Wednesday, April 5, 2017

माफी नहीं मुक्ति का मार्ग


व्यंग्य 
माफी नहीं मुक्ति का मार्ग अपनाइए  
ब्रजेश कानूनगो
 

यदि कोई व्यक्ति कुछ ऐसा कार्य करता है जो किसी के प्राकृतिक और वैध सुख में बाधा डालता हो, देश के कानून का उलंघन करता हो या सामाजिक मान्यता से  पाप और संवैधानिक रूप से अपराध की श्रेणी में आता हो, वह व्यक्ति दंड का भागीदार है। अब ये और बात है कि कभी कभी उसे माफ भी किया जा सकता है।

कर्ज लेने वाले किसान अपराधी नहीं होते हैं। कर्ज लेकर उन्होंने कोई पाप भी नहीं किया होता है,बल्कि वे अपने खून,पसीने से अनाज के दाने सींच कर समाज में सुखों की फसल खड़ी करते हैं। कर्ज लेना उनकी विवशता जरूर हो सकती है।

सरकारें भी स्थितियों के दबाव में व्यापक  'कर्ज माफी' जैसे निर्णय लेने को विवश हो जाती है।किसानों को भी 'कर्ज माफी' जैसी प्रक्रिया से गुजरना होता है। किसानों के दुख दर्द दूर करने की इस अस्थायी पहल का कदापि गलत नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन मेरी आपत्ति इस मामले में  'माफी' शब्द के भाषिक प्रयोग को लेकर है।


जो लोग यह समझते हैं कि 'कर्ज माफी' से समस्या से 'मुक्ति' मिल जाएगी वे भ्रम में पड़े हैं। 'अम्मी' और 'मम्मी' की तरह दोनों एक नहीं है। 'माफी' और 'मुक्ति' में खासा अंतर होता है।

मुक्ति' का हमारे संस्कारों में बड़ा आध्यात्मिक महत्व रहा है। इस शब्द से पवित्रता की सुगंध बिखरती है। संसार से मुक्ति के बाद आदमी इस दुनिया की गंदगी को छोड़कर ईश्वर में विलीन हो जाता है। बुरा से बुरा व्यक्ति देह मुक्ति के बाद आदरणीय और पूजनीय होने की अभिलाषा में तड़पता रहता है। कुछ अच्छे और भले बुजुर्ग जिन्हें होनहार संतानें वृद्धाश्रमों में भर्ती कराकर अपना वर्तमान सुखद बनाने  का प्रयास करते हैं, वे भी देह मुक्ति के बाद मोतियों की माला पहनकर अपनी  संतति को दुआओं से नवाजते हैं।

यही कारण है कि इसी आध्यात्मिक और पवित्रता को ध्यान में रखकर हमारे यहां 'मुक्ति' शब्द का अधिकाधिक  प्रयोग करने की कोशिश रहती आई है। स्वतंत्रता संग्राम के व्यापक 'फिरंगी मुक्ति' आंदोलन के बाद 'गरीबी मुक्ति' पर हमारा जोर रहा। इसी बड़े उद्देश्य को  लेकर कई मुक्ति अभियान चलते रहे हैं।

'मलेरिया, चेचक,पोलियो मुक्ति' के अलावा और भी प्रयास हुए हैं। हम एक बुराई से देश को मुक्त करते हैं, रावण के सर की तरह फिर नया अभिलाषी मुक्ति की कामना लिए सामने आ खड़ा होता है- ये लो, में आ गया।, फिर उससे मुक्ति के उपायों में जुट जाते हैं. यह एक निरंतर प्रक्रिया है.  

आप खुद समझदार हैं सो थोड़े कहे में ज्यादा समझने की काबिलियत आप में है।माफी से किसानों और कर्जदारों के दुख दूर होते हैं। मुक्ति अभियानों में प्रायोजकों, अभिनेताओं,बिचौलियों और अधिकारियों की भी चांदी होती है। काम ऐसा हो जिसमें सबका भला हो। 

बाबा कबीर कह गए हैं ' ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय।' 'मुक्ति' में भी ढाई अक्षर हैं और 'प्रेम' में भी। देश को विश्व का पंडित(गुरु) बनाने के लिए बहुत आवश्यक है कि हम 'मुक्ति' को प्रेम पूर्वक आत्मसात करें। मुक्ति मार्ग सबके कल्याण का पथ होता है। 'मुक्ति' शब्द में विवश व्यक्ति के कल्याण का भाव है,जबकि 'माफी' में अपराधी को 'माफ' कर देने की राजसी प्रवत्ति का बोध होता है। जरा सोचिए!!  

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाड़िया रोड, इंदौर 452018

मुक्तिमार्ग और उसका माहात्म्य

व्यंग्य
मुक्तिमार्ग और उसका माहात्म्य  
ब्रजेश कानूनगो 
 
ज्यादातर शहरों में जो गलियां और रास्ते श्मशान की दिशा में जाते हैं उन्हें 'मुक्ति मार्ग' कहा जाता है। इन रास्तों के नामकरण के संदर्भ में कभी विवाद पैदा नहीं होते।   'कबीर मार्ग' या 'रैदास मार्ग' जैसा यदि कुछ पुराना नाम हुआ भी तो वह अपने आप कालांतर में  'मुक्ति मार्ग' नाम में रूपांतरित हो जाता है। 


श्मशान की दिशा में जाने वाले रास्ते के नामकरण में कभी कोई बांदा या लफडा नहीं पड़ता।  अन्य सडकों के मामले में नगर पालिका और प्रशासन एक बड़ी झंझट में उलझ जाते हैं। 'धड़कन साहित्य समिति' का आग्रह रहता है कि अमुक मार्ग का नाम 'महादेवी पथ' रखा जाए, वहीं 'भभूति भजन मंडली' का दबाव बनता है कि मार्ग का नाम 'भोलेनाथ' पर होना चाहिये। उनका कहना भी ठीक है।  शिवमंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते का नाम लोगों का कल्याण करने वाले भगवान शिवशंकर के नाम पर नहीं होगा तो क्या किसी सेठ जी के नाम पर होगा। जबकि मंडी व्यापारी संघ चाहता है नामकरण नगर के प्रतिष्ठित दाल व्यवसायी के पितामह 'लच्छू सेठ' के नाम पर हो. भले ही  संघ उनके नाम पर पूर्व में बनी धर्मशाला में हुई आर्थिक गडबडियों का केस अदालत में लड़ रहा हो, लेकिन कोशिश यही रहती है कि सड़क को  प्रातः स्मरणीय समाजसेवी  'सेठ लक्ष्मीनारायण मार्ग ' के नाम पर ही पुकारा जाए।

वैसे नामकरण से होता भी क्या है. रज्जब अली खां मार्ग पर रहने वाले स्वयं नहीं जानते कि खां साहब के संगीत की दुनिया में कैसे जलवे हुआ करते थे. रवीन्द्रनाथ टैगौर मार्ग किसी शोपिंग माल के नाम से जाना जाता है. अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी के नाम पर बने एमजी रोड पर कई शहरों में हलाल और झटके का मटन बिकता रहता है. की शहरों के मुक्ति मार्गों पर एक अलग तरह का कारोबार सेट हो चुका है. जहां गमछों,टोपी, टॉवेल से लेकर कुंकू और म्रत्यु को प्राप्त हुए भले मानुष पर उड़ाने के लिए चिल्लर तक की दुकानें खुली हैं. कुछ लोगों ने भूख को मृत्यु से भी ऊपर स्थान देकर नाश्ते की दुकाने जमा ली हैं. ‘मुक्ति पथ के मूंग बड़े’ से लेकर ‘परम धाम पूड़ी सेंटर’ तक.

बहरहाल हम बात मुक्ति मार्ग की ही करते हैं. जिस तरह किसी ख़ास विचारधारा  या दर्शन के अनेक पंथ और उप धाराएं होती हैं या राजनीतिक दलों के कई अनुषंगी सेवा प्रकल्प होते हैं उसी तरह मुख्य मुक्ति मार्ग से जुड़ी गलियों को भी मुक्तिमार्ग गली नंबर एक, दो, तीन आदि के रूप में मान्यता मिलती जाती है। इसी पते पर गांव में शेष बचे  बुजुर्गों की देह मुक्ति का समाचार लाकर डाकिया भी कोने कटे पोस्ट कार्ड को ईमानदारी से डिलीवर करके, एक बड़ी राष्ट्रीय  जिम्मेदारी से मुक्त होता रहता है।


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर 452018



Friday, March 31, 2017

डर को जीवन मूल्य बनाइए

व्यंग्य
डर को जीवन मूल्य बनाइए 
ब्रजेश कानूनगो 

ऐसा व्यक्ति ढूंढ निकालना बड़ा मुश्किल काम है जो नितांत  निर्भय हो। जहां किसी परिंदे ने डर के डैने  कभी फड़फड़ाये ही नहीं हों। हर प्राणी किसी न किसी चीज से डरता है। कोई तो यह कहने तक से डरता है कि वह निडर है।कल से कह दिया और दुम दबाकर भागने की नौबत आ जाए तो फिर क्या होगा।

बहरहाल, डरना हमारा प्राकृतिक गुण है,सबके स्वभाव में थोड़ा बहुत शामिल है। डर है, तो डराने वाले भी हैं। हमेशा से दो तरह के हमारे हितैषी रहे हैं। एक वो जो डराने जैसा पुण्य का काम करते हैं, ताकि यह डर भाव जो सर्वदा प्रकृति प्रदत्त है कायम रह सके। दूसरे वे होते हैं जो डबल पुण्याई करते हुए सचेत करते हैं कि भाई डरो मत। दोनों तरह के लोग हमारे कल्याण के लिए ही सोचते हैं। ये तमाम व्यवसायी हमारी डर सम्पदा का दोहन करके लाभ कमाते हैं।इनके गिरगिटिया हितोपदेश में आत्महित अधिक समाया होता है।

जैसे ही वक्त बदलता है, ये अपनी भूमिकाएं बदल लेते हैं। डराने वाले डरो मत, डरो मत का उद्घोष करने लगते हैं और  निर्भयता की सब्सिडी  देने वाला, रंग बदल कर खुद डराने लग जाता है।

ये लोग यह जताने में सफल भी हो जाते हैं  कि इनमें लोकोपकार की भावना कूट-कूट कर भरी है। ये भलीप्रकार जानते हैं कि किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के अस्तित्व की तरह किसी भी व्यक्ति को भय मुक्तनहीं बनाया जा सकता। भय समस्त प्राणी मात्र का स्थायी भाव है, इसी भाव को ये भरपूर भाव देते हैं और लोकतंत्र की मंडी में ऊंचे भाव पर इसकी बोली लगा देते हैं.   

दरअसल, जो डराते हैं, वे हमारे हितैषी हैं।डरने के बाद ही आदमी मजबूत होता है। उसके भीतर साहसी हो जाने की आकांक्षा बलवती होने लगती है। असीम शक्ति का संचार होता है,और अधिक बड़ी और भयावह स्थितियों से निपटने की क्षमता विकसित होने लगती है। अब देखिये, बरसों तक केरोसिन और राशन की कतार में लगने की आदत और अनुभव ने हमारी कितनी मदद की है  कि नोट बंदी की राष्ट्रीय बेला में  निहायत अनपेक्षित बैंकों की दैत्याकार लाइन में लगने की भयावह स्थितियों का हम निडर होकर सामना कर पाए। चालीस पैंतालिस वर्षों तक छोटे-मोटे घोटालों के भय से डरते हुए पिछले वृहद घोटालों को हमने हंसते-हंसते सहन कर लिया। जाली नोटों के बार बार उजागर होते बड़े बाजार ने भी अब हमारा डर कितना कम कर दिया है कि ए टी एम से चूरन वाले नोट निकलने पर हम बस मुस्कुराकर रह जाते हैं।

डर के आगे जीत है। यदि विजेता बनना चाहते हैं तो डर का सामना करना होगा। डर होगा तब ही आदमी डरेगा। यदि डर ही नहीं होगा तो वह किससे डरेगा। डर पर विजय के उसके संघर्ष का क्या होगा? संघर्षों से ही जीत का सच्चा आनन्द मिलता है। बिना डरे कुछ हासिल हो जाए तो मजा नहीं। इसलिये डर भी जरूरी है,डरना भी जरूरी है। डर से मुक्ति का संघर्ष भी जरूरी है।

डर का कोहरा छटने के बाद सूरज के दर्शन होते हैं। डर रात का अँधेरा है, सुबह उजियारा लाती है।सूरज की रौशनी में सब साफ़ दिखाई देने लगता है।क्या मोहक है और क्या डरावना है।अँधेरे में तो सुंदर भी खौफ़नाक हो जाता है।खुद आदमी अपने अक्स से डर जाता है। भय से भयभीत मत होइए । इसका स्वागत कीजिये। भय से कैसा डर? आचार्य गब्बर सिंह कह गए हैं-'जो डर गया, समझो मर गया।' निर्भय होकर डर से दो-दो हाथ कीजिये।



ब्रजेश कानूनगो

503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018 

Thursday, March 23, 2017

सफलता का दो अक्षरी सिद्धांत

व्यंग्य
सफलता का दो अक्षरी सिद्धांत 
ब्रजेश कानूनगो

एक से भले दो, दो से भले तीन। इसी तरह बहुत पुरानी कहावत है ' तीन तिगाड़ी,बात बिगाड़ी'। निश्चित रूप से ये बातें बहुत अलग संदर्भों में कही गयी होंगी। हमारा संदर्भ थोड़ा अलग है।

हम शब्दों के उद्घोष और उनके प्रभावोत्पादन को लेकर गैर सांगीतिक , गैर व्याकरणीय और गैर वैज्ञानिक स्तर पर यहां चर्चा करना चाहते हैं। बौद्धिक और अकादमिक की बजाय मीडिया चैनलीय विश्लेषण को हम प्राथमिकता में रखेंगे।जिसमे एंकर को विषयगत विशेषज्ञता की ख़ास जरूरत नहीं होती। बस उसी तर्ज पर इस आलेख को आगे बढ़ाने का छोटा सा प्रयास है।तो मुलाहिजा फरमाइये।

मैंने महसूस किया है, बड़े शब्दों की बजाय सामान्यतः जन सामान्य के लिए दो अक्षरों वाले शब्द  ही सुविधाजनक रहते हैं। तीन या अधिक अक्षरों वाले शब्द  संबोधन में भी दो अक्षरों वाले शब्दों में बदल दिए जाते हैं।मसलन श्यामसुंदर 'शामूमें और दीनदयाल 'दीनू' में बदलते रहे हैं। जयकिशन 'जैकी' और मनोरमा 'मुन्नी' हो जाती है।

नारे वारों में भी जिस तरह  दो अक्षर वाले शब्द खिलते हैं  वैसे तीन चार अक्षरों वालों में उतना मजा नहीं आता। कुछ ख़ास सभाओं में जो भारी भीड़ उमड़ती रही  है,उसके पीछे भी वही दो अक्षरों वाले शब्दों की ख़ास  गूँज रही है।पूरे वायुमंडल में अदृश्य ध्वनि तरंगें इस तरह व्याप्त हो गईं कि उनके प्रभाव से बचा नहीं जा सकता।

आपने सुना ही होगा कि ध्वनियों को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता, बस उनका स्वरूप अवश्य बदल जाता है। अदृश्य ध्वनियों की उपस्थिति और  ये विकिरण प्राणी मात्र के मस्तिष्क को प्रभावित करता रहता है। घंटा ध्वनि और ओंकार नाद के संदर्भ में तो यह सर्व स्वीकृत है ही कि मानसिक,शारीरिक,पर्यावरणीय शुद्धता में इनकी बड़ी भूमिका होती है। 

दो अक्षरों वाले 'राम,राम' को उच्चारित करते हुए हमारे यहां अनपढ़ के भी  प्रकांड पंडित हो जाने के उदाहरण रहे हैं। 'राधे-राधे' कहते हुए संसार के कष्टों और दुखों से मुक्ति का रास्ता खुल जाता है।ये कुछ उदाहरण मात्र हैं,आप चाहें तो आगे व्यापक चिंतन के लिए ध्यान लगा सकते हैं।

मुझे लगता है देश में जो विपक्ष विनाशक हवा चली है इन दिनों, उसमें इस 'दो अक्षर सिद्धांत' का भी योगदान रहा होगा।
जो रिदम और प्रभावोत्पादकता  'मोदी-मोदी' या 'योगी-योगी' में है वह सोनिया,राहुल या केजरीवाल शब्दों में कहाँ! पीके जैसे लोगों को आगामी चुनावी योजनाएं बनाते समय इस सिद्धांत पर भी पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। विचार करने में हर्ज ही क्या है। 

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क, कनाड़िया रोड, इंदौर-452018

Friday, March 17, 2017

शिकायत है तो घंटा बजाइये

व्यंग्य

शिकायत है तो घंटा बजाइये 
ब्रजेश कानूनगो

एक होता है घंटा ! एक होती है घंटी। मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो या अचर वस्तु, हर  जगह लिंग भेद विद्यमान होता ही है। स्त्रीवाचक और पुरुषवाचक संबोधन  जरूर मिलता है मगर पितृसत्ता का बखेड़ा अचर में है या नहीं, इसके बारे में ज्यादा जानकारी मुझे नहीं।

बहरहाल, बात घण्टा-घण्टी की ही करते हैं। दोनों ही बजाने के काम आते हैं। एक तरह से इन्हें वाद्य यंत्र की श्रेणी में माना गया है। यही एक मात्र म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट है जिसे प्ले करने के लिए किसी उस्ताद से ताबीज नहीं बंधवाना पड़ता है। गाइड के घर की सब्जियां वगैरह बाजार से लाये बगैर भी आप इस कला में पीएचडी कर सकते हैं।

सामान्यतः भारतीय परिवारों में बच्चे के अपने पैरों पर खड़ा होते ही उसे हनुमानजी की मूठ वाली घंटी थमा दी जाती है।सब यही करते हैं। हमने भी यही किया। घर के बुजुर्ग जब चित्रगुप्त भगवान की तस्वीर सजाकर कलम दवात की पूजा करते थे तब हम भी घण्टी बजाया करते थे और अब एस्टेट में पैदा हुआ पोता भी घण्टी थामें उसे प्ले करता है।

दफ्तरों में साहब के सामने रखी घंटी का महत्व कौन नहीं जानता। उनके उद्घोष से कहीं प्रभावी उनकी घण्टी हुआ करती है। कक्ष के बाहर सेवक चौकन्ना सदैव कान लगाए उसी तरह बैठा रहता है जैसे शिव मंदिरों में नंदी विराजमान होते हैं। काम के लोग तो यही होते हैं। इन्ही लोगों को अपना कष्ट कह कर समाधान की राह आसान हो जाती है। इसीलिए पहले घण्टी बजती है, फिर याचक  द्वारपाल के कान में समस्या फूंकता है।

जो याचक है,पीड़ित है, परेशान है उसे घंटा बजाना आना चाहिए। बड़े-बूढ़े इस कला का महत्व जानते थे। इसलिए नई पीढ़ी को घण्टी बजाने के लिए अभ्यस्थ करने की हमेशा उनकी कोशिश रहती थी। मालिक का ध्यान घण्टी की ध्वनि के प्रति सदा सेंसिटिव होता है। 
राजा को भी प्रजा का धरती पर मालिक और भगवान कहा गया है। कुछ शासकों ने तो अपने प्रासादों के सामने घंटे लगवा रखे थे। कोई भी नागरिक कभी भी 'ट्वेंटी फॉर सेवन' अपने कष्टों की सुनवाई के लिए सरकार की नींद खराब कर सकता था। ये शानदार सवेंदनशील  परम्परा रही है हमारी।

अब चूंकि देश बदल रहा है। दुनिया भी बदल रही है। राजतंत्र ने गणतंत्र का रूप ले लिया है। प्रजा अब वोटर में बदल गयी है। घण्टे और घंटियों का भी डिजिटल रूपांतरण हुआ है। सोशल मीडिया जैसे नए सुनवाई प्रतिष्ठानों में ट्वीट्स और स्टेटमेंट की घंटियाँ प्रतिध्वनित होने लगीं हैं। सच तो यह है कि इन्ही के नाद से सरकारों में हलचल भी सहजता से देखने को मिलने लगी है। कितना महत्व होता है घण्टे,घंटियों का, यह आसानी से समझा जा सकता है। घंटियाँ बजाने में कोताही नहीं की जानी चाहिए. बजाइए! बजाइए!!

ब्रजेश कानूनगो 
503,
गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क, कनाड़िया रोड, इंदौर 452018

Tuesday, January 3, 2017

पथ भ्रष्ट जूता

व्यंग्य  
पथ भ्रष्ट जूता 
ब्रजेश कानूनगो 

टमाटर हो, अंडा हो या जूता हो,  अक्सर लक्ष्य से चूकते रहे हैं। चूक किससे नहीं होती। भगवान भी चूक जाता है। किसी जीव को  जिस पूर्व निर्धारित यौनि में जन्म देना होता है ज़रा सी चूक से उसे किसी और यौनि का नागरिक बना देता है। शेर के शरीर में गीदड़ की आत्मा और आदमी के सिर में लोमड़ी का दिमाग खुराफात करने से चूकता नहीं। लोग समझते हैं, आदमी चूक गया है,शेर गीदड़ हो गया है। प्रत्यक्ष तो यही दिखता है।

निशाना साधकर फैंका गया जूता नेताजी को बगैर क्षति पहुंचाए चुपचाप गुजर जाए तो बताइये इसमें चूक किसकी है? सोचने वाली बात है। जूते में खोट है या कि निशानेबाज से चूक हुई है।
यदि जूते में तनिक भी ईमानदारी हो तो कोई कैसे उसके प्रहार से बच सकता है। कहीं तो लोचा हुआ होगा। निशानेबाज की निपुणता पर भी संदेह होता है। जब गुरुकुल में निशानेबाजी सिखाई जा रही होगी तब उसका ध्यान जरूर कहीं ओर होगा. चिड़ियाँ की आँख की बजाय वह सुन्दर हिरणियों को निहारने में लगा होगा. 
यह भी हो सकता है कि वह किन्ही प्रतिद्वंदी ताकतों के हाथों बिक चुका हो। बाजार युग में सब कुछ खरीदा-बेचा जा सकता है। शरीर और आत्मा की बोली लग जाती है, फिर बेचारी चरण पादुका कौन मंत्रीजी की डिग्री है.

जूता प्रहार की प्रक्रिया को भी प्रायोजित किया जा सकता है। किसी अन्य बहुराष्ट्रीय ब्रांड की चालाकी या कूटनीति भी हो सकती है। जमे जमाये कारोबार पर आरोप लग सकता है कि अमुक कंपनी के जूते  की मारक क्षमता क्वालिटी कंट्रोल की कसौटी पर फेल है। इसलिए विश्वसनीय प्रकृति प्रदत्त और पूर्णतः वेज जूता अपनाएं, पूरी तरह स्वदेशी और गुणकारी। सिर पर लगे तो दिमाग की गर्मी भी निकाले और गंज पर अंकुरण भी सम्भव हो सके।

यह बहुत मानी हुई बात है कि जिस काम के लिए जिम्मेदारी सौंपी गयी हो उसे पूरी लगन और निष्ठा से करना चाहिए। यही आदर्श मूल्य हैं हमारे. यदि तंत्र को सौ रूपये आख़िरी आदमी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गयी हो और लक्ष्य तक सिर्फ पंद्रह पहुँच रहे तो संदेह होता है। इसका सीधा मतलब है कि तंत्र कही रास्ता भटक गया है। योजनाओं की आत्मा इसी तरह भटक जाती है। भटकाव की इसी अवधारणा को आगे चलकर भ्रष्टाचार जैसी अवधारणा से विद्वजन व्याख्यायित करते रहते हैं।

बहरहाल, कर्म को पूरे मन से सम्पन्न किया जाए और नेक इरादे से सम्पन्न किया जाए तो सफलता अवश्यम्भावी है। यदि मिसाइल को सचमुच सम्पूर्ण इच्छा शक्ति के साथ दुश्मन की ओर दागा जाए तो लक्ष्य भेद अवश्य होगा । मिसाइल हो या जूता, ये सब भौतिक और ठोस     वस्तुएं हैं, इनमें पर्याप्त गतिबल होता है, ये जुमलों या उद्घोषों की तरह अदृश्य और हवा हवाई तरंगें नहीं होतीं। इनके टकराने के बाद टारगेट तरंगित होता है.
नेताजी की दिशा में सन्नाया गया जूता यदि बगैर लक्ष्य भेदन के गुजर जाता है तो इसमें कुछ न कुछ षडयंत्र जरूर संभावित है।

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018