Tuesday, March 16, 2021

हादसा,हमला,हकीकत

हादसा,हमला,हकीकत

हुलिया ही बता रहा था कि उनके साथ कोई 'हादसा' हो गया है। एक हाथ की अंगुली से खून टपक रहा था।यह क्या हो गया साधुरामजी हाथ में?' मैंने चिंता व्यक्त की।

'हमला हुआ है मुझ पर... पहले जरा 'टिंचर आयोडीन' दो। घाव पर लगाना है!' साधुरामजी ने हड़बड़ाते हुए गेट खोलकर लगभग दौड़ते  हुए मेरे घर के बरामदे में प्रवेश किया।

मैं समझ गया साधुरामजी के मोहल्ले के 'हालात' बंगाल की तरह ठीक नहीं हैं। तुरन्त भीतर से दवाई लाकर उनकी अंगुली के घाव पर लगाई और पट्टी कर दी।

'आखिर हुआ क्या साधुरामजी? क्या आज फिर किसी मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया? खतरों को आमंत्रित करने की उनकी इस आदत को मैं जानता था।

'ये मिश्रा का बच्चा अपना 'खेला' कर गया। मैं जानता था वह ऐसा अवश्य करेगा। जलता है मुझ से।' तन से वे इधर थे पर मन वचन बंगाल हो रहा था।

'वह क्यों जलने लगेगा भला आपसे।' मैंने कहा।

'उसे मेरा लिखना,छपना सुहाता नहीं। दूसरे दल का मेम्बर है।' वे बोले।

'इसमें उसको क्या आपत्ति हो सकती है? वह भी लिखे अखबारों में,सोशल मीडिया पर,किन्तु इस बात से आपकी अंगुली टूटने का क्या संबंध हैं?   इसमें मिश्रा जी कहाँ से जुड़ गए? आखिर आपके पड़ोसी हैं।' मैंने कहा।

'मिश्रा को मेरा वह लेख बहुत खटक रहा था जिसमें मैंने बढ़ती महंगाई पर व्यंग्य किया था। कल जब वह अखबार में छपा तभी से उसका मुंह चढ़ा हुआ था। वाट्सएप और फेसबुक पर भी टिप्पणी नहीं की।'  साधुरामजी बोले।

'यह आपका भ्रम भी हो सकता है,किसी कारण उसने रुचि नहीं ली हो। जरूरी नही की वह हर बात में आपसे सहमत ही हो जाए।' मैंने समझाने की असफल कोशिश की।

'खैर,यह मानवीय प्रवृत्ति है। लेकिन इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि उसने आप पर हमला किया है। जरा घटना को विस्तार से बताएं? मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।

'आज सुबह मैं दरवाजे के नीचे खिसका ताजा अखबार उठा रहा था, मिश्रा ने दरवाजा जोर से दबा दिया बाहर से। मेरी अंगुली को चोट पहुंचाने का प्रयास किया। हमला किया है उसने। वह नहीं चाहता कि मैं उसकी पार्टी और सत्ता पर व्यंग्य लिखूं।'  साधुरामजी के डीएनए का खास तत्व  उछलकर बाहर आ गया।

'याने न रहेगी अंगुली,न चलेगी कलम!' मैंने चुटकी लेते हुए कहा,

'तो अब क्या करेंगें। यह चुनाव प्रचार जैसा कोई फायदा पहुंचाने वाली बात भी नहीं कि अपनी अंगुली की पट्टी दिखाते हुए वोट मांगते फिरें। राजनेता और आम लेखक की चोट में बड़ा अंतर होता है साधुरामजी।' मैंने कहा।

'तो क्या हुआ। मैं भी कोई कम खिलाड़ी नहीं हूँ। मिश्रा चाहता है मेरी अंगुली तोड़कर वह मेरा लिखना बंद करवा देगा तो मैं भी अब मोबाइल में 'बोलकर' टाइप करके 'खेला' करूंगा।'

इतना कहकर साधुरामजी वापिस लौट गए। वे कब हार मानने वाले थे।

ब्रजेश कानूनगो

Saturday, February 27, 2021

तुम्हारा नाम क्या है 'शेखर बाबू'

तुम्हारा नाम क्या है 'शेखर बाबू'   


मित्र साधुरामजी उस दिन बड़ी हड़बडी में घर आए तो बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे. बापू जिस तरह कमर में घड़ी लटकाए रहते थे उसी तरह मोबाइल फोन फीते से बंधा उनके गले में लटक कर कुरते की ऊपरी जेब में पड़ा होता है. चौबीसों घंटों का साथी. लेकिन उस दिन वह अपने नियत स्थान पर न होते हुए उनके बाएँ हाथ में नजर आया. दाहिने हाथ को हवा में लहराते हुए कहने लगे, ‘बंधु, ये शेखर बाबू को अचानक क्या हो गया? कल ही तो मैंने उन्हें अपनी रचना भिजवाई थी प्रकाशन हेतु. आज अस्पताल में पड़े हैं.’

‘तो इसमें इतना परेशान होने वाली क्या बात है? आपकी रचना उनका सहायक सम्पादक अखबार में कॉपी पेस्ट कर देगा.’ मैंने चुटकी ली. जब से डिजिटलाइजेशन हुआ है तब से प्रायः यही हो रहा है.

‘अरे यार, तुम्हे तो हर वक्त चुहल ही छूटती है, वे बेचारे परेशान हैं, टांग टूट गयी है, अस्पताल में भरती हैं और तुम्हे मजाक सूझ रहा है. ज़रा मानवीयता से काम लो.’ साधुरामजी चिढ़ गए.

‘ठीक है नाराज मत होइए; आपको कैसे पता चला कि शेखर जी घायल हो गए हैं?’ मैंने पूछा.

‘यह देखिये वाट्सएप पर खुद उनका ही सन्देश आया है, बड़ी परेशानी में हैं, खुद कह रहे हैं कि दो हजार रूपये की मदद कर दीजिये, शाम तक लौटा भी देंगें.’ साधुरामजी ने अपना मोबाइल खोलकर मेरे आगे स्क्रीन कर दिया.

‘अरे! तो उनसे बात कर लीजिए काल करके.’ मैंने सलाह दी.

‘काल भी किया है लेकिन उठा नहीं रहे, इमरजेंसी वार्ड में होंगे शायद.’ साधुरामजी बोले.

मैंने उनका मोबाइल देखा. सारा मामला साफ़ हो गया. शेखर बाबू का नंबर हैक हो गया था. दूसरी तरफ शेखर बाबू नहीं कोई ‘हैकर बाबू’ थे.

वाट्सएप संवाद कुछ इस तरह हुआ था; हेलो...आप से एक काम था....बोलिए सर...दो हजार रूपये की तत्काल जरूरत है... शाम को लौटा देंगे...नंबर दीजिए सर, किस पर ट्रांसफर करना है... सर फोन क्यों नहीं उठा रहे?... ऑफ है...आप पैसे  डाल दीजिये...शाम तक लौटा देंगे...’

‘आपने रुपए ट्रांसफर तो नहीं किए साधुरामजी?’ मैंने चिंता व्यक्त की.

‘अभी तक तो नहीं किए, आपके पास इसीलिए आया हूँ मेरा डिजिटल बैंकिंग का अनुभव नहीं है. आपके खाते से कर दीजिए अभी, मैं आपको नकद दे देता हूँ.’ वे बोले.

‘रुकिए, जल्दी मत कीजिए... थोड़ी बातचीत और करते हैं उनसे..’ मैंने शेखर बाबू से संवाद को कुछ आगे बढाया...’सर,यह सब कैसे? कब हो गया?... प्रेस से घर जा रहा था...स्कूटर फिसल गया... नजदीक के अस्पताल में भरती करा गया कोई रिक्शावाला... बहुत बुरा हुआ सर....ध्यान रखियेगा अपना... वह तो रख रहा हूँ आप दो हजार रूपये डाल दीजिये प्लीज...इलाज शुरू होना है...जी अवश्य आप फ़िक्र न करें...नंबर दीजिये...आप फोन क्यों नहीं उठा रहे?....ये नंबर है....इस पर ट्रांसफर करिए....शाम को लौटा देंगे... ठीक है सर...करता हूँ...सर एक कविता भेजी है....आप पैसे डाल दीजिये...बहुत जरूरत है...सर कविता पढ़िए नई वाली... तुम पैसे डालो यार....अच्छा सर एक व्यंग्य ही पढ़ लीजिए.... तुम पैसे डाल रहे हो या नहीं...सर आप व्यंग्य देख रहे हो या नहीं...चलिए एक दोहा ही पढ़ लीजिए...अरे यार बीमार को और परेशान मत करो...यह ठीक नहीं... अरे सर पढ़ लीजिये दोहा नहीं तो हायकू भेज दूंगा...मेरे पास ताका भी है....अच्छा यही बता दीजिये आपका नाम क्या है शेखर बाबू...?’ हैकर बाबू की बोलती बंद हो गई थी, अब वे वॉट्सएप से गायब हो चुके थे...!

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, December 21, 2020

मुट्ठी चरित

मुट्ठी चरित

मेरे घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर लगे टीवी स्क्रीन पर उस दिन गब्बरसिंह के साथी शोले बरसा रहे थे। काशीराम घर मे से आधी बोरी अनाज ले आया। ‘क्या लाये हो कासीराम?’ कालिया ने अपनी घनी मूंछों के पीछे से पीले दांत दिखाते हुए कहा। ‘हुजूर जुवार लाया हूँ।’ काशीराम ने चबूतरे पर बोरी रखते हुए कहा तो कालिया भड़क गया- ‘हमारे लिए बस आधी मुट्ठी जुवार... बाकी क्या बेटी के बारातियों को खिलाने के लिए रखी है..’ आधी बोरी अनाज कालिया के लिए केवल 'आधी मुट्ठी' के बराबर है। बोरी भर अनाज में काशीराम का सुख-चैन दांव पर लगा हुआ था।


मुट्ठी मुट्ठी में फर्क होता है। मित्र सुदामा की एक मुट्ठी में श्रीकृष्ण को एक लोक नजर आता है। जब तक मुट्ठी बंद रहती है तब तक रहस्य पर पर्दा पड़ा रहता है। जैसे ही मुट्ठी खुलती है चावल के दाने दोनों मित्रों के हृदय सागर को असंख्य प्रेममोतियों से मालामाल कर देते हैं।


मुझे तो इस पुरानी कहावत में भी संदेह रहता है कि ‘बंद मुट्ठी लाख की,खुल जाए तो ख़ाक की’। ये बिलकुल गलत बात है। यदि बंद मुट्ठी में से थोड़ी सी भस्म भी निकलती है तो उसका भी बड़ा मोल हो सकता है। वह भी बहुमूल्य हो सकती है। किसी पुराने वैद्यराज से पूछकर देखिये, कितनी महंगी होती है ‘स्वर्ण भस्म'। कल्लू पंसारी की मुट्ठी ही क्या उसकी चुटकी में दबी ‘केसर’ या गफूर गुल्लू की पुड़िया में बंद ‘पावडर’ का भाव कितना होता है यह खरीदने वाला ही जानता है।


यों देखा जाए तो इंसान की मुट्ठी हमेशा से सामूहिकता और एकजुटता का सटीक उदाहरण रही है। जब सारी उंगलियाँ एक साथ मिल जाती हैं तब मुट्ठी बनती है। एक नेताजी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे, कहने लगे ‘मुट्ठी भर लोग’ यदि उनके खिलाफ वोट देते भी हैं तो क्या फर्क पड़ने वाला है। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि ये ‘मुट्ठियाँ’ ही जब संकल्प,साहस और शक्ति से भर जाती हैं तो ‘मुक्का’ में बदल जाया करती हैं। जब जब मुट्ठियों नें संकल्पों की मशालें और विचारों के झंडे थामे हैं देश और दुनिया में महान क्रांतियाँ होती रही हैं। एकता में शक्ति होती है, यह बात यों ही नहीं कह दी गयी है। 


मतदान के बाद अनाज की बोरी 'काशीराम' चबूतरे पर रख आता है। 'सुदामाओं' की पोटली खुलने का इंतज़ार कई 'द्वारकाधीश' करने लगते हैं। बूट पॉलिश’ फिल्म का ख़ूबसूरत गीत हमारे यहाँ खूब लोकप्रिय है , ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है !’ मुट्ठी में है तकदीर हमारी, हमने किस्मत को बस में किया है। 'ईवीएम' और 'मतपेटियां' भी प्रजातंत्र की ऐसी ही बंद मुट्ठियाँ होती हैं जो खुलने पर किसी को विजेता का ताज पहनाकर मालामाल करती हैं और किसी के सामने जीवन का सुखचैन छिन जाने का संकट ला खड़ा कर देती हैं।


इन प्रजातांत्रिक मुट्ठियां जब धीरे धीरे खुलने रखती हैं, अनेक दिल धड़कने लगते हैं, बहुतों  की ‘बल्ले बल्ले’ होने लगती है....कई के दिल बैठ भी जाते हैं. फूगे हुए गुब्बारों की तरह उछलते दिलों के अलावा कई पंक्चर दिल भी चुनाव परिणाम वाले दिन सहजता से  अपने आसपास दिखाई देने लगते हैं... 


ब्रजेश कानूनगो


Friday, October 16, 2020

'दिशा जंगल' की दशा और दिशा

दिशा जंगल' की दशा और दिशा

उस दिन साधुरामजी आए तो बड़े खिन्न लग रहे थे। वैसे यह कोई नई बात नहीं थी 'खिन्न' रहना उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है।

दरअसल वे स्वच्छता अभियान के तहत गाँवों में बनाए गए शौचालयों के कुछ चित्र फेसबुक पर देखकर व्यथित थे। कहने लगे-'एक अच्छी योजना में थोड़ी बहुत गड़बड़ी को भी लोग मुद्दा बनाकर मखौल उड़ाने लगते हैं!'

'ऐसा क्या हो गया साधुरामजी?' मैंने पूछ लिया ताकि वे अपने भीतर का गुबार निकालकर थोड़ा हल्के हो जाएं।

'ये देखिये, इस शौचालय में किसी ने पान, बीड़ी की दुकान सजा ली है, और यह दूसरे में देखिए टॉयलेट की सीट के बीच से एक पपीते का पेड़ निकल आया है!'  साधुरामजी ने मोबाइल स्क्रीन मेरे आगे कर दिया।

'यह तो मैं पहले ही देख चुका हूँ साधुरामजी। पपीते का पेड़ तो शायद इस लिए उग आया होगा कि किसी ने खाते वक्त बीज निगल लिया होगा।'मैंने चुहुल की। मैं जानता था कि यह सब फोटोशॉप का करिश्मा भी हो सकता था। पर शौचालय में दुकान सजाने में कुछ सच्चाई जरूर नजर आई।

'तुम्हे मजाक सूझ रहा पर ऐसी बातों से हमारी अच्छी योजनाओं की बदनामी होती है।' साधुरामजी बोले।

'काहे कि बदनामी! जब भविष्य में आज की सभ्यता का मूल्यांकन होगा तब इन सब चीजों से इतिहासकारों को मदद मिलेगी। सत्य के करीब होगा इतिहास लेखन।'

'तुम खुराफाती हो, मजे लेने से बाज नहीं आओगे!' वे नाराज होकर मेरे घर से वॉक आउट कर गए किन्तु मुझे  'शौचालयों की  दशा और दिशा' पर चिंतन करने को विवश कर गए।

मुझे याद आया दादा कोंडके की एक फिल्म का वह दृश्य जिसमें एक विदेशी सैलानी ऊँट पर बैठकर भारत के गांव का भ्रमण करता है जब वह एक गाँव के सामने से गुजरता है तब जिज्ञासा से पूछता है - 'क्या या गांव का टॉयलेट है?' तब दादा उसे निर्विकार बताते हैं 'नहीं यह शौचालय नहीं है यह हमारे गांव का प्राथमिक स्कूल है।'  विदेशी सैलानी की आंखें आंखें फटी रह जाती हैं।

एक और कहानी याद आती है जिसमें उस समय की एक परंपरा का बहुत रोचक वर्णन करते हुए कथाकार ने एक गांव में आई बारात और उसके सत्कार का चित्रण किया था। उस काल में जितने दिन बाराती गांव में रहते लगता कोई उत्सव चल रहा हो। ढोल और बैंड बाजों के शोर से वातावरण कई दिनों तक लोक संगीत में डूबा रहता था। सुबह-सुबह बारातियों को शौच के लिए दिशा मैदान व स्नान आदि के लिए नदी किनारे ढोल नगाड़ों के साथ ले जाया जाता था। धरती की गोद में शीतल पवन के झौकों और विभिन्न वनस्पतियों की दिलकश सुगंध के बीच लोगों के नित्य कर्म निपटते थे। यह भी तत्कालीन टॉयलेट का एक प्राकृतिक स्वरूप होता था।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे, उनमें स्नानागार की पुष्टि तो होती है किंतु मनुष्य के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अधिक स्पष्ट नही है।

हां, आधुनिक भारत में बड़े लोगों के बाथरूम में बड़ी बड़ी तिजोरियों में बड़े-बड़े नोटों की बड़ी-बड़ी गड्डियाँ मिलने के सबूत खुफिया एजेंसियों की फाइलों में मिल जाते हैं। कहना सिर्फ इतना है  कि शौचालयों के बारे में प्राचीन काल से संदर्भ मिले न मिले, आधुनिक भारत के अधिकांश संदर्भ यहीं से मिलते हैं। वर्तमान में इनके बारे में प्रत्येक मनुष्य में जिज्ञासा सदा से बनी रही है। हम अधिक से अधिक जानना चाहते हैं टॉयलटों के बारे में। हमारे ही नहीं हम दूसरों के टॉयलेट का रहस्य जानने के लिए भी लालायित बने रहते हैं। उसका टॉयलेट मेरे टॉयलेट से बेहतर क्यों? 

खेतों की बागड़ और रेल पटरियों के किनारों  के अलावा भी टॉयलेट की बहुमूल्य, बहुरंगी व  खूबसूरत दुनिया होती है। चिंतकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों आदि के जीवन में तो शौचालय का महत्व बहुत अधिक होता है। टॉयलेट वह स्थान है जहां हम अपने विचारों का शोधन करते हुए असीम शांति को महसूस कर सकते हैं। जहां बैठकर देश दुनिया के बारे में सार्थक चिंतन किया जा सकता है। इसलिए अपने घरों में टॉयलेट बनवाइए और कृपया उसमें दुकान मत सजाइये। उसमें पेड़ मत उगाइये।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, October 6, 2020

श्री' का यूनिट पॉवर

'श्री' का यूनिट पॉवर

साधुरामजी को मैंने छेडते हुए कहा-‘श्रीमान जी, जब कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों न उसके सम्मान सूचक विशेषण वापिस ले लिए जाना चाहिए?’ जैसे वह अपने नाम के आगे ‘डॉ’ लगाता हो या योगाचार्य, स्वामी, आचार्य जैसे किसी आदरणीय पदनाम को धारित करता हो, उसे तुरंत विलोपित कर दिया जाना चाहिए.’ 

‘यह भी कोई बात हुई भला! कल से मैंने कोई गलती कर दी तो तुम कहोगे मैं अपने नाम के आगे इकलौता  ‘श्री’ भी न लगाऊँ !’

‘हाँ, इसमें क्या बुराई है, जानते नहीं एक आतंकी को ‘श्री’ कह देने से देश में कितना बवाल हो गया था.’ मैंने कहा.

‘तो क्या हुआ, हम अपने संस्कार भूल जाँए? बुरे काम से घृणा करने की परम्परा रही है हमारे यहाँ, अपराधी भी एक मनुष्य होता है. सम्बोधन में उसके लिए भी ‘श्री’ का प्रयोग करना गलत नही कहा जा सकता।’

‘लेकिन जो व्यक्ति गलत काम करता है उसे ‘श्री’ कैसे कहा जा सकता है?’ मैने उनसे असहमत होते हुए पूछ लिया।

‘जो भी हो, अपराधी को उसके कर्म के लिए दंडित किया जा सकता है, एक हमनस्ल प्राणी के तौर पर हर मनुष्य को मर्यादित सम्बोधन ही किया जाना चाहिए। यही हमारी गौरवशाली परम्परा भी रही है. रावण और कंस सहित अनेक खलनायकों को सम्मान दिया जाता रहा है हमारे यहाँ.’

साधुरामजी अपने कथ्य पर अडिग थे, उनके तर्क में भी काफी दम दिखाई दे रहा था फिर भी मैने जिज्ञासा जाहिर करते हुए उनसे पूछा- ‘जब आप साधु और शैतान में कोई भेद नही करेंगे तो कैसे पता चलेगा कि कौन सज्जन और चरित्रवान है और कौन धूर्त और पाखंडी या चालबाज? सब के सब ‘श्री’, फिर तो सब एक ही तराजू में एक ही वजन में तुलते रहेंगे? यह तो बडी ना-इंसाफी है हुजूर. यह न करें तो क्या करें,अब आप ही बताइये कुछ.’

साधुरामजी ने किसी दार्शनिक की तरह आसमान की ओर निहारा और पंडित जवाहर लाल नेहरू की तरह दाहिने हाथ की तर्जनी ठोडी पर टिकाते कहने लगे-‘तुम्हे याद होगा बडे-बडे संत महात्माओं के आगे 108 श्री, 1008 श्री लगाने की परम्परा हमारे यहाँ रही है। यही हमारी सभ्यता है। पांच हजार साल पुरानी हमारी सभ्यता को कैसे भुलाया जा सकता है। इसी तरह आधार नंबर की तर्ज पर  प्रत्येक व्यक्ति के आँकडों और सर्वे के अनुसार जनगणना के वक्त ही उसका व्यक्तिगत ‘श्री’  युनिट पॉवर निधारित कर दिया जाए। बाद में उसके नाम के साथ उतने ही 'श्री' का प्रयोग करना शायद अधिक तर्क संगत रहेगा।’ मैं साधुरामजी का चेहरा तकता रह गया।

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, September 10, 2020

माई री मैं कापे लिखूँ..!

 माई री मैं कापे लिखूँ..! 


उसने अपने घर की सारी खिड़कियां खोल रखी थीं। हवा का प्रवेश कमरे में भरपूर हो रहा था, फिर भी बेचैनी जैसे कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक द्वंद्व सा छिड़ा हुआ था मन के भीतर। घर की खिड़कियों के अलावा उसने अपने लैपटॉप में भी बहुत सारी 'विंडोज' ओपन कर रखी थीं। कुछ में अखबारों के 'ई संस्करण' एक में फेसबुक और एक में नया डॉक्यूमेंट खुला हुआ था, जिस पर वह कभी कुछ टाइप करता तो कभी  तुरंत डिलीट भी कर देता था। 


ऐसी स्थितियां अक्सर उसके सामने आती रहती थीं। विशेषकर तब जब एक साथ दो तीन ऐसे सामयिक विषय सामने होते थे जिन पर वह अपनी 'उलटबांसी' लिख देना चाहता है। अखबारों के संपादकीय पेज पर ऐसी 'तिरछी नजरों' और 'चुटकियों' की बड़ी मांग जो निकल आई है इन दिनों।  

परेशानी तब होती है जब व्यंग्यकार के सामने 'सरकारी तोता' और 'राजनीतिक कौआ'  एक साथ चले आते हैं।  जरूरी नहीं कि तोते या कौआ  के आने से कोई ज्यादा कष्ट है,  'हाथी' और 'हिरन'  भी आ सकते हैं। यह तो उदाहरण मात्र है। 

अब  'तोते' पर तीर चलाएं या 'हिरण' का शिकार करें। हाल यह हो जाता है कि थोड़ी ही देर में देशभर के व्यंग्यकार शिकारी 'तोते' की पसलियां और 'हिरण' का हृदय निकालकर संपादक के पास पहुंचा देते हैं। 

वह जमाना तो रहा नहीं कि पहले लिखेंगे फिर टाइप करवाएंगे फिर लिफाफा बनाकर डाकघर के हवाले करेंगे। अब यदि वे ऐसा करेंगे तो वही होगा जो रामाजी के साथ हुआ था। लोग कहेंगे ही 'रामाजी रईगिया ने रेल जाती री…!'  इसलिए वे सबसे पहले रेल में चढ़ना चाहते हैं। 


अभी हिरण और तोते से निपटने ही हैं कि 'अभिनेता' और 'जानेमन' आ खड़े होते हैं... कहते हैं, 'लो हम आ गए, अब हम पर लिखो!'  व्यंग्यकार बड़ा परेशान है... 'माई री मैं कापे लिखूँ...मेरे 'जिया' में सब कुछ बड़ा 'अशांत'।'  


बड़ी दुविधा आ खड़ी होती है स्तंभकार के सामने। किस पर लिखे, बल्कि पहले किस पर लिखे। 'अभिनेता' पर भी बहुत मसाला तैयार और 'जानेमन' भी 'बयान'  देने को तत्पर। अब यदि अभिनेता पर लिखने बैठते हैं और इस बीच जयपुर का कोई जांबाज या इंदौर के कोई भियाजी  अपना ईमेल पहले सेंड कर देते हैं तो फिर उनके आलेख का क्या होगा। आप जरा समझिये व्यंग्यकार की इस परेशानी को।  


ऐसा कहानीकार या कवि के साथ कभी नहीं होता। कहानीकार किसी भक्तन और बाबाजी की प्रेमकथा तत्काल लिखने की हड़बड़ी में नहीं होता। बाबाजी की कारावास समाधि यात्रा पर जाने और भक्तन के बॉलीवुड में वापस लौट आने तक वह लिखने की प्रतीक्षा कर सकता है। कवि चाहे जब 'चिड़िया' या 'पत्थर की घट्टी'  पर कविता लिख सकता है। चिड़िया के दुनिया से विलुप्त होने के बाद और पत्थर की घट्टी के पृथ्वी के गर्भ में समा जाने के बाद भी वह कभी भी उसकी याद में गीत गा सकता है। अखबारी व्यंग्यकार के पास यह अवसर नहीं है। यहां तो बड़ी हड़बड़ी का माहौल बना हुआ है। उसे तो अभी का अभी डिस्पैच करना है, वरना कोई और अपना माल खपा देगा। यह कितना अन्याय है इस बेचारे लेखक के साथ। इतनी मेहनत और लेखन के बावजूद उसका उचित मूल्यांकन नहीं हो पा रहा। कुछ उदार हृदय संपादक उसके लिखे पर थोड़ा बहुत पत्रं पुष्पं दे भी देते हैं, मगर ज्यादातर तो रचना प्रकाशित करके वाया कतरन साझा उसका सम्मान फेसबुक दोस्तों में बढ़ाने का पुनीत कार्य करते हैं। यह भी क्या कम है। इस तरह साहित्य के लिए उनका जो योगदान बना हुआ है इसके लिए तो लेखक को कृतज्ञ होना चाहिए। 


बहरहाल, अखबारी व्यंग्य लेखक की अपनी परेशानियां होती हैं,  जिन का सामना उसे खुद ही करना होता है। और वह करता भी है।  देश भर के अखबारों के हृदय स्थल में जनरुचि के मुद्दों पर रोज प्रतिक्रिया देना कोई आसान काम भी नहीं है। इनका जुझारूपन प्रणम्य है। नमन करने योग्य है। इस जीव को हम प्रणाम करते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो 

Tuesday, September 8, 2020

योगासन से जनासन तक

 योगासन से  जनासन तक 


साधुरामजी की नजर जब मेरे बढ़ते हुए पेट की ओर गई तो बरबस उनका सींकिया शरीर कांप गया। थोड़ा झल्लाकर बोले- 'यह क्या हो रहा है भाई! सारी बीमारियों की जड़ है यह मोटापा, कम करिए जरा अपनी तोंद को, इसे कम करने के लिए कोई लोकपाल नहीं आने वाला है।' 


मैं थोड़ा झेंप सा गया, बोला- 'अब मैं क्या करूं साधुरामजी बढ़ती उम्र में यह सब होता ही है और मेरे पिताजी की भी ऐसी ही तोंद निकली हुई थी, खानदानी पहचान है'। मैंने अपनी झेंप छिपाते हुए स्स्पष्टीकरण दिया तो मेरे पेट पर एक हल्की सी धौल जमाते हुए वे बोले- 'सुबह सुबह आ जाया करो मेरे घर, मैं नित्य योगासन करता हूं, तुम भी करना, सब मोटापा छट जाएगा।'  


साधुरामजी का आदेश मेरे लिए पार्टी हाईकमान के आदेश की तरह ही होता है। मैं दूसरे दिन तड़के उनकी घर की छत पर पहुंचा तो वे सूर्य नमस्कार की कुछ क्रियाएं करने में लगे हुए थे। 

उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा-'करो तुम भी करो।'  मैंने टाल दिया-'आज तबीयत ठीक नहीं है, कल से करूंगा।'  

मैं जानता था कल कभी नहीं आता और इस प्रकार योगासन से मैं सहज रूप से बच भी सकता हूं।  


विषय को दूसरी दिशा देने के उद्देश्य से मैंने साधुरामजी से पूछ लिया-'यह तो ठीक है साधुरामजी कि योगासन से हमारा शरीर स्वस्थ हो जाता है, बीमारियां दूर होती हैं, पर क्या ऐसा कोई आसन भी है जिससे हमारे समाज का स्वास्थ्य सुधर पाता हो, व्यवस्था की बीमारियां समाप्त हो जाती हों।'  

'क्यों मजाक करते हो, ऐसे भी कोई अटपटे आसन हो सकते हैं।' साधुरामजी योगासन लगाना छोड़ कर मेरे पास आसन पर आकर बैठ गए।

'हां हो सकते हैं ऐसे आसन भी। राजनीतिक लोग और सरकारें बहुत पहले से 'आश्वासन'  का प्रयोग करती रही हैं, मान्यता है कि हर समस्या 'आश्वासन' के जरिए हल हो जाती है।  सरकार की सेहत में इस आसन का बड़ा महत्व रहा है। जो नेता जितनी अच्छी तरह से यह आसन लगाने में सफल होता है उसका राजनीतिक स्वास्थ्य लंबे समय तक ठीक बना रहता है।'

साधुरामजी भी शायद अब मूड में आ गए थे तो मजे लेते हुए बोले- 'लेकिन जनता बेचारी को क्या फर्क पड़ता है, असल में उसकी समस्या तो जस की तस बनी रहती है।' 

'ऐसा नहीं है साधुरामजी, लोगों ने खुद अपना गलत आसन चुन रखा था।  वर्षों तक उन्होंने इसी आसन की मदद से अपनी सेहत बनाए रखने का भ्रम बनाए रखा। किसी भी प्रकार का अच्छा बुरा उन पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ता था। उनका मानना था कि यही मूकासन उनकी सहायता करता है। चिंता चिता समान होती है इस आसन का सूत्र है। साधक समझता रहा की चिंता से दूरी बनाए रखकर अपने स्वास्थ्य की क्षति को रोक पा रहा है।' मैंने कहा।

'लेकिन अब तो यह संभव नहीं रह गया है चुप रहकर समस्याएं हल नहीं हो सकती। व्यवस्था की बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि इस कठिन समय में आश्वासन और मूकासन जैसे आसन निष्फल दिखाई दे रहे हैं।' साधुरामजी ने चिंता व्यक्त की।


'बात तो ठीक है आपकी साधुरामजी लेकिन समय और परिस्थितियाँ ही इसका रास्ता भी दिखाते हैं। अब देखिए एक और भी आसान है 'धरनासन'। यह आसान भी बड़ा कमाल का है। असर करता है। इसका प्रयोग भी हर कोई अपनी बात मनवाने और मुद्दे पर ध्यानाकर्षण हेतु कर सकता है। पहले कभी सरकार के विरोध में विपक्ष और जनता धरनासन  लगाकर उसे जगाने का प्रयास किया करते थे लेकिन अब तो कई सरकारें खुद भी यह आसान लगाते दिखाई देने लगी हैं।और यह इतना है कारगर है कि आम और खास आदमी से लेकर बड़े-बड़े नेता समाजसेवी योग गुरु तक इस आसन के कायल हो रहे हैं।' मैंने कहा तो साधुरामजी ठहाका मारकर बोले- 'वाह! क्या बात है! अब तो समझो व्यवस्था के सारे विकारों के 'शवासन'  में चले जाने के प्रबल योग बन रहे हैं।


ब्रजेश कानूनगो