Tuesday, October 5, 2021

धुआं तो कहानी कहेगा ही...

धुआं तो कहानी कहेगा ही...      


जब कोई व्यक्ति सांस लेता दिखता है तो हम समझ जाते हैं कोई लौ अभी आदमी के भीतर प्रज्वलित है. इसी तरह जहां धुआँ होता है वहां भीतर कहीं आग भी होती है. आग और धुएं का पुराने मुहावरे में ‘चोली-दामन’ जैसा और नए जुमले में ‘नोट और एटीएम’ जैसा रिश्ता होता है. नोट के बगैर मशीन शव के सामान है, नोट प्राण हैं, मशीन देह है. धुआँ कहीं दिख रहा है तो आग वहां अभी बची हुई है.  


देश के हालात भी कभी कभी किसी भीतरी चिंगारी से सुलग जाते हैं. अंदर ही अंदर आग फैलती रहती है,किन्तु पता ही नहीं चल पाता. थोड़ा बहुत धुंआ नजर आने लगता है तो उस पर ध्यान दिए बगैर सब अपनी ही मस्ती में लगे रहते हैं.  राज्यो की सत्ता की रुई और राजनीतिक पार्टियों के भीतर जब असंतोष की ज्वाला भीतर ही भीतर फैलती है तो यकायक एक दिन विस्फोट हो जाता है. इसके पहले निसंदेह धुआं तो उठता ही है लेकिन उसका आकलन ठीक से करने में शायद विवेक का इस्तेमाल नहीं हो पाता। यह बात भी सही है कि धुएं धुएं में फर्क भी होता है. इसका अध्ययन करने और पूर्वानुमान हेतु विशेषज्ञों की दरकार रहती है. 


अब यह समझना भी जरूरी है कि जो दिखाई दे रहा वह धुआँ ही है. कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने रसोई घर में बघार लगाया हो और हम दमकल लेकर दौड़ पड़ें आग बुझाने के लिए. धुएं धुएं में फर्क होता है. विविधता होती है उसकी प्रकृति में. तो धुएं की पहचान करना भी जरूरी है. कचरा जलता है तो भी धुआँ निकलता है और बस्तियां जलती हैं तब भी काले-घने गुबार दिखाई देते हैं.


ये अलग बात है कि कभी-कभी नफ़रत का बघार भी ऐसा लगाया जाता है कि बस्तियां जलने लगती है. धुआँ हमारी समझ को ढँक लेता है. बस्तियों और कचरे के जलने में भेद नहीं कर पाते हम लोग . आग बुझाने के प्रति उदासीनता ज्यों की त्यों बनी रहती है. ख़याल ही नहीं रहता कि सुलगते घरों में निर्दोष लोग जल रहे हैं. रेलगाड़ियाँ और अन्य सम्पत्तियाँ नहीं हमारा अपना खून–पसीना धुएं में बदलता जा रहा है. छतों से सुलगते शहर और आसमान में धुएं का दानव हमारे आसुओं को सुखा देता है...        


घमण्ड की कढाई में शेखी का बघार लगाने पर झूठ का तेल उछलता है तो उसके छीटे धुएं के साथ मिलकर कालिख पोत देते हैं हमारे चेहरों पर. इसका उछाल इतना तीव्र होता है कि सात समंदर पार करके छींटे घर के आँगन तक पहुँच जाते हैं. सत्ता तक की सडकों पर चिकनाई फ़ैल जाती है.. नेता ओंधे मुँह गिर पड़ते हैं.


धुएं और आग के अंतर्संबंधों को थोडी आध्यात्मिक दृष्टि से समझने की कोशिश करें तो कई बार बाहर निकलते हुए धुएं को सहजता से देख पाना मुश्किल हो जाता है. मसलन जो किसी तीव्र गुस्से की वजह से धधकने वाली आग के कारण अदृश्य बाहर निकलने लगता है.परेशानियों के निदान का कुछ उपाय नहीं सूझने पर जब अंतर्मन में आग लगती है, बैचैनी का धुआँ गहराने लगता है, ईर्ष्या की आग में जीते-जी जो चिता भीतर कहीं जल उठती है उसके धुएं की जलन इतनी तीव्र होती है कि मनुष्यता ही राख में तब्दील हो जाती है.  किसी दुःख में दिल सुलगने लगता है तब भी निकलता है धुआँ.. लेकिन धुएं के ऐसे अदृश्य गुबारों को देख पाने के लिए संवेदनाओं की सूक्ष्म नजर की दरकार होती है... रूई में लगी आग की तरह कष्टों, दुखों और असंतोष की आग धीरे-धीरे भीतर ही भीतर सुलगती रहती है..और एक दिन जब गुबार तेज हवा के झोंके से आग के गोले में तब्दील हो जाता है.... खौफनाक विस्फोटों को रोक पाना किसी के बस में नहीं रह पाता.


धुंआ निश्चित ही हमेशा से उठता रहा है. चाहे पंजाब का मसला हो, गुजरात की बात हो,छत्तीसगढ़ का किस्सा हो. किसानों की बात हो, युवाओं के बेरोजगार होते जाने के प्रश्न हो. महंगाई डायन के पुनः लौट आने पर मध्यमवर्ग की आश्चर्यजनक खामोशी हो.... धुआं तो उठता दिख ही रहा है. नेताओं की लोकप्रियता का कम होता ग्राफ हो...धुएं की पहचान जरूरी है.


यदि हम दूध के जले हैं तो हमे सचेत रहने की और ज्यादा जरूरत है. वैश्विक महामारी के वक्त स्वास्थ्य सुविधाओं के भीतर लम्बे समय से निकल रहे धुएं को हमने नजर अंदाज किया तो दूसरी लहर की आग में निरपराध नागरिको को अपनी जान गंवाने को मजबूर होना पड़ गया. आग और धुएं के बड़े गहरे सम्बन्ध और संकेत होते हैं. इतना समझ लीजिये, धुआँ दिखते ही उससे तुरंत निपटने में ही सबकी भलाई है. आगे आपकी मर्जी साहब !!


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, September 28, 2021

गड्ढों में छुपा सुख

गड्ढों में छुपा सुख

'गड्ढा' होना एक सामान्य सी बात है। प्राकृतिक संरचना से थोड़ी सी सतह नीचे चली जाए तो वह 'गड्ढा' कहलाने लगती है और थोड़ी ऊंची उभर आए तो 'टीला' बन जाती है। यह बहुत विचित्र बात है कि सतह से ऊपर उठना सम्मानजनक हो जाता है और गड्ढे में गिर जाने से अब तक के सारे हासिल की ऐसीतैसी हो जाती है।

बड़ी भद्द पिट रही है बेचारे गड्ढों की। गड्ढों को बदनाम करने की  यह बड़ी साजिश लगती है। यह ठीक है कि कुछ बातें, कुछ व्यक्ति मखौल के पात्र बनते रहे हैं,  परंतु दुख है कि इसी परम्परा में 'गड्ढों' को भी अपमान सहना पड़ रहा है। पहचान के केवल एक पक्ष की चर्चा बार बार करके उसके उजले पक्ष पर पर्दा डाल दिया गया है। 'गड्ढा' बेचारा तो निर्विकार भाव से चुपचाप प्रकृति,समाज और दुनिया की बेहतरी के लिए अपने कर्तव्य पालन में  निष्ठा से संलग्न है।

सुख समृद्धि और सम्पन्नता का खजाना बगैर गड्ढों में उतरे हासिल नहीं किया जा सकता। बहुमूल्य संपदा इस धरती के नीचे दबी पड़ी है। गड्ढों के निर्माण के बाद ही देश के आर्थिक आकाश में सोने की चिड़ियाँ उड़ाई जा सकती है। यह भी कोई बात हुई कि वैश्विक महामारी की वजह से आई मंदी के कारण एक बार जीडीपी गड्ढे में क्या उतर गई,अर्थशास्त्रियों का बीपी बढ़ गया। सरकारों के हिमालय इरादों को भी तो गौर करिए जरा!

गड्ढों से ही इस संसार का सौंदर्य कायम है। पृथ्वी का बड़ा हिस्सा एक विशाल गड्ढा है, जो पानी से लबालब है। दुनिया के सुखों का बड़ा खजाना इसके भीतर छुपा है। सागर न होता तो बचे भूभाग और पर्वतों की जरूरत व खूबसूरती का महत्व हमें कैसे पता चल पाता। थोड़े से गड्ढे सड़कों पर क्या बन गए और उनमें बरसात का जल क्या जमा हो गया तो इतना हल्ला मचाने की क्या आवश्यकता है? थोड़ी तो उदारता अपने आचरण में रखनी चाहिए। सड़क के गड्ढों का भी मजा लेना चाहिए। दशहरे पर हजारों रावणों के दहन के बाद व दिवाली पर सवा सौ करोड़ दीपक जलते ही मच्छरों का आतंक भी खत्म हो जाएगा। धैर्य और धीरज से सब ठीक हो जाता है। 

एक कलाकार की रचनात्मक प्रतिभा का मैं बड़ा कायल हो गया हूँ जिसने एक सड़क के कीचड़ भरे गड्ढों में हमारे प्यारे भारतवर्ष के मानचित्र की छबि खोज निकाली। गड्ढों से ही सड़क बनती है, देश बनता है। गड्ढे हैं तो अखण्डता है। सौंदर्य तो हमारी दृष्टि या नजरिये में होता है। इन निरीह गड्ढों के कारण ज्यादा दुखी होना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं, इससे चेहरे पर तनाव आता है, त्वचा खिंच जाती है। मुस्कुराने से गालों में डिम्पल पड़ते हैं। चेहरे के इन गड्ढों में भी कितनी मोहकता होती है। जरा समझिए इस बात को! 


ब्रजेश कानूनगो


Monday, September 27, 2021

कनिप के डोज

कनिप के डोज

पिछले रविवार को जब मैं अपने मित्र साधुरामजी के घर गया तो देखा कि उनके दाहिने पैर में प्लास्टर चढ़ा हुआ है। वे आरामकुर्सी पर बैठे थे तथा पट्टायुक्त पैर उन्होंने सामने रखे स्टूल पर टिका रखा था।

'यह क्या हो गया साधुरामजी?' मैंने अचंभित उनसे पूछा।

'यह सब आप के तथाकथित विकास का परिणाम है, विकास के नाम पर पूरा शहर खोद रखा है। सड़कों पर गड्ढे ही गड्ढे हैं। पुरानी सड़कों की रिपेयरिंग भी मात्र दिखाने के लिए ही होती है। कुछ दिनों में सड़कें फिर उखड़ जाती हैं।कोई कब तक कैसे और कहां तक बच सकता है।' उन्होंने कहा, 'अपनी मोपेड पर जा रहा था, पानी भरे गड्ढे में अगला पहिया गया और मोपेड पलट गई। पैर में फ्रैक्चर हो गया है।' उन्होंने आगे बताया।

'अरे यह तो बड़ा दुखद रहा!'  मैंने संवेदनाएं व्यक्त कीं। 

लेकिन साधुरामजी ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों की कहां चिंता पालते हैं, तुरंत अपने स्वभाव के अनुसार बात की गंभीरता को खत्म करते हुए बोले, 'उस वक्त मैं स्वयं ही शायद थोड़ा असावधान था।  खैर जो होता है अच्छा ही होता है। पिछले पन्द्रह दिनों के विश्राम के दौरान मुझे अद्भुत ज्ञान प्राप्त हो गया है।' 

'कैसा ज्ञान साधुरामजी?'  मैंने जिज्ञासा व्यक्त की।

'आपने अक्सर देखा होगा,अनेक नीम हकीम और डॉक्टर अखबारों में विज्ञापन छपाते हैं कि पुराने और निराश रोगी ही मिलें। हम फलां बीमारी का शर्तिया इलाज करते हैं।' वे बोले।

'हां, वह तो है नीम हकीम खतरे जान।' मैंने कहा।

'लेकिन मेरे चिंतन ने मुझे अनेक परेशानियों और समस्याओं से मुक्ति का रामबाण नुस्खा उपलब्ध करा दिया है। यूं कहें कि यह एक नई चिकित्सा पद्धति है,जो मैंने खोज निकाली है।' साधुरामजी ने कहा।


'वाष्प चिकित्सा, चुंबक चिकित्सा, स्पर्श चिकित्सा, एक्यूपंचर, इलेक्ट्रो चिकित्सा, आयुर्वेद, होम्योपैथी, एलोपैथी की तरह ही यह चिकित्सा पद्धति भी मरीजों के लिए बेहद कारगर साबित होगी।' वे धाराप्रवाह बोल रहे थे। 

'यह कौन सी पद्धति है साधुरामजी, कहीं आप गधे के सींग तो नहीं खोज लाए हैं।'  मैंने चुटकी ली।

'भाई यह कोई गधे के सींग वाली बात नहीं है। यह बहुत असरकारी है लेकिन इसके विकास में सरकार का बड़ा योगदान है।'  उन्होंने आगे कहा, 'महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे सत्य मिला था, आर्कमिडीज बाथरूम से बगैर टावेल लपेटे बाहर भागे थे और मैं अपनी खोज के बाद ही दुर्घटना की वजह से तुम तक नहीं पहुंच सका। दरअसल इस खोज का बीज  उस वक्त पड़ा जब मैं अपने शहर की सड़कों पर गुजरता रहता था। कुछ सड़कों की स्थिति तो ऐसी थी कि गड्ढों के बीच उसे खोजना कठिन हो जाता था। जब दुर्घटना हुई, पैर पर प्लास्टर चढ़ा तो चिंतन का अवसर मिला। तब  इस चिकित्सा पद्धति का जन्म हो सका।' उन्होंने कहा।

'अब आप बता ही दें कि आखिर है क्या यह चिकित्सा पद्धति!'  मेरी अधीरता बढ़ती जा रही थी।

'तो सुनो!'  उन्होंने किसी दार्शनिक की तरह अपना चेहरा नीचे से ऊपर उठाया और कहा, 'हमारे शहर की सड़कों पर मरीज को वाहन यात्राओं के नियमित डोज देना ही इस पद्धति का मूल मंत्र है।' 

'वह कैसे?'  मैंने पूछ लिया।

'मरीज पुरानी कब्ज से परेशान हो उसे शहर की विशिष्ट सड़क पर पांच दिन नियमित स्कूटर यात्रा के लिए परामर्श दिया जाए, छठे दिन वह स्वयं को हल्का महसूस करने लगेगा। किसी मरीज की प्रसूति में विलंब हो रहा हो और शल्य क्रिया संभव न हो तो ऑटो रिक्शा से किसी दूरस्थ चिकित्सालय ले जाएं, सामान्य प्रस्तुति सहज रूप से संपन्न कराई जा सकती है। कोई व्यक्ति बचपन से हकलाता हो, बोलने में शब्द गले में ही अटक जाते हों, उसे एक माह तक शहर की विशिष्ट सड़क पर तेज गति से मोटर चलाने का परामर्श दें, शब्द ही क्या चित्कार निकलने लगेगी। अगर डॉक्टर ने शल्य क्रिया के दौरान गलत हड्डियां जोड़ दी हो तो शहर की सड़कों पर तेज गति से मोटरसाइकिल चलाने का परामर्श दें, अपने आप हड्डी सही स्थान पर बैठ जाएगी। स्नायु विकार और पुराने सिर दर्द में लगातार पन्द्रह दिनों का स्कूटर चालन लाभ पहुंचाता है। शरीर की अकड़न, कान से कम सुनाई देना जैसी समस्याओं में भी शहर की सड़कों से वाहन यात्रा के निश्चित डोज लाभप्रद हो सकते हैं। डॉक्टरों की थोड़ी सी सूझबूझ और यात्रा की प्रामाणिक खुराक का परामर्श मरीजों को अनेक कष्टों से मुक्ति प्रदान करवा सकता है।' साधुरामजी किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस के मुख्य वक्ता की तरह बोले जा रहे थे, जहां मैं अकेला सैकड़ों डेलीगेट्स का प्रतिनिधित्व कर रहा था। 

'और हां शहर की ऐसी सड़कों का नामकरण भी कनिप-वन, कनिप -2, कनिप -10 आदि  किया जा सकता है।'

'यह कनिप 1,2,3 क्या है?'  मैंने पूछ लिया। 'कनिप यानी 'कष्ट निवारण पथ'। इन सड़कों की गुणवत्ता के आधार पर इनकी रोग निवारक क्षमता का आकलन करके इनका नामकरण किया जा सकता है, जैसे दवाइयों का होता है सिपलॉक्स 100 विक्स 500 एविल 5 आदि।' उन्होंने स्पष्ट किया। 

मैंने साधुरामजी से विदा ली। घर लौटते हुए सोच रहा था कि चिकित्सा विज्ञान में एक गैर चिकित्सकीय व्यक्ति के योगदान के लिए क्या साधुरामजी का नाम 'सर शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' के लिए प्रस्तावित करना उचित नहीं होगा?


ब्रजेश कानूनगो

Monday, September 6, 2021

सिर पैर की बात!

सिर पैर की बात!


पूरे शरीर में दर्द हो रहा हो। नाक भी बह रही हो। आंखों में जाले पड़े हों, धुंधला दिखाई दे रहा हो। त्वचा पर खुजली चल रही हो। रात को नींद नहीं आती। कुछ न कुछ बड़बड़ाने का मन करता हो। बुखार 100 डिग्री से ऊपर बना ही रहता हो। चलने पर कभी कभी चक्कर भी आने लगते हों। खाने पीने का मन नहीं करता। जीभ का स्वाद चला गया हो।अब बताइए....?

जी नहीं मैं बीमारी का नाम नहीं पूछ रहा। न  बीमार व्यक्ति की दुर्दशा का वर्णन कर रहा। न आपको डराना चाहता हूँ और न ही उस व्यक्ति के दुखों का जिक्र करके आपके आनन्द में खलल डालना चाहता हूँ।

दरअसल मैं इन सब परेशानियों के बीच यकायक उसे प्राप्त होने वाली छोटी सी उस खुशी की बात करना चाहता हूँ जिससे कठिन समय में उसे जरा सी राहत का अहसास हो जाता है। वह राहत की बात यह है कि जब कल उसने मूंग के पापड़ का एक टुकड़ा मुंह मे रखा तो उसकी जीभ में स्वाद की ग्रंथि पुनः जाग्रत हो गई।

आप सोंचते होंगे कि मैं बड़ी अजीबोगरीब बात कर रहा हूँ। बहक गया हूँ। बिल्कुल भी नहीं बहका हूँ जनाब। उस बीमार आदमी की याद मुझे यों ही नहीं आ गई है और न ही मैं बेसिर पैर की कोई बात कर रहा हूँ। इस बात का सिर ही नहीं दिमाग भी है और अपने पैरों पर चलकर मेरे पास आई है।

यह उस आनन्द की बात है, उस राहत की बात है जिसे पाकर हमारा मन बल्ले बल्ले करने लगता है। जीवन की सारी परेशानियों और दुखों को अकस्मात भूल जाने का मन करता है। जैसे ऊपर उल्लेखित वह बीमार व्यक्ति पापड़ का एक कतरा अपने मुंह में रखते ही सारी बीमारियों को महसूस करना भूलकर स्वाद के संसार में लौटने लगता है।

चलिए पहेलियां बुझाना छोड़कर सीधे बात करते हैं।

दरअसल आम आदमी ही कहानी का वह बीमार व्यक्ति है जिसे अनेक परेशानियों ने जकड़ा हुआ है। ऊपर से महंगाई डायन की कुटिल नजरें भी उसके जीवन को निशाना बनाए हुए है। पेट्रोल और गैस के दामों ने उसके जीवन के सुखों में आग सी लगा दी है।

इन संकटों के बीच एक दिन अखबार में खबर छपती है, 'पेट्रोल की कीमतों में पन्द्रह पैसों की जबरदस्त राहत'।

अब बताइए क्या असीम संकटों के बीच इस खुशखबर से किस परेशान व्यक्ति का दिल बल्ले बल्ले नहीं करने लगेगा। पन्द्रह पैसों की राहत पन्द्रह मिनट के लिए भी मन को सुकून देती हैं तो वह भी क्या कम महत्वपूर्ण बात नहीं है? जरा सोचिए!


ब्रजेश कानूनगो

डायन का लौट आना

डायन का लौट आना

वह फिर लौट आई है। अच्छा लौटता है। बुरा लौटता है।अच्छा बुरा सब लौटकर आ ही जाता है। मौसम और ऋतुएं लौटती हैं। गर्मी जाती है तो बारिश लौट आती है। बाढ़, सुनामी,भूकम्प सब लौट लौट आते हैं। पतझड़ जाता है तो बसंत लौट आता है। दुख के बाद सुख लौटता है। रुदन के बाद मुस्कुराहट लौटती है। तालिबान लौटता है, हिटलर लौट आते हैं। रूपांतरित होकर साम्राज्यवाद लौटता है, समाजवाद के खंडहरों में हरियाली की बिदाई के बाद पूंजीवाद की जैकेट पहनकर प्रजातंत्र लौट आता है।  आतंकवाद लौटता है। दूर का,पास का,अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद सब लौटते हैं। नाम बदलकर लौटते हैं तो कभी उसी तरह लौट आते हैं जैसे पहले आए थे। लौट लौट आना इस सृष्टि की रीत है।


अवतारी पुरुष लौट आते हैं। सोने की चिड़िया लौट आती है। स्वस्थ होने पर तन लौटता है, मन स्वस्थ होने पर सनातन लौट आता है। ऐसे में पहले की 'महंगाई डायन ' लौट आती है तो किसी को कोई दिक्कत कैसे हो सकती है!  महंगाई डायन पहले भी आई थी। आती रहती है। इसका आना प्रकृति सम्मत है। वैसे भी हमेशा बर्फ में दबे जीव की तरह जिंदा रहती है। थोड़ी गर्मी पड़ी कि बर्फ पिघलने लगती है और यह डायन पुनः धरातल पर दृष्टिगोचर हो जाती है। 

हम शोर मचाने लगते हैं कि 'महंगाई डायन' लौट आई है। दरअसल वह गई ही कहाँ थी? यहीं बर्फ के नीचे दबी अपने को संस्कारित कर रही थी। अबकी लौटी यह डायन पहले जैसी बुरी आत्मा नहीं है। संस्कारित होकर 'अच्छी डायन' बनकर आई है। इसलिए इसके आने से किसी को कोई परेशानी नहीं है। उल्टे इसकी प्रशंसा है कि इसने अपने को संस्कारित कर लिया है। इसके संस्कारित होने से लोगों की क्रय क्षमता में उछाल आए या न आए किन्तु जीडीपी में वृध्दि अवश्य होगी।

स्वागत है 'अच्छी डायन'। पहले तुम साठ, सत्तर रुपयों में एक लीटर पेट्रोल से आग लगा देती थी, अस्सी रुपयों के सरसों तेल में बने भोजन से भी परिवार भूख से बिलखने लगते थे। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। तुम्हारे पास संस्कार नहीं थे, तुम्हारा चरित्र ही भ्रष्ट था। अब ऐसा नहीं है। अब तुम अच्छी डायन हो गई हो प्रिय महंगाई।

अब सौ से ऊपर के पेट्रोल और डेढ़ सौ रुपयों के खाद्य तेल में भी हमारा जीवन खुशहाल है। हमें कोई आपत्ति नहीं है बुआजी। तुम आराम से रहो। हममें से अधिकांश को जीने की आवश्यक सामग्री हमारी संवेदनशील सरकारें निशुल्क उपलब्ध करा ही रही हैं। जो थोड़े उच्च वर्ग के लोग हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, वे वितरक हैं,उत्पादक हैं। मध्यमवर्गीय लोग झंडा उठाए हैं।  तो प्यारी महंगाई बुआजी तुम बिल्कुल हमारी चिंता मत करो और जब तक चाहो,यहाँ रहो। तुम अब चरित्रवान हो गई हो, भली और ममतामयी हो गई हो, यही क्या कम बड़ी बात है। तुम्हे अब डायन कोई नहीं कहेगा, आराम से रहो। 


ब्रजेश कानूनगो

Friday, July 16, 2021

महाराज श्रृंखला 11

 महाराज श्रृंखला 11

11

आत्मज्ञान का प्रस्फुटन


महाराज को लम्बे समय से आशंका तो थी कि अतंतः उन्हें संघ गणराज्य में अपनी रियासत का विलय करना ही होगा। स्वतंत्रता संग्राम में सेनानियों के संघर्ष और महात्मा गांधी के नेतृत्व में लंबे स्वाधीनता आंदोलन के पश्चात अंग्रेजों को देश की सत्ता भारतीय नेताओं के हवाले करने को मजबूर होना पड़ा।

आजादी मिलने के बाद संघ गणराज्य में ज्यादातर रियासतें तो उसी समय शामिल हो गईं थीं किन्तु जो थोड़ी सी रियासतें झिझक रहीं थीं वे भी संघ के गृहमंत्री की योजना और कूटनीति के दबाव में विलय के लिए सहमत होती गईं।

अपनी रियासत के विलय को लेकर महाराज आशंकित तो थे किंतु यह नहीं मालूम था कि यह इतनी जल्दी हो जाएगा। 'पाषाण पुष्प' की यात्रा सम्राट के रूप में उनकी अन्तिम राजकीय यात्रा साबित हो जाएगी। एक सप्ताह के भीतर ही समझौते की कार्यवाही सम्पन्न हो गई। हालांकि संघ सरकार की ओर से नियमित अच्छी खासी धनराशि पेंशन की तरह 'प्रिवीपर्स' के नाम से महाराज को प्राप्त होती रहने वाली थी। जिससे वे अपनी शानोशौकत थोड़ी बहुत बनाए रख सकते थे। रियासत अब गणराज्य के एक प्रांत का हिस्सा बन गई थी। समस्त नीति नियम कानून राजशाही की बजाए प्रजातांत्रिक व चुनी हुई सरकार द्वारा बनाए और अपनाए जाने जरूरी हो गए।

महाराज की शिक्षा दीक्षा विलायत में हुई थी तो वे प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं के बारे में जानते भी थे। पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने इसके बारे में काफी पढ़ रखा था। दरअसल विलायत छोड़कर वे हिंदुस्तान आना नहीं चाहते थे किंतु पिताश्री याने बड़े महाराज की मृत्यु और रियासत पर चचेरे भाइयों की कुदृष्टि पड़ने, साम्राज्य हथिया लेने के षडयंत्रों की वजह से मातृभूमि लौटना पड़ा था।

राजकाज से मुक्त होकर, महाराज राजमहल प्रासाद को छोड़ एक छोटी कोठी में शिफ्ट कर गए। कोठी भी किसी छोटे राजमहल से कम नहीं थीं किन्तु प्रासाद की तुलना में नौकर चाकर से लेकर अन्य प्रबन्धन कार्यों में कमी अवश्य आई थी। प्रिवीपर्स राशि में अब पहले की तरह खर्च नहीं उठाया जा सकता था। वे जानते थे कि सरकार इस सुविधा को व्यापक राष्ट्रहित में कभी भी छीन सकती है। कालांतर में यह हुआ भी। 

राजशाही का वर्षों से लगा स्वाद महाराज के तन मन में ही नहीं आत्मा में भी घर बना चुका था। लोकतंत्र में सम्राट का ताज  सिर पर सजाना कभी सम्भव नहीं। मन मानने को तैयार ही नहीं था कि अब वे महाराज नहीं हैं। यद्यपि संबोधन में आज भी महाराज ही पुकारे जाते थे। गरीब की रोटी को भी रोटी ही कहते हैं लेकिन उस पर बटर नहीं लगा होता। महाराज की दशा लगभग वैसी ही हो गई थी।

बहुत पुरानी कहावत है ,जहां चाह होती है वहाँ राह भी निकल आती है। प्रजातंत्र में भी उन्हें अपना उज्ज्वल भविष्य आखिर नजर आ ही गया। एक सुबह शौचयोग करते हुए तनिक जोर लगाया तो मस्तिष्क में टंकार हुई। आत्मज्ञान का प्रकाश प्रस्फुटित हो गया।

अगले दिन देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल की सदस्यता उन्होंने ग्रहण कर ली। उन दिनों पोलिटिकल पार्टी में एंट्री का आज की तरह सार्वजनिक इवेंट नहीं होता था। पार्टी अध्यक्ष या महासचिव की उपस्थिति के बगैर भी बड़े बड़े लोग ज्वाइन कर लेते थे। पार्टी दफ्तर में जाकर महाराज ने फॉर्म भरा और चवन्नी नकद जमा करा दी। 

कार्यालय के बुजुर्ग सचिव ने रजिस्टर में नए सदस्य का नाम नोट किया, भूषणसिंह वल्द रणवीरसिंह ठाकुर, ठिकाना....? क्या करेंगें जानकर बस इतना जान लीजिए पूर्व रियासत का एक महाराजा आज प्रमुख पोलिटिकल पार्टी का चवन्नी सदस्य बनकर देश सेवा के लिए उद्यत हो गया।


ब्रजेश कानूनगो  


महाराज श्रृंखला 10

महाराज श्रृंखला 10

10

अपशगुन की छाया

पाषाण पुष्प की जनसभा को संबोधित करने के बाद महाराज ने कुछ समय लोक कलाकारों के साथ बिताया और स्वर्ण उत्खनन  परियोजना के शिलान्यास स्थल पर हेतु जल्दी ही पहुंच गए। उनकी बेसब्री से वहाँ प्रतीक्षा हो रही थी। उत्खनन कम्पनी के एमडी प्रशांत कुमार ने महाराज की अगवानी की। संगमरमर पर शिलान्यास का एक आकर्षक पत्थर तैयार किया गया था, जिस पर महाराज के अलावा संतश्री और गोपाल सेठ की उपस्थिति का उल्लेख भी बड़े अक्षरों में किया गया था। 

शिलालेख को स्थापित करने के पूर्व राज पुरोहित ने महाराज से पूजा अर्चना करवाई और एक कुदाल से भूमि पर थोड़ी सी औपचारिक रूप से  प्रतीकात्मक खनन कार्य करवाया। फोटोग्राफरों के कैमरों की चमक के साथ वहां उपस्थित लोगों ने तालियां बजाकर ऊंचे स्वर में महाराज का परम्परागत जयघोष किया।

तभी एक राजसेवक ने उपस्थित होकर महाराज के निजी सचिव काकदंत के कानों में कुछ आवश्यक संदेश दिया। निजी सचिव तुरन्त महाराज के समीप पहुंचे और उनको राजधानी से आए आवश्यक संदेश की जानकारी दी।

यद्यपि संध्या काल में संतश्री के आश्रम में प्रार्थना सभा और रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम में महाराज को भी शामिल होना था, किन्तु संदेश पाते ही महाराज ने पाषाण पुष्प का दौरा उसी वक्त समाप्त कर दिया।

थोड़ी ही देर में उनकी विलायती बड़ी कार राजमहल की दिशा में आगे बढ़ रही थी। महाराज के मुख मण्डल पर परेशानी पढी जा सकती थी। 

ड्राइवर लाखनसिंह शांत चित्त गाड़ी चला रहा था।  महाराज और काकदंत की धीमी आवाज में बातचीत के शब्द कानों तक पहुंच कर स्पष्ट कर रहे थे कि रियासत के अस्तित्व पर बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है।

मन विचलित हुआ तो एकाग्रता भंग हो गई। नजर हटी कि दुर्घटना घटी। अकस्मात ब्रेक लगने की जोरदार आवाज के साथ गाड़ी रुक गई।

'क्या हुआ लाखनसिंह?' काकदन्त और महाराज की आवाजें एक साथ गूंजी। 

सुरक्षाकर्मी तुरन्त गाड़ी से उतर कार के टायरों की ओर देखने लगा। लाखनसिंह भी उतर कर देखने लगा। 

अगले पहियों के नीचे एक व्यक्ति कुचल गया था।

देखने में वह कोई बुजुर्ग वनवासी लग रहा था। 

इस बीच काकदंत भी नीचे उतर आए थे। कार में केवल महाराज रह गए।

नीचे उतरे तीनों व्यक्तियों ने रियासत पर आई विपदा व महाराज की मनःस्थिति को ध्यान में रख कर कुछ मन्त्रणा की।

गाड़ी पुनः आगे बढ़ी तो महाराज ने पूछा, ' क्या हो गया था काकदंत? गाड़ी क्यों रोकना पड़ी?' 

'कुछ नहीं महाराज! एक श्वान गाड़ी के नीचे आकर मर गया!' 

'ओह! ईश्वर उसे सदगति दे।' महाराज ने आंखें बंद कर लीं। 

आधा पौन घण्टा यात्रा के बाद महाराज राजमहल पहुंच चुके थे। महामंत्री के सचिव ने बताया कि संघ गणराज्य का एक प्रतिनिधि मंडल अतिथिगृह में विश्राम कर रहा है और संध्या समय महाराज से भेंट करना चाहता है।

जिस अनिष्ट की महाराज को आशंका थी,वह घड़ी बिल्कुल करीब थी।

शीतल जल से स्नान के बाद तनाव तनिक कम होने की संभावना बनती है...महाराज प्रसाधन गृह की ओर बढ़ गए...


ब्रजेश कानूनगो