Monday, January 8, 2024

कोहरे में घटती दृश्यता और कर्तव्य पालन

कोहरे में घटती दृश्यता और कर्तव्य पालन

उस दिन सुबह से वे उसे जगा रहे थे. पर वह बिस्तर छोड़ने को तैयार ही नहीं था. रजाई एक तरफ से उलेटते तो वह दूसरी तरफ से खींच कर मुंह ढंक लेता. यों सामान्य स्थितियों में भी सुबह सात बजे स्कूल जाने में उसको अपनी स्वर्गवासी नानी जी याद आने लगती थी तब कड़कड़ाती ठंड में तो बड़ी मुश्किल हो रही थी. ऊपर से बेमौसम बरसात और ओला वृष्टि ने जैसे अलास्का या साइबेरिया को ही घर तक पहुंचा दिया था. बिना कुछ खर्च किए पर्यटन के सुख और आनंद का बंदोबस्त मुफ्त में उपलब्ध था.


पोते को न उठना था तो नहीं उठा. उसे स्कूल बस तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दादा का पारिवारिक कर्तव्य था. वैसे सरकार की कल्याणकारी नीतियों और योजनाओं के फायदों का प्रचार प्रसार के राष्ट्रीय दायित्व को सोसायटी के वाट्सएप ग्रुप में नियमित रूप से निभाते रहते हैं.  सरकारी सेवा से रिटायरमेंट के बाद कुछ पारिवारिक दायित्व भी उनके लिए अब निर्धारित कर दिए गए थे.


शीतकाल के इस समय में बड़ी समस्या आ रही थी दादाजी के समक्ष. कड़ाके की ठंड ने उनकी सारी गरमाहट को जैसे  दबोच लिया है. नियमित कर्तव्य पालन में बड़ी दिक्कत आ रही है. सब तरफ कोहरा छाया हुआ है. पोते में स्कूल जाने की गर्मी नहीं है, दादा की सरगर्मी कोई काम नही आ रही. सारे प्रयास विफल हो रहे. ऊपर से सोसायटी के वाट्सएप ग्रुप में संदेशे आने लगे कि बच्चे आपके हैं, कलेक्टर या सरकार के नहीं, ठंड में उन्हें स्कूल मत भेजें. लेकिन दादा का पुराना नेहरूकालीन मस्तिष्क यह बात स्वीकारने को तैयार नहीं. खुद की दादी के निधन हो जाने पर भी बचपन में उन्हें स्कूल भेज दिया गया था. पर अब नया देश था, नया संसार था.


बहरहाल, पोते को जगाने, बिस्तर छुड़वाने की माथापच्ची से मुक्त होकर उन्होंने ताजा अखबार उठा लिया. हालांकि अखबार में भी कोहरा छाया हुआ था. उसने भी दो दो जैकेट धारण कर रखी थी और उनमें भी हीटर,ऊनी कपड़ों, गर्मी लाने के साधनों और कंबलों के विज्ञापन छपे थे. सरकारों के गरमाहट से भरे बड़े बड़े पोस्टर छपे थे. जीवन में गर्मी की गारंटियां थीं.

भीतर के पृष्ठों पर वे ही खबरें थीं जो रात को ही वे टीवी पर देख चुके थे. जिन खबरों को वे विस्तार से पढ़ना चाहते थे वे थी ही नहीं या जो थोड़ी बहुत दिखाई दे रहीं थी वे भी ठिठुरकर छोटी हो गई थीं.


दो जैकेटों के बाद अखबार में जो सुर्खियां थी उनमें भी एक्सप्रेस हाइवे पर वाहनों के टकराने और दुर्घटनाओं की सूचनाएं थीं. नीतियों, कूटनीतियों में कोहरे और विचारहीनता की वजह से देशों और नेताओं के टकराव के शोले भड़कने की रिपोर्टिंग नजर आ रही थीं. आसमान में सूरज नहीं था पर राजनीति के आकाश में कई सूर्य और नक्षत्र अपनी तेजस्विता से कोहरे को भेदने की सफल,असफल कोशिश करते दिखाई दे रहे थे. 


चारों तरफ कोहरा घना था. दृश्यता सिमट गई थी. औसतन सौ मीटर रह गई थी. कहीं कहीं इससे भी कम. कोहरा इतना अधिक प्रभावी था कि आंखें तो आंखें दिमाग भी जैसे शून्य होता जा रहा था. न कुछ दिखता था न कुछ सोच पाता था. गजब का कोहरा काल था यह.


तीसरे पन्ने पर जैसे ही उनकी एक खबर पर दृष्टि पड़ी उन्होंने बड़ी राहत महसूस की. कलेक्टर ने अगले सात दिनों के लिए सभी स्कूलों को सुबह सुबह की बजाए प्रातः दस बजे से खोलने के निर्देश दे दिए थे. कोहरे के सामने सबने हथियार डाल दिए थे. सच है दुर्घटनाओं को रोकना है, परेशानियों से बचना है, सुखी, प्रसन्न रहना है तो कोहरे और अल्प दृश्यता को गले लगाने में ही भलाई है.

दादाजी ने अखबार को समेटकर मोबाइल उठाया और सोसाइटी के ग्रुप में सरकार के निर्णय और कलेक्टर के नए आदेश को प्रसारित करने का राष्ट्रीय कर्तव्य का निर्वहन प्रारंभ कर दिया. दृश्यता अब केवल सात इंच रह गई थी. कोहरे की वजह से दूरदृष्टि उनकी ही नहीं पूरे समाज की गड़बड़ा गई है. न जाने यह कोहरा कब छटेगा!


ब्रजेश कानूनगो

Thursday, January 4, 2024

आंदोलन पर उतरी सब्जियां

आंदोलन पर उतरी सब्जियां 


बड़ा ही गजब हो गया. ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल समाप्त हुई ही थी कि नगर की मंडी में सब्जियों ने आंदोलन शुरू कर दिया. 
सारी की सारी सब्जियां अपनी विविध प्रकृति और गुण धर्म छोड़कर एकजुट हो गईं. चाहे गौर वर्णी धवल मूलियां हों या गुलाबी शकरकंद,चुकंदर. यूरोपियन शैली में बालों को खूबसूरती से संवारे गोभियां हों या घूंघट लिए शर्मीली मटरें, अपने ठिकानों को छोड़कर राजबाड़ा चौक पर सभी जमा हो गए. 

केवल सब्जियां ही नहीं कंदमूल और जमीकंद भी हाथों में बैनर,झंडे और पोस्टर थामे नारे लगा रहे थे. यहां तक कि लौकी और कद्दू जैसी दीनहीन और उपेक्षित तरकारियां भी एकजुट हो गईं. 
भले ही गाजरों को कुटिल विदेशी लोगों के प्रेम ने सिर पर चढ़ा रखा है लेकिन जब भारतीयता पर बात आ गई तो हजारों की संख्या में ये रेड कामरेड भी हाथों की श्रंखला बनाए अपना झंडा बैनर थामे शालीन प्रदर्शन कर रहे थे. 

कद्दू समाज की ओर से तो एक पुतला बनाकर भी चौराहे तक लाया जा चुका था. उनका विचार था की पुतला जलाए बिना किसी आंदोलन में चेतना नहीं आती. आग और आंदोलन का बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध रहा है. पुतला न हो तो टायर जलाकर भी प्रदर्शन में जान फूंकी जाती रही है. 

सबसे ज्यादा आंदोलनकारी बैंगन समाज से ही थे. वैसे बैंगनों में भी कई जातियां और उपजातियों का झमेला है फिर भी उनकी एकता देखते ही बनती थी. अपने आपको श्रेष्ठ और सत्ता तक को हिला देने वाले बलशाली टमाटर और प्याज भी आज बहुत बड़ी संख्या में नारे बाजी कर रहे थे. 

इस समूचे प्रदर्शन और आंदोलन को सब्जियों के सरताज आलुओं का भरपूर सहयोग और शक्ति प्राप्त थी. हो भी क्यों ना? किसी ऑन लाइन फूड पोर्टल टेस्ट एटलस ने दुनिया की सबसे खराब सब्जियों में 'आलू,बैगन और टमाटर'  वाली अपनी पसंदीदा सब्जी का नाम शामिल कर लिया था. यह किसी भी हालत में किसी भारतीय को कैसे स्वीकार होगा चाहे वे व्यक्ति हो या तरकारी.  इसीलिए राजबाड़ा चौक पर गहमागहमी के बीच सब्जियों का यह विरोध प्रदर्शन चल रहा था. 

प्रश्न भारतीय तरकारी समाज की सब्जियत का जो था. उसके मान सम्मान का था. दुनिया को श्रेष्ठ भोजन देने वाले हर दिल अजीज आलुओं की सर्वव्यापकता और स्वीकार का था. उपेक्षित बैंगनों को गले लगाने वाली उसकी स्नेहिल उदारता का था. टमाटरों ही नहीं दुनियाभर की सब्जियों में उसके घुलमिल जाने और मिलनसारिता जैसे मूल्यों की रक्षा का था. आंदोलन तो होना ही था. 

आलुओं के नेतृत्व में यह भी लग रहा था कि सब्जियों का यह प्रदर्शन राष्ट्रव्यापी होता हुआ कहीं ग्लोबल ही न हो जाए.  टमाटरों का तो यहां तक कहना था कि इस सबके पीछे किन्ही विदेशी और बाजार शक्तियों का हाथ है जो भारतीय सब्जियों के बाजार पर कब्जा करना चाहती हैं. 
प्याज समाज के लीडर का कहना था कि हमें अपनों द्वारा सड़कों पर रौंद डालने से उतना मानसिक कष्ट नहीं हुआ जितना ' बैंगन टमाटर आलू ' की सब्जी को संसार की घटिया सब्जियों  में वर्गीकृत करने से हुआ है. 

राजबाड़ा चौक में शोरगुल बढ़ता जा रहा था. ढोल नगाड़े भी बजने लगे थे. देखते ही देखते मनुष्यों की भीड़ वहां बढ़ने लगी. कुछ नेतागण और उनके अनुयायी भी गरदनों में रंग बिरंगे दुशाले और टोपियां लगाए इकट्ठा होने लगे. सब्जियों की प्रदर्शनकारी टुकड़ियां धीरे धीरे मानवीय कार्यकर्ताओं के पीछे सिमटने लगीं. कद्दूओं द्वारा लाया गया पुतला किसी टोपीधारी नेता ने सुलगा दिया था. आग भड़कने लगी थी. नारों के स्वर ऊंचे होते जा रहे थे. 
किसी हवलदार ने चौकी को खबर की तो थोड़ी ही देर में  पुलिस की गाड़ी वहां आई और जवान  डंडे बरसाने लगे. जलते हुए पुतले को भीड़ से दूर ले जाकर उस पर फायर ब्रिगेड के वाहन ने पानी की बौछार कर दी.

यकायक मुझे लगा जोशीले प्रदर्शन को देखते हुए मेरे चेहरे पर भी पानी के कुछ छीटें आ गिरे हैं. छींटे ही नहीं एक जानी पहचानी सी आवाज भी सुनाई दी, अब उठ भी जाइए, कब तक सोते रहेंगे, बाजार से बैंगन ले आइए, बच्चों की फरमाइश है, आलू बैंगन टमाटर की सब्जी बनानी है आज. 

ब्रजेश कानूनगो 



Wednesday, December 27, 2023

प्रतिरोध में लौटाना

प्रतिरोध में लौटाना

 
समझ में नहीं आ रहा मैं क्या लौटाऊं। लौटाने के लिए अपने पास कुछ होना भी तो चाहिए। जिसे पहले कुछ मिला हो वही तो लौटाने के बारे में सोच सकता है।
हां, बचपन में जब एक बार किसी कक्षा में पहले नंबर पर आया था तब दादा जी ने जरूर खुश होकर अपना पैन इनाम में दे डाला था। अन्याय के खिलाफ वही पेन लौटाकर में अपना विरोध जता सकता हूं लेकिन स्टील का वह बॉलपेन अभी भी मेरे पास दादाजी की स्मृतियों के रूप में धरोहर की तरह रखा हुआ है जिसे लौटाकर में अपने अच्छे दिनों की याद को धुंधलाना नहीं चाहता।  मैं अन्ना हजारे जैसा कोई महान आंदोलनकारी भी नहीं रहा कि अपना पद्मश्री सम्मान लौटा कर प्रतिरोध से सरकार की नाक में दम कर डालूं। बहुतों के पास तो और भी मौके होते हैं। सम्मानों का ढेर लगा होता है। पद्मश्री ही क्या पद्म भूषण लौटने का भी चांस बन जाता है। सम्मानों की संदूक भरी होती है कुछ के पास, एक-एक करके लौटते जाएं क्या फर्क पड़ता है। 
मुश्किल तो हम जैसे कंगलों की है। गुस्सा तो मुझे भी बहुत आता रहता है। आहत होकर मैं भी विरोध भी दर्ज कराना चाहता हूं लेकिन तरीका ही नहीं सूझ रहा।
मैं कोई ऐसा खिलाड़ी भी नहीं हूं जिसे कोई पदक वगैरा मिला हो अन्यथा पदक लौटाकर ही अपना गुस्सा व्यक्त कर देता। थोड़ा बहुत कहानी कविता जरूर लिख लेता हूं पत्र पत्रिकाओं  में। बेहतर सामग्री के अभाव में मेरी रचनाओं का उपयोग भी कर लिया जाता है लेकिन केवल इतने से ही ज्ञानपीठ या अन्य साहित्य सम्मान और पुरस्कार तो नहीं दे देता कोई, तो वह भी मेरे पास नहीं है लौटाने के लिए। 
ऐसा नहीं है कि पुरस्कार या सम्मान पाने की कोई इच्छा मेरे भीतर कभी रही नहीं। बहुत हाथ पैर मारे हैं। देशभर के हिंदी प्रदेशों और कई गैर हिंदी भाषी राज्यों की संस्थाओं के प्रस्ताव आए थे कि भाई ले लो एक अदद पुरस्कार ले लो, लेकिन मेरी ही मती मारी गई थी जो वांछित सहयोग राशि का इंतजाम नहीं कर सका। अब पछता रहा हूं। तब विवेक से काम लेता और पत्नी का सोना बेचकर ही कोई सम्मान खरीद लेता तो यह दिन नहीं देखना पड़ता। आज वही सम्मान तेरा तुझको अर्पण के भाव से लौटाकर विरोध भी हो जाता और इज्जत भी रह जाती। 
लिहाजा मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं जिसे लौटा सकूं। एक डिग्री जरूर है, जब मिली थी तब सोचा था उसको ध्वज की तरह लहराते हुए सफलता का रास्ता तय कर लूंगा, लेकिन अब उसे लौटना भी क्या लौटाना हुआ!  कहा गया है कि इज्जत उसकी जाती है जिसकी होती है। ठीक उसी तरह मेरी मूल्यहीन डिग्री को लौटाने पर भी प्रतिरोध का क्या कोई मूल्य रहेगा। 
बड़े बड़े सम्मानित व्यक्तियों का मजाक बनता रहा है। अतः मुझे माफ कीजिएगा मैं उन महान लोगों में शामिल नहीं हो सकता जो कुछ पाकर नहीं कुछ लौटाकर अपना आक्रोश व्यक्त कर सकूं।  इतना जरूर है कहीं न कहीं अपनी मुस्कान और खुशी का कुछ हिस्सा जरूर मेरे पास से लौट गया है। इसके लौटने में जो थोड़ा बहुत प्रतिरोध का अंश है,सामान्यतः वह किसी को नजर नहीं आ रहा। 

ब्रजेश कानूनगो  

Saturday, October 21, 2023

बिकाऊ हो गए सच और झूठ

बिकाऊ हो गए सच और झूठ

वे सुबह सुबह मेरे घर आए। थोड़ा परेशान लग रहे थे। क्या बात है साधुरामजी? क्या आज फिर माइग्रेन का दौरा पड़ा है?

कोई दौरा वोरा नहीं पड़ा है। समय का ऐसा दौर आएगा हमारे जीते जी, कभी सोचा नहीं था। वे बोले। आखिर हुआ क्या है? हमने पूछा तो उबल पड़े, कहने लगे, माना कि इस कलियुग में सब कुछ बिकता है लेकिन इतना पतन हो जाएगा। यह तो अति ही हो गई है कि रावण भी बिक रहे हैं बाजार में। सस्ते-महंगे हर भाव मे मिल रहे हैं। ग्यारह सौ से लेकर सवा लाख रुपयों तक के रावण उपलब्ध हैं।

तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है साधुरामजी। आदमी बिकते हैं इस समाज में तो पुतलों के बिकने में कैसी परेशानी। आप भी खरीद लाइये और जला दीजिये अपने आंगन में दशहरे पर। रावण के पुतले का दहन करके हम समाज में घुस आई बुराइयों को जला डालते हैं और आने वाले समय के लिए अपना शुद्धिकरण कर लेते हैं। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की।

तुम्हारी ये आदर्श बातें अपने तक ही सीमित रखो। यदि ऐसा हो रहा होता तो हम अब तक सतयुग में लौट गए होते। घर,मोहल्ले के कूड़ा करकट को बोरी में भरकर बचपन में हम भी रावण बनाते थे और मोहल्ले के मैदान में दहन करते थे। दशहरा समितियां भी अपने बड़े बड़े रावण के पुतले बनवाया करती थीं। पर अब ये घरों घर रावण का पुतला जलाना? बाजार में पुतलों का बाजार सजना? रावण कोई ऐसी शख्सियत थी जिसको इतना भाव दिया जाए? इसे नैतिक नहीं कहा जा सकता। साधुरामजी अपनी रौ में बोलते जा रहे थे।

साधुरामजी, यह आपके जमाने वाला कलियुग नहीं है। यह बाजारयुग है। इस युग में अच्छा बुरा सब माथे लगाने योग्य है। जहां से जैसे भी मुद्राओं का आगमन सम्भव हो वह काम करना समय की रीत है। सच भी बिकता है और झूठ भी। आदमी भी बिकता है और पुतला भी। इसमें कोई नैतिक अनैतिक वाला प्रश्न ही खड़ा नहीं होता। आप अधिक बेचैन न होइए, बीपी बढ़ जाएगा आपका! मैंने कहा।

लेकिन यह भी तो देखिए एक पुतला ग्यारह सौ का है,एक पांच हजार का और कुछ तो सवा लाख रुपयों तक की कीमतों के हैं। पुतला जब प्रतीकात्मक है तो वे एक जैसे भी हो सकते हैं। एक साइज और एक जैसी सामान्य कीमतों के। हर व्यक्ति खरीद सके। साधुरामजी ने अपने को थोड़ा सहज बनाने का प्रयास किया।


साधुरामजी मैं आपको समझाता हूँ ठीक से। देखिए आपने भी माना है कि रावण का पुतला तो बुराई का प्रतीक मात्र है,जिसे जलाकर हम अपनी बुराइयों पर विजय का संकल्प लेते हैं हर साल। मान लीजिए कोई व्यक्ति अपने भीतर के भ्रष्टाचार रूपी रावण को नष्ट करने का संकल्प लेना चाहता है तो वह पुतला खरीद कर अपने आंगन में उसका दहन करेगा ही न! मैंने कहा।

लेकिन इसके लिए सवा लाख कीमत के पुतले की क्या आवश्यकता है? साधुरामजी बोले।

वह इसलिए साधुरामजी कि जो व्यक्ति हजार रुपयों तक का भ्रष्टाचार करता होगा वह क्यों कर महंगा रावण खरीदेगा। अपनी अपनी बुराइयों की साइज के हिसाब से ही तो रावण दहन करेगा न ! जितना बड़ा दोष, उतना बड़ा रावण खरीदेगा। बड़ी कॉलोनी में ज्यादा लोग रहते हैं तो बड़ा और महंगा रावण जलाना पड़ेगा। मैंने समझाया।

इस विश्लेषण को सुनते ही साधुरामजी पूरी तरह सामान्य हो गए। चिर परिचित अंदाज में ठहाका लगाकर बोले, क्या खूब कही आपने, अब समझ आया कि राजधानियों में इतने बड़े बड़े रावण क्यों जलाए जाते हैं।


ब्रजेश कानूनगो

Monday, July 24, 2023

मौसी आई है इस बार

मौसी आई है इस बार

सुना है यूपी की किसी मंत्री महोदया ने टमाटरों के महंगे हो जाने पर सुझाव दिया है कि जो महंगा हो उसे खाना छोड़ दें या फिर अपने घर के गमलों में टमाटर उगाएं !  यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। कई देशप्रेमी लोग तो राष्ट्रीय गौरव में महंगाई को कोई बुरी बात भी नहीं मानते। यह एक मौसमी दुर्घटना है जिसे सहजता से स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। दरअसल महंगाई बेचारी तो राजनीतिक क्षेत्रों में हर बार यूंही विषय या मुद्दा बन जाती है। जो लोग इसे डायन कहकर अपमानित करते हैं वे आम लोगों की जीवनशैली को समझते ही नहीं। आना जाना जीवन चक्र है। प्रकृति हो या इंसान का जीवन यह चक्र चलता रहता है। वाट्स एप पर आया भारतीय दर्शन भी यही कहता है।

आमतौर पर  लगता तो यही है कि महंगाई फिर लौट आई है। अच्छा लौटता है। बुरा लौटता है।अच्छा बुरा सब लौटकर आ ही जाता है। मौसम और ऋतुएं लौटती हैं। गर्मी जाती है तो बारिश लौट आती है। बाढ़, सुनामी,भूकम्प सब लौट लौट आते हैं। पतझड़ जाता है तो बसंत लौट आता है। दुख के बाद सुख लौटता है। रुदन के बाद मुस्कुराहट लौटती है। तालिबान लौटता है, हिटलर लौट आते हैं। रूपांतरित होकर साम्राज्यवाद लौटता है, समाजवाद के खंडहरों में हरियाली की बिदाई के बाद पूंजीवाद की जैकेट पहनकर प्रजातंत्र लौट आता है।  आतंकवाद लौटता है। दूर का,पास का,अच्छा आतंकवाद, बुरा आतंकवाद सब लौटते हैं। इमरजेंसी लौटती है। नाम बदलकर लौटते हैं तो कभी उसी तरह लौट आते हैं जैसे पहले आए थे। लौट लौट आना इस सृष्टि की रीत है।

अवतारी पुरुष लौट आते हैं। सोने की चिड़िया लौट आती है। स्वस्थ होने पर तन लौटता है, मन स्वस्थ होने पर सनातन लौट आता है। ऐसे में पहले की 'महंगाई ' लौट आती है तो किसी को कोई दिक्कत कैसे हो सकती है!  महंगाई डायन पहले भी आई थी। आती रहती है। इसका आना प्रकृति सम्मत है। वैसे भी वह बर्फ में दबे जीव की तरह हमेशा जिंदा रहती है। थोड़ी गर्मी पड़ी कि बर्फ पिघलने लगती है और यह डायन पुनः धरातल पर दृष्टिगोचर हो जाती है। 

हम शोर मचाने लगते हैं कि 'महंगाई डायन' लौट आई है। दरअसल वह गई ही कहाँ थी? यहीं बर्फ के नीचे दबी अपने को संस्कारित कर रही थी। अबकी लौटी यह डायन पहले जैसी बुरी आत्मा नहीं है। संस्कारित होकर 'अच्छी डायन' बनकर आई है। इसलिए इसके आने से किसी को कोई परेशानी नहीं है। उल्टे इसकी प्रशंसा है कि इसने अपने को संस्कारित कर लिया है। इसके संस्कारित होने से लोगों की क्रय क्षमता में उछाल आए या न आए किन्तु जीडीपी में वृध्दि अवश्य होगी।

स्वागत है 'अच्छी डायन', माफ करें ,स्वागत है महंगाई मौसी,मौसीजी । पहले तुम साठ, सत्तर रुपयों में एक लीटर पेट्रोल से आग लगा देती थी, अस्सी रुपयों के सरसों तेल में बने भोजन से भी परिवार भूख से बिलखने लगते थे। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं था। तुम्हारे पास संस्कार नहीं थे, तुम्हारा चरित्र ही भ्रष्ट था। अब ऐसा नहीं है। अब तुम अच्छी हो गई हो प्रिय महंगाई।

अब सौ से ऊपर के पेट्रोल और डेढ़ सौ रुपयों के खाद्य तेल में भी हमारा जीवन खुशहाल है। हमें कोई आपत्ति नहीं है मौसीजी। तुम आराम से रहो। हममें से अधिकांश को जीने की आवश्यक सामग्री हमारी संवेदनशील सरकारें निशुल्क उपलब्ध करा ही रही हैं। जो थोड़े उच्च वर्ग के लोग हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, वे वितरक हैं,उत्पादक हैं। मध्यमवर्गीय लोग झंडा उठाए हैं।  तो प्यारी महंगाई मौसीजी तुम बिल्कुल हमारी चिंता मत करो और जब तक चाहो,यहाँ रहो। तुम अब चरित्रवान हो गई हो, भली और ममतामयी हो गई हो, यही क्या कम बड़ी बात है। तुम्हे अब डायन कोई नहीं कहेगा, आराम से रहो। 

मंत्रीजी ने ठीक ही कहा है, टमाटर ही क्या, जो भी महंगा होगा उसे हम घर में उगा लेंगे। इस्तेमाल करना छोड़ देंगे। महंगाई से राहत का यह बड़ा अच्छा उपाय सुझाया है माननीय ने। क्यों न हम लोग महंगी शक्कर खरीदने से बचने के लिए आज ही आंगन में गन्ने की बुवाई शुरू करने की पहल करें। पेट्रोल के इंतजाम के लिए बेकयार्ड में तेल के कुएं खोदने में जुट जाएं। आत्म निर्भर बनना हमारे लिए ही नहीं देश के लिए भी सचमुच गौरव की बात होगी।

ब्रजेश कानूनगो



कच्चे कान वालों की व्यथा

कच्चे कान वालों की व्यथा


जंगल का राजा जब शिकार की तलाश में निकलता है तो जरा सी हलचल या आहट उसके कान खड़े कर देती है। आम बस्तियों में भी चूहों के इंतजार में बिल्लियां सदैव अपने कान खड़े किए इधर उधर सूंघती फिरती हैं। शिकारियों के मजबूत इरादे उनके कान से होकर गुजरते हैं। शिकार को कानों कान ख़बर नहीं होने देते कि कभी भी उन्हें दबोचा जा सकता है।  कानों को लेकर यह प्रवृत्ति इंसानों  में भी प्रायः देखी जा सकती है।

कुछ लोग कान के बड़े कच्चे होते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे लोगों के कान बहुत नाजुक होते हैं और हल्की सी बात का भार वे अधिक देर तक उठा नहीं पाते होंगे। बात ठीक इससे उलट है।दरअसल किसी व्यक्ति का कान का कच्चा होना इस बात का प्रमाण होता है कि उस व्यक्ति का कान नहीं बल्कि मन बड़ा कोमल होता है। ऐसे लोगों को सच्चा,झूठा कुछ भी कह दो वे विश्वास कर लिया करते हैं।  चतुर और अपना हित साधने वाले पक्के लोग सदैव कच्चे कानों की तलाश में रहते हैं। मौका मिलते ही उनके कानों पर कब्जा कर लेते हैं।

कान के कच्चे होने को गुण या दुर्गुण जो भी कह लें किंतु  धारण करने वाले सुपात्रों के कानों में स्वार्थ सिद्धि का मंत्र फूंक कर मंतव्य साधा जा सकता है। उन्हें बड़ी आसानी से बरगलाया जा सकता है। इन दिनों यह अभियान हर क्षेत्र में जोर शोर से जारी है। चाहे आपको अपना उत्पाद बेचना हो या विचार। धरती, समुद्र और आकाश की बोलियां लगानी हो। लोकतंत्र के बाजार में वोटर खरीदना हो या विधायक, कच्चे कान वाले भोले लोगों का शिकार जारी है। हमारे इस प्रलाप से कहीं आपके कान ही न पकने लगे हों लेकिन यह हकीकत है। सोशल मीडिया,अखबारों और टीवी चैनलों के जरिए हम सबके कानों में ऐसे ही मंत्र फूंके जा रहे हैं।

आंखों देखी और कानों सुनी का मुहावरा अब  अर्धसत्य है। किसी की आंखों देखी,कानों तक पहुंचते पहुंचते सच्चाई खो देती है। हमारी आंखों देखी हमारे ही कानों में झूठ की झंकार बनकर लौट आती है। सच की पड़ताल की फाइलों को झूठ की तिजोरियों में बंद कर दिया जाता है। दीवारों के कान तो होते ही नहीं, दीवारों की जुबानें भी नहीं होती।

आपने सुना होगा,ऊंचाई पर पहुंचने पर हमारे कान बंद हो जाते हैं। लोग पहाड़ चढें या हवाई जहाज में उड़ें, सत्ता का सिंहासन हो या समृद्धि का शिखर, कानों पर एक सा असर डालते हैं। ऊपर वाले को कुछ सुनाई नहीं देता। यह स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है। नीचे खड़ा आदमी गलत कहता है कि ऊपर वाले ने कानों में तेल डाला हुआ है। दरअसल वह सुनने की स्थिति में होता ही नहीं। यह उसकी चढ़ाई का अंतिम पड़ाव होता है। प्रारंभ में उसे एक कान से सुनाई भी देता है लेकिन दूसरे कान से निकल जाता है। कान से वह अनुलोम विलोम भी नहीं कर पाता है। कान बंद हो जाते हैं। उसके कानों पर किसी भी पुकार से जूं तक नहीं रेंगती। घंटे,घड़ियाल और नगाड़ों के भारी शोर से भी इस समस्या का उपचार नहीं हो पाता।  हम आप जैसे कान के कच्चे लोग इन पक्के लोगों की इस परेशानी को समझ ही नहीं सकते!

ब्रजेश कानूनगो





 

Thursday, July 20, 2023

वीडियो जनित संवेदना

वीडियो जनित संवेदना

साधुरामजी क्षुब्ध थे। आते ही बोले, मणिपुर की शर्मनाक घटना का वीडियो आज ही आना था क्या? यह सब षड्यंत्र है। देश विरोधी ताकतें ऐसे मौकों का इंतजार करती रहती हैं,जब हमारी संसद या विधान सभा का सत्र शुरू होता है तब ही ये लोग ऐसी हरकतें करते हैं। हमारे देश और प्रजातंत्र को बदनाम करने का शर्मनाक तरीका है यह।

लेकिन साधुरामजी मणिपुर तो कई महीनों से जल रहा है। इंटरनेट भी बंद हैं। खुद वहां के मुख्यमंत्री ने कहा है कि ऐसी अनेक घटनाएं हुईं हैं, जिन पर जल्दी ही सख्त कदम उठाए जाएंगे। अपराधियों को छोड़ा नहीं जाएगा। मैने कहा।

राज्य ने केंद्र को खबर देने में लगता है विलंब कर दिया। वो तो अच्छा हुआ कहीं से यह वीडियो देश के लोगों तक पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर सरकारों से अपनी ओर से जवाब तलब किया। तब जाकर...। मैं अपनी बात पूरी करता उसके पहले ही साधुरामजी बोल पड़े...

सच कहा आपने। पीएम भी इस अप्रत्याशित घटना और आकस्मिक सूचना से कितने दुखी हो उठे हैं। घटना घटते ही खबर मिल जाती तो अब तक तो अपराधी फांसी पर झूल रहे होते।

लेकिन गृह विभाग की अपनी भी प्रणाली होती है, गुप्तचर होते हैं,एजेंसियां होती हैं जो गृहमंत्रालय को सचेत कर सकती थीं। मैने बात आगे बढ़ाई।

वो सब तो ठीक है,पर वीडियो कहां आया था अब तक। वीडियो आना जरूरी है। संवेदना और चेतना तभी जागृत हो पाती है जब वीडियो आता है। 

यह ग्लोबल विश्व का डिजिटल भारत है, बिना वीडियो साक्ष्य के कार्यवाही आगे नहीं बढ़ती। महिला पहलवान भी वीडियो नहीं दे पाए थे तो न्याय में विलंब होता गया। कोई वीडियो आता है तभी माहौल बनता है, चेतना जागृत होती है,क्षोभ या गौरव का भाव स्खलित होने की स्थितियां निर्मित हो पाती हैं। किसी वायरल वीडियो से ही पता चलता है कि हम तरक्की कर रहे हैं, सम्मानित हो रहे हैं,विश्व में हमारा डंका बज रहा है। वीडियो आता है तभी पता चलता है कि बाहर के मुल्कों में किस तरह कुछ लोग हमें बदनाम कर रहे हैं। साधुरामजी ने स्पष्ट किया।

ये बात तो ठीक कही आपने। कुछ समय पहले एक मुख्यमंत्री ने भी भ्रष्टाचार रोकने के उपाय करते हुए अपने नागरिकों से कहा था, आप लोग रिश्वत मांगने वाले व्यक्ति को रिश्वत दे दें लेकिन उसका वीडियो बनाकर मुझे भेज दें। हम कारवाही करेंगें। मैने ज्ञान बघारा।

तो क्या वह प्रदेश अब भ्रष्टाचार मुक्त हो गया है? साधुरामजी ने जिज्ञासा व्यक्त की। 

पता नहीं! फिलहाल तो वहां के मंत्रीगण ही भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद हैं और किसी वीडियो के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं ताकि आरोप से मुक्त हो सकें। 

लेकिन यह जरूरी तो नहीं कि कोई वीडियो सच्चा ही होगा। आजकल तो तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि साधुरामजी के चेहरे पर किंग चार्ल्स की मुंडी चिपकाई जा सकती है। किसी की आवाज में अमिताभ बच्चन की खनक पैदा की जा सकती है। सुपर स्टार राजेश खन्ना की कही बात ही ठीक लगती है, दिल सच्चा और चेहरा झूठा!  मैने चुहुल की।

झूठ के बहुत सारे गवाह और सच के साक्ष्य भले ही कम ही क्यों न हों लेकिन न्यायमूर्ति की अदालत में सच्चाई आज भी प्रायः सामने आ ही जाती है, वीडियो उपलब्ध हो या न हो।  वे बोले।

पर यह तो तय है कि नींद उड़ाने के लिए वीडियो बहुत जरूरी होता है। मैने कहा। लेकिन ऐन संसद सत्र के शुरू होते ही वीडियो का आना तो निश्चित ही कोई षडयंत्र होगा। साधुरामजी बात पर अब भी दृढ़ थे।

जो भी हो मैं तो बिग बी साहब की बात पर विश्वास करता हूं जो उन्होंने त्रिशूल फिल्म में कहे थे, कोई चीज सही वक्त और सही मौके पर की जाए तो उसकी बात ही कुछ और होती है। उसका असर होता है। किसी को इसी मौके और वक्त का इंतजार रहा होगा साधुरामजी! मैने कहा तो वे खिन्न हो गए।

ब्रजेश कानूनगो