

कनिप के डोज

कनिप के डोज

पिछले रविवार को जब मैं अपने मित्र साधुरामजी के घर गया तो देखा कि उनके दाहिने पैर में प्लास्टर चढ़ा हुआ है। वे आरामकुर्सी पर बैठे थे तथा पट्टायुक्त पैर उन्होंने सामने रखे स्टूल पर टिका रखा था।

'यह क्या हो गया साधुरामजी?' मैंने अचंभित उनसे पूछा।

'यह सब आप के तथाकथित विकास का परिणाम है, विकास के नाम पर पूरा शहर खोद रखा है। सड़कों पर गड्ढे ही गड्ढे हैं। पुरानी सड़कों की रिपेयरिंग भी मात्र दिखाने के लिए ही होती है। कुछ दिनों में सड़कें फिर उखड़ जाती हैं।कोई कब तक कैसे और कहां तक बच सकता है।' उन्होंने कहा, 'अपनी मोपेड पर जा रहा था, पानी भरे गड्ढे में अगला पहिया गया और मोपेड पलट गई। पैर में फ्रैक्चर हो गया है।' उन्होंने आगे बताया।

'अरे यह तो बड़ा दुखद रहा!'  मैंने संवेदनाएं व्यक्त कीं। 

लेकिन साधुरामजी ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों की कहां चिंता पालते हैं, तुरंत अपने स्वभाव के अनुसार बात की गंभीरता को खत्म करते हुए बोले, 'उस वक्त मैं स्वयं ही शायद थोड़ा असावधान था।  खैर जो होता है अच्छा ही होता है। पिछले पन्द्रह दिनों के विश्राम के दौरान मुझे अद्भुत ज्ञान प्राप्त हो गया है।' 

'कैसा ज्ञान साधुरामजी?'  मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।

'आपने अक्सर देखा होगा,अनेक नीम हकीम और डॉक्टर अखबारों में विज्ञापन छपाते हैं कि पुराने और निराश रोगी ही मिलें। हम फलां बीमारी का शर्तिया इलाज करते हैं।' वे बोले।

'हां, वह तो है नीम हकीम खतरे जान।' मैंने कहा।

'लेकिन मेरे चिंतन ने मुझे अनेक परेशानियों और समस्याओं से मुक्ति का रामबाण नुस्खा उपलब्ध करा दिया है। यूं कहें कि यह एक नई चिकित्सा पद्धति है,जो मैंने खोज निकाली है।' साधुरामजी ने कहा।


'वाष्प चिकित्सा, चुंबक चिकित्सा, स्पर्श चिकित्सा, एक्यूपंचर, इलेक्ट्रो चिकित्सा, आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी की तरह ही यह चिकित्सा पद्धति भी मरीजों के लिए बेहद कारगर साबित होगी।' वे धाराप्रवाह बोल रहे थे। 

'यह कौन सी पद्धति है साधुरामजी, कहीं आप गधे के सींग तो नहीं खोज लाए हैं।'  मैंने चुटकी ली।

'भाई यह कोई गधे के सींग वाली बात नहीं है। यह बहुत असरकारी है लेकिन इसके विकास में सरकार का बड़ा योगदान है।'  उन्होंने आगे कहा, 'महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे सत्य मिला था, आर्कमिडीज बाथरूम से बगैर टावेल लपेटे बाहर भागे थे और मैं अपनी खोज के बाद ही दुर्घटना की वजह से तुम तक नहीं पहुंच सका। दरअसल इस खोज का बीज  उस वक्त पड़ा जब मैं अपने शहर की सड़कों पर गुजरता रहता था। कुछ सड़कों की स्थिति तो ऐसी थी कि गड्ढों के बीच उसे खोजना कठिन हो जाता था। जब दुर्घटना हुई, पैर पर प्लास्टर चढ़ा तो चिंतन का अवसर मिला। तब  इस चिकित्सा पद्धति का जन्म हो सका।' उन्होंने कहा।

'अब आप बता ही दें कि आखिर है क्या यह चिकित्सा पद्धति!'  मेरी अधीरता बढ़ती जा रही थी।

'तो सुनो!'  उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह अपना चेहरा नीचे से ऊपर उठाया और कहा, 'हमारे शहर की सड़कों पर मरीज को वाहन यात्राओं के नियमित डोज देना ही इस पद्धति का मूल मंत्र है।' 

'वह कैसे?'  मैंने पूछ लिया।

'मरीज पुरानी कब्ज से परेशान हो उसे शहर की विशिष्ट सड़क पर पांच दिन नियमित स्कूटर यात्रा के लिए परामर्श दिया जाए, छठे दिन वह स्वयं को हल्का महसूस करने लगेगा। किसी मरीज की प्रसूति में विलंब हो रहा हो और शल्य क्रिया संभव न हो तो ऑटो रिक्शा से किसी दूरस्थ चिकित्सालय ले जाएं, सामान्य प्रस्तुति सहज रूप से संपन्न कराई जा सकती है। कोई व्यक्ति बचपन से हकलाता हो, बोलने में शब्द गले में ही अटक जाते हों, उसे एक माह तक शहर की विशिष्ट सड़क पर तेज गति से मोटर चलाने का परामर्श दें, शब्द ही क्या चित्कार निकलने लगेगी। अगर डॉक्टर ने शल्य क्रिया के दौरान गलत हड्डियां जोड़ दी हो तो शहर की सड़कों पर तेज गति से मोटरसाइकिल चलाने का परामर्श दें, अपने आप हड्डी सही स्थान पर बैठ जाएगी। स्नायु विकार और पुराने सिर दर्द में लगातार पन्द्रह दिनों का स्कूटर चालन लाभ पहुंचाता है। शरीर की अकड़न, कान से कम सुनाई देना जैसी समस्याओं में भी शहर की सड़कों से वाहन यात्रा के निश्चित डोज लाभप्रद हो सकते हैं। डॉक्टरों की थोड़ी सी सूझबूझ और यात्रा की प्रामाणिक खुराक का परामर्श मरीजों को अनेक कष्टों से मुक्ति प्रदान करवा सकता है।' साधुरामजी किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस के मुख्य वक्ता की तरह बोले जा रहे थे, जहां मैं अकेला सैकड़ों डेलीगेट्स का प्रतिनिधित्व कर रहा था। 

'और हां शहर की ऐसी सड़कों का नामकरण भी कनिप-वन, कनिप -2, कनिप -10 आदि  किया जा सकता है।'

'यह कनिप 1,2,3 क्या है?'  मैंने पूछ लिया। 'कनिप यानी 'कष्ट निवारण पथ'। इन सड़कों की गुणवत्ता के आधार पर इनकी रोग निवारक क्षमता का आकलन करके इनका नामकरण किया जा सकता है, जैसे दवाइयों का होता है सिपलॉक्स 100 विक्स 500 एविल 5 आदि।' उन्होंने स्पष्ट किया। 

मैंने साधुरामजी से विदा ली। घर लौटते हुए सोच रहा था कि चिकित्सा विज्ञान में एक गैर चिकित्सकीय व्यक्ति के योगदान के लिए क्या साधुरामजी का नाम 'सर शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' के लिए प्रस्तावित करना उचित नहीं होगा?


ब्रजेश कानूनगो

Monday, September 6, 2021

सिर पैर की बात!

सिर पैर की बात!


पूरे शरीर में दर्द हो रहा हो। नाक भी बह रही हो। आंखों में जाले पड़े हों, धुंधला दिखाई दे रहा हो। त्वचा पर खुजली चल रही हो। रात को नींद नहीं आती। कुछ न कुछ बड़बड़ाने का मन करता हो। बुखार 100 डिग्री से ऊपर बना ही रहता हो। चलने पर कभी कभी चक्कर भी आने लगते हों। खाने पीने का मन नहीं करता। जीभ का स्वाद चला गया हो।अब बताइए....?

जी नहीं मैं बीमारी का नाम नहीं पूछ रहा। न  बीमार व्यक्ति की दुर्दशा का वर्णन कर रहा। न आपको डराना चाहता हूँ और न ही उस व्यक्ति के दुखों का जिक्र करके आपके आनन्द में खलल डालना चाहता हूँ।

दरअसल मैं इन सब परेशानियों के बीच यकायक उसे प्राप्त होने वाली छोटी सी उस खुशी की बात करना चाहता हूँ जिससे कठिन समय में उसे जरा सी राहत का अहसास हो जाता है। वह राहत की बात यह है कि जब कल उसने मूंग के पापड़ का एक टुकड़ा मुंह मे रखा तो उसकी जीभ में स्वाद की ग्रंथि पुनः जाग्रत हो गई।

आप सोंचते होंगे कि मैं बड़ी अजीबोगरीब बात कर रहा हूँ। बहक गया हूँ। बिल्कुल भी नहीं बहका हूँ जनाब। उस बीमार आदमी की याद मुझे यों ही नहीं आ गई है और न ही मैं बेसिर पैर की कोई बात कर रहा हूँ। इस बात का सिर ही नहीं दिमाग भी है और अपने पैरों पर चलकर मेरे पास आई है।

यह उस आनन्द की बात है, उस राहत की बात है जिसे पाकर हमारा मन बल्ले बल्ले करने लगता है। जीवन की सारी परेशानियों और दुखों को अकस्मात भूल जाने का मन करता है। जैसे ऊपर उल्लेखित वह बीमार व्यक्ति पापड़ का एक कतरा अपने मुंह में रखते ही सारी बीमारियों को महसूस करना भूलकर स्वाद के संसार में लौटने लगता है।

चलिए पहेलियां बुझाना छोड़कर सीधे बात करते हैं।

दरअसल आम आदमी ही कहानी का वह बीमार व्यक्ति है जिसे अनेक परेशानियों ने जकड़ा हुआ है। ऊपर से महंगाई डायन की कुटिल नजरें भी उसके जीवन को निशाना बनाए हुए है। पेट्रोल और गैस के दामों ने उसके जीवन के सुखों में आग सी लगा दी है।

इन संकटों के बीच एक दिन अखबार में खबर छपती है, 'पेट्रोल की कीमतों में पन्द्रह पैसों की जबरदस्त राहत'।

अब बताइए क्या असीम संकटों के बीच इस खुशखबर से किस परेशान व्यक्ति का दिल बल्ले बल्ले नहीं करने लगेगा। पन्द्रह पैसों की राहत पन्द्रह मिनट के लिए भी मन को सुकून देती हैं तो वह भी क्या कम महत्वपूर्ण बात नहीं है? जरा सोचिए!


ब्रजेश कानूनगो

डायन का लौट आना

डायन का लौट आना

वह फिर लौट आई है। अच्छा लौटता है। बुरा लौटता है।अच्छा बुरा सब लौटकर आ ही जाता है। मौसम और ऋतुएं लौटती हैं। गर्मी जाती है तो बारिश लौट आती है। बाढ़, सुनामी,भूकम्प सब लौट लौट आते हैं। पतझड़ जाता है तो बसंत लौट आता है। दुख के बाद सुख लौटता है। रुदन के बाद मुस्कुराहट लौटती है। तालिबान लौटता है, हिटलर लौट आते हैं। रूपांतरित होकर साम्राज्यवाद लौटता है, समाजवाद के खंडहरों में हरियाली की बिदाई के बाद पूंजीवाद की जैकेट पहनकर प्रजातंत्र लौट आता है।  आतंकवाद लौटता है। दूर का,पास का,अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद सब लौटते हैं। नाम बदलकर लौटते हैं तो कभी उसी तरह लौट आते हैं जैसे पहले आए थे। लौट लौट आना इस सृष्टि की रीत है।


अवतारी पुरुष लौट आते हैं। सोने की चिड़िया लौट आती है। स्वस्थ होने पर तन लौटता है, मन स्वस्थ होने पर सनातन लौट आता है। ऐसे में पहले की 'महंगाई डायन ' लौट आती है तो किसी को कोई दिक्कत कैसे हो सकती है!  महंगाई डायन पहले भी आई थी। आती रहती है। इसका आना प्रकृति सम्मत है। वैसे भी हमेशा बर्फ में दबे जीव की तरह जिंदा रहती है। थोड़ी गर्मी पड़ी कि बर्फ पिघलने लगती है और यह डायन पुनः धरातल पर दृष्टिगोचर हो जाती है। 

हम शोर मचाने लगते हैं कि 'महंगाई डायन' लौट आई है। दरअसल वह गई ही कहाँ थी? यहीं बर्फ के नीचे दबी अपने को संस्कारित कर रही थी। अबकी लौटी यह डायन पहले जैसी बुरी आत्मा नहीं है। संस्कारित होकर 'अच्छी डायन' बनकर आई है। इसलिए इसके आने से किसी को कोई परेशानी नहीं है। उल्टे इसकी प्रशंसा है कि इसने अपने को संस्कारित कर लिया है। इसके संस्कारित होने से लोगों की क्रय क्षमता में उछाल आए या न आए किन्तु जीडीपी में वृध्दि अवश्य होगी।

स्वागत है 'अच्छी डायन'। पहले तुम साठ, सत्तर रुपयों में एक लीटर पेट्रोल से आग लगा देती थी, अस्सी रुपयों के सरसों तेल में बने भोजन से भी परिवार भूख से बिलखने लगते थे। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। तुम्हारे पास संस्कार नहीं थे, तुम्हारा चरित्र ही भ्रष्ट था। अब ऐसा नहीं है। अब तुम अच्छी डायन हो गई हो प्रिय महंगाई।

अब सौ से ऊपर के पेट्रोल और डेढ़ सौ रुपयों के खाद्य तेल में भी हमारा जीवन खुशहाल है। हमें कोई आपत्ति नहीं है बुआजी। तुम आराम से रहो। हममें से अधिकांश को जीने की आवश्यक सामग्री हमारी संवेदनशील सरकारें निशुल्क उपलब्ध करा ही रही हैं। जो थोड़े उच्च वर्ग के लोग हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, वे वितरक हैं,उत्पादक हैं। मध्यमवर्गीय लोग झंडा उठाए हैं।  तो प्यारी महंगाई बुआजी तुम बिल्कुल हमारी चिंता मत करो और जब तक चाहो,यहाँ रहो। तुम अब चरित्रवान हो गई हो, भली और ममतामयी हो गई हो, यही क्या कम बड़ी बात है। तुम्हे अब डायन कोई नहीं कहेगा, आराम से रहो। 


ब्रजेश कानूनगो

Friday, July 16, 2021

महाराज श्रृंखला 11

 महाराज श्रृंखला 11

11

आत्मज्ञान का प्रस्फुटन


महाराज को लम्बे समय से आशंका तो थी कि अतंतः उन्हें संघ गणराज्य में अपनी रियासत का विलय करना ही होगा। स्वतंत्रता संग्राम में सेनानियों के संघर्ष और महात्मा गांधी के नेतृत्व में लंबे स्वाधीनता आंदोलन के पश्चात अंग्रेजों को देश की सत्ता भारतीय नेताओं के हवाले करने को मजबूर होना पड़ा।

आजादी मिलने के बाद संघ गणराज्य में ज्यादातर रियासतें तो उसी समय शामिल हो गईं थीं किन्तु जो थोड़ी सी रियासतें झिझक रहीं थीं वे भी संघ के गृहमंत्री की योजना और कूटनीति के दबाव में विलय के लिए सहमत होती गईं।

अपनी रियासत के विलय को लेकर महाराज आशंकित तो थे किंतु यह नहीं मालूम था कि यह इतनी जल्दी हो जाएगा। 'पाषाण पुष्प' की यात्रा सम्राट के रूप में उनकी अन्तिम राजकीय यात्रा साबित हो जाएगी। एक सप्ताह के भीतर ही समझौते की कार्यवाही सम्पन्न हो गई। हालांकि संघ सरकार की ओर से नियमित अच्छी खासी धनराशि पेंशन की तरह 'प्रिवीपर्स' के नाम से महाराज को प्राप्त होती रहने वाली थी। जिससे वे अपनी शानोशौकत थोड़ी बहुत बनाए रख सकते थे। रियासत अब गणराज्य के एक प्रांत का हिस्सा बन गई थी। समस्त नीति नियम कानून राजशाही की बजाए प्रजातांत्रिक व चुनी हुई सरकार द्वारा बनाए और अपनाए जाने जरूरी हो गए।

महाराज की शिक्षा दीक्षा विलायत में हुई थी तो वे प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं के बारे में जानते भी थे। पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने इसके बारे में काफी पढ़ रखा था। दरअसल विलायत छोड़कर वे हिंदुस्तान आना नहीं चाहते थे किंतु पिताश्री याने बड़े महाराज की मृत्यु और रियासत पर चचेरे भाइयों की कुदृष्टि पड़ने, साम्राज्य हथिया लेने के षडयंत्रों की वजह से मातृभूमि लौटना पड़ा था।

राजकाज से मुक्त होकर, महाराज राजमहल प्रासाद को छोड़ एक छोटी कोठी में शिफ्ट कर गए। कोठी भी किसी छोटे राजमहल से कम नहीं थीं किन्तु प्रासाद की तुलना में नौकर चाकर से लेकर अन्य प्रबन्धन कार्यों में कमी अवश्य आई थी। प्रिवीपर्स राशि में अब पहले की तरह खर्च नहीं उठाया जा सकता था। वे जानते थे कि सरकार इस सुविधा को व्यापक राष्ट्रहित में कभी भी छीन सकती है। कालांतर में यह हुआ भी। 

राजशाही का वर्षों से लगा स्वाद महाराज के तन मन में ही नहीं आत्मा में भी घर बना चुका था। लोकतंत्र में सम्राट का ताज  सिर पर सजाना कभी सम्भव नहीं। मन मानने को तैयार ही नहीं था कि अब वे महाराज नहीं हैं। यद्यपि संबोधन में आज भी महाराज ही पुकारे जाते थे। गरीब की रोटी को भी रोटी ही कहते हैं लेकिन उस पर बटर नहीं लगा होता। महाराज की दशा लगभग वैसी ही हो गई थी।

बहुत पुरानी कहावत है ,जहां चाह होती है वहाँ राह भी निकल आती है। प्रजातंत्र में भी उन्हें अपना उज्ज्वल भविष्य आखिर नजर आ ही गया। एक सुबह शौचयोग करते हुए तनिक जोर लगाया तो मस्तिष्क में टंकार हुई। आत्मज्ञान का प्रकाश प्रस्फुटित हो गया।

अगले दिन देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल की सदस्यता उन्होंने ग्रहण कर ली। उन दिनों पोलिटिकल पार्टी में एंट्री का आज की तरह सार्वजनिक इवेंट नहीं होता था। पार्टी अध्यक्ष या महासचिव की उपस्थिति के बगैर भी बड़े बड़े लोग ज्वाइन कर लेते थे। पार्टी दफ्तर में जाकर महाराज ने फॉर्म भरा और चवन्नी नकद जमा करा दी। 

कार्यालय के बुजुर्ग सचिव ने रजिस्टर में नए सदस्य का नाम नोट किया, भूषणसिंह वल्द रणवीरसिंह ठाकुर, ठिकाना....? क्या करेंगें जानकर बस इतना जान लीजिए पूर्व रियासत का एक महाराजा आज प्रमुख पोलिटिकल पार्टी का चवन्नी सदस्य बनकर देश सेवा के लिए उद्यत हो गया।


ब्रजेश कानूनगो  


महाराज श्रृंखला 10

महाराज श्रृंखला 10

10

अपशगुन की छाया

पाषाण पुष्प की जनसभा को संबोधित करने के बाद महाराज ने कुछ समय लोक कलाकारों के साथ बिताया और स्वर्ण उत्खनन  परियोजना के शिलान्यास स्थल पर हेतु जल्दी ही पहुंच गए। उनकी बेसब्री से वहाँ प्रतीक्षा हो रही थी। उत्खनन कम्पनी के एमडी प्रशांत कुमार ने महाराज की अगवानी की। संगमरमर पर शिलान्यास का एक आकर्षक पत्थर तैयार किया गया था, जिस पर महाराज के अलावा संतश्री और गोपाल सेठ की उपस्थिति का उल्लेख भी बड़े अक्षरों में किया गया था। 

शिलालेख को स्थापित करने के पूर्व राज पुरोहित ने महाराज से पूजा अर्चना करवाई और एक कुदाल से भूमि पर थोड़ी सी औपचारिक रूप से  प्रतीकात्मक खनन कार्य करवाया। फोटोग्राफरों के कैमरों की चमक के साथ वहां उपस्थित लोगों ने तालियां बजाकर ऊंचे स्वर में महाराज का परम्परागत जयघोष किया।

तभी एक राजसेवक ने उपस्थित होकर महाराज के निजी सचिव काकदंत के कानों में कुछ आवश्यक संदेश दिया। निजी सचिव तुरन्त महाराज के समीप पहुंचे और उनको राजधानी से आए आवश्यक संदेश की जानकारी दी।

यद्यपि संध्या काल में संतश्री के आश्रम में प्रार्थना सभा और रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम में महाराज को भी शामिल होना था, किन्तु संदेश पाते ही महाराज ने पाषाण पुष्प का दौरा उसी वक्त समाप्त कर दिया।

थोड़ी ही देर में उनकी विलायती बड़ी कार राजमहल की दिशा में आगे बढ़ रही थी। महाराज के मुख मण्डल पर परेशानी पढी जा सकती थी। 

ड्राइवर लाखनसिंह शांत चित्त गाड़ी चला रहा था।  महाराज और काकदंत की धीमी आवाज में बातचीत के शब्द कानों तक पहुंच कर स्पष्ट कर रहे थे कि रियासत के अस्तित्व पर बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है।

मन विचलित हुआ तो एकाग्रता भंग हो गई। नजर हटी कि दुर्घटना घटी। अकस्मात ब्रेक लगने की जोरदार आवाज के साथ गाड़ी रुक गई।

'क्या हुआ लाखनसिंह?' काकदन्त और महाराज की आवाजें एक साथ गूंजी। 

सुरक्षाकर्मी तुरन्त गाड़ी से उतर कार के टायरों की ओर देखने लगा। लाखनसिंह भी उतर कर देखने लगा। 

अगले पहियों के नीचे एक व्यक्ति कुचल गया था।

देखने में वह कोई बुजुर्ग वनवासी लग रहा था। 

इस बीच काकदंत भी नीचे उतर आए थे। कार में केवल महाराज रह गए।

नीचे उतरे तीनों व्यक्तियों ने रियासत पर आई विपदा व महाराज की मनःस्थिति को ध्यान में रख कर कुछ मन्त्रणा की।

गाड़ी पुनः आगे बढ़ी तो महाराज ने पूछा, ' क्या हो गया था काकदंत? गाड़ी क्यों रोकना पड़ी?' 

'कुछ नहीं महाराज! एक श्वान गाड़ी के नीचे आकर मर गया!' 

'ओह! ईश्वर उसे सदगति दे।' महाराज ने आंखें बंद कर लीं। 

आधा पौन घण्टा यात्रा के बाद महाराज राजमहल पहुंच चुके थे। महामंत्री के सचिव ने बताया कि संघ गणराज्य का एक प्रतिनिधि मंडल अतिथिगृह में विश्राम कर रहा है और संध्या समय महाराज से भेंट करना चाहता है।

जिस अनिष्ट की महाराज को आशंका थी,वह घड़ी बिल्कुल करीब थी।

शीतल जल से स्नान के बाद तनाव तनिक कम होने की संभावना बनती है...महाराज प्रसाधन गृह की ओर बढ़ गए...


ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, July 14, 2021

महाराज श्रृंखला 9

 महाराज श्रृंखला 9

9

जय जोहार ! 


महाराज की जय...महाराज की जय...! की गगनभेदी आवाज के बीच मंच के सूत्रधार उपाध्याय जी ने महाराज को आशीर्वचन हेतु आमन्त्रित किया। 

महाराज किसी चक्रवर्ती सम्राट सा गौरवभाव अपनी देह भाषा से दर्शाते हुए डायस तक आए। एक नजर सामने बैठे श्रोताओं पर डाली। एक छोर से दूसरे छोर तक के दृश्य का अवलोकन किया, फिर आगे प्रथम पंक्ति से अंतिम तक दृष्टि घुमाई। इतनी अधिक भीड़ देख महाराज का हृदय गदगद हो आया। 

कुछ देर स्तब्ध से हो गए। कुछ क्षणों तक मुंह से शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे। शायद उनका गला रुंध गया था,आंखें कुछ भीगी भीगी सी लग रहीं थीं। सामने रखे पात्र से थोड़ा जल पिया। डायस की आड़ से निकलकर आधे झुककर एक बार फिर सामने बैठी पाषाण पुष्प की प्रजा को प्रणाम किया। फोटोग्राफरों के कैमरों की फ़्लैश गन पुनः चमक उठीं।

यहां अब एक गोपनीय रहस्य भी जाहिर कर दिया जाना उचित होगा। दरअसल,महाराज के उद्बोधन के प्रारूप के सृजन में जितना महत्वपूर्ण योगदान राजकवि ज्ञानरिपु का होता था उतना ही उसकी प्रभावी प्रस्तुति में रियासत के मुख्य नाट्यसम्राट पंडित नटराज के सुझावों का भी होता था। वक्तव्य की सार्वजनिक प्रस्तुति के पूर्व महाराज सामान्यतः पण्डित नटराज से उचित परामर्श प्राप्त कर लिया करते थे। कल रात भी उन्होंने कुछ सूत्र समझ लिए थे। सम्भवतः उसी भेंट का परिणाम था कि आज की सभा में महाराज बहुत कुशलता से अपनी भाव भंगिमाओं से श्रोताओं पर बहुत गहरा और हृदयस्पर्शी प्रभाव छोड़ते जा रहे थे।

महाराज पुनः डायस पर आए। एक नजर मंच पर विराजे संतश्री और गोपाल सेठ पर डाली। श्रोताओं की ओर मुखातिब हुए, सबसे पहले उनके मुंह से कुछ शब्द वनवासियों के लिए उन्ही की भाषा में निकले....

'आप मन ला जय जोहार!'

उनके इतना कहते ही एक बार फिर महाराज की जयकार और तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल गूंज उठा। करीब पांच सात मिनट तक महाराज की जय...के जोरदार नारे लगते रहे। महाराज पुनः गदगदायमान हो गए।

उन्होंने हाथ उठाकर संकेत किया तो शांति छा गई। शायद वे थोड़ा पहले हाथ उठा देते तो शांति पहले उपस्थित हो जाती।

'सभी प्रजाजनों को मेरा नमस्कार!' अब उन्होंने मातृभाषा में बोलना प्रारम्भ किया। 

'पाषाण पुष्प' की प्रजा और माँ राजगंगा के बीच आकर मैं बहुत गौरव का अनुभव कर रहा हूँ। संतश्री रगडू महाराज का आशीर्वाद पाकर जो दैवीय अनुभूति हुई है वह मैं कभी विस्मृत नहीं कर पाऊंगा। 

'संत,समन्वय,सुख और स्वर्ण' का एक ऐसा सुंदर संयोग रियासत के इतिहास में पहली बार बन रहा है। हम धन्य हैं कि गोपाल सेठ के परिवार ने पाषाण के नीचे स्वर्ण उत्खनन करके राज्य में 'सुख,संपत्ति और समृद्धि' के पुष्प खिलाने का दुष्कर कार्य का बीड़ा उठाया है। समन्वय का दायित्व निश्चित ही रियासत के राजकीय विभाग के पास रहेगा लेकिन सबसे बड़ी प्रसन्नता की बात तो यह है कि संतश्री ने परियोजना को अपना आशीर्वाद प्रदान कर हमें कृतज्ञ कर दिया है। हम विश्वास दिलाते हैं वनवासियों के जीवन और उनके हितों पर हम कोई आंच नहीं आने देंगे।' 

महाराज जो कुछ बोल रहे थे उससे राजकवि की श्रेष्ठतम प्रतिभा के दर्शन हो रहे थे। भाषा में बहुत विनम्रता, माधुर्य के साथ रस, छंद और अलंकारों का सुंदर समन्वय हुआ था। विशेषतः अनुप्रास अलंकार का प्रयोग करना राजकवि ज्ञानरिपुजी की प्रिय शैली थी। एक ही अक्षर से शुरू होने वाले शब्दों के शब्द समुच्चय अक्सर बनाया करते थे। महाराज को भी यह प्रयोग बहुत रास आता था। बल्कि कई बार तो वे स्वयं भी कई नए संक्षिप्ताक्षर गढ़कर सबको चौंका दिया करते थे। महाराज आगे कह रहे थे,

'भाइयों और बहनों! आपको यह जानकर हर्ष होगा कि उत्खनन भूमि पर जो पेड़ लगे हैं उनमें से हमारे लिए आगे उपयोगी पेड़ों को प्रतिस्थापित करने का काम प्राथमिकता से किया जाएगा। जो प्रतिस्थापित नहीं किये जा सकेंगे,उतने ही नए पौधे रोपने का एक महाअभियान भी हाथ में लेने का हम आज संकल्प लेते हैं। एक नया वनक्षेत्र समीप की बंजर भूमि में आप सबके सहयोग से  विकसित होकर पेड़ कटाई की प्रतिपूर्ति कर सकेगा। संतश्री ने भी विश्वास दिलाया है कि आप सब वनवासी इस कार्य में हमारे साथ हैं। एक दूसरी खुशी की बात यह भी है कि उत्खनन परियोजना में वनवासी परिवारों के युवाओं को भी उचित जीविका उपलब्ध होगी। महिलाओं को खनन कार्य मे लगी कम्पनी के अधिकारियों कर्मचारियों के घरों और दफ्तरों में रोजगार उपलब्ध होगा।

आज खनन स्थल पर भूमि पूजन कार्य भी होने वाला है। मैं आप सब से आग्रह करूंगा कि इस अवसर पर आप सभी ग्राम भोज में भोजन करके ही घर लौटें। 

एक बहुत महत्वपूर्ण घोषणा भी मैं यहां आप सबके सामने करना चाहता हूँ...' इतना कहकर उन्होंने संतश्री रगडू महाराज की ओर मुस्कुराकर कनखियों से देखा। आगे बोले,

'संतश्री के आश्रम के निकट जो राजगंगा माँ का तट है वहां पूज्य संत स्वर्गीय जुगनू महाराज की एक विशाल धातु प्रतिमा को स्थापित करने का हम संकल्प लेते हैं। यह पुण्य कार्य राजकोष से 'प्रतिमा स्थापना समिति' को आबंटित किया जा सकेगा। निर्माण समिति में रियासत के मुख्य वास्तुशिल्पी, खनन कम्पनी के प्रबंध निदेशक प्रशांत कुमार और संतश्री रगडू महाराज सदस्य रहेंगे। अध्यक्षता की जिम्मेदारी सम्भालने के लिए हम हमारे परम् मित्र और समाजसेवी गोपाल सेठ से विनम्र अनुरोध करते हैं। विश्वास है वे पाषाण पुष्प की प्रजा के इस निवेदन को स्वीकार कर हमें अनुग्रहीत करेंगें।' अबकी बार महाराज ने मुस्कुराते हुए कनखी से मंच पर विराजे गोपाल सेठ की ओर देखा। गोपाल सेठ ने खड़े होकर उन्हें और श्रोताओं को प्रणाम किया।

कुछ देर बाद महाराज ने भाषण समाप्त करते हुए अंत में श्रोताओं से कहा कि अब हम मंगलदायिनी माँ राजगंगा के प्रति पाषाण पुष्प की ओर से कृतज्ञता व्यक्त करेंगें। मेरे साथ ऊंची आवाज में  बोलिए , 'माँ राजगंगा की...जय !'सभी उपस्थित श्रोताओं व अतिथियों ने सम्पूर्ण शक्ति से उद्घोष किया, 'जय!' महाराज ने यही जयकारा कुल तीन बार लगवाया।

यहाँ से महाराज को परियोजना खनन स्थल पर शिलान्यास करने के लिए प्रस्थान करना था। मंच से उतरकर समीप स्थित वनवासी कलाकारों के शिविर की ओर आए और अनौपचारिक वार्तालाप करने लगे। एक छोटे बच्चे को गोद में उठाकर प्यार भी किया। कलाकारों के साथ लोकनृत्य में सहभागिता करने का आज उनका मन नहीं था। बांसुरी जैसा कोई लोकवाद्य अवश्य हाथ में लिया किन्तु मुंह से लगाया नहीं। यद्यपि तालुका प्रमुख ने व्यवस्था तो सब कर रखी थी  पर सम्राट की इच्छा के आगे कौन क्या कर सकता है।हालांकि इस बीच फोटोग्राफर अपने कार्य में मुस्तैदी से व्यस्त हो गए थे।

ब्रजेश कानूनगो 





  

Monday, July 12, 2021

महाराज श्रृंखला 8

 महाराज श्रृंखला 8

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श्वेत सींगों वाला काला टोप


जयकारों की गगनभेदी गूंज के बीच महाराज मंच पर पहुंचे और दोनों हाथ जोड़ लगभग आधे झुक कर प्रजाजनों को नमन किया। यह उनकी अपनी विशेष शैली बन गई थी। लोग जानते थे कि अब दोनों हाथ उठाकर वे श्रोताओं,दर्शकों की ओर अपनी हथेलियाँ फैला कर स्नेह किरणों का प्रस्फुटन करेंगें। उन्होंने यही किया। इस बीच जयकारे और तालियों की ध्वनि लगातार बनी रही। 

पाषाण पुष्प की प्राथमिक पाठशाला के राज सम्मान से विभूषित अध्यापक हरि उपाध्याय बहुत अच्छी भाषा बोलते थे। हर राजकीय सार्वजनिक गोष्ठी,सभा,सम्मेलन आदि में सूत्रधार की भूमिका उन्ही के पास रहती थी। कुशल संचालन की वजह से गत वर्ष ही आदर्श शिक्षक  का राज सम्मान उन्हें प्राप्त हुआ था। आज भी मंच पर संचालन वे ही कर रहे थे। लगातार महाराज के सम्मान में जयकारे लगवा रहे थे।

महाराज की 'प्रजा नमन प्रक्रिया' के बाद तालुका प्रमुख ने जो अभी तक मंच पर ही थे, इशारा किया।  मंच के पीछे से दो वनवासी कन्याएं पारंपरिक वेशभूषा में सजीधजी बड़ी फूलमाला और सम्मान सामग्री लेकर आईं। तालुका प्रमुख ने गोपाल सेठ से अनुरोध किया कि महाराज को स्वागत माला वे पहनाएं। गोपाल सेठ ने कृष्णपाल को निकट बुलाकर कान में कुछ कहा तो उन्होंने मंच के सामने लगी एक कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की ओर इशारा किया। वे प्रशांत कुमार थे, सेठ के दामाद और उत्खनन कम्पनी 'राधिका एंटरप्राइज' के प्रबंध निदेशक। तेजी से मंच पर आए। महाराज को माला उन्ही के हाथों पहनाई गई। अब वे मंच पर सबके साथ खड़े हो गए थे। इस बीच मंच संचालक हरि उपाध्याय उनका परिचय व प्रशंसा शब्द प्रसारित कर चुके थे।

पहले वाली दोनों कन्याओं के मंच के पीछे चले जाने के बाद दो अन्य बालिकाएँ मोगरे की वेणियों से मंच को महकाती हुई प्रकट हुईं। उनके हाथों में परातें थीं। एक में अंगवस्त्र और दूसरी में आदिवासी समाज में प्रचलित परंपरागत मुकुट रखा था। मुकुट क्या एक बड़ा काले रंग का धातु का टोप सा था जिसके दोनों ओर गजदंत की तरह ऊपर दो सफेद सींग निकले दिखाई देते थे।

यहां यह बताना भी आवश्यक है कि महाराज यहाँ राज्य के सम्राट की हैसियत से उपस्थित थे। उनका गणवेश भी इसका अहसास करा रहा था। वेशभूषा आज रेशमी कपड़े से बनी हुई थी। लाल धोती और पीले अंगरखे में उनका व्यक्तित्व बहुत चमक रहा था। सिर पर उन्होंने लाल,पीला और बैगनी रंग में रंगा बन्धेज का रेशमी साफा धारण किया था। जिस पर राजकीय चिन्ह का स्वर्ण बैज और एक छोटा मोर पंख उसे अन्य तुच्छ साफों से अलग कर विशिष्ठता दे रहा था।

सम्राट के कंधों पर इस बार अंग वस्त्र गोपाल सेठ ने पहनाकर महाराज का अभिनन्दन किया। इस खास काले रंग के अंगवस्त्र के बारे में महाराज ने पहले से जानकारी प्राप्त कर ली थी ताकि वे आज पहनने के लिए उचित वेशभूषा का चयन कर सकें। यह बहुत सही निर्णय भी रहा महाराज का। पीले अंगरखे और लाल धोती के साथ श्याम रंगी रेशमी अंगवस्त्र का खूबसूरत मेल हो रहा था।सम्राट के  दिव्य, अलौकिक और भव्यता के दर्शन तो उस वक्त हुए जब संतश्री रगडू महाराज ने वनवासियों की ओर से पारंपरिक हाथीदांत वाला काला टोप उनके सिर पर सजाया। यद्यपि इस प्रक्रिया में पूर्व से धारण राजसी साफा उतरने से महाराज का बढ़ता हुआ गंज क्षेत्र तनिक सार्वजनिक हो गया। किन्तु जो व्यक्तित्व का अद्भुत सौंदर्य अब नजर आ रहा था उसके आगे वह बहुत मामूली बात थी। 

राज्य सूचना तंत्र के राजकीय और पत्रकार फोटोग्राफरों ने इस भव्यता को अपने कैमरों में सहेज लेने में तनिक भी विलंब नहीं किया।

महाराज के स्वागत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और जोखिमपूर्ण रस्म निर्विघ्न सम्पन्न हो गई थी। यही रस्म महाराज को सर्वाधिक रुचिकर भी लगती थी। आगे तो बस औपचारिकताएं शेष रहीं थीं।

अतिथियों ने अपने आसान ग्रहण कर लिए। प्रशांत कुमार व अन्य अधिकारी मंच से उतरकर तनाव से थोड़ा मुक्त हो सामने नियत स्थान पर जा बैठे।

अब आगे की चीजें निजी सचिव काकदंत और महाराज का भाषण लिखने वाले राजकवि ज्ञानरिपु की सेवाओं पर प्रभाव डालने वाली और चिंता की बात हो सकती थीं। 

सूत्रधार मंच के सूत्र संभालने को फिर से उद्यत हुआ और पाषाण पुष्प का वायुमण्डल सम्राट की जयकारों की ध्वनि तरंगों से पुनः कम्पित होने लगा। 


ब्रजेश कानूनगो