उक्तियों पर सवार युक्तियाँ
Sunday, June 25, 2023
उक्तियों पर सवार युक्तियाँ
Wednesday, June 14, 2023
नींद हराम होने से निकला ज्ञान
नींद हराम होने से निकला ज्ञान
Monday, May 8, 2023
राजनीति और आलू मार्का नेता
Tuesday, May 2, 2023
ठोकर में है जमाना
ठोकर में है जमाना
जहां चौखट है, वहां ठोकर है। ठोकर और पैरों का बड़ा सीधा रिश्ता होता है। ईश्वर की दहलीज में हमेशा से याचक ठोकर में पड़े रहने को अपना सौभाग्य मानते रहे हैं। ये ठोकरें पवित्र चरण होती हैं जिन पर श्रद्धालु सीस नवाते हैं।
जहां आस्था की ठोकर का अपना बड़ा आशावादी और विनम्र अहसास होता है वहीं दूसरी तरफ कुछ और भी ठोकरें होती है। जिनके तेवर कुछ अलग होते हैं। ऐसी ठोकरें खाई भी जाती हैं और मारी भी जाती हैं। अच्छे अच्छे बदमाश ठोकर खाकर संस्कारी होने लगते हैं। कई बार कई लोग अच्छे अवसरों को ठोकर मारकर आगे बड़ जाते हैं। कुछ ठोकर खा कर औंधे मुंह आ गिरते हैं।
जैसे ही कहीं चुनाव की घोषणा की जाती है वैसे ही चुनाव आयोग एक संहिता लागू कर देता है। आदर्श आचार संहिता लागू करना चुनाव आयोग का धर्म है। धर्म और कर्म दोनों एक साथ चला करते हैं इसलिए आचार संहिता को ठोकर मारने का उपक्रम भी खूब दिखाई देने लगते हैं।
यदि पैर मिले हैं तो ठोकर मारना भी उसकी एक कला का ही रूप है।
हर एक व्यक्ति को ईश्वर ने चलने के लिए दो अदद टांगें दी हैं। दुनिया नाप लेने की क्षमता व शक्ति इनमें पाई जाती है।
जब बालक पहले पहल चलना सीखता है तब देखिए इन पैरों का आकर्षण और उनकी लड़खड़ाती मोहक चाल। 'ठुमक चलत रामचन्द्र'। उसके बाद तो व्यक्ति ऐसी चाल पकड़ता है कि पीछे मुड़कर नहीं देखता। बाद में वह न सिर्फ चलता है, दौड़ता है बल्कि वह ठोकर भी मारने लगता है। कभी कभी असावधान कदमों के कारण वह स्वयं ठोकर खा भी जाता है। अपनी गलती पर उसे क्षोभ होने लगता है।
अब इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिसके पैर हैं वह ठोकर मार भी सकता है, ऐसा थोड़ी है कि दूरियां नापने के लिए मात्र आप चलते ही रहें... भोपाल दिल्ली या फिर पूरे देश प्रदेश की पदयात्रा ही करना ही तो हमारा उद्देश्य नहीं हो सकता ना।
मनुष्य सदा से प्रयोग शील प्रवृत्ति का रहा है और उसने पैरों को लेकर कई नए नए प्रयोग भी किए हैं। अगर ऐसा न हुआ होता तो देवकी पुत्र यशोदानंदन कालिया नाग की जहरीली फुंकार से कृष्ण कैसे बन पाते। न गोविंद गेंद को जोरदार ठोकर मारते और ना ही वह जमुना जी में जा गिरती। वह गोविंद की ठोकर ही थी जिसने कालिया नाग के गुरूर को चूर-चूर कर के रख दिया था। सही और उचित ठोकर से अच्छे अच्छों की अकड़ खत्म हो जाती है। कोई ज्यादा ही अकड़ रहा हो तो जमाइए एक जोरदार लात या ठोकर, भूल जाएगा वह अपनी सारी हेकड़ी।
बिना ठोकर मारे कोई 'खेला' संभव ही नहीं। वह कुर्सी का हो या फुटबॉल का। बिना ठोकर के फुटबॉल की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सही निशाने को लक्ष्य करके विवेकपूर्ण ढंग से मारी गई ठोकर फुटबॉल को सीधे गोलपोस्ट की राह दिखाती है, और पेनल्टी कॉर्नर को गोल में तब्दील किया जा सकता है।
इसी प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में कई लोग ठोकर खाते रहते हैं,ठोकर मारते रहते हैं। मारने वाले अपने प्रतिस्पर्धी को पीछे धकेल कर आगे बढ़ जाते हैं। पीछे रह जाने वाला, गिरने वाला फिर संभल कर, उठकर दूसरों को ठोकर मारने लगता है।
वैसे जो व्यक्ति जीवन में एक बार ठोकर खा लेता है उसकी राह आसान हो जाती है, शर्त यह है कि वह अपनी ठोकर से सबक ले वरना ठोकरें जीवनभर उसका पीछा नहीं छोड़ती। किसी लुप्त होते राजनीतिक दल की तरह गोल पर गोल खाते रहना उसका दुर्भाग्य बन जाता है। ठोकर मारना हरेक के लिए आसान भी नहीं होता। इसके लिए बहुत बड़ा जिगर और मजबूत कदम होना चाहिए। युवराज सिद्धार्थ अपने साम्राज्य को ठोकर मार कर यूं ही वन को नहीं निकल गए थे। हर कोई वैसा महात्यागी और महाबली नहीं हो सकता, जो उसी को लेकर ठोकर मार दे जिसके कारण उसका जीवन सुखी हो सकता है।
यह भी सही बात है कि हर व्यक्ति कहीं भी ठोकर मारने के लिए स्वतंत्र है, चाहे किसी व्यक्ति को मारे, किसी खेल में मारे, या आचार संहिता पर प्रहार करे। बस थोड़ा सा विवेक और निशाना ठीक बनाए रखना जरूरी होता है। अन्यथा खुद का पैर भी घायल हो सकता है। जरा सोचिए!
ब्रजेश कानूनगो
Tuesday, April 18, 2023
क्रांतिमुक्त दल बदल
क्रांतिमुक्त दल बदल
जब कोई राजनीतिक व्यक्ति एक दल छोड़कर दूसरे दल में प्रवेश करता है मुझे कुछ जासूसी और अपराध फिल्में याद आने लगती हैं। उनमें होता यह था कि किसी एक गैंग का कोई व्यक्ति चतुराई से दूसरी गैंग के सरगना का दिल जीतकर उसके दल में शामिल हो जाता था। उचित समय आने पर वहां के भेद जानकर उसका सफाया या भंडाफोड़ कर देता था। लेकिन यह विश्वासघात और जासूसी रोमांच राजनीतिक क्षेत्रों में सामान्यतः नहीं दिखाई देता। मैं उम्मीद लगाए ही रह जाता हूं की एक दल से दूसरे दल में गया व्यक्ति वहां भूचाल ला देगा और उस दल को तबाह कर देगा। लेकिन ऐसा होता नहीं। वह घुसपेठिया धीरे धीरे उसी रंग में रंग जाता है।
बहरहाल, जाना-आना दुनिया की रीत है। जो आता है वह जाता भी है। किसे यहाँ हमेशा के लिए रह जाना है। जब सारी सम्भावनाएँ खत्म हो गईं हों तो रह कर कोई करेगा भी क्या। एकरसता कोई अच्छी चीज नही होती। थोडे ही दिनों में बोरियत होने लगती है। डिप्रेशन में आ जाता है भला चंगा आदमी। जीवन का आनन्द ही इसी मे है कि उत्साह बना रहे। निराशा सब बीमारियों की जड है, इसलिए हवा-बदली की भी जरूरत पडती है। हवा बदली के लिए भी कभी कभी स्थान परिवर्तन करना पडता है। इसलिए भी आना-जाना लगा रहता है। कोई हवा बदली के लिए आता है तो कोई हवा बदली के लिए चला जाता है।
ऐसा ही होता आया है सदा से। जो कभी बीहडों में भटका करते थे, हवा बदली के लिए नगरों-महानगरों में सुपारी लेने लगे हैं। जो जनता की सेवा का दम भरते थे, वे अब राजनीति के बगीचे में चले आए हैं, संसद की हवा उन्हे स्वास्थ्य के लिए बडी मुफीद लगने लगी है। हाल यह है कि सेना की कमान सम्भालते सम्भालते कोई सेनापति इतना ऊब जाता है कि वह जनता की कमान सम्भालने के लिए लालायित दिखाई देने लगता है।
अब भाई ! इस आने-जाने को कौन रोक सकता है भला। जहाँ जिसे अच्छा लगे, वहाँ वह पलायन करने को स्वतंत्र है। चाहें तो सरकारी नौकरी छोडकर कोई एनजीओ बना लो या एनजीओ चलाते-चलाते इसे आन्दोलन का रूप दे दो। मन करे तो आन्दोलन को राजनीतिक दल में परिवर्तित कर डालो। चुनाव जीतने पर यदि सत्ता का सिंहासन रास न आए तो दन्न से सडक पर धरने पर बैठ जाओ। ऐसे में कुछ और लोग भी आपके साथ जुडने को आतुर हो सकते हैं। आप उन्हे रोकें नही। उन्हे रोका नही जा सकता। बड़ी बारात में सम्मिलित होने से किसे रोका जा सकता है।
खैर, जो आते हैं वे चले भी जाते हैं। जमे जमाए घरों से लोग निकल लेते हैं। टीवी स्टूडियो की बहसों में कभी लगता ही नही था कि सबसे पुराने घराने का प्रतिष्ठित प्रवक्ता अचानक घर-परिवार छोडकर किसी और परिवार की गोद में जाकर बैठ जाएगा। कभी रुबाबदार प्रशासनिक अधिकारी रहा और सत्ताधारी दल की बैसाखियों के सहारे राजनीति में राजनीति में आनेवाला व्यक्ति भी सत्ता सुन्दरी के आकर्षण में अचानक अपने पितृ दल की उम्मीदवारी को तिलांजली देकर विरोधी दल में छलांग लगा देता है।
इस आने-जाने में कभी-कभी बडी होड दिखाई देती है। रोज पल पल किसी न किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के पार्टी ज्वाइन करने की खबरें सुर्खियाँ बटोरने लगतीं हैं. जैसे इन दिनों हो रहा है. कई बार आने-जाने वालों के सामने बडे भ्रम की स्थिति निर्मित हो जाती है। ‘मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ’ वाली स्थिति । चुनाओं की घोषणाओं के साथ ही राजनैतिक पार्टियों का सूचकांक रोज बदलता रहता है। नेता ही क्या स्वयं पार्टियाँ तक समझ नही पाती कि वे किस के साथ जाएं? किसके साथ गठबन्धन करें। आज जिस नेता या दल की तूती बजती है अगले ही दिन किसी समन के पहुंच जाने की खबर सामने आ जाती है। संभावनाओं के आकाश में शंकाओं के बादल घिरे रहते हैं। कोई जानता ही नही कि चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा। ऐसे आयाराम गयारामों को निर्णय लेने में भारी कठिनाई का सामना करना पड जाता है। सत्ता सुन्दरी के खयालों में खोए इन सभी के अंतर्मन में एक ही धुन गूंजती रहती है-‘एक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती हो।’ लेकिन दिक्कत यह होती है कि इस राह पर अक्सर कोहरा छाया रहता है, जब भी कोई कृत्रिम प्रकाश पुंज दिखाई देने लगता है ये उस ओर ही दौडने लगते हैं।
ब्रजेश कानूनगो
Wednesday, March 1, 2023
वाट्सएप पर महाकवि
वाट्सएप पर महाकवि
किसी ने कहा है जीवन एक कविता है। कई पद हैं इसमें। चौपाइयां हैं, दोहे, सोरठा,कुंडलियां, क्या नहीं है इस कविता में। लय है, तुक है, तो कभी बेतुकी भी हो जाती है जीवन की कविता। हुनर चाहिए जीवन कविता को मनोहारी बनाने के लिए।
मैं कुछ इस तरह लिखते हुए अपने लेख की शुरुआत कर ही रहा था कि मित्र साधुरामजी आ धमके। बोले- 'यह क्या दिन भर टेबल पर झुके रहते हो! और कुछ काम धाम भी है या नहीं। जब देखो साहित्य, साहित्य करते रहते हो...'
उन्हें रात को लिखी अपनी नई कविता सुनाई। कविता को उन्होंने सराहा भी मगर थोड़ा निराश होते हुए गोकुलधाम सोसायटी के एकमेव सेक्रेटरी आत्माराम तुकाराम भिड़े की तरह अतीत गमन करते हुए बोले-‘हमारे जमाने में कविताएँ कभी इतनी रूखी-सूखी नहीं हुआ करती थीं, उनमें रस होता, पढ़ते-सुनते समय मन आनंद से सराबोर हो जाता था. तुम्हारी कविताएँ दुखीं कर देती हैं, वो आनंद नहीं रहा अब की कविताओं में।’
‘मगर अब कविताएँ यथार्थवादी होती हैं साधुरामजी, कला की बजाए इनमें कथ्य महत्वपूर्ण होता है,’ मैंने स्पष्ट करने की कोशिश की।
'क्या मिल जाएगा ऐसे यथार्थवादी लेखन से तुम्हे?' वे बोले।
'लिखने से मुझे आत्म संतोष मिलता है,साधुरामजी।' मैने कहा।
'अब ज्यादा बातें मत बनाओ! कोई पद्मश्री नहीं मिल जाएगा तुम्हे इससे!' वे बोले।
'मैं किसी सम्मान,पुरस्कार की आकांक्षा से नहीं लिखता, मेरा लेखन स्वान्तः सुखाय है साधुरामजी।' मैने कहा तो वे चिढ़ गए-'अरे छोड़ो भी अब, इतना समय घर के कामकाज में देते, भाभीजी को सहयोग करते तो उनकी दुआएं लगतीं।'
'उनकी दुआएं तो सदैव मेरे साथ ही हैं। उनका सहयोग नहीं होता तो मैंने जो थोड़ा बहुत लिखा पढा है वह भी नहीं कर पाता।' मैंने तनिक खिसियाते हुए कहा।
'और सुनो बन्धु ! ये जो तुम लिखते हो क्या सब तुम्हारा अपना है? ये देखो तुम्हारी वह ग़ज़ल जो तुमने पिछले हफ्ते गोष्ठी में सुनाई थी, वह तो गुलजार साहब की है। यह देखो!' साधुरामजी ने उनका मोबाइल में मेरी ओर बढ़ा दिया।
वहां एक वाट्सएप समूह में मेरी वही कविता शेयर की गई थी, किन्तु नीचे शायर का नाम 'गुलजार' लिखा हुआ था। अब यह मेरे लिए सम्मान की बात थी या गुलजार साहब के लिए सिर पीट लेने वाली, कह नहीं सकता।
'अरे भाई आप तो 'गुलजार साहब' हो गए हैं अब! सफेद कुर्ता पहनों और पहुंच जाओ मुम्बई। खूब काम मिलेगा और अवार्ड भी।' साधुरामजी मजे लेने के मूड में आ गए थे।
'और बंधु जरा कभी अपना रोल बदल कर भी देखो...मसलन कभी पत्नी के काम अपने हाथ में ले लो...बडा मजा है... महरी नही आने पर बरतन मांजने में भी बडा मजा है...अपनी इस कला को भी सार्थकता देकर चमकाया जा सकता है... कपडे धोना-सुखाना किसी तार पर...छत पर...अपने हाथों से आटा मथ कर गर्मा-गर्म रोटियाँ अपनों को खिलाना...वाह! अद्भुत आनन्द... एक नई कहानी...नई कविता लिखने के संतोष से भरा-भरा सा ... जैसे विविध-भारती पर नीरज या साहिर का गीत सुन रहे हों...!'
अब साधुरामजी जैसे पूरे साहित्य जगत को ही संबोधित कर रहे थे मानो वहां सारे रचनाकार अपनी घर गृहस्थी से विरक्त होकर सिर्फ सृजन में ही संलग्न हो गए हों।
तभी मेरे मोबाइल में चिड़िया चहकी। एक वाट्सएप मेसेज आया था। खोलकर पढा तो चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई। मैंने मोबाइल साधुरामजी के आगे कर दिया। वहां साधुरामजी की एक नज्म हरिवंशराय बच्चन जी के नाम से शेयर हुई थी।
ब्रजेश कानूनगो
उपन्यास लिख रहे हैं वे
उपन्यास लिख रहे हैं वे
लेखन उनके डीएनए में बसा हुआ है। कुछ सालों पहले तक वे कहा करते थे कि साहित्य उनके खून में है। लोगों को भी लगता है कि उनके रोम –रोम से पसीने की बजाए काव्य की गन्ध आती रहती है। यहाँ काव्य को शास्त्रीय अर्थों में व्यापकता से देखा जाना अपेक्षित होगा। क्योंकि उन्होने अपने लेखन को कभी विधाओं की सीमा में नही बान्धा है। जब चाहा, जिस विषय पर लिखना चाहा और जिस विधा में लिखना चाहा, पूरे जोशो-खरोश के साथ अपने को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।
अपने लेखन के प्रारम्भिक दिनों में उन्होने नगर पालिका और कोर्ट परिसर में लोगों के आवेदनों और प्रार्थना पत्रों में भी अपनी प्रतिभा का बहुत सार्थक रूप से उपयोग किया था। लोगों का मानना था कि उनके लिखे आवेदन पत्र पर कारर्वाई जरूर होती थी। उनके पूज्य पिता भी अपने जमाने के जाने-माने अर्जीनवीस थे साथ ही अभिनन्दन पत्र और लग्न-पत्रिकाएँ लिखने में भी उन्हे महारत हाँसिल थी। उनका यह गुण बेटे के खून में भी आया और जब चिकित्सा-विज्ञान ने तरक्की कर ली तब खून के अलावा उनके डीएनए में भी यह गुण दिखाई देने लगा।
दरअसल उनके एक क्लाइंट वैद्य होने के साथ-साथ कविता भी लिखा करते थे। आदर से उन्हे कविराज के नाम से सम्बोधित किया जाता था। कविराज खुद तो साहित्य मनीषी थे ही परंतु साहित्य अभिलाषियों को साहित्य विशारद और साहित्य रत्न जैसी उपाधियों के लिए परीक्षाएँ भी दिलवाया करते थे। उनके सानिध्य में ही इन्होने लेखन को भी साध लिया था। बाद में कविराज की गद्दी भी इन्होने सम्भाल ली और स्वयं कविराज कहलाने लगे ।
कुछ दिनों में ही इन्होने अपने गुरूजी के अप्रकाशित खंड काव्य ‘मारा जो ढेपा-पहुंच गया नेफा’ की पांडुलिपी से रचनाएँ यहाँ-वहाँ छपवाकर ख्याति अर्जित कर ली। फिर इन्होने मुडकर नही देखा और सृजन की रेलगाडी ब्रोडगेज पर न सही पर मीटर और नेरो गेज पर तेजी से दौडने लगी। अखबारों में सम्पादक के नाम पत्रों से लेकर जहाँ मौका लगता इनकी रचनाएँ मय नाम और फोटो के प्रकाशित होने लगीं। लिखना और छपना इनके लिए प्राण वायु सा बन गया। इतना छपने लगे कि जब नही छपते तो लोग पूछ ही बैठते- कविराज बहुत दिनों से कुछ लिख नही रहे?
बस यही वह टर्निंग पॉइंट है जहाँ से कविराज की कहानी और इस लेख को नई दिशा मिलती है। कविराज भी आखिर कितना लिखे और कितना छपें! और भी कई महत्वाकांक्षी नवलेखक लाइन में लगे होते हैं, अखबार और सम्पादक की अपनी सीमाएँ भी होती हैं। थोडा अंतराल तो आ ही जाता है बीच बीच में। दूसरे लेखकों को भी मौका देना होता है।
दरअसल कविराज यह समझते थे कि छपना ही असली लिखना होता है। छपे नही तो वह भी क्या लिखना। जंगल में मोर नाचा किसने देखा? नही छपने पर उन्हे ऐसा महसूस होता जैसे वे निष्क्रीय हो गए हैं और उनकी सृजनशीलता खत्म हो गई है। यही बात उन्हे कष्ट देती रहती थी। लोगों की निगाह में उनका सक्रीय रचनाकार दिखाई देते रहना ही उनकी असली खुशी होती थी। किसी भी कीमत पर वे इसे खोना नही चाहते थे।
यद्यपि वे अपनी रचनाओं में मौलिकता बनाए रखने की दृष्टि से किसी और का लिखा हुआ पढना बिल्कुल पसन्द नही करते थे, फिर भी मुंशी प्रेमचन्द का ‘गोदान’ उनके स्कूल के समय कोर्स में था, इसलिए उसे तो मजबूरन किसी तरह पढना ही पडा था। पढते हुए वे यह भी सोचा करते थे कि मुंशी जी ने आखिर इतना बडा उपन्यास कैसे लिख डाला होगा? और फिर जब लिख ही लिया होगा तो उसको छपवाने के लिए कितनी प्रतीक्षा करनी पडी होगी उन्हे?
बस इन्ही प्रेमचन्दजी और उनके ‘गोदान’ ने कविराज की समस्या का हल उन्हे सुझा दिया। नही लिखने और निष्क्रीयता के समय लोगों के कष्टदायक सवालों का आसान जवाब अब उन्हे मिल गया था। कल किसी ने उनसे जब पूछ लिया- ‘कविराज बहुत दिन हो गए कहीं नजर नही आए, क्या बात है आजकल कुछ छप नही रहा?’ कविराज मुस्कुराकर बोले- ‘भाई क्या बताऊँ, बहुत व्यस्त हूँ, इन दिनों एक उपन्यास लिख रहा हूँ। थोडी प्रतीक्षा तो आपको करनी ही पडेगी।’
कविराज के साथ मैं भी अब अच्छी तरह जान गया हूँ कि हरेक लेखक अक्सर कभी-कभी उपन्यास लिखने में क्यों इतना व्यस्त हो जाता है।
ब्रजेश कानूनगो