Tuesday, May 25, 2021

लहरों पर सवार हंस

लहरों पर सवार हंस

लोकतंत्र के पर्यावरण में अनेक सामाजिक,आर्थिक, प्रशासनिक,राजनीतिक सरोवर हैं,नदियाँ हैं, समुद्र हैं,झीलें हैं, जिनमें तमाम जीव जंतु अठखेलियाँ करते रहते हैं। लेकिन हंसों की बात अलग है। जो हंस होते हैं उन्हें राज्य में उपलब्ध अकूत जल राशि बहुत मुग्ध करती है। उनकी सदैव यही कोशिश होती है कि इस विशाल राशि पर उनका आधिपत्य स्थापित हो। खासकर ऐसे लबालब जल स्रोतों में उठती लहरों की सवारी करने में इन हंसों का दिल तड़प तड़प जाता है। 

पुराने समय में सम्राटों के सरोवरों में 'राजहंस' हुआ करते थे। अब न राजशाही का जमाना है और न ही राज सरोवरों में हंस बतख आदि क्रीड़ा करते हैं। अब देश दुनिया में लोकशाही का बोलबाला है। लहरों पर सवार होकर अब कुछ लोग हंस बनकर लहरों की सवारी करने लगते हैं। एक दिन ऐसा भी आता है  जब वे राजहंस का दर्जा पा लेते हैं।

लहरों के ये आदम हंस जब लहर पर सवार हो जाते हैं तो उन्हें केवल लहर के उतार चढ़ाव से मतलब होता है। उनकी राह में पड़ने वाले वे फिर किसी भी जीव का दुख दर्द नहीं देख पाते। उनका मकसद केवल एक ही होता है कि वे सरोवर में उठी लहरों पर सवार होकर वे अथाह जलराशि में से अपनी आने वाली पुश्तों के सुख की 'राशि' जुटा लें।

'लहरजीवी' हंस अपनी तिजोरी भरता रहता है। फिर वह लहर महामारी की हो या राजनीति में किसी लोकप्रिय दल विशेष की। चतुर हंस लहर पर सवार होकर अपने पंख फैलाने लगता है। देश में सूखा पड़ा हो, बाढ़ आई हो, महामारी में लोग मर रहे हों, लहरों के आदम हंसों को अपनी तिजोरी भरने से फुरसत नहीं मिलती।
आदम हंसों की दूर दृष्टि बहुत तेज होती है। वे देख लेते हैं कि अब किस क्षेत्र की किस चीज में कोई लहर आने वाली है। ऐनवक्त पर अपने पँख फड़फड़ाकर उस लहर पर सवार हो जाते हैं। कभी राष्ट्रीयकरण की लहर में सुख भोगते हैं तो कभी जनभागीदारी और निजीकरण के खूबसूरत सरोवर की उद्दात्त लहरों पर जलक्रीड़ा करने को लालायित हो उठते हैं। कभी शिक्षा,कभी निर्माण, कभी परिवहन तो कभी जन स्वास्थ्य की नदियों में उठती गिरती लहरें इन्हें मोहित करने लगती हैं। बड़ा आकर्षक दृश्य होता है। लहरों पर सवार इन हंसों से प्रजातंत्र का सरोवर जीवंत है। 
सबका मन करता है कि कभी मौका मिले तो एक बार हम भी लहरों की ऐसी सवारी करके देखें।

Saturday, May 15, 2021

कोष्ठकों में विचारधारा

कोष्ठकों में विचारधारा 


वे कभी समुद्र से भाप बनकर उठे थे..पानी की बूँद की तरह धरती पर एक धारा में विलीन हुए..फिर नदी में जा मिले..और आखिर में समुद्र से निकली बूँद वापिस समुद्र में जा मिली. कुछ अपवाद छोड़ दें तो सारी नदियां आकर अंततः समुद्र में आकर मिलती हैं। बड़ी नदियों में भी कुछ छोटी और मौसमी नदियों का विलय होता रहता है। छुट पुट धाराओं, नालों  वगैरह का पानी भी उपयुक्त ढलान आने पर किसी न किसी बड़े प्रवाह में विलीन हो जाता है। विलयन  या घुलनशीलता की सर्वोच्च परिणीति तो आखिर में समुद्र के विशाल खारेपन में एकाकार हो जाना ही है। 

हरेक वस्तु और प्राणी के अपने विशिष्ठ गुण धर्म होते हैं लेकिन हरेक  गुण,हरेक का धर्म नहीं होता। कोई व्यक्ति स्वधर्मी है तो जरूरी नहीं कि वह गुणवान भी हो। इतना जरूर है कि अपने प्राकृतिक गुणों के कारण व्यक्ति या वस्तु की विशिष्ठ पहचान अवश्य होती है जो अदृश्य भले ही रहे लेकिन जीवन पर्यंत भीतर विद्यमान रहती है।

पानी अपनी तरह है तो नमक अथवा शक्कर की अपनी अलग प्रकृति होती है। गुण प्रायः प्रकृति प्रदत्त होते हैं। गुणों को दुर्गुणों या सद्गुणों में बदलने का कार्य मनुष्य करता है। मनुष्य का भी अपना अलग मूल  आचार-विचार होता है। फिर भी  एक दूसरे में घुल मिल जाने की सामान्य प्रक्रिया हर जगह होती रहती है।  मिलन और घुलनशीलता का भी अपना रसायन याने केमेस्ट्री होती है। किसी के साथ केमेस्ट्री ठीक बैठती है तो कहीं विस्फोट के साथ विलयन-पात्र ही धधक उठता है।

दुनिया और समाज का कोई क्षेत्र ऐसा नही हो सकता जिसमे यह प्रक्रिया न होती हो। यहां तक कि  यह रसायन विज्ञान राजनीतिक परिदृश्य में अक्सर देखने को मिल जाता है। खासकर चुनाओं और लाभार्जन के मौकों पर मेल-मिलाप और विलयन की यह केमेस्ट्री खूब देखने को मिलती है। भिन्न विचारधाराओं के साथ जीने, मरने वाले नेता मौका मिलने पर फायदेदार पार्टी से जुड़ते चले जाते हैं। 

जिस तरह विज्ञान में  चीजों के विलय के संदर्भ में 'मिश्रण' और 'यौगिक' की अवधारणाएं होती हैं। उसी तरह राजनैतिक लोगों के संविलय को भी समझा जा सकता है। कुछ यौगिक की तरह मिलते हैं तो कुछ मिश्रण की तरह। आइये, ज़रा ठीक से समझने की कोशिश करते हैं।

यौगिक प्रक्रिया के तहत मिलने  वाले मूल तत्व अपनी स्वयं की पहचान मिटाकर भिन्न गुणों और पहचान के साथ अलग पदार्थ का निर्माण करते हैं। जैसे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन गैस मिलकर पानी जैसे तरल पदार्थ में रूपांतरित हो जाते हैं। जबकि मिश्रण में सब तत्वों की प्रकृति और विशेषताएं कायम रहती हैं। मसलन शक्कर और पानी मिलकर शर्बत बनाते हैं, या फिर गेहूं में राई या मिट्टी का मिल जाना। इनको आसानी से अलग भी किया जा सकता है। शर्बत को उबालें तो शक्कर और पानी अलग हो जाता है वैसे ही गेहूं से राई और कंकर, मिटटी अलग किये जा सकते हैं।

विचारधाराओं का विलय कभी यौगिक नहीं होता, वे अक्सर 'मिश्रण' की तरह एकसाथ आती हैं. ‘मिश्रण’ में तत्वों के विलग होने अथवा किये जाने की आशंका बनी रहती है। समुद्र के विशाल सीने पर भी भिन्न रंगों के अलग शेड दिखाई देते हैं उसी तरह तेजस्वी और चमकदार राजनीतिक चादर पर विभिन्न (विचार) धाराओं के छापे उसका सौन्दर्य भंग कर सकते हैं। इतिहास गवाह है जब सबसे बड़े दलों के उपदल बनते गए और और नाम के  ब्रेकेट में इंदिरा, बीजू, जगजीवन, माओ आदि जैसी खास पहचान दर्शाना जरूरी हो गया था। कौन जाने कब कोई अपना अलग कोष्ठक बना ले।
भानुमति के राजनीतिक पिटारे में विभिन्न विचारधाराओं के कोष्ठकों की आशंका का खतरा सदैव मंडराता रहता है। 

 
ब्रजेश कानूनगो


Tuesday, March 16, 2021

हादसा,हमला,हकीकत

हादसा,हमला,हकीकत

हुलिया ही बता रहा था कि उनके साथ कोई 'हादसा' हो गया है। एक हाथ की अंगुली से खून टपक रहा था।यह क्या हो गया साधुरामजी हाथ में?' मैंने चिंता व्यक्त की।

'हमला हुआ है मुझ पर... पहले जरा 'टिंचर आयोडीन' दो। घाव पर लगाना है!' साधुरामजी ने हड़बड़ाते हुए गेट खोलकर लगभग दौड़ते  हुए मेरे घर के बरामदे में प्रवेश किया।

मैं समझ गया साधुरामजी के मोहल्ले के 'हालात' बंगाल की तरह ठीक नहीं हैं। तुरन्त भीतर से दवाई लाकर उनकी अंगुली के घाव पर लगाई और पट्टी कर दी।

'आखिर हुआ क्या साधुरामजी? क्या आज फिर किसी मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया? खतरों को आमंत्रित करने की उनकी इस आदत को मैं जानता था।

'ये मिश्रा का बच्चा अपना 'खेला' कर गया। मैं जानता था वह ऐसा अवश्य करेगा। जलता है मुझ से।' तन से वे इधर थे पर मन वचन बंगाल हो रहा था।

'वह क्यों जलने लगेगा भला आपसे।' मैंने कहा।

'उसे मेरा लिखना,छपना सुहाता नहीं। दूसरे दल का मेम्बर है।' वे बोले।

'इसमें उसको क्या आपत्ति हो सकती है? वह भी लिखे अखबारों में,सोशल मीडिया पर,किन्तु इस बात से आपकी अंगुली टूटने का क्या संबंध हैं?   इसमें मिश्रा जी कहाँ से जुड़ गए? आखिर आपके पड़ोसी हैं।' मैंने कहा।

'मिश्रा को मेरा वह लेख बहुत खटक रहा था जिसमें मैंने बढ़ती महंगाई पर व्यंग्य किया था। कल जब वह अखबार में छपा तभी से उसका मुंह चढ़ा हुआ था। वाट्सएप और फेसबुक पर भी टिप्पणी नहीं की।'  साधुरामजी बोले।

'यह आपका भ्रम भी हो सकता है,किसी कारण उसने रुचि नहीं ली हो। जरूरी नही की वह हर बात में आपसे सहमत ही हो जाए।' मैंने समझाने की असफल कोशिश की।

'खैर,यह मानवीय प्रवृत्ति है। लेकिन इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि उसने आप पर हमला किया है। जरा घटना को विस्तार से बताएं? मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।

'आज सुबह मैं दरवाजे के नीचे खिसका ताजा अखबार उठा रहा था, मिश्रा ने दरवाजा जोर से दबा दिया बाहर से। मेरी अंगुली को चोट पहुंचाने का प्रयास किया। हमला किया है उसने। वह नहीं चाहता कि मैं उसकी पार्टी और सत्ता पर व्यंग्य लिखूं।'  साधुरामजी के डीएनए का खास तत्व  उछलकर बाहर आ गया।

'याने न रहेगी अंगुली,न चलेगी कलम!' मैंने चुटकी लेते हुए कहा,

'तो अब क्या करेंगें। यह चुनाव प्रचार जैसा कोई फायदा पहुंचाने वाली बात भी नहीं कि अपनी अंगुली की पट्टी दिखाते हुए वोट मांगते फिरें। राजनेता और आम लेखक की चोट में बड़ा अंतर होता है साधुरामजी।' मैंने कहा।

'तो क्या हुआ। मैं भी कोई कम खिलाड़ी नहीं हूँ। मिश्रा चाहता है मेरी अंगुली तोड़कर वह मेरा लिखना बंद करवा देगा तो मैं भी अब मोबाइल में 'बोलकर' टाइप करके 'खेला' करूंगा।'

इतना कहकर साधुरामजी वापिस लौट गए। वे कब हार मानने वाले थे।

ब्रजेश कानूनगो

Saturday, February 27, 2021

तुम्हारा नाम क्या है 'शेखर बाबू'

तुम्हारा नाम क्या है 'शेखर बाबू'   


मित्र साधुरामजी उस दिन बड़ी हड़बडी में घर आए तो बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे. बापू जिस तरह कमर में घड़ी लटकाए रहते थे उसी तरह मोबाइल फोन फीते से बंधा उनके गले में लटक कर कुरते की ऊपरी जेब में पड़ा होता है. चौबीसों घंटों का साथी. लेकिन उस दिन वह अपने नियत स्थान पर न होते हुए उनके बाएँ हाथ में नजर आया. दाहिने हाथ को हवा में लहराते हुए कहने लगे, ‘बंधु, ये शेखर बाबू को अचानक क्या हो गया? कल ही तो मैंने उन्हें अपनी रचना भिजवाई थी प्रकाशन हेतु. आज अस्पताल में पड़े हैं.’

‘तो इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? आपकी रचना उनका सहायक सम्पादक अखबार में कॉपी पेस्ट कर देगा.’ मैंने चुटकी ली. जब से डिजिटलाइजेशन हुआ है तब से प्रायः यही हो रहा है.

‘अरे यार, तुम्हे तो हर वक्त चुहल ही छूटती है, वे बेचारे परेशान हैं, टांग टूट गयी है, अस्पताल में भरती हैं और तुम्हे मजाक सूझ रहा है. ज़रा मानवीयता से काम लो.’ साधुरामजी चिढ़ गए.

‘ठीक है नाराज मत होइए; आपको कैसे पता चला कि शेखर जी घायल हो गए हैं?’ मैंने पूछा.

‘यह देखिये वाट्सएप पर खुद उनका ही सन्देश आया है, बड़ी परेशानी में हैं, खुद कह रहे हैं कि दो हजार रूपये की मदद कर दीजिये, शाम तक लौटा भी देंगें.’ साधुरामजी ने अपना मोबाइल खोलकर मेरे आगे स्क्रीन कर दिया.

‘अरे! तो उनसे बात कर लीजिए काल करके.’ मैंने सलाह दी.

‘काल भी किया है लेकिन उठा नहीं रहे, इमरजेंसी वार्ड में होंगे शायद.’ साधुरामजी बोले.

मैंने उनका मोबाइल देखा. सारा मामला साफ़ हो गया. शेखर बाबू का नंबर हैक हो गया था. दूसरी तरफ शेखर बाबू नहीं कोई ‘हैकर बाबू’ थे.

वाट्सएप संवाद कुछ इस तरह हुआ था; हेलो...आप से एक काम था....बोलिए सर...दो हजार रूपये की तत्काल जरूरत है... शाम को लौटा देंगे...नंबर दीजिए सर, किस पर ट्रांसफर करना है... सर फोन क्यों नहीं उठा रहे?... ऑफ है...आप पैसे  डाल दीजिये...शाम तक लौटा देंगे...’

‘आपने रुपए ट्रांसफर तो नहीं किए साधुरामजी?’ मैंने चिंता व्यक्त की.

‘अभी तक तो नहीं किए, आपके पास इसीलिए आया हूँ मेरा डिजिटल बैंकिंग का अनुभव नहीं है. आपके खाते से कर दीजिए अभी, मैं आपको नकद दे देता हूँ.’ वे बोले.

‘रुकिए, जल्दी मत कीजिए... थोड़ी बातचीत और करते हैं उनसे..’ मैंने शेखर बाबू से संवाद को कुछ आगे बढाया...’सर,यह सब कैसे? कब हो गया?... प्रेस से घर जा रहा था...स्कूटर फिसल गया... नजदीक के अस्पताल में भरती करा गया कोई रिक्शावाला... बहुत बुरा हुआ सर....ध्यान रखियेगा अपना... वह तो रख रहा हूँ आप दो हजार रूपये डाल दीजिये प्लीज...इलाज शुरू होना है...जी अवश्य आप फ़िक्र न करें...नंबर दीजिये...आप फोन क्यों नहीं उठा रहे?....ये नंबर है....इस पर ट्रांसफर करिए....शाम को लौटा देंगे... ठीक है सर...करता हूँ...सर एक कविता भेजी है....आप पैसे डाल दीजिये...बहुत जरूरत है...सर कविता पढ़िए नई वाली... तुम पैसे डालो यार....अच्छा सर एक व्यंग्य ही पढ़ लीजिए.... तुम पैसे डाल रहे हो या नहीं...सर आप व्यंग्य देख रहे हो या नहीं...चलिए एक दोहा ही पढ़ लीजिए...अरे यार बीमार को और परेशान मत करो...यह ठीक नहीं... अरे सर पढ़ लीजिये दोहा नहीं तो हायकू भेज दूंगा...मेरे पास ताका भी है....अच्छा यही बता दीजिये आपका नाम क्या है शेखर बाबू...?’ हैकर बाबू की बोलती बंद हो गई थी, अब वे वॉट्सएप से गायब हो चुके थे...!

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, December 21, 2020

मुट्ठी चरित

मुट्ठी चरित

मेरे घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर लगे टीवी स्क्रीन पर उस दिन गब्बरसिंह के साथी शोले बरसा रहे थे। काशीराम घर मे से आधी बोरी अनाज ले आया। ‘क्या लाये हो कासीराम?’ कालिया ने अपनी घनी मूंछों के पीछे से पीले दांत दिखाते हुए कहा। ‘हुजूर जुवार लाया हूँ।’ काशीराम ने चबूतरे पर बोरी रखते हुए कहा तो कालिया भड़क गया- ‘हमारे लिए बस आधी मुट्ठी जुवार... बाकी क्या बेटी के बारातियों को खिलाने के लिए रखी है..’ आधी बोरी अनाज कालिया के लिए केवल 'आधी मुट्ठी' के बराबर है। बोरी भर अनाज में काशीराम का सुख-चैन दांव पर लगा हुआ था।


मुट्ठी मुट्ठी में फर्क होता है। मित्र सुदामा की एक मुट्ठी में श्रीकृष्ण को एक लोक नजर आता है। जब तक मुट्ठी बंद रहती है तब तक रहस्य पर पर्दा पड़ा रहता है। जैसे ही मुट्ठी खुलती है चावल के दाने दोनों मित्रों के हृदय सागर को असंख्य प्रेममोतियों से मालामाल कर देते हैं।


मुझे तो इस पुरानी कहावत में भी संदेह रहता है कि ‘बंद मुट्ठी लाख की,खुल जाए तो ख़ाक की’। ये बिलकुल गलत बात है। यदि बंद मुट्ठी में से थोड़ी सी भस्म भी निकलती है तो उसका भी बड़ा मोल हो सकता है। वह भी बहुमूल्य हो सकती है। किसी पुराने वैद्यराज से पूछकर देखिये, कितनी महंगी होती है ‘स्वर्ण भस्म'। कल्लू पंसारी की मुट्ठी ही क्या उसकी चुटकी में दबी ‘केसर’ या गफूर गुल्लू की पुड़िया में बंद ‘पावडर’ का भाव कितना होता है यह खरीदने वाला ही जानता है।


यों देखा जाए तो इंसान की मुट्ठी हमेशा से सामूहिकता और एकजुटता का सटीक उदाहरण रही है। जब सारी उंगलियाँ एक साथ मिल जाती हैं तब मुट्ठी बनती है। एक नेताजी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे, कहने लगे ‘मुट्ठी भर लोग’ यदि उनके खिलाफ वोट देते भी हैं तो क्या फर्क पड़ने वाला है। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि ये ‘मुट्ठियाँ’ ही जब संकल्प,साहस और शक्ति से भर जाती हैं तो ‘मुक्का’ में बदल जाया करती हैं। जब जब मुट्ठियों नें संकल्पों की मशालें और विचारों के झंडे थामे हैं देश और दुनिया में महान क्रांतियाँ होती रही हैं। एकता में शक्ति होती है, यह बात यों ही नहीं कह दी गयी है। 


मतदान के बाद अनाज की बोरी 'काशीराम' चबूतरे पर रख आता है। 'सुदामाओं' की पोटली खुलने का इंतज़ार कई 'द्वारकाधीश' करने लगते हैं। बूट पॉलिश’ फिल्म का ख़ूबसूरत गीत हमारे यहाँ खूब लोकप्रिय है , ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है !’ मुट्ठी में है तकदीर हमारी, हमने किस्मत को बस में किया है। 'ईवीएम' और 'मतपेटियां' भी प्रजातंत्र की ऐसी ही बंद मुट्ठियाँ होती हैं जो खुलने पर किसी को विजेता का ताज पहनाकर मालामाल करती हैं और किसी के सामने जीवन का सुखचैन छिन जाने का संकट ला खड़ा कर देती हैं।


इन प्रजातांत्रिक मुट्ठियां जब धीरे धीरे खुलने रखती हैं, अनेक दिल धड़कने लगते हैं, बहुतों  की ‘बल्ले बल्ले’ होने लगती है....कई के दिल बैठ भी जाते हैं. फूगे हुए गुब्बारों की तरह उछलते दिलों के अलावा कई पंक्चर दिल भी चुनाव परिणाम वाले दिन सहजता से  अपने आसपास दिखाई देने लगते हैं... 


ब्रजेश कानूनगो


Friday, October 16, 2020

'दिशा जंगल' की दशा और दिशा

दिशा जंगल' की दशा और दिशा

उस दिन साधुरामजी आए तो बड़े खिन्न लग रहे थे। वैसे यह कोई नई बात नहीं थी 'खिन्न' रहना उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है।

दरअसल वे स्वच्छता अभियान के तहत गाँवों में बनाए गए शौचालयों के कुछ चित्र फेसबुक पर देखकर व्यथित थे। कहने लगे-'एक अच्छी योजना में थोड़ी बहुत गड़बड़ी को भी लोग मुद्दा बनाकर मखौल उड़ाने लगते हैं!'

'ऐसा क्या हो गया साधुरामजी?' मैंने पूछ लिया ताकि वे अपने भीतर का गुबार निकालकर थोड़ा हल्के हो जाएं।

'ये देखिये, इस शौचालय में किसी ने पान, बीड़ी की दुकान सजा ली है, और यह दूसरे में देखिए टॉयलेट की सीट के बीच से एक पपीते का पेड़ निकल आया है!'  साधुरामजी ने मोबाइल स्क्रीन मेरे आगे कर दिया।

'यह तो मैं पहले ही देख चुका हूँ साधुरामजी। पपीते का पेड़ तो शायद इस लिए उग आया होगा कि किसी ने खाते वक्त बीज निगल लिया होगा।'मैंने चुहुल की। मैं जानता था कि यह सब फोटोशॉप का करिश्मा भी हो सकता था। पर शौचालय में दुकान सजाने में कुछ सच्चाई जरूर नजर आई।

'तुम्हे मजाक सूझ रहा पर ऐसी बातों से हमारी अच्छी योजनाओं की बदनामी होती है।' साधुरामजी बोले।

'काहे कि बदनामी! जब भविष्य में आज की सभ्यता का मूल्यांकन होगा तब इन सब चीजों से इतिहासकारों को मदद मिलेगी। सत्य के करीब होगा इतिहास लेखन।'

'तुम खुराफाती हो, मजे लेने से बाज नहीं आओगे!' वे नाराज होकर मेरे घर से वॉक आउट कर गए किन्तु मुझे  'शौचालयों की  दशा और दिशा' पर चिंतन करने को विवश कर गए।

मुझे याद आया दादा कोंडके की एक फिल्म का वह दृश्य जिसमें एक विदेशी सैलानी ऊँट पर बैठकर भारत के गांव का भ्रमण करता है जब वह एक गाँव के सामने से गुजरता है तब जिज्ञासा से पूछता है - 'क्या या गांव का टॉयलेट है?' तब दादा उसे निर्विकार बताते हैं 'नहीं यह शौचालय नहीं है यह हमारे गांव का प्राथमिक स्कूल है।'  विदेशी सैलानी की आंखें आंखें फटी रह जाती हैं।

एक और कहानी याद आती है जिसमें उस समय की एक परंपरा का बहुत रोचक वर्णन करते हुए कथाकार ने एक गांव में आई बारात और उसके सत्कार का चित्रण किया था। उस काल में जितने दिन बाराती गांव में रहते लगता कोई उत्सव चल रहा हो। ढोल और बैंड बाजों के शोर से वातावरण कई दिनों तक लोक संगीत में डूबा रहता था। सुबह-सुबह बारातियों को शौच के लिए दिशा मैदान व स्नान आदि के लिए नदी किनारे ढोल नगाड़ों के साथ ले जाया जाता था। धरती की गोद में शीतल पवन के झौकों और विभिन्न वनस्पतियों की दिलकश सुगंध के बीच लोगों के नित्य कर्म निपटते थे। यह भी तत्कालीन टॉयलेट का एक प्राकृतिक स्वरूप होता था।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे, उनमें स्नानागार की पुष्टि तो होती है किंतु मनुष्य के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अधिक स्पष्ट नही है।

हां, आधुनिक भारत में बड़े लोगों के बाथरूम में बड़ी बड़ी तिजोरियों में बड़े-बड़े नोटों की बड़ी-बड़ी गड्डियाँ मिलने के सबूत खुफिया एजेंसियों की फाइलों में मिल जाते हैं। कहना सिर्फ इतना है  कि शौचालयों के बारे में प्राचीन काल से संदर्भ मिले न मिले, आधुनिक भारत के अधिकांश संदर्भ यहीं से मिलते हैं। वर्तमान में इनके बारे में प्रत्येक मनुष्य में जिज्ञासा सदा से बनी रही है। हम अधिक से अधिक जानना चाहते हैं टॉयलटों के बारे में। हमारे ही नहीं हम दूसरों के टॉयलेट का रहस्य जानने के लिए भी लालायित बने रहते हैं। उसका टॉयलेट मेरे टॉयलेट से बेहतर क्यों? 

खेतों की बागड़ और रेल पटरियों के किनारों  के अलावा भी टॉयलेट की बहुमूल्य, बहुरंगी व  खूबसूरत दुनिया होती है। चिंतकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों आदि के जीवन में तो शौचालय का महत्व बहुत अधिक होता है। टॉयलेट वह स्थान है जहां हम अपने विचारों का शोधन करते हुए असीम शांति को महसूस कर सकते हैं। जहां बैठकर देश दुनिया के बारे में सार्थक चिंतन किया जा सकता है। इसलिए अपने घरों में टॉयलेट बनवाइए और कृपया उसमें दुकान मत सजाइये। उसमें पेड़ मत उगाइये।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, October 6, 2020

श्री' का यूनिट पॉवर

'श्री' का यूनिट पॉवर

साधुरामजी को मैंने छेडते हुए कहा-‘श्रीमान जी, जब कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों न उसके सम्मान सूचक विशेषण वापिस ले लिए जाना चाहिए?’ जैसे वह अपने नाम के आगे ‘डॉ’ लगाता हो या योगाचार्य, स्वामी, आचार्य जैसे किसी आदरणीय पदनाम को धारित करता हो, उसे तुरंत विलोपित कर दिया जाना चाहिए.’ 

‘यह भी कोई बात हुई भला! कल से मैंने कोई गलती कर दी तो तुम कहोगे मैं अपने नाम के आगे इकलौता  ‘श्री’ भी न लगाऊँ !’

‘हाँ, इसमें क्या बुराई है, जानते नहीं एक आतंकी को ‘श्री’ कह देने से देश में कितना बवाल हो गया था.’ मैंने कहा.

‘तो क्या हुआ, हम अपने संस्कार भूल जाँए? बुरे काम से घृणा करने की परम्परा रही है हमारे यहाँ, अपराधी भी एक मनुष्य होता है. सम्बोधन में उसके लिए भी ‘श्री’ का प्रयोग करना गलत नही कहा जा सकता।’

‘लेकिन जो व्यक्ति गलत काम करता है उसे ‘श्री’ कैसे कहा जा सकता है?’ मैने उनसे असहमत होते हुए पूछ लिया।

‘जो भी हो, अपराधी को उसके कर्म के लिए दंडित किया जा सकता है, एक हमनस्ल प्राणी के तौर पर हर मनुष्य को मर्यादित सम्बोधन ही किया जाना चाहिए। यही हमारी गौरवशाली परम्परा भी रही है. रावण और कंस सहित अनेक खलनायकों को सम्मान दिया जाता रहा है हमारे यहाँ.’

साधुरामजी अपने कथ्य पर अडिग थे, उनके तर्क में भी काफी दम दिखाई दे रहा था फिर भी मैने जिज्ञासा जाहिर करते हुए उनसे पूछा- ‘जब आप साधु और शैतान में कोई भेद नही करेंगे तो कैसे पता चलेगा कि कौन सज्जन और चरित्रवान है और कौन धूर्त और पाखंडी या चालबाज? सब के सब ‘श्री’, फिर तो सब एक ही तराजू में एक ही वजन में तुलते रहेंगे? यह तो बडी ना-इंसाफी है हुजूर. यह न करें तो क्या करें,अब आप ही बताइये कुछ.’

साधुरामजी ने किसी दार्शनिक की तरह आसमान की ओर निहारा और पंडित जवाहर लाल नेहरू की तरह दाहिने हाथ की तर्जनी ठोडी पर टिकाते कहने लगे-‘तुम्हे याद होगा बडे-बडे संत महात्माओं के आगे 108 श्री, 1008 श्री लगाने की परम्परा हमारे यहाँ रही है। यही हमारी सभ्यता है। पांच हजार साल पुरानी हमारी सभ्यता को कैसे भुलाया जा सकता है। इसी तरह आधार नंबर की तर्ज पर  प्रत्येक व्यक्ति के आँकडों और सर्वे के अनुसार जनगणना के वक्त ही उसका व्यक्तिगत ‘श्री’  युनिट पॉवर निधारित कर दिया जाए। बाद में उसके नाम के साथ उतने ही 'श्री' का प्रयोग करना शायद अधिक तर्क संगत रहेगा।’ मैं साधुरामजी का चेहरा तकता रह गया।

ब्रजेश कानूनगो