Thursday, October 14, 2021

और वे घोड़े बेचकर सो गए

 और वे घोड़े बेचकर सो गए

ब्रजेश कानूनगो

उनकी परेशानी यह थी कि वे जितना दिमाग खपा रहे थे उतना ही मामला उलझता जा रहा था। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वे इस तरह परेशान हो जाएंगे। पिछले शनिवार को क्लास लेते समय एक छात्रा के प्रश्न पर वे बड़े विचलित हो उठे थे। स्वयं अपने उत्तर से संतुष्ट नहीं थे। उल्टे झुंझलाहट  और खीज से भर उठे थे।  छात्रा ने उनसे प्रश्न किया था 'सर यह नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी' का क्या मतलब हो सकता है?'

नौ मन तेल और राधा को लेकर अनुमानों के समुद्र में उनके तर्कों और विश्लेषण की नाव लगातार हिचकोले खा रही थी। भला वह कौन सी राधा थी जिसे नाचने से पहले नौ मन तेल की आवश्यकता पड़ती थी। कृष्ण की राधा तो वह हो नहीं सकती। उन्हें अगर आवश्यकता होती तो कृष्ण उन्हें जितना चाहे उतना घी अथवा मक्खन भिजवा देते। मान लिया जाए कि वह कोई और राधा थी जिसे नाचने से पहले तेल की आवश्यकता महसूस होती थी। तब विचारणीय है कि वह उस तेल का करती क्या होगी?  क्या वह तेल पीकर नाचती थी, या तेल बिखेर कर तत्कालीन कोई डिस्को अथवा ब्रेक डांस जैसा नृत्य किया करती थी। ज्यादा पहले की बात रही हो तो यह भी हो सकता है कि तब तेल को जमीन पर फैलाकर तांडव नृत्य का अभ्यास किया जाता हो। तेल की मात्रा का सवाल है तो वह पूरे नौ मन रहा है। वह दस मन क्यों नहीं रहा?  भारतीय परंपरा में शून्य को इस तरह के मामलों में अशुभ माना जाता है तो वह ग्यारह मन क्यों नहीं था? राधा को नौ नंबर से ही इतना मोह क्यों रहा?  कहीं उस समय तेल की टंकियों की धारण क्षमता ही नौ मन तो नहीं हुआ करती थी। या फिर दस मन की टंकी से एक मन व्यवस्था में बट जाता था ताकि राधा निर्बाध नृत्य कर सके। एक मन तेल का बटना क्या तत्कालीन भ्रष्टाचार की प्राथमिक स्थितियां हुआ करती थीं?

वह लगातार सोचे जा रहे थे उनका अनुमान था कहावत के पीछे की कथा अवश्य ही उस देश काल से संबंधित रही होगी, जब दो चम्मच तेल के इंतजाम के लिए किसी राधा को हाथ पैर नहीं नचाना पढ़ते थे, बल्कि नौ मन तेल के अभाव में व नृत्य करने से इंकार कर दिया करती थी।

वे अपने चिंतन से तनिक ऊब गए तो विद्यालय के ग्रंथालय से लाई पसंदीदा पत्रिका के पन्ने पलटने लगे। उन्हें लग रहा था पत्रिका में कोई वैचारिक सामग्री होगी। किन्तु वहां किसी युवा अभिनेत्री का इंटरव्यू छपा था। वह पिछले बरस आत्महत्या करने वाले अभिनेता के साथ अपने आत्मीय रिश्तों की कहानियाँ बता रही थी। चिकने पन्नों पर खूबसूरत चित्र उनकी विचार प्रक्रिया में बाधा डालने लगे तो उन्होंने पत्रिका झोले में वापिस रख ली। निराशा में सिर झटका।  वैचारिक गम्भीर पत्रिका से शायद उनका भरोसा ही उठ गया था। मुहावरे की भाषा में पत्रिका की भैंस ने पाड़ा जन दिया था।

भरोसे भाई की कभी कोई भैंस रही होगी। जिस पर किसी ने भरोसा किया होगा, और हो सकता है उसके भरोसे पर किसी ने भरोसा करके भैंस के पेटे कर्ज उपलब्ध करा दिया हो। वक्त आने पर भैंस ने कन्या के बदले पुत्र रत्न को जन्म देकर कर्जा लेने और देने वाले के बीच कटुता  स्थापित कर दी हो। पूछा गया हो, आखिर हुआ क्या? तब किसी के मुंह से बरबस फूट पड़ा होगा 'भरोसे की भैंस ने पाड़ा जन दिया' है। बन गई कहावत।

मन ही मन सोचने लगे क्या आज का भविष्य कल का वर्तमान नहीं होगा?  ऐसा वर्तमान जिसमें लोग आज बने मुहावरों में अटके होंगे। जैसे वे 'राधा और उसके तेल नृत्य' में आ फसें हैं।
'
गुस्से में नेता कानून फाड़ता है, मरीज बीमारी से नहीं ऑक्सीजन से मरता है , तू क्यों कोबरा हुआ जाता है, इतिहास का गुनहगार इतिहास, बादलों का सुरक्षा कवर, खेला का रेला, दहकते भाषण की छांव में लोकतंत्र।' ऐसे ही कई और जुमले कल के मुहावरे बनकर भविष्य के छात्रों का दिमाग खराब करेंगे।
कहावत या मुहावरे के पीछे कोई कथा जरूर होती है जो धीरे धीरे समय की गर्द में धूमिल होकर भुला दी जाती है। रह जाती है सिर्फ छात्रों और मास्टरों की सिर फुटव्वल।

लकड़ी की बेंच में न जाने ऐसी क्या बात थी उस पर बैठकर उनका दिमाग लगातार नए-नए विश्लेषण देर तक करता रहा।  अपने चिंतन से वे थोड़ा संतुष्ट भी हुए, खुश भी। मुहावरों से भाषा और साहित्य इसी तरह समृद्ध होता रहा है।

रात घिर आई तो टाउनहाल की बैंच से उठकर घर का रुख किया और घोड़े बेचकर सो गए। उसी तरह जैसे पन्द्रहवीं सदी में अरब से आया एक सौदागर  बादशाह को बीस घोड़े बेचकर निश्चिंत होकर शाही बाग में चैन से सो गया था। मन, मस्तिष्क को राहत मिल जाए तो गहरी नींद आती है। जागने पर तो फिर नए सवाल और चिंताओं के घोड़े फिर हिनहिनाने लगते हैं।

ब्रजेश कानूनगो




 

 

Tuesday, October 12, 2021

विकास के उजाले में अंधेरे का सूरज

विकास के उजाले में अंधेरे का सूरज


शहर अब सपना नहीं रह गया था। गांव कस्बे शहरों में बदल चुके थे। जो नहीं बदले थे वह इस कोशिश में लगे थे कि शीघ्र शहरों में बदल जाएं। शहर होना बदलते वातावरण में जरूरी हो गया था। जो नहीं हो सकता था उसे जबरदस्ती शहर बनाने के प्रयास किए जा रहे थे। गरज यह कि हर संभव शहरीकरण के लिए मीटिंग में हो रही थी जो शहर बन चुके थे उन्हें स्मार्ट सिटी बनाने के प्रस्ताव पारित हो रहे थे,योजनाएं बन रहीं थीं। और तो और हमारी प्राचीन अवधारणा 'कर्ज करो और घी पियो'  की तर्ज पर सरकार विदेशों से इसके लिए कर्ज प्राप्त करने में जुटी हुई थी। देश का स्वास्थ्य शहरीकरण पर निर्भर हो गया था। सरकार का विश्वास था कि देश का स्वास्थ्य कर्जे के घी या विदेशी ग्लूकोज़ चढ़ाने से ज्यादा जल्दी सुधरता है। उधार की पूंजी के साथ-साथ उधार की संस्कृति भी शहरीकरण पर उतारू देश के पास गेहूं में कंकड़ की तरह आ रही थी।

 

गांव की कजरी ने खेत की मिट्टी से अपना सिर धोना बंद कर दिया था। प्रोटीन युक्त शैंपू से अपने बालों को रेशमी और चमकदार बनाने में व्यस्त हो चुकी थी। ओढनी में सुनहरी किनारी और लहंगे में चमकीले फूल की जगह फटी जींस बदन पर चढ़ाने के मोहक खयालों में खो गई थी। गेरू और खड़िया मिट्टी से अपने आंगन में मांडना वह इसलिए नहीं उकेर पा रही थी कि वे सब बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कनस्तर में बेचे जाने लगे थे। उधार की पूंजी ने अभी इतना असर नहीं दिखाया था कि वह उन्हें खरीद सके।


शहर हो चुके हिस्सों में बाजार सजे थे। भागदौड़ मची हुई थी। रोशनी की चकाचौंध में लोग बटन दबाते ही जमीन से सातवें आसमान पर पहुंच रहे थे। उनके हौसले और उत्साह भी उसी रफ्तार से बुलंदियां छू रहे थे। वे लगातार ऊपर चढ़ रहे थे। विकास के साथ ही विकसित लोगों का शरीर भी  बेढंगे रूप से विकसित हो रहा था। बिजली की मशीनों से देह नियंत्रण के प्रयासों के बावजूद उनके शरीर फूल रहे थे।


जो जगह शहरों में बची थी वह या तो गाजर घास से पटी थी या वहां वे लोग आ बसे थे जिन्हें गाजर घास की तरह कभी भी उखाड़ फैंका जा सकता था। आवागमन इतना बढ़ गया था कि लोग अपने हर अंग का बीमा करवाने लगे थे। कुछ अधिक सावधान लोग स्टेपनी की तरह अतिरिक्त रूप से कुछ अंग अपने साथ रखने का भी सोचने लगे थे। मुख्य आंतरिक मार्ग के दबाव को कम करने के लिए शहर के बाहर एक जगमगाता बाहरी मार्ग बनाया गया था,जो रात को तो जगमग करता ही था, दिन में भी वहां के जलते हुए लेड बल्ब शहर की प्रगति के घमण्ड में सूरज को मुंह चिढ़ाते रहते थे।


गांव को शहर आने से रोका गया तो गांव स्वयं शहर हो गया। वाशिंग मशीन से कपड़े धुलने लगे और मिक्सर में चटनी पीसी जाने लगी। कुओं पर बिजली की मोटरें लग गईं। पत्थर की घट्टियों और सिलबट्टों पर मकड़ी ने जाले बना लिए। चौपालें उठ गईं। माच,लोक नृत्य,गीत और नौटंकियाँ लुप्त हो गए। गांव वाले भी टीवी पर नकचड़े सीरियलों और उत्तेजक खबरों के बीच देश की प्रगति का लुफ्त उठाने लगे।


अचानक एक झटका लगा। सब कुछ अंधेरे में डूब गया।  प्रगति और विकास चार कदम चलकर अचानक रुक गए। पांचवा कदम जाम हो गया, वह आगे बढ़ ही नहीं पा रहा था। कदम यांत्रिक थे। यंत्र बंद पड़ गया। ऊर्जा का वितरण रुक गया था। राष्ट्र नायक का मुस्कुराहट से भरा चेहरा और आश्वस्ति में उठता हाथ अंधकार में विलीन हो गया। उजाले की ओर देखती निगाहें शहर में छाए अंधेरे में डूब गई।


ऐसे में प्रवेश किया शहर ने इतिहास में। जो शहर धड़क रहा था अचानक खामोश हो गया। इतिहास में प्रवेश करते ही प्राकृतिक जीवन संभव था। हेल्थ क्लब और ब्यूटी पार्लरों पर ताले पड़ गए। महिलाएं सिर पर मटकी रख पनघट जाने लगीं। घट्टियाँ फिर घूमने लगी,सिलबट्टों की रगड़ घर में और खेतों में रहट का मधुर संगीत फिर गूंजने लगा। चिमनी और लालटेनों की दुकानें पुनः सज गईं। प्रतिभा और चिमनी की रोशनी का पुराना गणित साकार हुआ। देश में फिर से मशाल और केरोसिन लैंपपोस्ट संस्कृति का विकास हुआ। लेम्पपोस्ट और लालटेन के चमत्कारी प्रकाश में प्रतिभाएं दृश्य में आने लगीं। कालिदास और तुलसी के नए संस्करण साहित्य में स्वीकार किए जाने लगे। देश पुनः विश्वगुरु कहा जाने लगा।


मोमबत्तियां के प्रकाश में कॉफी हाउस की टेबल पर दुखी आत्माओं में नई क्रांतिकारी विचारधाराओं का जन्म होने लगा। बिजली की तेज रोशनी में जिस महीन साहित्यिक, सांस्कृतिक,संस्कारित जीवाणुओं का नाश हो गया था, चिमनी, दीपक और मोमबत्ती के मुलायम प्रकाश में वे फिर जागृत होने लगे। कारखानों की मशीनें निष्प्राण हो गईं तो ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति मिली। पर्यावरण की समस्या का बगैर सरकारी खर्च के निदान हो गया। मशीनीकरण समाप्त हुआ तो हस्तकला को प्रोत्साहन मिलने लगा। जुलाहे, बुनकर, चर्मकार , काश्तकार, पिछड़ी जातियां तथा वास्तविक बुनियादी उद्योगों को रोजगार के अवसर बढ़ गए। वे ऊपर उठने लगे। अंत्योदय होने लगा। गांधी, जयप्रकाश, लोहिया जी के सपने साकार होने लगे।

उधर उनके सपने साकार हो रहे थे, इधर अचानक आई तेज रोशनी से मेरा सपना टूट गया। दूरदर्शन का चेहरा फिर दमक उठा। चमकदार बॉर्डर की साड़ी पहने समाचार वाचिका बता रही थी, देश में उपस्थित हुए बिजली संकट को सरकार शीघ्र दूर करने का प्रयास कर रही है।


ब्रजेश कानूनगो

Sunday, October 10, 2021

मंगलग्रह पर फ्लैट की मद्यमवर्गीय आकांक्षा

मंगलग्रह पर फ्लैट की मद्यमवर्गीय आकांक्षा


जैसे कोई अफसर बोतल खुलते ही खुलने लगता है, जैसे कोई मिनिस्टर कड़कनाथ के बाद अपनी कड़कता भूलकर ढीला पडने लगता है, जैसे कोई प्रेयसी बादल घिरते ही प्रियतम की याद में बेचैन होने लगती है वैसे ही साधुरामजी में मिठाई देखकर मिठास घुलने लगती है। मीठा उनकी कमजोरी है। लेकिन महंगाई के इस दौर में सम्भव नहीं कि हर मेहमान के आगमन पर मोतीचूर के लड्डू या गुलाब जामुन की खुशबू से कोई मद्यमवर्गीय मेजमान अपने ड्राइंग रूम को महका कर सत्कार कर सके।

और फिर साधुरामजी तो वैसे भी घर के सदस्य की तरह हैं अतः एक कप चाय पिलाना परम्परा सी हो गई है।  उनके आते ही मैने बिटिया को आज का अमृत लाने का आदेश दिया और उनसे मुखातिब हुआ- ‘कहिए कैसी चल रही है आपकी सरकार? सुना है इनके और उनके फैसलों में कोई अंतर नही दिखाई दे रहा।’


‘हाँ, यह तो है! न उनके पास कोई चमत्कारी छड़ी थी और न ही ये भी किसी पीसी सरकार के वंशज हैं कि जादू चला के महंगाई के दानव को कबूतर में बदल सकें।’ साधुरामजी ने पीडा व्यक्त की।


तभी चाय बनकर आ गई। चुस्की लेते ही प्रश्न भरी नजरों से मुझे घूरने लगे। प्याली के साथ उनकी यह मुद्रा खबरिया चैनलों के किसी शातिर एंकर की तरह दिखाई दे रही थी। मैने भी चाय का स्वाद लिया तो पाया कि जैसे चाय में शकर थी ही नही। मैने पत्नी को पुकारा तो उन्होने बेटी को भेज दिया।


‘बेटे ,चाय में शकर नही डाली क्या?’ मैने पूछा।


‘डाली तो है पापा, मगर रोज से कम। मम्मी कहती है अब ऐसी ही कम शकर वाली चाय पीना पड़ेगी। घर गृहस्थी के खर्च में कमी के लिए मम्मी ने कुछ नियम बनाए हैं।' इतना कह कर वह भीतर चली गई।


‘ओ-हाँ ,याद आया, साधुरामजी वह क्या है कि बढ़ती महंगाई की वजह से हम आत्मानुशासन से घर का वित्तीय प्रबंधन कर रहे हैं।  हमने सोचा है कि जो चीजें हमारी औकात से दूर हो रहीं हैं उनके खर्च पर लगाम लगा लें। सरकार का रुख भी कुछ ठीक नही दिखाई देता।’ मैने संकोचभरी हकलाहट के साथ कहा।


साधुरामजी अपने मुख को थोड़ा विकृत ज्यामितीय रूप देते हुए बोले- ‘लगता है राजनीति में फिर कुछ न कुछ घटेगा, मँहगाई की मार वैसी ही बनी हुई है जैसी इस सरकार के आने के पहले थी... और अब यह शकर के दामों का किस्सा.. शकर के कारण लोगों के दिलों में बड़ती कडुवाहट का मूल्य कहीं सरकार को न चुकाना पड़ जाए, देश की राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।’ साधुरामजी के भीतर के नेता को चिंता सताने लगी।


‘लेकिन हमें राजनीति से क्या? हमे तो शकर मिलनी चाहिए सस्ते दामों पर।’ मैने कहा तो उनका सत्ता समर्थित राजतीतिज्ञ जाग गया- ‘क्या शकर का इस्तेमाल इतना जरूरी है तुम्हारे लिए?’ ऐसा लगा जैसे मधुमक्खी गुलाब पर अपनी मिठास की आवश्यकता के लिए प्रश्नचिन्ह लगा रही हो।


‘हाँ,मिठास भी आवश्यक है मनुष्य के लिए, और अगर आप सोचते हैं कि खाने में हम मिठास को त्याग दें तो चलिए आप हमें अपनी व्यवस्था से, तंत्र से ‘मीठा-व्यवहार’ दिलवाइए। हम शकर का उपयोग छोड़ देंगे। जब हर तरफ कडुवाहट फैली हुई है तो वहाँ शकर के चन्द दाने कौनसी मिठास घोल देंगे जीवन में। मैं तो कहता हूँ, आप घरेलू बाजार में शकर उपलब्ध ही मत कराओ बल्कि समूची शकर को निर्यात करके कुछ हेलिकाप्टर और तोपें खरीद लो, वक्त बेवक्त आपका और विपक्ष का समय संसद में कट जाया करेगा बहसों में।’ रक्तचाप ग्रसित मेरा चेहरा तमतमा उठा।


‘तुम तो ख्वामखाह नाराज हो गए, मेरा मतलब यह थोड़े था। ये तो तात्कालिक स्थितियाँ हैं, कभी प्याज तो कभी तेल, कभी दूध तो कभी शकर, महंगी-सस्ती होती रहती हैं। जरा जीना सीखो। ये छोटे-छोटे अभावों से क्यों प्रभावित होते हो। तुम तो महान देश के एक समझदार और सच्चे देशभक्त नागरिक हो। जरा उन अमर क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करो, जिन्होने भारी अभावों और कष्टों के बीच देश को आजाद कराया....और आज भी तुम एक नई आजादी के दौर से गुजर रहे हो...।’ साधुरामजी का राजनीतिज्ञ शब्दों में निरंतर शकर घोल रहा था...और हम तुम्हे क्या नही दे रहे... थोडा-सा इंतजार तो करो...इतना अधीर भी मत बनों...अच्छी चीजें आसानी से नही मिल जाती... थोडा-बहुत सेक्रिफाइज और त्याग तो हरेक को करना पडेगा... तुम भी क्या यह तुच्छ-सा महंगाई  का रोना लेकर बैठ गए।’ 


‘मैं आपकी मीठी-मीठी बातों में आने वाला नही हूँ, साधुरामजी। सरकार को चाहिए कि वह शकर को सस्ते दामों में हमेशा उपलब्ध कराए,बस।’ मैने सीधे-सीधे कहा तो वे क्रोधित हो गए-‘तुम भी अजीब आदमी हो, एक मामूली सी चीज के लिए अड़ रहे हो, माँगना ही है तो एयरपोर्ट मांगो, एक्सप्रेस हाई वे मांगो, एम्स मांगो, यूनिवर्सिटी मांगो, जो दिया जा सके वह माँगो।’ इतना कहकर साधुरामजी आँखे लाल किए पैर पटकते लौट गए। वे रुकते तो एक बार अवश्य उनसे पूछता, एयरपोर्ट पर कौनसी कम्पनी के विमान में हम यात्रा करें? एक्सप्रेस हाइवे पर गाड़ियां किस ईंधन से दौड़ाएं? एम्स ही क्या अन्य चिकित्सालयों में डॉक्टरों की भर्ती कब पूरी हो जाएगी? नई यूनिवर्सिटियों से पहले पुराने स्कूल कॉलेजों में शिक्षकों की संख्या और गुणवत्ता पर क्या कहना है?

मन ही मन मैं सोचने लगा- शायद साधुरामजी ठीक ही कह रहे थे। अब सस्ते तेल,शकर, पेट्रोल,डीजल,गैस जैसी मामूली चीजों के लिए सरकार को परेशान करने  की बजाए मंगल ग्रह पर नई कॉलोनी के विकास और उस पर अपने लिए एक फ्लैट आबंटन की गुजारिश करना ही उचित होगा। क्या कहते हैं आप!


ब्रजेश कानूनगो

Wednesday, October 6, 2021

व्यंग्य के शरीर में हास्य की तोंद

व्यंग्य के शरीर में हास्य की तोंद


ऑन लाइन गोष्ठी में चल रहे गम्भीर व्यंग्य विमर्श के बीच उस दिन यकायक वरिष्ठ व्यंग्यकार की तोंद क्या नजर आई, देश के कोने कोने  में बैठे सहभागी रचनाकारों और प्रेक्षकों के कम्प्यूटर की खिड़कियों से निकलकर मुस्कुराहटें खुशबू की तरह वातावरण को महकाने लगीं।


कुछ चीजें छुपाए नहीं छुपतीं। इस संदर्भ में बड़ी पुरानी कहावत है, इश्क और मुश्क कभी छुपते नहीं, पता चल ही जाता है। मृग की नाभि से रिस रही कस्तूरी हो या मोगरे की महक, पता चल ही जाती है। समझने वाले जान ही लेते हैं कि कौनसा मामला पक रहा है आसपास। प्रेम प्रसंग की खुशबू से मालूम पड़ जाता है कि कल्लू हलवाई के बेटे और इमरती देवी की बेटी चमेली के बीच कौनसी खिचड़ी पक रही है।


दरअसल, यहां संदर्भ उजागर होने का तो है किंतु इसमें किसी प्रकार की सुगन्ध महसूस नहीं की जा सकती। तथापि कुछ अर्थों में यहां 'स्मेल' के दर्शन जरूर हो जाते हैं। रविवार था तो बेचारे वरिष्ठ सुबह से लगातार गोष्ठियों में शिरकत करते करते थक गए तो थोड़ी कमर सीधी करने की दृष्टि से सोफे पर लेटे लेटे ही स्क्रीन देखने लगे। इस बीच गलती से मोबाइल का कैमरा ऑन हो गया। शरीर का मध्य क्षेत्र क्लोज़ अप में आकर सार्वजनिक हो गया। खिड़की अचानक खुल जाए तो रहस्य उजागर हो ही जाते हैं। चाँद का टुकड़ा भी दिख सकता है और व्यंग्यकार के पेट का उभार भी।


किसी सुंदर मुखड़े वाली नायिका और किसी बावले छोरे की कोई रोमेंटिक कहानी होती तो इस अवसर पर दूसरी खिड़की वाला गा सकता था, मेरे सामने वाली खिड़की में एक चाँद का टुकड़ा रहता है। यहां तो क्लोजअप के कारण पेट का पहाड़ नजर आ गया था। यह छोटा सा टीला मोबाइल की छोटी खिड़की में से होकर हिमालय में रूपांतरित हो गया था। गोष्ठी के सारे प्रतिभागियों का ध्यान मुख्य वक्ता के वक्तव्य से हटकर हिमालय के सौंदर्य में भटक गया। जहाँ व्यंग्य के सौंदर्यशास्त्र की बारीकियों पर नहीं व्यंग्यकार की वृहद तोंद पर चर्चा होने लगी। इस विमर्श में शामिल जो सहभागी चादर ओढ़कर आंखें बंद कर कैमरा ऑफ, माइक म्यूट कर विमर्श का आनन्द ले रहे थे निश्चित ही वरिष्ठ व्यंग्यकार की तोंद की भव्यता व दिलकश सौंदर्य के दर्शन करने में चूक गए होंगे। दुर्भाग्य रहा उनका। व्यंग्यकार के खुरापाती मस्तिष्क के आगे सामान्यतः बेचारा यह शूद्र पेट कहाँ नजर आ पाता है।


मुख्य वक्ता अपने उद्बोधन में रचना में व्यंग्य और हास्य के जरूरी अनुपात की बात कर रहे थे लेकिन इधर वरिष्ठ जी की ऑन लाइन खिड़की ने व्यंग्य की गंभीरता के बीच हास्य की हवा बहा दी। व्यंग्य की यही तो खूबी है कि हास्य की तनिक स्निग्धता के बीच व्यंग्य की आरी चलती रहे।


बहरहाल, व्यंग्यकार के तोंद दर्शन प्रसंग ने ऑन लाइन लाइव विमर्श के विषय 'व्यंग्य रचना में   कितना हास्य हो?' को भी बड़े ही प्रभावी रूप से स्पष्ट कर दिया था कि रचना के भारी शरीर में मात्र तोंद जितना हास्य ही उचित  माना जा सकता है। यही उस गंभीर गोष्ठी की बड़ी सफलता कही जा सकती है।


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, October 5, 2021

धुआं तो कहानी कहेगा ही...

धुआं तो कहानी कहेगा ही...      


जब कोई व्यक्ति सांस लेता दिखता है तो हम समझ जाते हैं कोई लौ अभी आदमी के भीतर प्रज्वलित है. इसी तरह जहां धुआँ होता है वहां भीतर कहीं आग भी होती है. आग और धुएं का पुराने मुहावरे में ‘चोली-दामन’ जैसा और नए जुमले में ‘नोट और एटीएम’ जैसा रिश्ता होता है. नोट के बगैर मशीन शव के सामान है, नोट प्राण हैं, मशीन देह है. धुआँ कहीं दिख रहा है तो आग वहां अभी बची हुई है.  


देश के हालात भी कभी कभी किसी भीतरी चिंगारी से सुलग जाते हैं. अंदर ही अंदर आग फैलती रहती है,किन्तु पता ही नहीं चल पाता. थोड़ा बहुत धुंआ नजर आने लगता है तो उस पर ध्यान दिए बगैर सब अपनी ही मस्ती में लगे रहते हैं.  राज्यो की सत्ता की रुई और राजनीतिक पार्टियों के भीतर जब असंतोष की ज्वाला भीतर ही भीतर फैलती है तो यकायक एक दिन विस्फोट हो जाता है. इसके पहले निसंदेह धुआं तो उठता ही है लेकिन उसका आकलन ठीक से करने में शायद विवेक का इस्तेमाल नहीं हो पाता। यह बात भी सही है कि धुएं धुएं में फर्क भी होता है. इसका अध्ययन करने और पूर्वानुमान हेतु विशेषज्ञों की दरकार रहती है. 


अब यह समझना भी जरूरी है कि जो दिखाई दे रहा वह धुआँ ही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने रसोई घर में बघार लगाया हो और हम दमकल लेकर दौड़ पड़ें आग बुझाने के लिए. धुएं धुएं में फर्क होता है. विविधता होती है उसकी प्रकृति में. तो धुएं की पहचान करना भी जरूरी है. कचरा जलता है तो भी धुआँ निकलता है और बस्तियां जलती हैं तब भी काले-घने गुबार दिखाई देते हैं.


ये अलग बात है कि कभी-कभी नफ़रत का बघार भी ऐसा लगाया जाता है कि बस्तियां जलने लगती है. धुआँ हमारी समझ को ढँक लेता है. बस्तियों और कचरे के जलने में भेद नहीं कर पाते हम लोग . आग बुझाने के प्रति उदासीनता ज्यों की त्यों बनी रहती है. ख़याल ही नहीं रहता कि सुलगते घरों में निर्दोष लोग जल रहे हैं. रेलगाड़ियाँ और अन्य सम्पत्तियाँ नहीं हमारा अपना खून–पसीना धुएं में बदलता जा रहा है. छतों से सुलगते शहर और आसमान में धुएं का दानव हमारे आसुओं को सुखा देता है...        


घमण्ड की कढाई में शेखी का बघार लगाने पर झूठ का तेल उछलता है तो उसके छीटे धुएं के साथ मिलकर कालिख पोत देते हैं हमारे चेहरों पर. इसका उछाल इतना तीव्र होता है कि सात समंदर पार करके छींटे घर के आँगन तक पहुँच जाते हैं. सत्ता तक की सडकों पर चिकनाई फ़ैल जाती है.. नेता ओंधे मुँह गिर पड़ते हैं.


धुएं और आग के अंतर्संबंधों को थोडी आध्यात्मिक दृष्टि से समझने की कोशिश करें तो कई बार बाहर निकलते हुए धुएं को सहजता से देख पाना मुश्किल हो जाता है. मसलन जो किसी तीव्र गुस्से की वजह से धधकने वाली आग के कारण अदृश्य बाहर निकलने लगता है.परेशानियों के निदान का कुछ उपाय नहीं सूझने पर जब अंतर्मन में आग लगती है, बैचैनी का धुआँ गहराने लगता है, ईर्ष्या की आग में जीते-जी जो चिता भीतर कहीं जल उठती है उसके धुएं की जलन इतनी तीव्र होती है कि मनुष्यता ही राख में तब्दील हो जाती है.  किसी दुःख में दिल सुलगने लगता है तब भी निकलता है धुआँ.. लेकिन धुएं के ऐसे अदृश्य गुबारों को देख पाने के लिए संवेदनाओं की सूक्ष्म नजर की दरकार होती है... रूई में लगी आग की तरह कष्टों, दुखों और असंतोष की आग धीरे-धीरे भीतर ही भीतर सुलगती रहती है..और एक दिन जब गुबार तेज हवा के झोंके से आग के गोले में तब्दील हो जाता है.... खौफनाक विस्फोटों को रोक पाना किसी के बस में नहीं रह पाता.


धुंआ निश्चित ही हमेशा से उठता रहा है. चाहे पंजाब का मसला हो, गुजरात की बात हो,छत्तीसगढ़ का किस्सा हो. किसानों की बात हो, युवाओं के बेरोजगार होते जाने के प्रश्न हो. महंगाई डायन के पुनः लौट आने पर मध्यमवर्ग की आश्चर्यजनक खामोशी हो.... धुआं तो उठता दिख ही रहा है. नेताओं की लोकप्रियता का कम होता ग्राफ हो...धुएं की पहचान जरूरी है.


यदि हम दूध के जले हैं तो हमे सचेत रहने की और ज्यादा जरूरत है. वैश्विक महामारी के वक्त स्वास्थ्य सुविधाओं के भीतर लम्बे समय से निकल रहे धुएं को हमने नजर अंदाज किया तो दूसरी लहर की आग में निरपराध नागरिको को अपनी जान गंवाने को मजबूर होना पड़ गया. आग और धुएं के बड़े गहरे सम्बन्ध और संकेत होते हैं. इतना समझ लीजिये, धुआँ दिखते ही उससे तुरंत निपटने में ही सबकी भलाई है. आगे आपकी मर्जी साहब !!


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, September 28, 2021

गड्ढों में छुपा सुख

गड्ढों में छुपा सुख

'गड्ढा' होना एक सामान्य सी बात है। प्राकृतिक संरचना से थोड़ी सी सतह नीचे चली जाए तो वह 'गड्ढा' कहलाने लगती है और थोड़ी ऊंची उभर आए तो 'टीला' बन जाती है। यह बहुत विचित्र बात है कि सतह से ऊपर उठना सम्मानजनक हो जाता है और गड्ढे में गिर जाने से अब तक के सारे हासिल की ऐसीतैसी हो जाती है।

बड़ी भद्द पिट रही है बेचारे गड्ढों की। गड्ढों को बदनाम करने की  यह बड़ी साजिश लगती है। यह ठीक है कि कुछ बातें, कुछ व्यक्ति मखौल के पात्र बनते रहे हैं,  परंतु दुख है कि इसी परम्परा में 'गड्ढों' को भी अपमान सहना पड़ रहा है। पहचान के केवल एक पक्ष की चर्चा बार बार करके उसके उजले पक्ष पर पर्दा डाल दिया गया है। 'गड्ढा' बेचारा तो निर्विकार भाव से चुपचाप प्रकृति,समाज और दुनिया की बेहतरी के लिए अपने कर्तव्य पालन में  निष्ठा से संलग्न है।

सुख समृद्धि और सम्पन्नता का खजाना बगैर गड्ढों में उतरे हासिल नहीं किया जा सकता। बहुमूल्य संपदा इस धरती के नीचे दबी पड़ी है। गड्ढों के निर्माण के बाद ही देश के आर्थिक आकाश में सोने की चिड़ियाँ उड़ाई जा सकती है। यह भी कोई बात हुई कि वैश्विक महामारी की वजह से आई मंदी के कारण एक बार जीडीपी गड्ढे में क्या उतर गई,अर्थशास्त्रियों का बीपी बढ़ गया। सरकारों के हिमालय इरादों को भी तो गौर करिए जरा!

गड्ढों से ही इस संसार का सौंदर्य कायम है। पृथ्वी का बड़ा हिस्सा एक विशाल गड्ढा है, जो पानी से लबालब है। दुनिया के सुखों का बड़ा खजाना इसके भीतर छुपा है। सागर न होता तो बचे भूभाग और पर्वतों की जरूरत व खूबसूरती का महत्व हमें कैसे पता चल पाता। थोड़े से गड्ढे सड़कों पर क्या बन गए और उनमें बरसात का जल क्या जमा हो गया तो इतना हल्ला मचाने की क्या आवश्यकता है? थोड़ी तो उदारता अपने आचरण में रखनी चाहिए। सड़क के गड्ढों का भी मजा लेना चाहिए। दशहरे पर हजारों रावणों के दहन के बाद व दिवाली पर सवा सौ करोड़ दीपक जलते ही मच्छरों का आतंक भी खत्म हो जाएगा। धैर्य और धीरज से सब ठीक हो जाता है। 

एक कलाकार की रचनात्मक प्रतिभा का मैं बड़ा कायल हो गया हूँ जिसने एक सड़क के कीचड़ भरे गड्ढों में हमारे प्यारे भारतवर्ष के मानचित्र की छबि खोज निकाली। गड्ढों से ही सड़क बनती है, देश बनता है। गड्ढे हैं तो अखण्डता है। सौंदर्य तो हमारी दृष्टि या नजरिये में होता है। इन निरीह गड्ढों के कारण ज्यादा दुखी होना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं, इससे चेहरे पर तनाव आता है, त्वचा खिंच जाती है। मुस्कुराने से गालों में डिम्पल पड़ते हैं। चेहरे के इन गड्ढों में भी कितनी मोहकता होती है। जरा समझिए इस बात को! 


ब्रजेश कानूनगो


Monday, September 27, 2021

कनिप के डोज

कनिप के डोज

पिछले रविवार को जब मैं अपने मित्र साधुरामजी के घर गया तो देखा कि उनके दाहिने पैर में प्लास्टर चढ़ा हुआ है। वे आरामकुर्सी पर बैठे थे तथा पट्टायुक्त पैर उन्होंने सामने रखे स्टूल पर टिका रखा था।

'यह क्या हो गया साधुरामजी?' मैंने अचंभित उनसे पूछा।

'यह सब आप के तथाकथित विकास का परिणाम है, विकास के नाम पर पूरा शहर खोद रखा है। सड़कों पर गड्ढे ही गड्ढे हैं। पुरानी सड़कों की रिपेयरिंग भी मात्र दिखाने के लिए ही होती है। कुछ दिनों में सड़कें फिर उखड़ जाती हैं।कोई कब तक कैसे और कहां तक बच सकता है।' उन्होंने कहा, 'अपनी मोपेड पर जा रहा था, पानी भरे गड्ढे में अगला पहिया गया और मोपेड पलट गई। पैर में फ्रैक्चर हो गया है।' उन्होंने आगे बताया।

'अरे यह तो बड़ा दुखद रहा!'  मैंने संवेदनाएं व्यक्त कीं। 

लेकिन साधुरामजी ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों की कहां चिंता पालते हैं, तुरंत अपने स्वभाव के अनुसार बात की गंभीरता को खत्म करते हुए बोले, 'उस वक्त मैं स्वयं ही शायद थोड़ा असावधान था।  खैर जो होता है अच्छा ही होता है। पिछले पन्द्रह दिनों के विश्राम के दौरान मुझे अद्भुत ज्ञान प्राप्त हो गया है।' 

'कैसा ज्ञान साधुरामजी?'  मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।

'आपने अक्सर देखा होगा,अनेक नीम हकीम और डॉक्टर अखबारों में विज्ञापन छपाते हैं कि पुराने और निराश रोगी ही मिलें। हम फलां बीमारी का शर्तिया इलाज करते हैं।' वे बोले।

'हां, वह तो है नीम हकीम खतरे जान।' मैंने कहा।

'लेकिन मेरे चिंतन ने मुझे अनेक परेशानियों और समस्याओं से मुक्ति का रामबाण नुस्खा उपलब्ध करा दिया है। यूं कहें कि यह एक नई चिकित्सा पद्धति है,जो मैंने खोज निकाली है।' साधुरामजी ने कहा।


'वाष्प चिकित्सा, चुंबक चिकित्सा, स्पर्श चिकित्सा, एक्यूपंचर, इलेक्ट्रो चिकित्सा, आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी की तरह ही यह चिकित्सा पद्धति भी मरीजों के लिए बेहद कारगर साबित होगी।' वे धाराप्रवाह बोल रहे थे। 

'यह कौन सी पद्धति है साधुरामजी, कहीं आप गधे के सींग तो नहीं खोज लाए हैं।'  मैंने चुटकी ली।

'भाई यह कोई गधे के सींग वाली बात नहीं है। यह बहुत असरकारी है लेकिन इसके विकास में सरकार का बड़ा योगदान है।'  उन्होंने आगे कहा, 'महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे सत्य मिला था, आर्कमिडीज बाथरूम से बगैर टावेल लपेटे बाहर भागे थे और मैं अपनी खोज के बाद ही दुर्घटना की वजह से तुम तक नहीं पहुंच सका। दरअसल इस खोज का बीज  उस वक्त पड़ा जब मैं अपने शहर की सड़कों पर गुजरता रहता था। कुछ सड़कों की स्थिति तो ऐसी थी कि गड्ढों के बीच उसे खोजना कठिन हो जाता था। जब दुर्घटना हुई, पैर पर प्लास्टर चढ़ा तो चिंतन का अवसर मिला। तब  इस चिकित्सा पद्धति का जन्म हो सका।' उन्होंने कहा।

'अब आप बता ही दें कि आखिर है क्या यह चिकित्सा पद्धति!'  मेरी अधीरता बढ़ती जा रही थी।

'तो सुनो!'  उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह अपना चेहरा नीचे से ऊपर उठाया और कहा, 'हमारे शहर की सड़कों पर मरीज को वाहन यात्राओं के नियमित डोज देना ही इस पद्धति का मूल मंत्र है।' 

'वह कैसे?'  मैंने पूछ लिया।

'मरीज पुरानी कब्ज से परेशान हो उसे शहर की विशिष्ट सड़क पर पांच दिन नियमित स्कूटर यात्रा के लिए परामर्श दिया जाए, छठे दिन वह स्वयं को हल्का महसूस करने लगेगा। किसी मरीज की प्रसूति में विलंब हो रहा हो और शल्य क्रिया संभव न हो तो ऑटो रिक्शा से किसी दूरस्थ चिकित्सालय ले जाएं, सामान्य प्रस्तुति सहज रूप से संपन्न कराई जा सकती है। कोई व्यक्ति बचपन से हकलाता हो, बोलने में शब्द गले में ही अटक जाते हों, उसे एक माह तक शहर की विशिष्ट सड़क पर तेज गति से मोटर चलाने का परामर्श दें, शब्द ही क्या चित्कार निकलने लगेगी। अगर डॉक्टर ने शल्य क्रिया के दौरान गलत हड्डियां जोड़ दी हो तो शहर की सड़कों पर तेज गति से मोटरसाइकिल चलाने का परामर्श दें, अपने आप हड्डी सही स्थान पर बैठ जाएगी। स्नायु विकार और पुराने सिर दर्द में लगातार पन्द्रह दिनों का स्कूटर चालन लाभ पहुंचाता है। शरीर की अकड़न, कान से कम सुनाई देना जैसी समस्याओं में भी शहर की सड़कों से वाहन यात्रा के निश्चित डोज लाभप्रद हो सकते हैं। डॉक्टरों की थोड़ी सी सूझबूझ और यात्रा की प्रामाणिक खुराक का परामर्श मरीजों को अनेक कष्टों से मुक्ति प्रदान करवा सकता है।' साधुरामजी किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस के मुख्य वक्ता की तरह बोले जा रहे थे, जहां मैं अकेला सैकड़ों डेलीगेट्स का प्रतिनिधित्व कर रहा था। 

'और हां शहर की ऐसी सड़कों का नामकरण भी कनिप-वन, कनिप -2, कनिप -10 आदि  किया जा सकता है।'

'यह कनिप 1,2,3 क्या है?'  मैंने पूछ लिया। 'कनिप यानी 'कष्ट निवारण पथ'। इन सड़कों की गुणवत्ता के आधार पर इनकी रोग निवारक क्षमता का आकलन करके इनका नामकरण किया जा सकता है, जैसे दवाइयों का होता है सिपलॉक्स 100 विक्स 500 एविल 5 आदि।' उन्होंने स्पष्ट किया। 

मैंने साधुरामजी से विदा ली। घर लौटते हुए सोच रहा था कि चिकित्सा विज्ञान में एक गैर चिकित्सकीय व्यक्ति के योगदान के लिए क्या साधुरामजी का नाम 'सर शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' के लिए प्रस्तावित करना उचित नहीं होगा?


ब्रजेश कानूनगो