Tuesday, January 24, 2023

चर्म मिसाइल का चूकना

चर्म मिसाइल का चूकना

संत बोलते हैं तो लगता है जैसे शब्द नहीं शीतल जल की बूंदें बरस रहीं हो। उद्वेलित मन शांत हो जाता है। आम व्यक्ति मन में उठती कठिनाइयों, वेदनाओं,पीड़ाओं की अग्नि को शांत करने के लिए महात्माओं की शरण में जाता है। उनके चरणों में पुष्प अर्पित करता है।

कई नेताओं के मन में भी भक्तों की चाह होती है।महान कहलाने की ख्वाहिश  में नेताजी संत तो नहीं बन पाते किंतु अभिनेता बन जाते हैं। उनके मुंह से फूल नहीं झरते बल्कि आग के गोले बरसने लगते हैं।

प्रत्येक क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है। आग के गोले की प्रतिक्रिया में कभी कभी श्रोताओं की ओर से जूता चला आता है।

कभी कभी वह लक्ष्य से चूक भी जाता है। टमाटर हो,अंडा हो या जूता हो,अक्सर लक्ष्य से चूकते भी रहे हैं। चूक किससे नहीं होती। भगवान भी चूक जाता है। किसी जीव को जिस पूर्व निर्धारित योनि में जन्म देना होता है ज़रा सी चूक से उसे किसी और योनि का नागरिक बना देता है। शेर के शरीर में गीदड़ की आत्मा और आदमी के सिर में लोमड़ी का दिमाग खुराफात करने से चूकता नहीं। लोग समझते हैं, आदमी चूक गया है,शेर गीदड़ हो गया है। प्रत्यक्ष तो यही दिखता है।

उस दिन नेताजी मंच से दहाड़ रहे थे कि कहीं से एक चर्म मिसाइल सन्नाती हुई उनके बगल से बिना उन्हे क्षति पहुंचाए गुजर गई। निशाना साधकर फैंका गया जूता नेताजी को बगैर क्षति पहुंचाए चुपचाप गुजर जाए तो बताइये इसमें चूक किसकी है? सोचने वाली बात है। जूते में खोट है या कि निशानेबाज से चूक हुई है।

यदि जूते में तनिक भी ईमानदारी हो तो कोई कैसे उसके प्रहार से बच सकता है। कहीं तो लोचा हुआ होगा। निशानेबाज की निपुणता पर भी संदेह होता है। जब गुरुकुल में निशानेबाजी सिखाई जा रही होगी तब उसका ध्यान जरूर कहीं ओर होगा. चिड़ियाँ की आँख की बजाय वह सुन्दर हिरणियों को निहारने में लगा होगा। 

यह भी हो सकता है कि वह जूता किन्ही प्रतिद्वंदी ताकतों के हाथों बिक चुका हो। बाजार युग में सब कुछ खरीदा-बेचा जा सकता है। शरीर और आत्मा की बोली लग जाती है, फिर बेचारी चरण पादुका कौन मंत्रीजी की डिग्री है।

जूता प्रहार की प्रक्रिया को भी प्रायोजित किया जा सकता है। किसी अन्य बहुराष्ट्रीय ब्रांड की चालाकी या कूटनीति भी हो सकती है। जमे जमाये कारोबार पर आरोप लग सकता है कि अमुक कंपनी के जूते  की मारक क्षमता क्वालिटी कंट्रोल की कसौटी पर फेल है। इसलिए विश्वसनीय प्रकृति प्रदत्त और पूर्णतः वेज जूता अपनाएं, पूरी तरह स्वदेशी और गुणकारी। सिर पर लगे तो दिमाग की गर्मी भी निकाले और गंज पर अंकुरण भी सम्भव हो सके।

यह बहुत मानी हुई बात है कि जिस काम के लिए जिम्मेदारी सौंपी गयी हो उसे पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। यही आदर्श मूल्य हैं हमारे। यदि तंत्र को सौ रूपये आख़िरी आदमी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गयी हो और लक्ष्य तक सिर्फ पंद्रह पहुँच रहे तो संदेह होता है। इसका सीधा मतलब है कि तंत्र कही रास्ता भटक गया है। योजनाओं की आत्मा इसी तरह भटक जाती है। भटकाव की इसी अवधारणा को आगे चलकर भ्रष्टाचार जैसी अवधारणा से विद्वजन व्याख्यायित करते रहते हैं।

बहरहाल, कर्म को पूरे मन से सम्पन्न किया जाए और नेक इरादे से सम्पन्न किया जाए तो सफलता अवश्यम्भावी है। यदि मिसाइल को सचमुच सम्पूर्ण इच्छा शक्ति के साथ दुश्मन की ओर दागा जाए तो लक्ष्य भेद अवश्य होगा। मिसाइल हो या जूता, ये सब भौतिक और ठोस वस्तुएं हैं, इनमें पर्याप्त गतिबल होता है, ये जुमलों या उद्घोषों की तरह अदृश्य और हवा हवाई तरंगें नहीं होतीं। इनके टकराने के बाद टारगेट तरंगित होता ही है।

नेताजी की दिशा में सन्नाया गया जूता यदि बगैर लक्ष्य भेदन के गुजर जाए तो इसमें कुछ न कुछ षडयंत्र जरूर शामिल होगा। जरा सोचिए साहब!

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, December 15, 2022

सेवा का मेवा

सेवा का मेवा


गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, फल की चिंता किए बगैर कर्म किए जाओ। समय आने पर फल अवश्य मिलेगा। धैर्य रखिए। पर धैर्य रखना ही तो मुश्किल है। कब तक कोई धीरज धरे। मन रे तू काहे न धीर धरे। कर्म करे तो कब तक करे बेचारा प्राणी। प्राण निकल जाएं तब फल मिले तो क्या करे उसका वह। मरणोपरांत मिले सम्मान की तरह संततियां अपनी बैठक की दीवार पर मढवाकर इतरा सकती हैं बस।

बहुत से लोग अब कर्म करने को सेवा करना कहते हैं। सेवा शब्द में स्निग्धता है। कर्म थोड़ा खुरादरा सा लगता है। पसीने की गंध आती है इसमें से। सेवा में पावनता है, इसमें केवड़े सी पवित्र महक महसूस होती है। भवन बनाने वाले कर्म करके पसीना बहाते हैं। सदन में सेवा की शपथ लेते नेताओं के शब्द मंत्र की तरह बिखरकर सदन को पवित्रता की सुगंध से भर देते हैं। सेवा की सुवास से प्रजातंत्र का मंदिर महकने लगता है।

तमाम खट कर्म करके चुनाव में विजयश्री मिलने के बाद हर चुने हुए जनप्रतिनिधि की दिली तमन्ना होती है कि वह लोगों की सेवा कर सके। लेकिन क्या सेवा के लिए अपने आपको समर्पित कर देना अब इतना सहज रह गया है? सेवाभावियों की बड़ी भीड़ उमड़ती है अब। हर कोई सेवा करना चाहता है। जो सेवा करता है मेवा उसे ही मिलता है।


क्या क्या सपने देखे होंगे विजयी नेता जी ने। जल सेवा करेंगे,अपने क्षेत्र में नल लगवाएंगे। किसानों के खेतों तक नहरें बनवाएंगे। अस्पताल और स्कूल खुलवाएंगे गली गली। जर जर स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था का कायाकल्प करने का प्रयास करेंगे। पर ये हो न सका। विजयश्री का मुकुट धारण करने के बावजूद सेवा कार्य के अवसर नहीं दिखाई दे रहे। कर्म करने से फल मिलता है और सेवा करने से मेवा।

जी,हां,चौंकिए नहीं! फल को सुखा लिया जाए तो वह मेवा बन जाता है। ताजे से ज्यादा सूखे में ज्यादा सुख है। फल से ज्यादा मेवा मूल्यवान होता है। नेताजी यह बात अच्छे से समझते हैं। मेवा चाहते हैं इसलिए सेवा करना चाहते हैं। पर दिक्कत यह है कि जिस दल के टिकट पर चुनाव जीतकर आए हैं,उसकी सरकार नहीं बन सकती। सत्ता के बगैर कैसे करें सेवा? सेवा का संकल्प कैसे पूरा हो। मेवा पाने की ख्वाहिश अधूरी रह जाने की आशंका सामने खड़ी हो गई है। उनको लगता है कि सेवा का मेवा उनसे दूर खिसक गया है। वे कहते हैं सत्ता में रहे बगैर सेवा करना संभव नहीं। सत्ता में नहीं तो मेवा नहीं। चुनावी संग्राम में उनके कर्मों का विजय फल तो मिल गया है, परंतु उसे मेवा में रूपांतरित किया जाना संभव नहीं है। सत्ता की उम्मीद लिए थोड़े दिन पहले जिस दल में शामिल हुए वह भारी अल्प मत में आ गया है।
वे इसी जीवन में सेवा का मेवा सेवन करना चाहते हैं। देर रात उन्होंने बहुत विचार मंथन किया और सुबह उठकर बहुमत वाले दल में छलांग लगा दी।

ब्रजेश कानूनगो
 

Thursday, November 17, 2022

कुत्तों का खलल

कुत्तों का खलल


अक्सर वीकेंड पर साधुरामजी और मैं लांग ड्राइव के लिए निकल जाते हैं। इससे मेरी पुरानी कार भी हमारे साथ थोड़ी सी ताजगी प्राप्त कर लेती है। साधुरामजी के साथ देश दुनिया की खट्टी मीठी खबरों की चर्चा करके हम भी नई ताजगी से भर जाते हैं। बड़ा आनंद आता है।

'इन दिनों हमारे यहां कुत्तों ने बड़ा आतंक मचाया हुआ है बंधु!' साधुरामजी ने कार में बैठते ही चर्चा के विषय को आगे बढ़ाया।
'हां,बिलकुल! अभी हाल ही में एक बच्चे को लिफ्ट में  पालतू कुत्ते ने काट लिया। थोड़े दिन पहले एक सुरक्षा गार्ड को घायल कर दिया। हर कहीं लोग कुत्तों के इस खतरनाक व्यवहार से चिंतित हैं। हमारे जीवन में इनका अवांछित अतिक्रमण सबको परेशान कर रहा है।' मैने कार स्टार्ट करते हुए कहा।
'कुछ न कुछ इनका करना ही पड़ेगा!' साधुरामजी बोले।

तभी एक पिल्ले ने मेरी कार के सामने आकर खुदकुशी करने का विचार बनाया। मैं कह नहीं सकता किस वजह से उसने मेरी ही कार को आत्महत्या का माध्यम बनाया होगा।

'कुत्ता कहीं का, इसे मेरी ही कार मिली मरने के लिए!'  घबराहट में मेरे मुंह से उसके लिए कुत्ते की ही गाली निकली। मुझे गुस्से के साथ साथ एतराज भी था कि वह इंसानों के लिए बनाई गई सड़क पर आया ही क्यों!'

'तुम्हारा मतलब है कि जब कुत्ते के पिल्ले कोई सड़क पार करें तब उन्हे इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि वह उनके बाप दादा की जागीर नही है कि यहाँ वहाँ ताकते हुए उस पर आराम से चहल कदमी करते फिरें। सड़क सरकार मनुष्य के लिए बनाती है। यह सरकार की मर्जी पर है कि उस पर भ्रमण करने की इजाजत वह किसे दे और किसे नही दे। कुत्ते और अन्य प्राणियों के पिल्ले कोई टैक्स नही चुकाते कि वे भी उसका उपयोग करें और फ्री-फोकट में हमारी गाड़ियों के सामने आकर हमारी जान को मुसीबत में डालें।' साधुरामजी चुहुल के मूड में आकर मजे लेने लगे।

'और नहीं तो क्या! न कुत्ते का बच्चा सड़क का साझेदार बनने की कोशिश करता न वह हमारी गाड़ी के रास्ते में रुकावट बन पाता।  स्वयं की गलती का खामियाजा तो उसको भुगतना ही पडेगा साधुरामजी।'  अब थोड़ा मूड मेरा भी बनने लगा था।

'जब हम बडे आराम से कैलाश खैर के सूफियाना प्रेम गीतों के रस में सराबोर होते हुए सफर का मजा ले रहे थे कि साले इस कम्बख्त कुत्ते के पिल्ले ने सारा मजा किरकिरा करके रख दिया। यह तो अच्छा हुआ कि सामने कुत्ते का पिल्ला ही आया, खुदा ना खास्ता कोई आदमी का बच्चा आ गया होता तो...!' साधुरामजी पूरे मूड में आ गए।

हम कहां पीछे रहने वाले थे थोड़े दार्शनिक अंदाज में कहने लगे-'यों देखा जाए तो यह बात केवल डामर और सीमेंट से बनाई गई सड़कों तक ही सीमित नही है मित्र, जहाँ अनाधिकृत जीवों का आना-जाना बना रहता है...देश में कई प्रकार की अन्य सड़कें भी हैं और उन पर कई प्रकार की गाड़ियां दौड लगा रहीं हैं।'
'जैसे? जरा स्पष्ट तो करो...' साधुरामजी ने मेरी तरफ ताकते हुए कहा।

'मसलन राजनीति को ही लें। यह भी सत्ता तक पहुंचने की एक सड़क ही है। अनेक पार्टियाँ अपनी अपनी विचारधाराओं के रंगों और रणनीति के दुपट्टे टोपियां डाले, विभिन्न तकनीकों से लेस होकर, सत्ता प्राप्ति का महान लक्ष्य लिए प्रजातंत्र की सड़क पर दौड़ लगा रही हैं। अब इस दौड़ में यदि कोई अवांछित आपके राजनीतिक हितों की राह में आकर बाधक बन जाए तो उसका तो कुत्ते के पिल्ले की तरह कुचल जाना निश्चित ही है।' मैंने साधुरामजी की कमजोर नस को दबाया।

'तो भैया, इस बात को तो अब यहीं खत्म करो और जरा इन बेलगाम पिल्लों के आतंक पर अंकुश लगाने का उपाय करो वरना ये इसी तरह हमारे जीवन की खुशनुमा राह में आकर हमें मुश्किल में डालते रहेंगे।' कहते हुए साधुरामजी ने प्रसंग का लगभग पटाक्षेप ही कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, November 8, 2022

रोबोट भी बन रहा है मानव

रोबोट भी बन रहा है मानव  


सुबह की चाय की चुस्की भरी ही थी कि साधुरामजी अखबार थामें बड़ी ही चिंतित मुद्रा में उपस्थित हो गए। 

'मैंने कहा था ना कि एक दिन विज्ञान हमारे लिए अभिशाप बन जाएगा!' आते ही बोले।

'ऐसा क्या हो गया?' मैंने उत्सुकता से पूछा। 
'हो क्या गया! गजब हो गया है! अब हज्जाम, पुलिसकर्मी जैसे लोग बेकार हो जाएंगे। ऐसे यंत्र मानव याने रोबोट बनाए जा चुके हैं जो बहुत ही कुशलता से अपना काम कर सकते हैं।'  वह बोले।

'क्या रोबोट भी बाल काटते समय अपनी कैंची से ज्यादा जीभ चलाएगा?' मैंने पूछा। 
'पता नहीं।' बे बोले। 'हमारी दाढ़ी बनाते समय वह भी राजनीति के गिरते स्तर पर अपनी राय प्रकट करेगा?' मैंने पूछा तो वे बोले, 'तुम्हें मजाक सूझ रहा है अगर ये रोबोट मानव बहुतायत से वाकई हमारे देश में छा गए तो बेचारे कितने गरीब मजदूरों, कर्मचारियों, पुलिसकर्मियों की छुट्टी हो जाएगी, उनके परिवार भूखे मरेंगे।
दुनिया के कई देशों में तो काफी पहले ही रोबोट को नौकरी पर रखा जा चुका है। जहां जहां रोबोट नियुक्त किए गए हैं, उनके व्यवहार में बदलाव देखा जा रहा है। अभी अपने इंदौर जैसे शहर में एक ही रोबोट ट्रैफिक पुलिस यातायात को कंट्रोल कर रहा है,यदि वह कंट्रोल से बाहर हो जाए तो जरा सोचिए क्या हाल हो।

हाल ही के एक सर्वे के अनुसार रोबोटों में जो लक्षण नजर आ रहे उनसे उनके अंदर मानवीय गुण आ जाने के खतरे संभावित हैं।' साधुरामजी अपनी रौ में बोले चले जा रहे थे।

'कहने का मतलब अब रोबोट भी बलात्कार कर पाएगा,भ्रष्टाचार कर सकेगा। वाकई विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है।' मैंने कहा तो साधुरामजी थोड़ा झुंझलाकर कर बोले,'हां, हां वह बलात्कार करेगा पैसे खाएगा और और...!' 
'और रोबोट अधिकारी के आदेश से एनकाउंटर भी करेगा।' मैंने बात पूरी की। 

साधुरामजी उठ कर जाने ही लगे थे कि श्रीमतीजी चाय का प्याला ले कर आ गईं। मैंने कहा, 'अजी बैठिए, बैठिए!  रोबोट पत्नी चाय ले आई है।' वे मुस्कुरा दिए और पुनः अपनी कुर्सी पर जम गए।

'मेरे ख्याल से जैसे हमने परमाणु बम नहीं बनाया है उसी तरह यह फैसला भी कर लेना चाहिए कि देशहित में हम रोबोट को भी बढ़ावा नहीं देंगे। डिजिटलाइजेशन व तरक्की के ढोल नगाड़ों के बीच भी हमें मशीनों की बजाय मजदूरों के श्रम का ही उपयोग करना चाहिए। देश में बेरोजगारी और गरीबी का स्तर अभी भी कम नहीं हुआ है। हंगर इंडेक्स में हमारा बड़ा बुरा हाल है।'  चाय का घूंट उतरते ही साधुरामजी का कामरेड जाग उठा। 

'लेकिन हमने रोबोट नहीं बनाए और पड़ोसियों ने रोबोट सैनिक बना लिए तो?' मैंने पूछा।

'नहीं वे ऐसा नहीं करेंगे। वे ऐसा तभी करेंगे जब हम वैसा करें। वे अक्सर हमारा अनुसरण करते हैं। महात्मा गांधी पर फ़िल्म बनने के काफी बाद उनके यहां भी कायदे आदम जिन्ना पर फ़िल्म बनीं। वे बस हमारी नकल करते हैं।'   

बात पुरानी थी पर कुछ ठीक ही लगी। 'हां गांधी फिल्म ने तो वाकई कमाल ही कर दिया था। शायद यह कमाल कोई रोबोट भी नहीं कर पाता जो अभिनेता बेन किंग्सले ने कर दिखाया। रोबोट से तो आदमी ही बेहतर होता है।' मैंने कहा तो वे फिर उत्तेजित हो गए। 'तुम्हें फिर मजाक सूझ रहा है।' 

'मैं मजाक नहीं, सच कह रहा हूं। इन रोबोटों का उपयोग आपकी राजनीति में बहुत अच्छी तरह किया जा सकता है। इन दिनों तो सब राजनीतिक कार्यकर्ता रोबोट की तरह ही तो कार्य करते हैं। जैसा ऊपर से आदेश होता है, करने लगते हैं। सब अलग अलग रंगों की टोपी और दुपट्टा पहने रोबोट हैं।' मैंने साधुराम जी की दुखती रग पर उंगली रख दी। 

'तुम तो राजनीति को बहुत ही गिरी हुई चीज समझते हो। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक होकर ऐसी घटिया बातें तुम्हे शोभा नहीं देती।' वे गुस्से से लाल हो गए।

मैंने चुटकी लेते हुए कहा, 'नहीं नहीं राजनीति तो बहुत अच्छी चीज है। रोबोट और राजनीतिज्ञों की क्या तुलना। रोबोट वह नहीं कर सकता जो राजनेता करते हैं। रोबोट कुर्सी से प्यार नहीं कर सकता। रोबोट असंतुष्ट नहीं हो सकता। वह कोई गुट नहीं बना सकता। रोबोट दल नहीं बदल सकता। रोबोट की राजनीतिज्ञ से क्या तुलना। आप ठीक कहते हैं।' 

साधुरामजी की चाय खत्म हो गई। गुस्से से लाल पीले होते लौट गए। शायद कल फिर कोई नया समाचार लेकर आएं।

ब्रजेश कानूनगो

Friday, September 30, 2022

मोबाइल धारक की स्मार्ट शपथ

मोबाइल धारक की स्मार्ट शपथ


हम भारत के मोबाइल धारक स्मार्ट लोग सोशल मीडिया रसरंजन में आकंठ डूबे, पूरी मदहोशी में शपथ लेते हैं कि जो कुछ यहां कहेंगे देश काल और परिस्थितियों के मद्देनजर सच कहेंगे। इसके अलावा यदि थोड़ा बहुत सच न भी रहा हो तो वह आपको सच ही लगेगा। हम बिना किसी भेदभाव के अपनी बात देश दुनिया में गाजर घास की तरह फैलाने में पूरे तन मन से लगे रहेंगे। ऐसी हरियाली को विस्तारित करने में हम कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।

हमें पता है अब यह मोबाइल यंत्र पांच वर्ष के मुन्नू से लेकर पिचासी वर्षीय दादू मुरारी लाल तक के हाथों की रौनक है। अपने परंपरागत आराध्य को चंदन,वंदन,नमन करने के पहले तड़के ही इस मोबाइल मूर्ति के सामने नत मस्तक होकर इसे माथे से लगाता है। अस्सी वर्षीय अनुभवी वैज्ञानिक का संदेश दस वर्षीय कालू मेकेनिक के पास पल में पहुंच जाता है। उसे तुरंत लाभ मिल जाता है।
गांधी का विचार गोविंद तक और सुभाषबाबू की बात साधुराम तक पहुंचती रहती है। यह माध्यम छोटे बड़े, जाति धर्म, प्रबुद्ध मूर्ख,विचार संस्कृति और देश परदेस की सीमाओं में बंधा नही होता। पश्चिम का खुलापन पूरब के लोगों को झकझोर सकता है। रूस की नीति और चीन की रीति के राज अपनों के बीच उघाड़े जा सकते हैं। यूएस की उपराष्ट्रपति में भारत के डीएनए और ब्रिटेन के पीएम की रेस में अपने अंश की दौड़ के गौरव को समान रूप से सब तक पहुंचाने की सुगमता यहां उपलब्ध है। हर बात हर स्तर पर समान रूप से पहुंचती रहती है। हम इस पुनीत कार्य को सदैव मुश्तैदी से आगे बढ़ाते रहेंगे।

हम संकल्प लेते हैं जब तक आवश्यक न हो और ऐसा करने को न कहा जाए तब तक हमे प्राप्त संदेशों को पूरे मन,आत्मा और अंतः करण से सत्य की तरह स्वीकार करेंगे और इसे सम्पूर्ण निष्ठा से चहुँओर त्वरित रूप से अग्रेषित व विस्तारित करने को तत्पर रहेंगे। आयातित संदेशों की पुष्टि के लिए कभी भी किसी भी संदर्भ ग्रंथ को खोलकर उसकी प्राचीन और जर जर जिल्द को क्षति पहुंचाने की धृष्टता करने की कोशिश कदापि नहीं करेंगे। एक तो उनमें जो कुछ लिखा है जरूरी नहीं कि वह सही ही हो। इसमें कोई शक नहीं कि ज्यादातर सामग्री हर शासनकाल में अपनी सुविधा से बदली जाती रही है। खासतौर से इतिहास की पुस्तकें तो बेहद जर्जर और अप्रासंगिक हो चुकीं हैं। पन्ने गल चुके हैं। अन्य विषयों के संदर्भ भी काफी कालातीत हो चुके हैं। सब कुछ बदल डालने का सुविचार बहुत सोच विचार के बाद लाया गया है।

बदलाव के इस महत्वपूर्ण समय में ज्ञान के प्रसार प्रचार में हमारी भूमिका किसी देशभक्त समाजसेवी से कम नही है। सोशल मीडिया के जरिए हमने नवजागरण का बीड़ा उठाया है, जिसका मूल्यांकन भविष्य में अवश्य होगा। बहुत संभव है इस प्रक्रिया में और भी शोध कार्य हो और तमाम शिक्षण संस्थाओं पर हो रहे बेवजह के खर्च को नियंत्रित किया जा सके। वैज्ञानिक और चिकित्सा जगत में प्रयोगशालाओं और अन्वेषण की आगे आवश्यकता ही न रहे। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसमें शासन,प्रशासन की बजाए जनभागीदारी की बड़ी भूमिका है। लोकतंत्र में यह बड़े काम की चीज है। हमने इस पवित्र विचार को आत्मसात किया है। संकल्प में असीम शक्ति होती है। विश्वास दिलाते हैं आने वाला समय नए समाज के निर्माण में हमारे योगदान को जरूर याद रखेगा। यह जगत पहली बार स्मार्ट जगत बनने में सफल होगा। इति।

ब्रजेश कानूनगो  

सस्ते महंगे रावण

सस्ते महंगे रावण

वे सुबह सुबह मेरे घर आए। थोड़ा परेशान लग रहे थे। क्या बात है साधुरामजी? क्या आज फिर माइग्रेन का दौरा पड़ा है?

कोई दौरा वोरा नहीं पड़ा है। समय का ऐसा दौर आएगा हमारे जीते जी, कभी सोचा नहीं था। वे बोले। आखिर हुआ क्या है? हमने पूछा तो उबल पड़े, कहने लगे, माना कि इस कलियुग में सब कुछ बिकता है लेकिन इतना पतन हो जाएगा। यह तो अति ही हो गई है कि रावण भी बिक रहे हैं बाजार में। सस्ते-महंगे हर भाव मे मिल रहे हैं। ग्यारह सौ से लेकर सवा लाख रुपयों तक के रावण उपलब्ध हैं।

तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है साधुरामजी। आदमी बिकते हैं इस समाज में तो पुतलों के बिकने में कैसी परेशानी। आप भी खरीद लाइये और जला दीजिये अपने आंगन में दशहरे पर। रावण के पुतले का दहन करके हम समाज में घुस आई बुराइयों को जला डालते हैं और आने वाले समय के लिए अपना शुद्धिकरण कर लेते हैं। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की।

तुम्हारी ये आदर्श बातें अपने तक ही सीमित रखो। यदि ऐसा हो रहा होता तो हम अब तक सतयुग में लौट गए होते। घर,मोहल्ले के कूड़ा करकट को बोरी में भरकर बचपन में हम भी रावण बनाते थे और मोहल्ले के मैदान में दहन करते थे। दशहरा समितियां भी अपने बड़े बड़े रावण के पुतले बनवाया करती थीं। पर अब ये घरों घर रावण का पुतला जलाना? बाजार में पुतलों का बाजार सजना? रावण कोई ऐसी शख्सियत थी जिसको इतना भाव दिया जाए? इसे नैतिक नहीं कहा जा सकता। साधुरामजी अपनी रौ में बोलते जा रहे थे।

साधुरामजी, यह आपके जमाने वाला कलियुग नहीं है। यह बाजारयुग है। इस युग में अच्छा बुरा सब माथे लगाने योग्य है। जहां से जैसे भी मुद्राओं का आगमन सम्भव हो वह काम करना समय की रीत है। सच भी बिकता है और झूठ भी। आदमी भी बिकता है और पुतला भी। इसमें कोई नैतिक अनैतिक वाला प्रश्न ही खड़ा नहीं होता। आप अधिक बेचैन न होइए, बीपी बढ़ जाएगा आपका! मैंने कहा।

लेकिन यह भी तो देखिए एक पुतला ग्यारह सौ का है,एक पांच हजार का और कुछ तो सवा लाख रुपयों तक की कीमतों के हैं। पुतला जब प्रतीकात्मक है तो वे एक जैसे भी हो सकते हैं। एक साइज और एक जैसी सामान्य कीमतों के। हर व्यक्ति खरीद सके। साधुरामजी ने अपने को थोड़ा सहज बनाने का प्रयास किया।


साधुरामजी मैं आपको समझाता हूँ ठीक से। देखिए आपने भी माना है कि रावण का पुतला तो बुराई का प्रतीक मात्र है,जिसे जलाकर हम अपनी बुराइयों पर विजय का संकल्प लेते हैं हर साल। मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने भीतर के भ्रष्टाचार रूपी रावण को नष्ट करने का संकल्प लेना चाहता है तो वह पुतला खरीद कर अपने आंगन में उसका दहन करेगा ही न! मैंने कहा।

लेकिन इसके लिए सवा लाख कीमत के पुतले की क्या आवश्यकता है? साधुरामजी बोले।

वह इसलिए साधुरामजी कि जो व्यक्ति हजार रुपयों तक का भ्रष्टाचार करता होगा वह क्यों कर महंगा रावण खरीदेगा। अपनी अपनी बुराइयों की साइज के हिसाब से ही तो रावण दहन करेगा न ! जितना बड़ा दोष, उतना बड़ा रावण खरीदेगा। बड़ी कॉलोनी में ज्यादा लोग रहते हैं तो बड़ा और महंगा रावण जलाना पड़ेगा। मैंने समझाया।

इस विश्लेषण को सुनते ही साधुरामजी पूरी तरह सामान्य हो गए। चिर परिचित अंदाज में ठहाका लगाकर बोले, क्या खूब कही आपने, अब समझ आया कि राजधानियों में इतने बड़े बड़े रावण क्यों जलाए जाते हैं।


ब्रजेश कानूनगो

Thursday, September 8, 2022

कतरा कतरा सुख

कतरा कतरा सुख 

कोई भी चीज अचानक जीवन में आ जाए तो धड़कनें ऊपर नीचे होने लगती हैं। जैसे अचानक पता चले कि पिताजी सारी संपत्ति किसी ट्रस्ट के नाम करके सिधार गए हैं तब बेटे की मनोदशा का आकलन कीजिए। उसको तो हृदयाघात होना निश्चित ही है। बात केवल आघात की ही नहीं है,अचानक मिली बहुत सारी खुशियों के मिल जाने पर भी यही संभावनाएं बन जाती हैं। मनुष्य बड़ा संवेदनशील प्राणी है इसलिए भलाई इसमें है कि सब कुछ शनै शनै ही हो। कहा भी तो गया है, धीरे धीरे रे मना,धीरे सब कुछ होए,माली सीचे सौ घड़ा,ऋतु आए फल होए। 

बीमारी से जूझते किसी परेशान व्यक्ति को जब छोटी सी राहत मिल जाती है तो वह भी उसके स्वस्थ होने की दिशा में संजीवनी का काम करने लग जाती है। मूंग के पापड़ का एक टुकड़ा मुंह मे रखते ही बेस्वाद हुई जीभ की स्वाद ग्रंथि पुनः जाग्रत हो उठती है। जीवन आनंद से भरने लगता है। 

आप सोंचते होंगे कि मैं बड़ी अजीबोगरीब बात कर रहा हूँ। बहक गया हूँ। बिल्कुल भी नहीं बहका हूँ जनाब। उस बीमार आदमी का उदाहरण मुझे यों ही नहीं नजर नहीं आ रहा। 

दरअसल यह उस आनन्द की बात है, उस राहत की बात है जिसे पाकर हमारा मन बल्ले बल्ले करने लगता है। जीवन की सारी परेशानियों और दुखों को अकस्मात भूल जाने का मन करता है। जैसे ऊपर उल्लेखित वह बीमार व्यक्ति पापड़ का एक कतरा अपने मुंह में रखते ही सारी बीमारियों को महसूस करना भूलकर स्वाद के संसार में लौटने लगता है।

चलिए पहेलियां बुझाना छोड़कर सीधे बात करते हैं। दरअसल आम आदमी ही कहानी का वह बीमार व्यक्ति है जिसे अनेक परेशानियों ने जकड़ा हुआ है। ऊपर से महंगाई डायन की कुटिल नजरें भी उसके जीवन को निशाना बनाए हुए है। पेट्रोल और गैस के दामों ने उसके जीवन के सुखों में आग सी लगा दी है।

इन संकटों के बीच अखबार में एक दिन खबर छपती है, 'पेट्रोल की कीमतों में पन्द्रह पैसों की जबरदस्त राहत'।

अब बताइए क्या असीम संकटों के बीच इस खुशखबर से किस परेशान व्यक्ति का दिल बल्ले बल्ले नहीं करने लगेगा। पन्द्रह पैसों की राहत पन्द्रह मिनट के लिए भी मन को सुकून देती हैं तो वह भी क्या कम महत्वपूर्ण बात नहीं है? 

सिंघाड़े का आटा हुआ दो रुपए सस्ता पढ़कर व्रत उपवास प्रधान राष्ट्र के किस धर्मप्राण नागरिक का मन जयकार नहीं करने को होगा। 

एक दिन खबर आती है कि सोने का भाव सौ रुपए टूटा। चांदी का भाव पांच सौ रुपए गिरा। अब सोचिए सोने के बिस्कुट चबाने वाले और चांदी के जेवर पहनने वाले गरीबों के टूटे दिल कितने प्रफुल्लित होने लगे होंगे। 

एक दम से दी गई भारी राहत नागरिक के दिल को भारी झटका दे इससे बेहतर यही है कि सलाइन की तरह खुशी की बूंदें धीरे धीरे उस तक पहुंचाई जाएं। 

दिल का खयाल रखना बहुत जरूरी है श्रीमान!  अचानक ढेर सारी खुशियां भी घातक हो सकती हैं। इसलिए कतरा कतरा खुशी का स्वागत करना सीखिए। इसी में सबका भला है। जरा समझिए जनाब!! 


ब्रजेश कानूनगो