Friday, May 1, 2020

होनहार बिरवान के होत न चीकने पात

व्यंग्य
होनहार बिरवान के होत न चीकने पात 

'होनहार बिरवान के होत चीकने पात', या 'पूत के लक्षण पालने में ही दिखने लग जाते हैं' जैसी पुरानी कहावतें अब अपने अर्थ खो चुकी लगती हैं।  पूरे यकीन से यह नहीं कहा जा सकता कि बचपन के लक्षण बच्चों के भविष्य का निश्चित संकेत देते ही हैं।  मेहमानों के समक्ष 'अंग्रेजी पोएम' सुनाकर सबका दिल जीत लेने वाला होनहार बच्चा मातृभाषा की परीक्षा में फेल हो जाता है। पिता की परचून की दुकान में पुड़िया बांधता बालक कालांतर में किसी राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी को शोभायमान करता है।

माँ हमेशा कहा करती थी कि मैं बचपन से ही बडा होनहार रहा हूँ। माँओं का दृष्टिकोण संतानों के प्रति हमारे यहाँ ऐसा ही होता आया है। यह अलग बात है कि जिस औलाद को वह होनहार समझती रही हो वही बेटा बदले हुए समय में अपनी होनहारियत पर अपना सिर पीटने को मजबूर हो जाए।

अब केवल होनहारियत या प्रतिभा से काम नहीं चलता। व्यक्ति में प्रबंधन के साथ साथ चतुराई बल्कि चालाकी जैसे गुणों का विकास होना भी जरूरी है। सफलता के लिए एक बार प्रतिभा में थोड़ी कमी रह जाए लेकिन उसमें दुनियादारी के सूत्र सिद्ध करने का कौशल अंगीकार करने की क्षमता अब बेहद जरूरी हो गई है।

अब देखिए, स्कूल के जमाने में चाहे भाषण प्रतियोगिता रही हो या निबन्ध अथवा कविता लेखन स्पर्धा, हमेशा हमने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया और होनहार होने का तमगा हमारे सीने पर चस्पा कर दिया गया। हमारे जो मित्र होनहार होने को अपना अपमान समझते थे तथा ‘ग’-गणेश की बजाए ‘ग’-गधा  उनको अधिक रुचिकर लगता था,उनका भाग्य देखिए,उनके यहाँ आज छापे पड रहे हैं, करोडों की दौलत गिनी जा रही है और एक हम हैं जो 'सेठ धर्मदास साहित्य सम्मान' की आस लगाए जेब के पैसों से ग्रंथ छपयाये जा रहे हैं।

निबन्ध तथा तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में अक्सर उन दिनों एक विषय रहता था-‘यदि मैं प्रधान मंत्री बन जाऊँ’ । विद्यार्थी बडे उत्साह से लिखते कि कैसे उनके प्रधानमंत्री बनते ही देश का काया कल्प हो जाएगा। कैसे हर तरफ सच्चाई और ईमानदारी की हवा बहने लगेगी। भ्रष्टाचार के दानव का वध किया जा चुका होगा, कोई भूखा नही होगा, हर सिर के ऊपर छत और हर बच्चे के हाथ में कलम होगी और चेहरे पर खुशी के फूल खिल उठेंगे। बचपन से ही बच्चों में प्रधानमंत्री बनने की चाहत पैदा करने के गम्भीर प्रयास किए जाते रहे हैं।

हमारे यहाँ होनहार लोगों की कभी कोई कमी नहीं रही। प्रधानमंत्री बनने के अभिलाषियों की एक लम्बी कतार लगी रहती है जैसे कोई आकाशगंगा राजनीति के आकाश में टिमटिमा रही हो।

तथाकथित होनहार बच्चे  शुरू से इस चेष्टा मे लगे रहते हैं कि जीवन में एक बार प्रधानमंत्री अवश्य बन जाएँ। हर माँ-बाप की ख्वाहिश होती है बेटा पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जनता से भारत माता की जय बुलवाए। लेकिन ऐसा होता कहाँ है! होनी को कौन टाल सकता है। जीवन की आपाधापी और संघर्षों के आगे अधिकाँश होनहार ‘हार’ जाते हैं। इस उपक्रम मे कई लोग पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं लेकिन प्रधानमंत्री हो जाने का उनका सपना उसी तरह पूरा नही हो पाता जिस तरह उनके बचपन में लिखे गए निबन्ध या भाषण में देखे गए सपने पूरे नही हो पाते।

सच तो यह है कि सपने पूरा करने के लिए अब  'बिरवान के चीकने पात' के भरोसे नहीं रहा जा सकता।

ब्रजेश कानूनगो

महाराज की बीमारी

व्यंग्यकथा
महाराज की बीमारी

किसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि किसी शूरवीर की बजाए कवि के निधन से सम्राट इतने दुखी हो उठेंगे।
राज्य कला ,संस्कृति और साहित्य की दृष्टि से बहुत समृद्ध था। अनेक कलाकार और साहित्यकार राज्य की शोभा बढ़ाते थे।
राजधानी में ही अनेक गुणी और प्रतिभावान विभूतियों के विद्यमान होने के उपरांत भी सबकी उपेक्षा करते हुए उन्हें प्राथमिकता देकर महाराज ने राजकवि का दर्जा दिया था। इस सम्मान के पीछे कुछ वही कारण थे जो प्रायः सभी कालखण्डों में इसी प्रकार रहते आये हैं। राजकवि का गौरव प्राप्त करने के लिए जो अहर्तताएँ होनी चाहिये वे उनमें मौजूद थीं और महाराज ने उन्हें बखूबी पहचान भी लिया था।
लेकिन पिछले माह जब राजकवि एक संगीत सभा के बाद रात्रि को नियमित सुरापान पश्चात विश्राम हेतु शयनकक्ष को गए तो प्रातःकाल वहां से मात्र कवि का देह फार्मेट तो उपलब्ध हुआ पर कविता नदारत थी। ब्रह्ममुहूर्त में उनके भीतर की काव्यात्मा पदोन्नत होकर  स्वर्गलोक की इंद्रसभा में अपना आसान ग्रहण करने हेतु कूच कर चुकी थी।

तब से ही महाराज की सेहत गिरती जा रही थी। पिछले कुछ दिनों से बहुत उदास और निढाल भी दिखाई देने लगे थे। मंत्रीगण, अधिकारी और परिजन सब चिंतित थे कि आखिर उन्हें हुआ क्या हैयदि महाराज की हालत इसी तरह  दिनों दिन गिरती रही तो राजकाज का क्या होगा?
चिकित्सा विज्ञान में प्रावीण्यता अर्जित किए और निपुण राजवैद्य बीमारी का सही कारण अपने सभी परीक्षणों के बावजूद पता नहीं लगा पा रहे थे। पड़ोसी राज्यों के विशेषज्ञों को भी आमंत्रित किया गया। मगर सफलता हाथ न लगी। दिनों दिन महाराज का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था। पहले सी आभा और तेज विलुप्त था।

तभी महामंत्री को स्मरण आया कि महाराज की सेहत के पीछे शारीरिक की बजाए कोई मानसिक समस्या तो नहीं है? उन्होंने तुरंत ही राज्य के विचारक और दार्शनिक आचार्य विद्यादमन का परामर्श लेना उचित समझा। आचार्य अपनी धारणाओं के आधार पर कठिनाई में पड़े व्यक्ति की मनोचिकत्सा भी किया करते थे। इसे आज की भाषा में हम काउंसलिंग भी कह सकते हैं।
आचार्य विद्यादमन ने सबसे पहले यह जानने की कोशिश की कि महाराज को सबसे अच्छा क्या लगता था। जो उन्हें पसंद हो वह उन्हें दिया जाए। यदि कोई मिष्ठान्न, विशिष्ठ सुरा, कोई प्रिय व्यक्ति, स्त्री,गीत,संगीत जो भी उनके मन को प्रसन्न कर सकता हो वह सब प्रस्तुत किया जाए। दुर्भाग्य रहा कि यह सब करने के बावजूद परिणाम शून्य ही रहा।  

आचार्य विद्यादमन चिंता में पड गए। उन्होंने अपने चिंतन को और विस्तारित और कारगर बनाने की दृष्टि से महाराज के विशिष्ठ महाज्ञानी नवरत्नों से विमर्श के लिए एक बैठक आमंत्रित की। इस बैठक का परिणाम बड़ा सकारात्मक रहा । आचार्य को महाराज के रोग के कारणों का पता चल गया। दरअसल बैठक में राज्य के नौ रत्नों में से आठ रत्न ही उपस्थित हुए थे। राजकवि की अनुपस्थिति ही वह बात थी जिससे आचार्य को समस्या के संकेत मिल गए।

आचार्य ने दिवगंत राज कवि का समस्त साहित्य अपने अध्ययन कक्ष में बुलवाया और गहन अध्ययन किया। यह देखकर वे हतप्रभ रह गये की कवि महोदय की सारी किताबें महाराज की प्रशंसा में लिखी गई रचनाओं से भरी हुईं थी। रचनाएं क्या थीं, मात्र छद्म शौर्य गाथाएँ, विरुदावलियाँ, महाराज के सम्मान में आरतियों आदि के अलावा और कुछ भी नहीं था उनमें।  हर रचना में महाराज की प्रशंसा महाभारत के चीरहरण प्रसंग में द्रोपदी के वस्त्र की तरह बढ़ती जाती थीं जो हर क्षण नई उपमाओं और अलंकारिक शब्दों से विस्तारित और काल्पनिक रंगों से इंद्रधनुषी हो जाती थीं। आचार्य पढ़ते हुए कितना ही अधीर होते जाते थे महाराज की असली सूरत मूरत नजर आना राजकवि की रचनाओं में मुश्किल हो रहा था।

किन्तु आचार्य विद्यादमन को इस बात का बहुत संतोष भी था कि राज्य के कल्याण की दृष्टि से उन्होंने अपने चिंतन से महाराज की अस्वस्थता का रहस्य आखिर खोज निकाला था। बल्कि यों कहें कि राजन के रोग का निवारण करने में उन्होंने सफलता प्राप्त कर ली थी।
आचार्यश्री  ने तुरंत महामंत्री को सुझाव दिया की वे रिक्त हुए राजकवि के पद को तुरंत भर दें और उस पर किसी योग्य चाटुकारिता गुणों से संपन्न ओजस्वी कवि को नियुक्त कर दें। महामंत्री ने तुरंत ही एक कार्यकारी राजकवि की नियुक्ति हेतु राज्य में आदेश प्रसारित कर दिया।

देखते ही देखते अनेक नवोदित लेखक, कवि अपनी सेवाएं देने को तत्पर हो गए। पद एक था मगर आवेदकों  की संख्या राजमहल की मुंडेर के कंगूरों पर जगमगाते दीपकों की तरह सैंकड़ों थी। हर कवि राजमहल पर छाये अँधेरे को अपनी रोशनी से जगमगा देना चाहता था। एक युवा जो राजमहल और महाराज की स्तुति में वर्षों से अपनी कविताओं और कथाओं से परोक्ष योगदान दे रहा था लेकिन साहित्य समाज में बहुत उपेक्षित सा महसूस करता रहा था उसके दिन फिर गए। प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत कृतियों ने उसे नया राजकवि हो जाने का गौरव प्रदान करवा दिया।
महाराज रोगी जरूर थे किन्तु वे थे तो सम्राट। उन्हें प्रशंसा पसंद थी। इतिहास गवाह है यदि व्यक्ति सम्राट है तो प्रशंसा उसके तन में जोश और मन में गौरव भर देती है। एक तरह से प्रशंसा राजा के लिए शक्तिवर्धक,रक्तशोधक और जोशवर्धक टॉनिक की तरह काम करती है।
कुछ ही दिनों में नए राजकवि की प्रतिभा का असर दिखाई देने लगा। धीरे धीरे महाराज पूर्ण स्वस्थ हो गए। चेहरा फिर दमकने लगा, राजकाज सुचारू रूप से चलने लगा। चहुँओर राजकवि की ओजस्वी और अलंकारिक कविताओं की गूँज से महाराज की कीर्ति पताका पुनः फहराने लगी। जिस तरह कल्याणकारी राज्य के उस कवि का कल्याण हुआ, उसके दिन फिरे...सबके फिरें....इतिश्री राजकथा चतुर्थ अध्याय समाप्त।

ब्रजेश कानूनगो

मंगल भवन अमंगल हारी

व्यंग्य कथा
मंगल भवन अमंगल हारी

पर्णकुटी में प्रवास कर रहे राजन की निगाहें अचानक दूर क्षितिज में उड़ती धूल पर गई तो वे आशंकित हो उठे कि कहीं राजधानी से कोई दूत किसी अनर्थ की सूचना लेकर तो नहीं आ रहा। उनकी शंका स्वाभाविक ही थी क्योंकि पिछले दिनों जब जब इधर कोई सन्देश वाहक आया था कभी भी उन्हें शुभ समाचार प्राप्त नहीं हुआ था। वे इधर वन में आ तो गए थे लेकिन राजकाज और प्रजा की परेशानियों से उसी तरह मुक्त नहीं हो पा रहे थे जिस प्रकार राज्य में दिनों दिन फैलती जा रही अज्ञात बीमारी के प्रकोप से प्रजा को बचाया जाना मुश्किल होता जा रहा था।

'आर्य! हम और कितने दिन यहाँ पर्णकुटी में समय व्यतीत करेंगें? कब हम इस एकांतवास से मुक्त होकर पुनः राजप्रासाद लौट सकेंगे?' महारानी ने परेशान होकर व्याकुल मन से आखिर एकांतवासी राजन से पूछ ही लिया।
'देवी! जैसे ही हमारे राज्य में  विषाणु संक्रमण के प्रकोप पर नियंत्रण कर लिया जाएगा और हमारे एकांत के कृष्णपक्ष की निर्धारित अवधि समाप्त हो जाएगी, हम लोग  पुनः राजधानी और राजमहल में प्रवेश कर लेंगें। तनिक धैर्य आपको रखना ही होगा।' महाराज ने महारानी से दो हस्त दूर अपने आसन पर विराजे विराजे कहा।

कोई और वक्त होता तो निश्चित ही वे ऐसा कहते हुए महारानी के सुकोमल कंधे पर अपने करकमल का स्नेह स्पर्श अवश्य करते। किंतु पृथ्वी पर फैली संक्रामक महामारी की वजह से वे ऐसा नहीं कर सकते थे। सात समंदर पार से आये अस्त्र सौदागर अतिथि के संपर्क में आने से उन्हें भी बीमारी का अंदेशा हो गया था। राजवैद्य ने परीक्षण के उपरांत सलाह दी कि संक्रमण की श्रृंखला को तोड़कर ही इस बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है। संक्रमित व्यक्तियों को अन्यों से दूर रहकर एकांतवास में रहना होगा ताकि एक दो पक्षों में विषाणु का असर स्वतः समाप्त हो जाए। और राजन पत्नी सहित एकांतवास हेतु वन क्षेत्र में पर्णकुटी में प्रवास को बाध्य हो गए।

उन्हें अब बहुत पश्चाताप भी हो रहा था कि अपनी राज्य व्यवस्था नीति के निर्धारण में शास्त्रागाह को समृद्ध करने की बजाए औषधि विज्ञान और चिकित्सालयों के विकास के लिए पर्याप्त ध्यान वे क्यों नहीं दे सके। लेकिन अब पछताने से क्या हो सकता था। लोकजीवन को विषाणु के संक्रमण से मुक्त करने का कोई तात्कालिक उपाय ही नहीं उपलब्ध था।  

विषाणु संक्रमण से राज्य का  बुरा हाल होता जा रहा था। प्रजा में प्रतिदिन संक्रमित लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी। एक ही उपाय था कि किसी तरह संक्रमण की श्रृंखला को भंग किया जाए। लोग थे कि मान ही नहीं रहे थे। राज्य में समस्त प्रकार की सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों को रोक दिया गया था। अनेक खेल प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक महोत्सवों की निर्धारित तिथियां आगे बढ़ा दी गईं थीं। लोगों को घरों में ही रहने की अधिसूचना प्रसारित कर दी गई थी लेकिन कुछ उद्दंड युवा राजनिर्देशों का अनुपालन नहीं करने से बाज नहीं आ रहे थे। दो दिन पूर्व ही सूचना लेकर दूत आया था कि कुछ युवकों ने अतिउत्साह दिखाते हुए शाही वृत्त पर निषेधात्मक आज्ञा का उलंघन करते हुए उत्सव मनाया जिससे संक्रमण के विस्तार की आशंकाएं और गहरी हो गईं थीं।

इसी बीच महाराज भी संक्रमण के संदिग्ध पाये गए तो महारानी सहित एकांत जीवन व्यतीत करने के लिए वन की ओर आना ही पड़ा। बस तभी से यह पर्णकुटी उनका आवास हो गई थी। जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं ही  उद्यम करना जरूरी हो गया था। किसी भी सहायक और सेवक को कुटी में प्रवेश करना निषेध कर दिया गया था। इसलिए खुद राजा रानी ही मिल जुलकर सभी घर गृहस्थी के दैनिक काम काज करने को विवश हो गए थे। शुरुआत में थोड़ा संकोच और कठिनाई अवश्य आई किंतु बाद में स्थितियों के प्रति उन्होंने समर्पण कर दिया और आमजन की तरह इसीमें थोड़ा थोड़ा आनन्द तलाशने की कोशिश करने लगे।

इस बीच राजमहल से निकला अश्वारोही सैनिक कुटिया के द्वार पर पहुँच चुका था। अश्व से उतर कर राजन को उसने प्रणाम किया ‘महाराज की जय हो!’ कहकर कुटिया के द्वार पर रखे द्रव से अपने हाथों को शुद्ध कर संदेशपत्र तिपाही पर रख दिया।

महाराज ने जैसे ही पत्र पढ़ा, खुशी से उछल से पड़े। अनेक वर्षों से तपोवन में शोधकार्य में लीन महर्षी ‘विज्ञानरिपु’ ने विषाणु जनित महामारी और रोगमुक्ति का उपाय आविष्कृत कर लिया था।

अचानक मेरी तंद्रा टूटी। टीवी देखते देखते शायद झपकी लग गयी थी। स्क्रीन पर महर्षी विश्वामित्र अपने आश्रम में श्रीराम को आशीर्वाद दे रहे थे। धीरे धीरे संगीत के बीच रामायण की पंक्तियाँ गूंजने लगीं...मंगल भवन अमंगल हारी...!

Thursday, March 19, 2020

सहीराम 'हिन्दुस्तानी' का बयान

सहीराम 'हिन्दुस्तानी' का  बयान
ब्रजेश कानूनगो

आदरणीय दोस्तों ,
कुछ लोग बिलकुल सही कहते हैं कि सबसे सही समय वह होता है जब बिलकुल सही नतीजे आते हैं. हालांकि वे भी सही हैं जो कहते हैं कि यह सही वक्त नहीं है और नतीजे भी सही नहीं आ रहे हैं. तात्पर्य यह है कि अपने यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता जो सही नहीं कहा जा सके. जिसे हम सही नहीं कह सकते वह भी कहीं न कहीं सही ही होता है.

अब यदि फ्लोर टेस्ट आदि में कोई सरकार गिर जाती है तो वह भी सही है,अल्पमत में उसका गिर जाना सही बात है. यदि वह बहुमत सिद्ध कर अपनी जगह जमी रहती है तो वो भी एक तरह से सही ही होगा क्योंकि जनता तो अपने प्रतिनिधियों को पूरे पांच वर्ष के लिए ही चुनकर भेजती है.

कोई समय इसलिए भी सही होता है कि सही पार्टी की सही सरकार बनती है. पहले जो सरकार रहती है वह भी सही ही होती है। लेकिन वह अपने समय पर सही पार्टी की होती है।  वर्तमान  सरकार चूंकि सही वक्त पर चुनकर आई है इसलिए एक सही सरकार है.

चूंकि सरकारें हमेशा सही होती हैं इसलिए उनकी नीतियाँ भी सही होती हैं , सरकारें हमेशा सही फैसला लेती हैं. निर्णय भी सही होते हैं.

विपक्ष भी सही होता है. सरकारों के निर्णयों का विरोध करके वह बिलकुल सही काम करता है.  सही तरह से यदि विपक्ष अपना दायित्व नहीं निबाहेगा तो सरकार को कैसे सही किया जा सकता है. सरकार को सही रखने के लिए विरोधियों को भी सही कार्य करते रहना पड़ता है. सही फैसलों का विरोध भी विपक्ष के नाते सही है और जो सही नहीं हो रहा है उसे सही किये जाने के लिए आवाज उठाना भी बिलकुल सही होता है.

कहते हैं कि पिछली सरकार के वक्त बहुत घोटाले हुए, भ्रष्टाचार हुआ. सही कहते हैं आप. सही हुआ कि यह सब पहले हो गया. जागरूकता आई और अब ध्यान रखा जा सकता है कि ऐसा दोबारा न हो. यह एक सही सावधानी है. कभी सार्वजनिक क्षेत्र और राष्ट्रीयकरण को सही माना गया अब जब निजी हाथों में विकास की कुदाली थमाई जाने की पहल दिखाई देती है. यह भी सही है. जब सरकारी मशीनरी सही नहीं रहे तो प्रायवेट सेक्टर को आगे बढ़ाना भी सही कदम है. नगर पालिकाएं सड़कें बनाती थीं, बत्तियां जलाती थीं बस्तियों में रात को. सफाई करवाती थी गटरों की,मोहल्लों की , सही करतीं थीं. अब ऐसे कामों में जनभागीदारी सुनिश्चित की जाती है. यह भी सही किया जाता है, इससे आम शहरी में सही नागरिक होने की भावना और दायित्व का प्रादुर्भाव होता है. सही सोच का विकास होता है. देश प्रदेश प्रगति की सही दिशा में आगे बढ़ता है.

वह भी सही था जब लोग आपस में मिला-जुला करते थे, सामाजिक रूप से एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होते थे. घर में शकर ख़त्म हो जाती तो पड़ोसी से मांग लेते थे, कोई बीमार पड़ता तो चचेरा भाई अस्पताल लिए जाता था. हर काम के लिए चलकर जाते तो काम के साथ व्यायाम भी हो जाता था. सब कुछ सही होता था. अब भी सही ही है कि सब कुछ ऑनलाइन हो जाता है. शकर की बात तो दूर कमबख्त पड़ोसी का मुंह तक नहीं देखना पड़ता. एक फोन करते ही दुनिया भर का किराना और सामान घर पर हाजिर. डिजिटल इंडिया की दिशा भी सही है. मोबाइल के नंबर दबाते ही सारी समस्याओं का समाधान संभव. न घर की न खेत की. न बीज की चिंता न दवाइयों की. सही है बिलकुल सही है विकास की यह राह भी.  सही नहीं भी होगी तो दुनिया कौनसी इतनी बड़ी है जो सही लक्ष्य तक पहुंचा न जा सके. मनुष्य के जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण रखना सदियों से हमारा दर्शन रहा है. किसी ने कहा भी है- ‘जो हो रहा है वह सही हो रहा है और जो सही नहीं हो रहा समझो वह और ज्यादा सही हो रहा है.’

भले ही आप मुझे बेहद लचर या गोबर व्यक्ति कहें, सच तो यह है कि अब ‘गलत’ कहना बहुत कठिन और जोखिम भरा काम है. इसके बोलने से दुःख-संताप बढ़ता है, सुख और आनंद में कमी आती है. एक बैल हमारी ओर सींग लहराता आता दिखाई देने लगता है. जो बाद में एक भीड़ में बदल जाता है.  यही कारण है कि मैंने अब ‘गलत’ कहना छोड़ दिया है. एक बार फिर दोहराता हूँ- जो कुछ हो रहा है वह सब सही हो रहा है...गलत तो कुछ होता ही नहीं.

आपका दोस्त
सहीराम हिन्दुस्तानी  

Tuesday, March 17, 2020

रंगपंचमी के रंग, दफ्तर के संग

हास्य-व्यंग्य संस्मरण
रंगपंचमी के रंग, दफ्तर के संग
ब्रजेश कानूनगो

हमारे दफ्तर के सबसे वरिष्ठ सदस्य जीवनबाबू वैसे तो लगभग सेवानिवृत्ति के करीब थे लेकिन इस उम्र में भी उनका उत्साह किसी नौजवान से कम नहीं था. कठिन से कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी सहजता बनी रहती थी बल्कि अपने कार्य कलापों से वे माहौल को बहुत हल्का फुल्का बना दिया करते थे. उनकी उपस्थिति मात्र से महफ़िल में रोनक आ जाती थी. खूब चुटकुले सुनाते और सबको मुक्त कंठ से ठहाके लगाने को विवश कर दिया करते थे.

खासकर रंगपंचमी के दिन उनका जो रूप देखने को मिलता था वह कभी भुलाया नहीं जा सकता. दरअसल हमारा दफ्तर राष्ट्रीयकृत बैंक की एक शाखा थी जहां धुलेंडी को तो सार्वजनिक अवकाश होता था किन्तु रंग पंचमी को दफ्तर लेनदेन के लिए खुला रहता था. पूरा शहर जब रंगों में डूबा रहता हम बैंककर्मी अपना लटका हुआ चेहरा लिए किसी भंगेड़ी,नशेड़ी, रंगपुते इक्का-दुक्का ग्राहक के इंतज़ार में  दोपहर तीन बजे तक बही-खाता खोलकर बैठे रहते. ऐसे में जीवन बाबू ही हमारा एकमात्र सहारा होते थे जो अपने दिलचस्प  किस्सों से हमारा मन बहलाया करते थे.

तीन बजते बजते जीवनबाबू चुपचाप भांग-प्रसादी ग्रहण करके पूरे मूड में आ जाते थे. ग्राहकीय समय ख़त्म होने पर धीरे-धीरे हम सब पर भी होली का रंग चढने लग जाता.

शाखा भवन से बाहर निकलने से पहले ही साथीगण एक दूसरे के कपड़ों पर चुपके चुपके हरी, नीली और लाल स्याही लगाने लग जाते. इस प्रयोजन से इंकपेड और रबर की मोहरों का भी खूब उपयोग होने लगता. जीवनबाबू रंगपंचमी को विशेषरूप से धवलवस्त्र धारण करके आते थे. उनके सफ़ेद झक्क कपड़ों पर रंग बिरंगी स्याही से बैंक की मोहरें ठप्पित कर दी जातीं. जीवनबाबू एक तरफ से ‘एकाउंट पेयी’ हो जाते तो दूसरी तरफ से ‘केश पेड’. पायजामें का पिछला हिस्सा किसी लिफ़ाफ़े की तरह ‘रिसिव्ड’ और कुरते का अग्र भाग ‘डीलिवर्ड’ हो जाता था. दिलचस्प तो यह होता कि इसके पश्चात जीवनबाबू मुस्कुराते हुए स्वयम एक मोहर अपने कपड़ों पर लाल स्याही से लगा लेते वह होती थी ‘आल अवर स्टेम्स आर केंसल्ड’ याने हमारी सभी मोहरें निरस्त की जाती हैं.

दफ्तर के बाहर निकलकर थोड़ा अबीर गुलाल से होली खेली जाती लेकिन बाद में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो ही जाती थी. बैंक भवन के बाहर पानी का एक बड़ा फव्वारा बना हुआ था जिसमें जीवनबाबू के निर्देशन में रंग घोल दिया जाता था. फिर एक दूसरे को उस ‘रंग कुंड’ में समर्पित करने का सिलसिला शुरू हो जाता. रंगपंचमी के दिन दफ्तर आते समय शहर की बस्तियों और चौराहों पर रखे कढावों में फैंके जाने से बचकर भले आ गए हों मगर दफ्तर के उस रंगकुंड से बचना बहुत मुश्किल हुआ करता था.

एक के बाद एक सबको रंगकुंड में स्वाहा किया जाने लगता तो कुछ लोग स्वयं ही फजीहत से बचने के लिए भीतर छलांग लगा देते. देखते ही देखते उस बड़े फव्वारे के होज में पानी से ज्यादा मुंडियां दिखने लगती, जैसे तालाब में रंगबिरंगे कमल खिले हों. जब काफी मटरगश्ती करने के बाद सब थक जाते तो धीरे धीरे बाहर निकल कर जमीन पर बैठकर सुस्ताने लगते.

जीवनबाबू सबसे आखिर में बाहर आते. एक बार तो काफी देर तक जब बाहर नहीं आये तो सबको चिंता हो गयी. उन्हें खींचकर बाहर निकाला गया तो वे फिर कूद गए. दोबारा निकाला तो फिर कूद गए. उनका चेहरा भी कुछ उतरा हुआ सा लग रहा था. सब चिंता में पड गए कहीं भांग ज्यादा तो नहीं चढ़ गयी उन्हें? लेकिन अगली बार जब वे कुंड से बाहर निकले तो चिपरिचित अंदाज में कहने लगे ‘क्यों इकन्नी कर रहे हो यार ! बत्तीसी गिर गयी थी पानी में, उसे ही ढूंढ रहा था.’ फिर तो जो ठहाके लगे थे उसे याद कर अभी भी चहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है.

उधर भवन के केन्टीन में ठंडाई और पकोड़ी आदि बनती रहती थीं. नाश्ते के इंतज़ार में तुकबन्दियाँ ,चुटकुले , गीत गजल गायन होता. जीवनबाबू भांग के खुमार में दार्शनिक हो जाते. उनकी कुछ बातें अब तक याद हैं...आज आप भी मजा लीजिये...उन्होंने कहा था...’यार हम इंसानों से तो ये गधे कितने समझदार हैं जो सबका एक ही नाम रखते है,ये ‘गधे’ इनके पिता ‘गधे’ और प्रपिता भी ‘गधे’..... और ‘ये भी बड़ी चिंता है यार कि जब इस संसार से आख़िरी व्यक्ति मरेगा तो उसे कंधा कौन देगा..?’
तो जनाब! ऐसी होती थी हमारे दफ्तर की रंगपंचमी.

ब्रजेश कानूनगो
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दिल्ली नहीं बिल्ली के दर्द की दास्तान

दिल्ली नहीं बिल्ली के दर्द की दास्तान
ब्रजेश कानूनगो

मुझे पता नहीं वे दोनों कहाँ से पलायन करके हमारे यहाँ शरण लेने आये थे. उनमें से एक थोड़ा गबरू था और उसके चहरे पर काली गहरी धारियां थी. देखकर ही लग जाता था कि वह ‘नर’ रहा होगा. जो दूसरा प्राणी था वह पहले वाले से कुछ उजला भूरा रंग लिए था, पहले के मुकाबले उसका शरीर नाजुक और पतला देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि वह ‘मादा’ रही होगी. रही क्या वह मादा ही थी. किसी नव विवाहित दंपत्ति की तरह इन दोनों ने हमारे गैरेज में अपनी गृहस्थी बसा ली थी. बिल्लियों के इस जोड़े से हमें भी कुछ लगाव सा हो गया था इसलिए बीच बीच में गैरेज में जाकर उनकी खैर खबर भी ले आते थे. उनके आ जाने से चूहों का आतंक भी थोड़ा कम होने लगा था. कुछ दिनों में जैसे वे हमारे परिवार का हिस्सा ही हो गए थे.

बिल्ला दोपहर को दिखाई नहीं देता था लेकिन शाम को लौट आता था. बिल्ली घर पर लम्बे समय से गैरेज में पार्क हमारे प्रवासी बेटे की कार के नीचे सुस्ताती रहती, कभी बाहर निकल कर बरामदे में चहल कदमी भी कर लेती थी. उनके साथ समय बिताने से हमारा दोपहर को टीवी देखना भी कम हो गया था. बिल्ली को देखकर लगता था वह निश्चित ही गर्भवती रही होगी. एक दिन अचानक बिल्लियों का वह जोड़ा हमारे घर से गायब हो गया. हम दोनों पति-पत्नी को उनका यह अभाव बहुत दुखी कर गया. उनके आ जाने के बाद जो हमारा एकाकीपन थोड़ा कम हो गया था वहां फिर से उदासी पसरने लगी थी. बहरहाल, स्थितियों से समझौता करना इतना मुश्किल भी नहीं होता. थोड़े समय में हम उनके संग-साथ को भुला चुके थे.

दरअसल इस सत्यकथा में ट्विस्ट तो तब आया जब कोई एक माह पश्चात वही बिल्ली फिर से लौट आई. इस बार उसके साथ गहरी धारियों वाला बिल्ला नहीं था. अपने जबड़ों में वह एक प्यारा और मुलायम सा ‘बिल्ला शिशु’ थामें हुए थी. अपने बच्चे को बरामदे के फर्श पर छोड़कर वह हमारी ओर ऐसे देखने लगी जैसे खुशी से कह रही हो - ‘देखो, मैं किसे लेकर आई हूँ आपके पास.’

सुबह सुबह नियमित सैर को निकलने वाले पड़ोसी ने बताया था कि कॉलोनी के आवारा कुत्तों ने बिल्ली के साथी गबरू बिल्ले पर एक सप्ताह पहले हमला कर दिया था. किसी तरह बिल्ली अपने नवजात को उनके खूंखार पंजों से बचाती हुई हमारे या यों कहें अपने घर लौट आई थी. हमारे घर में फिर रौनक लौट आई थी. छोटे से बच्चे को हम बड़ा होते देख रहे थे. माँ की उपस्थिति में कभी गेरेज से निकलकर वह बरामदे के फर्श पर लौट लगाता था तो भोजन की तलाश में माँ के बाहर निकलने पर गमलों के पीछे दुबक कर दोपहर की नींद निकाल लेता. गैरेज में रखी कार के टायरों पर चढ़कर मस्ती करना उसका प्रिय खेल हो गया था.

बच्चा देखते ही देखते बड़ा होने लगा था. हम दोनों पति-पत्नी और वो दोनों माँ-बेटा बहुत हंसी खुशी अपना समय बिता रहे थे कि अचानक एक जलजला आया और बिल्ली की दुनिया फिर उजड़ गयी. कुत्तों के समूह ने फिर हमला किया था शायद. इस बार बिल्ली अपने बच्चे के बिछोह में बहुत ग़मगीन नजर आई. लम्बे समय के साथ ने हमें बिल्लियों की खुशी और रुदन को समझने योग्य बना दिया था.

दुखी बिल्ली की उदास पुकार से हमारे ह्रदय भीग रहे थे...रो रहा था हमारा मन..... बल्कि हमारा मन तो दोहरी पीड़ा और व्यथा से छलछला रहा था. यह संयोग ही नहीं दुर्भाग्य भी  था कि हमारी प्यारी बिल्ली के साथ हमारी दिलकश दिल्ली की छाती भी दुखों से छलनी हो रही थी.
मैं जानता हूँ इस दुखभरी दास्ताँ का उन लोगों पर कतई प्रभाव नहीं पड़ने वाला जिनकी आत्मा न बिल्ली के दर्द पर पसीजती है और न ही दिल्ली के क्रंदन से.


ब्रजेश कानूनगो

Thursday, July 18, 2019

की फरक पैंदा जी !


व्यंग्य
की फरक पैंदा जी !

किसी के कुछ भी हो जाने को कोई अब रोक नहीं सकता। न ही किसी को कोई फर्क पड़ता है कि वह क्यों कर ऐसा हो गया। वो जमाना लद गया जब बाप गुस्से में आग बबूला होते हुए माँ पर आँखें तरेरता हुआ चीख उठता था- 'सुनती हो भागवान! तुम्हारा लाडला 'आवारा' हो गया है।'

समय समय की बात है। अब बेटा हत्यारा हो जाए तो भी बाप के माथे पर शिकन तक नहीं आती। ‘न्यू इंडिया’ का नया बाप जानता है कि बेटा अब 'भारत' नहीं रहा। भारत के भीतर के ‘प्रेम’ और आदर्शों को वक्त नें 'प्रेम चोपड़ा’ ने बदल कर रख दिया है।

‘मदन’ का चाकू 'पुरी' हो या 'भटिंडा' कहीं भी खुले आम अपने जलवे दिखा सकता है। अब कोई ‘बलराज’ अपने बेटे को ‘परीक्षित’ का तमगा लगवाना नहीं चाहता। नए जमाने मे सब बेटे बिना मेहनत किये 'अजेय' बने रहना चाहते हैं। कोई बाप उन्हें बदलने का दुस्साहस चाहकर भी कर नहीं सकता। यह मजबूरी है माँ बाप की। दौलत और जायदाद के लालच में बाप की जान को बेटे की लायसेंसी बन्दूक से खतरा है।

खतरा तो बाप से बेटी को भी हो गया है। अब ‘ओमप्रकाश’ या ‘नाजिर हुसैन’ से भावुक बाप भी कहाँ देखने को मिलते हैं। ‘जीवन’ दादा और ‘के एन सिंह’ के क्लोन मुहल्ले मुहल्ले बेटा बेटियों पर अत्याचार में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

बात केवल घर परिवार की ही नहीं है। बदलाव की यह प्रवत्ति इससे आगे बढ़कर नागरिक समाज की रगो में प्रवेश कर चुकी है। लोग क्या हो जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। अच्छा भला आदमी न जाने कब रूप बदलकर भेड़ में बदल जाए और किसी गड़रिये के पीछे पीछे  भेड़ों का कोई झुंड लहलहाती खुशहाल फसल को बर्बाद कर दे। गड़रिये को चतुर लोमड़ ‘कन्हैयालाल’ या खूंखार लॉयन ‘अजीत’ हो जाने से कोई रोक नहीं सकता।

अब कोई कभी भी शेर हो सकता है, गधा, बन्दर, चूहा भी हो सकता है। भैंस भी हो सकता है। कोई भरोसा नहीं रहा कि कौन कब क्या हो जाए। भरोसे की भैंस पाड़ा जने या फिर कीचड़ में उतर कर मजे करे, किसी को क्या फर्क पड़ने वाला। नेता अभिनेता हो जाए, अभिनेता अर्थशास्त्री, योगाचार्य व्यवसायी,पड़ोसी थानेदार, टीवी एंकर जज में बदल जाए... यारां ! की फरक पैंदा जी!!

अब लेखक खुद ही अपने को ‘परसाई’ समझने लगे तो पाठकों को क्या फर्क पड़ने वाला है। वाट्सएप यनिवर्सिटी से कितने ही नए ‘गुलजार’,’नीरज’, ‘बच्चन’ और ‘अटल बिहारी’ निकलकर आ रहे हैं। अब कोई प्रदीप के गीत को बीन की तरह सुन रहा हो तो जरूरी नहीं कि वह रसिक श्रोता ही हो। वह रूपांतरित इच्छाधारी भैंस भी हो सकती है। क्या फर्क पड़ता है इससे किसी को।