Saturday, January 22, 2022

ये पुरस्कार अगर मिल भी जाए तो क्या है

ये पुरस्कार अगर मिल भी जाए तो क्या है

'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है..' विविध भारती की तरंगों पर सवार मोहम्मद रफी कानों में उतरकर दिल के दरिया में दर्द की डोंगी आज भी जब तब चलाते रहते हैं। हालांकि आज का गायक,नायक  नाचते गाते हुए भी 'दर्द ए डिस्को' करने लगता है लेकिन मधुबनजी का दर्द कुछ शास्त्रीय किस्म का ही है।

मधुबनजी वैसे तो साहित्य संसार में हर घड़ी हर पल जिंदगी की धूप छांव और बदलते रूप  निहारते  फिरते हैं। लेकिन असल में उनकी अपनी एक वांछित दुनिया भी थी, जिसे वे पाना चाहते थे। 'मन तरसत हरि दर्शन को आज...' की तरह अंतर्मन में आशा की ज्योति जलाए बहुत हाथ पैर मारते रहे। दिल ही दिल में खूब चाहा कि किसी पुरस्कार या सम्मान के रूप में उन्हें भी कहीं से अपनी एक दुनिया हाथ लग जाए।

लेकिन अब तो एक छोटा सा आशियाना प्राप्त करने में ही दर दर की ठोकरें खाना पड़ती हैं। दुनिया तो बहुत बड़ी ख्वाहिश है।

इधर रफी साहब हैं कि गा गए हैं 'ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?'

अरे साहब! बहुत कुछ है। एक बार मिले तो सही! क्या नहीं है 'पैसा है,इज्जत है,शोहरत है। किताब के बेक कवर पर अपने परिचय में 'सेठ धनपत स्मृति साहित्य सम्मान' जैसा विशेषण है। चर्चे हैं, मुख्य आतिथ्य है। साहित्य अकादमियों की अध्यक्षता है, सृजन पीठों का निदेशक पद है, राज्यसभा सदस्यता के रास्ते हैं। 'दीवार' फ़िल्म  के शशिकपूर की तरह साहित्य के तमाम 'बिगों' को आप जवाब दे सकते हैं- 'मेरे पास पुरस्कार है!' ये वक्तव्य मेरा नहीं मधुबनजी का है रफी साहब को सुनते हुए।

बात सम्मान या दुनिया के मिल जाने की ही नहीं है। बाद में नायक के निराशा के समुद्र में उतर जाने की भी है। सबकी अपनी अपनी दुनिया होती है। अब दुग्गल साहब को  खाने में 'चिकन टिक्का' और पांडेय जी को 'मटर मलाई' मिल जाये तो उनके चेहरों पर सारा जहाँ मिल जाने की खुशी उतर आती है। लेकिन जनाब  निराश होने के लिए कई कारण भी मिल ही जाते हैं । दुग्गल साहब के 'चिकन टिक्का' में काली मिर्च की कमी और पांडेय जी की 'मटर मलाई' में शक्कर की ज्यादती उनकी दुनिया फिर से उजाड़ देती है।

रहा सवाल मधुबनजी का तो उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी गांठ के पैसों से किताबें छपवाईं। नामी गिरामी समीक्षकों को गोष्ठियों में आमंत्रित किया। मित्रों से समीक्षाएं लिखवाईं। तब जाकर उन्हें नगर की 'भाषा सेवा समिति' के शिखर सम्मान के रूप में छोटी ही सही एक दुनिया मिल तो गई, लेकिन व्यवस्था के प्रति आक्रोश इतना अधिक है कि सम्मान लौटाना चाहते हैं। नही लौटाते हैं तो ट्रोल होने का खतरा मुंह बाएँ खड़ा है। वास्तविक और आभासी दुनिया के अधबीच में उनकी दुनिया अटक गई है।

यही खास वजह है जिसके कारण मधुबनजी इन दिनों यही गीत गुनगुनाते फिर रहे हैं... 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...!'

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, November 30, 2021

हवाबाजी का दिलकश मौसम

 हवाबाजी का दिलकश मौसम


जब देश में कहीं भी चुनाव आने होते हैं न जाने क्यों मुझे बचपन का वह दोस्त याद आने लगता है जो बिलकुल मालगुडी के प्रसिद्द महाबातूनी चरित्र की तरह था। अक्सर ऊंची-ऊंची फैंकता रहता था। जिस दिन वह कोई लम्बी नही हांक पाता, उसके पेट में मरोड उठने लगती थी और रात को बड़ी देर तक वह सो नही पाता था। शायद इसी नींद के प्रबंधन के लिए दिन भर वह इस जुगाड़ में लगा रहता था की कोई मिले तो वह अपनी नई गप्प या नया किस्सा सुनाकर  हल्का हो ले।  इस आदत की वजह से ही लोगों ने उसे ‘हवाबाज’ के नाम से विभूषित किया था।  उसकी हवाबाजी का यह आलम था कि वह अपनी बातों से किसी की भी हवा बना सकता था और जब चाहे किसी की हवा निकाल भी दिया करता था।  हवा बनाने और हवा निकालने में वह माहिर था। उन दिनों नगर पंचायत के चुनावों में कुछ प्रत्याशी अक्सर उसकी सेवाओं का अक्सर लाभ भी लिया करते थे।

यह वही समय था जब डाक्टर ,वैद्य या हकीम साहब मरीज को देखने के बाद महंगी-महंगी जांचें करवाने के परामर्श देने की बजाए मरीज को हवा बदली की सलाह देना पसंद किया करते थे। नई जगह और नए वातावरण की नई हवा के साथ ही रोगी अपने कष्टों से मुक्त भी होने लगता था।  शरीर की बीमारियाँ भाग खड़ी होती थीं। कमाल है कि यही नुस्खा इन दिनों भारतीय राजनीति में प्रबल होता दिखाई देता रहा है। इस महादेश के हर हिस्से को तथाकथित असाध्य बीमारियों से मुक्त करने के लिए जोर दिया जाता है कि अब हर जगह सत्ता में बदलाव की बयार बहे।  यही वजह है कि मेरे बचपन के उस महाबातूनी हवाबाज दोस्त की तरह के लोगों की पूछ परख चुनावों के दिनों में काफी बढ़ जाती है।उनकी मांग का सूचकांक लगातार ऊंचा उठता चला जाता है।

देखा जाए तो नए जमाने में हवा बनाने के तरीकों में बदलाव भी आया है। बडी बडी बातों के तीर फैंकने के लिए अब किसी चौपाल या हाट-बाजार में मजमा लगाने की जरूरत नहीं रही है, मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसे हवाबाजों की आंधियां चलने लगती हैं।  नामी-गिरामी विज्ञापन एजेंसियां भी आपकी सेवा में हाजिर हो जाती हैं, जो मोटी रकम लेकर अपने नियुक्त किए हवाबाजों के जरिये इस काम को अंजाम देने में मुस्तैदी से जुट कर धन की फसल काटती हैं।  इस विज्ञापित हवाबाजी का आलम यह होता है कि वे अपनी सरकार और मंत्रीमंडल तक की घोषणा करने में सफल होते दिखाई देने लगते हैं।   

हवाबाजों की दृष्टि के भी क्या कहने वे साफ़-साफ़ देख लेते हैं कि बाजार में अभी किसकी हवा चल रही है और कैसे नई हवा बनाई जा सकती है।  किसी महान मौसम विज्ञानी  की तरह वे हवा का विश्लेषण करने का भरपूर सामर्थ्य रखते हैं।  किस हवा में कितनी आक्सीजन और कितनी कार्बनडाय आक्साइड है। कितनी नायट्रोजन किसी और हवा से आकर अपनी  हवा में अपना असर छोड़ सकती है।  कितनी प्राणवायु अगर दक्षिण दिशा से आकर उत्तर की हवा में मिल जाए तो नई यौगिक या मिश्र हवा का परिणामों पर क्या सकारात्मक असर हो सकता है।  ऐसी तमाम बातों को यह ‘हवा’ विज्ञानी समझ लेते हैं।  कोई भी हवाबाज ऐसे गणित में बड़ा निपुण होता है।  वह हर हवा पर उसका नाम लिखने में सक्षम होता है। जानकार लोग उसके लिखे शब्दों के रंग से पहचान जाते हैं कि कौनसा  झंडा इस बार हवा में लहराने वाला है।  

मुश्किल केवल इतनी सी रहती है कि किसी भी नाम की कोई भी हवा मात्रा से अधिक किसी भी रंग के गुब्बारे में पहुँच जाए तो उस के फट जाने का अन्देशा बढ जाता है।


ब्रजेश कानूनगो

बीती काहे बिसार दें

बीती काहे बिसार दें

समझदार लोग कहते आए हैं कि याद रखना उतना जरूरी नही जितना कि भूल जाना।इन्हीं के सामने कुछ समझदार लोग भी सामने आते रहे हैं, जो स्वयं को ‘भूलने के विरुद्ध’बताते हुए याद रखने की कला की तारीफ़ करते हैं. फिर भी आम समझ तो यही है कि सफर की तमाम मुश्किलों और पथ की दुर्गमता के बावजूद जिन्दगी की गाडी सहज चलती रहे तो जरूरी होगा कि पीछे रह गई बातों को हम भुलाते जाएँ. ‘बीती ताहि बिसार दे,आगे की सुधि ले’ यह मुहावरा भी इसी समझ से उपजा है.  हर कोई चाहता है की वह स्वस्थ बना रहे. तन और मन पर कोई भी पुरानी या गुजरी हुई बात विपरीत प्रभाव न डाल सके इसलिए नई घटनाओं और स्थितियों की रोशनी से विटामीन और ऊर्जा प्राप्त करने की भरपूर कोशिश करते रहना चाहिए.  बावजूद इसके कमबख्त कुछ विघ्न संतोषी हैं जो बार-बार भूली-बिसरी बातों को याद दिलाकर सारा मजा किरकिरा कर देते हैं. 


सरकारें तो पूरा प्रयास करती हैं कि पुरानी बातों को भूलकर हम विकास जैसे मुद्दे पर अपना ध्यान लगाएं, लेकिन अक्सर ऐसा होता नहीं है. हर कोई अर्जुन की तरह एकाग्र नहीं हो सकता, इसलिए ध्यान बंट ही जाता है.  अब देखिए पिछली सरकार के समय भी एक घोटाले के बाद दूसरा नया घोटाला इसलिए किया जाता रहा ताकि पिछले वाले को पब्लिक भुला सके.  कब तक आदर्श, कब तक 2जी, कब तक कोयला, छोडिए भी अब पुराना, नए में मन रमाइए अपना। नए की ख्वाहिश में सरकार तक बदल डाली हमने पर बात बनी नहीं. पुराने निशान आसानी से नहीं मिटा करते.  


भूलने-बिसराने का एक सदाबहार उदाहरण हमारे यहाँ बड़ा प्रेरणास्पद रहा है. प्रणय प्रसंग के बाद सम्राट दुष्यंत अपनी प्रेयसी शकुंतला को बिसरा ही दिया था लेकिन भला हो उस मुद्रिका का जिसे देखते ही सम्राट को वन कन्या के साथ बिताए वे मधुर पल दोबारा याद आ जाते हैं.  इतिहास गवाह है कि कालान्तर में इन्ही प्रेमी युगल की होनहार संतान ‘भरत’ के नाम पर इस गौरवशाली महादेश का नाम ‘भारत’ रखा गया.


भारत वर्ष में वह मुद्रिका परम्परा आज भी कायम है. याद दिलाने के लिए ऐसी कई मुद्रिकाओ के दर्शन अक्सर हमें करवाए जाते रहे हैं। देश- विभाजन, भारत-पाक और भारत-चीन के पुराने युद्ध या बोफोर्स सौदा,इमरजेंसी, स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ लोगों द्वारा अंग्रेजों को मदद और माफी आदि भी ऐसी ही हरदिल अजीज मुद्रिकाएं हैं जो भुला दिए गए अतीत के प्रसंगों की वक्त-बेवक्त याद ताजा करती रहीं है.


बेचारी जनता तो कब की भुला चुकी होती इन मुद्रिकाओं को लेकिन कुछ लोग हैं कि देश में कहीं भी चुनाव आने पर बार-बार नई-नई मुद्रिकाएं सामने लिए चले आते हैं. याद दिलाते रहते हैं कि भाई इस देश में इमर्जेंसी भी लगी थी और मज्जिद भी ध्वस्त की गई थी. गोधरा में कुछ लोग जिन्दा जला दिए गए थे और भोपाल के जहर ने कइयों की जानें और आँखों की रोशनी छीन ली थी। विद्वानों ने तो कई बार दुहराया है कि ‘बीती ताही बिसार दे, आगे की सुधि लेय।’  लेकिन उनका दिल है कि मानता नही। ज़रा गौर से देखिए तो पता चलता है कि मुद्रिका परम्परा के निर्वाह में इन दिनों भी कई संस्थान पूरी मुस्तैदी से लगे हुए हैं,जिन्हें वक्त के मरहम पर ऐतबार नहीं.


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, November 13, 2021

उनकी शुभकामनाएं और मेरा आभार

उनकी शुभकामनाएं और मेरा आभार     


वे विनम्रता की प्रतिमूर्ति हैं। कुछ लोगों में विनम्रता और सद्भाव जैसे गुण कूट कूट कर वैसे ही भरे होते हैं जैसे गजक में गुड़ समाया होता है। तिल्ली के साथ गुड़ की कुटाई से गजक जैसी लोकप्रिय और गुणकारी मिठाई बनती है। बचपन में मन और देह के साथ सद्गुणों की कुटाई करके गुरूजी भी अपने शिष्यों का गुणी व्यक्तित्व बनाने के प्रयास किया करते थे। हालांकि उस पिटाई से मन पर कम और देह पर चोट ज्यादा लगती थी, फिर भी उसका खासा असर सिर की तेल मालिश की तरह भीतर तक हो जाता था।

इस प्रक्रिया में विनम्रता और सद्भाव जैसे गुणों की चाशनी स्वभाव में उसी तरह सहज बनती चली जाती थी, जैसे मुंह में लार बनती है। यह तो सभी भली प्रकार जानते हैं कि हमारी लार शरीर की कई बीमारियों को हर लेने की असीमित क्षमता रखती है। आयुर्वेदाचार्य सुबह उठते ही बासी मुंह दो गिलास पानी लार सहित पी जाने का आज भी परामर्श देते हैं। इसी तरह विनम्रता और सद्भाव की चाशनी भी लार की तरह काम करती है, जीवन में अनेक समस्याओं और कठिनाइयों से निपटने में इस दवाई का भी बड़ा योगदान होता है।

उन्होंने जीवन में इसी चाशनी युक्त दवाई को चाय की तरह अपना रखा है। जब भी जरूरत पड़ती है सामने वाले को पिला देते हैं। हर मौके पर वे खूब शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं। 

जीवन को सुगम और सुखद बनाने के लिए एक दूसरे के प्रति भरपूर सद्भावनाएँ व्यक्त करना एक बढ़िया उपाय है। उनके लिए यह मात्र औपचारिक रस्म नहीं होती है। उनकी शुभकामनाएं सदैव हार्दिक होती हैं और हृदय से निकलकर आती हैं। कभी कभी तो यह अंतरतम की गहराइयों से बोरिंग के पानी की तरह फूटकर बहुत वेग से बाहर आती हैं। उनका एक 'हार्दिक' से काम नहीं चलता, व्याकरण और भाषाई अनुशासन का दिल पे क्या लगाम।  'हार्दिक' गुणित में निकलकर दो-दो बार उनके ह्रदय को निचोड़ देता है।  यह होता है विनम्रता, सद्भाव,संवेदनाओं और शुभेच्छाओं की अभिव्यक्ति का शानदार जलवा।

इस बार उनकी शुभकामनाएं पाकर मैं हतप्रभ रह गया। कार्ड पर हमेशा की तरह 'हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएं ' नहीं लिखा था।  कार्ड पर लिखा था , 'आर्थिक आर्थिक  शुभकामनाएं!'
वे हिंदी के विद्वान हैं। उनके लिखे में वर्तनी का दोष हो ही नहीं सकता। अखबारों तक में वे प्रूफ की गलतियां देख क्रोध से उबल पड़ते हैं। संपादक को चिट्ठी लिखते हैं। मैंने एक बार पुनः कार्ड पर नजर दौड़ाई। वही लिखा था। 'आर्थिक आर्थिक शुभकामनाएं।' मुझे विश्वास है इसबार उनकी संवेदनाएं दिल से नहीं बल्कि दिमाग से निकलकर आई हैं। महंगाई के इस दौर में मुझे इसी की जरूरत थी। शुक्रिया मित्र। बहुत आभार!! ओह, क्षमा! बहुत बहुत आभार!!

ब्रजेश कानूनगो

Friday, October 29, 2021

राजनीति की दूध तलैय्या

राजनीति की दूध तलैय्या


किसी भी राजनीतिक दल को अब निखालिस नहीं कहा जा सकता। जो वर्तमान में सत्ता संभाल रहा होता है वह धीरे धीरे अपना स्वरूप बदलने लगता है। कभी कभी तो पता ही नहीं चलता कि आखिर पहले वाले दल से वह कितना अलग है। ऐसे में एक दंतकथा याद आती है।


एक गांव में दूध से भरी एक पवित्र तलैया थी। ग्रामवासी उसे ईश्वर की कृपा मानते थे। कभी वह सूखती नहीं थी। किसी दुष्ट पापी ने चुपके से उसमें स्नान कर लिया तो अगली सुबह तलैया सूख गई। फिर तो जैसे ग्रामीणों पर कहर ही बरसने लगा। सूखा पड़ा। महामारी फैली। लोग मरने लगे।


किसी संत ने कष्टों से छुटकारे का उपाय बताया। तलैया को फिर से दूध से लबालब कर दें तो दुख दूर हो सकते हैं। हर रोज हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से तलैया में दूध का दान करने लगा। कुछ दिनों तक तो यह सब चला किन्तु फिर अर्पित किए जाने वाले दूध में थोड़ा थोड़ा पानी भी मिलाया जाने लगा। हर व्यक्ति सोचता कि अन्य तो दूध डाल ही रहे हैं। उसके थोड़े से पानी डालने से क्या फर्क पड़ने वाला है। अंत में जब संत ने तलैया का निरीक्षण किया तो पाया कि वहां सिर्फ दूधिया पानी ही भरा हुआ था। लगता है मिलावट प्रक्रिया की इसी तरह से कभी शुरुआत हुई होगी।


राजनीति में भी मिलावट की प्रक्रिया कुछ इसी प्रकार दिखती है। सत्ताधारी दूध में पानी मिलता रहता है। पानी ही क्या, यहां तो दही और सिरका भी प्रवेश कर जाता है। अब यदि दूध में थोड़ा सिरका चला जाए तो उसे तो फटना ही है। क्या किया जाए अब?  छैना बनाइए और रसगुल्लों का मजा लीजिए। दूसरे दलों से आए अन्य विचारधाराओं से संस्कारित नेता यही तो करते हैं। फटे दूध से बढ़िया व्यंजन बना ले जाते हैं। मिल्क केक के साथ रसगुल्लों का आनन्द भी उठाते हैं।


इसी तरह  एक चम्मच जावन की कुनकुने दूध में मिलावट से दही जमता है। दूध से सीधे आप घी नहीं निकाल सकते। दूध का रूपांतरण करके दही जमाना पड़ता है।  दही को मथने से मक्खन निकलता है। मक्खन से अन्ततः घी मिलता है। राजनीति का घी। आजकल इस मिलावट का बड़ा महत्व है। घी की आकांक्षा में हर कोई दूध की तलैया में मिल जाना चाहता है।


निसंदेह यह मिलन परमात्मा और आत्मा की तरह आध्यात्मिक या मोक्ष की अभिलाषा में नहीं होता है। यह सुमन और सुगंध की तरह निस्वार्थ और प्राकृतिक भी नहीं होता। इस मिलन में सांसारिक महत्वाकांक्षाओं व लिप्सा की गंध समूचे वातावरण में महसूस की जा सकती है।


ऐसी ही मिलावट की प्रक्रिया चलती रही तो कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि लोकतंत्र की तलैया में हमे एक दिन निखालिस दूध की जगह सिर्फ मटमैला सा पानी ही दिखाई दे।


ब्रजेश कानूनगो

Sunday, October 24, 2021

रिवर्स में जाता समय

रिवर्स में जाता समय


पिछले कई दिनों से मैं साधुरामजी का इंतजार कर रहा था। देश प्रदेश में इतना सब घट जाने के बाद भी उनका आगमन नहीं हुआ था। किसानों का धरना प्रदर्शन लम्बे समय से जारी था। फिल्मी सितारों के परिवार और उनके बच्चे संकट में घिरे हुए थे। कोरोना काल की कई करुण कहानियां सामने आ रहीं थीं। उधर महामारी के योद्धाओं का सम्मान भी होने लगा था। सौ करोड़ डोज के टीकाकरण का जश्न भी मन गया था।


यूपी,पंजाब,राजस्थान,छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सुनामी और तूफानों का दौर अभी थमा नहीं था। महंगाई डायन फिर जोश खरोश से महामंच पर तांडव कर रही थी। लोग मुग्ध होकर तालियां पीट रहे थे। किसी को कोई परेशानी नहीं थी।  सब कुशल मंगल था। कुछ ही मूर्ख लोग चिंतित थे। एक तरह से दुखी रहना उनका स्थायी मानसिक रोग होता है।


ऐसे में मुझे साधुरामजी की चिंता सता रही थी। मेरा अपना भी थोड़ा सा स्वार्थ था इसमें। रोज का वैचारिक विमर्श नहीं हो पाने से मैं बेचैन रहने लगा था। मुझे आशंका हुई कि कहीं उन्हें डेंगू, चिकनगुनिया वगैरा ने तो नहीं घेर लिया है। इसी चिंता के चलते मैं उनके घर पहुंचा। यह देखकर राहत महसूस हुई कि वह स्वस्थ थे और अपनी साइकिल के पहिए में तेल डाल रहे थे। 


क्या बात है साधुराम जी बहुत दिनों से दिखाई नहीं दिए। आपके नहीं आने से मन बेचैन हो रहा था। मुझे तो लग रहा था कि आप के विरह में मैं कहीं अवसाद का शिकार न हो जाऊं। मैंने कहा।

आप क्यों डिप्रेशन में आते हैं, मैं स्वयं ही बहुत निराशा से गुजर रहा हूँ। इतनी बहस करते हैं, विचार करते हैं लेकिन इस देश का कुछ होने वाला नहीं है। ऐसा लगता है कि हम फिर से पाषाणयुग में लौट रहे हैं। साधुरामजी बड़ी उदास आवाज में बोले। 

ऐसा क्यों सोचते हैं आप?  मैंने पूछा। 

देश के हालात देखिए क्या यह किसी कबीलाई संस्कृति से अलग नजर आता है? अपने ही राष्ट्र में छोटे-छोटे समूहों में बंट जाते हैं लोग। बोली, जाति, धर्म, अपने अपने स्वार्थ और विश्वास उन्हें जोड़ते नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धी बना देते हैं,शत्रुता की हद तक। लोग मनुष्य जाति की सामूहिकता  और एकरसता की अवधारणा अब वर्तमान समय में महत्व खो रही है। साधुरामजी की निराशा उनके शब्दों में और चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। मैं समझ गया देश प्रदेश के पिछले घटनाक्रमों से वे आहत थे। 


इतने बड़े और विविधता पूर्ण गणतंत्र में यह छोटा मोटा तो होता रहता है आप क्यों निराश होते हैं। मैंने कहा। 

मुश्किल यही तो है कि विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र में ऐसा हो रहा है। यही सब देखना था तो हम गणतंत्र क्यों बने, वही जनपदीय और साम्राज्यवादी व्यवस्था क्या बुरी थी। इसीलिए मेरा मानना है कि विकास का भले ही आर्केस्ट्रा बजाया जा रहा हो, वैचारिक और मानसिक धरातल पर हम अभी भी बीहड़ वन में नगाड़ा पीट रहे हैं। पीछे लौट रहे हैं। साधुरामजी बोले। 


ठीक ही कहा आपने साधुरामजी हम पीछे तो लौट रहे हैं। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि साइकिलें निकल आई हैं। गांव में फिर मिट्टी के चूल्हों में लकड़ियां जलाकर खाना पकाया जाने लगा है। विरोध स्वरूप विपक्ष के सांसद विधायक  गैस सिलेंडरों को अपने कंधों, माथों पर उठा कर नारे लगाने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। साइकिलों, बैलगाड़ियों से संसद,विधानसभा की यात्रा करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। परिणाम कुछ निकलता नहीं। ये जो आज कुर्सी पर हैं विपक्ष में रहते हुए ये भी यही करते थे। अब बेचारी जनता क्या करे? आप ही बताइए? इसे पीछे लौटना ही तो कहा जाएगा। मैंने चुटकी ली।


आपकी सब बातें ठीक हैं मगर साइकिल के प्रयोग को तो बढ़ाना ही चाहिए। महंगे तेल की बर्बादी को रोका जाना चाहिए। मैं तो कहता हूं कि इस क्षेत्र में पीछे जाना भी देश के लिए बेहतर होगा। साधुरामजी ने कहा। 

लेकिन साधुराम जब हम विकास की बात करते हैं तब आधुनिक परिवहन साधन भी तो विकास  का हिस्सा होते हैं। मैंने कहा। 

मैं कब कह रहा हूं कि आधुनिक परिवहन व्यवस्था का इंतजाम ना किया जाए। लोक परिवहन की व्यवस्था करें सरकार। इसके लिए जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति के पास अपनी कार हो हर बेजरूरत व्यक्ति को कार खरीदने को प्रोत्साहित नहीं किया जाए। कंपनियां तो हर व्यक्ति को अपनी कार का सपना दिखाते हुए  मार्केटिंग में लगी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस दुष्चक्र को समझा जाना चाहिए। 


भैया ठीक समझे आप!  यही उदारीकरण और वैश्वीकरण के दुष्परिणाम हैं। सरकार को चाहिए कि अब वह निजी कारों पर, बे जरूरत कार, अर्थव्यवस्था पर भार , जैसी वैधानिक चेतावनी लिखवाने का नियम लाए। आर्थिक विशेषज्ञ व सरकार स्वयं कहती है कि महंगाई पूरे विश्व में बढ़ रही है। हम अब केवल अपने देश को लेकर ही नहीं चल सकते। दुनिया की अर्थव्यवस्था से तालमेल बैठाना पड़ता है। चाहे तेल की कीमतें हो या खाद्यान्न की। सब कुछ ग्लोबल नीतियों के अनुसार चलेगा। ब्रिटिश काल में एक ही कंपनी आई थी अब दुनियाभर की कम्पनियों को इंडिया में आकर काम करने को आमंत्रित किया जा रहा है। इस तरह भी तो हम फिर पीछे लौट रहे हैं। साधुरामजी बोले। 


अब देखिये ना इन दिनों टीवी पर वे ही धारावाहिक व वेब सीरीज अधिक लोकप्रिय हो रहे हैं जिनमें पुरानी परिवार परंपराओं, रहस्य रोमांच,भूत-प्रेत, जादू-टोना टोटकों जैसे बीते समय के विषय प्रमुखता से दिखाए जा रहे हैं। सनसनी और अंधविश्वासों से भरी खबरों को बड़े चाव से देश के लोग देख रहे। मैंने उन्ही की बात को आगे बढ़ाते हुए उत्साह में कहा। 


यही सब होता है ऐसे प्रतिगामी समय में। जब विडंबनाओं और नीतियों के विरोध में कुछ नहीं किया जा सकता। सब कुछ ठीक किया जाना स्वप्न जैसा लगता है। राजनीतिक स्वार्थों के कारण सरकार और विपक्ष में अंतर नहीं रह जाता तब निराश नागरिक फेंटेसी का सहारा लेते हैं। अनहोनी में विश्वास करने लगते हैं। समय इसी तरह लौटता है। हम लौटते हैं इतिहास में। इतना कहकर साधुरामजी ने साइकिल उठाई और  गुटखा खरीदने लाल लँगोटी पान भंडार की ओर निकल पड़े।


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, October 23, 2021

सूने मकान में विमर्श का उजाला

 व्यंग्यकथा

सूने मकान में विमर्श का उजाला


मोहल्ले के सूने मकान में बरसों बाद मैंने रोशनी देखी तो थोड़ी जिज्ञासा हुई। पन्द्रह बीस बरस पहले मेरे मित्र जीवनबाबू वहां रहा करते थे। देश-विदेश, समाज संस्कृति और व्यवस्था की विसंगतियों को लेकर अक्सर हम चर्चा करते थे। कभी सहमत होते तो कभी असहमत लेकिन हमारी दोस्ती में कभी कोई दूरी नहीं आई।

प्रतिभा पलायन की पिछली बाढ़ में जब उनका बेटा बह गया तो मजबूरन जीवनबाबू को भी अमेरिका जाना पड़ा। 

क्या बात है जीवनबाबू अमेरिका रास नहीं आया?  लौट आए। मैंने बातचीत को आगे बढ़ाने की गरज से पूछ लिया। सोचा तो था बेटे के पास रहकर पश्चिम को जानूंगा समझूंगा, अकेलापन भी दूर होगा और बच्चों को भी परदेस में मेरा सम्बल रहेगा। लेकिन यह मेरा भ्रम ही था यहां अपने देश और अपने लोगों की बात ही कुछ और है, मैं लौट आया। वे बोले। 


मैंने उनके पहले वाली चमक में आई कमी का राज जान लिया था।  जीवनबाबू आप अपने देश और शहर में भले ही लौट आए हैं लेकिन आप के आने के पहले ही पश्चिम यहां आ चुका है। पिछले सालों से वही सब यहां भी है जो वहां होता है। मैंने कहा।

तुम भौतिक और आर्थिक पक्ष की बात कर रहे हो मित्र, मैं मानवीय और भावनात्मक संदर्भों में अपनी बात कह रहा हूँ कि हमारे यहां अभी भी मूल्यों का महत्व बचा हुआ है। वे बोले। 

जीवनबाबू आप आज ही लौटे हैं, वहां के मीडिया में भारत की खबरें यदा-कदा ही देखने को मिलती होगी। अब जब आप यहां के अखबार पढ़ेंगे, टीवी देखेंगे,शहर में निकलेंगें,लोगों से मिलेंगे तब आपको सही स्थिति का पता चलेगा। मैंने कहा। 

हां, मैंने अखबार वाले को बोल दिया है काफी नए अखबार आ गए हैं अब तो। बड़ा बदलाव आया है अपने शहर में भी। अच्छा लगता है देखकर। रास्ते में देख रहा था बड़े सुंदर चौराहे बने हैं। सड़कें भी चौड़ी हो गई हैं। वे बोले। 

हाँ इसी रास्ते और चौराहों से गुजर कर ही तो आ रहा है पश्चिम।  प्लास्टिक के पेड़ लगे हैं। शॉपिंग मॉल बने हैं। मल्टीप्लेक्स सिनेमा शुरू हुए हैं। हुक्का क्लब खुले हैं। मदहोश नशेड़ी हैं। तेज रफ्तार गाड़ियां है।  सब कुछ स्मार्ट हो रहा है। आदमी भी और परिवेश भी। मैंने उनकी जानकारी में वृद्धि करते हुए कहा। 

तुम नहीं बदले अभी तक, अपने मतलब से बात को घुमा देते हो। मैं भौतिक बदलाव की बात नहीं कर रहा। मानसिक परिवर्तन की बात कर रहा हूँ। विकास देख कर मन को शांति मिलती है। जीवनबाबू बोले। 

मैं भी वही बात कर रहा हूँ इस विकास के बाद  बहुत परिवर्तन आया है। छोटे दुकानदार, ठेला गाड़ी चलाकर अपनी रोजी-रोटी कमाने वालों और गरीबों की आमदनी में कमी आई है। दिन भर पसीना बहा कर दो पैसे कमाने वालों की बजाय लोग शॉपिंग मॉल से सामान खरीद लाते हैं। ऑनलाइन बाजार सजे हैं, जहां से सीधे किराना और कफ़न का सामान बटन दबाते  खरीदा जा सकता है। मैं थोड़ा उत्तेजित हो गया। 

जीवनबाबू ने पानी का गिलास मेरी और बढ़ा दिया, बोले, अरे बैठो तो सही। इत्मिनान से बात करेंगे। यह बताओ और क्या समाचार है इधर के?  समाचार क्या है जीवनबाबू, जिन मूल्यों की आप बात करते हैं उन पर भरोसा नहीं रहा अब। पतन ऐसा हुआ है कि बेटा अपने ही बाप को चाकू से गोद सकता है।  गुंडे पुलिस थानों का घेराव कर लेते हैं। अपराध कम करने की बजाए अपराधी के एनकाउंटर की मांग उठने लगी है। कल तक जो पूज्य और आदरणीय थे, बिना विचार उन्हें जूतों की माला पहनाने और मुंह काला कर देने में कोई हिचक नहीं। चौराहे पर स्कूल बस में आग लगा दी जाती है। कानून अपने हाथ में लेकर जनतंत्र धीरे धीरे भीड़तंत्र में बदलने लगा है।  जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत नहीं सच्चाई है। हम लोग तो बस किसी अवतार या सच्चे नेता की प्रतीक्षा ही करते रहते हैं। सब कुछ भगवान भरोसे ही चल रहा है। मैंने सोफे में धंसते हुए कहा। 

हां सुना है मैंने, यहां के नेताओं ने तो उत्सव मनाने ,बड़े-बड़े होर्डिंग लगवाने और अपना जयकारा लगवाने को ही अपना मुख्य काम समझ रखा है। जीवनबाबू ने अपनी आंखों में तनिक गुस्सा और मुंह से कटाक्ष की चिंगारी बरसाई तो मैंने भी थोड़ा सा घी उंड़ेला, बोला, अब नेतागण बेचारे अपने क्षेत्रों में कब तक घूम घूम कर नागरिकों से मिलेंगे,जुलेंगे?  अपने कीमती समय को किफायत से खर्च करते हैं। चौराहों पर तस्वीर टांग कर ज्यादा से ज्यादा लोगों की नजरों में बने रहना भी क्या बड़ी बात नहीं? 

और नहीं तो क्या!  भगवान भी तो कैलेंडर और चित्रों के जरिए इसी तरह भक्तों के दिलों में उतरते हैं। अबकी बार जीवनबाबू की चुटकी से अचंभित था। प्रायः वे नेताओं का मजाक नहीं बनाते थे।

क्या बात कही जीवनबाबू आपने! मैंने उनके हाथ पर हाथ मारते हुए कहा। चलिए! अब आप आ ही गए हैं। मैं भी वैचारिक बहस के लिए तरस गया था।  मित्र तो बहुत हैं लेकिन खुलकर कोई बात नहीं करता।  सबको खुद के और देश के विकास की इतनी हड़बड़ी है कि विचार कोई नहीं करना चाहता। सभी जगह हड़कंप मचा हुआ है। मोबाइल घनघना रहे हैं।  लेकिन दिल की बात कोई नहीं कहता सुनता। मैंने अपनी निराशा व्यक्त की और घर लौट आया। 

मुझे मालूम था जीवनबाबू  रात भर सो नहीं पाए होंगे। मुझे खुशी है कि वे लौट आए हैं। ऐसे लोगों की हमें अभी बहुत जरूरत है विडंबनाओं, मूर्खताओं और विसंगतियों को देखकर जिनकी नींद उड़ जाती हो। 

ब्रजेश कानूनगो