Monday, December 21, 2020

मुट्ठी चरित

मुट्ठी चरित

मेरे घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर लगे टीवी स्क्रीन पर उस दिन गब्बरसिंह के साथी शोले बरसा रहे थे। काशीराम घर मे से आधी बोरी अनाज ले आया। ‘क्या लाये हो कासीराम?’ कालिया ने अपनी घनी मूंछों के पीछे से पीले दांत दिखाते हुए कहा। ‘हुजूर जुवार लाया हूँ।’ काशीराम ने चबूतरे पर बोरी रखते हुए कहा तो कालिया भड़क गया- ‘हमारे लिए बस आधी मुट्ठी जुवार... बाकी क्या बेटी के बारातियों को खिलाने के लिए रखी है..’ आधी बोरी अनाज कालिया के लिए केवल 'आधी मुट्ठी' के बराबर है। बोरी भर अनाज में काशीराम का सुख-चैन दांव पर लगा हुआ था।


मुट्ठी मुट्ठी में फर्क होता है। मित्र सुदामा की एक मुट्ठी में श्रीकृष्ण को एक लोक नजर आता है। जब तक मुट्ठी बंद रहती है तब तक रहस्य पर पर्दा पड़ा रहता है। जैसे ही मुट्ठी खुलती है चावल के दाने दोनों मित्रों के हृदय सागर को असंख्य प्रेममोतियों से मालामाल कर देते हैं।


मुझे तो इस पुरानी कहावत में भी संदेह रहता है कि ‘बंद मुट्ठी लाख की,खुल जाए तो ख़ाक की’। ये बिलकुल गलत बात है। यदि बंद मुट्ठी में से थोड़ी सी भस्म भी निकलती है तो उसका भी बड़ा मोल हो सकता है। वह भी बहुमूल्य हो सकती है। किसी पुराने वैद्यराज से पूछकर देखिये, कितनी महंगी होती है ‘स्वर्ण भस्म'। कल्लू पंसारी की मुट्ठी ही क्या उसकी चुटकी में दबी ‘केसर’ या गफूर गुल्लू की पुड़िया में बंद ‘पावडर’ का भाव कितना होता है यह खरीदने वाला ही जानता है।


यों देखा जाए तो इंसान की मुट्ठी हमेशा से सामूहिकता और एकजुटता का सटीक उदाहरण रही है। जब सारी उंगलियाँ एक साथ मिल जाती हैं तब मुट्ठी बनती है। एक नेताजी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त थे, कहने लगे ‘मुट्ठी भर लोग’ यदि उनके खिलाफ वोट देते भी हैं तो क्या फर्क पड़ने वाला है। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि ये ‘मुट्ठियाँ’ ही जब संकल्प,साहस और शक्ति से भर जाती हैं तो ‘मुक्का’ में बदल जाया करती हैं। जब जब मुट्ठियों नें संकल्पों की मशालें और विचारों के झंडे थामे हैं देश और दुनिया में महान क्रांतियाँ होती रही हैं। एकता में शक्ति होती है, यह बात यों ही नहीं कह दी गयी है। 


मतदान के बाद अनाज की बोरी 'काशीराम' चबूतरे पर रख आता है। 'सुदामाओं' की पोटली खुलने का इंतज़ार कई 'द्वारकाधीश' करने लगते हैं। बूट पॉलिश’ फिल्म का ख़ूबसूरत गीत हमारे यहाँ खूब लोकप्रिय है , ‘नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है !’ मुट्ठी में है तकदीर हमारी, हमने किस्मत को बस में किया है। 'ईवीएम' और 'मतपेटियां' भी प्रजातंत्र की ऐसी ही बंद मुट्ठियाँ होती हैं जो खुलने पर किसी को विजेता का ताज पहनाकर मालामाल करती हैं और किसी के सामने जीवन का सुखचैन छिन जाने का संकट ला खड़ा कर देती हैं।


इन प्रजातांत्रिक मुट्ठियां जब धीरे धीरे खुलने रखती हैं, अनेक दिल धड़कने लगते हैं, बहुतों  की ‘बल्ले बल्ले’ होने लगती है....कई के दिल बैठ भी जाते हैं. फूगे हुए गुब्बारों की तरह उछलते दिलों के अलावा कई पंक्चर दिल भी चुनाव परिणाम वाले दिन सहजता से  अपने आसपास दिखाई देने लगते हैं... 


ब्रजेश कानूनगो


Friday, October 16, 2020

'दिशा जंगल' की दशा और दिशा

दिशा जंगल' की दशा और दिशा

उस दिन साधुरामजी आए तो बड़े खिन्न लग रहे थे। वैसे यह कोई नई बात नहीं थी 'खिन्न' रहना उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा है।

दरअसल वे स्वच्छता अभियान के तहत गाँवों में बनाए गए शौचालयों के कुछ चित्र फेसबुक पर देखकर व्यथित थे। कहने लगे-'एक अच्छी योजना में थोड़ी बहुत गड़बड़ी को भी लोग मुद्दा बनाकर मखौल उड़ाने लगते हैं!'

'ऐसा क्या हो गया साधुरामजी?' मैंने पूछ लिया ताकि वे अपने भीतर का गुबार निकालकर थोड़ा हल्के हो जाएं।

'ये देखिये, इस शौचालय में किसी ने पान, बीड़ी की दुकान सजा ली है, और यह दूसरे में देखिए टॉयलेट की सीट के बीच से एक पपीते का पेड़ निकल आया है!'  साधुरामजी ने मोबाइल स्क्रीन मेरे आगे कर दिया।

'यह तो मैं पहले ही देख चुका हूँ साधुरामजी। पपीते का पेड़ तो शायद इस लिए उग आया होगा कि किसी ने खाते वक्त बीज निगल लिया होगा।'मैंने चुहुल की। मैं जानता था कि यह सब फोटोशॉप का करिश्मा भी हो सकता था। पर शौचालय में दुकान सजाने में कुछ सच्चाई जरूर नजर आई।

'तुम्हे मजाक सूझ रहा पर ऐसी बातों से हमारी अच्छी योजनाओं की बदनामी होती है।' साधुरामजी बोले।

'काहे कि बदनामी! जब भविष्य में आज की सभ्यता का मूल्यांकन होगा तब इन सब चीजों से इतिहासकारों को मदद मिलेगी। सत्य के करीब होगा इतिहास लेखन।'

'तुम खुराफाती हो, मजे लेने से बाज नहीं आओगे!' वे नाराज होकर मेरे घर से वॉक आउट कर गए किन्तु मुझे  'शौचालयों की  दशा और दिशा' पर चिंतन करने को विवश कर गए।

मुझे याद आया दादा कोंडके की एक फिल्म का वह दृश्य जिसमें एक विदेशी सैलानी ऊँट पर बैठकर भारत के गांव का भ्रमण करता है जब वह एक गाँव के सामने से गुजरता है तब जिज्ञासा से पूछता है - 'क्या या गांव का टॉयलेट है?' तब दादा उसे निर्विकार बताते हैं 'नहीं यह शौचालय नहीं है यह हमारे गांव का प्राथमिक स्कूल है।'  विदेशी सैलानी की आंखें आंखें फटी रह जाती हैं।

एक और कहानी याद आती है जिसमें उस समय की एक परंपरा का बहुत रोचक वर्णन करते हुए कथाकार ने एक गांव में आई बारात और उसके सत्कार का चित्रण किया था। उस काल में जितने दिन बाराती गांव में रहते लगता कोई उत्सव चल रहा हो। ढोल और बैंड बाजों के शोर से वातावरण कई दिनों तक लोक संगीत में डूबा रहता था। सुबह-सुबह बारातियों को शौच के लिए दिशा मैदान व स्नान आदि के लिए नदी किनारे ढोल नगाड़ों के साथ ले जाया जाता था। धरती की गोद में शीतल पवन के झौकों और विभिन्न वनस्पतियों की दिलकश सुगंध के बीच लोगों के नित्य कर्म निपटते थे। यह भी तत्कालीन टॉयलेट का एक प्राकृतिक स्वरूप होता था।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में जो तत्कालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे, उनमें स्नानागार की पुष्टि तो होती है किंतु मनुष्य के निवृत्त होने की क्या व्यवस्था रही होगी, इसके बारे में जानकारी अधिक स्पष्ट नही है।

हां, आधुनिक भारत में बड़े लोगों के बाथरूम में बड़ी बड़ी तिजोरियों में बड़े-बड़े नोटों की बड़ी-बड़ी गड्डियाँ मिलने के सबूत खुफिया एजेंसियों की फाइलों में मिल जाते हैं। कहना सिर्फ इतना है  कि शौचालयों के बारे में प्राचीन काल से संदर्भ मिले न मिले, आधुनिक भारत के अधिकांश संदर्भ यहीं से मिलते हैं। वर्तमान में इनके बारे में प्रत्येक मनुष्य में जिज्ञासा सदा से बनी रही है। हम अधिक से अधिक जानना चाहते हैं टॉयलटों के बारे में। हमारे ही नहीं हम दूसरों के टॉयलेट का रहस्य जानने के लिए भी लालायित बने रहते हैं। उसका टॉयलेट मेरे टॉयलेट से बेहतर क्यों? 

खेतों की बागड़ और रेल पटरियों के किनारों  के अलावा भी टॉयलेट की बहुमूल्य, बहुरंगी व  खूबसूरत दुनिया होती है। चिंतकों, साहित्यकारों और वैज्ञानिकों आदि के जीवन में तो शौचालय का महत्व बहुत अधिक होता है। टॉयलेट वह स्थान है जहां हम अपने विचारों का शोधन करते हुए असीम शांति को महसूस कर सकते हैं। जहां बैठकर देश दुनिया के बारे में सार्थक चिंतन किया जा सकता है। इसलिए अपने घरों में टॉयलेट बनवाइए और कृपया उसमें दुकान मत सजाइये। उसमें पेड़ मत उगाइये।

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, October 6, 2020

श्री' का यूनिट पॉवर

'श्री' का यूनिट पॉवर

साधुरामजी को मैंने छेडते हुए कहा-‘श्रीमान जी, जब कोई व्यक्ति अपराध करता है तो क्यों न उसके सम्मान सूचक विशेषण वापिस ले लिए जाना चाहिए?’ जैसे वह अपने नाम के आगे ‘डॉ’ लगाता हो या योगाचार्य, स्वामी, आचार्य जैसे किसी आदरणीय पदनाम को धारित करता हो, उसे तुरंत विलोपित कर दिया जाना चाहिए.’ 

‘यह भी कोई बात हुई भला! कल से मैंने कोई गलती कर दी तो तुम कहोगे मैं अपने नाम के आगे इकलौता  ‘श्री’ भी न लगाऊँ !’

‘हाँ, इसमें क्या बुराई है, जानते नहीं एक आतंकी को ‘श्री’ कह देने से देश में कितना बवाल हो गया था.’ मैंने कहा.

‘तो क्या हुआ, हम अपने संस्कार भूल जाँए? बुरे काम से घृणा करने की परम्परा रही है हमारे यहाँ, अपराधी भी एक मनुष्य होता है. सम्बोधन में उसके लिए भी ‘श्री’ का प्रयोग करना गलत नही कहा जा सकता।’

‘लेकिन जो व्यक्ति गलत काम करता है उसे ‘श्री’ कैसे कहा जा सकता है?’ मैने उनसे असहमत होते हुए पूछ लिया।

‘जो भी हो, अपराधी को उसके कर्म के लिए दंडित किया जा सकता है, एक हमनस्ल प्राणी के तौर पर हर मनुष्य को मर्यादित सम्बोधन ही किया जाना चाहिए। यही हमारी गौरवशाली परम्परा भी रही है. रावण और कंस सहित अनेक खलनायकों को सम्मान दिया जाता रहा है हमारे यहाँ.’

साधुरामजी अपने कथ्य पर अडिग थे, उनके तर्क में भी काफी दम दिखाई दे रहा था फिर भी मैने जिज्ञासा जाहिर करते हुए उनसे पूछा- ‘जब आप साधु और शैतान में कोई भेद नही करेंगे तो कैसे पता चलेगा कि कौन सज्जन और चरित्रवान है और कौन धूर्त और पाखंडी या चालबाज? सब के सब ‘श्री’, फिर तो सब एक ही तराजू में एक ही वजन में तुलते रहेंगे? यह तो बडी ना-इंसाफी है हुजूर. यह न करें तो क्या करें,अब आप ही बताइये कुछ.’

साधुरामजी ने किसी दार्शनिक की तरह आसमान की ओर निहारा और पंडित जवाहर लाल नेहरू की तरह दाहिने हाथ की तर्जनी ठोडी पर टिकाते कहने लगे-‘तुम्हे याद होगा बडे-बडे संत महात्माओं के आगे 108 श्री, 1008 श्री लगाने की परम्परा हमारे यहाँ रही है। यही हमारी सभ्यता है। पांच हजार साल पुरानी हमारी सभ्यता को कैसे भुलाया जा सकता है। इसी तरह आधार नंबर की तर्ज पर  प्रत्येक व्यक्ति के आँकडों और सर्वे के अनुसार जनगणना के वक्त ही उसका व्यक्तिगत ‘श्री’  युनिट पॉवर निधारित कर दिया जाए। बाद में उसके नाम के साथ उतने ही 'श्री' का प्रयोग करना शायद अधिक तर्क संगत रहेगा।’ मैं साधुरामजी का चेहरा तकता रह गया।

ब्रजेश कानूनगो

Thursday, September 10, 2020

माई री मैं कापे लिखूँ..!

 माई री मैं कापे लिखूँ..! 


उसने अपने घर की सारी खिड़कियां खोल रखी थीं। हवा का प्रवेश कमरे में भरपूर हो रहा था, फिर भी बेचैनी जैसे कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक द्वंद्व सा छिड़ा हुआ था मन के भीतर। घर की खिड़कियों के अलावा उसने अपने लैपटॉप में भी बहुत सारी 'विंडोज' ओपन कर रखी थीं। कुछ में अखबारों के 'ई संस्करण' एक में फेसबुक और एक में नया डॉक्यूमेंट खुला हुआ था, जिस पर वह कभी कुछ टाइप करता तो कभी  तुरंत डिलीट भी कर देता था। 


ऐसी स्थितियां अक्सर उसके सामने आती रहती थीं। विशेषकर तब जब एक साथ दो तीन ऐसे सामयिक विषय सामने होते थे जिन पर वह अपनी 'उलटबांसी' लिख देना चाहता है। अखबारों के संपादकीय पेज पर ऐसी 'तिरछी नजरों' और 'चुटकियों' की बड़ी मांग जो निकल आई है इन दिनों।  

परेशानी तब होती है जब व्यंग्यकार के सामने 'सरकारी तोता' और 'राजनीतिक कौआ'  एक साथ चले आते हैं।  जरूरी नहीं कि तोते या कौआ  के आने से कोई ज्यादा कष्ट है,  'हाथी' और 'हिरन'  भी आ सकते हैं। यह तो उदाहरण मात्र है। 

अब  'तोते' पर तीर चलाएं या 'हिरण' का शिकार करें। हाल यह हो जाता है कि थोड़ी ही देर में देशभर के व्यंग्यकार शिकारी 'तोते' की पसलियां और 'हिरण' का हृदय निकालकर संपादक के पास पहुंचा देते हैं। 

वह जमाना तो रहा नहीं कि पहले लिखेंगे फिर टाइप करवाएंगे फिर लिफाफा बनाकर डाकघर के हवाले करेंगे। अब यदि वे ऐसा करेंगे तो वही होगा जो रामाजी के साथ हुआ था। लोग कहेंगे ही 'रामाजी रईगिया ने रेल जाती री…!'  इसलिए वे सबसे पहले रेल में चढ़ना चाहते हैं। 


अभी हिरण और तोते से निपटने ही हैं कि 'अभिनेता' और 'जानेमन' आ खड़े होते हैं... कहते हैं, 'लो हम आ गए, अब हम पर लिखो!'  व्यंग्यकार बड़ा परेशान है... 'माई री मैं कापे लिखूँ...मेरे 'जिया' में सब कुछ बड़ा 'अशांत'।'  


बड़ी दुविधा आ खड़ी होती है स्तंभकार के सामने। किस पर लिखे, बल्कि पहले किस पर लिखे। 'अभिनेता' पर भी बहुत मसाला तैयार और 'जानेमन' भी 'बयान'  देने को तत्पर। अब यदि अभिनेता पर लिखने बैठते हैं और इस बीच जयपुर का कोई जांबाज या इंदौर के कोई भियाजी  अपना ईमेल पहले सेंड कर देते हैं तो फिर उनके आलेख का क्या होगा। आप जरा समझिये व्यंग्यकार की इस परेशानी को।  


ऐसा कहानीकार या कवि के साथ कभी नहीं होता। कहानीकार किसी भक्तन और बाबाजी की प्रेमकथा तत्काल लिखने की हड़बड़ी में नहीं होता। बाबाजी की कारावास समाधि यात्रा पर जाने और भक्तन के बॉलीवुड में वापस लौट आने तक वह लिखने की प्रतीक्षा कर सकता है। कवि चाहे जब 'चिड़िया' या 'पत्थर की घट्टी'  पर कविता लिख सकता है। चिड़िया के दुनिया से विलुप्त होने के बाद और पत्थर की घट्टी के पृथ्वी के गर्भ में समा जाने के बाद भी वह कभी भी उसकी याद में गीत गा सकता है। अखबारी व्यंग्यकार के पास यह अवसर नहीं है। यहां तो बड़ी हड़बड़ी का माहौल बना हुआ है। उसे तो अभी का अभी डिस्पैच करना है, वरना कोई और अपना माल खपा देगा। यह कितना अन्याय है इस बेचारे लेखक के साथ। इतनी मेहनत और लेखन के बावजूद उसका उचित मूल्यांकन नहीं हो पा रहा। कुछ उदार हृदय संपादक उसके लिखे पर थोड़ा बहुत पत्रं पुष्पं दे भी देते हैं, मगर ज्यादातर तो रचना प्रकाशित करके वाया कतरन साझा उसका सम्मान फेसबुक दोस्तों में बढ़ाने का पुनीत कार्य करते हैं। यह भी क्या कम है। इस तरह साहित्य के लिए उनका जो योगदान बना हुआ है इसके लिए तो लेखक को कृतज्ञ होना चाहिए। 


बहरहाल, अखबारी व्यंग्य लेखक की अपनी परेशानियां होती हैं,  जिन का सामना उसे खुद ही करना होता है। और वह करता भी है।  देश भर के अखबारों के हृदय स्थल में जनरुचि के मुद्दों पर रोज प्रतिक्रिया देना कोई आसान काम भी नहीं है। इनका जुझारूपन प्रणम्य है। नमन करने योग्य है। इस जीव को हम प्रणाम करते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो 

Tuesday, September 8, 2020

योगासन से जनासन तक

 योगासन से  जनासन तक 


साधुरामजी की नजर जब मेरे बढ़ते हुए पेट की ओर गई तो बरबस उनका सींकिया शरीर कांप गया। थोड़ा झल्लाकर बोले- 'यह क्या हो रहा है भाई! सारी बीमारियों की जड़ है यह मोटापा, कम करिए जरा अपनी तोंद को, इसे कम करने के लिए कोई लोकपाल नहीं आने वाला है।' 


मैं थोड़ा झेंप सा गया, बोला- 'अब मैं क्या करूं साधुरामजी बढ़ती उम्र में यह सब होता ही है और मेरे पिताजी की भी ऐसी ही तोंद निकली हुई थी, खानदानी पहचान है'। मैंने अपनी झेंप छिपाते हुए स्स्पष्टीकरण दिया तो मेरे पेट पर एक हल्की सी धौल जमाते हुए वे बोले- 'सुबह सुबह आ जाया करो मेरे घर, मैं नित्य योगासन करता हूं, तुम भी करना, सब मोटापा छट जाएगा।'  


साधुरामजी का आदेश मेरे लिए पार्टी हाईकमान के आदेश की तरह ही होता है। मैं दूसरे दिन तड़के उनकी घर की छत पर पहुंचा तो वे सूर्य नमस्कार की कुछ क्रियाएं करने में लगे हुए थे। 

उन्होंने मेरी ओर देखकर कहा-'करो तुम भी करो।'  मैंने टाल दिया-'आज तबीयत ठीक नहीं है, कल से करूंगा।'  

मैं जानता था कल कभी नहीं आता और इस प्रकार योगासन से मैं सहज रूप से बच भी सकता हूं।  


विषय को दूसरी दिशा देने के उद्देश्य से मैंने साधुरामजी से पूछ लिया-'यह तो ठीक है साधुरामजी कि योगासन से हमारा शरीर स्वस्थ हो जाता है, बीमारियां दूर होती हैं, पर क्या ऐसा कोई आसन भी है जिससे हमारे समाज का स्वास्थ्य सुधर पाता हो, व्यवस्था की बीमारियां समाप्त हो जाती हों।'  

'क्यों मजाक करते हो, ऐसे भी कोई अटपटे आसन हो सकते हैं।' साधुरामजी योगासन लगाना छोड़ कर मेरे पास आसन पर आकर बैठ गए।

'हां हो सकते हैं ऐसे आसन भी। राजनीतिक लोग और सरकारें बहुत पहले से 'आश्वासन'  का प्रयोग करती रही हैं, मान्यता है कि हर समस्या 'आश्वासन' के जरिए हल हो जाती है।  सरकार की सेहत में इस आसन का बड़ा महत्व रहा है। जो नेता जितनी अच्छी तरह से यह आसन लगाने में सफल होता है उसका राजनीतिक स्वास्थ्य लंबे समय तक ठीक बना रहता है।'

साधुरामजी भी शायद अब मूड में आ गए थे तो मजे लेते हुए बोले- 'लेकिन जनता बेचारी को क्या फर्क पड़ता है, असल में उसकी समस्या तो जस की तस बनी रहती है।' 

'ऐसा नहीं है साधुरामजी, लोगों ने खुद अपना गलत आसन चुन रखा था।  वर्षों तक उन्होंने इसी आसन की मदद से अपनी सेहत बनाए रखने का भ्रम बनाए रखा। किसी भी प्रकार का अच्छा बुरा उन पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ता था। उनका मानना था कि यही मूकासन उनकी सहायता करता है। चिंता चिता समान होती है इस आसन का सूत्र है। साधक समझता रहा की चिंता से दूरी बनाए रखकर अपने स्वास्थ्य की क्षति को रोक पा रहा है।' मैंने कहा।

'लेकिन अब तो यह संभव नहीं रह गया है चुप रहकर समस्याएं हल नहीं हो सकती। व्यवस्था की बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि इस कठिन समय में आश्वासन और मूकासन जैसे आसन निष्फल दिखाई दे रहे हैं।' साधुरामजी ने चिंता व्यक्त की।


'बात तो ठीक है आपकी साधुरामजी लेकिन समय और परिस्थितियाँ ही इसका रास्ता भी दिखाते हैं। अब देखिए एक और भी आसान है 'धरनासन'। यह आसान भी बड़ा कमाल का है। असर करता है। इसका प्रयोग भी हर कोई अपनी बात मनवाने और मुद्दे पर ध्यानाकर्षण हेतु कर सकता है। पहले कभी सरकार के विरोध में विपक्ष और जनता धरनासन  लगाकर उसे जगाने का प्रयास किया करते थे लेकिन अब तो कई सरकारें खुद भी यह आसान लगाते दिखाई देने लगी हैं।और यह इतना है कारगर है कि आम और खास आदमी से लेकर बड़े-बड़े नेता समाजसेवी योग गुरु तक इस आसन के कायल हो रहे हैं।' मैंने कहा तो साधुरामजी ठहाका मारकर बोले- 'वाह! क्या बात है! अब तो समझो व्यवस्था के सारे विकारों के 'शवासन'  में चले जाने के प्रबल योग बन रहे हैं।


ब्रजेश कानूनगो

हवाईअड्डे की हड्डियाँ

 हवाईअड्डे की हड्डियाँ


बचपन के वे दिन अक्सर याद आते हैं जब हम स्कूल में छुट्टी की घंटी बजने के बाद अपनी कॉपियों से पन्ने निकालकर हवाईजहाज बना-बना कर छत से उन्हे उडाया करते थे। जब तक वह हवा में बना रहता हम रोमांच से भरे होते थे। जब कभी वह नीम के पेड़ पर अटक जाता हमारी सांसे भी जैसे अटक जाती थीं। नीचे मैदान में पानी के नल के पास जो कुछ फर्शियाँ जडीं थीं, वही हमारा एयरपोर्ट होता था। हर बच्चा इसी कोशिश में निशाना साधता था कि हवाई जहाज ठीक हवाईअड्डे पर ही उतरे,लेकिन अक्सर ऐसा होता नही था,कागज का प्लेन कहीं भी अपनी मर्जी से लेंड कर लिया करता था। बाद में आकाश में चीलगाडियों को देखते रहे।


हवाईजहाजों और विमानन को लेकर हमारे मन में जिज्ञासा और रोमांच का भाव बराबर बना रहा है। दादाजी भी अक्सर गर्मियों में छत पर तारों को निहारते हुए कहानियाँ सुनाते थे। उन्होने ही सबसे पहले बताया था कि जब श्रीराम लंका विजय करके अयोध्या लौटे तब वे आकाश मार्ग से यात्रा करते हुए आए थे। इस यात्रा के लिए उन्होने पुष्पक विमान का उपयोग किया था। जाहिर है उनका विमान लंका से उड़ा होगा और अयोध्या में उसने लेंड किया होगा। यह तो हर कोई जानता है कि विमान को उड़ने और लेंड करने के लिए एक हवाईअड्डा होना बहुत जरूरी है।


जहाँ तक मेरी जानकारी है अयोध्या के इतिहास में किसी प्राचीन एयरपोर्ट के अवशेष मिलने की कोई सूचना नही है लेकिन उधर श्रीलंका से खबर आई थी कि वहां की रामायण रिसर्च कमेटी ने शोध किया है कि उस जमाने में रावण के अपने हवाईअड्डे थे। एक नही बल्कि वह चार-चार हवाईअड्डों का मालिक था। सम्भव है श्रीराम के विमान ने रावण के उन्ही में से किसी एक हवाईअड्डे से उडान भरी होगी। अब यह भी एक प्रश्न है कि अयोध्या में वह उतरा कहाँ होगा ? जिज्ञासा वाजिब है। इसका पता अवश्य लगाना चाहिए हमारे इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को। श्रीलंका के शोधकर्ताओं से हम कोई कम तो हैं नही। जब हम राम के वनगमन मार्ग और उनके यात्रा के पडावों को खोज सकें हैं तो यह भी मुश्किल नही है कि हम उस स्थान का पता न लगा सकें जहाँ अयोध्यावासियों ने विमान की सीढियों से उतरते प्रसन्नचित राम,जानकी और लक्ष्मण की ओर हाथ हिला-हिलाकर उनका जोरदार स्वागत किया होगा। निश्चित ही दीवाली तो इसके बाद ही मनाई होगी सबने।


एक बात और जो कुलबुला रही है भीतर, वह यह है कि रावण तो राजा था वहाँ का और अगर हवाईअड्डे उसके खुद के थे तो निश्चित ही वे सरकारी हुए। सरकारी संस्थाओं की तत्कालीन स्थितियाँ क्या उस वक्त आज की तरह उतार पर रही होंगी जिसके कारण कालांतर में इस भूखंड से विमानन लुप्त हो गया। इसीतरह यदि हिन्दुस्तान के अयोध्या के बारे में विचार करें कि अगर यहाँ हवाईअड्डा रहा होगा तो बाद में वह किस गति को प्राप्त हो गया। यहाँ के विमानपत्तनम के पतन के पीछे क्या कारण रहे होंगे? क्या राजकीय एयरलाइंस का निजीकरण किया गया था या फिर बढते घाटे से परेशान होकर सम्राट ने अनुबन्धित सेवाओं के नाम पर उस जमाने के व्यापारियों ,सौदागरों को इसका संचालन सोंप दिया था। हो सकता है बाद में संचालकों द्वारा भस्मासुरी सेवाएँ जारी रखने के लिए कर्ज तथा अन्य सुविधाएँ मांगने पर सम्राट ने अपने हाथ खींच लिए हों। शायद इस तरह हमारी प्राचीन विमानन सेवाएँ तहस-नहस होकर इतिहास का हिस्सा बन गई होंगी। समय की गर्त में दबे इसी इतिहास की खोज होना चाहिए। 


अयोध्या में निश्चित ही त्रेता युग के विमानतल के अवशेष मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 


ब्रजेश कानूनगो



Sunday, September 6, 2020

एक कुत्ते की मौत

एक कुत्ते की मौत


अक्सर वीकेंड पर साधुरामजी और मैं लांग ड्राइव के लिए निकल जाते हैं। इससे मेरी पुरानी कार भी हमारे साथ थोड़ी सी ताजगी प्राप्त कर लेती है।

घर से थोड़ी दूर ही पहुंचे होंगे कि एक पिल्ले ने मेरी कार के सामने आकर खुदकुशी करने का विचार बनाया। मैं कह नहीं सकता किस वजह से उसने मेरी ही कार को आत्महत्या का माध्यम बनाया होगा।

'कुत्ता कहीं का, इसे मेरी ही कार मिली मरने के लिए!'  घबराहट में मेरे मुंह से उस के लिए कुत्ते की ही गाली निकली। मुझे गुस्से के साथ साथ एतराज भी था कि वह इंसानों के लिए बनाई गई सड़क पर आया ही क्यों!' 

'तुम्हारा मतलब है कि जब कुत्ते के पिल्ले कोई सडक पार करें तब उन्हे इतना अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि वह उनके बाप दादा की जागीर नही है कि यहाँ वहाँ ताकते हुए उस पर आराम से चहल कदमी करते फिरें। सडक सरकार की होती है, यह सरकार की मर्जी पर है कि उस पर भ्रमण करने की इजाजत वह किसे दे और किसे नही दे। कुत्ते और अन्य प्राणियों के पिल्ले कोई टैक्स नही चुकाते कि वे भी उसका उपयोग करें और फ्री-फोकट में हमारी गाडियों के सामने आकर हमारी जान को मुसीबत में डालें।' साधुरामजी चुहुल के मूड में आकर मजे लेने लगे।

'और नहीं तो क्या! न कुत्ते का बच्चा सडक का साझेदार बनने की कोशिश करता न वह हमारी गाडी के रास्ते में रुकावट बन पाता।  स्वयं की गलती का खामियाजा तो उसको भुगतना ही पडेगा साधुरामजी।'  अब थोड़ा मूड मेरा भी बनने लगा था।

'जब हम बडे आराम से कैलाश खैर के सूफियाना प्रेम गीतों के रस में सराबोर होते हुए सफर का मजा ले रहे थे कि साले इस कम्बख्त कुत्ते के पिल्ले ने सारा मजा किरकिरा करके रख दिया। यह तो अच्छा हुआ कि सामने कुत्ते का पिल्ला ही आया, खुदा ना खास्ता कोई आदमी का बच्चा आ गया होता तो.. हमारी तो सारी दबंगई निकल गई होती।' साधुरामजी पूरे फॉर्म में आ गए।

हम कहां पीछे रहने वाले थे थोड़े दार्शनिक अंदाज में कहने लगे-'यों देखा जाए तो यह बात केवल डामर और सीमेंट से बनाई गई सडकों तक ही सीमित नही है मित्र, जहाँ अनाधिकृत जीवों का आना-जाना बना रहता है...देश में कई प्रकार की अन्य सडकें भी हैं और उन पर कई प्रकार की गाडियां दौड लगा रहीं हैं।'
'जैसे? जरा स्पष्ट तो करो...' साधुरामजी ने मेरी तरफ ताकते हुए कहा।

'मसलन राजनीति को ही लें। यह भी एक सडक ही है। अनेक पार्टियाँ अपनी अपनी विचारधाराओं के रंगों और रणनीति की विभिन्न तकनीकों से लेस हो कर सत्ता प्राप्ति का महान लक्ष्य लिए प्रजातंत्र की सडक पर दौड लगा रही हैं। अब इस दौड में यदि कोई अवांछित आपके राजनीतिक हितों की राह में आकर बाधक बन जाए तो उसका तो कुत्ते के बच्चे की तरह कुचल जाना निश्चित ही है।' मैंने साधुरामजी की कमजोर नस को दबाया।

'तो भैया, इस बात को तो अब यहीं खत्म करो और जरा इन बेलगाम पिल्लों पर अंकुश लगाने का उपाय करो वरना ये इसी तरह हमारी खुशनुमा राह में आकर हमें मुश्किल में डालते रहेंगे।' कहते हुए साधुरामजी ने प्रसंग का लगभग पटाक्षेप ही कर दिया।

ब्रजेश कानूनगो